वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 91–100

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

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बालकाण्डे

ऋषिपुत्रवचः श्रुत्वा सर्वासां मतिरास वै ।

तदाश्रमपदं द्रष्टुं जग्मुः सर्वास्ततोऽङ्गनाः ॥ १६ ॥

" ऋषिकुमारकी यह बात सुनकर सब उनसे सहमत हो गयीं । फिर वे सब सुन्दरी स्त्रियाँ उनका आश्रम देखनेके लिये वहाँ गयीं ॥ १६ ॥

गतानां तु ततः पूजामृषिपुत्रश्चकार ह ।

इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं मूलं फलं च नः ॥ १७ ॥

" वहाँ जानेपर ऋषिकुमारने ' यह अर्घ्य है, यह पाद्य है तथा यह भोजनके लिये फल- मूल प्रस्तुत है ' ऐसा कहते हुए उन सबका विधिवत् पूजन किया ॥ १७ ॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां सर्वा एव समुत्सुकाः ।

ऋषेर्भीताश्च शीघ्रं तु गमनाय मतिं दधुः ॥ १८ ॥

“ ऋषिकी पूजा स्वीकार करके वे सभी वहाँसे चली जानेको उत्सुक हुईं । उन्हें विभाण्डक मुनिका भय लग रहा था, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही वहाँसे चली जानेका विचार किया ॥ १८ ॥

अस्माकमपि मुख्यानि फलानीमानि हे द्विज ।

गृहाण विप्र भद्रं ते भक्षयस्व च मा चिरम् ॥ १ ९ ॥

“ वे बोलीं – ‘ ब्रह्मन्! हमारे पास भी ये उत्तम-उत्तम फल हैं । विप्रवर! इन्हें ग्रहण कीजिये । आपका कल्याण हो । इन फलोंको शीघ्र ही खा लीजिये, विलम्ब न कीजिये ' ॥ १ ९ ॥

ततस्तास्तं समालिङ्ग्य सर्वा हर्षसमन्विताः ।

मोदकान् प्रददुस्तस्मै भक्ष्यांश्च विविधाञ्छुभान् ॥ २० ॥

" ऐसा कहकर उन सबने हर्षमें भरकर ऋषिका आलिंगन किया और उन्हें खानेयोग्य भाँति - भाँतिके उत्तम पदार्थ तथा बहुत - सी मिठाइयाँ दीं ॥ २० ॥

तानि चास्वाद्य तेजस्वी फलानीति स्म मन्यते ।

अनास्वादितपूर्वाणि वने नित्यनिवासिनाम् ॥ २१ ॥

" उनका रसास्वादन करके उन तेजस्वी ऋषिने समझा कि ये भी फल हैं; क्योंकि उस दिनके पहले उन्होंने कभी वैसे पदार्थ नहीं खाये थे । भला, सदा वनमें रहनेवालोंके लिये वैसी वस्तुओंके स्वाद लेनेका अवसर ही कहाँ है ॥२१ ॥

आपृच्छ्य च तदा विप्रं व्रतचर्यां निवेद्य च ।

गच्छन्ति स्मापदेशात्ता भीतास्तस्य पितुः स्त्रियः ॥ २२ ॥

" तत्पश्चात् उनके पिता विभाण्डक मुनिके डरसे डरी हुई वे स्त्रियाँ व्रत और अनुष्ठानकी बात बता उन ब्राह्मणकुमारसे पूछकर उसी बहाने वहाँसे चली गयी ॥२२ ॥

दशमः सर्गः ७ ९

गतासु तासु सर्वासु काश्यपस्यात्मजो द्विजः ।

अस्वस्थहृदयश्चासीद् दुःखाच्च परिवर्तते ॥ २३ ॥

" उन सबके चले जानेपर काश्यपकुमार ब्राह्मण ऋष्यश्रृंग मन - ही - मन व्याकुल हो उठे और बड़े दुःखसे इधर - उधर टहलने लगे ॥ २३ ॥

ततोऽपरेद्युस्तं देशमाजगाम स वीर्यवान् ।

विभाण्डकसुतः श्रीमान् मनसाचिन्तयन्मुहुः ॥। २४ ॥

मनोज्ञा यत्र ता दृष्टा वारमुख्याः स्वलंकृताः । " तदनन्तर दूसरे दिन फिर मनसे उन्हींका बारम्बार चिन्तन करते हुए शक्तिशाली विभाण्डककुमार श्रीमान् ऋष्यश्रृंग उसी स्थानपर गये, जहाँ पहले दिन उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे सजी हुई उन मनोहर रूपवाली वेश्याओंको देखा था ॥ २४३ ॥

दृष्ट्वैव च ततो विप्रमायान्तं हृष्टमानसाः ॥ २५ ॥

उपसृत्य ततः सर्वास्तास्तमूचुरिदं वचः ।

एह्याश्रमपदं सौम्य अस्माकमिति चाब्रुवन् ॥ २६ ॥

" ब्राह्मण ऋष्यशृंगको आते देख तुरंत ही उन वेश्याओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा । वे सब - की - सब उनके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहने लगीं - ' सौम्य! आओ, आज हमारे आश्रमपर चलो ॥ २५-२६ ॥

चित्राण्यत्र बहूनि स्युर्मूलानि च फलानि च ।

तत्राप्येष विशेषेण विधिर्हि भविता ध्रुवम् ॥ २७ ॥

यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके फल - मूल बहुत मिलते हैं तथापि वहाँ भी निश्चय ही इन सबका विशेषरूपसे प्रबन्ध हो सकता है ' ॥ २७ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तासां सर्वासां हृदयंगमम् ।

गमनाय मतिं चक्रे तं च निन्युस्तथा स्त्रियः ॥ २८ ॥

" उन सबके मनोहर वचन सुनकर ऋष्यश्रृंग उनके साथ जानेको तैयार हो गये और वे स्त्रियाँ उन्हें अंगदेशमें ले गयीं ॥ २८ ॥

तत्र चानीयमाने तु विप्रे तस्मिन् महात्मनि ।

ववर्ष सहसा देवो जगत् प्रह्लादयंस्तदा ॥ २ ९ ॥

" उन महात्मा ब्राह्मणके अंगदेशमें आते ही इन्द्रने सम्पूर्ण जगत्को प्रसन्न करते हुए सहसा पानी बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ २ ९ ॥

वर्षेणैवागतं विप्रं तापसं स नराधिपः ।

प्रत्युद्गम्य मुनिं प्रह्वः शिरसा च महीं गतः ॥ ३० ॥

" वर्षासे ही राजाको अनुमान हो गया कि वे तपस्वी ब्राह्मणकुमार आ गये । फिर बड़ी विनयके साथ

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८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

राजाने उनकी अगवानी की और पृथ्वीपर मस्तक ।

टेककर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया ॥

अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायतः सुसमाहितः ।

वने प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत् ॥ ३१ ॥

" फिर एकाग्रचित्त होकर उन्होंने ऋषिको अर्घ्य निवेदन किया तथा उन विप्रशिरोमणिसे वरदान माँगा, ' भगवन्! आप और आपके पिताजीका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो । ' ऐसा उन्होंने इसलिये किया कि कहीं कपटपूर्वक यहाँतक लाये जानेका रहस्य जान लेनेपर विप्रवर ऋष्यश्रृंग अथवा विभाण्डक मुनिके मनमें मेरे प्रति क्रोध न हो ॥ ३१ ॥

अन्तःपुरं प्रवेश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि ।

शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप सः ॥ ३२ ॥

" तत्पश्चात् ऋष्यश्रृंगको अन्तःपुरमें ले जाकर उन्होंने शान्तचित्तसे अपनी कन्या शान्ताका उनके साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया । ऐसा करके राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३२ ॥

एवं स न्यवसत् तत्र सर्वकामैः सुपूजितः ।

ऋष्यश्रृंगो महातेजाः शान्तया सह भार्यया ॥ ३३ ॥

" इस प्रकार महातेजस्वी ऋष्यश्रृंग राजासे पूजित हो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोग प्राप्त कर अपनी धर्मपत्नी शान्ताके साथ वहाँ रहने लगे ' ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥१० ॥

एकादशः सर्गः सुमन्त्रके कहनेसे राजा दशरथका सपरिवार अंगराजके यहाँ जाकर वहाँसे शान्ता और ऋष्यश्रृंगको अपने घर ले आना

भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम् ।

यथा स देवप्रवरः कथयामास बुद्धिमान् ॥ १ ॥

तदनन्तर सुमन्त्रने फिर कहा - " राजेन्द्र! आप पुनः मुझसे अपने हितकी वह बात सुनिये, जिसे देवताओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंको सुनाया था ॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः ।

नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः ॥ २ ॥

“ उन्होंने कहा था — इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक परम धार्मिक सत्यप्रतिज्ञ राजा होंगे ॥ २ ॥

अंगराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति ।

कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति ॥ ३ ॥

पुत्रस्त्वंगस्य राज्ञस्तु रोमपाद इति श्रुतः ।

तं स राजा दशरथो गमिष्यति महायशाः ॥ ४ ॥

अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शान्ताभर्ता मम क्रतुम् ।

आहरेत त्वयाऽऽज्ञप्तः संतानार्थं कुलस्य च ॥ ५ ॥

" उनकी अंगराजके साथ मित्रता होगी । दशरथके एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जिसका नाम होगा ' शान्ता ' * । अंगदेशके राजकुमारका नाम होगा ' रोमपाद ' । महायशस्वी राजा दशरथ उनके पास जायँगे और कहेंगे — ' धर्मात्मन्! मैं संतानहीन हूँ । यदि आप आज्ञा दें तो शान्ताके पति ऋष्यश्रृंग मुनि चलकर मेरा यज्ञ करा दें । इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति होगी और मेरे वंशकी रक्षा हो जायगी ' ॥ ३–५ ॥

श्रुत्वा राज्ञोऽथ तद् वाक्यं मनसा स विचिन्त्य च ।

प्रदास्यते पुत्रवन्तं शान्ताभर्तारमात्मवान् ॥ ६ ॥

" राजाकी यह बात सुनकर मन - ही - मन उसपर विचार करके मनस्वी राजा रोमपाद शान्ताके पुत्रवान् पतिको उनके साथ भेज देंगे ॥ ६ ॥

प्रतिगृह्य च तं विप्रं स राजा विगतज्वरः ।

आहरिष्यति तं यज्ञं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ७ ॥

" ब्राह्मण ऋष्यशृंगको पाकर राजा दशरथकी सारी चिन्ता दूर हो जायगी और वे प्रसन्नचित्त होकर उस यज्ञका अनुष्ठान करेंगे ॥ ७ ॥

तं च राजा दशरथो यशस्कामः कृताञ्जलिः ।

ऋष्यशृंगं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित् ॥ ८ ॥

यज्ञार्थं प्रसवार्थं च स्वर्गार्थं च नरेश्वरः ।

लभते च स तं कामं द्विजमुख्याद् विशाम्पतिः ॥ ९ ॥

" यशकी इच्छा रखनेवाले धर्मज्ञ राजा दशरथ हाथ * शान्ता राजा दशरथ एवं कौसल्याकी औरस पुत्री थी । उन्होंने राजा रोमपादको उसे दत्तक पुत्रीके रूपमें दिया था । इस प्रकार वह राजा दशरथकी औरसी और राजा रोमपादकी दत्तक कन्या थी । ( श्रीविष्णुपुराण ४ । १८ । १७-१८ )

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बालकाण्डे एकादशः सर्गः ८१ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ ऋष्यश्रृंगका यज्ञ, पुत्र और स्वर्गके । लिये वरण करेंगे तथा वे प्रजापालक नरेश उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षिसे अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेंगे ॥ ८ - ९ ॥

पुत्राश्चास्य भविष्यन्ति चत्वारोऽमितविक्रमाः ।

वंशप्रतिष्ठानकराः सर्वभूतेषु विश्रुताः ॥ १० ॥

“ राजाके चार पुत्र होंगे, जो अप्रमेय पराक्रमी, वंशकी मर्यादा बढ़ानेवाले और सर्वत्र विख्यात होंगे ॥

एवं स देवप्रवरः पूर्वं कथितवान् कथाम् ।

सनत्कुमारो भगवान् पुरा देवयुगे प्रभुः ॥ ११ ॥

" महाराज! पहले सत्ययुगमें शक्तिशाली देवप्रवर भगवान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंके समक्ष ऐसी कथा कही थी ॥११ ॥

स त्वं पुरुषशार्दूल समानय सुसत्कृतम् ।

स्वयमेव महाराज गत्वा सबलवाहनः ॥ १२ ॥

" पुरुषसिंह महाराज! इसलिये आप स्वयं ही सेना और सवारियोंके साथ अंगदेशमें जाकर मुनिकुमार ऋष्यशृंगको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइये ” ॥ १२ ॥

सुमन्त्रस्य वचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथोऽभवत् ।

अनुमान्य वसिष्ठं च सूतवाक्यं निशाम्य च ॥ १३ ॥

सान्तःपुरः सहामात्यः प्रययौ यत्र स द्विजः । सुमन्त्रका वचन सुनकर राजा दशरथको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने मुनिवर वसिष्ठजीको भी सुमन्त्रकी बातें सुनायीं और उनकी आज्ञा लेकर रनिवासकी रानियों तथा मन्त्रियोंके साथ अंगदेशके लिये प्रस्थान किया, जहाँ विप्रवर ऋष्यश्रृंग निवास करते थे ॥ १३३ ॥

वनानि सरितश्चैव व्यतिक्रम्य शनैः शनैः ॥ १४ ॥

अभिचक्राम तं देशं यत्र वै मुनिपुंगवः । मार्गमें अनेकानेक वनों और नदियोंको पार करके वे धीरे - धीरे उस देशमें जा पहुँचे, जहाँ मुनिवर ऋष्यश्रृंग विराजमान थे ॥ १४३ ॥

आसाद्य तं द्विजश्रेष्ठं रोमपादसमीपगम् ॥ १५ ॥

ऋषिपुत्रं ददर्शाथो दीप्यमानमिवानलम् । वहाँ पहुँचनेपर उन्हें द्विजश्रेष्ठ ऋष्यश्रृंग रोमपादके पास ही बैठे दिखायी दिये । वे ऋषिकुमार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे ॥ १५३ ॥

ततो राजा यथायोग्यं पूजां चक्रे विशेषतः ॥ १६ ॥

सखित्वात् तस्य वै राज्ञः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।

रोमपादेन चाख्यातमृषिपुत्राय धीमते ॥ १७ ॥

सख्यं सम्बन्धकं चैव तदा तं प्रत्यपूजयत् । प्रसन्न हृदयसे महाराज दशरथका शास्त्रोक्त विधिके अनुसार विशेषरूपसे पूजन किया और बुद्धिमान् ऋषिकुमार ऋष्यशृंगको राजा दशरथके साथ अपनी मित्रताकी बात बतायी । उसपर उन्होंने भी राजाका सम्मान किया ॥ एवं सुसत्कृतस्तेन सहोषित्वा नरर्षभः ॥ १८ ॥

सप्ताष्टदिवसान् राजा राजानमिदमब्रवीत् ।

शान्ता तव सुता राजन् सह भर्त्रा विशाम्पते ॥ १ ९ ॥

मदीयं नगरं यातु कार्यं हि महदुद्यतम् । इस प्रकार भलीभाँति आदर - सत्कार पाकर नरश्रेष्ठ राजा दशरथ रोमपादके साथ वहाँ सात - आठ दिनों तक रहे । इसके बाद वे अंगराजसे बोले - ' प्रजापालक नरेश! तुम्हारी पुत्री शान्ता अपने पतिके साथ मेरे नगरमें पदार्पण करे; क्योंकि वहाँ एक महान् आवश्यक कार्य उपस्थित हुआ है ' ॥ १८-१९ ३ ॥ तथेति राजा संश्रुत्य गमनं तस्य धीमतः ॥ २० ॥

उवाच वचनं विप्रं गच्छ त्वं सह भार्यया ।

ऋषिपुत्रः प्रतिश्रुत्य तथेत्याह नृपं तदा ॥ २१ ॥

राजा रोमपादने ' बहुत अच्छा ' कहकर उन बुद्धिमान् महर्षिका जाना स्वीकार कर लिया और ऋष्यश्रृंगसे कहा— ' विप्रवर! आप शान्ताके साथ महाराज दशरथके यहाँ जाइये । ' राजाकी आज्ञा पाकर उन ऋषिपुत्रने ' तथास्तु ' कहकर राजा दशरथको अपने चलनेकी स्वीकृति दे दी ॥ २०-२१ ॥

स नृपेणाभ्यनुज्ञातः प्रययौ सह भार्यया ।

तावन्योन्याञ्जलिं कृत्वा स्नेहात्संश्लिष्य चोरसा ॥ २२ ॥

ननन्दतुर्दशरथो रोमपादश्च वीर्यवान् ।

ततः सुहृदमापृच्छ्य प्रस्थितो रघुनन्दनः ॥ २३ ॥

राजा रोमपादकी अनुमति ले ऋष्यश्रृंगने पत्नीके साथ वहाँसे प्रस्थान किया । उस समय शक्तिशाली राजा रोमपाद और दशरथने एक - दूसरेको हाथ जोड़कर स्नेहपूर्वक छातीसे लगाया तथा अभिनन्दन किया । फिर मित्रसे विदा ले रघुकुलनन्दन दशरथ वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २२-२३ ॥

पौरेषु प्रेषयामास दूतान् वै शीघ्रगामिनः ।

क्रियतां नगरं सर्वं क्षिप्रमेव स्वलंकृतम् ॥ २४ ॥

धूपितं सिक्तसम्पृष्टं पताकाभिरलंकृतम् । उन्होंने पुरवासियोंके पास अपने शीघ्रगामी दूत भेजे और कहलाया कि ' समस्त नगरको शीघ्र ही सुसज्जित किया जाय । सर्वत्र धूपकी सुगन्ध फैले । तदनन्तर राजा रोमपादने मित्रताके नाते अत्यन्त | नगरकी सड़कोंको झाड़ - बुहारकर उनपर पानीका छिड़काव

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८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कर दिया जाय तथा सारा नगर ध्वजा - पताकाओंसे अलंकृत हो ' ॥ २४३ ॥

ततः प्रहृष्टाः पौरास्ते श्रुत्वा राजानमागतम् ॥ २५ ॥

तथा चक्रुश्च तत् सर्वं राज्ञा यत् प्रेषितं तदा । राजाका आगमन सुनकर पुरवासी बड़े प्रसन्न हुए । महाराजने उनके लिये जो संदेश भेजा था, उसका उन्होंने उस समय पूर्णरूपसे पालन किया ॥ २५३ ॥

ततः स्वलंकृतं राजा नगरं प्रविवेश ह ॥ २६ ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्ह्रादैः पुरस्कृत्वा द्विजर्षभम् । तदनन्तर राजा दशरथने शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ विप्रवर ऋष्यश्रृंगको आगे करके अपने सजे - सजाये नगरमें प्रवेश किया ॥ २६३ ॥

ततः प्रमुदिताः सर्वे दृष्ट्वा वै नागरा द्विजम् ॥ २७ ॥

प्रवेश्यमानं सत्कृत्य नरेन्द्रेणेन्द्रकर्मणा ।

यथा दिवि सुरेन्द्रेण सहस्त्राक्षेण काश्यपम् ॥ २८ ॥

उन द्विजकुमारका दर्शन करके सभी नगरनिवासी बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने इन्द्रके समान पराक्रमी नरेन्द्र दशरथके साथ पुरीमें प्रवेश करते हुए ऋष्यशृंगका उसी | प्रकार सत्कार किया, जैसे देवताओंने स्वर्गमें सहस्राक्ष इन्द्रके साथ प्रवेश करते हुए कश्यपनन्दन वामनजीका समादर किया था॥२७-२८ ॥

अन्तःपुरं प्रवेश्यैनं पूजां कृत्वा च शास्त्रतः ।

कृतकृत्यं तदात्मानं मेने तस्योपवाहनात् ॥ २ ९ ॥

ऋषिको अन्तःपुरमें ले जाकर राजाने शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया और उनके निकट आ जानेसे अपनेको कृतकृत्य माना ॥ २ ९ ॥

अन्तःपुराणि सर्वाणि शान्तां दृष्ट्वा तथागताम् ।

सह भर्त्रा विशालाक्षीं प्रीत्यानन्दमुपागमन् ॥ ३० ॥

विशाललोचना शान्ताको इस प्रकार अपने पतिके साथ उपस्थित देख अन्तःपुरकी सभी रानियोंको बड़ी

प्रसन्नता हुई । वे आनन्दमग्न हो गयीं ॥ ३० ॥

पूज्यमाना तु ताभिः सा राज्ञा चैव विशेषतः ।

उवास तत्र सुखिता कञ्चित् कालं सहद्विजा ॥ ३१ ॥

शान्ता भी उन रानियोंसे तथा विशेषतः महाराज दशरथके द्वारा आदर - सत्कार पाकर वहाँ कुछ कालतक । अपने पति विप्रवर ऋष्यश्रृंगके साथ बड़े सुखसे रही ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ॥

द्वादशः सर्गः राजाका ऋषियोंसे यज्ञ करानेके लिये प्रस्ताव, ऋषियोंका राजाको और राजाका मन्त्रियोंको यज्ञकी आवश्यक तैयारी करनेके लिये आदेश देना

ततः काले बहुतिथे कस्मिंश्चित् सुमनोहरे ।

वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत् ॥ १ ॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जानेके पश्चात् कोई परम मनोहर - दोषरहित समय प्राप्त हुआ । उस समय वसन्त ऋतुका आरम्भ हुआ था । राजा दशरथने उसी शुभ समयमें यज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया ॥ १ ॥

ततः प्रणम्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम् ।

यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य च ॥ २ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने देवोपम कान्तिवाले विप्रवर ऋष्यश्रृंगको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पुत्र - प्राप्तिके निमित्त यज्ञ करानेके उद्देश्यसे उनका वरण किया ॥ २ ॥

तथेति च स राजानमुवाच वसुधाधिपम् ।

सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् ॥ ३ ॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् । ऋष्यशृंगने ' बहुत अच्छा ' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन पृथ्वीपति नरेशसे कहा — ‘ राजन! यज्ञकी सामग्री एकत्र कराइये । भूमण्डलमें भ्रमणके लिये आपका यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय और सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय ' ॥ ३३ ॥

ततोऽब्रवीन्नृपो वाक्यं ब्राह्मणान् वेदपारगान् ॥४ ॥

सुमन्त्रावाहय क्षिप्रमृत्विजो ब्रह्मवादिनः ।

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम् ॥ ५ ॥

पुरोहितं वसिष्ठं च ये चान्ये द्विजसत्तमाः । तब राजाने कहा — ' सुमन्त्र! तुम शीघ्र ही वेदविद्या पारंगत ब्राह्मणों तथा ब्रह्मवादी ऋत्विजोंको बुला आओ । सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उन सबको बुलाओ ' ॥ ततः सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः ॥ ६ ॥

समानयत् स तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान् ।

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बालकाण्डे द्वादशः सर्गः ८३

तब शीघ्रगामी सुमन्त्र तुरंत जाकर वेदविद्याके ।

पारगामी उन समस्त ब्राह्मणोंको बुला लाये ॥ ६३ ॥

तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा ॥ ७ ॥

धर्मार्थसहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् । धर्मात्मा राजा दशरथने उन सबका पूजन किया और उनसे धर्म तथा अर्थसे युक्त मधुर वचन कहा ॥७३ ॥

मम तातप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वै सुखम् ॥ ८ ॥

पुत्रार्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम । ‘ महर्षियो! मैं पुत्रके लिये निरन्तर संतप्त रहता हूँ । उसके बिना इस राज्य आदिसे भी मुझे सुख नहीं मिलता है । अतः मैंने यह विचार किया है कि पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करूँ ॥ ८३ ॥

तदहं यष्टुमिच्छामि हयमेधेन कर्मणा ॥ ९ ॥

ऋषिपुत्रप्रभावेण कामान् प्राप्स्यामि चाप्यहम् । ' इसी संकल्पके अनुसार मैं अश्वमेध यज्ञका आरम्भ करना चाहता हूँ । मुझे विश्वास है कि ऋषिपुत्र ऋष्यशृंगके प्रभावसे मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लूँगा ' ॥९ ३ ॥ ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन् ॥ १० ॥

वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखाच्च्युतम् । राजा दशरथके मुखसे निकले हुए इस वचनकी वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोंने ' साधु - साधु ' कहकर बड़ी सराहना की ॥१०३ ॥

ऋष्यशृंगपुरोगाश्च प्रत्यूचुर्नृपतिं तदा ॥ ११ ॥

सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् ।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् ॥ १२ ॥

इसके बाद ऋष्यश्रृंग आदि सब महर्षियोंने उस समय राजा दशरथसे पुनः यह बात कही - ' महाराज! यज्ञसामग्रीका संग्रह किया जाय, यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय ॥ ११-१२ ॥

सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रांश्चतुरोऽमितविक्रमान् ।

यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता ॥ १३ ॥

' तुम यज्ञद्वारा सर्वथा चार अमित पराक्रमी पुत्र प्राप्त करोगे; क्योंकि पुत्रके लिये तुम्हारे मनमें ऐसे धार्मिक विचारका उदय हुआ है ' ॥ १३ ॥

ततः प्रीतोऽभवद् राजा श्रुत्वा तु द्विजभाषितम् ।

अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षेणेदं शुभाक्षरम् ॥ १४ ॥

ब्राह्मणोंकी यह बात सुनकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने बड़े हर्षके साथ अपने मन्त्रियोंसे यह शुभ अक्षरोंवाली बात कही ॥ १४ ॥

गुरूणां वचनाच्छीघ्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे ।

समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम् ॥ १५ ॥

' गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार तुमलोग शीघ्र ही मेरे लिये यज्ञकी सामग्री जुटा दो । शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें यज्ञिय अश्व छोड़ा जाय और उसके साथ प्रधान ऋत्विज् भी रहें ॥ १५ ॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् ।

शान्तयश्चाभिवर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि ॥ १६ ॥

' सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो, शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमशः शान्तिकर्म - पुण्याहवाचन आदिका विस्तारपूर्वक अनुष्ठान किया जाय, जिससे विघ्नोंका निवारण हो ॥१६ ॥

शक्यः कर्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता ।

नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे ॥ १७ ॥

' यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं ॥१७ ॥

छिद्रं हि मृगयन्त्येते विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः ।

विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति ॥ १८ ॥

' परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि ये विद्वान् ब्रह्म - राक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं । विधिहीन यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है ॥१८ ॥

तद् यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते ।

तथा विधानं क्रियतां समर्थाः करणेष्विह ॥ १ ९ ॥

' अतः मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पूर्ण हो सके वैसा उपाय किया जाय । तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो ' ॥ १ ९ ॥

तथेति च ततः सर्वे मन्त्रिणः प्रत्यपूजयन् ।

पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथाज्ञप्तमकुर्वत ॥ २० ॥

तब ' बहुत अच्छा ' कहकर सभी मन्त्रियोंने राजराजेश्वर दशरथके उस कथनका आदर किया और उनकी आज्ञाके अनुसार सारी व्यवस्था की ॥ २० ॥

ततो द्विजास्ते धर्मज्ञमस्तुवन् पार्थिवर्षभम् ।

अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंने भी धर्मज्ञ नृपश्रेष्ठ दशरथकी प्रशंसा की और उनकी आज्ञा पाकर सब जैसे । आये थे, वैसे ही फिर चले गये ॥२१ ॥

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८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गतेषु तेषु विप्रेषु मन्त्रिणस्तान् नराधिपः । उन ब्राह्मणोंके चले जानेपर मन्त्रियोंको भी विदा विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामतिः ॥ २२ ॥ | करके वे महाबुद्धिमान् नरेश अपने महलमें गये ॥२२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२ ॥

त्रयोदशः सर्गः राजाका वसिष्ठजीसे यज्ञकी तैयारीके लिये अनुरोध, वसिष्ठजीद्वारा इसके लिये सेवकोंकी नियुक्ति और सुमन्त्रको राजाओंको बुलानेके लिये आदेश, समागत राजाओंका सत्कार तथा पत्नियोंसहित राजा

पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत् ।

प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान् ॥ १ ॥

वर्तमान वसन्त ऋतुके बीतनेपर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तबतक एक वर्षका समय पूरा हो गया । उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतानके लिये अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा लेनेके निमित्त वसिष्ठजीके समीप गये ॥

अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायतः प्रतिपूज्य च ।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम् ॥ २ ॥

वसिष्ठजीको प्रणाम करके राजाने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र - प्राप्तिका उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनिसे यह विनययुक्त बात कही ॥ २ ॥

यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव ।

यथा न विघ्नाः क्रियन्ते यज्ञांगेषु विधीयताम् ॥ ३ ॥

' ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधिके अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञके अंगभूत अश्व - संचारण आदिमें ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये ॥ ३ ॥

भवान् स्निग्धः सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान् ।

वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यतः ॥ ४ ॥

4 ' आपका मुझपर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद् — अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं । यह जो यज्ञका भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं ' ॥ ४ ॥

तथेति च स राजानमब्रवीद् द्विजसत्तमः ।

करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम् ॥५ ॥

तब ' बहुत अच्छा ' कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजासे इस प्रकार बोले- ' नरेश्वर! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा ' ॥ ५ ॥

ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान् ।

स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान् ॥ ६ ॥

दशरथका यज्ञकी दीक्षा लेना

कर्मान्तिकान् शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि ।

गणकान् शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान् ॥ ७ ॥

तथा शुचीन् शास्त्रविदः पुरुषान् सुबहुश्रुतान् ।

यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात् ॥ ८ ॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होनेतक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा – ' तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो ॥

इष्टका बहुसाहस्त्री शीघ्रमानीयतामिति ।

उपकार्याः क्रियन्तां च राज्ञो बहुगुणान्विताः ॥ ९ ॥

' शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायँ । राजाओंके ठहरनेके लिये उनके योग्य अन्न - पान आदि अनेक उपकरणोंसे युक्त बहुत - से महल बनाये जायँ ॥ ९ ॥

ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्याः शतशः शुभाः ।

भक्ष्यान्नपानैर्बहुभिः समुपेताः सुनिष्ठिताः ॥ १० ॥

' ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये । वे सभी गृह बहुत - से भोजनीय अन्न - पान आदि उपकरणोंसे युक्त तथा आँधी - पानी आदिके निवारणमें समर्थ हों ॥ १० ॥

तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तराः ।

आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥

' इसी तरह पुरवासियोंके लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये । दूरसे आये हुए भूपालोंके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायँ ॥११ ॥

वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि च ।

भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम् ॥ १२ ॥

' घोड़े और हाथियोंके लिये भी शालाएँ बनायी

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बालकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ८५ जायँ । साधारण लोगोंके सोनेके लिये भी घरोंकी व्यवस्था हो । विदेशी सैनिकोंके लिये भी बड़ी - बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये ॥ १२ ॥

आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिताः ।

तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम् ॥ १३ ॥

दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया । ' जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने - पीनेकी प्रचुर सामग्री संचित रहे । उनमें सभी मनोवांछित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियोंको भी बहुत सुन्दर अन्न भोजनके लिये देना चाहिये । वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं ॥ १३३ ॥

सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृताः ॥ १४ ॥

न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि । ' ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्णके लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें । काम और क्रोधके वशीभूत होकर भी किसीका अनादर नहीं करना चाहिये ॥ यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा ॥ १५ ॥

तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम् । ' जो शिल्पी मनुष्य यज्ञकर्मकी आवश्यक तैयारीमें लगे हों, उनका तो बड़े - छोटेका खयाल रखकर विशेषरूपसे समादर करना चाहिये ॥ १५३ ॥

ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन च ॥ १६ ॥

यथा सर्वं सुविहितं न किंचित् परिहीयते ।

तथा भवन्तः कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा ॥ १७ ॥

' जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदिके द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं । उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंगसे सम्पन्न होता है । उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अतः तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो ' ॥

ततः सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन् ।

यथेष्टं तत् सुविहितं न किंचित् परिहीयते ॥ १८ ॥

यथोक्तं तत् करिष्यामो न किंचित् परिहास्यते । तब वे सब लोग वसिष्ठजीसे मिलकर बोले-' आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही करनेके लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी । कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा । आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे । उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे ' ॥ १८३ ॥

ततः सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये च धार्मिकाः ।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव सहस्रशः ॥ २० ॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने सुमन्त्रको बुलाकर कहा— ' इस पृथ्वीपर जो - जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्त्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रित करो ॥ २० ॥

समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान् ।

मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम् ॥ २१ ॥

तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम् ।

पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा ततः पूर्वं ब्रवीमि ते ॥ २२ ॥

' सब देशोंके अच्छे लोगोंको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ । मिथिलाके स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं । उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर - सत्कारके साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ ॥ २१-२२ ॥

तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम् ।

सद्वृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व ह ॥ २३ ॥

' इसी प्रकार काशीके राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं । वे सदाचारी तथा देवताओंके तुल्य तेजस्वी हैं; अतः उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ ॥ २३ ॥

तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम् ।

श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय ॥ २४ ॥

' केकयदेशके बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथके श्वशुर हैं; अतः उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ ॥ २४ ॥

अंगेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम् ।

वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय ॥ २५ ॥

' अंगदेशके स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराजके मित्र हैं, अतः उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक आओ ॥ २५ ॥

तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम् ।

मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ २६ ॥

प्राप्तिज्ञं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम् । ' कोशलराज भानुमान्‌को भी सत्कारपूर्वक ले आओ । मगधदेशके राजा प्राप्तिज्ञको, जो | शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ ॥ २६३ ॥

राज्ञः शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान् ।

। प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्च पार्थिवान् ॥ २७ ॥

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८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' महाराजकी आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेशके श्रेष्ठ नरेशोंको तथा सिन्धु - सौवीर एवं सुराष्ट्र देशके भूपालोंको यहाँ आनेके लिये निमन्त्रण दो ॥ २७ ॥

दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व ह ।

सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजानः पृथिवीतले ॥ २८ ॥

तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान् ।

एतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया ॥ २ ९ ॥

' दक्षिण भारतके समस्त नरेशोंको भी आमन्त्रित करो । इस भूतलपर और भी जो - जो नरेश महाराजके प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे -सम्बन्धियोंसहित यथासम्भव शीघ्र बुला लो । महाराजकी आज्ञासे बड़भागी दूतोंद्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो ' ॥ २८-२९ ॥

वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा ।

व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान् ॥ ३० ॥

वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषको राजाओंकी बुलाहटके लिये जानेका आदेश दे दिया ॥ ३० ॥

स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात् ।

सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः ॥ ३१ ॥

परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञासे खास - खास राजाओंको बुलानेके लिये स्वयं ही गये ॥ ३१ ॥

ते च कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये ।

सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम् ॥ ३२ ॥

यज्ञकर्मकी व्यवस्थाके लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समयतक यज्ञसम्बन्धी जो - जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी ॥ ३२ ॥

ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत् ।

अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा ॥ ३३ ॥

अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशयः । यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले- ' भद्र पुरुषो! किसीको जो कुछ देना हो; उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाताको नष्ट कर देता है- इसमें संशय नहीं है ' ॥ ३३३ ॥

। ततः कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षितः ॥३४ ॥

बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य ह । तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद राजा लोग महाराज दशरथके लिये बहुत - से रत्नोंकी भेंट लेकर अयोध्या में आये ॥ ३४३ ॥

ततो वसिष्ठः सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत् ॥ ३५ ॥

उपयाता नरव्याघ्र राजानस्तव शासनात् ।

मयापि सत्कृताः सर्वे यथार्हं राजसत्तम ॥ ३६ ॥

इससे वसिष्ठजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने राजासे कहा - ' पुरुषसिंह! तुम्हारी आज्ञासे राजालोग यहाँ आ गये । नृपश्रेष्ठ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है ॥ ३५-३६ ॥

यज्ञियं च कृतं सर्वं पुरुषैः सुसमाहितैः ।

निर्यातु च भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात् ॥ ३७ ॥

' हमारे कार्यकर्ताओंने पूर्णतः सावधान रहकर यज्ञके लिये सारी तैयारी की है । अब तुम भी यज्ञ करनेके लिये यज्ञमण्डपके समीप चलो ॥ ३७ ॥

सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्ततः । 8

द्रष्टुमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम् ॥ ३८ ॥

' राजेन्द्र! यज्ञमण्डपमें सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं । आप स्वयं चलकर देखें । यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मनके संकल्पसे ही बन गया हो'॥३८ ॥

तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृंगस्य चोभयोः ।

दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपतिः ॥ ३ ९ ॥

मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग दोनोंके आदेशसे शुभ नक्षत्रवाले दिनको राजा दशरथ यज्ञके लिये राजभवनसे निकले ॥ ३ ९ ॥

ततो वसिष्ठप्रमुखाः सर्व एव द्विजोत्तमाः ।

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा ॥ ४० ॥

यज्ञवाटं गताः सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि ।

श्रीमांश्च सह पत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत् ॥ ४१ ॥

तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजोंने यज्ञमण्डपमें जाकर ऋष्यश्रृंगको आगे करके शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञकर्मका आरम्भ किया । पत्नियोंसहित श्रीमान् अवधनरेशने यज्ञकी दीक्षा भली ॥ ४०-४१ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥

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बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ८७ चतुर्दशः सर्गः महाराज दशरथके द्वारा अश्वमेध यज्ञका सांगोपांग अनुष्ठान

अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे ।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत ॥ १ ॥

इधर वर्ष पूरा होनेपर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डलमें भ्रमण करके लौट अया । फिर सरयू नदीके उत्तर तटपर राजाका यज्ञ आरम्भ हुआ ॥ १ ॥

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्द्विजर्षभाः ।

अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः ॥ २ ॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऋष्यशृंगको आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्म करने लगे ॥२ ॥

कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगाः ।

यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रतः ॥ ३ ॥

यज्ञ करानेवाले सभी ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधिके अनुसार सब कर्मोंका उचित रीतिसे सम्पादन करते थे और शास्त्रके अनुसार किस क्रमसे किस समय कौन - सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्ममें प्रवृत्त होते थे ॥ ३ ॥

प्रवर्ग्यं शास्त्रतः कृत्वा तथैवोपसदं द्विजाः ।

चक्रुश्च विधिवत् सर्वमधिकं कर्म शास्त्रतः ॥ ४ ॥

ब्राह्मणोंने प्रवर्ग्य ( अश्वमेधके अंगभूत कर्मविशेष ) का शास्त्र ( विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र ) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टिविशेषका भी शास्त्र के अनुसार ही अनुष्ठान किया । तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेशसे अधिक जो अतिदेशतः प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया ॥४ ॥

अभिपूज्य तदा हृष्टाः सर्वे चक्रुर्यथाविधि ।

प्रातः सवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुंगवाः ॥ ५ ॥

तदनन्तर तत्तत् कर्मोंके अंगभूत देवताओंका पूजन करके हर्षमें भरे हुए उन सभी मुनिवरोंने विधिपूर्वक प्रातःसवन आदि ( अर्थात् प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन ) कर्म किये ॥५ ॥

ऐन्द्रश्च विधिवद् दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघः ।

माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम् ॥ ६॥

इन्द्रदेवताको विधिपूर्वक हविष्यका भाग अर्पित किया गया । पापनिवर्तक राजा सोम ( सोमलता ) * का रस निकाला गया । फिर क्रमशः माध्यन्दिनसवनका कार्य प्रारम्भ हुआ ॥ ६ ॥

तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः ।

चक्रुस्ते शास्त्रतो दृष्ट्वा यथा ब्राह्मणपुंगवाः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने शास्त्रसे देख-भालकर मनस्वी राजा दशरथके तृतीय सवनकर्मका भी विधिवत् सम्पादन किया ॥ ७ ॥

आह्वयाञ्चक्रिरे तत्र शक्रादीन् विबुधोत्तमान् ।

ऋष्यशृंगादयो मन्त्रैः शिक्षाक्षरसमन्वितैः ॥ ८ ॥

ऋष्यशृंग आदि महर्षियोंने वहाँ अभ्यासकालमें सीखे गये अक्षरोंसे युक्त – स्वर और वर्णसे सम्पन्न मन्त्रोंद्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंका आवाहन किया ॥ ८ ॥

गीतिभिर्मधुरैः स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हतः ।

होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम् ॥ ९ ॥

मधुर एवं मनोरम सामगानके लयमें गाये हुए आह्वान - मन्त्रोंद्वारा देवताओंका आवाहन करके होताओंने उन्हें उनके योग्य हविष्यके भाग समर्पित किये ॥ ९ ॥

न चाहुतमभूत् तत्र स्खलितं वा न किंचन ।

दृश्यते ब्रह्मवत् सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे ॥ १० ॥

उस यज्ञमें कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी । कहीं कोई भूल नहीं हुई— अनजानमें भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था । महर्षियोंने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये ॥ १० ॥

न तेष्वहःसु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते ।

नाविद्वान् ब्राह्मणः कश्चिन्नाशतानुचरस्तथा ॥ ११ ॥

यज्ञके दिनोंमें कोई भी ऋत्विज् थका - माँदा या भूखा- प्यासा नहीं दिखायी देता था । उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों ॥११ ॥

ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते ।

तापसा भुञ्जते चापि श्रमणाश्चैव भुञ्जते ॥ १२ ॥

उस यज्ञमें प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे | ( क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे ) तथा शूद्रोंको * इस विषयमें सूत्रकारका वचन है— सोमं राजानं दृषदि निधाय...... दृषद्भिरभिहन्यात् अर्थात् ' राजा सोम ( सोमलता ) को पत्थरपर रखकर........ पत्थरसे कूँचे ।

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८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भी भोजन उपलब्ध होता था । तापस और श्रमण भी भोजन करते थे ॥ १२ ॥

वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तथैव च ।

अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते ॥ १३ ॥

बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे । भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहनेपर भी किसीका मन नहीं भरता था ॥ १३ ॥

दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च ।

इति संचोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकशः ॥ १४ ॥

‘ अन्न दो, नाना प्रकारके वस्त्र दो ' अधिकारियोंकी ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे ॥१४ ॥

अन्नकूटाश्च दृश्यन्ते बहवः पर्वतोपमाः ।

दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत् तदा ॥ १५ ॥

वहाँ प्रतिदिन विधिवत् पके हुए अन्नके बहुत-से पर्वतों - जैसे ढेर दिखायी देते थे ॥ १५ ॥

नानादेशादनुप्राप्ताः पुरुषाः स्त्रीगणास्तथा ।

अन्नपानैः सुविहितास्तस्मिन् यज्ञे महात्मनः ॥ १६ ॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस यज्ञमें नाना देशोंसे आये हुए स्त्री - पुरुष अन्न - पानद्वारा भलीभाँति तृप्त किये गये थे ॥ १६ ॥

अन्नं हि विधिवत्स्वादु प्रशंसन्ति द्विजर्षभाः ।

अहो तृप्ताः स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघवः ॥ १७ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘ भोजन विधिवत् बनाया गया है । बहुत स्वादिष्ट है ' – ऐसा कहकर अन्नकी प्रशंसा करते थे । भोजन करके उठे हुए लोगोंके मुखसे राजा सदा यही सुनते थे कि ' हमलोग खूब तृप्त हुए । आपका कल्याण हो ' ॥ १७ ॥

स्वलंकृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान् पर्यवेषयन् ।

उपासन्ते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ १८ ॥

वस्त्र - आभूषणोंसे अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे और उन लोगोंकी जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे ॥ १८ ॥

कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान् बहूनपि ।

प्राहुः सुवाग्मिनो धीराः परस्परजिगीषया ॥ १ ९ ॥

एक सवन समाप्त करके दूसरे सवनके आरम्भ होनेसे पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता * तथा च सूत्रम् — ' चतुर्विंशत्यङ्गुलयोऽरत्निः ' अर्थात् | धीर ब्राह्मण एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे ॥ १ ९ ॥

दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजाः ।

सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिताः ॥ २० ॥

उस यज्ञमें नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्रके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करते थे ॥ २० ॥

नाषडंगविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुतः ।

सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशलो द्विजः ॥ २१ ॥

राजाके उस यज्ञमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगोंका ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो । वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद - विवादमें कुशल न हो ॥२१ ॥

प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन् षड् बैल्वाः खादिरास्तथा ।

तावन्तो बिल्वसहिताः पर्णिनश्च तथा परे ॥ २२ ॥

जब यूप खड़ा करनेका समय आया, तब बेलकी लकड़ीके छः यूप गाड़े गये । उतने ही खैरके यूप खड़े किये गये तथा पलाशके भी उतने ही यूप थे, जो बिल्वनिर्मित यूपोंके साथ खड़े किये गये थे ॥ २२ ॥

श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा ।

द्वावेव तत्र विहितौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ ॥ २३ ॥

बहेड़ेके वृक्षका एक यूप अश्वमेध यज्ञके लिये विहित है । देवदारुके बने हुए यूपका भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छः । देवदारुके दो ही यूप विहित हैं । दोनों बाँहें फैला देनेपर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूरपर वे दोनों स्थापित किये गये थे ॥ २३ ॥

कारिताः सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदैः ।

शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालंकृता भवन् ॥ २४ ॥

यज्ञकुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंने ही इन सब यूपोंका निर्माण कराया था । उस यज्ञकी शोभा बढ़ानेके लिये उन सबमें सोना जड़ा गया था ॥ २४ ॥

एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नयः ।

वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृताः ॥ २५ ॥

पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस - इक्कीस अरनि * ( पाँच सौ चार अंगुल ) ऊँचे बनाये गये थे । उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ोंसे अलंकृत किया गया था ॥ २५ ॥

विन्यस्ता विधिवत् सर्वे शिल्पिभिः सुकृता दृढाः ।

। अष्टास्त्रयः सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विताः ॥ २६ ॥

एक अरत्नि चौबीस अङ्गुलके बराबर होता है ।