वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 101–110

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ८ ९ कारीगरोंद्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे । वे सब-के - सब आठ कोणोंसे सुशोभित थे । उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी ॥ २६ ॥

आच्छादितास्ते वासोभिः पुष्पैर्गन्धैश्च पूजिताः ।

सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि ॥ २७ ॥

उन्हें वस्त्रोंसे ढक दिया गया था और पुष्प-चन्दनसे उनकी पूजा की गयी थी । जैसे आकाशमें तेजस्वी सप्तर्षियोंकी शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डपमें वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे ॥ २७ ॥

इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः ।

चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शिल्पकर्मणि ॥ २८ ॥

सूत्रग्रन्थोंमें बताये अनुसार ठीक मापसे ईंटें तैयार करायी गयी थीं । उन ईंटोंके द्वारा यज्ञसम्बन्धी शिल्पिकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंने अग्निका चयन किया था ॥ २८ ॥

स चित्यो राजसिंहस्य संचितः कुशलैर्द्विजैः ।

गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मकः ॥ २ ९ ॥

राजसिंह महाराज दशरथके यज्ञमें चयनद्वारा सम्पादित अग्निकी कर्मकाण्डकुशल ब्राह्मणोंद्वारा शास्त्रविधिके अनुसार स्थापना की गयी । उस अग्निकी आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़की - सी प्रतीत होती थी । सोनेकी ईंटोंसे पंखका निर्माण होनेसे उस गरुड़के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे । प्रकृत- अवस्थामें चित्य - अग्निके छः प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञमें उसका प्रस्तार तीनगुना हो जाता है । इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारोंसे युक्त थी ॥ २ ९ ॥

नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम् ।

उरगाः पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिताः ॥ ३० ॥

वहाँ पूर्वोक्त यूपोंमें शास्त्रविहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओंके उद्देश्यसे बाँधे गये थे ॥ ३० ॥

शामित्रे तु हस्तत्र तथा जलचराश्च ये ।

ऋषिभिः सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा ॥ ३१ ॥

शामित्र कर्ममें यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियोंने उन सबको शास्त्रविधिके अनुसार पूर्वोक्त यूपमें बाँध दिया ॥ ३१ ॥

पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा ।

अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह ॥ ३२ ॥

* जातिके अनुसार नाम अलग - अलग होते हैं । जातिकी ही थीं । उस समय उन यूपमें तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथका वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था ॥ ३२ ॥

कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्ततः ।

कृपाणैर्विशशारैनं त्रिभिः परमया मुदा ॥ ३३ ॥

रानी कौसल्याने वहाँ प्रोक्षण आदिके द्वारा सब ओरसे उस अश्वका संस्कार करके बड़ी प्रसन्नताके साथ तीन तलवारोंसे उसका स्पर्श किया ॥ ३३ ॥

पतत्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा ।

अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया ॥ ३४ ॥

तदनन्तर कौसल्या देवीने सुस्थिर चित्तसे धर्मपालनकी इच्छा रखकर उस अश्वके निकट एक रात निवास किया ॥ ३४ ॥

होताध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन् ।

महिष्या परिवृत्त्यार्थं वावातामपरां तथा ॥ ३५ ॥

तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाताने राजाकी ( क्षत्रियजातीय ) महिषी ' कौसल्या ', ( वैश्यजातीय स्त्री ) ' वावाता ' तथा ( शूद्रजातीय स्त्री ) ' परिवृत्ति ' – इन सबके हाथसे उस अश्वका स्पर्श कराया * ॥ ३५ ॥

पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः ।

ऋत्विक्परमसम्पन्नः श्रपयामास शास्त्रतः ॥ ३६ ॥

इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधिपूर्वक अश्वकन्दके गूदेको निकालकर शास्त्रोक्त रीतिसे पकाया ॥ ३६ ॥

धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः ।

यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् उस गूदेकी आहुति दी गयी । राजा दशरथने अपने पापको दूर करनेके लिये ठीक समय पर आकर विधिपूर्वक उसके धूएँकी गन्धको सूँघा ॥३७ ॥

हयस्य यानि चांगानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः ।

अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः षोडशर्त्विजः ॥ ३८ ॥

उस अश्वमेध यज्ञके अंगभूत जो - जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्निमें विधिवत् आहुति देने लगे ॥ ३८ ॥

प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हविः ।

अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते ॥ ३ ९ ॥

अश्वमेधके अतिरिक्त अन्य यज्ञोंमें जो हवि दी | जाती है, वह पाकरकी शाखाओंमें रखकर दी जाती है; दशरथके तो कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों क्षत्रिय

पृष्ठ 102

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१० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे परंतु अश्वमेध यज्ञका हविष्य बेंतकी चटाईमें रखकर देनेका नियम है ॥ ३ ९ ॥

त्र्यहोऽश्वमेधः संख्यातः कल्पसूत्रेण ब्राह्मणैः ।

चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम् ॥ ४० ॥

उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरात्रं तथोत्तरम् ।

कारितास्तत्र बहवो विहिताः शास्त्रदर्शनात् ॥ ४१ ॥

कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थोंके द्वारा अश्वमेधके तीन सवनीय दिन बताये गये हैं । उनमेंसे प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम ( ' अग्निष्टोम ' ) कहा गया है । द्वितीय दिवस साध्य सवनको ' उक्थ्य ' नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवनका अनुष्ठान होता है, उसे ' अतिरात्र ' कहते हैं । उसमें शास्त्रीय दृष्टिसे विहित बहुत - से दूसरे- दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये ॥ ४०-४१ ॥

ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ ।

अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतुः ॥ ४२ ॥

ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित्, छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम — ये सब - के - सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेधके उत्तर कालमें सम्पादित हुए ॥ ४२ ॥

प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः ।

अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् ॥ ४३ ॥

अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने यज्ञ

। एवं दत्त्वा प्रहृष्टोऽभूच्छ्रीमानिक्ष्वाकुनन्दनः ।

ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकिल्बिषम् ॥ ४६ ॥

यों दान देकर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथके हर्षकी सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेशसे इस प्रकार बोले- ॥ ४६ ॥

भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति ।

न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने ॥ ४७ ॥

' महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं । हममें इसके पालनकी शक्ति नहीं है; अतः भूमिसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है ॥४७ ॥

रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप ।

निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति ॥ ४८ ॥

' भूमिपाल! हम तो सदा वेदोंके स्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं ( इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता ); अतः आप हमें यहाँ इस भूमिका कुछ निष्क्रय ( मूल्य ) ही दे दें ॥ ४८ ॥

मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम् ।

तत् प्रयच्छ नृपश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम् ॥ ४ ९ ॥

' नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणारूपसे दे दीजिये । इस धरती से हमें कोई प्रयोजन नहीं है ' ॥ ४ ९ ॥

एवमुक्तो नरपतिब्रीह्मणैर्वेदपारगैः ।

गवां शतसहस्त्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः ॥ ५० ॥

पूर्ण होनेपर होताको दक्षिणारूपमें अयोध्यासे पूर्व दशकोटिं सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम् । दिशाका सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्युको पश्चिम दिशा तथा ब्रह्माको दक्षिण दिशाका राज्य दे दिया ॥ ४३ ॥

उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणैषा विनिर्मिता ।

अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा ॥ ४४ ॥

इसी तरह उद्गाताको उत्तर दिशाकी सारी भूमि दे दी । पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माजीने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऐसी ही दक्षिणाका विधान किया गया है * ॥ ४४ ॥

क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः ।

ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरां तां कुलवर्धनः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने ऋत्विजोंको सारी पृथ्वी दान कर दी । ४५ ॥ वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान कीं । दस करोड़ स्वर्णमुद्रा तथा उससे चौगुनी रजतमुद्रा अर्पित की ॥ ऋत्विजस्तु ततः सर्वे प्रददुः सहिता वसु ॥५१ ॥

ऋष्यशृंगाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते । तब उस समस्त ऋत्विजोंने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यश्रृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठको सौंप दिया ॥५१३ ॥

ततस्ते न्यायतः कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमाः ॥ ५२ ॥

सुप्रीतमनसः सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम् । तदनन्तर उन दोनों महर्षियोंके सहयोगसे उस धनका न्यायपूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन - ही - मन बड़े प्रसन्न हुए और बोले- महाराज! इस * ' प्रजापतिरश्वमेधमसृजत ( प्रजापतिने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया । ) ' इस श्रुतिके द्वारा यह सूचित होता है कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस महायज्ञका अनुष्ठान किया था । इसमें दक्षिणारूपसे प्रत्येक दिशाके दानका विधान कल्पसूत्रद्वारा किया गया है । यथा— ' प्रतिदिशं दक्षिणां ददाति प्राची दिग्धोतुर्दक्षिणा ब्रह्मणः प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्गातुः ' ॥

पृष्ठ 103

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बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ९ १ दक्षिणासे हम लोग बहुत संतुष्ट हैं ' ॥ ५२३ ॥

ततः प्रसर्पकेभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहितः ॥ ५३ ॥

जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा । इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथने अभ्यागत ब्राह्मणको एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्णकी मुद्राएँ बाँटीं ॥ ५३३ ॥

दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम् ॥ ५४ ॥

कस्मैचिद् याचमानाय ददौ राघवनन्दनः । [ सारा धन दे देनेके बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब ] एक दरिद्र ब्राह्मणने आकर राजासे धनकी याचना की । उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेशने उसे अपने हाथका उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया ॥ ५४३ ॥

ततः प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सलः ॥ ५५ ॥

प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रियः । तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उनपर स्नेह रखनेवाले नरेशने उन सबको प्रणाम किया । प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्षसे विह्वल हो रही थीं ॥ ५५३ ॥

तस्याशिषोऽथ विविधा ब्राह्मणैः समुदाहृताः ॥ ५६ ॥

उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च । पृथ्वीपर पड़े हुए उन उदार नरवीरको ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके आशीर्वाद दिये ॥ ५६३ ॥

ततः प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम् ॥ ५७ ॥

पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभैः । तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञका पुण्यफल पाकर राजा दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । वह यज्ञ उनके सब पापोंका नाश करनेवाला तथा उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाला था । साधारण राजाओंके लिये उस यज्ञको आदिसे अन्ततक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था ॥ ततोऽब्रवीदृष्यशृंगं राजा दशरथस्तदा ॥ ५८ ॥

कुलस्य वर्धनं तत् तु कर्तुमर्हसि सुव्रत । यज्ञ समाप्त होनेपर राजा दशरथने ऋष्यशृंगसे कहा - ' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! अब जो कर्म मेरी कुलपरम्पराको बढ़ानेवाला हो, उसका सम्पादन आपको करना चाहिये ' ॥ ५८३ ॥

तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः ।

भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः ॥ ५ ९ ॥

तब द्विजश्रेष्ठ ऋष्यश्रृंग ' तथास्तु ' कहकर राजासे बोले — ' राजन्! आपके चार पुत्र होंगे, जो इस कुलके भारको वहन करनेमें समर्थ होंगे ' ॥ ५ ९ ॥ स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्रः । जगाम ह परमं महात्मा तमृष्यशृंगं पुनरप्युवाच ॥ ६० ॥

उनका यह मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले महामना महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षको प्राप्त हुए तथा उन्होंने ऋष्यशृंगको पुनः पुत्रप्राप्ति करानेवाले कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये प्रेरित किया ॥ ६० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १४ ॥

पञ्चदशः सर्गः ऋष्यशृंगद्वारा राजा दशरथके पुत्रेष्टि यज्ञका आरम्भ, देवताओंकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीका रावणके वधका उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णुका देवताओंको आश्वासन देना मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम् । इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात् । लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत् ॥ १ ॥ अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः ॥ २ ॥

महात्मा ऋष्यश्रृंग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता ' महाराज! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये थे । उन्होंने थोड़ी देरतक ध्यान लगाकर अपने भावी अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा । वेदोक्त कर्तव्यका निश्चय किया । फिर ध्यानसे विरत हो वे विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य राजासे इस प्रकार बोले— ॥१ ॥ सफल होगा ' ॥ २ ॥

पृष्ठ 104

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९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय

ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात् ।

जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ३ ॥ ।

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौतविधिके अनुसार अग्निमें आहुति डाली ॥ ३ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि ॥ ४ ॥

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधिके अनुसार अपना - अपना भाग ग्रहण करनेके लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए ॥४ ॥

ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः ।

अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः ॥ ५ ॥

उस यज्ञ - सभामें क्रमशः एकत्र होकर ( दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए ) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले - ॥ ५ ॥

भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः ।

सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः ॥ ६ ॥

' भगवन्! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है । हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें ॥ ६ ॥

त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा ।

मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे ॥ ७ ॥

' प्रभो! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है । तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं ॥ ७ ॥

उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः ।

शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ ८ ॥

' उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकोंदम कर रखा है । वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है । देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है ॥ ८ ॥

ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा ।

अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः ॥ ९ ॥

‘ आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है ॥ ९ ॥

नैनं सूर्यः प्रतपति पार्श्वे वाति न मारुतः ।

चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते ॥ १० ॥

' सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते । वायु उसके । पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरंगें सदा ऊपर- र - नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध - सा हो जाता है — उसमें कम्पन नहीं होता ॥ १० ॥

तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात् ।

वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि ॥११ ॥

' वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है । उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन्! उसके वधके लिये आपको कोई - न - कोई उपाय अवश्य करना चाहिये ' ॥ ११ ॥

एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत् ।

हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः ॥१२ ॥

तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम् ।

अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया ॥ १३ ॥

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले — ' देवताओ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया । उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ । मैंने भी ' तथास्तु ' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ १२-१३ ॥

नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा ।

तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्युर्नान्योऽस्य विद्यते ॥ १४ ॥

' मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होनेका वरदान नहीं माँगा । इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा । मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्युका कारण नहीं है ' ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम् ।

देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा ॥ १५ ॥

ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः ।

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः ॥ १६ ॥

वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा ।

तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥ १७ ॥

ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः । इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे । उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे ।

पृष्ठ 105

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बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ९ ३ उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्णके बने केयूर । प्रकाशित हो रहे थे । उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये ॥ १६ - १७३ ॥ तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्ट्रय संनताः ॥ १८ ॥

त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया । तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तुति करके कहा - ' सर्वव्यापी परमेश्वर! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं ॥ १८३ ॥

दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ॥ १ ९ ॥

धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः ।

अस्य भार्यासु तिसृषु ह्री श्रीकीर्त्यपमासु च ॥ २० ॥

विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् ।

तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् ॥ २१ ॥

अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम् । ' प्रभो! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं । उनके तीन रानियाँ हैं जो ह्री, श्री और कीर्ति - इन तीन देवियोंके समान हैं । विष्णुदेव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये । इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये ॥ १ ९ –२१३ ॥ स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान् ॥ २२ ॥

राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योद्रेकेण बाधते । ' वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है ॥२२३ ॥

ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ २३ ॥

क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः । ' उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है ॥ २३३ ॥

वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह ॥ २४ ॥

सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः । ' इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं ॥२४३ ॥

त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप ॥ २५ ॥

वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु । ' शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये ' ॥ २५३ ॥

एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः ॥ २६ ॥

पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः ।

अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान् ॥ २७ ॥

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोक-वन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा— ॥ २६-२७ ॥

भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम् ।

सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम् ॥ २८ ॥

हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम् ।

दशवर्षसहस्त्राणि दशवर्षशतानि च ॥ २ ९ ॥

वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम् । ' देवगण! तुम्हारा कल्याण हो । तुम भयको त्याग दो । मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धु - बान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा । देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा ' ॥ २८-२९ ३ ॥ एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान् ॥ ३० ॥

मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः । देवताओंको ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णुने मनुष्यलोकमें पहले अपनी जन्मभूमिके सम्बन्धमें विचार किया ॥ ३०३ ॥

ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् ॥ ३१ ॥

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् । इसके बाद कमलनयन श्रीहरिने अपनेको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके राजा दशरथको पिता बनानेका निश्चय किया ॥ ३१३ ॥

ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः ।

स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३२ ॥

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया ॥ ३२ ॥

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९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम् । विरावणं साधुतपस्विकण्टकं तपस्विनामुद्धर तं भयावहम् ॥३३ ॥

वे कहने लगे- ' प्रभो! रावण बड़ा उद्दण्ड है । उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमण्ड बहुत बढ़ा - चढ़ा है । वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है । तीनों लोकोंको रुलाता है, साधुओं और तपस्वी जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसोंको भय देनेवाले उस भयानक राक्षसकी आप जड़ उखाड़ डालिये ॥ ३३ ॥

तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं विरावणं रावणमुग्रपौरुषम् । स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम् ॥ ३४ ॥

' उपेन्द्र! सारे जगत्‌को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु - बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग - द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है'॥३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १५ ॥

षोडशः सर्गः देवताओंका श्रीहरिसे रावणवधके लिये मनुष्यरूपमें अवतीर्ण होनेको कहना, राजाके पुत्रेष्टि यज्ञमें अग्निकुण्डसे प्राजापत्य पुरुषका प्रकट होकर खीर अर्पण करना और उसे खाकर रानियोंका गर्भवती होना

ततो नारायणो विष्णुर्नियुक्तः सुरसत्तमैः ।

जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ देवताओंद्वारा इस प्रकार रावणवधके लिये नियुक्त होनेपर सर्वव्यापी नारायणने रावणवधके उपायको जानते हुए भी देवताओंसे यह मधुर वचन कहा — ॥ १ ॥

उपाय: को वधे तस्य राक्षसाधिपतेः सुराः ।

यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम् ॥ २ ॥

‘ देवगण! राक्षसराज रावणके वधके लिये कौन-सा उपाय है, जिसका आश्रय लेकर मैं महर्षियोंके लिये कण्टकरूप उस निशाचरका वध करूँ? ' ॥ २ ॥

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम् ।

मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे ॥ ३ ॥

उनके इस तरह पूछनेपर सब देवता उन अविनाशी भगवान् विष्णुसे बोले- ' प्रभो! आप मनुष्यका रूप धारण करके युद्धमें रावणको मार डालिये ॥ ३ ॥

स हि तेपे तपस्तीव्रं दीर्घकालमरिंदमः ।

येन तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा लोककृल्लोकपूर्वजः ॥ ४ ॥

' उस शत्रुदमन निशाचरने दीर्घकालतक तीव्र तपस्या की थी, जिससे सब लोगोंके पूर्वज लोकस्रष्टा ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हो गये ॥ ४ ॥

संतुष्टः प्रददौ तस्मै राक्षसाय वरं प्रभुः ।

नानाविधेभ्यो भूतेभ्यो भयं नान्यत्र मानुषात् ॥५ ॥

' उसपर संतुष्ट हुए भगवान् ब्रह्माने उस राक्षसको यह वर दिया कि तुम्हें नाना प्रकारके प्राणियोंमेंसे मनुष्यके सिवा और किसीसे भय नहीं है ॥५ ॥

अवज्ञाताः पुरा तेन वरदाने हि मानवाः ।

एवं पितामहात् तस्माद् वरदानेन गर्वितः ॥ ६ ॥

' पूर्वकालमें वरदान लेते समय उस राक्षसने मनुष्योंको दुर्बल समझकर उनकी अवहेलना कर दी थी । इस प्रकार पितामहसे मिले हुए वरदानके कारण उसका घमण्ड बढ़ गया है ॥६ ॥

उत्सादयति लोकांस्त्रीन् स्त्रियश्चाप्युपकर्षति ।

तस्मात् तस्य वधो दृष्टो मानुषेभ्यः परंतप ॥ ७ ॥

' शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! वह तीनों लोकोंको पीड़ा देता और स्त्रियोंका भी अपहरण कर लेता है; अतः उसका वध मनुष्यके हाथसे ही निश्चित हुआ है ' ॥ ७ ॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान् ।

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् ॥ ८ ॥

समस्त जीवात्माओंको वशमें रखनेवाले भगवान् विष्णुने देवताओंकी यह बात सुनकर अवतारकालमें राजा दशरथको ही पिता बनानेकी इच्छा की ॥ ८ ॥

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बालकाण्डे षोडशः सर्गः ९ ५

स चाप्यपुत्रो नृपतिस्तस्मिन् काले महाद्युतिः ।

अयजत् पुत्रियामिष्टिं पुत्रेप्सुररिसूदनः ॥ ९ ॥

उसी समय वे शत्रुसूदन महातेजस्वी नरेश पुत्रहीन होनेके कारण पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे ॥ ९ ॥

स कृत्वा निश्चयं विष्णुरामन्त्र्य च पितामहम् ।

अन्तर्धानं गतो देवैः पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ १० ॥

उन्हें पिता बनानेका निश्चय करके भगवान् विष्णु पितामहकी अनुमति ले देवताओं और महर्षियोंसे पूजित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ १० ॥

ततो वै यजमानस्य पावकादतुलप्रभम् ।

प्रादुर्भूतं महद् भूतं महावीर्यं महाबलम् ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए राजा दशरथके यज्ञमें अग्निकुण्डसे एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ । उसके शरीरमें इतना प्रकाश था, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी । उसका बल - पराक्रम महान् था ॥ ११ ॥

कृष्णं रक्ताम्बरधरं रक्तास्यं दुन्दुभिस्वनम् ।

स्निग्धहर्यक्षतनुजश्मश्रुप्रवरमूर्धजम् ॥ १२ ॥

उसकी अंगकान्ति काले रंगकी थी । उसने अपने शरीरपर लाल वस्त्र धारण कर रखा था । उसका मुख भी लाल ही था । उसकी वाणीसे दुन्दुभिके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी । उसके रोम, दाढ़ी - मूँछ और बड़े - बड़े केश चिकने और सिंहके समान थे ॥ १२ ॥

शुभलक्षणसम्पन्नं दिव्याभरणभूषितम् ।

शैलश्रृंगसमुत्सेधं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ॥ १३ ॥

वह शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शैलशिखरके समान ऊँचा तथा गर्वीले सिंहके समान चलनेवाला था ॥ १३ ॥

दिवाकरसमाकारं दीप्तानलशिखोपमम् ।

तप्तजाम्बूनदमयीं राजतान्तपरिच्छदाम् ॥ १४ ॥

दिव्यपायससम्पूर्णां पात्रीं पत्नीमिव प्रियाम् ।

प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्यां स्वयं मायामयीमिव ॥ १५ ॥

उसकी आकृति सूर्यके समान तेजोमयी थी । वह प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान देदीप्यमान हो रहा था । उसके हाथमें तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णकी बनी हुई परात थी, जो चाँदीके ढक्कनसे ढँकी हुई थी । वह ( परात ) थाली बहुत बड़ी थी और दिव्य खीरसे भरी हुई थी । उसे उस पुरुषने स्वयं अपनी दोनों भुजाओंपर इस तरह उठा रखा था, मानो कोई रसिक अपनी प्रियतमा पत्नीको अङ्कमें लिये हुए हो । वह अद्भुत परात मायामयी - सी जान पड़ती थी । १४-१५ ॥

समवेक्ष्याब्रवीद् वाक्यमिदं दशरथं नृपम् ।

प्राजापत्यं नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृप ॥ १६ ॥

उसने राजा दशरथकी ओर देखकर कहा-' नरेश्वर! मुझे प्रजापतिलोकका पुरुष जानो । मैं प्रजापतिकी ही आज्ञासे यहाँ आया हूँ ' ॥ १६ ॥

ततः परं तदा राजा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ।

भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किमहं करवाणि ते ॥ १७ ॥

तब राजा दशरथने हाथ जोड़कर उससे कहा— ' भगवन्! आपका स्वागत है । कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥१७ ॥

अथो पुनरिदं वाक्यं प्राजापत्यो नरोऽब्रवीत् ।

राजन्नर्चयता देवानद्य प्राप्तमिदं त्वया ॥ १८ ॥

फिर उस प्राजापत्य पुरुषने पुनः यह बात कही-' राजन्! तुम देवताओंकी आराधना करते हो; इसीलिये तुम्हें आज यह वस्तु प्राप्त हुई है ॥ १८ ॥

इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम् ।

प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्यवर्धनम् ॥ १ ९ ॥

' नृपश्रेष्ठ! यह देवताओंकी बनायी हुई खीर है,

जो संतानकी प्राप्ति करानेवाली है । तुम इसे ग्रहण करो ।

यह धन और आरोग्यकी भी वृद्धि करनेवाली है ॥ १ ९ ॥

भार्याणामनुरूपाणामश्रीतेति प्रयच्छ वै ।

तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान् यदर्थं यजसे नृप ॥ २० ॥

' राजन्! यह खीर अपनी योग्य पत्नियोंको दो और कहो - ' तुमलोग इसे खाओ । ' ऐसा करनेपर उनके गर्भसे आपको अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होगी, जिनके लिये तुम यह यज्ञ कर रहे हो ' ॥ २० ॥

तथेति नृपतिः प्रीतः शिरसा प्रतिगृह्य ताम् ।

पात्रीं देवान्नसम्पूर्णां देवदत्तां हिरण्मयीम् ॥ २१ ॥

अभिवाद्य च तद्भूतमद्भुतं प्रियदर्शनम् ।

मुदा परमया युक्तश्चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥

राजाने प्रसन्नतापूर्वक ‘ बहुत अच्छा ' कहकर उस दिव्य पुरुषकी दी हुई देवान्नसे परिपूर्ण सोनेकी थालीको लेकर उसे अपने मस्तकपर धारण किया । फिर उस अद्भुत एवं प्रियदर्शन पुरुषको प्रणाम करके बड़े आनन्दके साथ उसकी परिक्रमा की॥२१-२२ ॥

ततो दशरथः प्राप्य पायसं देवनिर्मितम् ।

बभूव परमप्रीतः प्राप्य वित्तमिवाधनः ॥ २३ ॥

ततस्तदद्भुतप्रख्यं भूतं परमभास्वरम् ।

। संवर्तयित्वा तत् कर्म तत्रैवान्तरधीयत ॥२४ ॥

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९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे इस प्रकार देवताओंकी बनायी हुई उस खीरको । पाकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए, मानो निर्धनको धन मिल गया हो । इसके बाद वह परम तेजस्वी अद्भुत पुरुष अपना वह काम पूरा करके वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ २३-२४ ॥

हर्षरश्मिभिरुयोतं तस्यान्तःपुरमाबभौ ।

शारदस्याभिरामस्य चन्द्रस्येव नभोंऽशुभिः ॥ २५ ॥

उस समय राजाके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ हर्षोल्लाससे बढ़ी हुई कान्तिमयी किरणोंसे प्रकाशित हो ठीक उसी तरह शोभा पाने लगीं, जैसे शरत्कालके नयनाभिराम चन्द्रमाकी रम्य रश्मियोंसे उद्भासित होनेवाला आकाश सुशोभित होता है ॥ २५ ॥

सोऽन्तःपुरं प्रविश्यैव कौसल्यामिदमब्रवीत् ।

पायसं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रीयं त्विदमात्मनः ॥ २६ ॥

राजा दशरथ वह खीर लेकर अन्तःपुरमें गये और कौसल्यासे बोले — ' देवि! यह अपने लिये पुत्रकी प्राप्ति करानेवाली खीर ग्रहण करो ' ॥ २६ ॥

कौसल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा ।

अर्धादर्थं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥ २७ ॥

ऐसा कहकर नरेशने उस समय उस खीरका आधा भाग महारानी कौसल्याको दे दिया । फिर बचे हुए आधेका आधा भाग रानी सुमित्राको अर्पण किया ॥ २७ ॥

कैकेय्यै चावशिष्टार्थं ददौ पुत्रार्थकारणात् ।

प्रददौ चावशिष्टार्थं पायसस्यामृतोपमम् ॥ २८ ॥

अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः ।

एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक् ॥ २ ९ ॥

उन दोनोंको देनेके बाद जितनी खीर बच रही, उसका आधा भाग तो उन्होंने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे कैकेयीको दे दिया । तत्पश्चात् उस खीरका जो अवशिष्ट आधा भाग था, उस अमृतोपम भागको महाबुद्धिमान् नरेशने कुछ सोच - विचारकर पुनः सुमित्राको ही कर दिया । इस प्रकार राजाने अपनी सभी रानियोंको अलग - अलग खीर बाँट दी ॥ २८-२९ ॥

ताश्चैवं पायसं प्राप्य नरेन्द्रस्योत्तमस्त्रियः ।

सम्मानं मेनिरे सर्वाः प्रहर्षोदितचेतसः ॥ ३० ॥

महाराजकी उन सभी साध्वी रानियोंने उन हाथसे वह खीर पाकर अपना सम्मान समझा । उनके चित्तमें अत्यन्त हर्षोल्लास छा गया ॥३० ॥

ततस्तु ताः प्राश्य तमुत्तमस्त्रियो

महीपतेरुत्तमपायसं पृथक् ।

हुताशनादित्यसमानतेजसो-ऽचिरेण गर्भान् प्रतिपेदिरे तदा ॥ ३१ ॥

उस उत्तम खीरको खाकर महाराजकी उन तीनों साध्वी महारानियोंने शीघ्र ही पृथक् - पृथक् गर्भ धारण किया । उनके वे गर्भ अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥३१ ॥

ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ताः स्त्रियः प्ररूढगर्भाः प्रतिलब्धमानसः । बभूव हृष्टस्त्रिदिवे यथा हरिः सुरेन्द्रसिद्धर्षिगणाभिपूजितः ॥ ३२ ॥

तदनन्तर अपनी उन रानियोंको गर्भवती देख राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने समझा, मेरा मनोरथ सफल हो गया । जैसे स्वर्गमें इन्द्र, सिद्ध तथा ऋषियोंसे पूजित हो श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार भूतलमें देवेन्द्र, सिद्ध तथा महर्षियोंसे सम्मानित हो राजा । दशरथ संतुष्ट हुए थे ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥

सप्तदशः सर्गः ब्रह्माजीकी प्रेरणासे देवता आदिके द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियोंकी उत्पत्ति पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः । विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः ॥ २ ॥

उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम् ॥ १ ॥ मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे ।

जब भगवान् विष्णु महामनस्वी राजा दशरथके नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान् ॥ ३ ॥

पुत्रभावको प्राप्त हो गये, तब भगवान् ब्रह्माजीने सम्पूर्ण असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान् । देवताओंसे इस प्रकार कहा- ॥१ ॥ सर्वास्त्रगुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव ॥४ ॥

सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः । ‘ देवगण! भगवान् विष्णु सत्यप्रतिज्ञ, वीर और

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बालकाण्डे सप्तदशः सर्गः ९ ७ हम सब लोगोंके हितैषी हैं । तुमलोग उनके सहायकरूपसे । ऐसे पुत्रोंकी सृष्टि करो, जो बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, माया जाननेवाले, शूरवीर, वायुके समान वेगशाली, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, विष्णुतुल्य पराक्रमी, किसीसे परास्त न होनेवाले तरह - तरहके उपायोंके जानकार, दिव्य शरीरधारी तथा अमृतभोजी देवताओंके समान सब प्रकारकी अस्त्रविद्याके गुणोंसे सम्पन्न हों ॥

अप्सरस्सु च मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु च ।

यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्याधरीषु च ॥५ ॥

किन्नरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च ।

सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान् ॥ ६ ॥

' प्रधान - प्रधान अप्सराओं, गन्धर्वोंकी स्त्रियों, यक्ष और नागोंकी कन्याओं, रीछोंकी स्त्रियों, विद्याधरियों, किन्नरियों तथा वानरियोंके गर्भसे वानररूपमें अपने ही तुल्य पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करो ॥ ५-६ ॥

पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवानृक्षपुंगवः ।

जृम्भमाणस्य सहसा मम वक्त्रादजायत ॥ ७ ॥

' मैंने पहलेसे ही ऋक्षराज जाम्बवान्‌की सृष्टि कर रखी है । एक बार मैं जँभाई ले रहा था, उसी समय वह सहसा मेरे मुँहसे प्रकट हो गया ' ॥ ७ ॥

ते तथोक्ता भगवता तत् प्रतिश्रुत्य शासनम् ।

जनयामासुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिणः ॥ ८ ॥

भगवान् ब्रह्माके ऐसा कहनेपर देवताओंने उनकी आज्ञा स्वीकार की और वानररूपमें अनेकानेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ८ ॥

ऋषयश्च महात्मानः सिद्धविद्याधरोरगाः ।

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः ॥ ९ ॥

महात्मा, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, नाग और चारणोंने भी वनमें विचरनेवाले वानर - भालुओंके रूपमें वीर पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ९ ॥

वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् ।

सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतां वरः ॥ १० ॥

देवराज इन्द्रने वानरराज वालीको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया, जो महेन्द्र पर्वतके समान विशालकाय और बलिष्ठ था । तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यने सुग्रीवको जन्म दिया ॥ १० ॥

बृहस्पतिस्त्वजनयत् तारं नाम महाकपिम् ।

सर्ववानरमुख्यानां बुद्धिमन्तमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

बृहस्पतिने तार नामक महाकाय वानरको उत्पन्न किया, जो समस्त वानर सरदारोंमें परम बुद्धिमान् और श्रेष्ठ था ॥

धनदस्य सुतः श्रीमान् वानरो गन्धमादनः ।

विश्वकर्मा त्वजनयन्नलं नाम महाकपिम् ॥ १२ ॥

तेजस्वी वानर गन्धमादन कुबेरका पुत्र था ।

विश्वकर्माने नल नामक महान् वानरको जन्म दिया ॥ १२ ॥

पावकस्य सुतः श्रीमान् नीलोऽग्निसदृशप्रभः ।

तेजसा यशसा वीर्यादत्यरिच्यत वीर्यवान् ॥ १३ ॥

अग्निके समान तेजस्वी श्रीमान् नील साक्षात् अग्निदेवका ही पुत्र था । वह पराक्रमी वानर तेज, यश और बल - वीर्यमें सबसे बढ़कर था ॥ १३ ॥

रूपद्रविणसम्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ ।

मैन्दं च द्विविदं चैव जनयामासतुः स्वयम् ॥ १४ ॥

रूप - वैभवसे सम्पन्न, सुन्दर रूपवाले दोनों अश्विनीकुमारोंने स्वयं ही मैन्द और द्विविदको जन्म दिया था ॥ १४ ॥

वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम् ।

शरभं जनयामास पर्जन्यस्तु महाबलः ॥ १५ ॥

वरुणने सुषेण नामक वानरको उत्पन्न किया और महाबली पर्जन्यने शरभको जन्म दिया ॥ १५ ॥

मारुतस्यैौरसः श्रीमान् हनूमान् नाम वानरः ।

वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसम जवे ॥ १६ ॥

हनुमान् नामवाले ऐश्वर्यशाली वानर वायुदेवताके

औरस पुत्र थे । उनका शरीर वज्रके समान सुदृढ़ था ।

वे तेज चलनेमें गरुड़के समान थे ॥ १६ ॥

सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि ।

ते सृष्टा बहुसाहस्त्रा दशग्रीववधोद्यताः ॥ १७ ॥

सभी श्रेष्ठ वानरोंमें वे सबसे अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे । इस प्रकार कई हजार वानरोंकी उत्पत्ति हुई I । वे सभी रावणका वध करनेके लिये उद्यत रहते थे ॥ १७ ॥

अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः ।

ते गजाचलसंकाशा वपुष्मन्तो महाबलाः ॥ १८ ॥

उनके बलकी कोई सीमा नहीं थी । वे वीर, पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे । गजराजों और पर्वतोंके समान महाकाय तथा महाबली थे ॥ १८ ॥

ऋक्षवानरगोपुच्छाः क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे ।

यस्य देवस्य यद्रूपं वेषो यश्च पराक्रमः ॥ १ ९ ॥

अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् पृथक् ।

गोलांगूलेषु चोत्पन्नाः किंचिदुन्नतविक्रमाः ॥ २० ॥

रीछ, वानर तथा गोलांगूल ( लंगूर ) जातिके वीर । शीघ्र ही उत्पन्न हो गये । जिस देवताका जैसा रूप, वेष 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_5_1_Front

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९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे और पराक्रम था, उससे उसीके समान पृथक् - पृथक् पुत्र उत्पन्न हुआ । लंगूरोंमें जो देवता उत्पन्न हुए, वे देवावस्थाकी अपेक्षा भी कुछ अधिक पराक्रमी थे ॥ १ ९ - २० ॥

ऋक्षीषु च तथा जाता वानराः किन्नरीषु च ।

देवा महर्षिगन्धर्वास्तार्क्ष्ययक्षा यशस्विनः ॥ २१ ॥

नागाः किंपुरुषाश्चैव सिद्धविद्याधरोरगाः ।

बहवो जनयामासुर्हृष्टास्तत्र सहस्त्रशः ॥ २२ ॥

कुछ वानर रीछ जातिकी माताओंसे तथा कुछ किन्नरियोंसे उत्पन्न हुए । देवता, महर्षि, गन्धर्व, गरुड़, यशस्वी यक्ष, नाग, किम्पुरुष, सिद्ध, विद्याधर तथा सर्प जातिके बहुसंख्यक व्यक्तियोंने अत्यन्त हर्षमें भरकर सहस्त्रों पुत्र उत्पन्न किये ॥ २१-२२ ॥

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः ।

वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिणः ॥ २३ ॥

देवताओंका गुण गानेवाले वनवासी चारणोंने बहुत - से वीर, विशालकाय वानरपुत्र उत्पन्न किये । वे सब जंगली फल - मूल खानेवाले थे ॥ २३ ॥

अप्सरस्सु च मुख्यासु तथा विद्याधरीषु च ।

नागकन्यासु च तदा गन्धर्वीणां तनूषु च ।

कामरूपबलोपेता यथाकामविचारिणः ॥ २४ ॥

मुख्य - मुख्य अप्सराओं, विद्याधरियों, नागकन्याओं तथा गन्धर्व - पत्नियोंके गर्भसे भी इच्छानुसार रूप और बलसे युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करनेमें समर्थ वानरपुत्र उत्पन्न हुए ॥ २४ ॥

सिंहशार्दूलसदृशा दर्पेण च बलेन च ।

शिलाप्रहरणाः सर्वे सर्वे पर्वतयोधिनः ॥ २५ ॥

वे दर्प और बलमें सिंह और व्याघ्रोंके समान थे । पत्थरकी चट्टानोंसे प्रहार करते और पर्वत उठाकर लड़ते थे ॥२५ ॥

नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ।

विचालयेयुः शैलेन्द्रान् भेदयेयुः स्थिरान् द्रुमान् ॥ २६ ॥

वे सभी नख और दाँतोंसे भी शस्त्रोंका काम लेते थे । उन सबको सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंका ज्ञान था । वे पर्वतोंको भी हिला सकते थे और स्थिरभावसे खड़े हुए वृक्षोंको भी तोड़ डालनेकी शक्ति रखते थे ॥ २६ ॥

क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्रं सरितां पतिम् ।

दारयेयुः क्षितिं पद्भ्यामाप्लवेयुर्महार्णवान् ॥ २७ ॥

अपने वेगसे सरिताओंके स्वामी समुद्रको भी क्षुब्ध कर सकते थे । उनमें पैरोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर डालनेकी शक्ति थी । वे महासागरोंको भी लाँघ सकते थे ॥ २७ ॥

। नभस्तलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान् ।

गृह्णीयुरपि मातंगान् मत्तान् प्रव्रजतो वने ॥ २८ ॥

वे चाहें तो आकाशमें घुस जायँ, बादलोंको हाथोंसे पकड़ लें तथा वनमें वेगसे चलते हुए मतवाले गजराजोंको भी बन्दी बना लें ॥ २८ ॥

नर्दमानांश्च नादेन पातयेयुर्विहंगमान् ।

ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम् ॥२ ९ ॥

शतं शतसहस्त्राणि यूथपानां महात्मनाम् ।

ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपाः ॥ ३० ॥

घोर शब्द करते हुए आकाशमें उड़नेवाले पक्षियोंको भी वे अपने सिंहनादसे गिरा सकते थे । ऐसे बलशाली और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महाकाय वानर यूथपति करोड़ोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे । वे वानरोंके प्रधान यूथोंके भी यूथपति थे ॥ २ ९ -३० ॥

बभूवुर्यूथपश्रेष्ठान् वीरांश्चाजनयन् हरीन् ।

अन्ये ऋक्षवतः प्रस्थानुपतस्थुः सहस्रशः ॥ ३१ ॥

उन यूथपतियोंने भी ऐसे वीर वानरोंको उत्पन्न किया था, जो यूथपोंसे भी श्रेष्ठ थे । वे और ही प्रकारके वानर थे — इन प्राकृत वानरोंसे विलक्षण थे । उनमेंसे सहस्त्रों वानरयूथपति ऋक्षवान् पर्वतके शिखरोंपर निवास करने लगे ॥ ३१ ॥

अन्ये नानाविधान् शैलान् काननानि च भेजिरे ।

सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् ॥ ३२ ॥

भ्रातरावुपतस्थुस्ते सर्वे च हरियूथपाः ।

नलं नीलं हनूमन्तमन्यांश्च हरियूथपान् ॥ ३३ ॥

ते तार्क्ष्यबलसम्पन्नाः सर्वे युद्धविशारदाः ।

विचरन्तोऽर्दयन् सर्वान् सिंहव्याघ्रमहोरगान् ॥ ३४ ॥

दूसरोंने नाना प्रकारके पर्वतों और जंगलोंका आश्रय लिया । इन्द्रकुमार वाली और सूर्यनन्दन सुग्रीव ये दोनों भाई थे । समस्त वानरयूथपति उन दोनों भाइयोंकी सेवामें उपस्थित रहते थे । इसी प्रकार वे नल - नील, हनुमान् तथा अन्य वानर सरदारोंका आश्रय लेते थे । वे सभी गरुड़के समान बलशाली तथा युद्धकी कलामें निपुण थे । वे वनमें विचरते समय सिंह, व्याघ्र और बड़े - बड़े नाग आदि समस्त वनजन्तुओंको रौंद डालते थे ॥

महाबलो महाबाहुर्वाली विपुलविक्रमः ।

जुगोप भुजवीर्येण ऋक्षगोपुच्छ्वानरान् ॥ ३५ ॥

महाबाहु वाली महान् बलसे सम्पन्न तथा विशेष पराक्रमी थे । उन्होंने अपने बाहुबलसे रीछों, लंगूरों तथा अन्य वानरोंकी रक्षा की थी ॥ ३५ ॥

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