Ramayana 2 — पृष्ठ 1–10
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः महर्षि वाल्मीकिप्रणीत श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण ( सचित्र, हिंदीभाषान्तरसहित ) द्वितीय भाग ( सुन्दरकाण्ड उत्तरकाण्डतक ) अनुवाद क पाण्डेय पं ० रामनारायणदत्त शास्त्री ' राम ' '
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श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः महर्षि वाल्मीकिप्रणीत श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण ( सचित्र, हिंदीभाषान्तरसहित ) द्वितीय भाग ( सुन्दरकाण्डसे उत्तरकाण्डतक ) गीताप्रेस, गोरखपुर
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मुद्रक तथा प्रकाशक हनुमानप्रसाद पोद्दार गीताप्रेस गोरखपुर सं ० २०१७ प्रथम संस्करण १०,००० मूल्य दोनों भागोंका १७.५० ( सत्रह रुपया पचास नया पैसा ) गीताप्रेस, पो ० गीता प्रेस ( गोरखपुर )
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श्रीहरिः श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणकी विषय - सूची ( सुन्दरकाण्डम् ) सर्ग विषय पृष्ठ संख्या सर्ग विषय पृष्ठ संख्या १ - हनुमान जीके द्वारा समुद्रका लङ्घन, मैनाकके द्वारा उनका स्वागत, सुरसापर उनकी विजय तथा सिंहिकाका वध करके उनका समुद्रके उस पार पहुँचकर लङ्काकी शोभा देखना २- लङ्कापुरीका वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान् जीका विचार, उनका लघुरूपसे पुरीमें प्रवेश तथा चन्द्रोदयका वर्णन ३- लङ्कापुरीका अवलोकन करके हनुमान् जीका विस्मित होना, उसमें प्रवेश करते समय निशाचरी लङ्काका उन्हें रोकना और उनकी मारसे विह्वल ' होकर उन्हें पुरीमें प्रवेश करने की अनुमति देना ४- हनुमान् जीका लङ्कापुरी एवं रावण के अन्तःपुर-में प्रवेश ५ - हनुमानजी का रावणके अन्तः पुरमें घर - घर में सीताको ढूँढ़ना और उन्हें न देखकर दुखी ६ - हनुमान् जीका रावण तथा अन्यान्य राक्षसोंके घरों में सीताजीकी खोज करना... ७ - रावणके भवन एवं पुष्पक विमानका वर्णन ८- हनुमानजी के द्वारा पुनः पुष्पक विमानका दर्शन ९- हनुमान् जीका रावण के श्रेष्ठ भवन, पुष्पक-विमान तथा रावण के रहनेकी सुन्दर हवेलीको देखकर उसके भीतर सोयी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियोंका अवलोकन करना १० - हनुमानजीका अन्तःपुरमें सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रामें पड़ी हुई उसकी स्त्रियको देखना तथा मन्दोदरीको सीता समझकर प्रसन्न हो ११- वह सीता नहीं है — ऐसा निश्चय होनेपर हनुमान्जीका पुनः अन्तःपुरमें और उसकी ग--पानभूमिमें सीताका पता लगाना, उनके मन में धर्मलोपकी आशङ्का और स्वतः उसका निवारण ८८ ९ ८४७ १२- सीता के मरणकी आशङ्कासे हनुमान् जीका शिथिल ८६१ १३ ८६५ १४ ८६८ होना फिर उत्साहका आश्रय लेकर अन्य स्थानों में उनकी खोज करना और कहीं भी पता न लगने से पुनः उनका चिन्तित - सीताजी के नाशकी आशङ्कासे चिन्ता, श्रीरामको सीताके न देनेसे अनर्थकी सम्भावना देख लौटने का निश्चय करके पुनः करना और अशोक वाटिका में तरह - तरह की बातें सोचना होना ८ ९ २ हनुमानजी की मिलनेकी सूचना हनुमान् जीका न खोजने का विचार घूमने के विषय में ... ८ ९ ४ - हनुमान् जीका अशोकवाटिका में प्रवेश करके उसकी शोभा देखना तथा एक अशोक वृक्षपर छिपे रहकर वहीं से सीताका अनुसन्धान करना ८ ९९ १५ - वनकी शोभा देखते हुए हनुमान्जीका एक ८७० ८७३ ८७६ १६ ८७८ चैत्यप्रासाद ( मन्दिर ) के पास सीताको दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना ९ ०३ 1 - हनुमान् जीका मन - ही - मन सीताजीके शील और सौन्दर्यकी सराहना करते हुए उन्हें कष्टमें पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना ९ ०६ १७- भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुई सीताके दर्शनसे हनुमान जी का प्रसन्न होना ९ ० ९ १८- अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए रावणका अशोक-८७ ९ वाटिकामें आगमन और हनुमान् जीका उसे देखना ९ ११ १ ९ - रावणको देखकर दुःख, भय और चिन्तामें डूबी हुई सीताकी अवस्थाका वर्णन ९ १३ ८८५ २० - रावणका सीताजीको प्रलोभन ९ १५ २१- सीताजीका रावणको समझाना और उसे श्रीरामके सामने नगण्य बताना ९ १८
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२२ - रावणका सीताको दो मासकी अवधि देना, सीताका उसे फटकारना फिर रावणका उन्हें धमकाकर राक्षसियोंके नियन्त्रणमें रखकर स्त्रियों-सहित पुनः महलको लौट जाना २३ - राक्षसियों का सीताजीको समझाना २४ - सीताजीका राक्षसियोंकी बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियोंका उन्हें मारने - काटनेकी धमकी देना २५ - राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार संतप्त सीताका विलाप करना २६ - सीताका करुण विलाप तथा अपने देनेका निश्चय करना २७ - त्रिजटाका स्वप्न, राक्षसों के श्रीरघुनाथजीकी विजयकी शुभ करके शोक-प्राणोंको त्याग विनाश और सूचना.... २८ - विलाप करती हुई सीताका प्राण त्यागके लिये उद्यत होना २ ९ - सीताजी के शुभ शकुन... ३० - सीताजी से वार्तालाप करने के विषयमें हनुमान् जीका विचार करना ३१ - हनुमान् जीका सीताको सुनानेके लिये श्रीराम-कथाका वर्णन करना ३२- सीताजीका तर्क - वितर्क ३३- सीताजीका हनुमानजीको अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरणका वृत्तान्त बताना ३४ - सीताजीका हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजी-गुणका ३५ - सीताजीके पूछने पर हनुमान्जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नरवानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मनमें विश्वास उत्पन्न करना ••• ३६ - हनुमान्जीका सीताको मुद्रिका देना, सीताका ' श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे ' यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान्जीका श्रीरामके सीता विषयक प्रेमका वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना ( १८ ) ३७ - सीताका हनुमानजी से श्रीरामको शीघ्र बुलाने का ९ २० ९ २३ ३८ ९ २५ ९ २८ ३ ९ ९ २ ९ ९ ३३ ४० ९ ३६ ९ ३८ ४१ ९ ३ ९ आग्रह, हनुमान् जीका सीतासे अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीताका अस्वीकार करना ९ ५ ९ - सीताजीका हनुमानजीको पहचान के रूपमें चित्रकूट पर्वतपर घटित हुए एक कौए के प्रसङ्गको सुनाना, भगवान् श्रीरामको शीघ्र बुला लाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि ९ ६३ - चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमानजी से सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करने के लिये कहना तथा समुद्र तरण के विषयमें शङ्कित हुई सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्जीका आश्वासन देना ९ ६८ - सीताका श्रीरामसे कहने के लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन दे उत्तर दिशाकी ओर जाना ९ ७१ - हनुमानजी के द्वारा प्रमदावन ( अशोक-वाटिका ) का विध्वंस ९ ७३ ४२ - राक्षसियों के मुखसे एक वानरके द्वारा ९ ४२ प्रमदावन के विध्वंसका समाचार सुनकर रावणका ९ ४४ किंकर नामक राक्षसोंको भेजना और हनुमान्-जीके द्वारा उन सबका संहार ९ ७५ ४३ - हनुमान् जीके द्वारा चैत्यप्रासादका विध्वंस तथा ९ ४५ उसके रक्षकों का वध ९ ७८ ४४ - प्रहस्त - पुत्र जम्बुमालीका वध ९ ७ ९ ४५ - मन्त्रीके सात पुत्रका वध ' '.. ९ ८० ९ ४७ ४६ - रावणके पाँच सेनापतियोंका वध... ९ ८२ ४७- रावण - पुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध ९ ८४ ४८ - इन्द्रजित् और हनुमान् जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान्जीका ९ ४ ९ रावण के दरबार में उपस्थित होना ९ ८८ ४ ९ – रावण के प्रभावशाली स्वरूपको देखकर हनुमानजी के मनमें अनेक प्रकारके विचारोंका उठना ९९ ३ ५० - रावणका प्रहस्त के द्वारा हनुमान्जीसे लङ्कामें आनेका कारण पुछवाना और हनुमान्का अपने-९ ५५ को श्रीरामका दूत बताना ९९ ५
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( १ ९ ५१ - हनुमान्जीका श्रीरामके प्रभावका वर्णन करते हुए रावणको समझाना ९९ ६ ५२ - विभीषण का दूतके वधको अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देनेके लिये कहना तथा रावणका उनके अनुरोध को स्वीकार कर लेना ९९९ ५३ – राक्षसका हनुमान्जीकी पूँछमें आग लगाकर उन्हें नगरमें घुमाना १००२ ५४ - लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप १००५ ५५ - सीताजी के लिये हनुमान्जीकी चिन्ता और उसका निवारण १०० ९ ५६ -- हनुमान्जीका पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना १०११ ५७ - हनुमान्जीका समुद्रको लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदोंसे मिलना १०१४ ५८ - जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान् जीका अपनी लङ्कायात्राका सारा वृत्तान्त सुनाना... १०१७ ५ ९ - हनुमान जी का सीताकी दुरवस्था बताकर वानरोंको लङ्कापर आक्रमण करने के लिये उत्तेजित करना १०२८ ६० - अङ्गदका लङ्काको जीतकर सीताको ले आनेका • उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान् के द्वारा उसका निवारण १०३० ) ६१ - वानरोंका मधुवनमें जाकर वहाँके मधु एवं फलोंका मनमाना उपभोग करना और वन - रक्षक-को घसीटना १०३२ ६२ - वानरोंद्वारा मधुवनके रक्षकों और दधिमुखका पराभव तथा सेवकोंसहित दधिमुखका सुग्रीवके पास जाना १०३४ ६३ - दधिमुखसे मधुवनके विध्वंसका समाचार सुनकर सुग्रीवका हनुमान् आदि वानरोंकी सफलता के विषय में अनुमान... १०३७ ६४- दधिमुखसे सुग्रीवका संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरोंका किष्किन्धामें पहुँचना और हनुमान्जीका श्रीरामको प्रणाम करके सीतादेवी के दर्शनका समाचार बताना १०३ ९ ६५ - हनुमान्जीका श्रीरामको सीताका समाचार सुनाना १०४२ ६६ – चूडामणिको देखकर और सीताका समाचार पाकर श्रीरामका उनके लिये विलाप १०४४ ६७ - हनुमान् जीका भगवान् श्रीरामको सीता का संदेश सुनाना १०४५ ६८ - हनुमान् जीका सीताके संदेह और अपने द्वारा उनके निवारणका वृत्तान्त बताना... १०४८ ( तिरंगा ) १- अशोकवन - विध्वंसके बाद घोष ( एकरंगा ) १ - हनुमानजीको जानकीजीका प्रथम चित्र -मारुतिका ८४७ दर्शन ९ ०४ सूची २ - हनुमान् जीकी जानकीजीसे बात -३ - रावणकी सभा में हनुमान् ४- समुद्रको लाँघकर लङ्कासे मारुति ५- वानरौको समुद्रपारसे लौटते श्रीरामको आश्वासन दे रहे हैं । चीत ९ ४५ ९९ ३ लौटते हुए १०१४ देखकर सुग्रीव १०४१
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श्रीहरिः श्रीमवाल्मीकीय रामायणकी विषय - सूची ( युद्धकाण्डम् ) सग विषय पृष्ठ संख्या १ - हनुमानजी की प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करने के लिये चिन्तित होना... १०५१ २- सुग्रीवका श्रीरामको उत्साह प्रदान करना १०५२ ३- हनुमानजी का लंका के दुर्ग, फाटक, सेना - विभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान् श्रीरामसे सेनाको कूच करने की आज्ञा देने के लिये प्रार्थना करना १०५४ ४- श्रीराम आदिके साथ वानर सेनाका प्रस्थान और समुद्र तटपर उसका पड़ाव... १०५६ ५ - श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप १०६४ ६ - रावणका कर्तव्य निर्णय के लिये अपने मन्त्रियों से समुचित सलाह देने का अनुरोध करना १०६६ ७ - राक्षसोंका रावण और इन्द्रजित् के बल पराक्रमका वर्णन करते हुए उसे रामपर विजय पानेका विश्वास दिलाना... १०६७ ८- प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु सेनाको मार गिराने का उत्साह दिखाना १०६ ९ ९ - विभीषणका रावण से श्रीरामकी अजेयता बताकर सीताको लौटा देने के लिये अनुरोध करना १०७१ १० - विभीषण का रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देने के लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना १०७२ ११ - रावण और उसके सभासदोंका सभाभवनमें एकत्र होना १०७५ १२ - नगरकी रक्षाके लिये सैनिकों की नियुक्ति, रावणका सीताके प्रति अपनी आसक्ति बताकर उनके हरणका प्रसंग बताना और भावी कर्तव्य के लिये सभासदोंकी सम्मति माँगना, कुम्भकर्णका सर्ग विषय पृष्ठ संख्या पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओंके वधका स्वयं ही भार उठाना १०७७ १३ - महापार्श्वका रावणको सीतापर बलात्कार के लिये उकसाना और रावणका शापके कारण अपनेको ऐसा करने में असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रमके गीत गाना १०८० १४ - विभीषण का रामको अजेय बताकर उनके पास सीताको लौटा देने की सम्मति देना १०८२ १५ - इन्द्रजित् द्वारा विभीषणका उपहास तथा विभीषणका उसे फटकारकर सभामें अपनी उचित सम्मति देना १०८४ १६ - रावण के द्वारा विभीषणका तिरस्कार और विभीषणका भी उसे फटकारकर चल देना १०८६ १७ - विभीषणका श्रीरामकी शरणमें आना और श्रीरामका अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना १०८८ १८- भगवान् श्रीरामका शरणागतकी रक्षाका महत्त्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषणसे मिलना १० ९ ३ १ ९- विभीषणका आकाशसे उतरकर भगवान् श्रीरामके चरणोंकी शरण लेना, उनके पूछने पर रावणकी शक्तिका परिचय देना और श्रीरामका रावण वधकी प्रतिज्ञा करके विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर उनकी सम्मति से समुद्र-तटपर धरना देने के लिये बैठना १० ९ ५ २० - शार्दूलके कहने से रावणका शुकको दूत बनाकर सुग्रीव के पास संदेश भेजना, वहाँ वानरोंद्वारा उसकी दुर्दशा, श्रीरामकी कृपासे उसका संकटसे छूटना और सुग्रीवका रावण के लिये उत्तर देना... १० ९ ८
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( २१ - श्रीरामका समुद्र के तटपर कुशा बिछाकर तीन दिनोंतक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से कुपित हो उसे बाण मारकर विक्षुब्ध कर ११०१ २२- समुद्र की सलाह के अनुसार नलके द्वारा सागरपर सौ योजन लंबे पुलका निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम आदिसहित वानरसेनाका उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना...... ११०३ २३- श्रीरामका लक्ष्मणसे उत्पातसूचक लक्षणों का वर्णन और लङ्कापर आक्रमण ११० ९ २४ - श्रीरामका लक्ष्मणसे लङ्काकी शोभाका वर्णन करके सेनाको व्यूहबद्ध खड़ी होने के लिये आदेश देना, श्रीरामकी आज्ञासे बन्धनमुक्त हुए शुकका रावणके पास जाकर उनकी सैन्यशक्तिकी प्रबलता बताना तथा रावणका अपने बलकी डींग हाँकना १११० २५ - रावणका शुक और सारणको गुप्तरूपसे वानर सेना में भेजना विभीषणद्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीरामकी कृपासे छुटकारा पाना तथा श्रीरामका संदेश लेकर लङ्कामें लौटकर उनका रावणको समझाना १११३ २६- सारणका रावणको पृथक् - पृथक् वानर-यूथपतियों का परिचय देना १११६ २७ - वानरसेना के प्रधान यूथपतियोंका परिचय १११ ९ २८ - शुकके द्वारा सुग्रीवके मन्त्रियोंका, मैन्द और द्विविदका, हनुमान्का, श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीवका परिचय देकर वानर-सेनाकी संख्याका निरूपण करना ११२२ २ ९ - रावणका शुक और सारणको फटकारकर अपने दरबारसे निकाल देना, उसके भेजे हुए गुप्तचरोंका श्रीराम की दयासे वानरोंके चंगुल से छूटकर लङ्कामें आना ११२५ ३० - रावण के भेजे हुए गुप्तचरों एवं शार्दूलका उससे वानर सेनाका समाचार बताना और मुख्य - मुख्य वीरोंका परिचय देना... ११२७ २१ ) ३१ - मायारचित श्रीरामका कटा मस्तकं दिखाकर रावणद्वारा सीताको मोह में डालने का प्रयत्न ११२ ९ ३२- श्रीराम के मारे जानेका विश्वास करके सीताका विलाप तथा रावणका सभामें जाकर मन्त्रियोंकी सलाह से युद्धविषयक उद्योग करना... ११३२ ३३- सरमाका सीताको सान्त्वना देना, रावणकी मायाका भेद खोलना, श्रीरामके आगमनका प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होने-का विश्वास दिलाना ११३५ ३४ - सीताके अनुरोधसे सरमाका उन्हें मन्त्रियोंसहित रावणका निश्चित विचार बताना ११३८ ३५ - माल्यवान् का रावणको श्रीरामसे संधि करने के लिये समझाना ११४० ३६ - माल्यवानूपर आक्षेप और नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके रावणका अपने अन्तःपुरमें जाना ११४२ ३७ - विभीषणका श्रीरामसे रावणद्वारा किये गये लङ्काकी रक्षा प्रबन्धका वर्णन तथा द्वारा लङ्काके विभिन्न द्वारोंपर आक्रमण लिये अपने सेनापतियोंकी नियुक्ति ३८ - श्रीरामका प्रमुख वानरोंके साथ सुवेल चढ़कर वहाँ रात में निवास करना ३ ९ - वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल - शिखरसे पुरीका निरीक्षण करना " ४० - सुग्रीव और रावणका मल्लयुद्ध ४१ - श्रीरामका सुग्रीवको दुःसाहससे रोकना, श्रीराम-करने के ११४४ पर्वतपर ११४६ लङ्का-... ११४८ ११५० लङ्का चारों द्वारोंपर वानरसैनिकों की नियुक्ति, रामदूत अङ्गदका रावण के महलमें पराक्रम तथा वानरों-के आक्रमण से राक्षसों को भय ११५३ ४२- लङ्कापर वानरोंकी चढ़ाई तथा राक्षसों के साथ उनका घोर युद्ध ११५ ९ ४३- द्वन्द्वयुद्ध में वानरोंद्वारा राक्षसों की पराजय... ११६२ ४४- रातमें वानरों और राक्षसोंका घोर युद्ध, अङ्गदके, द्वारा इन्द्रजित् की पराजय, मायासे अदृश्य हुए इन्द्रजितका नागमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बाँधना ११६५
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( १२ ४५- इन्द्रजित् के बाणोंसे श्रीराम और लक्ष्मणका अचेत होना और वानरोंका शोक करना ११६८ ४६ - श्रीराम और लक्ष्मणको मूर्छित देख वानरोंका शोक, इन्द्रजित् का हर्षोद्वार, विभीषणका सुग्रीव-को समझाना, इन्द्रजित् का लङ्का में जाकर पिताको शत्रुवधका वृत्तान्त बताना और प्रसन्न हुए रावण के द्वारा अपने पुत्रका अभिनन्दन ११७० ४७ - वानरोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मण की रक्षा, रावण-की आज्ञा से राक्षसियों का सीताको पुष्पक विमानद्वारा रणभूमिमें ले जाकर श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन कराना और सीताका दुखी होकर रोना ११७३ ४८ - सीताका विलाप और त्रिजटाका उन्हें समझा-बुझाकर श्रीराम - लक्ष्मण के जीवित होने का विश्वास दिलाकर पुनः लङ्कामें ही लौटा लाना ११७५ ४ ९ - श्रीरामका सचेत होकर लक्ष्मणके लिये विलाप करना और स्वयं प्राणत्यागका विचार करके वानरोंको लौट जाने की आज्ञा देना ११७७ ५० - विभीषणको इन्द्रजित् समझकर वानरोंका पलायन और सुग्रीवकी आज्ञासे जाम्बवान्का उन्हें सान्त्वना देना, विभीषणका विलाप और सुग्रीवका उन्हें समझाना, गरुड़का आना और श्रीराम - लक्ष्मणको नागपाशसे मुक्त करके चला जाना ११८० ५१ - श्रीराम के बन्धनमुक्त होने का पता पाकर चिन्तित हुए रावणका धूम्राक्षको युद्धके लिये भेजना और सेनासहित धूम्राक्षका नगरसे बाहर आना १ ९ ८४ ५२ - धूम्राक्षका युद्ध और हनुमान्जीके द्वारा उसका वध... ११८६ ५३ - वज्रदंष्ट्रका सेनासहित युद्ध के लिये प्रस्थान, वानरों और राक्षसोंका युद्ध, वज्रदंष्ट्रद्वारा वानरोंका तथा अङ्गदद्वारा राक्षसोंका संहार ११८ ९ ५४ - वज्रदंष्ट्र और अङ्गदका युद्ध तथा अङ्गदके हाथसे उस निशाचरका वध ११ ९ १ ५५ - रावणकी आज्ञासे अकम्पन आदि राक्षसोका युद्ध में आना और वानरों के साथ उनका घोर युद्ध ११ ९ ४ ५६ - हनुमान् जीके द्वारा अकम्पनका वध ११ ९ ६ ) ५७ - प्रहस्तका रावणकी आज्ञासे विशाल युद्ध के लिये प्रस्थान ५८ - नीलके द्वारा प्रहस्तका वध ५ ९ - प्रहस्त के मारे जानेसे दुखी हुए स्वयं ही युद्ध के लिये पधारना, आये हुए मुख्य वीरोंका परिचय सेनासहित ११ ९ ८ १२०१ रावणका उसके साथ , रावणकी मारसे सुग्रीवका अचेत होना, लक्ष्मणका युद्धमें आना, हनुमान् और रावणमें थप्पड़ोंकी मार, रावणद्वारा नीलका मूर्छित होना, लक्ष्मणका शक्तिके आघातसे मूर्छित एवं सचेत होना तथा श्रीरामसे परास्त होकर रावणका लङ्कामें घुस जाना... १२०५ ६० - अपनी पराजयसे दुखी हुए रावणकी आज्ञासे सोये हुए कुम्भकर्णका जगाया जाना और उसे देखकर वानरोंका भयभीत होना १२१७ ६१ - विभीषणका श्रीरामसे कुम्भकर्णका परिचय देना और श्रीरामकी आज्ञासे वानरोंका युद्धके लिये लङ्काके द्वारोंपर डट जाना १२२४ ६२ - कुम्भकर्णका रावण के भवनमें प्रवेश तथा रावणका रामसे भय बताकर उसे शत्रुसेना के विनाश के लिये प्रेरित करना १२२७ ६३ - कुम्भकर्णका रावणको उसके कुकृत्योंके लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्ध-विषयक उत्साह प्रकट करना... १२२८ ६४ - महोदरका कुम्भकर्णके प्रति आक्षेप करके रावणको बिना युद्धके ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका उपाय बताना १२३२ ६५ - कुम्भकर्णकी रणयात्रा १२३५ ६६ - कुम्भकर्णके भयसे भागे हुए वानरोंका अङ्गद-द्वारा प्रोत्साहन और आवाहन, कुम्भकर्णद्वारा वानरोंका संहार, पुनः वानर सेनाका पलायन और अंगदका उसे समझा - बुझाकर लौटाना १२३ ९ ६७ – कुम्भकर्णका भयंकर युद्ध और श्रीराम के हाथसे उसका वध १२४२ ६८ - कुम्भकर्ण वधका समाचार सुनकर रावणका विलाप १२५५
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६ ९ – रावण के पुत्रों और भाइयोंका युद्ध के लिये जाना और नरान्तकका अङ्गदके द्वारा वध ७० - हनुमान् जीके द्वारा देवान्तक और त्रिशिराका, नीलके द्वारा महोदरका तथा ॠषभके द्वारा महापार्श्वका वध ७१ - अतिकायका भयंकर युद्ध और लक्ष्मणके द्वारा उसका वध ७२ - रावणकी चिन्ता तथा उसका राक्षसोंको पुरीकी रक्षा के लिये सावधान रहनेका आदेश ७३ - इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से वानरसेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणका मूर्छित होना ७४ - जाम्बवान् के आदेशसे हनुमान् जीका हिमालय-से दिव्य ओषधियों के पर्वतको लाना और उन ओषधियोंकी गन्ध से श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरों का पुनः स्वस्थ होना ७५ - लङ्कापुरीका दहन तथा राक्षसों और वानरोंका भयंकर युद्ध ७६ - अङ्गदके द्वारा कम्पन और प्रजङ्घका द्विविदके द्वारा शोणिताक्षका, मैन्दके द्वारा यूपाक्षका और सुग्रीव के द्वारा कुम्भका वध ७७ - हनुमान के द्वारा निकुम्भका वध ७८ - रावणकी आज्ञासे मकराक्षका युद्ध के लिये प्रस्थान ७ ९ - श्रीरामचन्द्र जी के द्वारा मकराक्षका वध ८० - रावणकी आज्ञासे इन्द्रजित् का घोर युद्ध तथा उसके वध के विषयमें श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत ८१ - इन्द्रजित् के द्वारा मायामयी सीताका वध ८२ - हनुमान जी के नेतृत्व में वानरों और निशाचरोंका युद्ध, हनुमान्जीका श्रीरामके पास लौटना और इन्द्रजित्का निकुम्भिला - मन्दिरमें जाकर होम करना ८३ - सीताके मारे जाने की बात सुनकर श्रीरामका शोकसे मूच्छित होना और लक्ष्मणका उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थके लिये उद्यत होना ८४ - विभीषणका श्रीरामको इन्द्रजित् की मायाका रहस्य बताकर सीताके जीवित होनेका विश्वास ( २३ ) दिलाना और लक्ष्मणको सेनासहित निकुम्भिला-१२५७ मन्दिर में भेजने के लिये अनुरोध करना १३१ ९ ८५ - विभीषण के अनुरोधसे श्रीरामचन्द्रजीका १२६४ १२६८ ८६ १२७६ लक्ष्मणको इन्द्रजित् के वध के लिये जाने की आज्ञा देना और सेनासहित लक्ष्मणका निकुम्भिला - मन्दिरके पास पहुँचना १३२१ - वानरों और राक्षसों का युद्ध, हनुमानजी के द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्-को द्वन्द्वयुद्ध के लिये ललकारना तथा लक्ष्मण-का उसे देखना १३२३ १२७८ ८७ - इन्द्रजित् और विभीषण की रोषपूर्ण बातचीत १३२५ ८८ - लक्ष्मण और इन्द्रजित् की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध १३२७ ८ ९ - विभीषणका राक्षसोंपर प्रहार, उनका वानर-१२८५ यूथपतियोंको प्रोत्साहन देना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् के सारथिका और वानगेंद्वारा उसके १२ ९ २ घोड़ोंका वध १३३३ ९०- ० - इन्द्रजित् और लक्ष्मणका भयंकर युद्ध तथा इन्द्रजित् का वध १३३६ १२ ९ ७ ९ १ - लक्ष्मण और विभीषण आदिका श्रीरामचन्द्रजी-१३०३ के पास आकर इन्द्रजित् के वधका समाचार १३०४ सुनाना, प्रसन्न हुए श्रीरामके द्वारा लक्ष्मण-१३०६ को हृदय से लगाकर उनकी प्रशंसा तथा सुषेणद्वारा लक्ष्मण आदि की चिकित्सा १३४२ ९ २ - रावणका शोक तथा सुपार्श्वके समझानेसे उसका सीता - वघसे निवृत्त होना १३४४ १३०८ ९ ३ - श्रीरामद्वारा राक्षससेनाका संहार १३४८ १३११ ९ ४ ९ ५ १३१४ ९ ६ - राक्षसियों का विलाप १३५१ - रावणका अपने मन्त्रियोंको बुलाकर शत्रुवध-विषयक अपना उत्साह प्रकट करना और सबके साथ रणभूमिमें आकर पराक्रम दिखाना १३५३ - सुग्रीवद्वारा राक्षससेनाका संहार विरूपाक्षका वध १३५७ १३१६ ९ ७ - सुग्रीवके साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वघ १३५ ९ ९ ८ - अंगद के द्वारा महापार्श्वका वघ १३६२ ९९- श्रीराम और रावणका युद्ध १३६१