वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
Valmiki Ramayana - 2 · Gita Press, Gorakhpur · 912 पृष्ठ · 92 खण्ड
विषय सूची
- श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः महर्षि वाल्मीकिप्रणीत श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण ( सचित्र, हिंदीभाषान्तरसहित ) द्वितीय भाग ( सुन्दरकाण्ड उत्तरकाण्डतक ) अनुवाद क… 1–10
- ( २४ १०० - राम और रावणका युद्ध, रावणकी शक्तिसे लक्ष्मणका मूर्छित होना तथा रावणका युद्ध से भागना १३६६ १०१ - श्रीरामका विलाप तथा हनुमान्जीकी लायी हुई ओषधि… 11–20
- ८४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणोंसे उस पर्वतको दबाया । ११ । सचचालाचलश्चाशु मुहूर्ते कपिपीडितः… 21–30
- ८५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मुक्त हुए हनुमानजीको देखकर सुरसा देवीने अपने असली रूपमें प्रकट होकर उन वानरवीरसे कहा- । १७०… 31–40
- ८६८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे स्वयं स्वयम्भुवा दत्तं वरदानं यथा मम । ४६ । ' वानरेश्वर! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ । आप इसे सुनिये… 41–50
- ८७८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सहायक जान पड़ते थे । उनकी पाँखें मूँगे और सुवर्णके बने हुए फूलोंसे युक्त थीं तथा उन्होंने लीलापूर्वक अपने बाँके पंखोंको समेट… 51–60
- ८८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण विपञ्ची परिगृह्यान्या नियता नृत्यशालिनी । निद्रावशमनुप्राप्ता सहकान्तेव भामिनी । ४१… 61–70
- ८ ९ ८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे " यदि सम्पाति के कहने से भी मैं श्रीरामको यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नीको यहाँ न देखनेपर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरोंको जलाकर… 71–80
- ९ ०६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे पीतं कनकपट्टाभं स्तं तद्वसनं शुभम् । उत्तरीयं नगासकं तदा दृष्टं प्लवङ्गमैः । ४५ । भूषणानि च मुख्यानि दृष्टानि धरणीतले… 81–90
- ९ १६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' देवि! इस विषय में तुम्हें भय नहीं करना चाहिये । प्रिये! मुझपर विश्वास करो और यथार्थ रूपसे प्रेमदान दो… 91–100
- ९ २६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अशोक वृक्षमें चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमानजी ' मिथिलेश कुमारी! तुम्हारा भला हो… 101–110
- ९ ३६ श्रीमदुवाल्मीकीयरामायणे अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये । विरूपमपि चाङ्गेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम् । ४७… 111–120
- हनुमानजीकी जानकीजीसे बात - चीत सुन्दरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ९ ४५ अतः श्रीराम - दर्शनकी लालसासे अत्यन्त पीड़ित हो सदा उन्हींका चिन्तन करती हुई उन्हींको… 121–130
- ९ ५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रुत्वा भ्रातृवधं कोपादिदं वचनमब्रवीत् । यवीयान् केन मे भ्राता हतः क्व च निपातितः । ६५… 131–140
- ९ ६४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे शीघ्र ही प्रिय करना चाहता था । अतः स्नेहपूर्ण हृदयसे ही मैंने ऐसी बात कही है । ७… 141–150
- ९ ७४ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे युद्ध करनेका अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समरमें अपनी सेनाको और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टिसे देखकर कैसे यह समझ… 151–160
- ९ ८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तयोर्वेगवतोर्वेगं निहत्य स महाबलः । निपपात पुनर्भूमौ सुपर्ण इव वेगितः । ३१… 161–170
- रावणकी सभा में हनुमान् सुन्दरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ९९ ३ यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुनः दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता… 171–180
- १००२ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे निशाचराणामधिपोऽनुजस्य विभीषणस्योत्तमवाक्यमिष्टम् । जग्राह बुद्धया सुरलोकशत्रु-महावलो राक्षसराजमुख्यः… 181–190
- १०१२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः । ११ । श्रीरामके हाथसे मारा जायगा, यह आप अपनी आँखों ' शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले… 191–200
- १०२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' तत्पश्चात् मैं गरुड़की भाँति उस विशाल आकाशमें फिर उड़ने लगा । उस समय किसीने मेरी परछाई पकड़ ली, किंतु मैं किसी को देख नहीं… 201–210
- १०३० श्रीमवाल्मीकीयरामायणे अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा । अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे । २४… 211–220
- १०४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे और मधु पीजिये । यह सब आपकी ही सम्पत्ति है । महाबली वीर! आप हमारे युवराज और इस वनके स्वामी हैं । ७… 221–230
- १०४८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुखी गयीं । उनके मुखपर आँसुओं की धारा बह चली… 231–240
- १०५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जो क्षत्रिय मन्द ( क्रोधशून्य ) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे… 241–250
- १०६४ श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे जानेवाले महाभयंकर जलजन्तुओंसे व्याप्त दिखायी देता था । दीप्तभोगैरिवाकीर्ण भुजङ्गैर्वरुणालयम्… 251–260
- १०७४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे ' रसोई घरों में, अग्निशालाओं में तथा वेदाध्ययनके स्थानों में भी साँप देखे जाते हैं और हवन सामग्रियों में चींटियाँ पड़ी दिखायी… 261–270
- १०८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे शरीरसे आवेष्टित कर रक्खा है । तुम सब लोग मिलकर इसे बन्धनसे बाहर करके प्राणसंकटसे बचाओ ( अर्थात् श्रीराम-चन्द्रजीके साथ वैर… 271–280
- १० ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दौरात्म्यं रावणे दृष्ट्रा विक्रमं च तथा त्वयि । युक्तमागमनं ह्यत्र सदृशं तस्य बुद्धितः । ५८… 281–290
- ११०२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे इस प्रकार उस समय वहाँ तीन रात लेटे रहकर सशङ्खशुक्तिकाजालं समीनमकरं तथा । १ ९… 291–300
- १११० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ‘ क्रूर पशु और पक्षी दीन आकार धारण कर सूर्य की ओर मुँह करके दीनतापूर्ण स्वरमें चीत्कार करते हुए महान् भय उत्पन्न कर रहे हैं… 301–310
- ११२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भरे हुए हैं । ये राक्षसों और पिशाचोंके समान क्रूर हैं और बड़े - बड़े पर्वत - शिखरों पर चढ़कर वहाँसे महान् मेघों के समान विशाल… 311–320
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ११३० विद्युजिह्वं च मायाज्ञमत्रवीद् राक्षसाधिपः । मोहयिष्यावहे सीतां मायया जनकात्मजाम् । ७… 321–330
- ११३८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अचिरान्मोक्ष्यते सीते देवि ते जघनं गताम् । धृतामेकां बहून् मासान् वेणीं रामो महाबलः । ३४… 331–340
- ११४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकोनचत्वारिंशः सर्गः वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल - शिखर से लङ्कापुरीका निरीक्षण करना तां रात्रिमुषितास्तत्र सुवेले हरियूथपाः… 341–350
- ११५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे निरुद्विग्नास्त्रयो लोका भविष्यन्ति हते त्वयि । ७ ९ । “ मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धुबान्धवसहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि… 351–360
- १ ९ ६८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः इन्द्रजित के बाणोंसे श्रीराम और लक्ष्मणका अचेत होना और वानरोंका शोक करना स तस्य गतिमन्विच्छन्… 361–370
- ११७८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे और फुफकारते हुए सपके समान साँस ले रहे थे । १ । सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः ससुग्रीव महाबलाः परिवार्य महात्मानौ तस्थुः शोकपरिप्लुताः… 371–380
- १ ९ ८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे हयैः परमशीघ्रैश्च गजैश्चैव मदोत्कटैः । निर्ययुनैर्ऋतव्याघ्रा व्याघ्रा इव दुरासदाः । २७… 381–390
- ११ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उन महावीर वानरशिरोमणियोंने युद्धके मुहानेपर वृक्षों- सबने नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा राक्षसोंको भलीभाँति मथ… 391–400
- १२०६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे संख्ये प्रहस्तं निहतं निशम्य क्रोधार्दितः शोकपरीतचेताः । उवाच तान् राक्षसयूथमुख्या-निन्द्रो यथा निर्जरयूथमुख्यान् । ३… 401–410
- युद्ध साथ रावणके श्रीरामका आरूढ पर कंधे के हनुमानजी युद्धकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः १२१५ आस्यैश्व नेत्रैः श्रवणैः पपात रुधिरं बहु… 411–420
- १२२० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे कच्चित् सुकुशलं राज्ञो भयं वा नेह किंचन । ६७ । ' तुम लोगोंने इस प्रकार आदर करके मुझे किस लिये जगाया है? राक्षसराज रावण… 421–430
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १२३२ यदि मे मुष्टिवेगं स राघवोऽद्य सहिष्यति । ४७ । ततः पास्यन्ति बाणौघा रुधिरं राघवस्य मे… 431–440
- १२४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तदनन्तर ऋषभ, शरभ, मैन्द, धूम्र, नील, कुमुद, आदि श्रेष्ठ वानर - वीर तुरंत ही कुम्भकर्णका सामना करनेके सुषेण, गवाक्ष, रम्भ,… 441–450
- १२५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ततस्तु वातोद्धतमेघकल्पं भुजंगराजोत्तमभोगबाहुः 1 तमापतन्तं धरणीधराभ-मुवाच रामो युधि कुम्भकर्णम् । १४३… 451–460
- १२६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे महामना वानरोंने भी राक्षससेनापर दृष्टिपात किया । वह हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी थी, सैकड़ों - हजारों घुँघुरुओं की रुनझुनसे… 461–470
- १२७० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे समान टंकार - ध्वनि प्रकट होती है । इस निशाचरका धनुष इन्द्र - धनुषके समान शोभा पाता है । १८ । सध्वजः सपताकश्च सानुकर्षो महारथः… 471–480
- १२८० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे किं पुनर्मानुषं धृष्यं निहनिष्यसि राघवम् । १८ । ' बेटा! कोई भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके… 481–490
- १२ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ब्रह्मालयं शंकरकार्मुकं च ददर्श नाभिं च वसुंधरायाः । ६० । इसके सिवा अग्निका, कुबेरका और द्वादश सूर्योंके समावेशका भी… 491–500
- १२ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे को सँभालकर लोहेकी गदा उठायी और अङ्गदका ही पीछा किया । १३ । प्रजङ्घस्तु महावीरो यूपाक्षसहितो बली… 501–510
- १३०८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे विरथो वसुधास्थः स मकराक्षो निशाचरः । ३० । तच्छूलं निहतं दृष्ट्रा रामेणाक्लिष्टकर्मणा… 511–520
- १३१८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे बलस्य यदि चेद् धर्मो गुणभूतः पराक्रमैः । धर्ममुत्सृज्य वर्तस्व यथा धर्मे तथा बले । २७… 521–530
- १३२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कहने लगा और उछलकर सामने आ गया । १ । उद्यतायुधनिस्त्रिंशो रथे सुसमलंकृते । कालाश्वयुक्ते महति स्थितः कालान्तकोपमः । २… 531–540
- १३३८ भीमव्वाल्मीकीयरामायणे सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुघातिना । असक्तं प्रेषयामास लक्ष्मणाय बहूञ्शरान् । २६… 541–550
- १३४६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे कालाग्निके समान अत्यन्त कुपित हो वह जिस - जिस दिशाकी ओर दृष्टि डालता था, उस उस दिशामें खड़े हुए राक्षस भयभीत हो खम्भे आदि की… 551–560
- १३५६ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे लगाये श्रीरघुनाथजीके साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है; इस प्रकारकी कलह - ध्वनि कानोंमें पड़ रही थी । ३६… 561–570
- १३६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अभेद्य कवचपर गिरे थे; इसलिये उस समय उसे व्यथित न कर सके । ३८ । पुनरेवाथ तं रामो रथस्थं राक्षसाधिपम्… 571–580
- १३७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ते तान् सर्वाञ्शराञ्जघ्नुः सर्परूपान् महाजवान् । प्रकार बढ़ने लगा, मानो सूर्यदेवको छू लेना चाहता है… 581–590
- १३८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बड़ी भयंकर थी | वह आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी विमान के समान दृष्टिगोचर होता था । ५३… 591–600
- १३ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे राघवस्तव संयुक्त गगने च विशुश्रुवे । साधुसाध्विति वागग्र्या देवतानां महात्मनाम् । २ ९… 601–610
- १४०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मेरा शत्रु था । यद्यपि ज्येष्ठ होनेसे गुरुजनोचित गौरवके कारण वह मेरा पूज्य था, तथापि वह मुझसे सत्कार पाने योग्य नहीं है… 611–620
- श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १४१२ सोऽभिगम्य महात्मानं ज्ञात्वापि ध्यानमास्थितम् । प्रणतश्च प्रहृष्टश्च प्राप्तां सीतां न्यवेदयत् । १६… 621–630
- ९ ४२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए उन महाबाहु नरेशने उन्हें गोद में बिठाकर दोनों बाँहों में भर लिया और इस प्रकार कहा – । १२… 631–640
- १४३० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर सेतु बाँधा गया था । १६३ । पश्य सागरमक्षोभ्यं वैदेहि वरुणालयम् । १७… 641–650
- १४४० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे गये, जिनका नाम था सम्पाति । उन्होंने हमें बताया कि सीता लङ्कामें रावण के भवन में निवास करती हैं । ४२… 651–660
- १४५० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे की ओर देखकर कहा - ' सौभाग्यशालिनि! भामिनि! तुम जिसपर संतुष्ट हो, उसे यह हार दे दो ' । ८०३… 661–670
- १४५८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे तृतीयः सर्गः विश्रवासे वैश्रवण ( कुबेर ) की उत्पत्ति, उनकी तपस्या, वरप्राप्ति तथा लङ्कामें निवास अथ पुत्रः पुलस्त्यस्य विश्रवा… 671–680
- १४६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे नारायणश्च रुद्रश्च शक्रश्चापि यमस्तथा । अस्माकं प्रमुखे स्थातुं सर्वे विभ्यति सर्वदा । ४२… 681–690
- १४७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मातुस्तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् । अमर्षमतुलं लेभे प्रतिशां चाकरोत् तदा । ४४… 691–700
- १४८८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे समाप्ते नियमे तस्मिंस्तत्र देवो महेश्वरः । ततः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभुः । २६… 701–710
- १४ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अवरुह्य विमानाग्रात् कन्दर्पशरपीडितः । २० । यह सुनकर रावण कामबाणसे पीड़ित हो विमानसे उतर गया और उस उत्तम एवं महान् व्रतका… 711–720
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १५०६ अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् । विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम् । २… 721–730
- रावणद्वारा सुन्दरी कन्याओं का अपहरण उत्तरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः १५१५ चतुर्विंशः सर्गः रावणद्वारा अपहृत हुई देवता आदिकी कन्याओं और स्त्रियोंका विलाप एवं… 731–740
- १५२४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे मुहूर्तात् क्रोधताम्राक्षस्तोयं जग्राह पाणिना । उस समय दो ही घड़ीमें रावणकी उस करतूतको जानकर वैश्रवणपुत्र नलकुबर के नेत्र… 741–750
- १५३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रूयतां या भवेत् सिद्धिः शतक्रतुविमोक्षणे । ११ । ममेष्टं नित्यशो हव्यैर्मन्त्रैः सम्पूज्य पावकम्… 751–760
- १५४४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे त्रयस्त्रिंशः सर्गः पुलस्त्यजीका रावणको अर्जुनकी कैदसे छुटकारा दिलाना रावणग्रहणं तत् तु वायु ग्रहणसंनिभम्… 761–770
- १५५४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ततः सुराणां तु वरैर्दृष्ट्वा ह्येनमलंकृतम् । चतुर्मुखस्तु मना वायुमाह जगहुरुः । २२… 771–780
- १५६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पूर्वक बीत गया । इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंकी उस सुरम्य राजधानी- के प्रेमपूर्वक सत्कारसे उनका वह समय सुखपूर्वक बीत में वे वानर और… 781–790
- १५७२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे षट्चत्वारिंशः सर्गः लक्ष्मणका सीताको रथपर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजीके ततो रजन्यां व्युष्टायां… 791–800
- १५८० श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे एकपञ्चाशः सर्गः मार्ग में सुमन्त्रका दुर्वासा के मुखसे सुनी हुई भृगुऋषि के शापकी कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें… 801–810
- १५८८ श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे तौ परस्परशापेन देहमुत्सृज्य धार्मिकौ । अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ । ४… 811–820
- १५ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भृग्वाङ्गिरसकुत्साद्या वसिष्ठश्च सकाश्यपः । धर्मपाठक मुख्याश्च सचिवा नैगमास्तथा । ३३… 821–830
- १६०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दीर्घकालके पश्चात् सुदासकुमार मित्रसह अयोध्याके राजा हो गये । १७ । राजापि यजते यज्ञमस्याश्रमसमीपतः… 831–840
- १६१८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे स भुक्तवान् नरश्रेष्ठो गीतमाधुर्यमुत्तमम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन् काले यथाक्रमम् । १४… 841–850
- १६२६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तत्पश्चात् देवता बहुसंख्यक विमानोंपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुए… 851–860
- १६३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे । शीघ्रतापूर्वक कहा - ' तुम अभी जाकर शीघ्रपराक्रमी भरत लक्ष्मणं भरतं चैव गत्वा तौ लघुविक्रमौ और लक्ष्मण को मेरे आने की सूचना… 861–870
- राजा इलका चन्द्रपुत्र बुध के साथ संवाद उत्तरकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः १६४५ एकोननवतितमः सर्गः बुध और इलाका समागम श्रुत्वा किंपुरुषोत्पत्ति लक्ष्मणो भरतस्तथा… 871–880
- १६५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे है । इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं । २८ । यदि बुद्धिः कृता राजञ्छ्रवणाय महारथ… 881–890
- १६६२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे रामाय प्रददौ राजा शुभान्याभरणानि च । ३ । उनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको परम उत्तम प्रेमोपहार के रूपमें अर्पण करने के लिये… 891–900
- १६७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दूतान् सम्प्रेषयामास शत्रुघ्नाय महात्मने । २१ । अपने नगरमें भेजकर श्रीरघुनाथजीने महात्मा शत्रुघ्न के पास इस प्रकार उन दोनों… 901–910
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १६८० जो उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो श्रीरघुनाथजीकी कथा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोक में जाता है १५३… 911–912