Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 701–710
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 701–710
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शतपथब्राह्मण - प्रजापतिः पाशः १ - अमृतम् - ग्रात्मयोनिः । पोडशकलम् । विश्वात्मा विश्वेश्वरः प्राणाधारो भोक्ता २ - ब्रह्म - प्रकृतियोनिः पञ्चकलम् । विश्वसंचालकम् - भोगसाधनम् “ ३ - शुक्रम् - विकृतियोनिः । षट्कलम् । विश्वम् । भोंग्यम् । १ परात्परः - श्रद्ध मात्रा. “ पशुपतिः पशुः उ ५- अव्ययः ५- अक्षरः म् ५ - क्षरः १ - आनन्दः | १ | अमृतत्रह्मा १ मर्त्यब्रह्मा | २ - विज्ञानम ३- मनः ४- प्राणः 19 विष्णुः २,, विष्णुः इन्द्रः ३,, इन्द्र: ४, अग्निः ४, अग्निः | ५ - वः क् 19 सोमः ५,, सोम १ - प्राणः -- स्वायम्भुवः । २- आप: - - पारमेठ्यः । ३ - वाक् –– सौरी । ४ - अन्नादः - पार्थिवः । ५– अन्नम् — चान्द्रम् । प्रजापतिरीश्वरः षोडशकलः एष स ' प्रणवः -अमृत वाचकः ' तस्य ( १ ) --ब्रह्म- ( २ ) ४३६
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१ - वाक् – स्वायम्भुवं - शुक्रम् २- श्राप: -: - पारमेठ्य - शुक्रम् ३ – अग्निः- सौरं --- शुक्रम् ४– अग्निः- सौरं – – शुक्रम् ५ - श्रापः - चान्द्र -शुक्रम ६ - वाक् - - पार्थिवं - शुक्र म् प्रथमकाण्ड - अमृताग्निशुक्राणि - ३ शुक्रम् षड्विधम् ( ३ ) > मर्त्याग्निशुक्राणि ३ अमृत - ब्रह्म - शुक्र, तीनों में ' अमृतब्रह्म ' सब पदार्थों में समान है । ' ईशावास्यमिदं सर्वम् ’ - ‘ समं सर्वेषु भूतेषु ' इत्यादि श्रौतस्मार्त्त ' - प्रमाणों के अनुसार वह सत्र में समान है । परन्तु ब्रह्म, शुक्र, इन दोनों में भेद है । यद्यपि सत्र में पाँचों ब्रह्म हैं । एवं ६ औं शुक्र हैं । परन्तु किसी में कोई ब्रह्म प्रधान है, एवं किसी में कोई शुक्र प्रधान है । इस प्रधानता, अप्रधानता के तारतम्य से ही पदार्थों में परस्पर भेद होजाता है । जिन ६ शुक्रो का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया हैं, उनका हम अग्नि, सोम, इन दो तत्त्वों में अन्तर्भाव मानते हैं । वाक् श्रग्नि है । आप: सोम है । तीसरा अग्नि न हे ही । फिर मर्त्यावाक् अग्नि है । ग्रापः सोम है । अग्नि अग्नि है । ६ औं शुक्रों से विश्व का निर्माण हुआ है, इसका तात्पर्य्य यही है कि, अग्नीषोम से ही विश्व उत्पन्न हुआ है । अतएव विश्व के लिए अवश्य ही ' अग्नीषोमात्कं जगत् ' यह कहा जासकता है । तत्त्व दो ही हैं । परन्तु अग्नि भी अनेक प्रकार के हैं । सोम भी अनेक प्रकार के हैं | इत्थंभूत ‘ प्रकार-भेद ' से ही पदार्थों के स्वरूप में वैचित्र्य होजाता है । जिस अमृतप्रजापति का पूर्व में निरूपण किया गया है, उस में श्रानन्द – विज्ञानादि १६ कलाएँ बतलाई गई हैं । उन में श्रानन्द - विज्ञान – मनः - प्राण - वाक्- -भेद-भिन्न पञ्चकल अव्ययपुरुष है । इन पाँचों में आनन्द - विज्ञान उस ओर है, प्राण वाक् इस ओर है । मध्य में मन है | मन का दोनों के साथ सम्बन्ध है । अव्ययपुरुष के श्रानन्द - विज्ञान - मन का नाम ' विद्या ' भाग है । यही ब्रह्म है | मन: -- प्राण - वाक्- ' अविद्या ' भाग है । यही ' कर्म्म ' है । ब्रह्म - कम्र्मात्मक यही अव्यय-पुरुष सृष्टि का आलम्बन है । मुक्ति में उसका कर्म्मभाग गौण रहता है, एवं ब्रह्मभाग प्रधान रहता है । सृष्टि में ब्रह्मभाग गौण रहता है, एवं कर्म्मभाग प्रधान रहता है । दोनों में दोनों हैं । अमृतब्रह्मरूपा विद्या में मृत्यु-कर्म्मरूपा अविद्या अनुस्यूत है । एवं मृत्युमयी कर्म्मरूपा विद्या में अमृतब्रह्मरूपा विद्या अनुस्यूत है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं—
( १ ) - अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम् ।
मृत्युर्विवस्वन्तं वस्ते मृत्योरात्मा विवस्वति ॥
- शतपथे
( २ ) –विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोमयं सह ।
विद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥
- ईशोपनिषदि ४४०
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शतपथब्राह्मण
( ३ ) –कर्म्मण्यकर्म्म यः पश्येदकर्म्मणि च कर्म्म यः ।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्म्मकृत् ॥
— गीतायाम् ४ | १८ |
( ४ ) - ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
— गीतायाम् ५ | १० | बतलाना इस प्रपञ्च से यही है कि, सृष्टि का आधार मनः - प्राण- वाङमय भाग ही है । ऋषि, पितर, देव, गन्धर्व, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी, ओषधि, वनस्पति, धातु, रस, विष, श्रादि जितनीं भी स्थावर - जङ्गम – सृष्टियाँ हैं, सब का श्रालम्बन, एवं प्रवत्तक मनः प्राणवाङमय अव्यय ही है । श्रव्यय के मन से सृष्टि की कामना होती है, प्राणभाग से कामनानुकूल तपे होता है, एवं वाग्भाग से तपोऽनुकूल श्रम होता है, एवं काम तपः - श्रम के समुच्चय से ही वस्तु की उत्पत्ति होती है । ये तीनों ही सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं । अतएव सृष्टिप्रतिपादक ब्राह्मणों में- ' प्रजापतिर्ह वा इद्गग्र एक एवास | स ऐक्षत । स तपोऽतप्यत । सोऽश्राम्यत् ' इत्यादि रूप से इच्छा - तप - श्रम को ही सृष्टि के प्रवर्त्त के बत-लाया जाता है । मनः - प्राण - वाक्- तीनों में मन ज्ञानशक्तिवन है, प्राण क्रियाशक्तिघन है, एवं वाग् अर्थशक्तिघना है । इन तीनों शक्तियों से सर्वज्ञ - सर्वशक्तिमान् - सर्ववित् बनता हुआ अक्षर दर के द्वारा ब्रह्म - शुक्र को उत्पन्न कर ब्रह्म के द्वारा शुक्र से सम्पूर्ण विश्व का निर्माण किया करता है । ज्ञानमय मन भी निष्क्रिय है । अर्थमयी वाक् भी निष्क्रिया है । सक्रिय है केवल मध्य का क्रियामय प्राण | सृष्टि का प्रथम प्रत्रत्त ' के तपोमूत्ति प्राण ही है । इस तप से तपश्चर्या करता हुआ ही प्रजापति सबकुछ उत्पन्न करने में समर्थ होता है । तप से प्रजापति का प्राण विस्रत ( खर्च ) होता है | यही सूक्ष्मावस्था में जाकर मन बन जाता है । स्थूलावस्था में आकर यही वाक् बन जाता है । अतएव तैत्तिर-यादि श्रुतियों ने प्राण को ही ' प्रजापति ' माना है । संसार के प्राणीमात्र तप कर रहे हैं । सब अपने प्राण को परस्पर दे रहे हैं | इसी ' प्रारण यज्ञ ' से विश्व स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित होरहा हैं । प्राणसत्ता से ही प्राणी की सत्ता है । मनः - प्राण - वाक्, तीनों में प्राण हीं प्रधान है । अतएव हम न मनस्वी कहलाते, न वाग्मी कहलाते । अपितु कहलाते हैं ' प्राणी ' | ' एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति ' के अनुसार हम जिस व्यापार से अपने प्राण का विस्रंसन करते हैं, वह प्राणमूलक व्यापार ही ' तप ' कहलाता है । तप करो, सब कुछ सिद्ध होगा । चेतो सबकुछ मिलेगा । हमें विश्वास करना चाहिए कि, विंश्व इसी तपोबल से भृगु और अङ्गिराने ( अग्नि - सोमने ) सर्वत्र अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर रक्खा है । अतएव यदि हमें संसार में अभ्यु-दय प्राप्त करना है, तो - ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' उक्त श्रौत आदेश को शिरोधार्य्यं करते हुए हमें निरन्तर तपः ( कर्म्म ) ही करते रहना चाहिए । कभी क्षणमात्र भी अकर्म्मण्य नहीं बनना चाहिए । हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि, जो प्रजापति किसी समय ४४१
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प्रथमकाण्ड एकाकी थे, जिनके कोश में किसी युग में कुछ न था, आज वे ही इस तपोबल के प्रभाव से विश्व को उत्पन्न कर ‘ विश्वात्मा ' बनते हुए विश्वेश्वर नाम प्रसिद्ध होरहे हैं । उसी तप के प्रभाव से संसार संसरणात्मक ( गति-शील ) स्वधर्म्म से समन्वित है । सचमुच आज हमने तप के वास्तविक स्वरूप को विस्मृत ही कर दिया है । मणि-माला जपने में हीं आज हमने तपःकर्म्म की इतिश्री मानली है । इसी इतिश्री ने आज हमारी श्री की ' इतिश्री ' करदी है । यदि हमें अपने पूर्वजों पर गर्व है, तो हमें - ' उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्य वरान्निबोधत!!! ऋषिप्रदत्त इस महान् वर को उपास्य बनाते हुए अविलम्ब प्रकृतिसिद्ध ( शास्त्र सिद्ध ) प्रकृतिभेदभिन्न कर्त्तव्य - कम्र्मों में हीं अनन्यनिष्ठा से संलग्न होजाना चाहिए । इस कम्र्मनिष्ठा से अवश्यमेव हम अपनी चिरकाल - विलुत्ता सांस्कृतिक - निधि को पुनः प्राप्त करने में समर्थ हो जायँगे । यदि अत्र भी हमने उपेक्षा की, तो ' महती विनिष्टि ' है । प्रजापति के कोश में किसी समय कुछ न था । परन्तु उनके प्राणों में वह साधन था, जिससे सब कुछ सम्भव था । वह साधन था एकमात्र ' तप ' । उस तप से सर्वप्रथम उन्होंने ब्रह्म - सुब्रह्म - नाम के दो तत्त्व उत्पन्न किए । ‘ त्रयीवेद ' का नाम ब्रह्म है । एवं अथर्ववेद का नाम सुब्रह्म है । त्रयीब्रह्म वाङ्मय है, अथर्ववेद पोमय है । उस त्रयीब्रह्म में ऋक्साम केवल छन्द हैं, वयोनाध है, श्रायतनमात्र हैं । ये दोनों सृष्टिनिर्माण में केवल सहकारी हैं । इनसे कोई वस्तु नहीं बनती । अपितु ये दोनों वस्तु बनाने वाले के साथ नित्य सम्बद्ध रहते हैं । तीसरा है - ' यजुर्ब्रह्म ' । यजुर्ब्रह्म ही पुरुष हैं । इसी से सम्पूर्ण सृष्टि होती हैं । ' ऋक्सामे यजुरपीत: ' ( ० १० कां ० १ । १ ६ । ) के अनुसार ऋक्साम यजु में डूबे रहते हैं । यजु है क्या?, इसका उत्तर है- स्थिति, गति । सम्पूर्ण विश्व चलाचल है । चलभाव गति है । यही यत् है । अचलभात्र स्थिति है । यही जू है । यत्- जू ही यज्जू है । यज्जू ही ' यजु ' है | ( देखिए - शत ० १० कां ० १० | ३ | ६ | १, २, ) । स्थिति उस पदार्थ की सम्भूति है । गति उन पदार्थों का परि-वर्त्तनात्मक ' विनाश ' है । प्रत्येक वस्तु ठहरती हुई चल रही है । बनती हुई बिगड़ रही है । प्रत्येक पदार्थ प्रतिक्षण बिगड़ रहा है । नष्ट होरहा है । एवं प्रतिक्षण सम्भूतिभाव से भी आक्रान्त होरहा है । एक में हीं परस्परात्यन्तविरुद्ध सम्भूति, तथा विनाश का समन्वय हो रहा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उपनिष-च्छति कहती है-नयू सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वदोभयं सह! विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ - ईशोपनिषदि सम्भूति, तथा विनाश — रूप स्थितिगत्यात्मक तत्त्व का ही नाम यजुः है । यह यजु: अग्नि - स्वरूप है । कैंसा अग्नि ‘ वागग्नि ’ | इसी यजुरग्नि के लिए- ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ' यह कहा जाता है । विश्व का उपादानभूत ब्रह्माग्निरूप यह यजुर्ब्रह्म ही पहिला शुक्र है । ' वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थारच निर्ममे ' में पृथक् पृथक् संस्थानिर्माण करने वाला यही पहिला ' अपौरुषेय - ब्रह्मनिःश्वसितवेद ' है । यह वेद अग्निरूप है । अग्नि ' सत्य ' होता है । अतएव हम इसे ' सत्य ' तत्त्व कह सकते हैं । तीन सत्यों में-‘ वेदाः सत्यम् ’ वाला पहिला यही सत्य है । सम्पूर्ण देवता इसी सत्यमूर्ति वेद पर प्रतिष्ठित हैं | ४४२
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शतपथब्राह्मण दूसरा है सुब्रह्म । श्रापः तत्त्व का ही नाम सुब्रहा है । इसमें स्नेह - तेज - ये दो भाग हैं । स्नेहतत्त्व भृगु है, तेजस्तत्व अङ्गिरा है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपम् ' के अनुसार इन दोनों की समष्टि ही ' आपः है । यही अथर्ववेद् है । वह सत्य था, यह ऋत है । वह अग्नि था, - यह सोम है । वह वाक् था, यह आपः है । वह पुरुष था, यह स्त्री है । वह प्रारण था, यह रयि है । वह वृषा था, यह योषा है | उस तपोमूर्त्तिं प्रजापति के तप से सबसे पहिले - सत्य - ऋतरूप ब्रह्म, एवं सुब्रह्म का ही जन्म होता है | आगे जाकर इस ब्रह्म में ' मातरिश्वा वायु के द्वारा सुब्रह्म की आहुति होती है । इसी से विश्व उत्पन्न होता है | तीसरा शुक्र अग्नि है । वही वेद उस आपोमय मण्डल में अवतीर्ण होकर रूपान्तर धारण कर लेता है । उसी के लिए- ' अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः यह कहा जाता है । वह वेदाग्नि ' ब्रह्म-निःश्वसित ' वेद नाम से प्रसिद्ध था, एवं यह वेदाग्नि ' गायत्रीमान्त्रिकवेद ' नाम से प्रि प्रसिद्ध है । C. संसार के निर्मात । बाक् - आप: - अग्निः, ये तीन ही शुक्र हैं । ' श्रद्ध ' ह वै प्रजापतेरा-त्मनो मर्त्यमासीदद्ध ममृतम् ' के अनुसार तीनों हीं अमृत मर्त्य भेद से दो दो भागों में विभक्त हैं । इसप्रकार तीन के ६ शुक्र होजाते हैं । इनमें अमृतावाक् से स्वयम्भू मण्डल का निर्माण होता है । अमृत आपः से परमेष्ठीमण्डल का निर्माण होता है । एवं अमृताग्नि से सूर्य्य के अमृत भाग का निर्माण होता है । मर्त्याग्नि से सौर मर्त्य भाग उत्पन्न होता हैं । मर्त्य आप: से चन्द्रमा उत्पन्न होता है । एवं मर्त्या वाक् से पृथिवी उत्पन्न होती है । मध्य में सूर्य्य है । उपक्रममें स्वयम्भू है । उपसंहार में पृथिवी ( भूपिण्ड ) है । पृथिवी का मर्त्य- वाक्- शुक्र से सम्बन्ध है । चन्द्रमा का मर्त्य - आपः - शुक्र से सम्बन्ध है । इसप्रकार - ' तस्माद्यत् किंचार्वाचीनमादित्यात्-सर्वं - तन्मृत्युनाप्तम् ' के अनुसार सूर्य्य के नीचे की सृष्टि मृत्युप्रधान है । एवं सूर्य्य के ऊपर प्रतिष्ठित परमेष्ठी का अमृत - श्राप: - शुक्र से सम्बन्ध है । स्वयम्भू का अमृत वाक्शु से सम्बन्ध है । मध्यस्थ सूर्य्य का - अमृत - मयग्नि, दोनों मध्य के शुक्रों से सम्बन्ध है । शुक्रमूला सृष्टि का यही संक्षिप्त स्वरूपेतिवृत्त है । * ब्रह्म, सुब्रह्म से कैसे विश्व उत्पन्न होता है?, इह्न् शुक्र क्यों कहा जाता है?, इन की ऋत, सत्यता का क्या स्वरूप है?, इत्यादि प्रश्नों का उत्तर ' ईशभाष्य ' में द्रष्टव्य है । ४४३
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प्रथमकाण्ड श्रमृतम् मर्त्यम् १. वाक् – ब्रह्म निःश्वसितवेदः त्रयीवेदः अपौरुषेयः ब्रह्माग्निः = स्वयम्भूः २ आपः = ब्रह्मस्वेद वेदः अथर्ववेदः " - गोत्र मित्रत्रयीव पारुषयः दवन ने ४ अग्निः – गायत्रीमात्रीकवेदः - त्रयीवेदः ५ ( पः = ब्रह्मस्वेदवेद: -अथ वेदः ६ वाक् = यज्ञमा त्रिकवेदः - त्रयीवेदः पारमेष्ठ्यसोमः = परमेष्ठी = मूर्यः देवाग्निः J " चान्द्रसोमः चन्द्रः " भूताग्निः पृथिवी । जगदित्याहुः अग्नीषोमात्मकं ' विविध भावापन्न विश्व का संक्षिप्त स्वरूप पूर्व के निरूपण से गतार्थ होजाता है । अत्र दर्भोत्पत्ति की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, पृथिवी चन्द्रात्मक पञ्चकल जिस विश्व का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है; उस महाविश्व के केन्द्रभूत मध्यस्थ सूर्य्य पर दृष्टि डालिए । सूर्य्य अग्निमय है । परमेष्ठी आपोमय है । श्रापोमय परमेष्ठी के उदर में बुद्बुद्रूप सूर्य्य प्रतिष्ठित है । सूर्य्य-पिण्ड मर्त्य है | यह मर्त्य पिण्ड अपने स्थान पर स्थिररूप से तप रहा है । इसमें एक अमृतप्राण है । यह अमृतप्राण जहाँतक सूर्य्य का तेजोमण्डल है, वहाँतक व्याप्त है । इसी को ' इन्द्र ' कहा जाता है । पारमेष्ठ्य सोम की आहुति से युक्त होकर यही ' मघवा ' नामक सौर इन्द्र ' रूप ' का ( प्रकाश का ) अधिष्ठाता बन रहा है । सूर्य्यं से ही ( सूर्य के प्रवर्ग्यभाग से ही ) भूलोक उत्पन्न होता है । स्वयं सूर्य्य द्युलोक है । सूर्य्य, एवं पृथिवी का मध्य का भाग अन्तरिक्ष है । यही सौर त्रिलोकी ' रोदसी ' नाम से प्रसिद्ध है । परमेष्ठी में पानी भी है, सोम भी है । इनमें सौम्य प्राण पितर कहलाता है, आप्यप्राण असुर कह— लाता है । सोमतत्त्व सूर्य्य का स्वरूपरक्षक । अप्तत्त्व सूर्य्यभक्षक है । यह आपः व्याप्तिधर्म्मा है । चारों आोर फैलने वाला है । आाप्तिधर्म्मा यह पानी उस सम्पूर्ण रोदसीत्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । चारों ओर से सौर मण्डल का संवरण करके उसपर अपना प्रभुत्त्व स्थापित किए हुए है । अतएव ऋषियोंनें इस श्राप्य-प्राण की ' वृत्र ' संज्ञा रक्खी है । श्राप्यप्राणरूप इस ' वृत्रासुर ' ने सम्पूर्ण सौरमण्डल को ( जो कि सौरमण्डल ' द्यावापृथवी ' स्वरूप है ) घेर रक्खा है । परन्तु बड़ा आश्चर्य है कि, उस महाप्रबल शत्रु के आक्रमण होने पर भी सौर इन्द्र त्रैलोक्य में विजयी होरहा है । यदि इन्द्र अपना कार्य्य छोड़ देता, तो अवश्य ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य आपोमण्डल में विलीन होजाता । होता क्या है - उसी पारमेष्ठ्य सोम की आहुति से प्रबल बनता हुआ इन्द्र सौर - रश्मियों में प्रविष्ट होकर इस रश्मिरूप वज्र के द्वारा उस शत्रु का संहार किया करता है । सौर रश्मियाँ अपने धक्के से चारों ओर श्राक्रान्त वृत्ररूप उस पानी को हटातीं रहतीं हैं । इस धक्के से वह वृत्र-रूप पानी ऊपर की ओर व्याप्त उसी श्रापोमय समुद्र में विलीन होता रहता है । जहाँ इन्द्र नहीं रहता, वहाँ वायु नहीं रहता, एवं जहाँ वायु नहीं रहता, वहाँ ' यद्वै वातो नाभिवाति तत्सर्वं वरुणदैवत्यम् ' के अनु-सार वरुण का साम्राज्य होजाता है । एवं नहीं वरुण का राज्य होजाता है, वहाँ वरुणपाश के प्रभाव से सड़ान ४४४
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शतपथब्राह्मण उत्पन्न होजाती है । अवरुद्ध वायु में कोई भी वस्तु बिना सड़े नहीं रह सकती । क्योंकि वायुगत इन्द्र के म रहने से वहाँ वृत्रासुर अपना प्रभाव स्थापित कर लेता है । यही स्थिति यहाँ हुई | इन्द्र के द्वारा हतवीर्य्य उस वृत्ररूप पानी की भी यही दशा हुई । सूर्य-रश्मियोनें पानी को चारों ओर से प्रक्षिप्त कर दिया । इस व्यापार से कुछ दूर पर्य्यन्त रश्मियाँ भी पानी में प्रविष्ट होगईं । पारमेष्ठ्य पानी के जितने भाग में सौर रश्मियाँ प्रविष्ट रहतीं हैं, उतनी दूर का पानी रश्मियों के प्रभाव से दूषित नहीं रहने पाता । क्योंकि उतनी दूर में पवित्रधर्म के अधिष्ठाता सौर इन्द्र की सत्ता रहती हैं | यह सौर पानी अनापूयित ( दुर्गन्ध रहित ) रहा । इस पानी का उस दूषित रश्मिशून्य वृत्रपानी ग्लानि करना स्वाभाविक ही है । यह स्वच्छ दिव्य- सौर पानी उस प्रक्षिप्त पूयित वृत्रपानी से न मिलता उससे हुआ पृथक् ही रहता है । पारमेष्ठ्य मण्डल में जितनी दूर पर्य्यन्त सौर रश्मियाँ अन्त प्रविष्ट : रहतीं हैं, उतनी दूर का पानी ' ज्योतिर्म्मय ' होजाता है । इसी ज्योतिर्म्मय अनापूयित पानी को ‘ वेन ' कहा जाता है । भाष्यकार महाभाग वेन का अर्थ ' सुन्दर ' करते हैं । वस्तुतः वेन पूर्वोक्त ज्योतिपय पानी का ही नाम है । हाँ, इतनी बात अवश्य है कि, जिसके शरीर में यह पानी उल्वण रहता है, वह अवश्य ही अति-सुन्दर होता है । ऐसा पदार्थ ' पानीदार ' कहलाता है । किसी किसी के मुख पर सुशान्ता सात्त्विक - ज्योति होती है, यह उसी वेन की महिमा है । इसके विपरीत जिसके शरीर में वृत्रपानी की प्रधानता होती है, वह कुरूप होता है, असुरबुद्धि से आक्रान्त होता है । इसी पूर्वोक्त वेन का स्वरूप बतलाते हुए ऋषि कहते हैं-वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । सङ्गमे सूर्य्यस्य शिशु ं न विप्रा मतिभीरिहन्ति ॥ — यजुःसंहिता ७ | १४ | सोमयज्ञ में ‘ एकधना ', ‘ नित्राभ्या ', ' वसतीवरी ' - इन तीन प्रकार के जलों का ग्रहण किया जाता है | इनसे ‘ वसतीवरी ' पूर्वोक्त वेनपानी की ही प्रतिकृति मानी गई है । सूर्य्यमण्डल में इस वेन की व्याप्ति है । अत्नः इस पानी का ग्रहण सूर्य्यसत्ता में ही किया जाता है । साथ ही अवरुद्ध तटादि का ( बँद तालाब का ) पानी पूर्वकथनानुसार वारुण होता हुआ वृत्रस्वरूप है, आसुर है, वेन का विरोधी है, एवं बहता पानी वरुणरहित होता हुआ शुद्ध है, अनापूरित है, वेनसम्पत्ति से युक्त है । अतएव-“ ता वै स्यन्दमानानां गृह्णीयात् - दिवा गृह्णीयात् " - शतपथ उक्त कथनानुसार वेन की प्रतिकृतिरूप ' वसतीवरी ' का आनयन बहते पानी से ही होता है । पूर्व में बतलाया गया है कि, परमेष्ठी से सोम सूर्य्य में आहुत होता रहता है । सूर्य्य में बहुत होने वाले इस पार--मेष्ठ्य सोम का सर्वप्रथम इसी ज्योतिर्म्मय पानी से सम्बन्ध होता है । अनन्तर वह सूर्य में बहुत होता है । हमारा सोमयज्ञ इस नित्ययज्ञ की प्रतिकृति है । अत: जैसा वहाँ होता है, ठीक वही निदान के द्वारा यहाँ कराना पड़ता है | बसतीवरी ज्योतिर्म्मयपानी ( वेन ) के स्थान में है । सोमवल्ली सोम के स्थान में है । प्रकृतिवत् यहाँ भी पहले इस सोमवल्ली को वेनरूप वसतीवरी पानी से अभिषिक्त किया जाता है । इसी वेन-रूप पानी की स्तुति पूर्वमन्त्र में की गई है । ४४५
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प्रथमकाण्ड भाष्यकारोंनें वेन का अर्थ चन्द्रमा भी किया है । हमारी दृष्टि यह अर्थ उनकी प्रौढिमात्र ही है । सूर्य्यरश्मियाँ ' पृश्नि ' कहलाती हैं । क्योंकि उनमें अनेक वर्णं होते हैं । वहाँ का पानी इन रश्मियों के गर्भ में प्रविष्ट रहता है । अतः हम अवश्य ही वेन को ' पृश्निगर्भा ' कह सकते हैं । यह वेनपानी सौर ज्योति से वेष्टित रहता है । ज्योति ही इसकी ' जरायु ' है । लोक को- ' रज ' कहते हैं । लोक की अन्तिम सीमा सौरमण्डल का अन्तिम प्रदेश है । यह त्रैलोक्य की सीमारूप ' विमान ' है । इसी लोकविमान में [ सौरसंस्थान की अन्तिम सीमा में ] यह वेन प्रतिष्ठित रहता है । ऐसा यह वेन प्रत्येक वस्तु को प्रेरित किया करता है । सूर्य्यं के ऊपर उसी बेनस्थान के समीप प्रेरयिता सविताग्रह: हैं । उस की प्र ेरणा का पहले वेन से ही सम्बन्ध होता है । सूर्य्य, और पारमेष्ठ्य पानी, दोनों जहाँ मिलते हैं, परस्पर ओतप्रोत होते हैं--ऋषिगण बड़े प्रेम से शिशुवत् उसी स्थान पर अपनी बुद्धि के द्वारा उसकी स्तुति किया करते हैं । बात यथार्थं है - वहाँ दृष्टि का पहुँचना असम्भव है । केवल ' मति ' के द्वारा ही उसकी स्तुति होसकती है । संसार में आप जो पानी देखते हैं, सबमें थोड़ी बहुत मात्रा से अवश्य ही ' वृत्रभाग ' रहता है 1 । इससे यह भी मान लेना पड़ता है कि, पवित्रधर्मं के अधिष्ठाता होने पर भी पानी सर्वात्मना पवित्र नहीं कहा जासकता । वृत्र के रहने से अवश्य ही वह दोषाक्रान्त रहता है । सर्वथा पवित्र पानी तो [ जिसके कि वास्त-विक मौलिक स्वरूप को हम प्राप्त करने में असमर्थ हैं ] केवल वही पूर्वोक्त ज्योतिर्मय वेन पानी है | यज्ञ में यदि यत्किञ्चित् भी असुरभाव प्रविष्ट हो पड़ता है, तो यज्ञ नष्ट होजाता है । प्रकृतिसिद्ध, प्राणानुबन्धी इसी तथ्य के आधार पर ऋषि इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि, बिना पानी के काम चलेगा नहीं, एवं पानी में असुरभाव का रहना अनिवार्य है । फलत: इसी विप्रतिवत्ति के निराकरण के लिए पदार्थविद्या के उन आचाय्योंनें ‘ दर्भ ' का ही अन्वेषण किया । उह्नोंनें अपनी वैज्ञानिक परीक्षाओं से यह जान लिया कि, दर्भ का निर्माण सुरभाव से रहित स्वच्छ वेनपानी से ही होता है । जो माहात्म्य सुवर्ण का है, वही दर्भ का है । दोनों में अन्तर केवल इतना हीं है कि, सुवर्ण अग्निप्रधान है, एवं दर्भ अपप्रधान है । वे ही सौररश्मियाँ पार्थिव मिट्टी के पाशबन्धन में आकर सुवर्ण बन जातीं हैं । एवं वे ही सौररश्मियाँ दर्भ बनतीं हैं । सौरमण्डल में वेन पानी भी है, सावित्राग्नि भी है । पानी से युक्त इन्द्र दर्भ है, एवं अग्नि से युक्त इन्द्र सुवर्ण है । पारमेष्ठ्य समुद्र का अंशभूत वेन पानी अतिपवित्र है । पर्जन्य, और विद्य ुत् से संसृष्ट, सौर हिरण्मय प्राण से समन्वित वेन पानी हीं दर्भ का उपादान है । इसी ' दर्भोंत्पत्तिविज्ञान ' को लक्ष्य में रखकर अथर्वश्रुति कहती है—
यत् समुद्रो अभ्यक्रन्दत् पर्जन्यो विद्यता सह ।
ततो हिरण्यो बिन्दुस्ततो दर्भे श्रजायत ॥
- अथर्व सं ० १६ का ० ३।५ । दर्भ साक्षात् वेनपानी है, इसी रहस्य को बतलाने के लिए ऋषियोंनें इसका नाम ' दर्भ ' रख दिया है | किसी भी वस्तु में आप दर्भ डाल दीजिए, उसी क्षण उसके आसुरप्राण मूच्छित होजायँगे, एवं सावित्र— आग्नेय वायु में व्याप्त दैवप्राण तत्र समाविष्ट होजायगा । ग्रहणकाल में असुरप्राण की व्याप्ति रहती है, दर्भ वेनरूप होने से असुर का शत्रु है । अतएव जिन पदार्थों के साथ दर्भ का सम्बन्ध करा दिया जाता है, उनमें ग्रहण-" ४४६
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शतपथब्राह्मण कालावच्छिन्न असुरप्राण प्रविष्ट नहीं होने पाता । पूर्व का ब्राह्मणभाग आख्यान के द्वारा इसी ' दर्भोंत्पत्ति ' का निरूपण करता है । प्रणीतापानी को दर्भ से क्यों पवित्र किया जाता है, इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति हैं, जिसे लक्ष्य बना कर ही श्रुति ने कहा है-“ वृत्रो ह वा इदं • । तमिन्द्रो जधान ० ” ॥४, ५ ॥ सम्पूर्ण विश्व ऋत - सत्यमय है । सहृदय सशरीरी तत्त्व ही सत्य है, अहृदय अशरीरी तत्त्व ही ऋत है, जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जाचुका है । जितने पिण्ड हैं, सत्र ऋतसत्यात्मक हैं । पिण्ड क्षरपरमाणुओं का संघमात्र है । प्रत्येक परमाणु अपना केन्द्र रखता है । इन सकेन्द्र परमाणुओं का एक स्वतन्त्र केन्द्र बनता है । उसी को ' प्रजापति ' कहा जाता है । इस केन्द्र की अपेक्षा से सम्पूर्ण परमाणु ऋत हैं । सब उस केन्द्र पर प्रतिष्ठित हैं । इस दृष्टि से ऋत सत्य में अनुस्यूत है, एवं सत्य ऋत में अनुस्यूत है । इसी आधार पर ' ऋतं सत्ये धायि, सत्यं ऋते धायि ' ( शतपथ ) यह कहा जाता है । इसप्रकार प्रजापति के तप से प्रादुर्भूत ऋत - सत्य सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं । हाँ इतना अवश्य है कि, कहीं ऋत की प्रधानता है, तो कहीं सत्य की प्रधानता । जिस सविता का प्रकृत में निरूपण चल रहा है, वह सत्यप्रधान है । ग्राजदिन सविता सूर्य्य का · पर्य्याय समझा जाता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । सविता एक स्वतन्त्र ग्रह है, एवं इसकी सत्ता सूर्य से ऊपर है । सूर्य से ऊपर बृहस्पति है । बृहस्पति से ऊपर सविता है । सविता से ऊपर ब्रह्मणस्पति है । इसके उपर परमेष्टी, सूत्रात्मा वाचस्पति आदि हैं । चर - अचर जड़ - चेतन सत्र में सविता से ही प्रेरणात्रल उपलब्ध है | प्रेरणा का अधिष्ठाता एकमात्र सविता देवता ही है । सूर्य्य से नीचे का त्रैलोक्य सूर्य्यरूप रुद्र के सम्बन्ध से ' रोदसा ' नाम से प्रसिद्ध है । रोदसीत्रिलोकी में सूर्य्य के द्वारा ही क्योंकि प्रेरणा का आगमन होता है, अतएव हम अपने लिए सूर्य्य को ही सविता मान लेते हैं । सूर्य्य का सवितृत्त्व आपेक्षिक है, गौण है । सब सविता हैं । गुरु सविता हैं, शिष्य इससे प्रेरित है । पति सविता है, पत्नी प्रेरिता है । राजा सविता है, प्रजा उसकी प्रेरणा से प्रेरिता । इसी प्रकार सर्वत्र सविता का साम्राज्य समझिए । इन सत्र का अधिष्ठाता सूर्य्यरूप सविता है । प्रकृत में सविता शब्द से सूर्य्य का ही ग्रहण है । क्योंकि यज्ञविद्या सौर त्रयीवेद पर ही प्रतिष्ठित है । सूर्य्य त्रयीमय है । अतः यज्ञप्रकरण में सूर्य्यात्मक सविता काही ग्रहण अपेक्षित है । सूर्य्यं अग्निमय हैं | अग्नितत्व सत्य है । अतः हम इस सविता को अवश्य ही सत्यमूर्त्ति कह सकते हैं । सौरमण्डल में सर्वत्र सविता प्राण भरा हुआ है । सौर - रश्मियाँ सविता - प्राणमयीं हैं । सौर मण्डल का कोई भी प्रदेश सविता - प्राणमयीं रश्मियों से शून्य नहीं हैं । कहीं भी छिद्र नहीं है । त्रैलोक्य में पदार्थों के दूषित भाव को हटाने वालीं, अतएव ' पवित्र ' नाम से प्रसिद्ध सविता - प्राणमयीं रश्मियाँ ‘ अच्छिद्र हैं’-इसका तात्पर्य्य यही है कि वे रश्मियाँ सत्य हैं । यद्यपि याज्ञवल्क्यने ' यो वा अयं पाते एषोऽच्छिद्र पवित्रः ' इत्यादि रूप से वायु को अच्छिद्र पवित्र बतलाया है । तथापि विरोध का अवसर नहीं है । वायु वास्तव में पवित्र करता है । परन्तु सौर वायु, न कि वारुण वायु । वारुण वायु तो सड़ान ही उत्पन्न कर देता है | सौर वायु में ' इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते ' इस सिद्धान्त के अनुसार एक चौथाई इन्द्र रहता ४४७
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प्रथमकाण्ड - है । इन्द्र सौर प्राण है । इसीके सम्बन्ध से सौर वायु में पवित्र करने का धर्म्म उत्पन्न होता है । क्योंकि चायु से भी कोई स्थान रिक्त नहीं है । सम्पूर्ण सौर मण्डल वायु व्याप्त रहता है । अतः उसी सौर रश्मिगत इन्द्रप्राण के सम्बन्ध से सौर मण्डल में सर्वत्र व्याप्त सौर वायु को भी हम अच्छिद्र पवित्र कह सकते हैं । वस्तुतः विशोधनशक्ति सौर - रश्मियों में ही है । अतएव श्रागे जाकर श्रुति को - ' एते वा उत्पवितारो यत् सूर्य्यस्य रश्मयः ' यह कहना पड़ा है । इसप्रकार ( सवितुः ० ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा उसी श्रच्छिद्र पवित्र की भावना करता हुत्रा, उसी सौरप्राणरूप ' वेन ' से निर्मित कुशाओं के द्वारा अध्वर्यु यज्ञपात्रों को पवित्र करता है । इसी अभिप्राण से श्रुतिने कहा है--' स उत्पुनाति । तस्मादाह सूर्यस्य रश्मिभिरिति ॥६ ॥
संकुचित भाव ही अल्पता का मूल होता हुआ दुःख का कारण बनता है । ऐसा भाव यज्ञ-विरोधी है । इसी को दूर करने के लिए ' देवीरापो ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ वामहस्त में पात्र लेकर दक्षिण से ऊपर की ओर प्रोक्षण करता हुआ आगे चलता है । भूमण्डल में आया हुआ पानी दोषाक्रान्त होजाता है, एवं अन्तरिक्ष में रहने वाला पानी इन्द्ररूप सौर प्राणमय वायु के सम्बन्ध से शुद्ध- - पवित्र रहता है | हमारा यह पानी दोषाक्रान्त नहीं है । अपितु शुद्ध श्रान्तरिक्ष्य, अतएव भूमण्डलस्थ पानी की अपेक्षा श्रेष्ठ है, पवित्र है | अपने पात्रस्थ पानी को यह प्रतिष्ठा प्रदान करने के लिए ही ऊपर की ओर ही प्रोक्षण क्रिया की जाती है । इसी आधार पर - " उपस्तौत्येवैना एतत् । महयत्येव " - यह कहा है । 1 पानी का निम्ऩगमन प्रसिद्ध है । पानी कहीं भी डाल दीजिए, जिधर ढलाव होगा, उसी ओर पानी चल पड़ेगा | आगे जाना पानी का स्वाभाविक धर्म्म है । हम भी यज्ञ के द्वारा आगे बढ़ना चाहते हैं | वही कार्य्यं यज्ञस्त्ररूप – सम्पादक इस प्रोक्षणपानी का है । यह हमारे कर्म के अनुकूल है । इसी तथ्य को सूचित करने के लिए- ' अग्रे गुवः ' कहा है । अपि च नदी तालाब आदि सब का पानी अन्ततोगत्त्वा समुद्र में ह्रीं विलीन होता है । दोनों प्रकार से पानी का श्राश्रय समुद्र ही है । भूपिण्ड पर स्थित पानी अपनी सुसूक्ष्मा वाष्पावस्था से तो श्रान्तरिक्ष्य ' अर्णव समुद्र ' में प्रतिष्ठित होता है । एवं अपनी स्थूलावस्था से यहीं के आपो-मय पूर्व पश्चिमादिं समुद्रों में मिलता है । यहाँ प्रधानता अान्तरिक्ष्य समुद्र की है, जो कि समुद्र वायुमय है । पानी बाप बन कर इसी समुद्र में प्रतिष्ठित होता है । पृथिवी से ऊपर का अन्तरिक्ष ' अग्रस्थान ' है । यहीं पानी जाता है । यहीं यजमान का ' दैवात्मा ' जायगा । इसलिए भी पानी को - ' अग्रेगः ' कहा जासकता है | इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर ' ता यत समुद्र गच्छन्ति, तेनाग्रेगुवः ' यह कहा है । ‘ पवित्रं ते विवतं ब्रह्मणस्पते ०, इत्यादि मन्त्र - वर्णन के अनुसार पदार्थ के दूषित भाव को नष्ट कर उसे पवित्र बनाने वाला परमेष्ठीमण्डल में प्रतिष्ठित ' ब्रह्मणस्पति ' नाम से प्रसिद्ध ' पवमानसोम ' ही है । इस पवमान सोम का प्रथम भक्षण उस पारमेष्ठ्य वेन पानी से ही होता है । पहिले उसी का इस * यथा नद्यः सन्दमाना समुद्र ेऽस्तं गच्छन्ति नाम - रूपे विहाय ।
तथा विद्वान्नारूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।
—मुण्डकोपनिषत् ३ ॥ ८ ।
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