शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री
Shatapathabrahman 1 1 · 884 पृष्ठ · 89 खण्ड
विषय सूची
- ॐ शतपथब्राह्मण - हिन्दी- विज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डान्तर्गत " प्रथम अध्यायात्मक ” प्रथमखण्ड १ निबन्धा - मोतीलालशम्र्मोपाह्रो - यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा,… 1–10
- शतपथ - प्रथमखण्ड एक महती — समस्या बन कर हमारे सम्मुख उपस्थित होजाता है, जिसका निम्न लिखित अक्षरों में आज के आबालवृद्धवनिता – सभी निष्कामकर्म्मयोगियों? के… 11–20
- शतपथ - प्रथमखण्ड जनित विषयात्मक फल ही इसकी मानसिक - चर्व्वणा के प्रमुख उपास्य बने रहते हैं । फलात्मक विषयों के सतत अनुध्यान से उत्पन्न होने वाली… 21–30
- शतपथ - प्रथमखण्ड आदि आदि असंख्य ऐसे भी प्राणी हैं, जिनमें शत: बुद्धि विकसित रहती है । और कतिपय क्षेत्रों में तो मानव की अपेक्षा भी इनकी बुद्धि विशेष काम… 31–40
- शतपथ - प्रथमखण्ड मृत्यौ - परिध्वस्ता - दर्शने ' ( हैम: ) के अनुसार पलायन, मृत्यु, स्वरूपध्वंस, प्रदर्शन, आदि अनेक भावों के साथ ‘ नाश ' शब्द समन्वित हो रहा… 41–50
- शतपथ - प्रथमखण्ड एवमेव प्राकृतिक समत्रर्त्त'न के गर्भ में श्रात्यन्तिक विषमवर्त्तन ही पुष्पित - पल्लवित होता रहता है… 51–60
- शतपथ - प्रथमखण्ड इस ब्रह्माग्नि का प्राण - महिमात्मक - प्रथम - ब्रह्माग्निवेद ही पहिला ' प्राकृतवेद ' है, जिसे ब्रह्माग्नि के सम्बन्ध से ही - '… 61–70
- शतपथ - प्रथमखण्ड प्राकृत तत्त्वात्मक – नित्य - वेद का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उन पांचों प्राकृत - वेदविवत्त में से सर्वान्त के – ‘ यज्ञमात्रिक '… 71–80
- शतपथ - प्रथमखण्ड ऋषिप्राणद्रष्टा, अतएव ऋषिप्राणात्मक मन्त्रब्राह्मएात्मक पूर्वोक्त शालाभेदभिन्न तत्त्ववेद ( वृ ० सं ० ७० ) के द्रष्टा मानवमहर्षियोंने अपनी… 81–90
- शतपथ - प्रश्न मत्र एड का कदापि यह अभिप्राय नहीं है कि, ' वेदमन्त्रन्त्य हैं । अपितु अर्थ यही है कि, ब्राह्मणवेद की ज्ञानविज्ञानात्मिका - परिभाषाओं के… 91–100
- शतपथ - प्रथमखण्ड सनातन - ज्ञानविज्ञान - तथ्यों से सर्वथा शून्य, भूतानुत्रन्धी- मनः शरीरमात्र प्रधान अशन - पान - भ्रमणादि लोकजीवनों से अनुप्राणित… 101–110
- शतपथ - प्रथमखण्ड लेना पड़ता है कि, “ इत्थंभूता - व्यावहारिकी - जनतन्त्रीया - उपयोगिता की दृष्टि से तो सचमुच ही वेदशास्त्र का आज कोई भी उपयोग प्रतीत नहीं… 111–120
- शतपथ - प्रथमखण्ड | १ | १ - भोगसाधनभूता - ज्ञानशक्तिः ( ब्रह्मवर्चस् ) २- भोगफलात्मिका - नामख्यातिः ( कीत्तिः ) ब्रह्मवर्चोभावेन महान् भवति ( १ ) कीर्त्या… 121–130
- शतपथ - प्रथमखण्ड हुआ है यथामति इस ग्रन्थ की उपासना के आधार पर । अतएव इसका ' भाष्य ' नामकरण मान लिया गया है… 131–140
- शतपथ - प्रथमखण्ड टा - धरातल पर प्रतिष्ठित है, वैसा गरिमा - महिमामय हिन्दू कदापि किसी के भी प्रति प्रतिक्रियावादी, आक्रोशवादी, किंवा आवेशाविष्ट नहीं बन… 141–150
- शतपथ - प्रथमखण्ड अजमहाभाष्ये ) । शिल्प कला - वाणिज्य - नृत्य -- गीत - सङ्गीत - आख्यान - उपाख्यान - गाथा - लोक - समाज राजनीति अन्तर्राष्ट्रीय नीति -- आदि… 151–160
- शतपथ - प्रथमखण्ड चड़ा ही चमत्कारपूर्ण है श्रुति का उक्त उद्बोधनसूत्र | दिग्देशकालानुबन्धी- व्यक्त - मूर्त्त - -शासन-तन्त्र के दों प्रमुख त्रल माने गए हैं,… 161–170
- विषयसूची २८ - ज्ञान - विज्ञान - शब्दों की विविध - परिभाषाएँ २६ – श्रुति के द्वारा ज्ञान - विज्ञान - पक्षों का समर्थन .... ३२ – ब्रह्म विज्ञानधारा, और… 171–180
- विषयसूची ५४ विद्वानों से तटस्थता ५५ लोकसामान्यजन के प्रति अनुगति ५६ लोकानुगत - पारिभाषिक क्षम्य - विस्तार ५७ स्थिति, और गति का संस्मरण ५८ स्थिति से… 181–190
- विषयसूची १८८ काल्पनिक - मान्यताओं से वेदार्थ की अभिभूति २२२ १८६ छन्दोऽनुगत तीन सवन १६० सवनानुगता शब्दोच्चारणमर्य्यादा १ ९ १ सवनानुगता - स्वरमय्र्यादा १६२… 191–200
- ३५६ ' न विजानामि यदि वेदमस्मि ' ३५७ निरर्थक ब्रह्मसत्ता विरोध ३५८ क्रियामय विश्व का स्वरूप ३५६ क्रिया का निष्क्रिय आधार ३६० विभिन्न ज्ञानधाराएँ विषयसूची… 201–210
- ६७६ वर्णवागनुगता मानवसृष्टि ६७७ भूवायु - और चान्द्रजीव ६७८ चान्द्रमण्डल, और चान्द्रजीव विषयसूची ३४० १०१० शास्त्रदृष्टि की प्रामाणिकता 17 १०११ चरक का… 211–220
- ४२४ केन्द्रपरिचायक धर्म ४२५ केन्द्रशक्ति का अन्तर्य्यामित्त्व ४२६ पञ्च क्षरों का अग्निप्रधानत्व ४२७ अग्नि का सार्वदैवत्य ४२८ प्रजापति का विस्रसन ४२६… 221–230
- १०३ ' वात ' नामक पारिभाषिक वायु १०४ प्रवाहित - स्पर्शधर्मा वातवायु १०५प्राङ, और प्रत्यङ रूप प्राणवायु १०६ एक प्राणवायु की द्विरूपता १०७ प्राणापानस्थानीय… 231–240
- ३४५ तर्कत्रयी ( ३० ) ३४६ शब्दब्रह्मत्रयी ( ३१ ) ३४७ अनलत्रयी ( ३२ ) ३४८ तत्त्वत्रयी ( ३३ ) ३५.६ त्रिफलत्रयी ( ३४ ) ३५० कालखण्डत्रयी ( ३५ ) ३५.१ त्रिकुटी (… 241–250
- १०१६ ब्रह्मा, और अष्टाचत्वारिंशत्पृष्ट १०२० पृथिवी की विश्वरूपता १०२१ महीपृथिवी का स्वरूप - परिचय १,२२ भूः भुवः स्वः - रूपा महा व्याहृतियाँ १०२३ अष्टविध… 251–260
- पारिभाषिक सूचनाएँ १६- श्रुतावदानम् १७ - उपवेषः १८ - मकराकारकूर्चः 1 १६ - दृषत्ः २०- उपलः २१ - षडवत्तम् २२ - श्रभिः २३ - - अधरारणि: २४- उत्तरारणि: २५-… 261–270
- शतपथभाष्य १६ आधारब्राह्मण ४ अ ० ५ ब्रा ० ४ प्र ०१ ब्रा ० २० प्रवरब्राह्मण ५ श्र ० १ ब्रा ० ४ प्र ०२ ब्रा ० २१ स्रुग्ब्राह्मण ५ अ ० २ ब्रा ० ४ प्र ० ३ ब्रा… 271–280
- कर्म्मनाम -१- अग्निपरिस्तरणम् २- अग्निसम्मार्जनम् शतपथभाष्य ७ - प्रथमकाण्डानुगता कर्म्मनामसूची - प्रकारादिक्रमेण -प्रपाठक - ब्राह्मण-- कण्डिका ३० -… 281–290
- काण्ड संख्या काण्डनाम हविर्यज्ञः १ एकपादिका २ अध्वरः ३ ग्रहः ४ ५ सव: ६ उषासम्भरणम् हस्तिघटः ७ चितिः ८ सञ्चितिः Ε निरहम्यम् १० अष्टाध्यायी ११ १२ मध्यमः… 291–300
- शतपथ भाष्य पाठ कर्म्मकाण्डानुगतमात्र बना रहता हुआ पारायणपाठी की पार्थिव भोगकामनाएँ हीं पूर्ण करने की क्षमता रखता है… 301–310
- शतपथमाध्य भावात्मक विज्ञान के क्षेत्र मानें गए हैं । ज्ञान - ज्ञाता - ज्ञेय - विषय - विज्ञान - आदि आदि सभी शब्द एकलया भौतिक पदार्थों के साथ ही समन्वित… 311–320
- शतपथभाष्य उदाहरण के लिए - प्राण, प्रजापति - षोड़शी - चतुष्टय - त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंश - सप्तदश - आदि आदि शब्द किसी नियत अर्थ ' का संग्रह करते हुए जहाँ… 321–330
- शतपथमाष्य ५३ – व्यवस्थित, एवं अव्यवस्थित विज्ञानों का तारतम्य— यह सर्वथा संस्मरणीय, किंवा अविस्मरणीय है कि, तीनों विवर्त्तभाव एक ही अव्याकृत तत्त्व के तीन… 331–340
- शतपथभाष्य आङ्गिरस सूर्य्य की उस पारमेष्ठ्य समुद्र के समतुलन में - ' द्रप्सस्च स्कन्द ' इत्यादि वेदमन्त्रानुसार ' एक बिन्दु के समान हीं स्वरूपस्थिति मानी… 341–350
- शतपथमाष्य ८५- ' ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् ' का अनुगमात्मक समन्वय— सैषा समतुलनस्थितिः । स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया - ज्ञान - विज्ञान - शब्दार्थसमन्वयदृष्ट्या… 351–360
- शतपथभाष्य को ऋषप्रज्ञा ने ‘ महाभूत ' नाम से व्यवहृत किया है । बहुत्त्व की प्रात्यन्तिकता ही इन स्थूल भूतों की महत्ता है… 361–370
- शतपथमाध्य ११४ - मतवादाभिनिष्ट हिंसादि वादों की निःसारिता --महत्सौभाग्य है आज यह भारतराष्ट्र वा कि, वह भी पुन: इसी तथ्य की ओर आकर्षित होता जारहा है… 371–380
- प्रथमकाण्ड अन्तरिक्ष में तुम व्याप्त हो रहे हो, यह कहा जाता है । इस सोमाहुति से ही सूर्य्य प्रकाशित है । प्रकाश इसी सोमाहुति का प्रभाव है… 381–390
- प्रथमकाण्ड के त्रिना अग्निहोत्र व्यर्थ है । अग्निहोत्र के बिना दर्शपूर्णमास व्यर्थ है । द ० पू ० के बिना चातुर्मास्य व्यर्थ है… 391–400
- प्रथमकाण्ड ( अनुवाद ) – ( व्रतप्रहरण के अनन्तर - ' अशनानशन ' नाम से प्रसिद्ध श्रारण्य ओषधि, अथबा फलभोजन का विधान है… 401–410
- प्रथमकाण्ड सम्पूर्ण विश्व का विज्ञान बतलाने वाले वेद, ” विष्णु, ब्रह्मा आदि कोई भी उसे नहीं जानते… 411–420
- प्रथमकाण्ड पूर्वपर्य्यन्त के सम्पूर्ण कर्म्म अन्तरङ्गकर्म में अन्तर्भूत हैं । दूसरे शब्दों में- वेदिनिर्माण से पहिले के कम्नों की समष्टि एक कर्म्म है, यही… 421–430
- प्रथमकाण्ड अतएव ‘ अग्निर्वै प्रजापतिः ' ( मैत्रा ० २ । ४ । ६ ) यह कहा जाता है । एवं वही ब्रह्मा विष्णु से युक्त होकर सोम-स्वरूप में परिणत होजाते हैं, अतएव… 431–440
- प्रथमकाण्ड विजातीय प्राणों के घर्षण से पानी के उत्पन्न होते हीं संसर्गभावका जन्म होगया है । इस पानी के गर्भ में सूर्य्य रहता है… 441–450
- प्रथमकाण्ड हे कश्यपप्रजापति जल की गंभीरता ( गहराई ) में आप विराजिए । सूर्य्य और त्रैलोक्य में व्याप्त वैश्वानर अग्नि आपको संताप न पहुँचावें… 451–460
- प्रथमकाण्ड हिमवद्विन्ध्यशैलाभ्यां प्रायो व्याप्ता वसुन्धर । सौम्यं पथ्यं च तत्राद्यमाग्नेयं विन्ध्यमौषधम् । -- श्रष्टाङ्गः संग्रहः भेषजकल्प, अ०–८… 461–470
- प्रथमकाण्ड न जानना । इसी अश्रद्धा के कारण वैदिककाल में भी भारतीय मानवों की यज्ञविद्या के प्रति श्रद्धा होगई थी… 471–480
- प्रथमकाण्ड ‘ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ' ( वह सब के गर्भ में है, और सबके बाहिर है - ईशावास्योप-निषत् - मन्त्र ५ ) इत्यादि श्रुतियाँ दोनों में… 481–490
- प्रथमकाण्ड ' य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् । तत्त्वेन भारतश्रेष्ठ! स लोके न प्रणश्यति । ६… 491–500
- प्रथमकाण्ड दशाक्षरयुक्त मर्त्यामृतभावापन्न विराड् अग्नि ] १ आत्मा । १ - अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा, ये चार देवता हैं… 501–510
- प्रथमकाण्ड सम्पूर्ण धर्म्मप्रपञ्च वेद के इन चारों भागों में निहित है । अतएव वेद के लिए - ' सर्वज्ञानमयो हि सः । सर्व वेदात् प्रसिर्द्धयति… 511–520
- प्रथमकाण्ड ' अपि वा पुरुषविधानामेव सतां कर्म्मात्मान एतेस्युर्यथा यज्ञो यजमानस्य ' -तात्पर्य यही है कि, पुरुषविध देवताओं के जो कर्मात्मा हैं, जिन्हें कि… 521–530
- प्रथमकाण्ड न तत्र सूर्य्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति… 531–540
- प्रथमकाण्ड यह नियम था कि, जो मनुष्य जिस तत्त्व की परीक्षा करता था, एवं उसका भूमण्डल पर प्रचार करता था, तत्कालीन विद्वान् उस आविष्कर्त्ता की कीर्ति… 541–550
- प्रथमकाण्ड प्रबन्ध करना, विशेष मानवों को स्वर्ग के लिए ' प्रवेशपत्र ' प्रदान करना, इत्यादि सत्र कार्य्यं इसी अग्नि के ग्राधीन थे… 551–560
- प्रथमकाण्ड ' प्रकृतिं पुरुषं चैत्र विद्धयनादी उभावपि ' ( ईश्वरतत्त्व पुरुष, और प्रकृति, इन दो भागों में विभक्त है ) इस गीता - सिद्धान्त के अनुसार दोनों… 561–570
- प्रथमकाण्ड तीन वर्तुल वृक्षों की परिधि मिलाकर तीनों के चारों ओर एक रेखा खैंच दीजिए, वही ' दीर्घवृत्त ' बन स्वरूप बनता है, एवं प्रत्येक में स्वतन्त्र… 571–580
- शतपथब्राह्मण प्रतिष्ठित होना दूसरा मार्ग है । एवं यहाँ से भूतल पर आना तीसरा मार्ग है । अतएव यह गङ्गा पुराणों में ' त्रिपथगा ' नाम से प्रसिद्ध है… 581–590
- शतपथब्राह्मण ' यदस्य ( षोडशी पुरुस्य ) त्वं ( ब्रह्मसत्यभागः ), यदस्य च देवेषु, अथ नु मीमां-स्यमेव ते मन्ये विदितम् ' । – केनोपनिषत् २ खं ० ं मं ०… 591–600
- ब्रह्मरन्ध्र मनः O २ कर्णौ २ चक्षुषी ७ — २ नासिके 0110 १ वाक् i * कण्ठः २ हस्तौ २ स्तनौ ७ २ फुफ्फुसे O I १ हृदयम् * हृदयम् २ यकृत प्लीहे - O 0 २ क्लोमानौ… 601–610
- शतपथब्राह्मण उत्तर देने में समर्थ देखकर स्वयं गन्धर्वने हीं विस्तार से इन दोनों का स्वरूप बतलाया था… 611–620
- शतपथब्राह्मण में स्थित ) धू भाग में रहने वाला अग्नि ' धु ' कहलाता है | ( आज यह अब ' धुर्य्य ’ अग्नि के पश्चिम भाग में नीडस्थ हविर्ग्रहण के लिए जाता है )… 621–630
- शतपथब्राह्मण निकल जाता है । इस क्षतिपूर्ति के लिए प्राण पुन: अन्न लेता है । धन्न पुन: ऊर्क बनता है । ऊर्क पुन: प्राण बनता है… 631–640
- शतपथब्राह्मण से प्रसिद्ध है, सम्पूर्ण इन्द्रियों में प्रज्ञारूप से अनुस्यूत मन ' सर्वेन्द्रिय ', अतएव ' अनिन्द्रिय ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव हमारा यह रस… 641–650
- शतपथब्राह्मण रहेगा । ऐसी वस्तु कदापि शुभफल प्रद नहीं होगी । इसलिए ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विद्ध– नम् ' इस सिद्धान्त को लक्ष्य में रखते हुए… 651–660
- शतपथब्राह्मण का पूर्वाह्णकाल है । . यही ग्रीष्म है | माध्यन्दिनसवन मध्याह्नकाल है । यही वर्षा है… 661–670
- शतपथब्राह्मण वहाँ आपको इस कूर्म्मप्रजापति के भूतात्मक मूर्त्तस्वरूप के साक्षात् दर्शन होजायँगे… 671–680
- शतपथब्राह्मण एषा गतिः । एषा प्रतिष्ठा य एष तपति 1 । तस्य ये रश्मयस्ते सुकृतः । अथ यत् परंभाः, प्रजापतिर्वा स स्वर्गो वा लोक: ' ( श ० ब्रा ० १२६७/४/१० कं ०… 681–690
- शतपथब्राह्मण ( जायका ) अच्छा भी है, बुरा भी है । यही परिस्थिति अन्य विषयों की है । अन्न में जो भौतिक भाग है, वह आत्मा का विरोधी है, एवं रसभाग विरोधी है… 691–700
- शतपथब्राह्मण - प्रजापतिः पाशः १ - अमृतम् - ग्रात्मयोनिः । पोडशकलम् । विश्वात्मा विश्वेश्वरः प्राणाधारो भोक्ता २ - ब्रह्म - प्रकृतियोनिः पञ्चकलम्… 701–710
- शतपथब्राह्मण की पवित्रता के साथ सम्बन्ध होता है । संसार में जितने भी पदार्थों के साथ पवमानसोम का सम्बन्ध हुआ है, उन सब में प्रथम पानी का ही स्थान है… 711–720
- शतपथब्राह्मण ताश ( तन्मध्यस्थ यज्ञिय कम्र्मों से अनुप्राणिता मंन्त्रात्मिका दैवीवाक् के अतिरिक्त ) मानुषी ( व्यावहारिकी लौकिकी ) वाक् बोल पड़े, तो उसे… 721–730
- शतपथब्राह्मण दबाव डाला जायगा, तत्काल अग्निज्ज्वाला प्रकट होजायगी । कहना प्रकृत में यही है कि, उस आपोमय परमेष्ठी - मण्डल के केन्द्र में यज्ञवराह के द्वारा… 731–740
- शतपथब्राह्मण श्रयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्न वेदं सर्वं जनयति । एतं यन्तमनु-प्रजायते । तस्माद् वायुरेव यजुः । श्रयमेवाकाशो जूः - यदिदमन्तरिक्षम्… 741–750
- शतपथब्राह्मण ( ञ ) समष्टिपरिलेख: - ( छन्दोवितान रसलक्षणा वेदत्रयी ) । मूर्त्तिवेदः ऋक् तेजोवेदः साम १ - छन्दोवेदत्रदी ( ऋग्वेदत्रयी ) -१ – कूटस्थविष्कम्भः… 751–760
- = मंडलम् महिम ) ( मूत्तिः स्कन्धः व्यासः केन्द्रबिन्दु ( ६ ) - व्यासाविन्दुवितानपरिलेखः— प्रथमकाण्ड 0000 C ( १० ) - व्यासा गुसाहस्रीवितान… 761–770
- प्रथमकाण्ड ( १६ ) -सूर्य्यानुगत- उक्थामद ( मूर्त्ति ) वितानपरिलेख: — हि 1000000000000000 @ ooo000000000 , मा 00000000000000000009ape000000000… 771–780
- १ सत्वविशाल प्रथम काण्ड १ जलचर १ श्रध्यात्मिक [ १६ ] २ रजोविशाल चान्द्रसृष्टित्रयी [ १७ ] २ थलचर अनात्म्यजीव [ १८ ] २ श्राधिभौतिक तापत्रयी त्रयी ३… 781–790
- प्रथमकाण्ड • कहना प्रकृत में यही है कि, जबतक सूर्य्यसता रहती है, तभीतक आत्मा कर्म करने में सन्नद्ध रहता है… 791–800
- शतपथब्राह्मण ( २३ ) - पारावतपृष्ठानुगत - पार्थिव - जागतमण्डलपरिलेख: -जायतस्तोम वाक् पृष्ठ ( ब्रह्मपृष्ठ ) महिमामंडलकी अन्तिमसीमा ( उच्च बिन्दु )… 801–810
- प्रथमकाण्ड चलते हु • कार्य्यं को अवरुद्ध कर देने वाला शत्रु ' राक्षस ' कहलाता है । एवं आती हुई सम्पत्ति का अव— रोध करने वाला शत्रु ‘ अराति ' कहलाता है… 811–820
- प्रथमकाण्ड आत्मा प्रविष्ट होरहा है । इस षोडशी प्रजापति की व्याप्ति यद्यपि सम्पूर्ण विश्व में हीं रहती है… 821–830
- ना नि III 10 भु च ० पृ ० सू ० प ० स्व ० परात्परः मत्य सोमः ग्रमृतसी अ. ० / मर्त्यब्रह्मा व्र भ्रमृत वि. परात्परः मृत . म प्रा. परात्परः वा. अमृतवि… 831–840
- परात्परः शतपथब्राह्मण परात्परः— परमेश्वरः— प्रखण्ड: – सर्वपरिग्रहातीत: - विश्वातीतः १- आत्मा त्रिमूर्त्तिख्ययात्मा सोऽयं सनातनषोडशी ईश्वरोऽयम्: २ - पदम्… 841–850
- शतपथब्राह्मण कहाँ है वे ε लोक?, प्रश्न के समाधान के लिए पञ्चपर्वात्मक उसी विश्वमूर्ति यज्ञेश्वर की ओर आप का ध्यान आकर्षित किया जाता है… 851–860
- शतपथब्राह्मण पूर्वकथनानुसार सूर्य्य में इस मनुस्तत्त्व का विकास होता है । सूर्य्य गायत्री मात्रिकवेदाग्नि स्वरूप है… 861–870
- शतपथब्राह्मण ही पार्थिव प्रज्ञानात्मा ' हिरण्मय ' कहलाता है । अध्यात्म में प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से प्रविष्ट सौर हिरण्मय दिव्य--तेज ' विज्ञानात्मा ' नाम से… 871–880
- शतपथब्राह्मण प्रिय नहीं है । यह बात लोकप्रसिद्ध है कि, यदि कोई मनुष्य हमें हमारे घनिष्ठ प्रेमी के आने की सूचना देता है, तो उसके लिए हमारे मुख से ' तुमारे… 881–884