शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1101–1108
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1108
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[ १०८५ ] अद्वितीय आत्मज्ञानानन्दस्वरूपमें पार्वतीसे सुशोभित है, निरन्तर मेरा ही देखते हैं, उन तेजोमय भगवान् शंकरको, जिनका नमस्कार है । आधा शरीर शैलराजकुमारी वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं भगवान् शंकर सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं प्रेमदं पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वयैकवासं वन्दना करनेसे जिनका सत्यप्रियं सत्यदं विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयोपात्ताकृतिं शिवम् । भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण मन प्रसन्न हो जाता है, जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्यारा है, जो प्रेम शंकरम् ॥ श्रीविग्रह करनेवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके एकमात्र आवासस्थान प्रदान करनेवाले, पूर्णानन्दमय, है, जो सत्यमय हैं, जिनका ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित और कल्याणस्वरूप हैं, सत्य जिनका विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं, स्वेच्छानुसार है, जो सत्यप्रिय एवं सत्यप्रदाता हैं, ब्रह्मा और गौरीपति शरीर धारण करनेवाले उन भगवान् शंकरकी मैं वन्दना करता विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु भगवान् शिव हूँ । मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यरूपं हेतुमेकं गौरीपतिं विदिततत्त्वमनन्तकीर्तिम्
बोधस्वरूपममलं ।
जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके हि शिवं नमामि ॥
तत्त्वज्ञ हैं, जिनकी कीर्तिका कहीं अन्त नहीं एकमात्र कारण हैं, गौरी गिरिराजकुमारी उमाके पति हैं, स्वरूप अचिन्त्य है, उन विमल बोधस्वरूप है, जो मायाके आश्रय होकर भी उससे अत्यन्त दूर हैं तथा जिनका भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ । महामहेश्वर ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् । चाँदीके पर्वतके समान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमाको निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥ रत्नमय अलंकारोंसे जिनका शरीर उज्ज्वल है, जिनके हाथोंमें आभूषणरूपसे धारण करते हैं, जो प्रसन्न हैं, पद्मके आसनपर विराजमान परशु तथा मृग, वर और अभय मुद्राएँ हैं, हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघकी खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि, जगत्की उत्पत्तिके बीज और समस्त भयको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वरका प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये । पञ्चमुख सदाशिव मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजवावर्णैर्मुखैः पञ्चभिस्त्र्यक्षैरञ्चितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम् । शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनान् नागेन्द्रघण्टाङ्कुशान् पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्वलं चिन्तयेत् ॥ जिन भगवान् शंकरके पाँच मुखोंमें क्रमशः ऊर्ध्वमुख गजमुक्ताके समान हलके लाल रंगका, पूर्व-मुख पीतवर्णका, दक्षिण - मुख सजल मेघके समान नील वर्णका, पश्चिम - मुख मुक्ताके समान कुछ भूरे रंगका और उत्तर - मुख जवापुष्पके समान प्रगाढ़ रक्तवर्णका है, जिनकी तीन आँखें हैं और सभी मुखमण्डलोंमें नीलवर्णके मुकुटके साथ चन्द्रमा सुशोभित हो रहे हैं, जिनके मुखमण्डलकी आभा करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाके तुल्य आह्लादित करनेवाली हैं, जो अपने हाथोंमें क्रमश: त्रिशूल, टंक ( परशु ), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घण्टा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं एवं जो अनन्त कल्पवृक्षके समान कल्याणकारी हैं, उन सर्वेश्वर भगवान् शंकरका ध्यान करना चाहिये । अम्बिकेश्वर
11. 1: आद्यन्तमङ्गलमजातसमानभावमार्यं तमीशमजरामरमात्मदेवम् ।
पञ्चाननं प्रबलपञ्चविनोदशीलं सम्भावये मनसि शंकरमम्बिकेशम् ॥ 7578
जो आदि और अन्तमें ( तथा मध्यमें भी ) नित्य मंगलमय हैं, जिनकी समानता अथवा तुलना कहीं भी नहीं है, जो आत्माके स्वरूपको प्रकाशित करनेवाले देवता ( परमात्मा ) हैं, जिनके पाँच मुख हैं और जो खेल-
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[ १०८६ ] रचना पालन और संहार तथा अनुग्रह एवं तिरोभावरूप पाँच प्रबल कर्म करते ही खेलमें- अनायास जगत्की, अम्बिकापति भगवान् शंकरका मैं मन - ही - मन चिन्तन करता हूँ । रहते हैं, उन सर्वश्रेष्ठ अजर - अमर ईश्वर भगवान् पञ्चानन पार्वतीनाथ दोर्भिः शीतांशुखण्डप्रतिघटितजटाभारमौलिं त्रिनेत्रम् । शूलाही टङ्कघण्टासिशृणिकुलिशपाशाग्न्यभीतीर्दधानं पद्मस्थं पञ्चवक्त्रं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि नानाकल्पाभिरामापघनमभिमतार्थप्रदं सुप्रसन्नं ॥ अपने करकमलोंमें क्रमशः त्रिशूल, सर्प, टंक ( परशु ), घण्टा, तलवार, अंकुश, वज्र, पाश, अग्नि जो किये हैं जिनका प्रत्येक मुखमण्डल द्वितीयाके चन्द्रमासे युक्त जटाओंसे सुशोभित तथा अभयमुद्रा धारण हुए और, अग्नि- ये तीन नेत्र हैं, जो अनेक कल्पवृक्षोंके समान अपने भक्तोंको हो रहा है, जिनके चन्द्रमा, सूर्य देते हैं और जो सदा अत्यन्त प्रसन्न ही रहते हैं, जो कमलके ऊपर स्थिर रहनेवाले मनोरथोंसे परिपूर्ण कर विराजित हैं, जिनके पाँच मुख हैं तथा जिनका वर्ण स्फटिकमणिके समान दिव्य प्रभासे आभासित हो रहा है, उन पार्वतीनाथ भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ । भगवान् महाकाल स्त्रष्टारोऽपि प्रजानां प्रबलभवभयाद् यं नमस्यन्ति देवा यश्चित्ते सम्प्रविष्टोऽप्यवहितमनसां ध्यानमुक्तात्मनां च । लोकानामादिदेवः स जयतु भगवाञ्छ्रीमहाकालनामा बिभ्राणः सोमलेखामहिवलययुतं व्यक्तलिङ्गं कपालम् ॥ प्रजाकी सृष्टि करनेवाले प्रजापति देव भी प्रबल संसार - भयसे मुक्त होनेके लिये जिन्हें नमस्कार करते हैं, जो सावधानचित्तवाले ध्यानपरायण महात्माओंके हृदयमन्दिरमें सुखपूर्वक विराजमान होते हैं और चन्द्रमाकी कला, सर्पोंके कंकण तथा व्यक्त चिह्नवाले कपालको धारण करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंके आदिदेव उन भगवान् महाकालकी जय हो । श्रीनीलकण्ठ बालार्कायुततेजसं धृतजटाजूटेन्दुखण्डोज्ज्वलं नागेन्द्रैः कृतभूषणं जपवटीं शूलं कपालं करैः । खट्वाङ्गं दधतं त्रिनेत्रविलसत्पञ्चाननं सुन्दरं व्याघ्रत्वक्परिधानमब्जनिलयं श्रीनीलकण्ठं भजे ॥ भगवान् श्रीनीलकण्ठ दस हजार बालसूर्योंके समान तेजस्वी हैं, सिरपर जटाजूट, ललाटपर अर्धचन्द्र और मस्तकपर सर्पोंका मुकुट धारण किये हैं, चारों हाथोंमें जपमाला, त्रिशूल, नर - कपाल और खट्वांग - मुद्रा है । तीन नेत्र हैं, पाँच मुख हैं, अति सुन्दर विग्रह है, बाघम्बर पहने हुए हैं और सुन्दर पद्मपर विराजित हैं । इन श्रीनीलकण्ठदेवका भजन करना चाहिये । पशुपति मध्याह्नार्कसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलं त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्धजम् । हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्तिं दधानं विभुं दंष्ट्राभीमचतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्ररूपं स्मरेत् ॥ जिनकी प्रभा मध्याह्नकालीन सूर्यके समान दिव्य रूपमें भासित हो रही है, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजित है, जिनका मुखमण्डल प्रचण्ड अट्टहाससे उद्भासित हो रहा है, सर्प ही जिनके आभूषण हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि — ये तीन जिनके तीन नेत्रोंके रूपमें अवस्थित हैं, जिनकी दाढ़ी और सिरकी जटाएँ चित्र - विचित्र रंगके मोरपंखके समान स्फुरित हो रही हैं, जिन्होंने अपने करकमलोंमें त्रिशूल, मुद्गर, तलवार तथा शक्तिको धारण कर रखा है और जिनके चार मुख तथा दाढ़ें भयावह हैं, ऐसे सर्वसमर्थ, दिव्य रूप एवं अस्त्रोंको धारण करनेवाले पशुपतिनाथका ध्यान करना चाहिये । भगवान् दक्षिणामूर्ति मुद्रां भद्रार्थदात्रीं सपरशुहरिणां बाहुभिर्बाहुमेकं जान्वासक्तं दधानो भुजगवरसमाबद्धकक्षो आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटितजटः वटाधः । क्षीरगौरस्त्रिनेत्रो दद्यादाद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरभिवृतो भावशुद्धिं भवो वः॥ण जो भगवान् दक्षिणामूर्ति अपने करकमलोंमें अर्थ प्रदान करनेवाली और परशु धारण । भद्रामुद्रा, मृगीमुद्रा
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[ १०८७ ] किये हुए हैं और एक हाथ घुटनेपर अवस्थित हैं, जिनके प्रत्येक टेके हुए हैं, कटिप्रदेशमें नागराजको लपेटे उज्ज्वल है, सूर्य, चन्द्रमा और सिरके ऊपर जटाओंमें द्वितीयाका चन्द्रमा जटित हुए हैं तथा वटवृक्षके नीचे आदि मुनियोंसे आवृत अग्नि- ये तीनों जिनके तीन नेत्रके रूपमें स्थित हैं, जो है और वर्ण धवल दुग्धके समान हैं, वे भगवान् भव - - इ शंकर आपके हृदयमें सनकादि एवं शुकदेव [ नारद ] महामृत्युञ्जय विशुद्ध भावना ( विरक्ति ) प्रदान करें । हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य
कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं वहन्तं परम् ।
अक्षस्स्रमृगहस्तमम्बुजगतं तोयं शिरः सिञ्चन्तं करयोर्युगेन देवं त्रिनेत्रं भजे ॥
मूर्धस्थचन्द्रस्त्रवत्पीयूषार्द्रतनुं दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ । त्र्यम्बकदेव अष्टभुज हैं । उनके एक हाथमें अक्षमाला भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम् ॥ कलशोंमें अमृतरस लेकर उससे अपने मस्तकको और दूसरेमें मृगमुद्रा है, दो हाथोंसे दो हुए हैं । शेष दो हाथ उन्होंने अपने आप्लावित कर रहे हैं और दो हाथोंसे उन्हीं कलशोंको थामे विराजमान हैं, मुकुटपर बालचन्द्र अंकपर रख छोड़े हैं और उनमें दो अमृतपूर्ण घट हैं । वे श्वेत पद्मपर कैलासपति श्रीशंकरकी मैं शरण सुशोभित है, मुखमण्डलपर तीन नेत्र शोभायमान हैं । ऐसे देवाधिदेव ग्रहण करता हूँ । जो अपने दो करकमलोंमें रखे हुए दो कलशोंसे जल निकालकर मस्तकको सींचते हैं । अन्य दो हाथोंमें दो घड़े लिये उन्हें उनसे ऊपरवाले दो हाथोंद्वारा अपने एवं मृगमुद्रा धारण करते हैं, कमलके अपनी गोदमें रखे हुए हैं तथा शेष दो हाथोंमें रुद्राक्ष जिनका सारा शरीर आसनपर बैठे हैं, सिरपर स्थित चन्द्रमासे निरन्तर झरते हुए अमृतसे भीगा हुआ है तथा जो तीन नेत्र धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् मृत्युंजयका, जिनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी विराजमान हैं, मैं भजन ( चिन्तन ) करता हूँ । दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम् ।
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥१ ॥
समस्त चराचर विश्वके स्वामिरूप विश्वेश्वर, नरकरूपी संसारसागरसे उद्धार करनेवाले, कर्णसे श्रवण करनेमें अमृतके समान नामवाले, अपने भालपर चन्द्रमाको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले, कर्पूरकी कान्तिके समान धवल वर्णवाले, जटाधारी और दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥१ ॥
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय ।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥२ ॥
गौरीके अत्यन्त प्रिय, रजनीश्वर ( चन्द्र ) की कलाको धारण करनेवाले, कालके भी अन्तक ( यम ) -रूप, नागराजको कंकणरूपमें धारण करनेवाले, अपने मस्तकपर गंगाको धारण करनेवाले, गजराजका विमर्दन करनेवाले और दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥ २ ॥
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥३ ॥
' भक्तिके प्रिय, संसाररूपी रोग एवं भयके विनाशक, संहारके समय उग्ररूपधारी, दुर्गम भवसागरसे पार करानेवाले, ज्योति: स्वरूप, अपने गुण और नामके अनुसार सुन्दर नृत्य करनेवाले तथा दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥३ ॥
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[ १०८८ ]
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।
चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनायदारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥४ ॥
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय व्याघ्रचर्मधारी चिताभस्मको लगानेवाले, भालमें तृतीय नेत्रधारी, मणियोंके कुण्डलसे सुशोभित, अपन चरणोंमें धारण, करनेवाले जटाधारी और दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नूपुर नमस्कार है ॥४ ॥
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥५ ॥
पाँच मुखवाले, नागराजरूपी आभूषणोंसे सुसज्जित, सुवर्णके समान वस्त्रवाले अथवा सुवर्णके समान किरणवाले, तीनों लोकोंमें पूजित, आनन्दभूमि ( काशी ) को वर प्रदान करनेवाले, सृष्टिके संहारके लिये तमोगुणाविष्ट होनेवाले तथा दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥५ ॥
भानुप्रिया भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥६ ॥
सूर्यको अत्यन्त प्रिय अथवा सूर्यके प्रेमी, भवसागरसे उद्धार करनेवाले, कालके लिये भी महाकालस्वरूप, कमलासन ( ब्रह्मा ) -से सुपूजित, तीन नेत्रोंको धारण करनेवाले, शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥६ ॥
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय ।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥७ ॥
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामको अत्यन्त प्रिय अथवा रामसे प्रेम करनेवाले, रघुनाथको वर देनेवाले, सर्पोंके अतिप्रिय, भवसागररूपी नरकसे तारनेवाले, पुण्यवानोंमें परिपूर्ण पुण्यवाले, समस्त देवताओंसे सुपूजित तथा दरिद्रतारूपी दुःखके विनाशक भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है ॥७ ॥
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ८ ॥
मुक्तजनोंके स्वामिरूप, पुरुषार्थचतुष्टयरूप फलको देनेवाले, प्रमथादि गणोंके स्वामी, स्तुतिप्रिय, नन्दीवाहन, गजचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, महेश्वर तथा दरिद्रतारूपी दुःखके शिवको मेरा नमस्कार है ॥ ८ ॥ विनाशक भगवान्
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम् सर्वसम्पत्रं ।
शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्॥९
समस्त रोगोंके विनाशक तथा शीघ्र ही समस्त सम्पत्तियोंको ॥
परम्पराको बढ़ानेवाले, वसिष्ठद्वारा निर्मित प्रदान करनेवाले और पुत्र - पौत्रादि वंश-निश्चय ही स्वर्गलोककी इस स्तोत्रका जो भक्त नित्य तीनों कालोंमें पाठ करता है, उसे प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥
॥ इति महर्षिवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ क
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स ग
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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि 1111 सं ० ब्रह्मपुराण 1113 नरसिंहपुराण - सटीक 1189 सं ० गरुडपुराण 1362 अग्निपुराण ( हिन्दी - अनुवाद ) 1361 सं ० श्रीवराहपुराण 584 सं ० भविष्यपुराण 1131 कूर्मपुराण- सटीक 631 सं ० ब्रह्मवैवर्तपुराण 1432 वामनपुराण- सटीक 557 मत्स्यमहापुराण - सटीक 1610 देवीपुराण ( महाभागवत ) 517 गर्गसंहिता ( भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका वर्णन ) 47 पातञ्जलयोग - प्रदीप 135 पातञ्जलयोग - दर्शन [ बँगलामें भी ] 582 छान्दोग्योपनिषद् - सानुवाद, शांकर-577 बृहदारण्यकोपनिषद्- " " 1421 ईशादि नौ उपनिषद्- " " ( एक ही जिल 66 ईशादि नौ उपनिषद्-अन्वय - हिन्दी व्याख्या [ बँगला 67 ईशावास्योपनिषद् - सानुवाद, शांकर [ तेलुगु, कन्नड भी ] 68 केनोपनिषद् –अजिल्द, सानुवाद, शांक 578 कठोपनिषद्-69 माण्डूक्योपनिषद्- ", 513 मुण्डकोपनिषद्- 27, 70 प्रश्नोपनिषद्- " ' 71 तैत्तिरीयोपनिषद्- >> 72 ऐतरेयोपनिषद्- " 73 श्वेताश्वतरोपनिषद्-65 वेदान्त - दर्शन - हिन्दी व्याख्यासह स 639 श्रीनारायणीयम् - सानुवाद [ तेलुग
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