शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 1091–1100

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100

पृष्ठ 1091

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अ ० ४० ] वायवीयसहिता

ततः प्रभातसमये नैमिषीयास्तपोधनाः ।

सत्रान्तेऽवभृथं कर्तुं सर्व एव समुद्ययुः ॥ २

तदा ब्रह्मसमादेशाद्देवी साक्षात्सरस्वती ।

प्रसन्ना स्वादुसलिला प्रावर्तत नदी शुभा ॥ ३

सरस्वतीं नदीं दृष्ट्वा मुनयो हृष्टमानसाः ।

समाप्य सत्रं प्रारब्धं चक्रुस्तत्रावगाहनम् ॥ ४

अथ सन्तर्प्य देवादींस्तदीयैः सलिलैः शिवैः ।

स्मरन्तः पूर्ववृत्तान्तं ययुर्वाराणसीं प्रति ॥ ५

तदा ते हिमवत्पादात्पन्ततीं दक्षिणामुखीम् ।

दृष्ट्वा भागीरथीं तत्र स्नात्वा तत्तीरतो ययुः ॥ ६

ततो वाराणसीं प्राप्य मुदिताः सर्व एव ते ।

तदोत्तरप्रवाहायां गङ्गायामवगाह्य च ॥ ७

अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं दृष्ट्वाभ्यर्च्य विधानतः ।

प्रयातुमुद्यतास्तत्र ददृशुर्दिवि भास्वरम् ॥ ८

सूर्यकोटिप्रतीकाशं तेजोदिव्यं महाद्भुतम् ।

आत्मप्रभावितानेन व्याप्तसर्वदिगन्तरम् ॥ ९

अथ पाशुपताः सिद्धाः भस्मसञ्छन्नविग्रहाः ।

मुनयोऽभ्येत्य शतशो लीनाः स्युस्तत्र तेजसि ॥ १०

तथा विलीयमानेषु तपस्विषु महात्मसु ।

सद्यस्तिरोदधे तेजस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नैमिषीया महर्षयः ।

किमेतदित्यजानन्तो ययुर्ब्रह्मवनं प्रति ॥ १२

प्रागेवैषां तु गमनात्पवनो लोकपावनः ।

दर्शनं नैमिषीयाणां संवादस्तैर्महात्मनः ॥ १३

शुद्धां बुद्धिं ततस्तेषां साम्बे सानुचरे शिवे ।

समाप्तिं चापि सत्रस्य दीर्घपूर्वस्य सत्रिणाम् ॥ १४ ।

( उत्तरखण्ड ) १०७५ तदनन्तर प्रात: काल नैमिषारण्यके समस्त तपस्वी मुनि सत्रके अन्तमें अवभृथ स्नान करनेको उद्यत उस समय ब्रह्माजीके आदेशसे साक्षात् हुए । सरस्वतीदेवी स्वादिष्ठ जलसे भरी हुई स्वच्छ सुन्दर नदीके रूपमें वहाँ बहने लगीं ॥२-३ ॥ सरस्वती नदीको उपस्थित देख मुनि मन - ही - मन बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने सत्र समाप्त करके उसमें अवगाहन ( स्नान ) आरम्भ किया । उस नदीके मंगलमय जलसे देवता आदिका तर्पण करके पूर्व- वृत्तान्तका स्मरण करते हुए वे सब - के - सब वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये॥४-५ ॥ उस समय हिमालयके चरणोंसे निकलकर दक्षिणकी ओर बहनेवाली भागीरथीका दर्शन करके उन ऋषियोंने उसमें स्नान किया और भागीरथीके ही किनारेका मार्ग पकड़कर वे आगे बढ़े ॥ ६ ॥

तदनन्तर वाराणसीमें पहुँचकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई । वहाँ उत्तरवाहिनी गंगामें स्नान करके उन्होंने अविमुक्तेश्वर - लिंगका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन किया । पूजन करके जब वे चलनेको उद्यत हुए तब उन्होंने आकाशमें एक दिव्य और परम अद्भुत प्रकाशमान तेज देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान जान पड़ता था । उसने अपनी प्रभाके प्रसारसे सम्पूर्ण दिगन्तको व्याप्त कर लिया था ॥७ – ९ ॥ तदनन्तर जिन्होंने अपने शरीरमें भस्म लगा रखा था, वे सैकड़ों सिद्ध पाशुपत मुनि निकट जाकर उस तेजमें लीन हो गये । उन तपस्वी महात्माओंके इस प्रकार लीन हो जानेपर वह तेज तत्काल अदृश्य हो गया । वह एक अद्भुत - सी घटना घटित हुई! उस महान् आश्चर्यको देखकर वे नैमिषारण्यके निवासी महर्षि ‘ यह क्या है ' इस बातको न जानते हु ब्रह्मवनको चले गये ॥ १०–१२ ॥ इनके जानेसे पहले ही लोकपावन पवनदेव वहाँ जा पहुँचे । उन्होंने नैमिषारण्यवासी ऋषियोंका जिस प्रकार साक्षात्कार हुआ, जिस तरह उनसे उनकी बातचीत हुई, उन ऋषियोंकी शुद्ध बुद्धि जिस प्रकार पार्षदोंसहित साम्ब सदाशिवमें लगी थी और जिस प्रकार उन यज्ञपरायण ऋषियोंका वह दीर्घकालिक

पृष्ठ 1092

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१०७६ विज्ञाप्य जगतां धात्रे ब्रह्मणे ब्रह्मयोनये स्वकार्ये तदनुज्ञातो जगाम स्वपुरं प्रति अथ स्थानगतो ब्रह्मा तुम्बुरोर्नारदस्य च । परस्परं स्पर्द्धितयोर्गाने विवदमानयोः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० । । यज्ञ पूरा हुआ था, ये सारी बातें जगत्स्रष्टा ब्रह्मयोनि / ब्रह्माजीको बतायीं । फिर अपने कार्यके लिये उनसे ॥ १५ ले वे अपने नगरको चले गये ॥ १३-१५ आज्ञा बैठे ॥ तदनन्तर अपने स्थानपर हुए ब्रह्माजी | गानकी कलामें परस्पर स्पर्धा रखने और विवाद ॥ १६ । करनेवाले तुम्बुरु और नारदके गानजनित रसका आस्वादन करते हुए वहां मध्यस्थता करने लगे । उस तदुद्भावितगानोत्थरसैर्माध्यस्थमाचरन् 1 | समय वे गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित हो सुखपूर्वक गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सुखमास्ते निषेवितः ॥

तदानवसरादेव द्वाःस्थैर्द्वारि निवारिताः ।

मुनयो ब्रह्मभवनाद्बहिः पार्श्वमुपाविशन् ॥

अथ तुम्बुरुणा गाने समतां प्राप्य नारदः ।

साहचर्येष्वनुज्ञातो ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥

त्यक्त्वा परस्परस्पर्द्धां मैत्रीं च परमां गतः ।

सह तेनाप्सरोभिश्च गन्धर्वैश्च समावृतः ॥

उपवीणयितुं देवं नकुलीश्वरमीश्वरम् ।

भवनान्निर्ययौ धातुर्जलदादंशुमानिव ॥

तं दृष्ट्वा षट्कुलीयास्ते नारदं मुनिगोवृषम् ।

प्रणम्यावसरं शम्भोः पप्रच्छुः परमादरात् ॥

स चावसर एवायमितोऽन्तर्गम्यतामिति ।

वदन्ययावन्यपरस्त्वरया परया युतः ॥

ततो द्वारि स्थिता ये वै ब्रह्मणे तान्न्यवेदयन् ।

तेन ते विविशुर्वेश्म पिण्डीभूयाण्डजन्मनः ॥

प्रविश्य दूरतो देवं प्रणम्य भुवि दंडवत् ।

समीपे तदनुज्ञाताः परिवृत्योपतस्थिरे ॥

१७ बैठे थे॥१६-१७ ॥

उस वेलामें किसी बाहरी व्यक्तिको वहाँ जानेका १८ अवसर नहीं दिया जाता था । इसीलिये ब नैमिषारण्यनिवासी मुनि वहाँ पहुँचे, तब द्वारपालोंने उन्हें द्वारपर ही रोक दिया । वे मुनि ब्रह्मभवन बाहर ही पार्श्वभागमें बैठ गये । इधर संगीत - गोष्ठीमें नारदने तुम्बुरुकी समानता प्राप्त की । तब परमेष्ठी ब्रह्माने उन्हें तुम्बुरुके साथ रहनेकी आज्ञा दी और वे पारस्परिक स्पर्धाको त्यागकर तुम्बुरुके परम मित्र हो १ ९ गये ॥ १८-१९ ॥ तत्पश्चात् गन्धर्वों और अप्सराओंसे घिरे हुए २० नारद नकुलेश्वर महादेवको वीणागान सुनाकर संतुष्ट करनेके लिये तुम्बुरुके साथ ब्रह्मभवनसे उसी प्रकार निकले, जैसे मेघोंकी घटासे सूर्यदेव बाहर निकलते २१ हैं ॥ २०-२१ ॥ उस समय मुनिवर नारदको देखकर उन छ: २२ कुलोंमें उत्पन्न हुए ऋषियोंने प्रणाम किया और बड़े आदरके साथ ब्रह्माजीसे मिलनेका अवसर पूछा । नारदजीका चित्त दूसरी ओर लगा था और वे बड़ी उतावलीमें थे । अतः उनके पूछनेपर बोले — ' यही अवसर है । आपलोग भीतर जाइये । ' यह कहते हुए २३ वे चले गये ॥ २२-२३ ॥ तदनन्तर द्वारपालोंने ब्रह्माजीको उन ऋषियोंके २४ आगमनकी सूचना दी । उनकी आज्ञा पाकर वे सब । एक साथ ब्रह्माजीके भवनमें प्रविष्ट हुए । भीतर | जाकर उन्होंने दूरसे ही दण्डकी भाँति पृथ्वीपर । गिरकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया । फिर उनका आदेश | पाकर वे ऋषि उनके पास गये और चारों ओरसे उन्हें २५ | घेरकर बैठे ॥ २४-२५

पृष्ठ 1093

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अ ० ४० ] वायवीयसंहिता

तांस्तत्रावस्थितान् पृष्ट्वा कुशलं कमलासनः ।

वृत्तान्तं वो मया ज्ञातं वायुरेवाह नो यतः ॥ २६

भवद्भिः किं कृतं पश्चान्मारुतेऽन्तर्हिते सति ।

इत्युक्तवति देवेशे मुनयोऽवभृथात्परम् ॥ २७

गङ्गातीर्थेऽस्य गमनं यात्रां वाराणसीं प्रति । दर्शनं तत्र लिङ्गानां स्थापितानां सुरेश्वरैः ॥ २८

अविमुक्तेश्वरस्यापि लिङ्गस्याभ्यर्चनं सकृत् ।

आकाशे महतस्तस्य तेजोराशेश्च दर्शनम् ॥ २ ९

मुनीनां विलयं तत्र निरोधं तेजसस्ततः ।

याथात्म्यवेदनं तस्य चिन्तितस्यापि चात्मभिः ॥ ३०

सर्वं सविस्तरं तस्मै प्रणम्याहुर्मुहुर्मुहुः ।

मुनिभिः कथितं श्रुत्वा विश्वकर्मा चतुर्मुखः ॥ ३१

कंपयित्वा शिरः किञ्चित्प्राह गम्भीरया गिरा ।

प्रत्यासीदति युष्माकं सिद्धिरामुष्मिकी परा ॥ ३२

भवद्भिर्दीर्घसत्रेण चिरमाराधितः प्रभुः ।

प्रसादाभिमुखो भूत इति भूतार्थसूचितम् ॥ ३३

वाराणस्यां तु युष्माभिर्यद् दृष्टं दिवि दीप्तिमत् ।

तल्लिंगसंज्ञितं साक्षात्तेजो माहेश्वरं परम् ॥ ३४

तत्र लीनाश्च मुनयः श्रौतपाशुपतव्रताः ।

मुक्ता बभूवुः स्वस्थाश्च नैष्ठिका दग्धकिल्बिषाः ॥ ३५

प्राप्यानेन यथा मुक्तिरचिराद्भवतामपि ।

स चायमर्थः सूच्येत युष्मद्दृष्टेन तेजसा ॥३६

तत्र वः काल एवैष दैवादुपनतः स्वयम् ।

प्रयात दक्षिणं मेरोः शिखरं देवसेवितम् ॥ ३७

( उत्तरखण्ड ) १०७७ उन्हें वहाँ बैठा देख कमलासन ब्रह्माने कुशल - समाचार पूछा और बताया कि मुझे तुमलोगोंका उनका सारा वृत्तान्त ज्ञात हो चुका है; क्योंकि वायुदेवने ही यहाँ सब कुछ कहा है । अब तुम बताओ, जब वायुदेव तुम्हें कथा सुनाकर अदृश्य हो गये, तब तुमने क्या किया? ॥ २६१/२ ॥ देवेश्वर ब्रह्माके इस प्रकार पूछनेपर उन मुनियोंने अवभृथ - स्नानके पश्चात् गंगातीर्थमें जाने, वाराणसीकी यात्रा करने, वहाँ देवेश्वरोंद्वारा स्थापित शिवलिंगों और अविमुक्तेश्वरलिंगके करने, आकाशमें भी दर्शन - पूजन महान् तेज: पुंजके दिखायी देने, कतिपय महर्षियोंके उसमें लीन होने तथा फिर उस तेजके अदृश्य हो जानेकी सब बातें ब्रह्माजीसे विस्तारपूर्वक उन्हें बारंबार प्रणाम करके कहीं । साथ ही यह भी बताया कि ' हम अपने मनमें बहुत विचार करनेपर भी उस तेजको ठीक - ठीक जान न सके ' ॥ २७ - ३० ३ ॥ मुनियोंका कथन सुनकर विश्वस्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माने किंचित् सिर हिलाकर गम्भीर वाणीमें कहा— ' महर्षियो! तुम्हें परम उत्तम पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होनेका अवसर आ रहा है । तुमने दीर्घकालिक सत्रद्वारा चिरकालतक प्रभुकी आराधना की है । इसलिये वे प्रसन्न होकर तुमलोगोंपर कृपा करनेको उत्सुक हैं । उस तेज: पुंजके दर्शनकी जो घटना घटित हुई है, उससे यही बात सूचित होती है । तुमने वाराणसीमें आकाशके भीतर जो दीप्तिमान् दिव्य तेज देखा था, वह साक्षात् ज्योतिर्मय लिंग ही था, उसे महेश्वरका उत्कृष्ट तेज समझो ॥ ३१-३४ ॥ उस तेजमें श्रौत और पाशुपत - व्रतका पालन करनेवाले मुनि, जो स्वधर्ममें पूर्णतः निष्ठा रखनेवाले थे और अपने पापको दग्ध कर चुके थे, लीन हुए हैं । लीन होकर वे स्वस्थ एवं मुक्त हो गये हैं । इसी मार्गसे तुम्हें भी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त होनेवाली है । तुम्हारे देखे हुए उस तेजसे यही बात सूचित होती है । तुम्हारे लिये यह वही समय दैववश स्वयं उपस्थित

पृष्ठ 1094

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१०७८ सनत्कुमारो यत्रास्ते मम पुत्रः परो मुनिः प्रतीक्ष्यागमनं साक्षाद्भूतनाथस्य नंदिनः श्रीशिवमहापुराण । । हो गया है । तुम मेरुपर्वतके दक्षिण देवता रहते हैं, जाओ, वहीं मेरे पुत्र ॥ ३८ मुनि हैं, निवास करते हैं । | उत्कृष्ट नन्दीके आगमनकी प्रतीक्षामें | भूतनाथ [ अ ० ४० शिखरपर , जहाँ सनत्कुमार, जो वे वहाँ - साक्षात् हैं ॥ ३५-३८ ॥ परमेश्वरम् । पूर्वकालकी बात है, सनत्कुमार अज्ञानवश पुरा सनत्कुमारोऽपि दृष्ट्वापि अज्ञानात्सर्वयोगीन्द्रमानी विनयदूषितः अभ्युत्थानादिकं युक्तमकुर्वन्नतिनिर्भयः ततोऽपराधात्क्रुद्धेन महोष्ट्रो नंदिना कृतः अथ कालेन महता तदर्थे शोचता मया ॥ ३ ९ अपनेको सब योगियोंका शिरोमणि मानने लगे थे । । इसीलिये दुर्विनीत हो गये थे । यही कारण है कि | उन्होंने किसी समय परमेश्वर शिवको सामने देखकर भी उनके लिये उचित अभ्युत्थान आदि सत्कार नहीं । । किया । वे अपने स्थानपर निर्भय बैठे रहे । उनके इस ॥ ४० अपराधसे कुपित हो नन्दीने उन्हें बहुत बड़ा ऊँट बना दिया ॥ ३ ९ -४० ॥ । तब उनके लिये मुझे बड़ा शोक हुआ और मैंने उपास्य देवं देवीं च नंदिनं चानुनीय वै ॥ ४१ दीर्घकालतक महादेव और महादेवीकी उपासना करके

कथंचिद् दुष्टता तस्य प्रयत्नेन निवारिता ।

प्रापितो हि यथापूर्वं सनत्पूर्वी कुमारताम् ॥

तदाह च महादेवः स्मयन्निव गणाधिपम् ।

अवज्ञाय हि मामेव तथाहंकृतवान्मुनिः ॥

अतस्त्वमेव याथात्म्यं ममास्मै कथयानघ ।

ब्रह्मणः पूर्वजः पुत्रो मां मूढमिव संस्मरन् ॥

मयैव शिष्यस्ते दत्तो मम ज्ञानप्रवर्तकः ।

धर्माध्यक्षाभिषेकं च तव निर्वर्त्तयिष्यति ॥

स एवं व्याहृतो भूयः सर्वभूतगणाग्रणीः ।

यत्पुराज्ञापनं मूर्ध्ना प्राप्य प्रतिगृहीतवान् ॥

तथा सनत्कुमारोऽपि मेरौ मदनुशासनात् । प्रसादार्थं गणस्यास्य • त तपश्चरति दुश्चरम् ॥

द्रष्टव्यश्चेति युष्माभिः प्राग्गणेशसमागमात् ।

तत्प्रसादार्थमचिरान्नन्दी तत्रागमिष्यति ॥

नन्दीसे भी बड़ी अनुनय - विनय की । इस प्रकार प्रयत्न करके किसी तरह उनको ऊँटकी योनिसे छुटकारा ४२ दिलाया और उन्हें पूर्ववत् सनत्कुमाररूपकी प्राप्ति करायी ॥ ४१-४२ ॥ उस समय महादेवजीने मुसकराते हुए - से अपने ४३ गणाध्यक्ष नन्दीसे कहा- ' अनघ! सनत्कुमार मुनिने मेरी ही अवहेलना करके अपना वैसा अहंकार प्रकट किया था, अतः तुम्हीं उनको मेरे यथार्थ स्वरूपका ४४ उपदेश दो । ब्रह्माका ज्येष्ठ पुत्र मूढ़की भाँति मेरा स्मरण कर रहा है, अत: मैंने ही उसको तुम्हें शिष्यके रूपमें दिया है; तुमसे उपदेश पाकर वह मेरे ज्ञानका ४५ प्रवर्तक होगा और वही तुम्हारा धर्माध्यक्षके पदपर

अभिषेक करेगा । ' ॥ ४३–४५ ॥

महादेवजीके ऐसा कहनेपर समस्त भूतगणोंके ४६ | अध्यक्ष नन्दीने [ प्रात: काल ] मस्तक झुकाकर स्वामी वह आज्ञा शिरोधार्य की तथा सनत्कुमार भी मेरी | आज्ञासे इस गणराज नन्दीको प्रसन्न करनेके लिये ४७ मेरुपर दुष्कर तपस्या कर रहे हैं । गणाध्यक्ष नन्दीके समागमसे पहले ही तुमलोग सनत्कुमारसे मिलो; | क्योंकि उनपर कृपा करनेके लिये नन्दी शीघ्र ही वहाँ ४८ | आयेंगे ॥ ४६-४८ ॥

पृष्ठ 1095

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अ ० ४१ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) इति सत्वरमादिश्य प्रेषिता विश्वयोनिना । १०७ ९ कुमारशिखरं विश्वयोनि ब्रह्माके इस प्रकार आदेश देकर मेरोर्दक्षिणं मुनयो ययुः भेजनेपर वे मुनि मेरुपर्वतके दक्षिणवर्ती इति श्रीशिवमहापुराणे ॥ ४ ९ शिखरपर शीघ्र गये ॥ ४ ९ ॥ कुमार-नैमिषर्षियात्रावर्णनं सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे क ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

नैमिषर्षियात्रावर्णन अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥

अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः मेरुगिरिके स्कन्द - सरोवरके तटपर मुनियोंका वहाँ आना और दृष्टिपातमात्रसे सनत्कुमारजीसे मिलना, भगवान् नन्दीका चला जाना पाशछेदन एवं ज्ञानयोगका उपदेश करके , शिवपुराणकी महिमा तथा ग्रन्थका उपसंहार सूत उवाच तत्र स्कन्दसरो नाम सरः सागरसन्निभम् । अमृतस्वादुशिशिरस्वच्छागाधलघूदकम् ॥

समन्ततः संघटितं स्फटिकोपलसञ्चयैः ।

सर्वर्तुकुसुमैः फुल्लैश्छादिताखिलदिङ्मुखम् ॥

शैवलैरुत्पलैः पद्मः कुमुदैस्तारकोपमैः ।

तरङ्गैरभ्रसङ्काशैराकाशमिव भूमिगम् ॥

सुखावतरणारोहैः स्थलैर्नीलशिलामयैः ।

सोपानमार्गे रुचिरैः शोभमानाष्टदिङ्मुखम् ॥

तत्रावतीर्णैश्च यथा तत्रोत्तीर्णैश्च भूयसा ।

स्नातैः सितोपवीतैश्च शुक्लकौपीनवल्कलैः ॥

जटाशिखायनैर्मुण्डैस्त्रिपुंड्रकृतमण्डनैः विरागविवशस्मेरमुखैर्मुनिकुमारकैः ॥

घटैः कमलिनीपत्रपुटैश्च कलशैः शिवैः ।

कमण्डलुभिरन्यैश्च तादृशैः करकादिभिः ॥

आत्मार्थं च परार्थं च देवतार्थं विशेषतः ।

आनीयमानसलिलमात्तपुष्पं च नित्यशः ॥

सूतजी कहते हैं — वहाँ [ मेरुपर्वतपर ] सागरके समान एक विशाल सरोवर है, जिसका नाम स्कन्द - सर १ है । उसका जल अमृतके समान स्वादिष्ठ, शीतल, स्वच्छ, अगाध और हलका है । वह सरोवर सब ओरसे स्फटिकमणिके शिलाखण्डोंद्वारा संघटित हुआ है । उसके चारों ओर सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूलोंसे २ भरे हुए वृक्ष उसे आच्छादित किये रहते हैं ॥ १-२ ॥ उस सरोवरमें सेवार, उत्पल, कमल और कुमुदके ३ पुष्प तारोंके समान शोभा पाते हैं और तरंगें बादलोंके समान उठती रहती हैं, जिससे जान पड़ता है कि आकाश ही भूमिपर उतर आया है । वहाँ सुखपूर्वक उतरने-चढ़नेके लिये सुन्दर घाट और सीढ़ियाँ हैं । वहाँकी भूमि ४ नीली शिलाओंसे आबद्ध है । आठों दिशाओंकी ओरसे वह सरोवर बड़ी शोभा पाता है ॥ ३-४ ॥ वहाँ बहुत - से लोग नहानेके लिये उतरते हैं और कितने ही नहाकर निकलते रहते हैं । स्नान करके श्वेत यज्ञोपवीत और उज्ज्वल कौपीन धारण किये, वल्कल पहने, सिरपर जटा अथवा शिखा रखाये या मूँड़ ६ मुड़ाये, ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाये, वैराग्यसे विमल एवं मुसकराते मुखवाले बहुत - से मुनिकुमार घड़ोंमें, कमलिनीके पत्तोंके दोनोंमें, सुन्दर कलशोंमें, कमण्डलुओंमें तथा ७ वैसे ही करकों ( करवों ) आदिमें अपने लिये, दूसरोंके लिये, विशेषतः देवपूजाके लिये वहाँसे नित्य जल ८ और फूल ले जाते हैं॥५–८ ॥

पृष्ठ 1096

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१०८० स्पर्शशंकया अन्तर्जलशिलारूढैर्नीचानां आचारवद्भिर्मुनिभिः कृतभस्माङ्गधूसरैः इतस्ततोऽप्सु मज्जद्भिरिष्टशिष्टैः शिलागतैः तिलैश्च साक्षतैः पुष्पैस्त्यक्तदर्भपवित्रकैः

देवाद्यमृषिमध्यं च निर्वर्त्य पितृतर्पणम् ।

निवेदयेदभिज्ञेभ्यो नित्यस्नानगतान् द्विजान् ॥

स्थाने स्थाने कृतानेकबलिपुष्पसमीरणैः ।

सौरार्घ्यपूर्वं कुर्वद्भिः स्थण्डिलेभ्यर्चनादिकम् ॥

क्वचिन्निमज्जदुन्मज्जत्प्रस्त्रस्तगजयूथपम् 1 क्वचिच्च तृषयायातमृगीमृगतुरङ्गमम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ आचारसम्पन्न, भस्मोद्धूलित शरीरवाले, सम्मान्य । । शिष्ट मुनिजन अपवित्र पुरुष आदिके स्पर्शसे शंकित ॥ ९ । रहते हुए उस सरोवरमें जहाँ - तहाँ जलमें डूबी । । शिलाओंपर स्थित हो स्नानकृत्य सम्पन्न करते हैं हुई ॥ १० देवर्षि मनुष्य- पितृतर्पण करनेके उपरान्त छोड़े गये । | कुश, तिल, अक्षत, पुष्प तथा पवित्रक आदिसे युक्त | वह सरोवर स्नानादि धर्मकृत्योंके सम्पादनार्थ आये हुए ११ द्विजोंका मानो परिचय - सा देता रहता है ॥ ९ -११ ॥ स्थान - स्थानपर अनेक प्रकारकी पुष्पबलि आदि [ मन्त्रोंके ] उच्चारणपूर्वक दी जाती है, कुछ लोग १२ | सूर्यदेवको अर्घ्य देते हैं और कुछ लोग वेदिकाओंपर । देवताओंकी अर्चनामें निरत रहते हैं । उस सरोवरमें । | कहीं [ श्रमके कारण ] शिथिल शरीरवाले श्रेष्ठ गज १३ डूबते - उतराते हुए जलक्रीडा करते हैं तो कहीं प्याज बुझानेके लिये हरिण, हरिणियाँ और घोड़े आ दीखते हैं । वहाँपर कहीं तो जल पीकर उड़ते हुए मयूर परस्पर स्पर्धा - सी करते हैं तो कहींपर तटोंको क्वचित्पीतजलोत्तीर्णमयूरवरवारणम् ॥१४ आहत करते हुए वृषभ अपने प्रतिद्वन्द्वी वृषभोंसे लड़ते क्वचित्कृततटाघातवृषप्रतिवृषोज्ज्वलम्

क्वचित्कारंडवरवैः क्वचित्सारसकूजितैः ।

क्वचिच्च कोकनिनदैः क्वचिद्भ्रमरगीतिभिः ॥

स्नानपानादिकरणैः स्वसम्पद्रुमजीविभिः ।

प्रणयात्प्राणिभिस्तैस्तैर्भाषमाणमिवासकृत् ॥

कूलशाखिशिखालीनकोकिलाकुलकूजितैः ।

आतपोपहतान् सर्वान्नामन्त्रयदिवानिशम् ॥

उत्तरे तस्य सरसस्तीरे कल्पतरोरधः ।

वेद्यां वज्रशिलामय्यां मृदुले मृगचर्मणि ॥

सनत्कुमारमासीनं शश्वद्बालवपुर्धरम् ।

तत्कालमात्रोपरतं समाधेरचलात्मनः ॥

उपास्यमानं मुनिभिर्योगीन्द्रैरपि पूजितम् ।

ददृशुर्नैमिषेयास्ते प्रणताश्चोपतस्थिरे ॥

हुए शोभित होते हैं ॥ १२–१४ ॥

कहीं कारण्डव पक्षियोंकी ध्वनि हो रही है, १५ कहीं सारसोंका कूजन सुनायी दे रहा है, कहीं कोकपक्षी ( चक्रवाक ) शब्द कर रहे हैं और कहीं भौरे गुंजन करते हुए मानो गीत - सा गा रहे हैं । वह सरोवर जलमें स्नान - पानादि करते हुए अपने समीपवर्ती १६ वृक्षोंका आश्रय लेकर रहनेवाले जीव - जन्तुओंसे मानो प्रेमपूर्वक बार - बार वार्तालाप कर रहा है । वह सरोवर अपने तटवर्ती वृक्षोंकी चोटियोंपर बैठकर कूजन करती हुई कोयलोंकी [ कुहू - कुहू ] ध्वनिके १७ बहानेसे मानो आतपसे सन्तप्त सभी जीवोंको निरन्तर आमन्त्रित - सा करता है ॥ १५–१७ ॥ उस सरोवरके उत्तर तटपर एक कल्पवृक्षके नीचे १८ हीरेकी शिलासे बनी हुई वेदीपर कोमल मृगचर्म बिछाकर । सदा बालरूपधारी सनत्कुमारजी बैठे थे । वे अपनी अविचल । । समाधिसे उसी समय उपरत हुए थे । उस समय बहुत- भी । १ ९ | से ऋषि - मुनि उनकी सेवामें बैठे थे और योगीश्वर उनकी पूजा कर रहे थे । नैमिषारण्यके मुनियोंने वहाँ । सनत्कुमारजीका दर्शन किया । उनके चरणोंमें मस्तक ॥ २० । झुकाया और उनके आस - पास बैठ गये ॥ १८-२०

पृष्ठ 1097

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अ ० ४१ ] वायवीयसंहिता यावत्पृष्टवते तस्मै प्रोचुः स्वागतकारणम् । तुमुलः शुश्रुवे तावद्दिवि दुंदुभिनिःस्वनः ॥ २१ ददृशे तत्क्षणे तस्मिन् विमानं भानुसन्निभम् । गणेश्वरैरसंख्येयैः संवृतं च समन्ततः ॥ २२

अप्सरोगणसंकीर्णं रुद्रकन्याभिरावृतम् ।

मृदङ्गमुरजोद्धुष्टं वेणुवीणारवान्वितम् ॥ २३

चित्ररत्नवितानाढ्यं मुक्तादामविराजितम् । मुनिभिः सिद्धगन्धर्वैर्यक्षचारणकिन्नरैः ॥ २४

नृत्यद्भिश्चैव गायद्भिर्वादयद्भिश्च संवृतम् ।

वीरगोवृषचिह्नेन विद्रुमद्रुमयष्टिना ॥ २५

कृतगोपुरसत्कारं केतुना मान्यहेतुना ॥

तस्य मध्ये विमानस्य चामरद्वितयान्तरे ॥ २६

छत्रस्य मणिदंडस्य चन्द्रस्येव शुचेरधः ।

दिव्यसिंहासनारूढं देव्या सुयशया सह ॥ २७

श्रिया च वपुषा चैव त्रिभिश्चापि विलोचनैः ।

प्राकारैरभिकृत्यानां प्रत्यभिज्ञापकं प्रभोः ॥ २८

अविलंघ्य जगत्कर्तुराज्ञापनमिवागतम् ।

सर्वानुग्रहणं शम्भोः साक्षादिव पुरः स्थितम् ॥ २ ९

शिलादतनयं साक्षाच्छ्रीमच्छूलवरायुधम् ।

विश्वेश्वरगणाध्यक्षं विश्वेश्वरमिवापरम् ॥ ३०

विश्वस्यापि विधातॄणां निग्रहानुग्रहक्षमम् ।

चतुर्बाहुमुदाराङ्गं चन्द्ररेखाविभूषितम् ॥ ३१

कंठे नागेन मौलौ च शशांकेनाप्यलंकृतम् ।

सविग्रहमिवैश्वर्यं सामर्थ्यमिव सक्रियम् ॥ ३२

( उत्तरखण्ड ) १०८१ सनत्कुमारजीके पूछनेपर उन ऋषियोंने उनसे ज्यों ही अपने आगमनका कारण बताना आरम्भ किया, त्यों ही आकाशमें दुन्दुभियोंका सुनायी दिया । उसी समय सूर्यके समान तुमुल नाद विमान दृष्टिगोचर तेजस्वी एक हुआ, जो असंख्य गणेश्वरोंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ था । उसमें अप्सराएँ रुद्रकन्याएँ भी थीं । वहाँ मृदंग, ढोल और वीणाकी तथा ध्वनि गूँज रही थी ॥ २१–२३ ॥ उस विमानमें विचित्र रत्नजटित चँदोवा तना था और मोतियोंकी लड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । बहुत - से मुनि, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, चारण और किन्नर नाचते, गाते और बाजे बजाते हुए उस विमानको सब ओरसे घेरकर चल रहे थे, उसमें वृषभचिह्नसे युक्त और मूँगेके दण्डसे विभूषित ध्वजा - पताका फहरा रही थी, जो उसके गोपुरकी शोभा बढ़ाती थी । उस विमानके मध्यभागमें दो चँवरोंके बीच चन्द्रमाके समान उज्ज्वल मणिमय दण्डवाले शुभ्र छत्रके नीचे दिव्य सिंहासनपर शिलादपुत्र नन्दी देवी सुयशाके साथ बैठे थे । वे अपनी कान्तिसे, शरीरसे तथा तीनों नेत्रोंसे बड़ी शोभा पा रहे थे । भगवान् शंकरको आवश्यक कार्योंकी सूचना देनेवाले वे नन्दी मानो जगत्स्रष्टा शिवके अलंघनीय आदेशका मूर्तिमान् स्वरूप होकर वहाँ आये थे, अथवा उनके रूपमें मानो साक्षात् शम्भुका सम्पूर्ण अनुग्रह ही साकाररूप धारण करके वहाँ सबके सामने उपस्थित हुआ था ॥ २४-२९ ॥ शोभाशाली श्रेष्ठ त्रिशूल ही उनका आयुध है । वे विश्वेश्वरके गणोंके अध्यक्ष हैं और दूसरे विश्वनाथकी भाँति शक्तिशाली हैं । उनमें विश्व-स्रष्टा विधाताओंका भी निग्रह और अनुग्रह करनेकी शक्ति है । उनके चार भुजाएँ हैं । अंग - अंगसे उदारता सूचित होती है, वे चन्द्रलेखासे विभूषित हैं । कण्ठमें नाग और मस्तकपर चन्द्रमा उनके अलंकार हैं । वे साकार ऐश्वर्य और सक्रिय सामर्थ्यके स्वरूप-से जान पड़ते हैं॥३०–३२ ॥

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१०८२ समाप्तमिव निर्वाणं सर्वज्ञमिव सङ्गतम् दृष्ट्वा प्रहृष्टवदनो ब्रह्मपुत्रः सहर्षिभिः तस्यात्मानमिवार्पयन् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ भलीभाँति प्राप्त हुए मोक्ष अथवा निकट उपस्थित । सर्वज्ञ परमात्माके समान प्रतीत होनेवाले । ३३ / हुए उन्ह | देखकर ऋषियोंसहित ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारका । प्रसन्नतासे खिल उठा । वे दोनों हाथ जोड़कर मुख उठ । और उन्हें आत्मसमर्पण - सा करते हुए खड़े हो गये । तस्थौ प्राञ्जलिरुत्थाय चावनिं गते ॥ ३४ इतनेमें ही वह विमान धरतीपर आ गया, सनत्कुमारन अथ तत्रान्तरे तस्मिन्विमाने प्रणम्य दण्डवद्देवं स्तुत्वा व्यज्ञापयन्मुनीन् ।

षट्कुलीया इमे दीर्घं नैमिषे सत्रमास्थिताः ।

आगता ब्रह्मणादिष्टाः पूर्वमेवाभिकांक्षया ॥

श्रुत्वा वाक्यं ब्रह्मपुत्रस्य नंदी छित्त्वा पाशान्दृष्टिपातेन सद्यः । शैवं धर्मं चैश्वरं ज्ञानयोगं दत्त्वा भूयो देवपार्श्वं जगाम ॥ सनत्कुमारेण च तत्समस्तं व्यासाय साक्षाद्गुरवे ममोक्तम् । व्यासेन चोक्तं महितेन मह्यं मया च तद्वः कथितं समासात् ॥ नावेदविद्भ्यः कथनीयमेतत् पुराणरत्नं पुरशासनस्य । नाभक्तशिष्याय च नास्तिकेभ्यो दत्तं हि मोहान्निरयं ददाति ॥ मार्गेण सेवानुगतेन यैस्तद् दत्तं गृहीतं पठितं श्रुतं वा । तेभ्यः सुखं धर्ममुखं त्रिवर्गं निर्वाणमन्ते नियतं ददाति ॥ परस्परस्योपकृतं भवद्भि-र्मया च पौराणिकमार्गयोगात् । अतो गमिष्येऽहमवाप्तकामः समस्तमेवास्तु शिवं सदा नः ॥ सूते कृताशिषि गते मुनयः सुवृत्तां यागे च पर्यवसिते महति प्रयागे । | देव नन्दीको साष्टांग प्रणाम करके उनकी स्तुति की | और मुनियोंका परिचय देते हुए कहा - ' ये छ: कुलोंम | उत्पन्न ऋषि हैं, जो नैमिषारण्यमें दीर्घकालसे सत्रका । अनुष्ठान करते थे । ब्रह्माजीके आदेशसे आपका दर्शन ३५ करनेके लिये ये लोग पहलेसे ही यहाँ आये हुए हैं ' ॥ ३३–३५ ॥ ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारका यह कथन सुनकर नन्दीने दृष्टिपातमात्रसे उन सबके पाशोंको तत्काल काट डाला और ईश्वरीय शैवधर्म एवं ज्ञानयोगका उपदेश ३६ देकर वे फिर महादेवजीके पास चले गये ॥ ३६ ॥

सनत्कुमारने वह समस्त ज्ञान साक्षात् मेरे गुरु व्यासको दिया, पूजनीय व्यासजीने मुझे संक्षेपसे वह सब कुछ बताया और उस ज्ञानको मैंने संक्षेपमें आप ३७ लोगोंको बताया ॥ ३७ ॥

त्रिपुरारि शिवके इस पुराणरत्नका उपदेश वेदके न जाननेवाले लोगोंको नहीं देना चाहिये । जिस शिष्यकी गुरुमें भक्ति न हो, उसको तथा नास्तिकोंको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । यदि मोहवश इन ३८ अनधिकारियोंको इसका उपदेश दिया गया तो यह नरक प्रदान करता है ॥ ३८ ॥

जिन लोगोंने सेवानुगत - मार्गसे इस पुराणका उपदेश दिया, लिया, पढ़ा अथवा सुना है, उनको यह सुख तथा धर्म आदि त्रिवर्ग प्रदान करता है और ३ ९ अन्तमें निश्चय ही मोक्ष देता है ॥ ३ ९ ॥ इस पौराणिक मार्गके सम्बन्धसे आपलोगोंने और मैंने एक - दूसरेका उपकार किया है; अतः म । सफल - मनोरथ होकर जा रहा हूँ । हमलोगोंका सदा ४० ' सब प्रकारसे मंगल ही हो ॥ ४० ॥

सूतजीके आशीर्वाद देकर चले जाने और उस [ नैमिषारण्यके अन्तर्गत स्थित ] प्रयागतीर्थमें महायज्ञके पूर्ण हो जानेपर वे सदाचारी मुनि विषय-

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अ ० ४१ ] वायवीयसंहिता काले कलौ च विषयैः कलुषायमाणे वाराणसीपरिसरे वसतिं वितेनुः अथ च ते पशुपाशमुमुक्षया-खिलतया कृतपाशुपतव्रताः अधिकृताखिलबोधसमाधयः परमनिर्वृतिमापुरनिन्दिताः व्यास उवाच

एतच्छिवपुराणं हि समाप्तं हितमादरात् ।

पठितव्यं प्रयत्नेन श्रोतव्यं च तथैव हि ॥

नास्तिकाय न वक्तव्यमश्रद्धाय शठाय च ।

अभक्ताय महेशस्य तथा धर्मध्वजाय च ॥

एतच्छ्रुत्वा ह्येकवारं भवेत् पापं हि भस्मसात् । अभक्तो भक्तिमाप्नोति भक्तो भक्तिसमृद्धिभाक् ॥

पुनः श्रुते च सद्भक्तिर्मुक्तिः स्याच्च श्रुते पुनः ।

तस्मात् पुनः पुनश्चैव श्रोतव्यं हि मुमुक्षुभिः ॥

पञ्चावृत्तिः प्रकर्तव्या पुराणस्यास्य सद्धिया ।

परं फलं समुद्दिश्य तत्प्राप्नोति न संशयः ॥

पुरातनाश्च राजानो विप्रा वैश्याश्च सत्तमाः ।

सप्तकृत्वस्तदावृत्यालभन्त शिवदर्शनम् ॥

श्रोष्यत्यथापि यश्चेदं मानवो भक्तितत्परः ।

इह भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते मुक्तिं लभेच्च सः ॥

एतच्छिवपुराणं हि शिवस्यातिप्रियं परम् ।

भुक्तिमुक्तिप्रदं ब्रह्मसम्मितं भक्तिवर्धनम् ॥

एतच्छिवपुराणस्य वक्तुः श्रोतुश्च सर्वदा ।

सगणः ससुतः साम्बः शं करोतु स शङ्करः ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां ( उत्तरखण्ड ) १०८३ ॥ ४१ निवास कलुषित कलिकालके आनेसे काशीके आसपास करने लगे । तदनन्तर पशु - पाशसे छूटनेकी इच्छासे उन सबने पूर्णतया पाशुपत । किया और सम्पूर्ण बोध एवं समाधिपर व्रतका अनुष्ठान करके वे अनिन्द्य महर्षि परमानन्दको अधिकार ॥ ४२ | गये ॥ ४१-४२ ॥ प्राप्त हो व्यासजी कहते हैं — यह शिवपुराण पूरा हुआ इस हितकर पुराणको बड़े आदर एवं प्रयत्नसे, ४३ तथा सुनना चाहिये । नास्तिक, श्रद्धाहीन, शठ, महेश्वरके पढ़ना प्रति भक्तिसे रहित तथा धर्मध्वजी ( पाखण्डी ) -को ४४ इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ ४३-४४ ॥ इसका एक बार श्रवण करनेसे ही सारा पाप ४५ भस्म हो जाता है । भक्तिहीन भक्ति पाता है और भक्त भक्तिकी समृद्धिका भागी होता है । दोबारा श्रवण करनेपर उत्तम भक्ति और तीसरी बार सुननेपर मुक्ति ४६ सुलभ हो जाती है, इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको बारंबार इसका श्रवण करना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ किसी भी उत्तम फलको पानेके लिये शुद्ध-४७ बुद्धिसे इस पुराणकी पाँच आवृत्ति करनी चाहिये । ऐसा करनेसे मनुष्य उस फलको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है । प्राचीन कालके राजाओं, ब्राह्मणों ४८ तथा श्रेष्ठ वैश्योंने इसकी सात आवृत्ति करके शिवका । साक्षात् दर्शन प्राप्त किया है॥४७-४८ ॥ जो मनुष्य भक्तिपरायण हो इसका श्रवण करेगा, ४ ९ वह भी इहलोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेगा । यह श्रेष्ठ शिवपुराण भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय है । यह वेदके तुल्य ५० माननीय, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा भक्तिभावको बढ़ानेवाला हैं । अपने प्रमथगणों, दोनों पुत्रों तथा देवी पार्वतीजीके साथ भगवान् शंकर इस पुराणके वक्ता ५१ और श्रोताका सदा कल्याण करें ॥४ ९ –५१ ॥ वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे व्यासोपदेश-श्रीशिवमहापुराणमाहात्म्यवर्णनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें व्यासोपदेश एवं श्रीशिवमहापुराणमाहात्म्यवर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

॥ श्रीशिवमहापुराण - द्वितीय खण्ड- उत्तरार्ध सम्पूर्ण ॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥ श्रीसाम्बशिवार्पणमस्तु ॥

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॥ श्रीहरिः ॥ विभिन्न स्वरूपोंका ध्यान सदाशिवके भगवान् सदाशिव रजःसंश्रयः संहर्ता तमसान्वितो गुणवतीं मायामतीत्य स्थितः । यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्रष्टा नित्यं सत्त्वसमन्वयादधिगतं पूर्णं शिवं धीमहि ॥ सत्यानन्दमनन्तबोधममलं लेकर ब्रह्मादिसंज्ञास्पदं संसारकी सृष्टि करते हैं, सत्त्वगुणसे सम्पन्न हो सातों भुवनोंका धारण पोषण जो रजोगुणका आश्रय संहार करते हैं तथा त्रिगुणमयी मायाको लाँघकर अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित करते हैं, तमोगुणसे युक्त हो सबका एवं पूर्णब्रह्म शिवका हम ध्यान करते हैं । वे ही रहते हैं, उन सत्यानन्दस्वरूप, अनन्त बोधमय, निर्मल नाम धारण करते हैं तथा सदैव सात्त्विकभावको सृष्टिकालमें ब्रह्मा,, पालनके समय विष्णु और संहारकालमें रुद्र अपनानेसे ही प्राप्त होते हैं । परमात्मप्रभु शिव वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाक्षरः । अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते स स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः ॥ वेदान्तग्रन्थोंमें जिन्हें एकमात्र परम पुरुष परमात्मा कहा गया है, जिन्होंने समस्त द्यावा- - पृथिवीको अन्तर्बाह्य — सर्वत्र व्याप्त कर रखा है, जिन एकमात्र महादेवके लिये ' ईश्वर ' शब्द अक्षरशः यथार्थरूपमें प्रयुक्त होता है और जो किसी दूसरेके विशेषणका विषय नहीं बनता, अपने अन्तर्हृदयमें समस्त प्राणोंको निरुद्ध करके मोक्षकी इच्छावाले योगीजन जिनका निरन्तर चिन्तन और अन्वेषण करते रहते हैं, वे नित्य एक समान सुस्थिर रहनेवाले, महाप्रलयमें भी विक्रियाको प्राप्त न होनेवाले और भक्तियोगसे शीघ्र प्रसन्न होनेवाले भगवान् शिव आप सभीका परम कल्याण करें । मङ्गलस्वरूप भगवान् शिव

कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं शशाङ्ककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम् ।

करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपुर्धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम् ॥

जिनकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिनका मुखारविन्द मन्द मुसकानकी छटासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमाकी कला जैसे परम उज्ज्वल हैं, जो आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंको शान्त कर देनेमें समर्थ हैं, जिनका स्वरूप सच्चिन्मय एवं परमानन्दरूपसे प्रकाशित होता है तथा जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके भुजापाशसे आवेष्टित हैं, वे शिव नामक कोई अनिर्वचनीय तेज: पुंज सबका मंगल करें । भगवान् अर्धनारीश्वर

नीलप्रवालरुचिरं विलसत्त्रिनेत्रं पाशारुणोत्पलकपालत्रिशूलहस्तम् ।

अर्धाम्बिकेशमनिशं प्रविभक्तभूषं बालेन्दुबद्धमुकुटं प्रणमामि रूपम् ॥

यो धत्ते निजमाययैव भुवनाकारं विकारोज्झितो यस्याहुः करुणाकटाक्षविभवौ स्वर्गापवर्गाभिधौ । प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हृदि सदा पश्यन्ति यं योगिनस्तस्मै शैलसुताञ्चितार्थवपुषे शश्वन्नमस्तेजसे । श्रीशंकरजीका शरीर नीलमणि और प्रवालके समान सुन्दर ( नीललोहित ) है, तीन नेत्र हैं, चारों हाथोंमें पाश, लाल कमल, कपाल और त्रिशूल हैं, आधे अंगमें अम्बिकाजी और आधेमें महादेवजी हैं । दोनों अलग अलग शृंगारोंसे सज्जित हैं, ललाटपर अर्धचन्द्र है और मस्तकपर मुकुट सुशोभित है, ऐसे स्वरूपको नमस्कार है । जो निर्विकार होते हुए भी अपनी मायासे ही विराट् विश्वका आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग और । अपवर्ग ( मोक्ष ) जिनके कृपा - कटाक्षके ही वैभव बताये जाते हैं तथा योगीजन जिन्हें अपने हृदयके भीतर । सदा