शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 111–120

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २२ ] शतरुद्रसंहिता ९९

तदा नभोगता वाणी मेघगम्भीरनिःस्वना ।

उवाच देवान्दैत्यांश्चाश्वासयन्तीश्वराज्ञया ॥

नभोवाण्युवाच

हे देवा असुराश्चैव मन्थध्वं क्षीरसागरम् ।

भवतां बलबुद्धिर्हि भविष्यति न संशयः ॥

मन्दरं चैव मन्थानं रज्जुं कुरुत वासुकिम् ।

मिथः सर्वे मिलित्वा तु मंथनं कुरुतादरात् ॥

नन्दीश्वर उवाच

नभोगतां तदा वाणीं निशम्याथ सुरासुराः ।

उद्योगं चक्रिरे सर्वे तत्कर्तुं मुनिसत्तम ॥

सुसन्धायाखिलास्ते वै मन्दरं पर्वतोत्तमम् ।

कनकाभं च सरलं नानाशोभार्चितं ययुः ॥

सुप्रसाद्य गिरीशं तं तदाज्ञप्ताः सुरासुराः ।

बलादुत्पाटयामासुर्नेतुकामाः पयोऽर्णवम् ॥

भुजैरुत्पाट्य ते सर्वे जग्मुः क्षीरार्णवं मुने ।

अशक्ता अभवंस्तत्र तमानेतुं हतौजसः ॥

तद्भुजैः स परिभ्रष्टः पतितो मंदरो गिरिः ।

सहसातिगुरुः सद्यो देवदैत्योपरि ध्रुवम् ॥

एवं भग्नोद्यमा भग्नाः सम्बभूवुः सुरासुराः ।

चेतनाः प्राप्य च ततस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ॥

तदिच्छयोद्यताः सर्वे पुनरुत्थाप्य तं गिरिम् ।

निचिक्षिपुर्जले नीत्वा क्षीरोदस्योत्तरे तटे ॥

ततः सुरासुरगणा रज्जुं कृत्वा च वासुकिम् ।

रत्नान्यादातुकामास्ते ममंथुः क्षीरसागरम् ॥

क्षीरोदे मथ्यमाने तु श्रीः स्वर्लोकमहेश्वरी ।

समुद्भूता समुद्राच्च भृगुपुत्री हरिप्रिया ॥

तब मेघके समान गम्भीर ध्वनिसे युक्त ५ आकाशवाणी शिवजीकी आज्ञासे देवताओं तथा असुरोंको आश्वस्त करती हुई कहने लगी- ॥५ ॥

आकाशवाणी बोली- हे देवगणो! हे असुरो! आपलोग क्षीरसागरका मन्थन कीजिये, [ इस कार्यके ६ लिये ] आपलोगोंको बल और बुद्धिकी प्राप्ति होगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥६ ॥

आपलोग मन्दराचलपर्वतको मथानी एवं वासुकि ७ नागको रस्सी बनाइये और सभी लोग आपसमें मिलकर आदरपूर्वक मन्थन कीजिये ॥७ ॥

नन्दीश्वर बोले - हे मुनिसत्तम! तब [ इस प्रकारकी ] आकाशवाणी सुनकर सभी देवता तथा ८ असुर ऐसा करनेके लिये प्रयत्न करने लगे ॥८ ॥

वे सब आपसमें मिलकर सोनेके समान ९ कान्तिवाले, ऋजुकाय तथा नाना प्रकारकी शोभासे सम्पन्न पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलके समीप गये॥९॥

उस गिरीश्वरको प्रसन्न करके तथा उसकी आज्ञा १० प्राप्तकर उसे क्षीरसागरमें ले जानेकी इच्छावाले देवताओं तथा असुरोंने बलपूर्वक उसे उखाड़ लिया ॥ १० ॥

हे मुने! अपनी भुजाओंसे [ मन्दराचलको ] ११ उखाड़कर वे सब क्षीरसागरके पास जाने लगे, किंतु क्षीण बलवाले वे उसे ले जानेमें असमर्थ हो गये ॥ ११ ॥

अत्यन्त भारी वह मन्दराचल अकस्मात् उनकी १२ भुजाओंसे छूटकर शीघ्र ही देवताओं और दैत्योंके ऊपर गिर पड़ा ॥ १२ ॥

तब भग्न उद्यमवाले देवता तथा असुर आहत हो १३ गये, फिर [ कुछ समय बाद ] चेतना प्राप्तकर जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥

इसके बाद जगदीश्वरकी इच्छासे उद्यत हुए उन १४ सबने उस पर्वतको पुनः उठाकर क्षीरसागरके उत्तरी तटपर ले जाकर जलमें डाल दिया ॥ १४ ॥

तदनन्तर रत्न प्राप्त करनेकी इच्छावाले देवता तथा असुर वासुकि नागकी रस्सी बनाकर क्षीरसागरका १५ मन्थन करने लगे ॥१५ ॥

क्षीरसागरका मन्थन किये जानेपर स्वर्गलोककी महेश्वरी भृगुपुत्री हरिप्रिया महालक्ष्मी समुद्रसे प्रकट हुईं । १६ उसके बाद धन्वन्तरि, चन्द्रमा, पारिजात कल्पवृक्ष, 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_5_2_Front

पृष्ठ 112

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ १०० धन्वन्तरिः शशांकश्च पारिजातो महाद्रुमः I उच्चैःश्रवाश्च तुरगो गज ऐरावतस्तथा ॥ १७

सुरा हरिधनुः शङ्खो गावः कामदुघास्ततः ।

कौस्तुभाख्यो मणिश्चैव तथा पीयूषमेव च ॥ १८

पुनश्च मथ्यमाने तु कालकूटं महाविषम् ।

युगान्तानलभं जातं सुरासुरभयावहम् ॥ १ ९

पीयूषजन्मकाले तु बिन्दवो ये बहिर्गताः ।

तेभ्यः कान्ताः समुद्भूता बह्वह्यो ह्यद्भुतदर्शनाः ॥ २०

शरत्पूर्णेन्दुवदनास्तडित्सूर्यानलप्रभाः हारकेयूरकटकैर्दिव्यरत्नैरलङ्कृताः ॥२१

लावण्यामृततोयेन ताः सिञ्चन्त्यो दिशो दश ।

जगदुन्मादयन्त्येव भ्रूभङ्गायतवीक्षणाः ॥ २२

कोटिशस्ताः समुत्पन्नास्त्वमृतात्कामनिस्सृताः ।

ततोऽमृतं समुत्पन्नं जरामृत्युनिवारणम् ॥२३

लक्ष्मीं शंखं कौस्तुभं च खड्गं जग्राह केशवः ।

जग्राहार्को हयं दिव्यमुच्चैःश्रवसमादरात् ॥ २४

पारिजातं तरुवरमैरावतमिभेश्वरम् ।

शचीपतिश्च जग्राह निर्जरेशो महादरात् ॥ २५

कालकूटं शशांकं च देवत्राणाय शङ्करः ।

स्वकण्ठे धृतवान् शम्भुः स्वेच्छया भक्तवत्सलः ॥ २६

दैत्याः सुराख्यां रमणीमीश्वराजविमोहिताः ।

जगृहुः सकला व्यास सर्वे धन्वन्तरिं जनाः ॥ २७

जगृहुर्मुनयः सर्वे कामधेनुं मुनीश्वराः ।

सामान्यतस्त्रियस्ताश्च स्थिता आसन्विमोहिकाः ॥ २८

अमृतार्थे महायुद्धं संबभूव जयैषिणाम् ।

सुराणामसुराणां च मिथः संक्षुब्धचेतसाम् ॥ २ ९

हृतं सोमं च दैतेयैर्बलाद्देवान्विजित्यच । ।

बलिप्रभृतिभिर्व्यास युगान्ताग्न्यर्कसुप्रभैः ॥ ३० ।

उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, सुरा, विष्णुका शार्ङ्गधनुष, शंख, कामधेनु, गोवृन्द, कौस्तुभमणि । अमृत उत्पन्न हुए । पुनः मथे जानेपर प्रलयकालीन तथा अग्निके समान कान्तिवाला और देवताओं लाने असुरोंको भय उत्पन्न करनेवाला कालकूट नामक । महाविष उत्पन्न हुआ ॥ १६–१९ ॥ | अमृत उत्पन्न होनेके समय उसकी जो बूंदें बाहर छलक पड़ीं, उनसे अद्भुत दर्शनवाली बहुत - सी स्त्रियाँ प्रकट हुईं । वे शरत्कालीन पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, बिजली, सूर्य तथा अग्निके समान प्रभावाली और हार, बाजूबन्द, कटक तथा दिव्य । रत्नोंसे अलंकृत थीं । वे अपने सौन्दर्यरूपी अमृतजलसे दसों दिशाओंको सींच रही थीं और अपने भ्रूविलासके कारण विस्तीर्ण नेत्रोंवाली वे संसारको उन्मत्त कर रही थीं । इस प्रकार उन अमृतकी बूँदोंसे स्वेच्छया करोड़ों स्त्रियाँ निकलीं । तदनन्तर जरा और मृत्युको दूर करनेवाला अमृत उत्पन्न हुआ ॥ २०–२३ ॥ लक्ष्मी, शंख, कौस्तुभमणि एवं खड्गको श्रीविष्णुने ग्रहण किया । सूर्यने बड़े आदरके साथ दिव्य उच्चैःश्रवा नामका घोड़ा ले लिया । देवताओंके स्वामी शचीपति इन्द्रने अत्यन्त आदरपूर्वक वृक्षोंमें श्रेष्ठ पारिजात एवं हाथियोंके राजा ऐरावतको ग्रहण किया ॥ २४-२५ ॥ भक्तवत्सल तथा कल्याणकारी शिवजीने देवताओंकी रक्षाके लिये कण्ठमें [ महाभयंकर ] कालकूट विषको तथा चन्द्रमाको [ मस्तकपर ] स्वेच्छासे धारण किया ॥ २६ ॥

ईश्वरकी मायासे मोहित हुए दैत्योंने आनन्द प्रदान करनेवाली मदिरा ग्रहण की । फिर हे व्यास! सभी मनुष्योंने धन्वन्तरि वैद्यको ग्रहण किया ॥ २७ ॥

सभी मुनिगणोंने कामधेनुको ग्रहण किया और मोहित करनेवाली वे स्त्रियाँ सामान्य रूपसे स्थित रहीं ॥ २८ ॥

विजयकी अभिलाषावाले तथा व्याकुल चित्तवाले देवताओं एवं राक्षसोंमें अमृतके लिये परस्पर महान् युद्ध हुआ ॥२ ९ ॥ हे व्यास! प्रलयकालीन अग्नि तथा सूर्यके समान महान् तेजस्वी बलि आदि दैत्योंने बलपूर्वक देवगणोंको जीतकर उनसे अमृत छीन लिया ॥ ३० ॥

2224 Shivmahapuran_IInd Part Section_5_2_Back

पृष्ठ 113

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २२ ] शतरुद्रसंहिता १०१

देवाः शङ्करमापन्ना विह्वलाः शिवमायया ।

सर्वे शक्रादयस्तात दैतेयैरर्दिता बलात् ॥ ३१

ततस्तदमृतं यत्नात्स्त्रीस्वरूपेण मायया ।

शिवाज्ञया रमेशेन दैत्येभ्यश्च हृतं मुने ॥ ३२

अपाययत्सुरांस्तांश्च मोहिनी स्त्रीस्वरूपधृक् ।

मोहयित्वासुरान्सर्वान्हरिर्मायाविनां वरः ॥ ३३

गत्वा निकटमेतस्या ऊचिरे दैत्यपुंगवाः ।

पाययस्व सुधामेतां माभूद्भेदोऽत्र पंक्तिषु ॥ ३४

एतदुक्त्वा ददुस्तस्मै विष्णवे छलरूपिणे ।

ते दैत्या दानवाः सर्वे शिवमायाविमोहिताः ॥ ३५

एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा स्त्रियो दानवपुंगवाः ।

अनयन्नमृतोद्भूता यथास्थानं यथासुखम् ॥ ३६

तासां पुराणि दिव्यानि स्वर्गाच्छतगुणान्यपि ।

घोरैर्यन्त्रैः सुगुप्तानि मयमायाकृतानि च ॥ ३७

सुरक्षितानि सर्वाणि कृत्वा युद्धाय निर्ययुः ।

अस्पृष्टवृक्षसो दैत्याः कृत्वा समयमेव हि ॥ ३८

न स्पृशामः स्त्रियश्चेमा यदि देवैर्विनिर्जिताः ।

इत्युक्त्वा ते महावीरा दैत्याः सर्वे युयुत्सवः ॥ ३ ९

सिंहनादं ततश्चक्रुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक् ।

पूरयन्त इवाकाशं तर्पयन्तो बलाहकान् ॥ ४०

युद्धं बभूव देवानामसुरैः सह भीकरम् ।

देवासुराख्यमतुलं प्रसिद्धं भुवनत्रये ॥ ४१

जयं प्रापुः सुराः सर्वे विष्णुना परिरक्षिताः ।

दैत्याः पलायितास्तत्र हताः सामरविष्णुना ॥ ४२

दैत्याः संमोहिता देवैर्विष्णुना च महात्मना । हे तात! तदनन्तर शिवकी मायासे दैत्योंके द्वारा बलपूर्वक पीड़ित किये गये इन्द्रादि सभी देवता व्याकुल होकर शिवजीकी शरणमें आये । हे मुने! तब शिवजीकी आज्ञासे विष्णुने मायासे स्त्रीरूप धारणकर बड़े यत्नसे दैत्योंसे उस अमृतको छीन लिया ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् मायावियोंमें श्रेष्ठ मोहिनी स्त्रीरूपधारी विष्णुने समस्त दैत्योंको मोहितकर वह अमृत देवगणोंको पिला दिया ॥ ३३ ॥

तब उस [ मोहिनी रूपवाली ] स्त्रीके पास जाकर उन श्रेष्ठ दैत्योंने कहा- इस सुधाको हम सभी दैत्योंको भी पिलाओ, जिससे किसी प्रकारका पंक्तिभेद न हो ॥३४ ॥

ऐसा कहकर शिवमायासे मोहित हुए उन सभी दैत्यों एवं दानवोंने कपटरूपधारी उन विष्णुको वह अमृत दे दिया ॥३५ ॥

इसी बीच वे वरिष्ठ दैत्य अमृतसे उत्पन्न स्त्रियोंको देखकर उन्हें सुखपूर्वक यथास्थान ले गये ॥ ३६ ॥

उन स्त्रियोंके नगर स्वर्गसे भी सौ गुने मनोहर, मयदानवकी मायासे विनिर्मित तथा सुदृढ़ यन्त्रोंसे सुरक्षित थे । उन सभीको सुरक्षित करके उनका आलिंगन किये बिना ही वे दैत्य प्रतिज्ञा करके युद्धहेतु निकल पड़े । यदि देवगण हमें जीत लेंगे तो हम इन स्त्रियोंका स्पर्श भी नहीं करेंगे — ऐसा कहकर युद्धकी इच्छावाले वे समस्त महावीर दैत्य आकाशको पूरित - सा करते हुए तथा मेघोंको तृप्त [ -सा ] करते हुए पृथक् - पृथक् सिंहनाद करने लगे और शंख बजाने लगे ॥ ३७–४० ॥ देवगणोंका असुरोंके साथ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध देवासुर नामक भयानक संग्राम हुआ ॥ ४१ ॥

[ उस संग्राममें ] विष्णुके द्वारा सब प्रकारसे रक्षित सभी देवताओंकी विजय हुई । बहुत - से दैत्य देवताओं और विष्णुके द्वारा मार डाले गये और शेष दैत्य भाग गये । कुछ दैत्योंको देवताओं तथा महात्मा विविशुर्विवराणि च ॥ ४३ विष्णुने मोहित कर दिया । जो मरनेसे बचे, वे पाताल हतावशिष्टाः पातालं एवं [ पृथ्वीके ] विवरोंमें प्रवेश कर गये ॥ ४२-४३ ॥ महाबली विष्णुने हाथमें चक्र लेकर अत्युत्तम तान्विष्णुश्चक्रपाणिर्महाबलः । पातालमें जाकर भयभीत होकर स्थित हुए उन

अनुवव्राज गत्वा संस्थितान्भीतभीतवत् ॥ ४४ । दैत्योंका पीछा किया ॥४४ ॥

पातालं परमं

पृष्ठ 114

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२ एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्ददर्शामृतसम्भवाः कान्ताः पूर्णेन्दुवदना दिव्यलावण्यगर्विताः । संमोहितः कामबाणैर्लेभे तत्रैव निर्वृतिम् ताभिश्च वरनारीभिः क्रीडमानो बभूव ह

ताभ्यः पुत्रानजनयद्विष्णुर्वरपराक्रमान् ।

महीं सर्वा कंपयन्तो नानायुद्धविशारदान् ॥

ततो वै हरिपुत्रास्ते महाबलपराक्रमाः ।

महोपद्रवमाचेरुः स्वर्गे भुवि च दुःखदम् ॥

लोकोपद्रवमालक्ष्य निर्जरा मुनयोऽथ वै । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ । इसी बीच विष्णुने वहाँपर अमृतसे उत्पन्न पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली तथा दिव्य सौन्दयों हुई, ४५ | गर्वित स्त्रियोंको देखा और वे मोहित होकर वहीं । । उन श्रेष्ठ स्त्रियोंके साथ विहार करने लगे पर तथा ॥ ४६ उन्होंने वहाँ शान्ति प्राप्त की । ४५-४६ ॥ विष्णुने उन स्त्रियोंसे श्रेष्ठ पराक्रमवालेतथा / युद्ध करनेमें निपुण अनेक पुत्र उत्पन्न किये, जिनके ४७ । बलसे सारी पृथ्वी काँप उठती थी । तत्पश्चात् महाबलवान् एवं पराक्रमी वे विष्णुपुत्र सम्पूर्ण पृथ्वीको कम्पित ४८ करते हुए स्वर्गलोक तथा भूलोकमें दु: खद महान् उपद्रव करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ सारे संसारमें उनका [ इस प्रकारका ] उपद्रव चक्रुर्निवेदनं तेषां ब्रह्मणे प्रणिपत्य च ॥४ ९ देखकर मुनियों एवं देवताओंने ब्रह्माको प्रणामकर

तच्छ्रुत्वादाय तान्ब्रह्मा ययौ कैलासपर्वतम् ।

तत्र दृष्ट्वा शिवं देवं प्रणनाम पुनः पुनः ॥

तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्नतस्कन्धः कृताञ्जलिः ।

जय देव महादेव सर्वस्वामिन्निति ब्रुवन् ॥

ब्रह्मोवाच

देवदेव महादेव लोकान् रक्षाखिलान्प्रभो ।

उपद्रुतान्विष्णुपुत्रैः पातालस्थैर्विकारिभिः ॥

नारीष्वमृतभूतासु संसक्तात्मा हरिर्विभो ।

पाताले तिष्ठतीदानीं रमते हि विकारवान् ॥

नन्दीश्वर उवाच इत्थं बहुस्तुतः शम्भुर्ब्रह्मणा सर्षिनिर्जरैः । लोकसंरक्षणार्थाय विष्णोरानयनाय उनसे निवेदन किया ॥ ४ ९ ॥ यह सुनकर ब्रह्माजी उन्हें साथ लेकर कैलास ५० पर्वतपर गये । वहाँ प्रभु शिवजीको देखकर विनम्र भावसे अंजलि बाँधे हुए उन्होंने बारंबार प्रणाम किया तथा हे देव! हे महादेव! हे सर्वस्वामिन्! आपकी ५१ जय हो - ऐसा कहते हुए अनेक स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुति की ॥ ५०-५१ ॥ ब्रह्मा बोले — हे देवदेव! हे महादेव! हे प्रभो! पातालमें स्थित, विकारयुक्त तथा उपद्रवी विष्णुपुत्रोंसे ५२ [ सन्त्रस्त ] सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये ॥५२ ॥

हे विभो! विकारसे ग्रस्त होकर विष्णुजी अमृतसे ५३ उत्पन्न स्त्रियोंमें आसक्तचित्त होकर इस समय पातालमें स्थित हैं और उनके साथ स्थित हैं ॥ ५३ ॥

नन्दीश्वर बोले — इस प्रकार लोकसंरक्षणके लिये तथा पातालसे विष्णुको लानेके निमित्त ऋषियोंसहित च ॥५४ देवताओं तथा ब्रह्माने शिवजीकी बहुत स्तुति की ॥ ५४ ॥

ततः स भगवान् शम्भुः कृपासिंधुर्महेश्वरः तदनन्तर कृपासिन्धु भगवान् महेश्वर शिवने उस तदुपद्रवमाज्ञाय वृषरूपो । उपद्रवका वृत्तान्त जानकर वृषभका रूप धारण कर

बभूव ह ॥ ५५ । लिया ॥५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां विष्णूपद्रववृषावतारवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥ विष्णूपद्रववृषावतारवर्णन

पृष्ठ 115

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २३ ] शतरुद्रसंहिता १०३ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः विष्णुद्वारा भगवान् शिवके वृषभेश्वरावतारका स्तवन नन्दीश्वर उवाच

ततो वृषभरूपेण गर्जमानः पिनाकधृक् ।

प्रविष्टो विवरं तत्र निनदन्भैरवान् रवान् ॥

निपेतुस्तस्य निनदैः पुराणि नगराणि च ।

प्रकम्पो हि बभूवाथ सर्वेषां पुरवासिनाम् ॥

ततो वृषो हरेः पुत्रान्संग्रामोद्यतकार्मुकान् । शिवमायाविमूढात्ममहाबलपराक्रमान् ॥

हरिपुत्रास्ततस्तेऽथ प्राकुप्यन्मुनिसत्तम ।

प्रदुद्रुवुः प्रगर्योच्चैर्वीराः शङ्करसम्मुखम् ॥

आयातांस्तान्हरेः रेः पुत्रान् रुद्रो वृषभरूपधृक् ।

प्राकुप्यद्विष्णुपुत्रांश्च खुरैः शृंगैर्व्यदारयत् ॥

विदारितांगा रुद्रेण सर्वे हरिसुताश्च ते ।

नष्टा द्रुतं संबभूवुर्गतप्राणा विचेतसः ॥

हतेषु तेषु पुत्रेषु विष्णुर्बलवतां वरः ।

निष्क्रम्याथ प्रगर्योच्चैर्ययौ शीघ्रं हरान्तिकम् ॥

दृष्ट्वा रुद्रं प्रव्रजन्तं हतविष्णुसुतं वृषम् ।

शरैः सन्ताडयामास दिव्यैरस्त्रैश्च केशवः ॥

ततः क्रुद्धो महादेवो वृषरूपी महाबलः ।

अस्त्राणि तानि विष्णोश्च जग्रास गिरिगोचरः ॥

अथ कृत्वा महाकोपं वृषात्मा स महेश्वरः ।

विननाद महाघोरं कम्पयंस्त्रिजगन्मुने ॥

तत उत्प्लुत्य तरसा खुरैः शृंगैर्व्यदारयत् ।

विष्णुं क्रोधाकुलं मूढमजानन्तं निजं हरिम् ॥

नन्दीश्वर बोले — तब वृषभका रूप धारणकर गर्जन तथा भीषण ध्वनि करते हुए पिनाकधारी शिवजीने १ उस [ पातालके ] विवरमें प्रवेश किया ॥१ ॥

उनके निनादसे पुर और नगर सभी गिरने लगे २ एवं सभी नगरवासियोंको कँपकँपी होने लगी ॥२ ॥

उसके बाद वृषभरूप धारण करनेवाले शिवजी महेश्वरकी मायासे मोहित महान् बल तथा पराक्रमवाले ३ और संग्रामके लिये धनुष उठाये हुए विष्णुपुत्रोंके सम्मुख पहुँचे ॥३ ॥

हे मुनिसत्तम! तब वे वीर विष्णुपुत्र कुपित हो ४ उठे और जोर - जोरसे गर्जन करके शिवजीके सामने दौड़े ॥ ४ ॥

वृषरूपधारी महादेव भी [ अपने सामने ] आये ५ हुए विष्णुपुत्रोंपर कुपित हो उठे और खुरों तथा शृंगोंसे उन्हें विदीर्ण करने लगे ॥५ ॥

शिवजीके द्वारा क्षत - विक्षत किये गये शरीरवाले ६ वे सभी मूढ़ विष्णुपुत्र शीघ्र ही प्राणरहित हो विनष्ट हो गये ॥६ ॥

उन पुत्रोंके मारे जानेपर बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णु ७ [ पाताल - विवरसे ] शीघ्र बाहर निकलकर जोरसे गर्जना करके शिवजीके निकट जा पहुँचे ॥ ७ ॥

पुत्रोंको मारकर जाते हुए वृषभरूपधारी शिवजीको ८ देखकर विष्णुने बाणों तथा दिव्यास्त्रोंसे उनपर प्रहार किया ॥ ८ ॥

तब महाबलवान् कैलासनिवासी वृषभरूपधारी ९ शिवने क्रुद्ध होकर विष्णुके उन अस्त्रोंको निगल लिया ॥ ९ ॥

हे मुने! इसके बाद वृषभरूपधारी उन महेश्वरने १० अत्यन्त क्रोधकर तीनों लोकोंको कँपाते हुए महाघोर गर्जना की ॥१० ॥

क्रोधमें उन्मत्त हुए और अज्ञानवश [ शिवजीको ] अपना ईश्वर न माननेवाले विष्णुको बड़े वेगसे कूद-कूदकर अपने सींगों तथा खुरोंसे उन्होंने विदीर्ण कर ११ दिया ॥ ११ ॥

पृष्ठ 116

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०४ ततः स शिथिलात्मा हि व्यथितांगो बभूव ह तत्प्रहारमसह्याशु हरिर्मायाविमोहितः गतगर्वो हरिश्चैव विचेता गतचेतनः ज्ञातवान् परमेशानं विहरन्तं वृषात्मना अथ विज्ञाय गौरीशमागतं वृषरूपतः प्राह गम्भीरया वाचा नतस्कन्धः कृताञ्जलिः हरिरुवाच देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । मायया ते महेशान मोहितोऽहं विमूढधीः कृतं युद्धं त्वयेशेन स्वनाथेन मया प्रभो । कृपां कृत्वा मयि स्वामिन्सोऽपराधो हि सह्यताम् नन्दीश्वर उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हरेर्दीनतया मुने ।

भगवान् शङ्करः प्राह रमेशं भक्तवत्सलः ॥

हे विष्णो हे महाबुद्धे कथं मां ज्ञातवान्न हि ।

युद्धं कृतं कुतस्तेऽद्य ज्ञानं सर्वं च विस्मृतम् ॥

आत्मानं किन्न जानासि मदधीनपराक्रमम् ।

त्वया नात्र रतिः कार्या निवर्तस्व कुचारतः ॥

कामाधीनं कथं ज्ञानं स्त्रीषु सक्तो विहारकृत् ।

नोचितं तव देवेश स्मरणं विश्वतारणम् ॥

तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं विज्ञानप्रदमादरात् ।

व्रीड्यन्स्वमनसा विष्णुः प्राह वाचं महेश्वरम् ॥

विष्णुरुवाच

ममात्र विद्यते चक्रं तद् गृहीत्वेतदादरात् ।

गमिष्यामि स्वलोकं तं त्वदाज्ञापरिपालकः ॥

नन्दीश्वर उवाच

तदाकर्ण्य महेशानो वचनं वैष्णवं हरः ।

प्रत्युवाच वृषात्मा हि वृषरक्षः पुनर्हरिम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ तब मायासे विमोहित हुए विष्णु शिवजीके । प्रहारको सहनेमें असमर्थ होकर शीघ्र ही शिथिल ॥ १२ । मनवाले तथा व्यथित शरीरवाले हो गये ॥१२ ' ॥ । विष्णुका सारा गर्व चूर हो गया, वे चेतनाशून्य ॥ १३ होकर मूच्छित हो गये, तब उन्होंने वृषभरूपधारी शिवजीको जाना ॥ १३ ॥

। इसके बाद वृषभरूपसे आये हुए शिवजीको ॥ १४ पहचानकर विष्णुजी हाथ जोड़कर सिर झुकाका गम्भीर वाणीमें कहने लगे — ॥ १४ ॥

विष्णुजी बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे | करुणासागर! हे प्रभो! हे महेशान! आपकी मायासे ॥ १५ मोहित होनेके कारण मेरी बुद्धि विकृत हो गयी थी । हे प्रभो! हे स्वामिन्! मैंने अपने स्वामी आप शिवसे जो युद्ध किया, आप मुझपर कृपा करके उस ॥ १६ अपराधको क्षमा कीजिये ॥ १५-१६ ॥ नन्दीश्वर बोले - हे मुने! उन विष्णुकी दीनतापूर्ण यह बात सुनकर भक्तवत्सल भगवान् शंकरने विष्णुसे १७ कहा— ॥ १७ ॥

हे विष्णो! हे महाबुद्धे! आपने मुझे क्यों नहीं १८ पहचाना? आपका सारा ज्ञान किस प्रकार विस्मृत हो गया, जिसके कारण आज आपने मेरे साथ युद्ध किया? ॥ १८ ॥

आपने अपनेको मेरे अधीन पराक्रमवाला क्यों १ ९ नहीं समझा? अब आप पुनः ऐसा न कीजिये और इस कृत्यसे विरत हो जाइये ॥१ ९ ॥ आप इन स्त्रियोंमें आसक्त होकर विहार कर रहे २० हैं; भला कामी पुरुषको ज्ञान किस प्रकार रह सकता है? हे देवेश! यह आपके लिये उचित नहीं है, क्योंकि आपका स्मरण तो विश्वका तारण करनेवाला है ॥ २० ॥

शिवजीके इस विज्ञानप्रद वचनको सुनकर मन-२१ ही मन लज्जित होते हुए विष्णु आदरपूर्वक शिवजीसे यह वचन कहने लगे —॥२१ ॥

विष्णुजी बोले — हे प्रभो! यहाँ मेरा सुदर्शन चक्र है, इसे लेकर आपकी आज्ञाका आदरपूर्वक पालन २२ करनेवाला मैं [ अब ] अपने लोकको जाऊँगा ॥ २२ ॥

नन्दीश्वर बोले — तब वृषभरूपधारी धर्मरक्षक | महेश्वर शिवने उस वचनको सुनकर विष्णुसे पुनः २३ | कहा– ॥ २३ ॥

पृष्ठ 117

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २३ ] शतरुद्रसंहिता १०५

न विलम्बः प्रकर्त्तव्यो गन्तव्यमित आशु ते ।

मच्छासनाद्धरे लोके चक्रमत्रैव तिष्ठताम् ॥

सन्तानादित्यसंस्थानाच्छिवत्ववचनादपि 1 अहं घोरतरं तस्माच्चक्रमन्यद्ददामि ते ॥

एतदुक्त्वा हरोऽलेखीद्दिव्यं कालानलप्रभम् ।

परं चक्रं प्रदीप्तं हि सर्वदुष्टविनाशनम् ॥

विष्णवे प्रददौ चक्रं घोरार्कायुतसुप्रभम् ।

सर्वामरमुनीन्द्राणां रक्षकाय महात्मने ॥

लब्ध्वा सुदर्शनं चान्यच्चक्रं परमदीप्तिमत् ।

उवाच विबुधांस्तत्र विष्णुर्बुद्धिमतां वरः ॥

सर्वदेववरा यूयं मद्वाक्यं शृणुतादरात् ।

कर्तव्यं तत्तथा शीघ्रं ततः शं वो भविष्यति ॥

दिव्या वरांगनास्सन्ति पाताले यौवनान्विताः ।

ताभिः सार्द्धं महाक्रीडां यः करोतु करोतु सः ॥

तच्छ्रुत्वा केशवाद्वाक्यं शूरास्त्रिदशयोनयः ।

प्रवेष्टुकामाः पातालं बभूवुर्विष्णुना सह ॥

विचारमथ विज्ञाय तं तदा भगवान्हरः । क्रोधाच्छापं ददौ घोरं देवयोन्यष्टकस्य च हर उवाच वर्जयित्वा मुनिं शान्तं दानवान्वा मदंशजम् इदं यः प्रविशेत्स्थानं तस्य स्यान्निधनं क्षणात् श्रुत्वा वाक्यमिदं घोरं मनुष्यहितवर्धनम् प्रत्याख्यातास्तु रुद्रेण देवाः स्वगृहमाययुः स्त्रीलः परो विष्णुः शिवेन प्रतिशासितः हे हरे! इस समय आप देर न कीजिये और मेरी २४ आज्ञासे शीघ्र ही यहाँसे अपने लोक चले जाइये; चक्रको यहीं रहने दीजिये ॥ २४ ॥

हे विष्णो! मैं आपके कल्याणकारी वचनोंसे २५ प्रसन्न होकर ज्योतिर्मय सान्तानिक लोकमें स्थित, इससे भिन्न एक दूसरा चक्र प्रदान करता हूँ, जो अत्यन्त भयंकर है ॥ २५ ॥

[ नन्दीश्वर बोले- ] ऐसा कहकर शिवजीने २६ दिव्य कालाग्निके समान देदीप्यमान, अत्यन्त प्रज्वलित एवं दुष्टोंका नाश करनेवाला चक्र प्रकट किया और दस हजार सूर्योंकी - सी कान्तिवाले उस महाभयानक २७ चक्रको सभी देवताओं एवं मुनियोंके रक्षक महात्मा विष्णुको प्रदान किया ॥ २६-२७ ॥ तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुने अत्यन्त दीप्तिमान् उस दूसरे सुदर्शनचक्रको प्राप्तकर वहाँ [ स्थित ] २८ | देवगणोंसे कहा — आप सभी श्रेष्ठ देवतागण आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये और वैसा ही शीघ्र कीजिये; उसीसे २ ९ आपलोगोंका कल्याण होगा ॥ २८-२९ ॥ पाताललोकमें स्थित उन दिव्य स्त्रियोंका वरण ३० स्वेच्छासे आप लोग करें ॥३० ॥

विष्णुके उस वचनको सुनकर सभी शूर देवता उन विष्णुके साथ पातालमें प्रविष्ट होनेकी इच्छा ३१ करने लगे ॥३१ ॥

तब भगवान् शिवने देवताओंके इस विचारको जानकर क्रोधपूर्वक अष्टविध देवयोनियोंको घोर शाप ॥ ३२ दे दिया ॥३२ ॥

हर बोले — मेरे अंशसे उत्पन्न हुए शान्त । मुनि [ कपिलजी ] एवं दानवोंको छोड़कर जो इस ॥ ३३ स्थानमें प्रवेश करेगा, उसी समय उसकी मृत्यु हो जायगी ॥३३ ॥

मनुष्योंके हितको बढ़ानेवाले शिवजीके इस घोर । वाक्यको सुनकर तथा उनके द्वारा निषेध करनेपर ॥ ३४ देवतागण अपने - अपने स्थानको चले गये ॥३४ ॥

हे व्यास! इस प्रकार भगवान् शिवने अपनी मायाके प्रभावसे उनमें आसक्त हुए भगवान् विष्णुको । अनुशासित किया और तब विष्णु देवलोकको चले

एवं व्यास स्वास्थ्यं प्राप जगच्च तत् ॥ ३५ । गये तथा संसार सुखी हो गया ॥३५ ॥

स्वर्लोकमगमद्

पृष्ठ 118

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ १०६ । इस प्रकार देवताओंका कार्य करके वृषभरूपधारी वृषेश्वरोऽपि भगवान् शंकरो भक्तवत्सलः भक्तवत्सल भगवान् शिव अपने स्थान कैलासपर्वतपर इत्थं कृत्वा देवकार्यं जगाम स्वगिरीश्वरम् ॥ ३६ / चले गये ॥३६ ॥

वृषेश्वरावतारस्तु वर्णितः शङ्करस्य च विष्णुमोहहरः शर्वः त्रैलोक्यसुखकारकः पवित्रमिदमाख्यानं शत्रुबाधाहरं परम् स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम् ॥ य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वै समाहितः ।

तथा पठति यो हीदं पाठयेत् सुधियो नरान् ।

स भुक्त्वा सकलान् कामान् अन्ते मोक्षमवाप्नुयात् ॥

[ हे सनत्कुमार! ] मैंने शिवजीके वृषेश्वरावतारका । | वर्णन कर दिया, जो विष्णुके अज्ञानका हरण करनेवाला ॥ ३७ । कल्याणकारक तथा तीनों लोकोंको सुख, प्रदान करनेवाला है । यह आख्यान परम पवित्र, श्रेष्ठ । । शत्रुबाधाको दूर करनेवाला और सज्जनोंको स्वर्ग, ३८ आयु, भोग तथा मोक्ष देनेवाला है । जो भक्ति, यश, साथ सावधान होकर इसे सुनता है अथवा सुनाता है और जो इसे पढ़ता है तथा बुद्धिमान् मनुष्योंको पढ़ाता है, | वह [ इस लोकमें ] समस्त सुखोंको भोगकर अन्तमें ३ ९ । मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥३७–३९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां वृषेश्वरसंज्ञक-शिवावतारवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें वृषेश्वरसंज्ञक शिवावतारवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः भगवान् शिवके पिप्पलादावतारका वर्णन नन्दीश्वर उवाच पिप्पलादाख्यमपरमवतारं महेशितुः शृणु प्राज्ञ महाप्रीत्या भक्तिवर्धनमुत्तमम् यः पुरा गदितो विप्रो दधीचिर्मुनिसत्तमः महाशैवः सुप्रतापी च्यावनिर्भृगुवंशजः क्षुवेण सह संग्रामे येन विष्णुः पराजितः सनिर्जरोऽथ संशप्तो महेश्वरसहायिना तस्य पत्नी महाभागा सुवर्चा नाम नामतः महापतिव्रता साध्वी यया शप्ता दिवौकसः तस्मात्तस्यां महादेवो नानालीलाविशारदः प्रादुर्बभूव तेजस्वी पिप्पलादेति नामतः सूत उवाच इत्याकर्ण्य मुनिश्रेष्ठो नन्दीश्वरवचोऽद्भुतम् । सनत्कुमारः प्रोवाच नतस्कन्धः कृताञ्जलिः नन्दीश्वर बोले- हे प्राज्ञ! अब आप महेश्वरके । पिप्पलाद नामक भक्तिवर्धक अन्य अवतारको अत्यन्त ॥ १ प्रसन्नतासे सुनिये ॥१ ॥

। महाप्रतापी, भृगुवंशमें उत्पन्न, महान् शिवभक्त ॥ २ तथा मुनिश्रेष्ठ जिन च्यवनपुत्र विप्र दधीचिके विषयमें मैं पहले कह चुका हूँ और जिन्होंने क्षुवके साथ । युद्धमें विष्णुको पराजित किया तथा महेश्वरकी कृपा ॥ ३ प्राप्तकर देवताओंसहित विष्णुको शाप दियाथा । उनकी सुवर्चा नामक महाभाग्यवती, महापतिव्रता एवं ॥ ४ साध्वी पत्नी थीं, जिन्होंने देवताओंको शाप दिया था ॥ उन मुनिसे उन्हीं सुवर्चाके गर्भसे अनेक लीलाएँ ॥ ५ । करनेमें प्रवीण तेजस्वी महादेव पिप्पलाद - इस नामसे उत्पन्न हुए॥२-५ ॥ सूतजी बोले- नन्दीश्वरके इस अद्भुत वचनको | सुनकर हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर मुनिश्रेष्ठ ॥ ६ सनत्कुमार कहने लगे - ॥ ६ ॥

पृष्ठ 119

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २४ ] शतरुद्रसंहिता १०७ सनत्कुमार उवाच

नन्दीश्वर महाप्राज्ञ साक्षाद् रुद्रस्वरूपधृक् ।

धन्यस्त्वं सद्गुरुस्तात श्रावितेयं कथाद्भुता ॥

क्षुवेण सह संग्रामे श्रुतो विष्णुपराजयः ।

ब्रह्मणा मे पुरा तात तच्छापश्च शिलादज ॥

अधुना श्रोतुमिच्छामि देवशापं सुवर्चया ।

दत्तं पश्चात् पिप्पलादचरितं मङ्गलायनम् ॥

सूत उवाच

इति श्रुत्वाथ शैलादिर्विधिपुत्रवचः शुभम् ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥

नन्दीश्वर उवाच

एकदा निर्जराः सर्वे वासवाद्या मुनीश्वर ।

वृत्रासुरसहायैश्च दैत्यैरासन्पराजिताः ॥

स्वानि स्वानि वरास्त्राणि दधीचस्याश्रमेऽखिलाः ।

निःक्षिप्य सहसा सद्योऽभवन् देवाः पराजिताः ॥

तदा सर्वे सुराः सेन्द्रा वध्यमानास्तथर्षयः ।

ब्रह्मलोकं गताः शीघ्रं प्रोचुः स्वं व्यसनं च तत् ॥

तच्छ्रुत्वा देववचनं ब्रह्मा लोकपितामहः ।

सर्वं शशंस तत्त्वेन त्वष्टुश्चैव चिकीर्षितम् ॥

भवद्वधार्थं जनितस्त्वष्ट्रायं तपसा सुराः ।

वृत्रो नाम महातेजाः सर्वदैत्याधिपो महान् ॥

अथ प्रयत्नः क्रियतां भवेदस्य वधो यथा ।

तत्रोपायं शृणु प्राज्ञ धर्महेतोर्वदामि ते ॥

महामुनिर्दधीचिर्यः स तपस्वी जितेन्द्रियः । लेभे शिवं समाराध्य वज्रास्थित्ववरं पुरा सनत्कुमार बोले – हे महाप्राज्ञ! हे नन्दीश्वर! हे तात! आप साक्षात् शिवस्वरूप हैं, आप धन्य हैं ७ तथा आप ही सद्गुरु हैं, जो कि आपने यह अद्भुत कथा सुनायी है ॥७ ॥

हे शिलादपुत्र! हे तात! क्षुवके साथ संग्राममें ८ विष्णुको जिस प्रकार शिवभक्त दधीचिने पराजित किया था तथा उन्हें शाप दिया था, उस कथाको मैंने पहले ब्रह्माजीसे सुना था ॥८ ॥

अब मैं [ पहले ] सुवर्चाके द्वारा देवताओंको ९ दिये गये शाप [ के वृत्तान्तको ] तथा बादमें कल्याणके निवासभूत पिप्पलादचरित्रको सुनना चाहता हूँ ॥ ९ ॥

सूतजी बोले- तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारका यह शुभ वचन सुनकर शिवजीके चरणकमलका ध्यानकर १० शिलादपुत्र प्रसन्नचित्त होकर कहने लगे- ॥ १० ॥

नन्दीश्वर बोले - हे मुनीश्वर! किसी समय इन्द्रादि सभी देवताओंको वृत्रासुरकी सहायतासे दैत्योंने ११ पराजित कर दिया ॥ ११ ॥

तब उन सभी देवताओंने सहसा दधीचि मुनिके १२ आश्रममें अपने श्रेष्ठ अस्त्रोंको फेंक दिया और तत्काल पराजय स्वीकार कर ली । इसके बाद आदि सभी पीड़ित देवता एवं ऋषिगण १३ तथा अपना वह दु: ख निवेदित किया ॥ देवताओंके वचनको सुनकर १४ ब्रह्माने उनसे त्वष्टाका सारा मन्तव्य कह दिया ॥१४ ॥

[ ब्रह्माजी बोले- ] हे देवताओ! शीघ्र ही इन्द्र ब्रह्मलोक गये १२-१३ ॥ लोकपितामह यथार्थ रूपसे त्वष्टाने अपनी १५ तपस्याके प्रभावसे आपलोगोंका वध करनेके लिये इसे उत्पन्न किया है; सम्पूर्ण दैत्योंका स्वामी यह वृत्र महान् तेजस्वी है ॥ १५ ॥

अतः आप लोग वैसा प्रयत्न कीजिये, जिस १६ प्रकार इसका वध हो सके । हे प्राज्ञ! मैं धर्मकी रक्षाके लिये वह उपाय आपको बता रहा हूँ; आप उसे सुनें ॥ १६ ॥

जो जितेन्द्रिय तथा तपस्वी दधीचि नामक महामुनि हैं, उन्होंने पूर्वकालमें शिवजीकी आराधनाकर वज्रके समान हड्डियोंवाला होनेका वरदान पाया ॥ १७ | था ॥ १७ ॥

पृष्ठ 120

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ १०८

तस्यास्थीन्येव याचध्वं स दास्यति न संशयः ।

निर्माय तैर्दण्डवज्रं वृत्रं जहि न संशयः ॥ १८

नन्दीश्वर उवाच

तच्छ्रुत्वा ब्रह्मवचनं शक्रो गुरुसमन्वितः ।

आगच्छत्सामरः सद्यो दधीच्याश्रममुत्तमम् ॥१ ९

दृष्ट्वा तत्र मुनिं शक्रः सुवर्चान्वितमादरात् ।

ननाम साञ्जलिर्नम्रः सगुरुः सामरश्च तम् ॥ २०

तदभिप्रायमाज्ञाय स मुनिर्बुधसत्तमः ।

स्वपत्नीं प्रेषयामास सुवर्चां स्वाश्रमान्तरम् ॥ २१

ततस्स देवराजश्च सामरः स्वार्थसाधकः ।

अर्थशास्त्रपरो भूत्वा मुनीशं वाक्यमब्रवीत् ॥ २२

शक्र उवाच

त्वष्ट्रा विप्रकृताः सर्वे वयं देवास्तथर्षयः ।

शरण्यं त्वां महाशैवं दातारं शरणं गताः ॥ २३

स्वास्थीनि देहि नो विप्र महावज्रमयानि हि ।

अस्थ्ना ते स्वपविं कृत्वा हनिष्यामि सुरद्रुहम् ॥ २४

इत्युक्तस्तेन स मुनिः परोपकरणे रतः ।

ध्यात्वा शिवं स्वनाथं हि विससर्ज कलेवरम् ॥ २५

ब्रह्मलोकं गतः सद्यः स मुनिर्ध्वस्तबन्धनः ।

पुष्पवृष्टिरभूत्तत्र सर्वे विस्मयमागताः ॥ २६

अथ गां सुरभिं शक्र आहूयाशु ह्यलेहयत् ।

अस्त्रनिर्मितये त्वाष्ट्रं निर्दिदेश तदस्थिभिः ॥ २७

विश्वकर्मा तदाज्ञप्तश्चक्लृपेऽस्त्राणि कृत्स्नशः ।

तदस्थिभिर्वज्रमयैः ।

सुदृढैः शिववर्चसा ॥ २८

आपलोग [ उनके पास जाकर ] अस्थियोंके | लिये याचना कीजिये, वे अवश्य दे देंगे; इसमें संशय नहीं है । इसके बाद उन अस्थियोंसे दण्डवज्रका । निर्माणकर निःसन्देह वृत्रासुरका वध कीजिये ॥ १८ नन्दीश्वर बोले – [ हे मुने! ] ब्रह्माका ॥ यह वचन सुनकर देवगुरु बृहस्पति तथा देवताओंको साथ | लेकर इन्द्र शीघ्र ही दधीचि ऋषिके उत्तम आश्रमपर आये ॥१ ९ ॥ वहाँ सुवर्चासहित मुनिको बैठे देखकर गुरु एवं | देवताओं सहित इन्द्रने हाथ जोड़कर विनम्र हो आदरपूर्व उन्हें प्रणाम किया ॥ २० ॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ उन मुनिने उनका अभिप्राय जानकर पत्नी सुवर्चाको आश्रमके भीतर भेज दिया ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् देवताओंसहित देवराज इन्द्रने, जो स्वार्थसाधनमें बड़े दक्ष थे, अपने प्रयोजनमें तत्पर हो करके मुनीश्वरसे यह वाक्य कहा— ॥२२ ॥

शक्र बोले- [ हे मुने! ] हम देवताओं तथा ऋषियोंको यह त्वष्टा बड़ा दुःख दे रहा है । इसलिये हमलोग महाशिवभक्त, शरणागतवत्सल तथा महादानी आपकी शरणमें आये हुए हैं ॥२३ ॥

विप्र! आप अपनी वज्रमयी अस्थियाँ हमें प्रदान कीजिये; क्योंकि हमलोग आपकी हड्डियोंसे वज्रका निर्माणकर देवद्रोही वृत्रासुरका वध करना चाहते हैं ॥ २४ ॥

इन्द्रके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परोपकारपरायण उन मुनिने अपने स्वामी शिवका ध्यान करके [ अपना ] शरीर छोड़ दिया ॥ २५ ॥

वे मुनि कर्मबन्धनसे छुटकारा पाकर शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये । उस समय वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी और सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये ॥ २६ ॥

तदनन्तर इन्द्रने शीघ्र ही सुरभि गौको बुलाकर उसके द्वारा उन्हें चटवाया और उनकी अस्थियोंसे अस्त्रनिर्माण करनेके निमित्त विश्वकर्माको आज्ञा प्रदान की ॥ २७ ॥

उनकी आज्ञा प्राप्त करके विश्वकर्माने शिवजीके तेजसे अत्यन्त दृढ़ वज्रमयी उन अस्थियोंसे सम्पूर्ण अस्त्रोंका निर्माण कर दिया ॥२८ ॥