शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 101–110
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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अ ० १ ९ ] शतरुद्रसंहिता ८ ९
एक एव मया ध्यात ईश्वरः पुत्रहेतवे ।
यः कश्चिदीश्वरः ख्यातो जगतां स्वस्त्रिया सह ॥
यूयं त्रयस्सुराः कस्मादागता वरदर्षभाः ।
एतन्मे संशयं छित्त्वा ततो दत्तेप्सितं वरम् ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यूचुस्ते सुरास्त्रयः ।
यादृक्कृतस्ते संकल्पस्तथैवाभून्मुनीश्वर ॥
वयं त्रयो भवेशानाः समाना वरदर्षभाः ।
अस्मदंशभवास्तस्माद्भविष्यन्ति सुतास्त्रयः ॥
विदिता भुवने सर्वे पित्रोः कीर्तिविवर्द्धनाः । इत्युक्त्वा ते त्रयो देवाः स्वधामानि ययुर्मुदा
वरं लब्ध्वा मुनिः सोऽथ जगाम स्वाश्रमं मुदा ।
युतोऽनसूयया प्रीतो ब्रह्मानन्दप्रदो मुने ॥
अथ ब्रह्मा हरिः शम्भुरवतेरुः स्त्रियां ततः । पुत्ररूपैः प्रसन्नास्ते नानालीलाप्रकाशकाः विधेरंशाद्विधुर्जज्ञेऽनसूयायां मुनीश्वरात् । आविर्बभूवोदधितः क्षिप्तो देवैः स एव हि विष्णोरंशात् स्त्रियां तस्यामत्रेर्दत्तो व्यजायत संन्यासपद्धतिर्येन वर्द्धिता परमा मुने दुर्वासा मुनिशार्दूलः शिवांशान्मुनिसत्तम । जज्ञे तस्यां स्त्रियामत्रेर्वरधर्मप्रवर्तकः भूत्वा रुद्रश्च दुर्वासा ब्रह्मतेजोविवर्द्धनः चक्रे धर्मपरीक्षां च बहूनां स दयापरः सूर्यवंशे समुत्पन्नो योऽम्बरीषो नृपोऽभवत् तत्परीक्षामकार्षीत्स तां शृणु त्वं मुनीश्वर सोऽम्बरीषो नृपवरः सप्तद्वीपरसापतिः नियमं हि चकारासावेकादश्यां व्रते दृढम् एकादश्या व्रतं कृत्वा द्वादश्यां चैव पारणाम् करिष्यामीति सुदृढसंकल्पस्तु नराधिपः मैंने तो सपत्नीक [ तपोनिरत होकर ] पुत्रकी १८ कामनासे केवल एकमात्र जो इस सारे जगत्के ईश्वर हैं, उन्हींका ध्यान किया था । किंतु वरदाताओंमें श्रेष्ठ आप तीनों देवता यहाँ कैसे उपस्थित हुए हैं; मेरे इस १ ९ संशयको दूरकर मुझे अभीष्ट वर दीजिये ॥ १८-१९ ॥ उनकी यह बात सुनकर उन तीनों देवताओंने २० कहा - हे मुनिराज! जैसा आपने संकल्प किया था, वैसा ही हुआ है, हम ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों ही समानरूपसे इस जगत्के ईश्वर हैं, इसलिये वर २१ देनेके लिये उपस्थित हुए हैं, अतः हमलोगोंके अंशसे आपके तीन पुत्र उत्पन्न होंगे । वे सभी जगत्में प्रसिद्ध होकर माता एवं पिताकी कीर्तिको बढ़ानेवाले होंगे । ॥ २२ ऐसा कहकर वे तीनों देवता प्रसन्न हो अपने - अपने धामको चले गये ॥ २०–२२ ॥ हे मुने! ब्रह्मानन्दके प्रदाता अत्रि मुनि भी वर २३ प्राप्तकर हर्षित हो अनसूयाके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानपर चले आये ॥२३ ॥
तब अनेक लीलाओंको करनेवाले वे ब्रह्मा, ॥ २४ विष्णु एवं शिव प्रसन्न हो पुत्ररूपसे अनसूयाके गर्भसे उत्पन्न हुए । समय पूर्ण होनेपर मुनीश्वरके द्वारा अनसूयासे ब्रह्माके अंशसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए, किंतु ॥ २५ देवताओंके द्वारा समुद्रमें डाल देनेके कारण वे पुनः समुद्रसे उत्पन्न हुए ॥ २४-२५ ॥ । हे मुने! विष्णुके अंशसे अत्रिके द्वारा उन ॥ २६ अनसूयासे दत्तात्रेय उत्पन्न हुए, जिन्होंने सर्वोत्तम संन्यासपद्धतिका संवर्धन किया ॥ २६ ॥
हे मुनिसत्तम! अत्रिके द्वारा उन अनसूयासे ॥ २७ शिवके अंशसे श्रेष्ठ धर्मका प्रचार करनेवाले मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उत्पन्न हुए । रुद्रने दुर्वासाके रूपमें प्रकट । होकर ब्रह्मतेजको बढ़ाया और दयापूर्वक बहुतों के ॥ २८ धर्मकी परीक्षा भी ली ॥ २७-२८ ॥ । हे मुनीश्वर! सूर्यवंशमें उत्पन्न जो अम्बरीष ॥ २ ९ नामक राजा थे, उनकी परीक्षा दुर्वासाने ली थी; उस आख्यानको आप सुनिये ॥ २ ९ ॥ । वे नृपश्रेष्ठ अम्बरीष सात द्वीपोंवाली पृथ्वीके स्वामी ॥ ३० थे । एकादशीके व्रतमें स्थित होकर वे दृढ़ नियमका । पालन करते थे । उन राजाका यह दृढ़ संकल्प था कि मैं ॥ ३१ एकादशीव्रतकर द्वादशीको पारण करूँगा ॥ ३०-३१ ॥
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९ ० ज्ञात्वा तन्नियमं तस्य दुर्वासा मुनिसत्तमः तदन्तिकं गतः शिष्यैर्बहुभिः शङ्करांशजः ॥ पारणे द्वादशीं स्वल्पां ज्ञात्वा यावत्स भोजनम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ । शंकरजीके अंशसे उत्पन्न हुए मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ३२ उनके उस नियमको जानकर अपने अनेक साथ ले उनके समीप गये ॥३२ ॥
उस दिन स्वल्प द्वादशी जानकर राजाने [ पारण | करनेके लिये ] ज्यों ही भोजन करनेका विचार किया कर्त्तुं व्यवसितस्तावदागतं स न्यमन्त्रयत् ॥३३ | उसी समय शिष्योंसहित दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे,
ततः स्नानार्थमगमद्दुर्वासाः शिष्यसंयुतः ।
विलम्बं कृतवांस्तत्र परीक्षार्थं मुनिर्बहु ॥
धर्मविघ्नं तदा ज्ञात्वा स नृपः शास्त्रशासनात् ।
जलं प्राश्यास्थितस्तत्र तदागमनकांक्षया ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र दुर्वासा मुनिरागतः ।
कृताशनं नृपं ज्ञात्वा परीक्षार्थं धृताकृतिः ॥
चुक्रोधाति नृपे तस्मिन्परीक्षार्थं वृषस्य सः ।
प्रोवाच वचनं तूग्रं स मुनिः शङ्करांशजः ॥
दुर्वासा उवाच
मां निमन्त्र्य नृपाभोज्य जलं पीतं त्वयाधम ।
दर्शयामि फलं तस्य दुष्टदण्डधरो ह्यहम् ॥
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो नृपं दग्धुं समुद्यतः ।
समुत्तस्थौ द्रुतं चक्रं तत्स्थं रक्षार्थमैश्वरम् ॥
प्रजज्वालाति तं चक्रं मुनिं दग्धुं सुदर्शनम् ।
शिवरूपं तमज्ञात्वा शिवमायाविमोहितम् ॥
एतस्मिन्नन्तरे व्योमवाण्युवाचाशरीरिणी ।
अम्बरीषं महात्मानं ब्रह्मभक्तं च वैष्णवम् ॥
व्योमवाण्युवाच
सुदर्शनमिदं चक्रं हरये शम्भुनार्पितम् ।
शान्तं कुरु प्रज्वलितमद्य दुर्वाससे नृप ॥
, तब । राजाने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया ॥३३ ॥ इसके बाद मुनि दुर्वासा शिष्योंके साथ स्नान ३४ करनेके लिये चले गये और राजाकी परीक्षा लेने के । लिये उन्होंने वहाँ बहुत विलम्ब कर दिया ॥३४ ॥
तब धर्ममें विघ्न जानकर राजा शास्त्रकी आज्ञासे ३५ जलका प्राशन करके दुर्वासाके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ ३५ ॥
इसी बीच महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे और ३६ राजाको जलप्राशन किया जानकर उनकी परीक्षा लेनेके लिये [ महर्षिने भयानक ] आकृति धारण कर ली और अत्यन्त क्रुद्ध हो गये । शिवके अंशसे उत्पन्न ३७ हुए वे दुर्वासा धर्मकी परीक्षा करनेके उद्देश्यसे राजासे कठोर वचन कहने लगे ॥ ३६-३७ ॥ दुर्वासा बोले- हे अधम नृप! तुमने मुझे निमन्त्रण देकर बिना भोजन कराये ही जल पी लिया । ३८ मैं तुम्हें उसका फल दिखाता हूँ; क्योंकि मैं दुष्टोंको दण्ड देनेवाला हूँ ॥३८ ॥
इतना कहकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले वे ज्यों ही ३ ९ राजाको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए, इतनेमें ही राजाके भीतर रहनेवाला ईश्वरका चक्र उनकी रक्षाके लिये शीघ्रता से प्रकट हो गया ॥३ ९ ॥ वह सुदर्शन चक्र शिवमायासे विमोहित ४० शिवस्वरूप मुनि दुर्वासाको न जानकर उन्हें जलाने के लिये भयंकर रूपमें जल उठा । इसी समय अशरीरी ४१ | आकाशवाणीने विष्णुप्रिय ब्राह्मणभक्त महात्मा अम्बरीषसे कहा— ॥ ४०-४१ ॥ आकाशवाणी बोली - हे राजन्! शिवजीने ही यह सुदर्शन चक्र विष्णुको प्रदान किया है; दुर्वासाको जलानेके लिये प्रज्वलित चक्रको इस समय ४२ शीघ्र शान्त कीजिये ॥ ४२ ॥
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अ ० १ ९ ] दुर्वासायं शिवः साक्षात्स चक्रं हरयेऽर्पितम् । एवं साधारणमुनिं न जानीहि नृपोत्तम तव धर्मपरीक्षार्थमागतोऽयं मुनीश्वरः शरणं याहि तस्याशु भविष्यत्यन्यथा लयः नन्दीश्वर उवाच इत्युक्त्वा च नभोवाणी विरराम मुनीश्वर अस्तावीत्स हरांशं तमम्बरीषोऽपि चादरात् ॥ अम्बरीष उवाच यद्यस्ति दत्तमिष्टं च स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः कुलं नो विप्रदैवं चेद्धरेरस्त्रं प्रशाम्यतु यदि नो भगवान्प्रीतो मद्भक्तो भक्तवत्सलः सुदर्शनमिदं चास्त्रं प्रशाम्यतु विशेषतः नन्दीश्वर उवाच इति स्तुवति रुद्राग्रे शैवं चक्रं सुदर्शनम् अशाम्यत्सर्वथा ज्ञात्वा तं शिवांशं सुलब्धधीः अथाम्बरीषः स नृपः प्रणनाम च तं मुनिम् शिवावतारं संज्ञाय स्वपरीक्षार्थमागतम् सुप्रसन्नो बभूवाथ स मुनिः शङ्करांशजः भुक्त्वा तस्मै वरं दत्त्वा स्वाभीष्टं स्वालयं ययौ अम्बरीषपरीक्षायां दुर्वासश्चरितं मुने प्रोक्तमन्यच्चरित्रं त्वं शृणु तस्य मुनीश्वर पुनर्दाशरथेश्चक्रे परीक्षां नियमेन वै मुनिरूपेण कालेन यः कृतो नियमो मुने शतरुद्रसंहिता ९ १ ये दुर्वासा साक्षात् शिव हैं; इन्होंने ही विष्णुको ॥ ४३ यह चक्र प्रदान किया है । हे नृपश्रेष्ठ! इन्हें सामान्य । मुनि मत समझिये । ये मुनीश्वर आपके धर्मकी परीक्षाके ॥४४ लिये आये हैं, अतः शीघ्र ही इनकी शरणमें जाइये, नहीं तो प्रलय हो जायगा॥४३-४४ ॥ नन्दीश्वर बोले - हे मुनीश्वर! ऐसा कहकर । आकाशवाणी शान्त हो गयी, तब वे अम्बरीष भी ४५ शिवके अंशस्वरूप उन मुनिकी स्तुति आदरसे करने लगे ॥ ४५ ॥
अम्बरीषजी बोले- यदि मैंने दान किया है, । इष्टापूर्त किया है, अपने धर्मका भलीभाँति अनुष्ठान ॥ ४६ किया है और हमारा कुल ब्रह्मण्य है, तो विष्णुका यह अस्त्र शान्त हो जाय ॥४६ ॥
। यदि मेरे द्वारा सेवित भक्तवत्सल भगवान् मुझपर ॥ ४७ प्रसन्न हैं तो यह सुदर्शनचक्र विशेष रूपसे शान्त हो जाय ॥ ४७ ॥
नन्दीश्वर बोले - हे मुनीश्वर! इस प्रकार । रुद्रांशभूत दुर्वासाके आगे अम्बरीषके स्तुति करनेपर ॥ ४८ [ आकाशवाणीसे ] प्रेरित बुद्धिवाला वह शैव सुदर्शन चक्र उन्हें शिवांश जानकर पूर्ण रूपसे शान्त हो गया ॥ ४८ ॥
। इसके बाद उन राजा अम्बरीषने अपनी परीक्षाके ॥ ४ ९ निमित्त आये हुए उन मुनिको शिवावतार जानकर उन्हें प्रणाम किया ॥४ ९ ॥ । तदनन्तर शिवजीके अंशसे उत्पन्न वे मुनि अत्यन्त ॥ ५० प्रसन्न हो गये और भोजन करके अभीष्ट वर प्रदानकर । अपने स्थानको चले गये । हे मुने! मैंने अम्बरीषकी परीक्षामें दुर्वासाका चरित्र कह दिया । हे मुनीश्वर! अब ॥ ५१ आप उनका दूसरा चरित्र सुनिये ॥ ५०-५१ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने दशरथपुत्र रामकी नियमसे परीक्षा ली । काल जब मुनिका रूप धारणकर श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट करनेके लिये पहुँचा, तब उसने रामसे एक अनुबन्ध किया [ और कहा - मैं आपसे कुछ बात करूँगा । किंतु यदि उस समय कोई तीसरा पहुँचा तो वह आपका वध्य होगा । रामचन्द्रजीने तथास्तु कहकर लक्ष्मणको पहरेपर नियुक्त कर दिया और कालसे एकान्तमें बातचीत करने । लगे । इसी बीच वहाँ दुर्वासा पहुँचे । ] उन्होंने लक्ष्मणसे ॥ ५२ । कहा- मैं आवश्यक कार्यसे रामचन्द्रसे मिलना चाहता
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९ २ तदैव मुनिना तेन सौमित्रिः प्रेषितो हठात् तं तत्याज द्रुतं रामो बन्धुं प्रणवशान्मुने
सा कथा विदिता लोके मुनिभिर्बहुधोदिता ।
नातो मे विस्तरात्प्रोक्ता ज्ञाता यत्सर्वथा बुधैः ॥
नियमं सुदृढं दृष्ट्वा सुप्रसन्नोऽभवन्मुनिः ।
दुर्वासा सुप्रसन्नात्मा वरं तस्मै प्रदत्तवान् ॥
श्रीकृष्णनियमस्यापि परीक्षां स चकार ह ।
तां शृणु त्वं मुनिश्रेष्ठ कथयामि कथां च ताम् ॥
ब्रह्मप्रार्थनया विष्णुर्वसुदेवसुतोऽभवत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ । । हूँ । लक्ष्मणजीने इधर रामकी प्रतिज्ञा, उधर दुर्वासाका शाप — इस प्रकार दोनों ओरसे असमंजसमें पड़कर विचार ॥ ५३। किया कि ब्रह्मशापसे दग्ध होना अच्छा नहीं | उन्होंने दुर्वासाके आनेका समाचार श्रीरामको दे, दिया अतः हे मुने! इस प्रकार दुर्वासाके द्वारा हठपूर्वक भेजे जानेपर । | श्रीरामने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार तत्क्षण लक्ष्मणको त्याग दिया॥५२-५३ ॥ महर्षियोंने यह कथा बहुधा कही है, जिसके ५४ कारण यह लोकमें प्रसिद्ध है । अतः इसे विस्तारसे | नहीं कहा; क्योंकि बुद्धिमान् लोग तो इस कथाको जानते ही हैं ॥५४ ॥
महर्षि दुर्वासा उनके इस अत्यन्त दृढ़ नियमको ५५ देखकर सन्तुष्ट हुए और प्रसन्नचित्त हो उन्हें वर प्रदान किया ॥ ५५ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने श्रीकृष्णके नियमकी भी ५६ परीक्षा ली थी; मैं उस कथाको कह रहा हूँ, आप उसे सुनिये । ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे पृथ्वीका भार उतारनेके धराभारावतारार्थं साधूनां रक्षणाय च ॥५७ लिये एवं साधुओंकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णु
हत्वा दुष्टान्महापापान् ब्रह्मद्रोहकरान्खलान् ।
ररक्ष निखिलान्साधून्ब्राह्मणान्कृष्णनामभाक् ॥
ब्रह्मभक्तिं चकाराति स कृष्णो वसुदेवजः ।
नित्यं हि भोजयामास सुरसान्ब्राह्मणान्बहून् ॥
ब्रह्मभक्तो विशेषेण कृष्णश्चेति प्रथामगात् ।
सन्द्रष्टुकामः स मुनिः कृष्णान्तिकमगान्मुने ॥
रुक्मिणीसहितं कृष्णं सन्नं कृत्वा रथे स्वयम् ।
संयोज्य संस्थितो वाहं सुप्रसन्न उवाह तम् ॥
मुनी रथात्समुत्तीर्य दृष्ट्वा तां दृढतां पराम् ।
तस्मै भूत्वा सुप्रसन्नो वज्राङ्गत्ववरं ददौ ॥
द्युनद्यामेकदा स्नानं कुर्वन्नग्नो बभूव ह ।
लज्जितोऽभून्मुनिश्रेष्ठो दुर्वासाः कौतुकी मुने ॥
वसुदेवके पुत्ररूपमें अवतरित हुए ॥ ५६-५७ ॥
श्रीकृष्ण नामवाले विष्णुने ब्रह्मद्रोही खलों, दुष्टों ५८ एवं महापापियोंका संहार करके समस्त साधुओं एवं ब्राह्मणोंकी रक्षा की ॥ ५८ ॥
वे वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण ब्राह्मणोंके प्रति अत्यधिक ५ ९ भक्ति रखते थे और प्रतिदिन बहुत - से ब्राह्मणोंको सरस भोजन कराते थे ॥५ ९ ॥ श्रीकृष्ण ब्राह्मणोंके विशेषरूपसे भक्त हैं ' जब ६० वे इस प्रसिद्धिको प्राप्त हुए, तब हे मुने! उन्हें देखनेकी इच्छासे वे ( दुर्वासा ) मुनि कृष्णके पास पहुँचे ॥ ६० ॥
उन्होंने श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणीको रथमें जोत दिया ६१ और उस रथपर स्वयं सवार होकर [ उन्हें ] हाँकने लगे । श्रीकृष्ण [ एवं रुक्मिणी ] -ने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस रथका वहन किया ॥ ६१ ॥
[ ब्राह्मणके विषयमें ] उन दोनोंकी इतनी बड़ी ६२ दृढ़ता देखकर रथसे उतरकर मुनिने प्रसन्न हो उन्हें वज्रके समान अंगवाला होनेका वर दिया ॥६२ ॥
हे मुने! एक समय गंगाजीमें स्नान करते हुए मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा नग्न हो गये थे; उस समय वे ६३ कौतुकी मुनि लज्जाका अनुभव करने लगे ॥६३ ॥
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अ ० २० ] शतरुद्रसंहिता
तज्ज्ञात्वा द्रौपदी स्नानं कुर्वती तत्र चादरात् ।
तल्लज्जा छादयामास भिन्नस्वाञ्चलदानतः ॥ ६४
तदादाय प्रवाहेनागतं स्वनिकटं मुनिः ।
तेनाच्छाद्य स्वगुह्यं च तस्यै तुष्टो बभूव सः ॥ ६५
द्रौपद्यै च वरं प्रादात्तदञ्चलविवर्द्धनम् ।
पाण्डवान्सुखिनश्चक्रे द्रौपदी तद्वरात्पुनः ॥ ६६
हंसडिम्भौ नृपौ कौचित्स्वावमानकरौ खलौ ।
दत्त्वा निदेशं च हरेर्नाशयामास स प्रभुः ॥ ६७
ब्रह्मतेजो विशेषेण स्थापयामास भूतले ।
संन्यासपद्धतिं चैव यथाशास्त्रविधिक्रमम् ॥ ६८
बहूनुद्धारयामास सूपदेशं विबोध्य च ।
ज्ञानं दत्त्वा विशेषेण बहून्मुक्तांश्चकार सः ॥ ६ ९
इत्थं चक्रे स दुर्वासा विचित्रं चरितं बहु ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं शृण्वतः सर्वकामदम् ॥ ७०
य इदं शृणुयाद्भक्त्या दुर्वासश्चरितं मुदा ।
श्रावयेद्वा परान् यश्च स सुखीह परत्र च ॥ ७१
९ ३ उस समय वहाँ स्नान कर रही द्रौपदीने यह जानकर अपना आँचल फाड़कर तथा उसे आदरपूर्वक प्रदान करके उनकी लज्जाको ढँक दिया था ॥ ६४ ॥
इस प्रकार प्रवाहके द्वारा अपने समीप आये उस वस्त्रको लेकर वे मुनि अपने गुह्य अंगको उससे ढँककर उस [ द्रौपदी ] -पर प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदीको उसके आँचलके बढ़नेका वर दिया । समय आनेपर उसी वरदानके प्रभावसे द्रौपदीने पाण्डवोंको सुखी बनाया ॥ ६५-६६ ॥ हंस एवं डिम्भ नामक महाखल कोई दो राजा थे । उन्होंने दुर्वासाका अनादर किया । तब इन्हीं दुर्वासाने श्रीकृष्णको सन्देश देकर उनका नाश करवाया ॥ ६७ ॥
उन्होंने पृथ्वीपर विशेषरूपसे ब्रह्मतेज और शास्त्रकी रीतिके अनुसार संन्यासपद्धतिकी स्थापना की ॥ ६८ ॥
उन्होंने अत्यन्त सुन्दर उपदेश देकर बहुतोंका उद्धार किया और विशेष रूपसे ज्ञान देकर बहुतोंको मुक्त भी कर दिया ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार उन दुर्वासाने अनेक विचित्र चरित्र किये । [ दुर्वासाका ] यह चरित्र श्रवण करनेवालेको धन, यश तथा आयु प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है ॥ ७० ॥
जो दुर्वासाके इस चरित्रको प्रीतिपूर्वक सुनता है अथवा जो प्रसन्नतापूर्वक दूसरोंको सुनाता है, वह इस । लोकमें एवं परलोकमें सुखी रहता है ॥७१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां दुर्वासश्चरितवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें दुर्वासाचरित-वर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः शिवजीका हनुमान्के रूपमें अवतार तथा उनके चरितका वर्णन नन्दीश्वर उवाच अतः परं शृणु प्रीत्या हनुमच्चरितं मुने यथा चकाराशु हरो लीलास्तद्रूपतो वराः चकार सुहितं प्रीत्या रामस्य परमेश्वरः तत्सर्वं चरितं विप्र शृणु सर्वसुखावहम् नन्दीश्वर बोले- हे मुने! अब इसके पश्चात् । शिवजीने जिस प्रकार हनुमान्जीके रूपमें अवतार ॥ १ लेकर मनोहर लीलाएँ कीं, उस हनुमच्चरित्रको प्रेमपूर्वक सुनिये ॥ १ ॥
उन परमेश्वरने प्रेमपूर्वक [ हनुमद्रूपसे ] । श्रीरामका परम हित किया, हे विप्र! सर्वसुखकारी ॥ २ उस सम्पूर्ण चरित्रका श्रवण कीजिये ॥२ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० ९ ४
एकस्मिन्समये शम्भुरद्भुतोतिकरः प्रभुः ।
ददर्श मोहिनीरूपं विष्णोः स हि वसेद्गुणः ॥
चक्रे स्वं क्षुभितं शम्भुः कामबाणहतो यथा ।
स्वं वीर्यं पातयामास रामकार्यार्थमीश्वरः ॥
तद्वीर्यं स्थापयामासुः पत्रे सप्तर्षयश्च ते ।
प्रेरिता मनसा तेन रामकार्यार्थमादरात् ॥
तैर्गौतमसुतायां तद्वीर्यं शम्भोर्महर्षिभिः ।
कर्णद्वारा तथाञ्जन्यां रामकार्यार्थमाहितम् ॥
ततश्च समये तस्माद्धनूमानिति नामभाक् ।
शम्भुर्जज्ञे कपितनुर्महाबलपराक्रमः ॥
हनूमान्स कपीशानः शिशुरेव महाबलः ।
रविबिम्बं बभक्षाशु ज्ञात्वा लघुफलं प्रगे ॥
देवप्रार्थनया तं सोऽत्यजज्ज्ञात्वा महाबलम् ।
शिवावतारं च प्राप वरान्दत्तान् सुरर्षिभिः ॥
स्वजनन्यन्तिकं प्रागादथ सोऽतिप्रहर्षितः ।
हनूमान्सर्वमाचख्यौ तस्यै तद् वृत्तमादरात् ॥
तदाज्ञया ततो धीरः सर्वविद्यामयत्नतः ।
सूर्यात्पपाठ स कपिर्गत्वा नित्यं तदन्तिकम् ॥
सूर्याज्ञया तदंशस्य सुग्रीवस्यान्तिकं ययौ ।
मातुराज्ञामनुप्राप्य रुद्रांशः कपिसत्तमः ॥
ज्येष्ठभ्रात्रा वालिना हि स्वस्त्रीभोक्त्रा तिरस्कृतः ।
ऋष्यमूकगिरौ तेन न्यवसत्स हनूमता ॥
ततोऽभूत्स सुकण्ठस्य मन्त्री कपिवरः सुधीः ।
सर्वथा सुहितं चक्रे सुग्रीवस्य हरांशजः ॥
एक बार अत्यन्त अद्भुत लीला करनेवाले | सर्वगुणसम्पन्न उन भगवान् शिवने विष्णुके मोहिनी तथा रूपको देखा ॥३ ॥
[ उस मोहिनी रूपको देखते ही ] कामबाण ४ | आहतकी भाँति शम्भुने अपनेको विक्षुब्ध कर दिया | और उन ईश्वरने श्रीरामके कार्यके लिये अपने तेजका उत्सर्ग कर दिया ॥४ ॥
शिवजीके मनकी प्रेरणासे प्रेरित हुए सप्तर्षियोंने ५ उनके तेजको रामकार्यके लिये आदरपूर्वक पत्तेपर स्थापित कर दिया ॥५ ॥
तत्पश्चात् उन महर्षियोंने शम्भुके उस तेजको श्रीरामके कार्यके लिये गौतमकी कन्या अंजनीमें ६ कानके माध्यमसे स्थापित कर दिया ॥ ६ ॥
समय आनेपर वह शम्भुतेज महान् बल तथा ७ पराक्रमवाला और वानर शरीरवाला होकर हनुमान्के नामसे प्रकट हुआ ॥ ७ ॥
वे महाबलवान् कपीश्वर हनुमान् जब शिशु ही ८ थे, उसी समय प्रात: काल उदय होते हुए सूर्यबिम्बको छोटा फल जानकर निगल गये थे ॥ ८ ॥
तब देवताओंकी प्रार्थनासे उन्होंने सूर्यको उगल ९ दिया । उन्हें महाबली शिवावतार जानकर देवताओं तथा ऋषियोंके द्वारा प्रदत्त वरोंको उन्होंने प्राप्त किया॥९॥
तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्न हनुमान्जी अपनी १० माताके निकट गये और आदरपूर्वक उनसे वह वृत्तान्त कह सुनाया ॥१० ॥
इसके बाद माताकी आज्ञासे नित्यप्रति सूर्यके ११ पास जाकर धैर्यशाली हनुमान्जीने बिना यत्नके ही उनसे सारी विद्याएँ पढ़ लीं ॥११ ॥
उसके बाद माताकी आज्ञा प्राप्तकर रुद्रके १२ अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी सूर्यकी आज्ञासे [ प्रेरित हो ] सूर्यके अंशसे उत्पन्न हुए सुग्रीवके पास गये । वे सुग्रीव अपने ज्येष्ठ भ्राता वालि, जिसने उनकी स्त्रीका १३ बलात् हरण कर लिया था, तिरस्कृत हो ऋष्यमूक पर्वतपर हनुमान्जीके साथ निवास करने लगे ॥ १२-१३ ॥ तब वे सुग्रीवके मन्त्री हो गये । शिवजीके अंशसे उत्पन्न परम बुद्धिमान् कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीने सब १४ प्रकारसे सुग्रीवका हित किया । उन्होंने भाई [ लक्ष्मण ]
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अ ० २० ]
तत्रागतेन सभ्रात्रा हृतभार्येण दुःखिना ।
कारयामास रामेण तस्य सख्यं सुखावहम् ॥
घातयामास रामश्च वालिनं कपिकुञ्जरम् ।
भ्रातृपल्याश्च भोक्तारं पापिनं वीरमानिनम् ॥
ततो रामाज्ञया तात हनूमान्वानरेश्वरः । स सीतान्वेषणं चक्रे बहुभिर्वानरैः सुधीः ज्ञात्वा लङ्कागतां सीतां गतस्तत्र कपीश्वरः । शतरुद्रसंहिता ९ ५ के साथ वहाँ आये हुए अपहृत पत्नीवाले दुखी रामके १५ साथ उनकी सुखदायी मित्रता करवायी ॥ १४-१५ ॥ रामचन्द्रजीने भाईकी स्त्रीके साथ रमण करनेवाले, १६ महापापी एवं अपनेको वीर माननेवाले कपिराज वालिका वध कर दिया ॥ १६ ॥
हे तात! तदनन्तर वे महाबुद्धिमान् वानरेश्वर ॥ १७ हनुमान् रामचन्द्रजीकी आज्ञासे बहुतसे वानरोंके साथ सीताकी खोजमें लग गये ॥१७ ॥
सीताको लंकामें विद्यमान जानकर वे कपीश्वर द्रुतमुल्लंघ्य सिंधुं तमनिस्तीर्यं परैः स वै ॥ १८ दूसरोंके द्वारा न लाँघे जा सकनेवाले उस समुद्रको चक्रेऽद्भुतचरित्रं स तत्र विक्रमसंयुतम् । अभिज्ञानं ददौ प्रीत्या सीतायै स्वप्रभोर्वरम् सीताशोकं जहाराशु स वीरः कपिनायकः श्रावयित्वा रामवृत्तं तत्प्राणावनकारकम् तदभिज्ञानमादाय निवृत्तो रामसन्निधिम् रावणाराममाहत्य जघान बहुराक्षसान् तदैव रावणसुतं हत्वा सबहुराक्षसम् स महोपद्रवं चक्रे महोतिस्तत्र निर्भयः यदा दग्धो रावणेनावगुण्ठ्य वसनानि च तैलाभ्यक्तानि सुदृढं महाबलवता मुने उत्प्लुत्योत्प्लुत्य च तदा महादेवांशजः कपिः ददाह लंकां निखिलां कृत्वा व्याजं तमेव हि दग्ध्वा लंकां वंचयित्वा विभीषणगृहं ततः अपतद्वारिधौ वीरस्ततः स कपिकुञ्जरः स्वपुच्छं तत्र निर्वाप्य प्राप तस्य परं तटम् अखिन्नः स ययौ रामसन्निधिं गिरिशांशजः अविलंबेन सुजवो हनूमान् कपिसत्तमः रामोपकण्ठमागत्य ददौ सीताशिरोमणिम् बड़ी शीघ्रतासे लाँघकर वहाँ गये ॥१८ ॥
वहाँ उन्होंने पराक्रमयुक्त अद्भुत कार्य किया ॥ १ ९ और जानकीको प्रीतिपूर्वक अपने प्रभुका उत्तम । [ मुद्रिकारूप ] चिह्न प्रदान किया । जानकीके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला रामवृत्त सुनाकर उन वीर वानरनायकने ॥ २० शीघ्र ही उनके शोकको दूर कर दिया ॥ १ ९ -२० ॥ । उन्होंने रावणकी अशोकवाटिका उजाड़कर बहुत-॥ २१ से राक्षसोंका वध कर दिया; फिर सीतासे स्मरणचिह्न लेकर रामचन्द्रके पास लौटने लगे ॥ २१ ॥
। उस समय महालीला करनेवाले उन्होंने अत्यन्त ॥ २२ निर्भय होकर रावणके पुत्र तथा अनेक राक्षसोंको मारकर वहाँ लंकामें महान् उपद्रव किया ॥२२ ॥
। हे मुने! जब महाबलशाली रावणने तैलसे ॥ २३ सने हुए वस्त्रोंको उनकी पूँछमें दृढ़तापूर्वक लपेटकर उसमें आग लगा दी, तब महादेवके अंशसे उत्पन्न । हनुमान्जीने इसी बहानेसे कूद - कूदकर समस्त लंकाको ॥ २४ जला दिया ॥ २३-२४ ॥ । तदनन्तर वे कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान् [ केवल ] ॥ २५ विभीषणके घरको छोड़कर सारी लंकाको जला करके समुद्रमें कूद पड़े ॥ २५ ॥
। वहाँ अपनी पूँछ बुझाकर शिवके अंशसे उत्पन्न ॥ २६ वे समुद्रके दूसरे किनारेपर आये और प्रसन्न होकर श्रीरामजीके पास गये ॥२६ ॥
सुन्दर वेगवाले कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीने शीघ्रतापूर्वक । श्रीरामके निकट जाकर उन्हें सीताजीकी चूड़ामणि ॥ २७ | प्रदान की ॥ २७ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० ९ ६
ततस्तदाज्ञया वीरः सिन्धौ सेतुमबन्धयत् ।
वानरैः स समानीय बहून् गिरिवरान् बली ॥
गत्वा तत्र ततो रामस्तर्तुकामो यथा ततः ।
शिवलिंगं समानर्च प्रतिष्ठाप्य जयेप्सया ॥
तद्वरात्स जयं प्राप्य वरं तीर्त्वादधिं ततः ।
लंकामावृत्य कपिभी रणं चक्रे स राक्षसैः ॥
जघानाथासुरान्वीरो रामसैन्यं ररक्ष सः ।
शक्तिक्षतं लक्ष्मणं च संजीविन्या ह्यजीवयत् ॥
सर्वथा सुखिनं चक्रे सरामं लक्ष्मणं हि सः ।
सर्वसैन्यं ररक्षासौ महादेवात्मजः प्रभुः ॥
रावणं परिवाराढ्यं नाशयामास विश्रमः ।
सुखीचकार देवान्स महाबलग्रहः कपिः ॥
महिरावणसंज्ञं स हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ।
तत्स्थानादानयामास स्वस्थानं परिपाल्य च ॥
रामकार्यं चकाराशु सर्वथा कपिपुङ्गवः ।
असुरान्नमयामास नानालीलां चकार च ॥
स्थापयामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वरः ।
स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीतारामसुखप्रदः ॥
लक्ष्मणप्राणदाता च सर्वदेवमदापहः ।
रुद्रावतारो भगवान्भक्तोद्धारकरः स वै ॥
हनुमान्स महावीरो रामकार्यकरः सदा ।
रामदूताभिधो लोके दैत्यघ्नो भक्तवत्सलः ॥
इति ते कथितं तात हनुमच्चरितं वरम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥
तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे वानरोंके साथ बलवान् तथा वीर हनुमान्जीने अनेक विशाल पर्वतोंको उन २८ लाकर समुद्रपर पुल बाँधा ॥ २८ ॥
तब पार जानेकी कामनावाले श्रीरामचन्द्रजीने
२ ९ विजय प्राप्त करनेकी इच्छासे शिवलिंगको यथाविधि '।
। प्रतिष्ठितकर तदुपरान्त उसका पूजन किया ॥ २ ९ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने पूज्यतम शिवजीसे विजयका ३० | वरदान प्राप्त करके समुद्र पारकर वानरोंके साथ ' लंकाको घेरकर राक्षसोंसे युद्ध किया ॥ ३० ॥
उन वीर हनुमान्ने राक्षसोंका वध किया ३१ श्रीरामचन्द्रजीकी सेनाकी रक्षा की तथा शक्तिसे घायल, लक्ष्मणको संजीवनी बूटीके द्वारा पुनः जीवित कर दिया ॥३१ ॥
इस प्रकार महादेवके पुत्र प्रभु उन हनुमान्जीने ३२ लक्ष्मणसहित श्रीरामजीको सब प्रकारसे सुखी बनाया और सम्पूर्ण सेनाकी रक्षा की ॥ ३२ ॥
महान् बल धारण करनेवाले उन कपिने बिना ३३ श्रमके परिवारसहित रावणका विनाश किया और देवताओंको सुखी बनाया ॥३३ ॥
उन्होंने महिरावण नामक राक्षसको मारकर ३४ लक्ष्मणसहित रामकी रक्षा करके उसके स्थानसे उन्हें अपने स्थानपर ला दिया ॥३४ ॥
इस प्रकार उन कपिपुंगवने सब प्रकारसे श्रीरामका ३५ कार्य शीघ्र ही सम्पन्न किया, असुरोंका वध किया एवं नाना प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ ३५ ॥
सीतारामको सुख देनेवाले वानरराजने स्वयं ३६ श्रेष्ठ भक्त होकर भूलोकमें रामभक्तिकी स्थापना की ॥ ३६ ॥
वे लक्ष्मणके प्राणोंके रक्षक, सभी देवताओंका ३७ गर्व चूर करनेवाले, रुद्रके अवतार, भगवत्स्वरूप और भक्तोंका उद्धार करनेवाले थे ॥३७ ॥
वे हनुमान्जी महावीर, सदा रामका कार्य सिद्ध ३८ करनेवाले, लोकमें रामदूतके रूपमें विख्यात, दैत्योंका संहार करनेवाले तथा भक्तवत्सल थे ॥ ३८ ॥
हे तात! इस प्रकार मैंने हनुमान्जीका श्रेष्ठ चरित्र | कहा, जो धन, यश, आयु तथा सम्पूर्ण कामनाओंका ३ ९ फल देनेवाला है ॥ ३ ९ ॥
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अ ० २१ ] शतरुद्रसंहिता ९ ७ य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । जो सावधान होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें सभी सुखोंको स भुक्त्वेहाखिलान्कामान् अन्ते मोक्षं लभेत्परम् ॥ ४० | भोगकर अन्तमें परम मोक्षको प्राप्त करता है ॥४० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां हनुमदवतारचरित्रवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें हनुमदवतारचरित्र-वर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः शिवजीके महेशावतार - वर्णनक्रममें अम्बिकाके शापसे भैरवका वेतालरूपमें पृथ्वीपर अवतरित होना नन्दीश्वर उवाच
अथ प्रीत्या शृणु मुनेऽवतारं परमं प्रभोः ।
शङ्करस्यात्मभूपुत्र शृण्वतां सर्वकामदम् ॥ १
एकदा मुनिशार्दूल गिरिजाशङ्करावुभौ ।
विहर्तुकामौ संजातौ स्वेच्छया परमेश्वरौ ॥ २
भैरवं द्वारपालं च कृत्वाभ्यन्तरमागतौ ।
नानासखिगणैः प्रीत्या सेवितौ नरशीलितौ ॥ ३
चिरं विहृत्य तत्र द्वौ स्वतन्त्रौ परमेश्वरौ ।
बभूवतुः प्रसन्नौ तौ नानालीलाकरौ मुने ॥ ४
अथोन्मत्ताकृतिर्देवी स्वतन्त्रा लीलया शिवा ।
आगता द्वारि तद्रूपा प्रभोराज्ञामवाप सा ॥
तां देवीं भैरवः सोऽथ नारीदृष्ट्या विलोक्य च ।
निषिषेध बहिर्गन्तुं तद्रूपेण विमोहितः ॥ ६
नारीदृष्ट्या सुदृष्टा सा भैरवेण यदा मुने ।
क्रुद्धाभवच्छिवा देवी तं शशाप तदाऽम्बिका ॥ ७
शिवोवाच
नारीदृष्ट्या पश्यसि त्वं यतो मां पुरुषाधम ।
अतो भव धरायां हि मानुषस्त्वं च भैरव ॥ ८
नन्दीश्वर उवाच
इत्थं यदाभवच्छप्तो भैरवः शिवया मुने ।
हाहाकारो महानासीद्दुःखमाप स लीलया ॥ ९
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_5_1_Front नन्दीश्वर बोले – हे मुने! हे ब्रह्मपुत्र! अब शिवजीके एक और श्रेष्ठ अवतारको प्रीतिपूर्वक सुनिये, जो सुननेवालोंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥१ ॥
हे मुनिशार्दूल! एक बार परमेश्वर शिव एवं गिरिजा अपनी इच्छासे विहार करनेके लिये तत्पर हुए । भैरवको द्वारपालके रूपमें स्थापितकर वे भीतर आ गये और अनेक सखियोंसे प्रेमपूर्वक सेवित हो मनुष्यके समान लीला करने लगे॥२-३ ॥ हे मुने! इस प्रकार वहाँ बहुत कालतक विहारकर अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले तथा स्वतन्त्र वे दोनों ही परमेश्वर परम प्रसन्न हुए ॥ ४ ॥
तदनन्तर परम स्वतन्त्र वे शिवा लीलावशात् उन्मत्त वेषमें शिवजीकी आज्ञासे द्वारपर आयीं ॥५ ॥
तब उन देवीको [ साधारण ] नारीकी दृष्टिसे देखकर उनके [ उस उन्मत्त ] रूपसे भ्रमित हुए भैरवने उन्हें बाहर जानेसे रोका ॥६ ॥
हे मुने! जब भैरवने [ देवीको एक सामान्य ] नारीकी दृष्टिसे देखा, तब वे देवी शिवा क्रोधित हो गयीं और उन अम्बिकाने उन्हें शाप दे दिया ॥७ ॥
शिवा बोलीं – हे पुरुषाधम! हे भैरव! तुम मुझे [ सामान्य ] स्त्रीकी दृष्टिसे देख रहे हो, इसलिये तुम पृथ्वीपर मनुष्यरूप धारण करो ॥८ ॥
नन्दीश्वर बोले – हे मुने! इस प्रकार जब पार्वतीने
भैरवको शाप दे दिया, तब महान् हाहाकार मच गया ।
[ पार्वतीकी इस ] लीलासे भैरव अत्यन्त दुखी हुए ॥ ९ ॥
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९ ८ ततश्च शङ्करः शीघ्रं तमागत्य मुनीश्वर आश्वासयद्भैरवं हि नानानुनयकोविदः
तच्छापाद्भैरवः सोऽथ क्षिताववतरन्मुने ।
मनुष्ययोन्यां वैतालसंज्ञकः शङ्करेच्छया ॥
तत्स्नेहतः शिवः सोऽपि क्षिताववतरद्विभुः । शिवया सह सल्लीलो लौकिकीं गतिमाश्रितः
महेशाह्वः शिवश्चासीच्छारदा गिरिजा मुने ।
सुलीलां चक्रतुः प्रीत्या नानालीलाविशारदौ ॥
इति ते कथितं तात महेशचरितं वरम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः ।
स भुक्त्वेहाखिलान्भोगानन्ते मोक्षमवाप्नुयात् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ । हे मुनीश्वर! इसके बाद अनेकविध अनुनय-॥ १० विनयमें प्रवीण श्रीशिवजीने शीघ्रतासे वहाँ आकर भैरवको आश्वस्त किया । हे मुने! तब उस शापसे | शिवजीकी इच्छासे वे भैरव पृथ्वीपर मनुष्ययोनिम एवं ११ वेताल नामसे उत्पन्न हुए॥१०-११ ॥ उनके स्नेहसे लौकिक गतिका आश्रय ग्रहणकर ॥ १२ उत्तम लीलाओंवाले वे प्रभु शिवजी भी पार्वतीके साथ पृथ्वीपर अवतरित हुए ॥ १२ ॥
हेमुने! शिवजी महेश नामसे तथा पार्वतीजी शारदा १३ नामसे प्रसिद्ध हुईं और नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेमें प्रवीण वे दोनों प्रेमपूर्वक उत्तम लीला करते रहे ॥ १३ ॥
हे तात! इस प्रकार मैंने शिवजीके उत्तम १४ चरित्रका वर्णन आपसे किया, जो धन, यश, आयु तथा सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है । जो मनुष्य सावधानचित्त होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको १५ । भोगकर अन्तमें मुक्तिको प्राप्त कर लेता है ॥ १४-१५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां महेशावतारवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें महेशावतारवर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः IIII शिवके वृषेश्वरावतार - वर्णनके प्रसंगमें समुद्रमन्थनकी कथा नन्दीश्वर उवाच
शृणु ब्रह्मसुत प्राज्ञ वृषेशाख्यं मुनीश्वर ।
शिवावतारं सल्लीलं हरिगर्वहरं वरम् ॥
पुरा देवासुराः सर्वे जरामृत्युभयार्दिताः ।
परस्परं च संधाय रत्नान्यादित्सवोऽभवन् ॥
ततः सुरासुराः सर्वे क्षीरोदं सागरोत्तमम् ।
उद्यता मथितुं तं च बभूवुर्मुनिनन्दन ॥
आसन् शुचिस्मिताः सर्वे केनेदं मन्धनं भवेत् ।
स्वकार्यसिद्धये तस्य ब्रह्मन्निति सुरासुराः ॥
नन्दीश्वर बोले — हे ब्रह्मसुत! हे प्राज्ञ! हे मुनीश्वर! अब आप भगवान् विष्णुके अहंकारको १ नष्ट करनेवाले तथा श्रेष्ठ लीलासे परिपूर्ण शिवजीके वृषेश्वर नामक उत्तम अवतारको सुनें ॥१ ॥
पूर्व समयमें जरा एवं मृत्युसे भयभीत हुए २ देवताओं एवं असुरोंने आपसमें सन्धिकर समुद्रसे रत्न ग्रहण करनेका विचार किया ॥२ ॥
हे मुनिनन्दन! तदनन्तर सभी देवता और ३ असुर समुद्रोंमें श्रेष्ठ क्षीरसागरको मथनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३ ॥
हे ` ब्रह्मन्! मधुर मुसकानवाले सभी देवता तथा असुर अपनी कार्यसिद्धिके लिये विचार करने लगे कि ४ किस उपायसे उस क्षीरसागरका मन्थन किया जाय ॥ ४ ॥
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