शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 131–140
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
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अ ० २७ ] नन्दीश्वर उवाच
ततः स तस्या वचनं प्रतिनन्द्य महेश्वरः ।
ताः सर्वाश्च तया सार्धं निनाय स्वं परं पदम् ॥
वैश्यनाथावतारस्ते वर्णितः परमो मया ।
महानन्दासुखकरो भक्तानन्दप्रदः सदा ॥
इदं चरित्रं परमं पवित्रं
सतां च सर्वप्रदमाशु दिव्यम् ।
शिवावतारस्य विशाम्पतेर्महा-नन्दामहासौख्यकरं विचित्रम् ॥
इदं यः शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः च्यवते न स्वधर्मात्स परत्र लभते गतिम् ॥ शतरुद्रसंहिता ११ ९ नन्दीश्वर बोले - – [ हे मुने! ] इसके उपरान्त शिवजीने उसके वचनका आदरकर उसके सहित उन ६२ सबको अपने परम पदकी प्राप्ति करायी ॥६२ ॥
मैंने वैश्यनाथके परम अवतारका वर्णन आपसे ६३ कर दिया, जो महानन्दाको सुख देनेवाला तथा भक्तोंको सदा आनन्द देनेवाला है ॥ ६३ ॥
शिवके अवताररूप वैश्यनाथका यह दिव्य चरित्र परम पवित्र, सत्पुरुषोंको शीघ्र सब कुछ देनेवाला, महानन्दाको परम सुख देनेवाला तथा अद्भुत है ॥ ६४ ॥
६४ जो भक्तिसहित सावधान होकर इसे सुनता है । अथवा सुनाता है, वह अपने धर्मसे पतित नहीं होता, ६५ । और परलोकमें [ उत्तम ] गति प्राप्त करता है ॥ ६५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां वैश्यनाथाह्वय - शिवावतारवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें वैश्यनाथ नामवाले शिवावतारका वर्णन नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः भगवान् शिवके नन्दीश्वर उवाच
शृणु तात प्रवक्ष्यामि शिवस्य परमात्मनः ।
द्विजेश्वरावतारं च सशिवं सुखदं सताम् ॥
यः पूर्वं वर्णितस्तात भद्रायुर्नृपसत्तमः ।
यस्मिन्नृषभरूपेणानुग्रहं कृतवाञ्छिवः ॥
तद्धर्मस्य परीक्षार्थं पुनराविर्बभूव सः ।
द्विजेश्वरस्वरूपेण तदेव कथयाम्यहम् ॥
ऋषभस्य प्रभावेण शत्रूञ्जित्वा रणे प्रभुः ।
प्राप्तसिंहासनस्तात भद्रायः संबभूव ह ॥
चन्द्रांगदस्य तनया सीमन्तिन्याः शुभाङ्गजा ।
पत्नी तस्याभवद् ब्रह्मन् सुसाध्वी कीर्तिमालिनी ॥
स भद्रायुः कदाचित्स्वप्रियया गहनं वनम् ।
प्राविशत्संविहारार्थं वसन्तसमये मुने ॥
अथ तस्मिन्वने रम्ये विजहार स भूपतिः ।
शरणागतपालिन्या तया स्वप्रियया सह ॥
द्विजेश्वरावतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले- हे तात! अब मैं सज्जनोंके लिये कल्याणकारी तथा उन्हें सुख देनेवाले परमात्मा शिव १ द्विजेश्वरावतारका वर्णन करता हूँ, उसे सुनिये ॥१ ॥
हे तात! मैंने पहले जिन नृपश्रेष्ठ भद्रायुका वर्णन किया था और जिनपर शिवजीने ऋषभरूप २ धारणकर अनुग्रह किया था, उन्हींके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये वे पुनः द्विजेश्वरस्वरूपसे प्रकट हुए थे, ३ उसी वृत्तान्तको मैं कह रहा हूँ॥२-३ ॥ हे तात! उन प्रभविष्णु राजा भद्रायुने ऋषभके ४ प्रभावसे संग्राममें समस्त शत्रुओंको जीतकर राज्यसिंहासन प्राप्त किया । हे ब्रह्मन्! राजा चन्द्रांगदकी सीमन्तिनी नामक पत्नीसे उत्पन्न सुन्दरी पुत्री तथा ५ परम साध्वी कीर्तिमालिनी उनकी पत्नी हुई ॥ ४-५ ॥ हे मुने! किसी समय उन भद्रायुने वसन्तकालमें ६ अपनी पत्नीके साथ वनविहार करनेके लिये घने वनमें प्रवेश किया । इसके बाद वे राजा उस सुरम्य वनमें शरणागतोंका पालन करनेवाली अपनी प्रियाके ७ साथ विहार करने लगे॥६-७ ॥
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१२० अथ तद्धर्मदृढतां प्रतीक्षन्परमेश्वरः लीलां चकार तत्रैव शिवया सह शंकरः शिवा शिवश्च भूत्वोभौ तद्वने द्विजदम्पती व्याघ्रं मायामयं कृत्वाविर्भूतौ निजलीलया अथाविदूरे तस्यैव द्रवन्तौ भयविह्वलौ अन्वीयमानौ व्याघ्रेण रुदन्तौ तौ बभूवतुः अथ विद्धौ च तौ तात भद्रायुः स महीपतिः ददर्श क्रन्दमानौ हि शरण्यः क्षत्रियर्षभः अथ तौ मुनिशार्दूल स्वमायाद्विजदम्पती भद्रायुषं महाराजमूचतुर्भयविह्वलौ द्विजदम्पती ऊचतुः पाहि पाहि महाराज नावुभौ धर्मवित्तम एष आयाति शार्दूलो जग्धुमावां महाप्रभो एष हिंस्रः कालसमः सर्वप्राणिभयङ्करः यावन्न खादति प्राप्य तावन्नौ रक्ष धर्मवित् नन्दीश्वर उवाच
इत्थमाक्रन्दितं श्रुत्वा तयोश्च नृपतीश्वरः ।
अति शीघ्रं महावीरः स यावद्धनुराददे ॥
तावदभ्येत्य शार्दूलः त्वरमाणोऽतिमायिकः ।
स तस्य द्विजवर्यस्य मध्ये जग्राह तां वधूम् ॥
हे नाथ नाथ हे कान्त हा शम्भो हा जगद्गुरो ।
इति रोरूयमानां तां व्याघ्रो जग्रास भीषणः ॥
तावत्स राजा निशितैर्भल्लैर्व्याघ्रमताडयत् ।
न स तैर्विव्यथे किंचिद्गिरीन्द्र इव वृष्टिभिः ॥
स शार्दूलो महासत्त्वो राज्ञः स्वैरकृतव्यथः ।
बलादाकृष्य तां नारीमपाक्रमत सत्वरः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ । तब उनके धर्मकी दृढ़ताकी परीक्षाके लिये ॥ ८ पार्वतीसहित भगवान् शिवने वहींपर एक लीला की ॥८ ॥
शिवजी और पार्वतीजी द्विजदम्पती बनकर तथा । अपनी लीलासे एक मायामय व्याघ्रको बनाकर उस ॥ ९ वनमें प्रकट हुए॥९॥
। वे दोनों द्विजदम्पती जहाँ राजा विहार कर रहे ॥ १० थे, वहींसे थोड़ी दूरपर व्याघ्रद्वारा पीछा किये जानेपर भयसे व्याकुल होकर दौड़ते, रोते - चिल्लाते हुए । राजाके समीप पहुँचे । शरणागतवत्सल एवं क्षत्रियोंमें ॥ ११ श्रेष्ठ उन राजा भद्रायने व्याघ्रसे आक्रान्त होकर ' हे तात! ' चिल्लाते हुए उन दोनोंको देखा ॥ १०-११ ॥ । हे मुनिश्रेष्ठ! अपनी मायासे द्विजदम्पती बने हुए ॥१२ उन दोनोंने भयसे व्याकुल होकर महाराज भद्रायुसे इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥
द्विजदम्पती बोले- हे महाराज! हे धर्मवित्तम! । हम दोनोंकी रक्षा कीजिये । हे महाप्रभो! हम दोनोंको ॥ १३ खानेके लिये यह व्याघ्र आ रहा है । हे धर्मज्ञ! यह हिंसक, कालसदृश तथा सभी प्राणियोंके लिये भयंकर व्याघ्र आकर जबतक हम दोनोंको खा न ले, उसके ॥ १४ पहले ही आप इस व्याघ्रसे हमलोगोंको बचा लीजिये ॥ १३-१४ ॥ नन्दीश्वर बोले- उन महावीर राजाने उन दोनोंका करुण क्रन्दन सुनकर ज्यों ही अत्यन्त १५ शीघ्रतापूर्वक धनुष धारण किया, इतनेमें अति मायावी उस व्याघ्रने बड़ी शीघ्रताके साथ पहुँचकर उस १६ द्विजश्रेष्ठकी स्त्रीको पकड़ लिया, और ' हे नाथ! हा कान्त! हा शम्भो! हे जगद्गुरो! ' – इस प्रकार कहकर रोती हुई उस स्त्रीको भयंकर व्याघ्रने ग्रास बना १७ लिया ॥ १५–१७ ॥ तबतक राजाने अपने तीक्ष्ण भालोंसे व्याघ्रपर १८ प्रहार किया, किंतु उसे उन भालोंसे किसी प्रकारकी व्यथा नहीं हुई, जैसे वृष्टिधाराओंसे पर्वतराजपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ॥ १८ ॥
राजाके द्वारा यथेच्छ आघात किये जानेपर भी व्यथारहित वह महाबलवान् व्याघ्र बलपूर्वक उस स्त्रीको १ ९ लेकर बड़ी शीघ्रताके साथ वहाँसे भाग गया ॥ १ ९ ॥
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अ ० २७ ]
व्याघ्रेणापहृतां नारीं वीक्ष्य विप्रोऽतिविस्मितः ।
लौकिकीं गतिमाश्रित्य रुरोदाति मुहुर्मुहुः ॥
रुदित्वा चिरकालं च स विप्रो माययेश्वरः ।
भद्रायुषं महीपालं प्रोवाच मदहारकः ॥
द्विजेश्वर उवाच
राजन् क्व ते महास्त्राणि क्व ते त्राणं महद्धनुः ।
क्व ते द्वादशसाहस्त्रमहानागयुतं बलम् ॥
किं ते खड्गेन शङ्खेन किं ते मन्त्रास्त्रविद्यया । किं सत्त्वेन महास्त्राणां किं प्रभावेण भूयसा तत्सर्वं विफलं जातं यच्चान्यत्त्वयि तिष्ठति । यस्त्वं वनौकसां घातं न निवारयितुं क्षमः क्षत्रस्यायं परो धर्मो क्षताच्च परिरक्षणम् तस्मिन्कुलोचिते धर्मे नष्टे त्वज्जीवितेन किम् आर्तानां शरणाप्तानां त्राणं कुर्वन्ति पार्थिवाः प्राणैरर्थैश्च धर्मज्ञास्तद्विना च मृतोपमाः आर्तत्राणविहीनानां जीवितान्मरणं वरम् धनिनां दानहीनानां गार्हस्थ्याद्भिक्षुता वरम् वरं विषाशनं प्राज्ञैर्वरमग्निप्रवेशनम् । कृपणानामनाथानां दीनानामपरक्षणात् नन्दीश्वर उवाच इत्थं विलपितं तस्य स्ववीर्यस्य च गर्हणम् शतरुद्रसंहिता १२१ इस प्रकार बाघके द्वारा अपहृत अपनी स्त्रीको २० देखकर ब्राह्मण अत्यन्त विस्मित हो गया और लौकिकी गतिका आश्रय लेकर बारंबार रोने लगा ॥ २० ॥
फिर देरतक रोनेके बाद अभिमान नष्ट करनेवाले २१ तथा मायासे विप्ररूप धारण करनेवाले उन परमेश्वरने राजा भद्रायसे कहा- ॥ २१ ॥
द्विजेश्वर बोले- हे राजन्! [ इस समय ] तुम्हारे महान् अस्त्र कहाँ हैं, रक्षा करनेवाला तुम्हारा २२ महाधनुष कहाँ है और बारह हजार हाथियोंका तुम्हारा बल कहाँ है? ॥२२ ॥
तुम्हारे शंख तथा खड्गसे क्या लाभ? तुम्हारी ॥ २३ समन्त्रक अस्त्रविद्यासे क्या लाभ? तुम्हारे सत्त्वसे क्या | लाभ और तुम्हारे महान् अस्त्रोंके उत्कृष्ट और अतिशय प्रभावसे क्या लाभ? अन्य जो कुछ भी तुममें है, वह सब ॥ २४ निष्फल हो गया; क्योंकि तुम वनमें रहनेवाले जन्तुओंके आक्रमणको भी रोकनेमें सक्षम न हो सके ॥ २३-२४ ॥ । [ प्रजाजनोंको ] क्षीण होनेसे बचाना क्षत्रियका ॥ २५ परम धर्म है । उस कुलधर्मके नष्ट हो जानेपर तुम्हारे जीवित रहनेसे क्या लाभ है? ॥२५ ॥
। धर्मज्ञ राजा अपने प्राणों तथा धनसे अपने ॥ २६ शरणमें आये हुए दीन - दु: खियोंकी रक्षा करते हैं, यदि वे ऐसा नहीं करते तो मृतकके समान हैं ॥ २६ ॥
। पीड़ितोंकी रक्षा करनेमें असमर्थ राजाओंके लिये ॥ २७ जीवित रहनेकी अपेक्षा मर जाना ही श्रेयस्कर है, दानसे हीन धनी लोगोंके लिये गृहस्थ होनेकी अपेक्षा भिखारी होना कहीं अधिक श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
अनाथ, दीन एवं आर्तजनोंकी रक्षा करनेमें ॥ २८ जो अक्षम हैं, उनके लिये विष खाना या अग्निमें प्रवेश कर जाना कहीं अच्छा है - ऐसा बुद्धिमान् लोग | कहते हैं ॥२८ ॥
नन्दीश्वर बोले- इस प्रकार उस ब्राह्मणका । विलाप तथा उसके मुखसे अपने पराक्रमकी निन्दा निशम्य नृपतिः शोकादात्मन्येवमचिन्तयत् ॥ २ ९ सुनकर राजा भद्रायु शोकसन्तप्त हो अपने मनमें इस प्रकार विचार करने लगे ॥ २ ९ ॥ अहो! आज भाग्यके उलट - फेरसे मेरा पराक्रम अहो मे पौरुषं नष्टमद्य दैवविपर्ययात् । नष्ट हो गया, आज मेरी कीर्ति नष्ट हो गयी और मुझे अद्य कीर्तिश्च मे नष्टा पातकं प्राप्तमुत्कटम् ॥ ३० | भयंकर पापका भागी होना पड़ा ॥३० ॥
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१२२ धर्मः कुलोचितो नष्टो मन्दभाग्यस्य दुर्मतेः । नूनं मे सम्पदो राज्यमायुष्यं क्षयमेष्यति
अद्य चैनं द्विजन्मानं हतदारं शुचार्दितम् ।
हतशोकं करिष्यामि दत्त्वा प्राणानतिप्रियान् ॥
इति निश्चित्य मनसा स भद्रायुर्नृपोत्तमः ।
पतित्वा पादयोस्तस्य बभाषे परिसान्त्वयन् ॥
भद्रायुरुवाच
कृपां कृत्वा मयि ब्रह्मन् क्षत्रबन्धौ हतौजसि ।
शोकं त्यज महाप्राज्ञ दास्याम्यद्य तु वाञ्छितम् ॥
इदं राज्यमियं राज्ञी ममेदं च कलेवरम् । त्वदधीनमिदं सर्वं किं तेऽभिलषितं वरम् ब्राह्मण उवाच
किमादर्शेन चान्धस्य किं गृहैभैक्ष्यजीविनः ।
किं पुस्तकेन मूढस्य निस्त्रीकस्य धनेन किम् ॥
अतोऽहं हतपत्नीको भुक्तभोगो न कर्हिचित् । इमां तवाग्रमहिषीं कामये दीयतामिति भद्रायुरुवाच
दाता रसान्तवित्तस्य राज्यस्य गजवाजिनाम् ।
आत्मदेहस्य कस्यापि कलत्रस्य न कर्हिचित् ॥
परदारोपभोगेन यत्पापं समुपार्जितम् ।
न तत्क्षालयितुं शक्यं प्रायश्चित्तशतैरपि ॥
ब्राह्मण उवाच
आस्तां ब्रह्मवधं घोरमपि मद्यनिषेवणम् ।
तपसा विधमिष्यामि किं पुनः पारदारिकम् ॥
तस्मात्प्रयच्छ भार्यां स्वामिमां कामो न मेऽपरः ।
अरक्षणाद्भयार्तानां गन्तासि निरयं ध्रुवम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ मुझ अभागे तथा दुर्बुद्धिका कुलोचित धर्म नष्ट ॥ ३१ हो गया । निश्चय ही [ इस प्रकारके पापके कारण ] मेरी सम्पत्तियों, राज्य और आयुका भी नाश हो जायगा ॥ ३१ ॥
अपनी पत्नीके मर जानेसे शोकसन्तप्त इस ३२ ब्राह्मणको मैं आज अतिप्रिय प्राणोंको देकर शोकरहित करूँगा ॥३२ ॥
इस प्रकार नृपश्रेष्ठ भद्रायुने अपने मनमें ३३ निश्चयकर उस ब्राह्मणके चरणोंमें गिरकर उसे सान्त्वना देते हुए कहा- ॥ ३३ ॥
भद्रायु बोले — हे ब्रह्मन्! हे महाप्राज्ञ! मुझ नष्ट तेजवाले क्षत्रियाधमपर कृपा करके अपने शोकका ३४ त्याग कीजिये, मैं आज आपका अभीष्ट पूरा करूँगा यह राज्य, यह रानी और मेरा यह शरीर सब कुछ आपके अधीन है, इसके अतिरिक्त आप और क्या ॥ ३५ चाहते हैं? ॥ ३४-३५ ॥ ब्राह्मण बोले- [ हे राजन्! ] अन्धेको दर्पणसे क्या लाभ, भिक्षासे जीवन - निर्वाह करनेवालेको घरकी ३६ क्या आवश्यकता, मूर्खको पुस्तकसे क्या लाभ और स्त्रीविहीन पुरुषको धनसे क्या प्रयोजन! इस समय मेरी स्त्री मर चुकी है और मैंने कभी कामसुखका ॥ ३७ उपभोग नहीं किया, अतः मैं आपकी इस पटरानीको चाहता हूँ, इसे मुझे दे दीजिये ॥ ३६-३७ ॥ भद्रायु बोले- [ हे ब्राह्मण! ] पूरी पृथ्वीके धनका और राज्य, हाथी, घोड़े तथा अपने शरीरका ३८ भी दाता तो हुआ जा सकता है, किंतु अपनी स्त्रीका दान करनेवाला तो कहीं नहीं होता ॥ ३८ ॥।
दूसरेकी स्त्रीके साथ समागम करनेसे जो पाप ३ ९ अर्जित किया जाता है, उसे सैकड़ों प्रायश्चित्तोंसे भी दूर नहीं किया जा सकता है ॥ ३ ९ ॥ ब्राह्मण बोले — मुझे घोर ब्रह्महत्या तथा मद्य पीनेका महापाप ही क्यों न लगे, मैं उसे तपस्यासे नष्ट ४० कर दूँगा, फिर परस्त्रीगमन कितना बड़ा पाप है ॥ ४० ॥
अतः आप मुझे अपनी यह स्त्री प्रदान कीजिये, | मैं दूसरा कुछ नहीं चाहता, अन्यथा भयभीतोंकी रक्षा | करनेमें असमर्थ होनेके कारण आपको निश्चित रूपसे ४१ । नरककी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥
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अ ० २७ ] शतरुद्रसंहिता १२३ नन्दीश्वर उवाच नन्दीश्वर बोले- ब्राह्मणकी इस बातसे भयभीत इति विप्रगिरा भीतश्चिन्तयामास पार्थिवः । राजा विचार करने लगे कि भयभीतकी रक्षा न कर अरक्षणान्महापापं पत्नीदानं ततो वरम् ॥ ४२ सकना महान् पाप है, उसकी अपेक्षा स्त्री दे देना ही
अतः पत्नीं द्विजाग्र्याय दत्त्वा निर्मुक्तकिल्बिषः ।
सद्यो वह्निं प्रवेक्ष्यामि कीर्तिश्च विदिता भवेत् ॥
इति निश्चित्य मनसा समुज्ज्वाल्य हुताशनम् ।
तमाहूय द्विजं चक्रे पत्नीदानं सहोदकम् ॥
स्वयं स्नातः शुचिर्भूत्वा प्रणम्य विबुधेश्वरान् तमग्निं त्रिः परिक्रम्य शिवं दध्यौ समाहितः तमथाग्निं पतिष्यन्तं स्वपदासक्तचेतसम् प्रत्यषेधत विश्वेशः प्रादुर्भूतो द्विजेश्वरः तमीश्वरं पञ्चमुखं त्रिनेत्रं पिनाकिनं चन्द्रकलावतंसम् प्रलम्बपिंगांशुजटाकलापं मध्याह्नसद्भास्करकोटितेजसम् मृणालगौरं गजचर्मवाससं गंगातरङ्गोक्षितमौलिदेशकम् नागेन्द्रहारावलिकण्ठभूषणं किरीटकाञ्च्यङ्गदकंकणोज्ज्वलम् शूलासिखट्वाङ्गकुठारचर्म-मृगाभयाष्टाङ्गपिनाकहस्तम् वृषोपरिस्थं शितिकण्ठभूषणं प्रोद्भूतमग्रे स नृपो ददर्श ततोऽम्बराद् द्रुतं पेतुर्दिव्याः कुसुमवृष्टयः प्रणेदुर्देवतूर्य्याणि देव्यश्च ननृतुर्जगुः तत्राजग्मुः स्तूयमाना हरिर्ब्रह्मा तथा सुराः इन्द्रादयो नारदाद्या मुनयश्चापरेऽपि च तदोत्सवो महानासीत्तत्र भक्तिप्रवर्धनः सति पश्यति भूपाले भक्तिनम्रीकृताञ्जलौ श्रेयस्कर है ॥४२ ॥
अतः श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी स्त्री प्रदानकर ४३ पापसे मुक्त हो शीघ्र ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा, । ऐसा करनेसे मेरी कीर्ति भी बढ़ेगी ॥ ४३ ॥
मनमें ऐसा विचारकर राजाने अग्नि प्रज्वलित ४४ करके उस ब्राह्मणको बुलाकर जल लेकर [ संकल्पके साथ ] अपनी पत्नीका दान कर दिया ॥४४ ॥
। इसके बाद स्वयं स्नान करके पवित्र हो ॥ ४५ देवेश्वरोंको प्रणामकर उस अग्निकी तीन बार प्रदक्षिणा करके समाहितचित्त हो, उन्होंने शिवजीका ध्यान किया ॥ ४५ ॥
। तदनन्तर द्विजेश्वरने साक्षात् शिवरूपमें प्रकट ॥ ४६ होकर अपने चरणोंमें मन लगाकर [ प्रज्वलित ] अग्निमें गिरनेको उद्यत हुए उन राजाको रोक दिया ॥ ४६ ॥
पाँच मुखोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, पिनाकी, मस्तकपर । चन्द्रकला धारण करनेवाले, लम्बी एवं पीली - पीली जटाओंसे युक्त, मध्याह्नकालीन करोड़ों सूर्योकी भाँति ॥ ४७ तेजवाले, मृणालके समान शुभ्र वर्णवाले, गजचर्म धारण किये हुए, गंगाकी तरंगोंसे सिंचित शिर: प्रदेशवाले, कण्ठमें नागेन्द्रहाररूप आभूषण धारण करनेवाले, मुकुट - करधनी - बाजूबन्द तथा कंकण धारण करनेसे ॥ ४८ उज्ज्वल प्रतीत होनेवाले, त्रिशूल - खड्ग - खट्वांग-कुठार - चर्म - मृग - अभय मुद्रा तथा पिनाक नामक धनुषसे युक्त आठ हाथोंवाले, बैलपर बैठे हुए और कण्ठमें विषकी कालिमासे सुशोभित उन शिवजीको राजाने ॥ ४ ९ अपने सामने प्रकट हुआ देखा॥४७–४९ ॥ तब आकाशमण्डलसे शीघ्र ही दिव्य पुष्पवृष्टि । ॥ ५० होने लगी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और अप्सराएँ नाचने तथा गाने लगीं ॥५० ॥
। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि देवता, नारदादि महर्षि तथा ॥५१ अन्य मुनिगण भी स्तुति करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ५१ ॥
उस समय भक्तिसे विनम्र हो हाथ जोड़े हुए । राजाके देखते - देखते ही भक्तिको बढ़ानेवाला महान् ॥ ५२ उत्सव होने लगा ॥५२ ॥
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१२४ तद्दर्शनानन्दविजृम्भिताशयः प्रवृद्धबाष्पाम्बुविलिप्तगात्रः प्रहृष्टरोमा स हि गद्गदाक्षर-स्तुष्टाव गीर्भिर्मुकुलीकृताञ्जलिः ततस्स भगवान् राज्ञा संस्तुतः परमेश्वरः प्रसन्नः सह पार्वत्या तमुवाच दयानिधिः राजंस्ते परितुष्टोऽहं भक्त्या त्वद्धर्मतोऽधिकम् वरं ब्रूहि सपत्नीकं प्रयच्छामि न संशयः
तव भावपरीक्षार्थं द्विजो भूत्वाहमागतः ।
व्याघ्रेण या परिग्रस्ता साक्षादेवी शिवा हि सा ॥
व्याघ्रो मायामयो यस्ते शरैरक्षतविग्रहः ।
धीरतां द्रष्टुकामस्ते पत्नीं याचितवानहम् ॥
नन्दीश्वर उवाच
इत्याकर्ण्य प्रभोर्वाक्यं स भद्रायुर्महीपतिः ।
पुनः प्रणम्य संस्तूय स्वामिनं नतकोऽब्रवीत् ॥
भद्रायुरुवाच
एक एव वरो नाथ यद्भवान्परमेश्वरः ।
भवतापप्रतप्तस्य मम प्रत्यक्षतां गतः ॥
यद्ददासि पुनर्नाथ वरं स्वकृपया प्रभो ।
वृणेऽहं परमं त्वत्तो वरं हि वरदर्षभात् ॥
वज्रबाहुः पिता मे हि सपत्नीको महेश्वर ।
सपत्नीकस्त्वहं नाथ सदा त्वत्पादसेवकः ॥
वैश्यः पद्माकरो नाम तत्पुत्रः सनयाभिधः ।
सर्वानेतान्महेशान सदा त्वं पार्श्वगान्कुरु ॥
नन्दीश्वर उवाच
अथ राज्ञी च तत्पत्नी प्रमत्ता कीर्तिमालिनी ।
भक्त्या प्रसाद्य गिरिशं ययाचे वरमुत्तमम् ॥
राज्ञ्युवाच
चन्द्रांगदो मम पिता माता सीमन्तिनी च मे ।
तयोर्याचे महादेव त्वत्पार्श्वे सन्निधिं मुदा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ भगवान् सदाशिवके दर्शनमात्रसे राजाका अन्त करण : | प्रसन्नतासे खिल उठा, अश्रुपातसे सारा शरीर आर्द्र हो गया, शरीर रोमांचित हो गया । तब वे हाथ जोड़े ॥ ५३ । गद्गद वाणीसे शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥५३ ॥
इसके बाद राजाके द्वारा स्तुति किये जानेपर । । पार्वतीके साथ प्रसन्न हुए दयानिधि भगवान् महेश्वरने ॥ ५४ उनसे कहा- हे राजन्! मैं आपकी भक्तिसे अत्यन्त | प्रसन्न हो गया हूँ और आपके धर्मपालनसे तो और । भी प्रसन्न हुआ हूँ । अब आप अपनी पत्नीसहित वर ॥ ५५ माँगिये, मैं उसे दूँगा, इसमें संशय नहीं है । मैं आपके भक्तिभावकी परीक्षाके लिये ही ब्राह्मणवेष धारण ५६ करके आया था और व्याघ्रने जिसे पकड़ लिया था, वे साक्षात् देवी पार्वती थीं । तुम्हारे बाणोंसे आहत न होनेवाला जो व्याघ्र था, वह मायासे बनाया गया था ५७ और मैंने आपके धैर्यकी परीक्षाके लिये ही आपकी स्त्रीको माँगा था ॥ ५४–५७ ॥ नन्दीश्वर बोले- प्रभुका यह वचन सुनकर उन्हें पुनः प्रणामकर तथा उनकी स्तुति करके विनम्र ५८ होकर वे राजा भद्रायु स्वामी [ शिव ] - से कहने लगे— ॥ ५८ ॥
भद्रायु बोले — हे नाथ! मेरा एक ही वर है जो कि आप परमेश्वरने सांसारिक तापसे सन्तप्त ५ ९ मुझको प्रत्यक्ष दर्शन दिया है । हे नाथ! हे प्रभो! फिर भी यदि आप अपनी कृपासे वर देना ही चाहते हैं, ६० तो मैं वरदाताओंमें श्रेष्ठ आपसे यही परम वर माँगता हूँ कि हे महेश्वर! हे नाथ! माताके साथ मेरे पिता वज्रबाहु तथा स्त्रीके सहित मैं आपके चरणोंका सदा ६१ सेवक बना रहूँ और हे महेशान! जो पद्माकर नामक यह वैश्य है तथा सनय नामक उसका पुत्र है- है –इन ६२ सबको सदा अपना पार्श्ववर्ती बनायें ॥ ५ ९ -६२ ॥ नन्दीश्वर बोले — तदनन्तर उस राजाकी कीर्तिमालिनी नामक पत्नी भी आनन्दित होकर अपनी ६३ भक्तिसे शिवजीको प्रसन्नकर उत्तम वरदान माँगने लगी ॥ ६३ ॥
रानी बोली — हे महादेव! मेरे पिता चन्द्रांगद | और मेरी माता सीमन्तिनी - इन दोनोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक ६४ आपके समीप निवासकी याचना करती हूँ ॥ ६४ ॥
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अ ० २८ ] नन्दीश्वर उवाच
एवमस्त्विति गौरीशः प्रसन्नो भक्तवत्सलः ।
तयोः कामवरान्दत्त्वा क्षणादन्तर्हितोऽभवत् ॥
भद्रायुरपि सुप्रीत्या प्रसादं प्राप्य शूलिनः ।
सहितः कीर्तिमालिन्या बुभुजे विषयान्बहून् ॥
कृत्वा वर्षायुतं राज्यमव्याहतपराक्रमः ।
राज्यं विक्षिप्य तनये जगाम शिवसन्निधिम् ॥
चन्द्रांगदोऽपि राजेन्द्रो राज्ञी सीमन्तिनी च सा ।
भक्त्या संपूज्य गिरिशं जग्मतुः शाम्भवं पदम् ॥
द्विजेश्वरावतारस्ते वर्णितः परमो मया ।
महेश्वरस्य भद्रायुपरमानन्ददः प्रभो ॥
इदं चरित्रं परमं पवित्रं शिवावतारस्य पवित्रकीर्तेः द्विजेशसंज्ञस्य महाद्भुतं हि शृण्वन्पठन् शम्भुपदं प्रयाति य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः न श्चोतति स्वधर्मात्स परत्र लभते गतिम् ॥ शतरुद्रसंहिता १२५ नन्दीश्वर बोले- भक्तवत्सल पार्वतीपति प्रसन्न होकर उन दोनोंसे ‘ ऐसा ही हो ' – इस प्रकार कहकर उन्हें ६५ इच्छित वर देकर क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये ॥ ६५ ॥
भद्रायने भी प्रीतिपूर्वक शिवजीकी कृपा प्राप्तकर ६६ [ अपनी पत्नी ] कीर्तिमालिनीके साथ अनेक विषयोंका भोग किया ॥६६ ॥
इस प्रकार अव्याहत पराक्रमवाले राजा दस ६७ हजार वर्षपर्यन्त राज्य करके पुत्रको राज्यका भार देकर शिवजीकी सन्निधिमें चले गये और राजर्षि चन्द्रांगद तथा उनकी रानी सीमन्तिनी भक्तिसे शिवजीका ६८ पूजनकर शिवपदको प्राप्त हुए ॥ ६७-६८ ॥ हे प्रभो [ सनत्कुमार! ] इस प्रकार मैंने आपसे ६ ९ शिवजीके श्रेष्ठ द्विजेश्वरावतारका वर्णन किया, जिससे राजा भद्रायुको परम सुख प्राप्त हुआ ॥६ ९ ॥ । पवित्र कीर्तिवाले द्विजेशसंज्ञक शिवावतारके इस परम पवित्र तथा अत्यन्त अद्भुत चरित्रको पढ़ने तथा ॥ ७० सुननेवाला शिवपदको प्राप्त होता है ॥ ७० ॥
जो एकाग्रचित्त होकर इसे प्रतिदिन सुनता । अथवा सुनाता है, वह अपने धर्मसे विचलित नहीं होता ७१ है और परलोकमें उत्तम गति प्राप्त करता है ॥ ७१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां द्विजेशाख्य - शिवावतारवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें द्विजेशाख्यशिवावतारवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः नल एवं दमयन्तीके पूर्वजन्मकी कथा नन्दीश्वर उवाच शृणु प्राज्ञ प्रवक्ष्यामि शिवस्य परमात्मनः अवतारं परानन्दं यतिनाथाह्वयं मुने अर्बुदाचलसंज्ञे तु पर्वते भिल्लवंशजः आहुकश्च तदभ्याशे वसति स्म मुनीश्वर तत्पत्नी ह्याहुका नाम बभूव किल सुव्रता उभावपि महाशैवावास्तां तौ शिवपूजकौ तथा शिवावतार यतीश्वरका हंसरूप धारण करना नन्दीश्वर बोले- हे प्राज्ञ! हे मुने! अब मैं । परमात्मा शिवके परम आनन्दप्रद यतिनाथ नामक ॥ १ अवतारका वर्णन करूँगा, आप सुनें ॥१ ॥
। हे मुनीश्वर! [ पूर्वकालमें ] अर्बुदाचल नामक ॥ २ पर्वतके समीप भिल्लवंशमें उत्पन्न आहुक नामक एक भील रहता था ॥२ ॥
उसकी पत्नीका नाम आहुका था, जो अत्यन्त । पतिव्रता थी । वे दोनों प्रतिदिन भक्तिपूर्वक शिवजीकी
॥ ३ पूजा करते थे । वे दोनों महाशिवभक्त थे ॥३ ॥
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१२६ कस्मिँश्चित्समये भिल्लः शिवभक्तिरतः सदा आहारार्थं स्वपत्न्याश्च सुदूरं स गतो मुने एतस्मिन्नन्तरे तत्र गेहे भिल्लस्य शङ्करः भूत्वा यतिवपुः सायं परीक्षार्थं समाययौ तस्मिन्नवसरे तत्राजगाम स गृहाधिपः पूजनं च यतीशस्य चकार प्रेमतः सुधीः तद्भावस्य परीक्षार्थं यतिरूपः स शंकरः महालीलाकरः प्रीत्या भीतः प्रोवाच दीनगीः यतिनाथ उवाच श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ । हे मुने! किसी समय सदा शिवभक्तिमें तत्पर ॥ ४ रहनेवाला वह भील अपने तथा स्त्रीके लिये आहारकी व्यवस्थाहेतु बहुत दूर चला गया ॥४ ॥
। इसी बीच शिवजी संन्यासीका रूप धारणकर ॥ ५ उसकी परीक्षा लेनेके लिये सायंकाल उस भीलके घर आये ॥५ ॥
। उसी समय वह गृहपति [ आहुक ] भी वहाँ आ ॥ ६ गया और उस महाबुद्धिमान् भीलने प्रेमपूर्व उन यतीश्वरकी पूजा की ॥६ ॥
। उसके भावकी परीक्षा करनेके लिये महालीला ॥ ७ करनेवाले संन्यासीरूपधारी उन शिवजीने डरते हुए प्रेमपूर्वक दीनवचन कहा— ॥ ७ ॥
यतिनाथ बोले- हे भिल्ल! तुम मुझे आज अद्य स्थलं निवासार्थं देहि मे प्रातरेव हि । रहनेके लिये स्थान दो और प्रातःकाल होते ही मैं यास्यामि सर्वथा भिल्ल स्वस्ति स्यात्तव सर्वदा भिल्ल उवाच सत्यं प्रोक्तं त्वया स्वामिन् शृणु मद्वचनं च ते अति स्वल्पं स्थलं मे हि स्यान्निवासः कथं तव नन्दीश्वर उवाच इत्युक्तः स यतिस्तेन गमनाय मतिं दधे तावद्भिल्ल्या वचः प्रोक्तं स्वामिनं संविचार्य वै भिल्ल्युवाच स्वामिन्देहि यतेः स्थानं विमुखं कुरु मातिथिम् गृहधर्मं विचार्य त्वमन्यथा धर्मसंक्षयः स्थीयतां ते गृहाभ्यन्तः सुखेन यतिना सह अहं बहिः स्थितिं कुर्यामायुधानि बृहन्त्यपि नन्दीश्वर उवाच तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भिल्ल्या धर्मान्वितं शिवम् स्वपत्न्या मनसा तेन भिल्लेन च विचारितम् स्त्रियं बहिश्च निष्कास्य कथं स्थेयं मया गृहे यतेरन्यत्र गमनमधर्मकरमात्मनः द्वयमप्युचितं नैव सर्वथा गृहमेधिनः यद्भावि तद्भवेदेव मया स्थेयं गृहाद् बहिः ॥ ८ सर्वथा चला जाऊँगा, तुम्हारा सर्वदा कल्याण हो ॥ ८ ॥
भिल्ल बोला — हे स्वामिन्! आपने सत्य कहा, । किंतु मेरी बात सुनिये, मेरा स्थान तो बहुत थोड़ा है, ॥ ९ फिर यहाँ आपका निवास किस प्रकार सम्भव है? ॥ ९ ॥
नन्दीश्वर बोले – हे सनत्कुमार! उसके द्वारा । इस प्रकार कहे जानेपर वह संन्यासी जानेका विचार ॥ १० करने लगा, तबतक भीलनीने विचारकर अपने स्वामीसे कहा- | - ॥१० ॥
भीलनी बोली- हे स्वामिन्! गृहस्थधर्मका विचार । करके आप संन्यासीको स्थान दे दीजिये, अतिथिको निराश
॥ ११ मत कीजिये । अन्यथा आपके धर्मका क्षय होगा ॥ ११
। आप घरके भीतर संन्यासीके साथ निवास करें ॥ १२ और मैं सभी बड़े अस्त्र - शस्त्रोंको बाहर रखकर वहीं रहूँगी ॥ १२ ॥
नन्दीश्वर बोले— अपनी पत्नी उस भीलनीके । धर्मयुक्त कल्याणकारी वचनको सुनकर वह भील ॥ १३ अपने मनमें विचार करने लगा ॥१३ ॥
। स्त्रीको घरके बाहर रखकर मेरा घरमें निवास ॥१४ करना उचित प्रतीत नहीं होता है, फिर इस यतिका दूसरी जगह गमन भी अपने अधर्मका कारण होगा ॥ १४ ॥
गृहस्थधर्मका आचरण करनेवालोंके लिये ये । । दोनों बातें सर्वथा उचित नहीं हैं । अतः जो होनहार ॥ १५ है, वह हो, मैं घरके बाहर ही रहूँगा ॥ १५ ॥
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अ ० २८ ] शतरुद्रसंहिता १२७ इत्याग्रहं तदा कृत्वा गृहान्तः स्थाप्य तौ मुदा । स्वायुधानि च संस्थाप्य भिल्लोऽतिष्ठद् गृहाद् बहिः ।
रात्रौ तं पशवः क्रूराः हिंसकाः समपीडयन् ।
तेनापि च यथाशक्ति कृतो यत्नो महांस्तदा ॥
एवं यत्नं प्रकुर्वाणः स भिल्लो बलवानपि ।
प्रारब्धात्प्रेरितैर्हिस्त्रैर्बलादासीच्च भक्षितः ॥
प्रातरुत्थाय स यतिर्दृष्ट्वा हिंस्त्रैश्च भक्षितम् ।
भिल्लं वनेचरं तं वै दुःखितोऽभूदतीव हि ॥
दुःखितं तं यतिं दृष्ट्वा भिल्ली सा दुःखितापि हि ।
धैर्यात्स्वदुःखं संहृत्य वचनं चेदमब्रवीत् ॥
भिल्ल्युवाच
किमर्थं क्रियते दुःखं भद्रं जातं यतेऽधुना ।
धन्योऽयं कृतकृत्यश्च यज्जातो मृत्युरीदृशः ॥
अहं चैनं गमिष्यामि भस्म भूत्वानले यते ।
चितां कारय सुप्रीत्या स्त्रीणां धर्मः सनातनः ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा हितं मत्वा स्वयं यतिः ।
चितां व्यरचयत्सा हि प्रविवेश स्वधर्मतः ॥
एतस्मिन्नन्तरे साक्षात्पुरः प्रादुरभूच्छिवः ।
धन्ये धन्य इति प्रीत्या प्रशंसंस्तां हरोऽब्रवीत् ॥
हर उवाच
वरं ब्रूहि प्रसन्नोऽस्मि त्वदाचरणतोऽनघे ।
तवादेयं न वै किंचिद् वश्योऽहं ते विशेषतः ॥
नन्दीश्वर उवाच
तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं परमानन्ददायकम् ।
सुखं प्राप्तं विशेषेण न किञ्चित्स्मरणं ययौ ॥
तस्यास्तद्गतिमालक्ष्य सुप्रसन्नो हरोऽभवत् ।
उवाच च पुनः शम्भुर्वरं ब्रूहीति तां प्रभुः ॥
इस प्रकार आग्रहकर उन दोनोंको घरके भीतर १६ रखकर अपने अस्त्रोंको लेकर वह भील प्रसन्नतासे घरसे बाहर स्थित हो गया ॥१६ ॥
रात्रिमें उस भीलको क्रूर एवं हिंसक पशु सताने १७ लगे, उसने भी अपनी रक्षाके लिये उस समय यथाशक्ति महान् प्रयत्न किया ॥ १७ ॥
इस प्रकार [ अपनी शक्तिके अनुसार ] यत्न १८ करते रहनेपर भी प्रारब्धप्रेरित हिंसक पशुओंने बलपूर्वक उस बलवान् भीलको खा लिया ॥ १८ ॥
प्रात: काल उठकर संन्यासी हिंस्र जन्तुओंसे भक्षित १ ९ उस वनेचर भीलको देखकर बड़ा दुखी हुआ ॥ १ ९ ॥ संन्यासीको दुखी देखकर वह भीलनी भी बहुत २० दुःखित हुई, किंतु धैर्यसे अपने दुःखको दबाकर यह वचन कहने लगी— ॥२० ॥
भीलनी बोली- हे यते! आप शोक क्यों कर रहे हैं? इनका कल्याण हो गया, ये धन्य हो गये,
२१ कृतकृत्य हो गये । जो इस प्रकार इनकी मृत्यु हुई ॥ २१ ॥
। हे यते! अब मैं भी इन्हींके साथ अग्निमें भस्म २२ होकर सती हो जाऊँगी, आप प्रेमपूर्वक चिता तैयार कराइये; क्योंकि यही स्त्रियोंका सनातनधर्म है ॥ २२ ॥
उसकी यह बात सुनकर और इसीमें उसका २३ कल्याण समझकर उस संन्यासीने तत्क्षण ही चिता | तैयार कर दी और वह अपने धर्मके अनुसार उसीमें प्रविष्ट होनेके लिये उद्यत हुई ॥२३ ॥
इसी अवसरपर साक्षात् शिवजी सामने प्रकट हो २४ गये । धन्य हो, धन्य हो - इस प्रकारसे प्रेमपूर्वक प्रशंसा करते हुए शिवजी उस भीलनी से कहने लगे- ॥२४ ॥
हर बोले - हे अनघे! मैं तुम्हारे आचरणसे प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो, मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी २५ अदेय नहीं है । मैं इस समय विशेष रूपसे तुम्हारे वशमें हूँ ॥ २५ ॥
नन्दीश्वर बोले- शिवजीके उस परमानन्ददायक वचनको सुनकर वह विशेष रूपसे सुखी हुई और २६ उसको कुछ भी स्मरण नहीं रहा ॥२६ ॥
उसकी इस अवस्थाको देखकर शिवजी बहुत प्रसन्न हुए । प्रभु शिवने उससे पुन: कहा कि वर २७ | माँगो ॥ २७ ॥
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१२८ शिव उवाच अयं यतिश्च मद्रूपो हंसरूपो भविष्यति परजन्मनि वां प्रीत्या संयोगं कारयिष्यति भिल्लश्च वीरसेनस्य नैषधे नगरे वरे महान्पुत्रो नलो नाम भविष्यति न संशयः त्वं सुता भीमराजस्य वैदर्भे नगरेऽनघे दमयन्ती च विख्याता भविष्यसि गुणान्विता
युवां चोभौ मिलित्वा च राजभोगं सुविस्तरम् ।
भुक्त्वा मुक्तिं च योगीन्द्रैर्लप्स्येथे दुर्लभां ध्रुवम् ॥
नन्दीश्वर उवाच इत्युक्त्वा च स्वयं शम्भुर्लिङ्गरूपोऽभवत्तदा । तस्मान्न चलितो धर्मादचलेश इति स्मृतः स भिल्ल आहुकश्चापि वीरसेनसुतोऽभवत् । नैषधे नगरे तात नलनामा महानृपः
आहुका सा महाभिल्ली भीमस्य तनयाभवत् ।
वैदर्भे नगरे राज्ञो दमयन्तीति विश्रुता ॥
यतिनाथाह्वयः सोऽपि हंसरूपोऽभवच्छिवः ।
विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलेन वै ॥
पूर्वसत्काररूपेण महापुण्येन शंकरः ।
हंसरूपं विधायैव ताभ्यां सुखमदात्प्रभुः ॥
शिवो हंसावतारो हि नानावार्ताविचक्षणः ।
दमयन्त्या नलस्यापि परमानन्ददायकः ॥
इदं चरित्रं परमं पवित्रं शिवावतारस्य पवित्रकीर्तेः । यतीशसंज्ञस्य महाद्भुतं हि हंसाह्वयस्यापि विमुक्तिदं हि ॥
यतीशब्रह्महंसाख्यावतारचरितं शुभम् ।
शृणुयाच्छ्रावयेद्यो हि स लभेत परां गतिम् ॥
इदमाख्यानमनघं सर्वकामफलप्रदम् ।
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं भक्तिवर्धनमुत्तमम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ शिवजी बोले- यह मेरे रूपवाला यति अगले । । जन्ममें हंस होगा और तुम दोनोंका पुनः संयोग ॥ २८ करायेगा ॥ २८ ॥
यह भील निषधनगरके राजा वीरसेनका नल । । नामक महाप्रतापी पुत्र होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ९ और हे अनघे! तुम विदर्भनगरमें भीमराजकी कन्या । । होकर परम गुणवती दमयन्ती नामसे विख्यात ॥ ३० होओगी ॥ २ ९ -३० ॥ तुम दोनों ही बहुत कालपर्यन्त यथेष्ट राज्यसुखका ३१ भोग करके योगीश्वरोंके लिये दुर्लभ मुक्तिको निश्चित रूपसे प्राप्त करोगे ॥ ३१ ॥
नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर शिवजी उसी समय लिंगरूपमें प्रकट हो गये । [ उनके द्वारा परीक्षा ॥ ३२ करनेपर ] भील धर्मसे विचलित नहीं हुआ, इसलिये वह लिंग अचलेश — इस नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२ ॥
हे तात! वह आहुक भील निषधनगरमें वीरसेनका ॥ ३३ पुत्र नल नामवाला महान् राजा हुआ । उसकी पत्नी आहुका भीलनी विदर्भनगरके राजा भीमसेनकी पुत्री ३४ दमयन्ती नामसे प्रसिद्ध हुई । वे शिवावतार यतीश्वर भी हंसरूपमें अवतरित हुए, जिन्होंने दमयन्तीका ३५ विवाह नलके साथ करवाया ॥ ३३–३५ ॥ पूर्व समयमें उनके द्वारा किये गये [ अतिथिके ] ३६ सत्काररूप महापुण्यके कारण प्रभु शिवजीने हंसरूप धारणकर [ इस जीवनमें ] दोनोंको महान् सुख प्रदान किया ॥ ३६ ॥
अनेक प्रकारका वार्तालाप करनेमें निपुण हंसावतार ३७ शिवजीने दमयन्ती तथा नलको न महान् सुख प्रदान किया ॥ ३७ ॥
पवित्र कीर्तिवाले यतीश्वर नामक तथा हंस नामक शिवावतारका यह चरित्र अत्यन्त पवित्र, परम ३८ अद्भुत तथा निश्चय ही मुक्तिदायक है ॥३८ ॥
जो यतीश तथा ब्रह्महंस नामक अवतारके शुभ ३ ९ चरित्रको सुनता है अथवा सुनाता है, वह परम गति । प्राप्त करता है । यह आख्यान निष्पाप, सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, यश तथा आयु प्रदान करनेवाला, भक्तिको बढ़ानेवाला एवं ४० | उत्तम है ॥३ ९ -४० ॥