श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 141–150

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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अ ० २ ९ ] शतरुद्रसंहिता १२ ९ श्रुत्वैतच्चरितं शम्भोर्यतिहंसस्वरूपयोः । यतीश्वर तथा हंसरूप शिवका यह चरित्र सुनकर मनुष्य इस लोकमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें इह सर्वसुखं भुक्त्वा सोऽन्ते शिवपुरं व्रजेत् ॥ ४१ शिवलोकको प्राप्त करता है ॥ ४१ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां यतिनाथब्रह्महंसाह्वय-शिवावतारचरितवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें यतिनाथब्रह्महंसाह्वयशिवावतारचरितवर्णन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नन्दीश्वर उवाच

सनत्कुमार शम्भोस्त्ववतारं परमं शृणु ।

नभगज्ञानदं कृष्णदर्शनाह्वयमुत्तमम् ॥ १

इक्ष्वाकुप्रमुखा आसन् श्राद्धदेवसुताश्च ये ।

नभगस्तत्र नवमो नाभागस्तत्सुतः स्मृतः ॥ २

अम्बरीषः सुतस्तस्य विष्णुभक्तो बभूव सः ।

यस्योपरि प्रसन्नोऽभूद्दुर्वासा ब्रह्मभक्तितः ॥ ३

पितामहो ऽम्बरीषस्य नभगो यः प्रकीर्तितः ।

तच्चरित्रं शृणु मुने यस्मै ज्ञानमदाच्छिवः ॥ ४

नभगो मनुपुत्रस्तु पठनार्थं सुबुद्धिमान् ।

चक्रे गुरुकुले वासं बहुकालं जितेन्द्रियः ॥ ५

एतस्मिन्समये ते वै इक्ष्वाकुप्रमुखाः सुताः ।

तस्मै भागमकल्प्यैव भेजुर्भागान्निजान्क्रमात् ॥ ६

स्वं स्वं भागं गृहीत्वा ते बुभुजू राज्यमुत्तमम् ।

अविषादं महाभागाः पित्रादेशात्सुबुद्धयः ॥ ७

स पश्चादागतस्तत्र ब्रह्मचारी गुरुस्थलात् ।

नभगोऽधीत्य सर्वाश्च सांगोपांगाः श्रुतीः क्रमात् ॥ ८

भ्रातृन्विलोक्य नभगो विभक्तान्सकलान्निजान् ।

दायार्थी प्राह तान्स्नेहादिक्ष्वाकुप्रमुखान्मुने ॥ ९

नामक अवतारकी कथा नन्दीश्वर बोले - हे सनत्कुमार! अब आप नभगको ज्ञान प्रदान करनेवाले कृष्णदर्शन नामक उत्तम शिवावतारका श्रवण कीजिये ॥१ ॥

श्राद्धदेवके इक्ष्वाकु आदि जो प्रमुख पुत्र हुए, उनमें नभग नौवें पुत्र थे, उन्हींके पुत्र नाभाग कहे गये हैं ॥२ ॥

उनके पुत्र अम्बरीष थे । वे विष्णुजीके भक्त हुए, जिनकी ब्राह्मणभक्तिसे दुर्वासाजी उनपर प्रसन्न हुए थे ॥३ ॥

हे मुने! अम्बरीष पितामह जो नभग कहे गये हैं, आप उनका चरित्र सुनिये । जिनको सदाशिवजीने ज्ञान दिया था ॥ ४ ॥

मनुके अति बुद्धिमान् तथा जितेन्द्रिय पुत्र नभग जब पढ़नेके लिये गुरुकुलमें निवास करने लगे, उसी समय मनुके इक्ष्वाकु आदि पुत्रोंने उनको भाग दिये बिना ही अपने - अपने भागोंको क्रमसे विभाजित कर लिया ॥ ५-६ ॥ वे महाबुद्धिमान् और भाग्यवान् पुत्र अपने | पिताकी आज्ञासे अपने - अपने भागको लेकर सुखपूर्वक उत्तम राज्यका भोग करने लगे ॥ ७ ॥

उसके बाद ब्रह्मचारी नभग क्रमसे सांगोपांग सभी वेदोंका अध्ययन करके गुरुकुलसे वहाँ लौटे । तब हे मुने! इक्ष्वाकु आदि अपने सभी भाइयोंको राज्य विभक्त किये हुए देखकर अपना भाग प्राप्त करनेकी । इच्छासे नभगने उनसे स्नेहपूर्वक कहा — ॥८ - ९ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_6_1_Front

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१३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९ नभग उवाच

भ्रातरोऽभक्तकं मह्यं दायं कृत्वा यथातथम् ।

सर्वे विभक्ताः सुप्रीत्या स्वदायार्थागताय च ॥ १०

तदा विस्मृतमस्माभिरिदानीं पितरं तव ।

विभजामो वयं भागं तं गृहाण न संशयः ॥ ११

तच्छ्रुत्वा भ्रातृवचनं नभगः परविस्मृतः ।

तदोपकण्ठमागत्य पितरं समभाषत ॥ १२

नभग उवाच

हे तात भ्रातरः सर्वे त्यक्त्वा मां व्यभजंश्च ते ।

पठनार्थं गतश्चाहं ब्रह्मचारी गुरोः कुले ॥ १३

तत आगत्य मे पृष्टा दायदानार्थमादरात् ।

ते त्वामूचुर्विभागं मे तदर्थमहमागतः ॥ १४

नन्दीश्वर उवाच

तदाकर्ण्य वचस्तस्य पिता तं प्राह विस्मितः ।

आश्वास्य श्राद्धदेवः स सत्यधर्मरतं मुने ॥ १५

मनुरुवाच

तदुक्तं मादृथास्तात प्रतारणकरं हि तत् ।

न ह्यहं परमं दायं सर्वथा भोगसाधनम् ॥ १६

तथापि दायभावेन दत्तोऽहं तैः प्रतारिभिः ।

तव वै जीवनोपायं वदामि शृणु तत्त्वतः ॥ १७

सत्रमांगिरसा विप्राः कुर्वंत्यद्य सुमेधसः ।

तत्र कर्मणि मुह्यन्ति षष्ठं षष्ठमहः प्रति ॥ १८

तत्र त्वं गच्छ नभग तान् सुशंस महाकवे ।

सूक्ते द्वे वैश्वदेवे हि सत्रं शुद्धं हि तद्भवेत् ॥ १ ९

तत्कर्मणि समाप्ते हि स्वर्यान्तो ब्राह्मणाश्च ते ।

धनं दास्यन्ति ते तुष्टाः स्वसत्रपरिशेषितम् ॥ २० ।

नभग बोले- हे भाइयो! आपलोगोंने | हिस्सा बिना दिये ही पिताकी सम्पत्ति जैसे मेरा आपसमें बाँट ली, अब मैं अपने दायभागके - तैसे लिये आपलोगोंके पास आया हूँ ॥१० ॥

[ उनके भाइयोंने कहा- ] दायका विभाग | करते समय हमलोग तुम्हें भूल गये, अब हमलोगोंने | तुम्हारे हिस्सेमें पिताजीको नियत किया है, अत: । उन्हींको ग्रहण करो, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११ तुम ॥ भाइयोंकी वह बात सुनकर नभग अत्यन्त विस्मित हो गये और अपने पिताके पास आकर कहने लगे ॥१२ ॥

नभग बोले — हे तात! जब मैं ब्रह्मचारी होकर गुरुकुलमें पढ़नेके लिये चला गया था, तभी उन सभी भाइयोंने मुझे छोड़कर सारा राज्य बाँट लिया ॥ १३ ॥

वहाँसे लौटकर जब मैं अपने हिस्सेके लिये उनसे आदरपूर्वक पूछने लगा । तो उन्होंने आपको ही मेरे भागके रूपमें दिया, इसलिये मैं [ आपके पास ] आया हूँ ॥१४ ॥

नन्दीश्वर बोले - – हे मुने! उनका वचन सुनकर विस्मित हुए पिता श्राद्धदेवने सत्यधर्ममें निरत अपने पुत्रको धीरज बँधाते हुए कहा- ॥ १५ ॥

मनु बोले - हे तात! तुम भाइयोंकी बातमें विश्वास मत करो । उनका यह वचन तुम्हें धोखा देनेके लिये है । मैं तुम्हारे भोगका साधनभूत परम दाय नहीं हूँ ॥१६ ॥

किंतु उन धोखेबाजोंने तुम्हारे लिये मुझे दायभागके रूपमें दिया है, अतः मैं तुम्हारे जीवन - निर्वाहका ठीक-ठीक उपाय बताता हूँ, तुम श्रवण करो ॥ १७ ॥

इस समय आंगिरसगोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं, उस यज्ञमें वे अपने छठे दिनके कर्ममें भूल कर जाते हैं ॥१८ ॥

अतः हे नभग! हे महाकवे! तुम वहाँ जाओ और जाकर विश्वेदेवसम्बन्धी दो सूक्तोंको उन्हें बतलाओ, जिससे वह यज्ञ शुद्ध हो सके ॥ १ ९ ॥ उस यज्ञकर्मके समाप्त हो जानेपर जब वे ब्राह्मण स्वर्ग जाने लगेंगे तो वे प्रसन्न होकर यज्ञसे बचा हुआ धन तुम्हें दे देंगे ॥ २० ॥

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पृष्ठ 143

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अ ० २ ९ ] शतरुद्रसंहिता १३१ नन्दीश्वर उवाच

तदाकर्ण्य पितुर्वाक्यं नभगः सत्यसारवान् ।

जगाम तत्र सुप्रीत्या यत्र तत्सत्रमुत्तमम् ॥ २१

तदाहः कर्मणि मुने सत्रे तस्मिन्स मानवः ।

सूक्ते द्वे वैश्वदेवे हि प्रोवाच स्पष्टतः सुधीः ॥ २२

समाप्ते कर्मणि ततो विप्रा आंगिरसाश्च ते ।

तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं स्वं स्वं सत्रावशेषितम् ॥ २३

तत्तदा स्वीकरिष्यन्तं सुसत्रपरिशेषितम् ।

विज्ञाय गिरिशः सद्य आविर्भूतः सदूतिकृत् ॥ २४

सर्वांगसुन्दरः श्रीमान्पुरुषः कृष्णदर्शनः ।

भावं समीक्षितुं भागं दातुं ज्ञानं परं च तत् ॥ २५

अथो स शंकरः शम्भुः परीक्षाकर ईश्वरः ।

उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य नभगं तं हि मानवम् ॥ २६

ईश्वर उवाच

कस्त्वं गृह्णासि पुरुष ममेदं वास्तुकं वसु ।

प्रेषितः केन तत्सर्वं सत्यं वद ममाग्रतः ॥ २७

नन्दीश्वर उवाच

तच्छ्रुत्वा तद्वचस्तात मानवो नभगः कविः ।

प्रत्युवाच विनीतात्मा पुरुषं कृष्णदर्शनम् ॥ २८

नभग उवाच ममेदमृषिभिर्दत्तं वसु वसु यज्ञगतं

यज्ञगतं खलु ।

कथं वारयसे मां त्वं गृह्णन्तं कृष्णदर्शन ॥ २ ९

नन्दीश्वर उवाच

आकर्ण्य नाभगं वाक्यमिदं सत्यमुदीरितम् ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पुरुषः कृष्णदर्शनः ॥३०

कृष्णदर्शन उवाच

विवादेऽस्मिन्हि नौ तात प्रमाणं जनकस्तव ।

याहि तं पृच्छ स ब्रूयात्तत्प्रमाणं तु सत्यतः ॥ ३१

2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_6_2_Front नन्दीश्वर बोले- पिताकी यह बात सुनकर सत्य बोलनेवाले नभग बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ गये, जहाँ वह उत्तम यज्ञ हो रहा था और हे मुने! उस दिन यज्ञकर्ममें उन परम बुद्धिमान् नभगने विश्वेदेवके दोनों सूक्तोंको स्पष्ट रूपसे कहा ॥ २१-२२ ॥ यज्ञकर्मके समाप्त हो जानेपर वे आंगिरस विप्र यज्ञसे बचा हुआ सारा धन उन्हें देकर स्वर्ग चले गये ॥ २३ ॥

उस श्रेष्ठ यज्ञके शेष धनको ज्यों ही नभगने लेना चाहा, उसी समय यह जानकर उत्तम लीला करनेवाले शिवजी शीघ्र ही प्रकट हो गये । वे कृष्णदर्शन शिवजी सर्वांगसुन्दर तथा श्रीमान् थे । यज्ञशेष धन किसका भाग होता है - इस बातकी परीक्षा करनेके लिये तथा नभगको भाग और उत्तम ज्ञान देनेके लिये वे प्रकट हुए थे ॥ २४-२५ ॥ इसके बाद परीक्षा करनेवाले ऐश्वर्यशाली उन कल्याणकारी शंकरने उन मनुपुत्र नभगके पास उत्तरकी ओरसे जाकर [ उनका अभिप्राय जाननेके लिये ] उनसे कहा —॥२६ ॥

ईश्वर बोले – हे पुरुष! तुम कौन हो? तुम्हें यहाँ किसने भेजा है? यह यज्ञमण्डपसम्बन्धी धन तो मेरा है, तुम इसे क्यों ग्रहण करते हो, मेरे सामने सत्य-सत्य बताओ ॥२७ ॥

नन्दीश्वर बोले - हे तात! मनुपुत्र कवि नभगने उनका वचन सुनकर अत्यन्त विनम्र होकर उन कृष्णदर्शन पुरुषसे कहा- — ॥ २८ ॥

नभग बोले- यज्ञसे ( अवशिष्ट ) प्राप्त हुए इस धनको ऋषियोंने मुझे दिया है । हे कृष्णदर्शन! तब आप इसे लेनेसे मुझे क्यों मना करते हैं? ॥ २ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले — नभगद्वारा कहे गये सत्य वचनको सुनकर प्रसन्नचित्त कृष्णदर्शन पुरुषने कहा-॥ ३० ॥

कृष्णदर्शन बोला- हे तात! हम दोनोंके इस विवादमें तुम्हारे पिता प्रमाण हैं, जाओ और उनसे पूछो, वे जो कुछ भी कहेंगे, वही सत्यरूपमें प्रमाण | होगा ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 144

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१३२ नन्दीश्वर उवाच तदाकर्ण्य वचस्तस्य नभगो मानवः कविः आगच्छत्पितरं प्रीत्या तदुक्तं पृष्टवान्मुने पुत्रोदितं समाकर्ण्य श्राद्धदेवः स वै मनुः स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं प्राप्तस्मृतिरुवाच तम् मनुरुवाच हे तात शृणु मद्वाक्यं स देवः पुरुषः शिवः तस्यैव सकलं वस्तु यज्ञप्राप्तं विशेषतः अध्वरोर्वरितं वस्तु रुद्रभागः प्रकीर्तितः । इत्यपि प्राज्ञवादो हि क्वचिज्जातस्तदिच्छया स देव ईश्वरः सर्वं वस्त्वर्हति न संशयः । यज्ञावशिष्टं किमुत परे तस्येच्छया विभोः

अनुग्रहार्थमायातस्तव तद्रूपतः प्रभुः ।

तत्र त्वं गच्छ नभग प्रसन्नं कुरु सत्यतः ॥

क्षमापय स्वापराधं सुप्रणम्य स्तुतिं कुरु ।

सर्वप्रभुः स एवेशो यज्ञाधीशोऽखिलेश्वरः ॥

विष्णुब्रह्मादयो देवाः सिद्धाः सर्वर्षयोऽपि हि ।

तदनुग्रहतस्तात समर्थाः सर्वकर्मणि ॥

किम्बहूक्त्यात्मजश्रेष्ठ गच्छ तत्राशु माचिरम् ।

प्रसादय महादेवं सर्वथा सकलेश्वरम् ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्युक्त्वा स मनुः श्राद्धदेवश्च तनयं द्रुतम् ।

प्रेषयामास निकटं शम्भोः सोऽपि समेत्य तम् ॥

नभगश्च प्रणम्याशु साञ्जलिर्नतमस्तकः ।

प्रोवाच सुप्रसन्नात्मा विनयेन महामतिः ॥

नभग उवाच

इदं तवेश सर्वं हि वस्तु त्रिभुवने हि यत् ।

इत्याह मे पिता नूनं किमुताध्वरशेषितम् ॥

अजानता मया नाथ यदुक्तं तद्वचो भ्रमात् ।

अपराधं त्वं क्षमस्व शिरसा त्वां प्रसादये ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९ नन्दीश्वर बोले — हे मुने! उनका यह वचन । । सुनकर मनुपुत्र कवि नभग अपने पिताके पास आये ॥ ३२ / और प्रसन्नतासे उनके द्वारा कही गयी बातके विषयमें पूछने लगे ॥३२ ॥

तब उन श्राद्धदेव मनुने पुत्रकी बात सुनकर

।

शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण किया और वस्तु-॥ ३३ स्थितिको समझकर उससे कहा- ॥ ३३ ॥

मनु बोले – हे तात! मेरी बात सुनो, वे । कृष्णदर्शन पुरुष साक्षात् शिव हैं । सब वस्तु उन्हींकी ॥ ३४ है और विशेषकर यज्ञसे प्राप्त वस्तु उन्हींकी है । यज्ञसे बचा हुआ भाग रुद्रभाग कहा गया है । उनकी प्रेरणासे कहीं - कहीं बुद्धिमान् लोग ऐसा कहा करते ॥ ३५ हैं ॥ ३४-३५ ॥ वे देव ईश्वर ही यज्ञसे बची हुई सारी वस्तुके ॥ ३६ अधिकारी हैं, इसमें सन्देह नहीं है । उन विभुकी इच्छाके परे है ही क्या! ॥३६ ॥

हे नभग! तुम्हारे ऊपर कृपा करनेके लिये ही वे ३७ प्रभु उस रूपमें आये हुए हैं, तुम वहाँ जाओ और अपने सत्यसे उन्हें प्रसन्न करो, अपने अपराधके लिये क्षमा माँगो और भलीभाँति प्रणाम करके उनकी स्तुति करो । ३८ वे शिव ही सर्वप्रभु, यज्ञके स्वामी एवं अखिलेश्वर हैं । हे तात! ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता, सिद्धगण एवं सभी ३ ९ ऋषि भी उनके अनुग्रहसे सभी कर्मोंको करनेमें समर्थ होते हैं । हे पुत्रश्रेष्ठ! अधिक कहनेसे क्या लाभ, ४० तुम वहाँ शीघ्र जाओ, विलम्ब मत करो और सर्वेश्वर महादेवको सब प्रकारसे प्रसन्न करो ॥ ३७–४० ॥ नन्दीश्वर बोले — इतना कहकर श्राद्धदेव मनुने पुत्रको शीघ्र ही शिवजीके समीप भेजा । वे महाबुद्धिमान् ४१ नभग भी शिवजीके पास शीघ्र जाकर हाथ जोड़कर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके अति प्रसन्नचित्त ४२ होकर विनयपूर्वक कहने लगे— ॥ ४१-४२ ॥ नभग बोले — हे ईश! इन तीनों लोकोंमें जो भी वस्तु है, सब आपकी ही वस्तु है, फिर यज्ञशेष वस्तुके ४३ विषयमें कहना ही क्या - ऐसा मेरे पिताने कहा है ॥ ४३ ॥

हे नाथ! मैंने अज्ञानवश भ्रमसे जो वचन कहा है, मेरे उस अपराधको आप क्षमा करें, मैं सिर ४४ । झुकाकर आपको प्रसन्न करता हूँ ॥ ४४ ॥

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पृष्ठ 145

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अ ० २ ९ ] शतरुद्रसंहिता १३३

इत्युक्त्वा नभगः सोऽतिदीनधीस्तु कृताञ्जलिः ।

तुष्टाव तं महेशानं कृष्णदर्शनमानतः ॥

श्राद्धदेवोऽपि शुद्धात्मा नतकः साञ्जलिः सुधीः ।

तुष्टाव तं प्रभुं नत्वा स्वापराधं क्षमापयन् ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र विष्णुब्रह्मादयः सुराः ।

वासवाद्याः समाजग्मुः सिद्धाश्च मुनयोऽपि हि ॥

महोत्सवं प्रकुर्वन्तः सुकृताञ्जलयोऽखिलाः ।

तुष्टुवुर्नतका भक्त्या सुप्रणम्य पृथक्पृथक् ॥

अथ रुद्रः प्रसन्नात्मा कृपादृष्ट्या विलोक्य तान् ।

उवाच नभगं प्रीत्या सस्मितं कृष्णदर्शनः ॥

कृष्णदर्शन उवाच

यत्ते पितावदद्धर्म्यं वाक्यं तत्तु तथैव हि ।

त्वयापि सत्यमुक्तं तत् साधुस्त्वं नात्र संशयः ॥

अतोऽहं सुप्रसन्नोऽस्मि सर्वथा सुव्रतेन ते ।

ददामि कृपया ते हि ज्ञानं ब्रह्म सनातनम् ॥

महाज्ञानी भव त्वं हि सविप्रो नभग द्रुतम् ।

गृहाण वस्त्विदं सर्वं मद्दत्तं कृपयाधुना ॥

इह सर्वसुखं भुङ्क्ष्व निर्विकारं महामते ।

सुगतिं प्राप्स्यसि त्वं हि सविप्रः कृपया मम ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्युक्त्वा तात भगवान्स रुद्रः सत्यवत्सलः ।

सर्वेषां पश्यतां तेषां तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥

विष्णुर्ब्रह्मापि देवाद्याः सर्वे ते मुनिसत्तम ।

स्वं स्वं धाम ययुः प्रीत्या तस्यै नत्वा दिशे मुदा ॥

सपुत्रः श्राद्धदेवोऽपि स्वस्थानमगमन्मुदा । भुक्त्वा भोगान्सुविपुलान्सो ऽन्ते शिवपुरं ययौ ऐसा कहकर वे नभग अत्यन्त दीनबुद्धि होकर ४५ हाथ जोड़कर विनम्र हो उन कृष्णदर्शन महेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥ ४५ ॥

शुद्धात्मा महाबुद्धिमान् श्राद्धदेव भी अपने ४६ अपराधके लिये क्षमायाचना करते हुए विनम्र हो हाथ जोड़कर उन शिवजीको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे ॥४६ ॥

[ हे मुने! ] इसी बीच ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि ४७ देवता, सिद्ध एवं मुनिगण भी वहाँ आ गये और महोत्सव करते हुए वे सब भक्तिसे हाथ जोड़कर ४८ पृथक् - पृथक् भलीभाँति प्रणामकर विनम्र हो उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ इसके बाद कृष्णदर्शनरूपधारी सदाशिवने उन ४ ९ [ देवताओं तथा मुनियों ] -को कृपादृष्टिसे देखकर प्रेमपूर्वक हँसते हुए नभगसे कहा —॥४ ९ ॥ कृष्णदर्शन बोले- तुम्हारे पिताने जो धर्मयुक्त वचन कहा है, बात भी वैसी ही है और तुमने भी ५० सारी बात सत्य - सत्य कही, इसलिये तुम साधु हो, इसमें संशय नहीं है । अतः मैं तुम्हारे इस सत्य ५१ आचरणसे सर्वथा प्रसन्न हूँ और कृपापूर्वक तुम्हें सनातन ब्रह्मका उपदेश करता हूँ ॥ ५०-५१ ॥ हे नभग! तुम [ यज्ञकर्ता ] ब्राह्मणोंसहित शीघ्र ५२ ही महाज्ञानी हो जाओ, अब मेरे द्वारा प्रदत्त इस समस्त [ यज्ञशेष ] सामग्रीको तुम मेरी कृपासे ग्रहण करो ॥ ५२ ॥

हे महामते! तुम निर्विकार होकर इस संसारमें ५३ सभी प्रकारका सुख भोगो, मेरी कृपासे तुम [ यज्ञकर्ता ] ब्राह्मणोंके सहित सद्गति प्राप्त करोगे ॥५३ ॥

नन्दीश्वर बोले- हे तात! सत्यसे प्रेम करनेवाले वे भगवान् रुद्र ऐसा कहकर उन सबके देखते - देखते ५४ वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥५४ ॥

हे मुनिसत्तम! ब्रह्मा, विष्णु आदि वे समस्त ५५ देवगण आनन्दसे उस दिशाको नमस्कारकर प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने धामको चले गये ॥ ५५ ॥

अपने पुत्र नभगको साथ लेकर श्राद्धदेव भी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये और वहाँ अनेक सुखोंको भोगकर अन्तमें वे शिवलोकको चले ॥ ५६ | गये ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 146

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१३४ इत्थं ते कीर्तितो ब्रह्मन्नवतारः शिवस्य हि कृष्णदर्शननामा वै नभगानन्ददायकः इदमाख्यानमनघं भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम् । पठतां शृण्वतां वापि सर्वकामफलप्रदम्

य एतच्चरितं प्रातः सायं च स्मरते सुधीः ।

कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिमन्ते लभेत्पराम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३० । हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने नभगको आनन्द ॥ ५७ देनेवाले कृष्णदर्शन नामक शिवावतारका वर्णन आपसे किया ॥ ५७ ॥

यह पवित्र आख्यान सज्जनोंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है, पढ़ने और सुननेवालोंको भी ॥ ५८ यह । समस्त कामनाओंका फल प्रदान करता है ॥ ५८ ॥

जो बुद्धिमान् प्रातः काल तथा सायंकाल इस | चरित्रका स्मरण करता है, वह कवि तथा मन्त्रवेत्ता हो ५ ९ जाता है और अन्तमें परमगति प्राप्त करता है ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां नन्दीश्वरसनत्कुमारसंवादे कृष्णदर्शनशिवावतारवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें नन्दीश्वर - सनत्कुमार - संवादमें कृष्णदर्शन शिवावतारवर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ९ ॥ अथ भगवान् शिवके नन्दीश्वर उवाच

शृणु त्वं ब्रह्मपुत्राद्यावतारं परमेशितुः ।

अवधूतेश्वराह्वं वै शक्रगर्वापहारकम् ॥

शक्रः पुरा हि सगुरुः सर्वदेवसमन्वितः ।

दर्शनं कर्तुमीशस्य कैलासमगमन्मुने ॥

अथ गुर्विन्द्रयोर्ज्ञात्वागमनं शंकरस्तयोः ।

परीक्षितुं च तद्भावं स्वदर्शनरतात्मनोः ॥

अवधूतस्वरूपोऽभून्नानालीलाकरः प्रभुः ।

दिगंबरो महाभीमो ज्वलदग्निसमप्रभः ॥

सोऽवधूतस्वरूपो हि मार्गमारुद्ध्य सद्गतिः ।

लंबमानपटः शंभुरतिष्ठच्छोभिताकृतिः ॥

अथ तौ गुरुशक्रौ च गच्छन्तौ शिवसन्निधिम् ।

अद्राष्टां पुरुषं भीमं मार्गमध्येऽद्भुताकृतिम् ॥

अथ शक्रो मुनेऽपृच्छत्स्वाधिकारेण दुर्मदः ।

पुरुषं तं स्वमार्गान्तःस्थितमज्ञाय शंकरम् ॥

त्रिंशोऽध्यायः अवधूतेश्वरावतारका वर्णन नन्दीश्वरजी बोले – हे ब्रह्मपुत्र! अब आप शिवजीके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन सुनिये, १ जो इन्द्रके घमण्डको नष्ट करनेवाला है ॥१ ॥

हे मुने! पूर्व समयमें बृहस्पति एवं देवताओंके सहित इन्द्र शिवजीका दर्शन करनेके लिये कैलास २ पर्वतपर जा रहे थे ॥२ ॥

अपने दर्शनके लिये निरत चित्तवाले बृहस्पति तथा ३ इन्द्रको आते जानकर उनके भावकी परीक्षा करनेके लिये नाना प्रकारकी लीला करनेवाले प्रभु शिवजी दिगम्बर, महाभीमरूप तथा जलती हुई अग्निके समान ४ प्रभावाले अवधूतके रूपमें स्थित हो गये । सज्जनोंको गति प्रदान करनेवाले तथा सुन्दर आकृतिवाले वे ५ अवधूतस्वरूप शिवजी लटकते हुए वस्त्र धारण किये उनका मार्ग रोककर खड़े हो गये॥३–५ ॥ उसके बाद शिवजीके समीप जाते हुए उन ६ बृहस्पति तथा इन्द्रने [ अपने ] मार्गके मध्यमें अद्भुत आकारवाले एक भयंकर पुरुषको देखा ॥ ६ ॥

हे मुने! यह देखकर अधिकारमदमें चूर हुए इन्द्रने अपने मार्गके बीचमें खड़े पुरुषको उसे शंकर ७ न जानकर उससे पूछा ॥ ७ ॥

पृष्ठ 147

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अ ० ३० ] शक्र उवाच

कस्त्वं दिगंबराकारावधूतः कुत आगतः ।

किन्नाम तव विख्यातं तत्त्वतो वद मेऽचिरम् ॥

स्वस्थाने संस्थितः शंभुः किं वान्यत्र गतोऽधुना ।

दर्शनार्थं हि तस्याहं गच्छामि सगुरुः सुरैः ॥

नन्दीश्वर उवाच

शक्रेणेत्थं स पृष्टश्च किञ्चिन्नोवाच पूरुषः ।

लीलागृहीतदेहः स शङ्करो मदहा प्रभुः ॥

शक्रः पुनरपृच्छत्तं नोवाच स दिगंबरः । अविज्ञातगतिः शम्भुर्महाकौतुककारकः पुनः पुरन्दरोऽपृच्छत् त्रैलोक्याधिपतिः स्वराट् । तूष्णीमास महायोगी महालीलाकरः स वै इत्थं पुनः पुनः पृष्टः शक्रेण स दिगम्बरः । नोवाच किञ्चिद्भगवान् शक्रदर्पजिघांसया अथ चुक्रोध देवेशस्त्रैलोक्यैश्वर्यगर्वितः शतरुद्रसंहिता १३५ शक्र बोले- दिगम्बर अवधूत वेष धारण किये हुए तुम कौन हो, कहाँसे आये हो और तुम्हारा ८ क्या नाम है? तुम मुझे ठीक - ठीक शीघ्र बताओ ॥ ८ ॥

इस समय शिवजी अपने स्थानपर हैं अथवा ९ कहीं गये हुए हैं? मैं देवताओं और गुरु बृहस्पतिको साथ लेकर उनके दर्शनहेतु जा रहा हूँ॥९॥

नन्दीश्वर बोले— [ हे सनत्कुमार! ] इन्द्रके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर लीलासे [ अवधूत ] १० देहधारी तथा अहंकारको चूर्ण करनेवाले उन पुरुषरूप प्रभु शिवने कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥१० ॥

इन्द्रने उनसे पुन: पूछा, किंतु अलक्षित गतिवाले ॥ ११ महाकौतुकी वे दिगम्बर शिव फिर भी कुछ नहीं बोले ॥ ११ ॥

जब त्रैलोक्याधिपति स्वराट् इन्द्रने पुनः पूछा, तो ॥ १२ भी महान् लीला करनेवाले वे महायोगी मौन ही रहे । इस प्रकार बारंबार इन्द्रके द्वारा पूछे जानेपर भी दिगम्बर भगवान् शिवजी इन्द्रका गर्व नष्ट करनेकी ॥ १३ इच्छासे कुछ नहीं बोले ॥ १२-१३ ॥ । तब तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे गर्वित इन्द्रको बड़ा उवाच वचनं क्रोधात्तं निर्भर्त्स्य जटाधरम् ॥ १४ क्रोध उत्पन्न हुआ और उन्होंने क्रोधसे उन जटाधारीको इन्द्र उवाच पृच्छमानोऽपि रे मूढ नोत्तरं दत्तवानसि अतस्त्वां हन्मि वज्रेण कस्ते त्रातास्ति दुर्मते इत्युदीर्य ततो वज्री संनिरीक्ष्य क्रुधा हि तम् हन्तुं दिगम्बरं वज्रमुद्यतं स चकार ह वज्रहस्तं च तं दृष्ट्वा शक्रं शीघ्रं सदाशिवः चकार स्तम्भनं तस्य वज्रपातस्य शंकरः ततः स पुरुषः क्रुद्धः करालाक्षो भयङ्करः द्रुतमेव प्रजज्वाल तेजसा प्रदहन्निव बाहुप्रतिष्टम्भभुवा मन्युनान्तः शचीपतिः समदह्यत भोगीव मन्त्ररुद्धपराक्रमः धमकाते हुए कहा —॥१४ ॥

इन्द्र बोले – रे मूढ! रे दुर्मते! तुमने मेरे । पूछनेपर भी कुछ भी उत्तर नहीं दिया, इसलिये मैं ॥ १५ इस वज्रसे तुम्हारा वध करता हूँ, देखें, कौन तुम्हारी रक्षा करता है । ऐसा कहकर इन्द्रने क्रोधपूर्वक उनकी । ओर देखकर उन दिगम्बरको मारनेके लिये वज्र ॥१६ उठाया ॥ १५-१६ ॥ । सदाशिव शंकरने हाथमें वज्र उठाये हुए इन्द्रको ॥ १७ देखकर शीघ्र ही उनका स्तम्भन कर दिया ॥१७ ॥

। तदनन्तर भयंकर तथा विकराल नेत्रोंवाले वे ॥ १८ पुरुष कुपित होकर अपने तेजसे [ मानो इन्द्रको ] जलाते हुए शीघ्र ही प्रज्वलित हो उठे ॥१८ ॥

उस समय अपनी बाहुके स्तम्भित हो जानेके कारण उत्पन्न हुए क्रोधसे इन्द्र भीतर - ही-भीतर इस तरह जल रहे थे, जिस प्रकार मन्त्रके । द्वारा अपने पराक्रमके रुक जानेसे सर्प मन - ही - मन ॥ १ ९ | जलता है ॥ १ ९ ॥

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१३६

दृष्ट्वा बृहस्पतिस्त्वेनं प्रज्वलन्तं स्वतेजसा ।

पुरुषं तं धियामास प्रणनाम हरं द्रुतम् ॥

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ततो गुरुरुदारधीः । दण्डवत्कौ पुनर्नत्वा प्रभुं तुष्टाव भक्तितः गुरुरुवाच देवदेव महादेव शरणागतवत्सल । प्रसन्नो भव गौरीश सर्वेश्वर नमोऽस्तु ते

मायया मोहिताः सर्वे ब्रह्मविष्ण्वादयोऽपि ते ।

त्वां न जानन्ति तत्त्वेन जानन्ति त्वदनुग्रहात् ॥

नन्दीश्वर उवाच

बृहस्पतिरिति स्तुत्वा स तदा शङ्करं प्रभुम् ।

पादयोः पातयामास तस्येशस्य पुरन्दरम् ॥

ततस्तात सुराचार्यः कृताञ्जलिरुदारधीः ।

बृहस्पतिरुवाचेदं प्रश्रयावनतः सुधीः ॥

बृहस्पतिरुवाच

दीनानाथ महादेव प्रणतं तव पादयोः ।

समुद्धर च मां तत्त्वं क्रोधं न प्रणयं कुरु ॥

तुष्टो भव महादेव पाहीन्द्रं शरणागतम् ।

वह्निरेष समायाति भालनेत्रसमुद्भवः ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्याकर्ण्य गुरोर्वाक्यमवधूताकृतिः प्रभुः ।

उवाच करुणासिन्धुर्विहसन् स सदूतिकृत् ॥

अवधूत उवाच

क्रोधाच्च निस्सृतं तेजो धारयामि स्वनेत्रतः ।

कथं हि कञ्चुकीं सर्पः संधत्ते चोज्झितां पुनः ॥

नन्दीश्वर उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य शङ्करस्य बृहस्पतिः ।

उवाच साञ्जलिर्भूयो भयव्याकुलमानसः ॥

बृहस्पतिरुवाच

हे देव भगवन्भक्ता अनुकम्प्याः सदैव हि ।

भक्तवत्सलनामेति स्वं सत्यं कुरु शंकर ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३० बृहस्पतिने तेजसे प्रज्वलित होते हुए उन पुरुषको २० | देखकर अपनी बुद्धिसे उन्हें शिव जान लिया और शीघ्रतासे उन्हें प्रणाम किया ॥ २० ॥

इसके बाद उदार बुद्धिवाले वे गुरु बृहस्पति हाथ जोड़कर पुनः पृथ्वीमें [ लेटकर ] दण्डवत् प्रणाम ॥ २१ । करके भक्तिपूर्वक शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥ २१ गुरु बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे शरणागत- ॥ । वत्सल! प्रसन्न होइये । हे गौरीश! हे सर्वेश्वर! आपको ॥ २२ नमस्कार है । ब्रह्मा, विष्णु आदि समस्त देवता भी आपकी मायासे मोहित होकर आपको यथार्थ रूप में नहीं जान पाते हैं, केवल आपकी कृपासे ही जान २३ सकते हैं ॥ २२-२३ ॥ नन्दीश्वर बोले — बृहस्पतिने इस प्रकार प्रभु शिवजीकी स्तुति करके इन्द्रको उन ईश्वरके चरणों में २४ गिरा दिया । तदनन्तर हे तात! उदार बुद्धिवाले विद्वान् देवगुरु बृहस्पतिने हाथ जोड़कर विनम्रतासे कहा— २५ ॥ २४-२५ ॥ बृहस्पति बोले – हे दीननाथ! हे महादेव! मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ, आप मेरा और इनका उद्धार २६ कीजिये; क्रोध नहीं, बल्कि प्रेम कीजिये ॥२६ ॥

हे महादेव! आप प्रसन्न होइये और अपने २७ शरणमें आये हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आपके भालस्थ नेत्रसे उत्पन्न हुई यह अग्नि [ इन्द्रको जलानेके लिये ] आ रही है ॥ २७ ॥

नन्दीश्वर बोले- देवगुरुका यह वचन सुनकर अवधूत आकृतिवाले, करुणासिन्धु, उत्तम लीला २८ करनेवाले उन प्रभुने हँसते हुए कहा —॥२८ ॥

अवधूत बोले — मैं क्रोधके कारण अपने नेत्रसे निकले हुए तेजको किस प्रकार धारण करूँ? क्या २ ९ सर्प कंचुकीका त्याग करनेके उपरान्त पुनः उसे धारण कर सकता है ॥२ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले — उन शंकरके इस वचनको सुनकर भयसे व्याकुल मनवाले बृहस्पतिने हाथ जोड़कर ३० पुनः कहा- ॥३० ॥

बृहस्पति बोले — हे देव! हे भगवन्! भक्त सर्वदा अनुकम्पाके योग्य होते हैं । हे शंकर! अपने ३१ । भक्तवत्सल नामको सार्थक कीजिये ॥ ३१ ॥

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अ ० ३० ] शतरुद्रसंहिता १३७

क्षेप्तुमन्यत्र देवेश स्वतेजोऽत्युग्रमर्हसि ।

उद्धर्ता सर्वभक्तानां समुद्धर पुरन्दरम् ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्युक्तो गुरुणा रुद्रो भक्तवत्सलनामभाक् ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा सुरेज्यं प्रणतार्तिहा ॥

रुद्र उवाच

प्रीतस्तेऽहं सुराचार्य ददामि वरमुत्तमम् ।

इन्द्रस्य जीवदानेन जीवेति त्वं प्रथां व्रज ॥

समुद्भूतोऽनलो योऽयं भालनेत्रात्सुरासहः ।

एनं त्यक्ष्याम्यहं दूरे यथेन्द्रं नैव पीडयेत् ॥

नन्दीश्वर उवाच

इत्युक्त्वा स करे धृत्वा स्वतेजोऽनलमद्भुतम् ।

भालनेत्रसमुद्भूतं प्राक्षिपल्लवणाम्भसि ॥

अथो शिवस्य तत्तेजो भालनेत्रसमुद्भवम् ।

क्षिप्तं च लवणाम्भोधौ सद्यो बालो बभूव ह ॥

स जलन्धरनामाभूत्सिन्धुपुत्रोऽसुरेश्वरः ।

तं जघान महेशानो देवप्रार्थनया प्रभुः ॥

इत्थं कृत्वा सुचरितं शङ्करो लोकशङ्करः ।

अवधूतस्वरूपेण ततश्चान्तर्हितोऽभवत् ॥

बभूवुः सकला देवाः सुखिनश्चातिनिर्भयाः ।

गुरुशक्रौ भयान्मुक्तौ जग्मतुः सुखमुत्तमम् ॥

यदर्थे गमनोद्युक्तौ दर्शनं प्राप्य तस्य तौ ।

कृतार्थौ गुरुशक्रौ हि स्वस्थानं जग्मतुर्मुदा ॥

अवधूतेश्वराह्वोऽवतारस्ते कथितो मया । परमेशस्य परमानन्ददः खलदण्डदः हे देवेश! आप अपने इस अत्यन्त उग्र तेजको ३२ किसी अन्य स्थानपर रख सकते हैं; आप सभी भक्तोंका उद्धार करनेवाले हैं, अतः इन्द्रका उद्धार कीजिये ॥ ३२ ॥

नन्दीश्वर बोले — इस प्रकार बृहस्पतिके कहनेपर भक्तवत्सल नामसे पुकारे जानेवाले तथा भक्तोंका ३३ कष्ट दूर करनेवाले भगवान् रुद्रने प्रसन्नचित्त होकर

देवगुरुसे कहा- । - ॥ ३३ ॥

रुद्र बोले — हे सुराचार्य! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, इसलिये आपको उत्तम वर देता हूँ कि इन्द्रको ३४ जीवनदान देनेके कारण आप लोकमें जीव नामसे विख्यात होंगे । मेरे भालस्थ नेत्रसे जो देवताओंके लिये असह्य अग्नि उत्पन्न हुई है, उसे मैं दूर फेंक ३५ देता हूँ, जिससे कि यह इन्द्रको पीड़ित न कर सके ॥ ३४-३५ ॥ नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर शिवजीने अपने भालस्थ नेत्रसे उत्पन्न हुई उस अद्भुत अग्निको हाथमें ३६ लेकर लवणसमुद्रमें फेंक दिया ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् शिवके भालनेत्रसे उत्पन्न वह तेज, जो लवणसमुद्रमें फेंका गया था, शीघ्र ही बालकरूपमें ३७ परिणत हो गया ॥ ३७ ॥

वही बालक समुद्रका पुत्र तथा समस्त असुरोंका ३८ अधिपति होकर जलन्धर नामसे विख्यात हुआ, फिर देवताओंकी प्रार्थनासे प्रभु शिवजीने ही उसका वध किया ॥ ३८ ॥

लोककल्याणकारी शिवजी अवधूतरूपसे ३ ९ इस प्रकारका सुन्दर चरित्रकर पुनः अन्तर्धान हो गये और सभी देवता सुखी तथा निर्भय हो गये । बृहस्पति और इन्द्र भी भयमुक्त होकर अत्यन्त सुखी ४० हो गये ॥ ३ ९ -४० ॥ जिनका दर्शन करनेहेतु इन्द्र और बृहस्पति जा ४१ रहे थे, उनका दर्शन प्राप्तकर वे कृतार्थ हो गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये ॥ ४१ ॥

[ हे सनत्कुमार! ] मैंने दुष्टोंको दण्ड देनेवाले तथा परमानन्ददायक परमेश्वर शिवजीके अवधूतेश्वर ॥ ४२ । नामक अवतारका वर्णन आपसे कर दिया ॥ ४२ ॥

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१३८ इदमाख्यानमनघं यशस्यं स्वर्ग्यमेव च भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥

य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः ।

इह सर्वसुखं भुक्त्वा सोऽन्ते शिवगतिं लभेत् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ । यह आख्यान पवित्र, दिव्य, यशको बढ़ानेवाला, ४३ स्वर्ग, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको । पूर्ण करनेवाला है । जो स्थिरचित्त हो प्रतिदिन | सुनता अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें सभी इसे सुखोंको भोगकर अन्तमें शिवकी गतिको प्राप्त कर ४४ | लेता है॥४३-४४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां नन्दीश्वरसनत्कुमारसंवादे अवधूतेश्वरशिवावतारचरित्रवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके नन्दीश्वर - सनत्कुमार - संवादमें अवधूतेश्वरशिवावतारचरित्रवर्णन नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

अथैकत्रिंशोऽध्यायः शिवजीके नन्दीश्वर उवाच अथ वक्ष्ये मुनिश्रेष्ठ शम्भोः शृण्ववतारकम् स्वभक्तदयया विप्र नारीसन्देहभंजकम् आसीत्सत्यरथो नाम्ना विदर्भविषये नृपः धर्मात्मा सत्यशीलश्च महाशैवजनप्रियः ॥ तस्य राज्ञः सुधर्मेण महीं पालयतो मुने । महान्कालो व्यतीयाय सुखेन शिवधर्मतः

कदाचित्तस्य राज्ञस्तु शाल्वैश्च पुररोधिभिः ।

महान् रणो बभूवाथ बहुसैन्यैर्बलोद्धतैः ॥

स विदर्भनृपः कृत्वा सार्धं तैर्दारुणं रणम् ।

प्रनष्टोरुबलः शाल्वैर्निहतो दैवयोगतः ॥

तस्मिन्नृपे हते युद्धे शाल्वैस्तु भयविह्वलाः ।

सैनिका हतशेषाश्च मन्त्रिभिः सह दुद्रुवुः ॥

अथ तस्य महाराज्ञी रात्रौ स्वपुरतो मुने ।

संरुद्धा रिपुभिर्यलादन्तर्वत्नी बहिर्ययौ ॥

निर्गता शोकसंतप्ता सा राजमहिषी शनैः ।

प्राचीं दिशं ययौ दूरं स्मरन्तीशपदाम्बुजम् ॥

भिक्षुवर्यावतारका वर्णन नन्दीश्वर बोले - हे मुनिश्रेष्ठ! हे विप्र! अब । मैं शिवजीके उस अवतारका वर्णन करूँगा, जिसे ॥ १ [ किसी ] नारीके सन्देहका निवारण करनेके लिये उन्होंने अपने भक्तपर दया करके ग्रहण किया था, उसे आप सुनिये ॥१ ॥

। विदर्भनगरमें धर्मात्मा, सत्यशील तथा शिवभक्तोंसे २ प्रेम करनेवाला सत्यरथ नामक एक राजा था ॥२ ॥

हे मुने! धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते एवं ॥ ३ शिवधर्मसे सुखपूर्वक निवास करते हुए उस राजाका राज् बहुत समय बीत गया ॥३ ॥

किसी समय उसके नगरको अवरुद्ध करनेवाले, ४ बहुत - सी सेनासे युक्त तथा बलसे उन्मत्त शाल्वसंज्ञक क्षत्रिय वीरोंके साथ उस राजाका घोर युद्ध हुआ ॥४ ॥

उन शाल्ववीरोंके साथ भयानक युद्ध करके नष्ट ५ हुए पराक्रमवाला वह विदर्भराज दैवयोगसे उनके द्वारा मार दिया गया । शाल्वोंके द्वारा रणभूमिमें उस राजाके ६ मारे जानेपर उसके बचे हुए सैनिक भयसे व्याकुल होकर मन्त्रियोंके साथ भाग गये ॥ ५-६ ॥ हे मुने! उसके बाद उस राजाकी गर्भवती रानी ७ शत्रुओंके द्वारा घिरी होनेपर भी रात्रिके समय बड़े यत्नसे नगरसे बाहर चली गयी । शोकसे सन्तप्त वह रानी [ राजधानीसे ] निकलकर शिवके चरणकमलोंका ध्यान ८ करती हुई पूर्व दिशाकी ओर बहुत दूर चली गयी ॥ ७-८ ॥