शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 21–30

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ] क्रियते यस्य कस्यापि देहिनो यदि निग्रहः अष्टमूर्तेरनिष्टं तत्कृतमेव न संशयः अष्टमूर्त्यात्मना विश्वमधिष्ठायास्थितं शिवम् भजस्व सर्वभावेन रुद्रं परमकारणम् ॥ इति प्रोक्ताः स्वरूपास्ते विधिपुत्राष्टविश्रुताः । सर्वोपकारनिरताः सेव्याः श्रेयोऽर्थिभिर्नरैः शतरुद्रसंहिता १७ । यदि किसीके द्वारा जिस किसी भी शरीरधारीको ॥ १५ कष्ट दिया जाता है, तो मानो अष्टमूर्ति शिवका ही वह अनिष्ट किया गया है, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥

। अतः अष्टमूर्तिरूपसे सारे विश्वको व्याप्त करके १६ सर्वतोभावेन स्थित परमकारण रुद्र शिवका सर्वभावसे भजन कीजिये । [ हे सनत्कुमार! ] हे विधिपुत्र! इस प्रकार मैंने आपसे शिवके प्रसिद्ध आठ स्वरूपोंका वर्णन किया, अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यों को सभीके उपकारमें निरत इन रूपोंकी उपासना करनी ॥ १७ चाहिये ॥ १६-१७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां शिवाष्टमूर्त्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें शिवाष्टमूर्तिवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः भगवान् शिवका अर्धनारीश्वर अवतार एवं सतीका प्रादुर्भाव नन्दीश्वर उवाच शृणु तात महाप्राज्ञ विधिकामप्रपूरकम् अर्द्धनारीनराख्यं हि शिवरूपमनुत्तमम् यदा सृष्टाः प्रजाः सर्वाः न व्यवर्द्धन्त वेधसा तदा चिंताकुलोऽभूत्स तेन दुःखेन दुखितः नभोवाणी तदाभूद्वै सृष्टिं मिथुनजां कुरु तच्छ्रुत्वा मैथुनीं सृष्टिं ब्रह्मा कर्तुममन्यत नारीणां कुलमीशानान्निर्गतं न पुरा यतः । ततो मैथुनजां सृष्टिं कर्तुं शेके न पद्मभूः प्रभावेण विना शंभोर्न जायेरन्निमाः प्रजाः एवं संचिन्तयन्ब्रह्मा तपः कर्त्तुं प्रचक्रमे शिवया परया शक्त्या संयुक्तं परमेश्वरम् संचिन्त्य हृदये प्रीत्या तेपे स परमं तपः तीव्रेण तपसा तस्य संयुक्तस्य स्वयंभुवः अचिरेणैव कालेन तुतोष स शिवो द्रुतम् ॥ नन्दीश्वर बोले - हे तात! हे महाप्राज्ञ! अब । मैं ब्रह्माजीकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले शिवके ॥ १ उत्तम अर्धनारीश्वर नामक रूपका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनें । ब्रह्माके द्वारा विरचित समस्त प्रजाओंका । जब विस्तार नहीं हुआ, तब उस दुःखसे व्याकुल हो ॥ २ वे चिन्तित रहने लगे ॥ १-२ ॥ । तब आकाशवाणी हुई कि आप मैथुनी सृष्टि ॥ ३ करें । यह सुनकर ब्रह्माने मैथुनी सृष्टि करनेका निश्चय किया । उस समय शिवजीसे स्त्रियाँ उत्पन्न नहीं हुई थीं, अतः ब्रह्माजी मैथुनी सृष्टि करनेमें समर्थ ॥ ४ नहीं हो सके॥३-४ ॥ । शिवके प्रभावके बिना इन प्रजाओंकी वृद्धि नहीं ॥ होगी - ऐसा विचार करते हुए ब्रह्माजी तप करनेको उद्यत हुए । पार्वतीरूप परम शक्तिसे संयुक्त परमेश्वर । शिवका हृदयमें ध्यानकर वे अत्यन्त प्रीतिसे महान् ॥ ६ तपस्या करने लगे । इस प्रकारकी उग्र तपस्यासे संयुक्त । हुए उन स्वयम्भू ब्रह्मापर थोड़े समयमें शिवजी शीघ्र ७ । ही प्रसन्न हो गये ॥ ५–७ ॥

पृष्ठ 22

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ १८ मूर्तिमाविश्य कामदाम् । उसके पश्चात् भगवान् हर अपनी पूर्ण चैतन्यमयी, ततः पूर्णचिदीशस्य अर्द्धनारीनरो भूत्वा गतो ब्रह्मान्तिकं हरः तं दृष्ट्वा शङ्करं देवं शक्त्या परमयान्वितम् प्रणम्य दण्डवद्ब्रह्मा स तुष्टाव कृताञ्जलिः अथ देवो महादेवो वाचा मेघगभीरया संभवाय सुसंप्रीतो विश्वकर्ता महेश्वरः ईश्वर उवाच वत्स वत्स महाभाग मम पुत्र पितामह ज्ञातवानस्मि सर्वं तत्तत्त्वतस्ते मनोरथम् प्रजानामेव वृद्ध्यर्थं तपस्तप्तं त्वयाधुना तपसा तेन तुष्टोऽस्मि ददामि च तवेप्सितम् इत्युक्त्वा परमोदारं स्वभावमधुरं वचः पृथक्चकार वपुषो भागाद्देवीं शिवां शिवः तां दृष्ट्वा परमां शक्तिं पृथग्भूतां शिवागताम् प्रणिपत्य विनीतात्मा प्रार्थयामास तां विधिः ब्रह्मोवाच

देवदेवेन सृष्टोऽहमादौ त्वत्पतिना शिवे ।

प्रजाः सर्वा नियुक्ताश्च शंभुना परमात्मना ॥

मनसा निर्मिताः सर्वे शिवे देवादयो मया ।

न वृद्धिमुपगच्छन्ति सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥

मिथुनप्रभवामेव कृत्वा सृष्टिमतः परम् ।

संवर्द्धयितुमिच्छामि सर्वा एव मम प्रजाः ॥

न निर्गतं पुरा त्वत्तो नारीणां कुलमव्ययम् ।

तेन नारीकुलं स्रष्टुं मम शक्तिर्न विद्यते ॥

सर्वासामेव शक्तीनां त्वत्तः खलु समुद्भवः ।

तस्मात्त्वां परमां शक्तिं प्रार्थयाम्यखिलेश्वरीम् ॥

शिवे नारीकुलं स्रष्टुं शक्तिं देहि नमोऽस्तु ते ।

चराचरजगद्वृद्धिहेतोर्मातः शिवप्रिये ॥

॥ ८ ऐश्वर्यशालिनी तथा सर्वकामप्रदायिनी मूर्तिमें प्रविष्ट होकर अर्धनारीनरका रूप धारणकर ब्रह्माके पास गये ॥ ८ ॥

। वे ब्रह्माजी परम शक्तिसे सम्पन्न उन परमेश्वरको ॥ ९ देखकर दण्डवत् प्रणामकर हाथ जोड़े हुए उनकी । स्तुति करने लगे । इसके बाद देवाधिदेव विश्वकर्ता ॥ १० महेश्वरने अत्यन्त प्रसन्न हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें सृष्टिके लिये ब्रह्माजीसे कहा – - ॥ ९ -१० ॥ ईश्वर बोले — वत्स! हे महाभाग! हे मेरे पुत्र । पितामह! मैं तुम्हारे समस्त मनोरथको यथार्थ रूपमें ॥ ११ जान गया हूँ । प्रजाओंकी वृद्धिके लिये ही तुमने इस । समय तपस्या की है । उस तपस्यासे मैं सन्तुष्ट हूँ और ॥ १२ तुम्हें इच्छित वरदान दे रहा हूँ ॥ ११-१२ ॥ । परम उदार एवं स्वभावसे मधुर यह वचन ॥ १३ कहकर भगवान् शिवने अपने शरीरके [ वाम ] भागसे देवी पार्वतीको अलग किया ॥ १३ ॥

। शिवसे अलग हुई और पृथक् रूपमें स्थित उन ॥ १४ परम शक्तिको देखकर विनीत भावसे प्रणाम करके ब्रह्माजी उनसे प्रार्थना करने लगे - ॥१४ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे शिवे! आपके पति देवाधिदेव शिवजीने सृष्टिके आदिमें मुझे उत्पन्न किया और उन्हीं १५ परमात्मा शिवने सभी प्रजाओंको नियुक्त किया है ॥ १५ ॥

हे शिवे! [ उनकी आज्ञासे ] मैंने अपने मनसे सभी १६ देवताओं आदिकी सृष्टि की, किंतु बार - बार सृष्टि करनेपर भी प्रजाओंकी वृद्धि नहीं हो रही है । इसलिये अब मैथुनसे होनेवाली सृष्टि करके ही मैं अपनी समस्त १७ प्रजाओंकी वृद्धि करना चाहता हूँ ॥ १६-१७ ॥ आपसे पहले शिवजीके शरीरसे स्त्रियोंका १८ अविनाशी समुदाय उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिये मैं उस नारीकुलकी सृष्टि करनेमें असमर्थ रहा । सभी शक्तियाँ १ ९ आपसे ही उत्पन्न होती हैं, इसलिये मैं परम शक्तिस्वरूपा आप अखिलेश्वरीसे प्रार्थना कर रहा हूँ ॥ १८-१९ ॥ हे शिवे! हे मातः! इस चराचर जगत्की वृद्धिके लिये नारीकुलकी रचनाका सामर्थ्य प्रदान कीजिये । हे २० शिवप्रिये! आपको नमस्कार है ॥ २० ॥

पृष्ठ 23

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ]

अन्यं त्वत्तः प्रार्थयामि वरं च वरदेश्वरि ।

देहि मे तं कृपां कृत्वा जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥

चराचरविवृद्ध्यर्थमीशेनैकेन सर्वगे ।

दक्षस्य मम पुत्रस्य पुत्री भव भवाम्बिके ॥

एवं संयाचिता देवी ब्रह्मणा परमेश्वरी ।

तथास्त्विति वचः प्रोच्य तच्छक्तिं विधये ददौ ॥

तस्माद्धि सा शिवा देवी शिवशक्तिर्जगन्मयी ।

शक्तिमेकां भ्रुवोर्मध्यात्ससर्जात्मसमप्रभाम् ॥

तामाह प्रहसन्प्रेक्ष्य शक्तिं देववरो हरः ।

कृपासिन्धुर्महेशानो लीलाकारी भवाम्बिकाम् ॥

शिव उवाच

तपसाराधिता देवि ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।

प्रसन्ना भव सुप्रीत्या कुरु तस्याखिलेप्सितम् ॥

तामाज्ञां परमेशस्य शिरसा प्रतिगृह्य सा ।

ब्रह्मणो वचनाद्देवी दक्षस्य दुहिताऽभवत् ॥

दत्त्वैवमतुलां शक्तिं ब्रह्मणे सा शिवा मुने ।

विवेश देहं शंभोर्हि शंभुश्चान्तर्दधे प्रभुः ॥

तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्स्त्रिया भागः प्रकल्पितः ।

आनन्दं प्राप स विधिः सृष्टिर्जाता च मैथुनी ॥

एतत्ते कथितं तात शिवरूपं महोत्तमम् ।

अर्द्धनारीनरार्द्ध हि महामंगलदं सताम् ॥

एतदाख्यानमनघं यः पठेच्छृणुयादपि ।

स भुक्त्वा सकलान्भोगान्प्रयाति परमां गतिम् ॥

शतरुद्रसंहिता १ ९ हे वरदेश्वरि! मैं आपसे एक अन्य वरकी २१ प्रार्थना करता हूँ, मुझपर कृपाकर उसे प्रदान करें । हे जगन्मातः! आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

हे सर्वगे! हे अम्बिके! इस चराचर जगत्की २२ वृद्धिके लिये आप अपने एक सर्वसमर्थरूपसे मेरे पुत्र दक्षकी कन्याके रूपमें अवतरित हों ॥। २२ ॥ ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार याचना करनेपर ' ऐसा २३ ही होगा ' – यह वचन कहकर देवी परमेश्वरीने ब्रह्माको वह शक्ति प्रदान की । इस प्रकार [ यह स्पष्ट ही है कि ] भगवान् शिवकी परमशक्ति वे शिवादेवी २४ विश्वात्मिका ( स्त्रीपुरुषात्मिका ) हैं । उन्होंने अपनी भौंहोंके मध्यसे अपने ही समान कान्तिवाली एक दूसरी शक्तिका सृजन किया॥२३-२४ ॥ उस शक्तिको देखकर देवताओंमें श्रेष्ठ, कृपासिन्धु, २५ लीलाकारी महेश्वर हर हँसते हुए उन जगन्मातासे कहने लगे— ॥ २५ ॥

शिवजी बोले- हे देवि! परमेष्ठी ब्रह्माने तपस्याके द्वारा आपकी आराधना की है, अतः आप २६ प्रसन्न हो जाइये और प्रेमपूर्वक उनके सारे मनोरथोंको पूर्ण कीजिये । तब उन देवीने परमेश्वर शिवजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके ब्रह्माजीके प्रार्थनानुसार दक्षपुत्री २७ होना स्वीकार कर लिया ॥ २६-२७ ॥ हे मुने! इस प्रकार ब्रह्माको अपार शक्ति २८ प्रदानकर वे शिवा शिवजीके शरीरमें प्रविष्ट हो गयीं और प्रभु शिव भी अन्तर्धान हो गये ॥ २८ ॥

उसी समयसे इस लोकमें सृष्टि - कर्ममें स्त्रियोंको भाग प्राप्त हुआ । तब वे ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए २ ९ और मैथुनी सृष्टि होने लगी । हे तात! इस प्रकार मैंने आपसे शिवजीके अत्यन्त उत्तम तथा सज्जनोंको परम ३० मंगल प्रदान करनेवाले इस अर्धनारी और अर्धनर रूपका वर्णन कर दिया ॥ २ ९ -३० ॥ जो इस निष्पाप कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह [ इस लोकमें ] सभी सुखोंको भोगकर परम गति ३१ । प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां शिवस्यार्द्धनारीश्वरावतारवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें शिवके अर्धनारीश्वर-अवतारका वर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

पृष्ठ 24

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ २० अथ चतुर्थोऽध्यायः वाराहकल्पके प्रथमसे नवम द्वापरतक हुए व्यासों एवं शिवावतारोंका वर्णन नन्दीश्वर उवाच सनत्कुमार सर्वज्ञ चरितं शांकरं मुदा रुद्रेण कथितं प्रीत्या ब्रह्मणे सुखदं सदा शिव उवाच सप्तमे चैव वाराहे कल्पे मन्वन्तराभिधे । कल्पेश्वरोऽथ भगवान्सर्वलोकप्रकाशनः

मनोर्वैवस्वतस्यैव ते प्रपुत्रो भविष्यति ।

तदा चतुर्युगाश्चैव तस्मिन्मन्वन्तरे विधे ॥

अनुग्रहार्थं लोकानां ब्राह्मणानां हिताय च ।

उत्पत्स्यामि विधे ब्रह्मन्द्वापराख्ययुगान्तिके ॥

युगप्रवृत्त्या च तदा तस्मिंश्च प्रथमे युगे ।

द्वापरे प्रथमे ब्रह्मन्यदा व्यासः स्वयंप्रभुः ॥

तदाहं ब्राह्मणार्थाय कलौ तस्मिन्युगान्तिके । भविष्यामि शिवायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः

हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पर्वतोत्तमे ।

तदा शिष्याः शिखायुक्ता भविष्यन्ति विधे मम ॥

श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेताश्वः श्वेतलोहितः ।

चत्वारो ध्यानयोगात्ते गमिष्यन्ति पुरं मम ॥

ततो भक्ता भविष्यन्ति ज्ञात्वा मां तत्त्वतोऽव्ययम् । नन्दीश्वर बोले – - हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! । अब शंकरजीके जिस सुखदायक चरित्रको हर्षित ॥ १ होकर रुद्रने ब्रह्माजीसे प्रेमपूर्वक कहा था, [ उस चरित्रको सुनें ] ॥१ ॥

शिवजी बोले - [ हे ब्रह्मन्! ] वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले ॥ २ भगवान् कल्पेश्वर, जो तुम्हारे प्रपौत्र हैं, वैवस्वत ३ मनुके पुत्र होंगे ॥ २-३ ॥ हे विधे! हे ब्रह्मन्! उस समय लोकोंके कल्याणके ४ निमित्त तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये मैं [ प्रत्येक ] द्वापर युगके अन्तमें अवतार ग्रहण करूँगा ॥४ ॥

इस प्रकार क्रमशः युगोंके प्रवृत्त होनेपर प्रथम ५ युगमें ( चतुर्युगीके ) प्रथम द्वापरयुगमें जब स्वयंप्रभु नामक व्यास होंगे, तब मैं ब्राह्मणोंके हितके लिये उस ॥ ६ कलिके अन्तमें पार्वतीसहित श्वेत नामक महामुनिके रूपमें अवतार लूँगा॥५-६ ॥ हे विधे! उस समय पर्वतोंमें श्रेष्ठ, रमणीय ७ हिमालयके छागल नामक शिखरपर शिखासे युक्त श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व और श्वेतलोहित नामक ८ मेरे चार शिष्य होंगे । वे चारों ध्यानयोगके प्रभावसे मेरे लोकको जायँगे ॥ ७-८ ॥ तब [ वहाँ ] मुझ अविनाशीको तत्त्वपूर्वक जानकर जन्ममृत्युजराहीनाः परब्रह्मसमाधयः ॥ ९ वे मेरे भक्त होंगे और जन्म - मृत्यु - जरासे रहित तथा

द्रष्टुं शक्यो नरैर्नाहमृते ध्यानात्पितामह ।

दानधर्मादिभिर्वत्स साधनैः कर्महेतुभिः ॥

द्वितीये द्वापरे व्यासः सत्यो नाम प्रजापतिः ।

यदा तदा भविष्यामि सुतारो नामतः कलौ ॥

परम ब्रह्ममें समाधि लगानेवाले होंगे ॥ ९ ॥

हे पितामह! हे वत्स! ध्यानके बिना मनुष्य मुझे १० दान - धर्मादि कर्मके हेतुभूत साधनोंसे देखनेमें असमर्थ हैं ॥ १० ॥

दूसरे द्वापरमें जब सत्य नामक प्रजापति व्यास होंगे, तब मैं कलियुगमें सुतार नामसे अवतार ग्रहण ११ करूँगा ॥११ ॥

पृष्ठ 25

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ४ ] तत्रापि मे भविष्यन्ति शिष्या वेदविदो द्विजाः दुन्दुभिः शतरूपश्च हृषीकः केतुमांस्तथा चत्वारो ध्यानयोगात्ते गमिष्यन्ति पुरं मम ततो मुक्ता भविष्यन्ति ज्ञात्वा मां तत्त्वतोऽव्ययम् ॥ तृतीये द्वापरे चैव यदा व्यासस्तु भार्गवः । तदाप्यहं भविष्यामि दमनस्तु युगान्तिके तत्रापि च भविष्यन्ति चत्वारो मम पुत्रकाः । विशोकश्च विशेषश्च विपापः पापनाशनः शिष्यैः सहायं व्यासस्य करिष्ये चतुरानन । निवृत्तिमार्गं सुदृढं वर्त्तयिष्ये कलाविह चतुर्थे द्वापरे चैव यदा व्यासोऽङ्गिरा स्मृतः तदाप्यहं भविष्यामि सुहोत्रो नाम नामतः

तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारो योगसाधकाः ।

भविष्यन्ति महात्मानस्तन्नामानि ब्रुवे विधे ॥

सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दमो दुरतिक्रमः । शिष्यैः सहायं व्यासस्य करिष्येऽहं तदा विधे पञ्चमे द्वापरे चैव व्यासस्तु सविता स्मृतः तदा योगी भविष्यामि कंको नाम महातपाः तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारो योगसाधकाः । भविष्यन्ति महात्मानस्तन्नामानि शृणुष्व मे सनकः सनातनश्चैव प्रभुर्यश्च सनन्दनः । विभुः सनत्कुमारश्च निर्मलो निरहंकृतिः तत्रापि कंकनामाहं साहाय्यं सवितुर्विधे व्यासस्य हि करिष्यामि निवृत्तिपथवर्द्धकः ॥ परिवर्त्ते पुनः षष्ठे द्वापरे लोककारकः । कर्ता वेदविभागस्य मृत्युर्व्यासो भविष्यति तदाऽप्यहं भविष्यामि लोकाक्षिर्नाम नामतः व्यासस्य सुसहायार्थं निवृत्तिपथवर्द्धनः तत्रापि शिष्याश्चत्वारो भविष्यन्ति दृढव्रताः सुधामा विरजाश्चैव संजयो विजयस्तथा ॥ शतरुद्रसंहिता २१ । उस युगमें भी दुन्दुभि, शतरूप, हृषीक तथा ॥ १२ केतुमान् नामक वेदज्ञ ब्राह्मण मेरे शिष्य होंगे ॥ १२ ॥

। वे चारों ध्यानयोगके प्रभावसे मेरे लोकको प्राप्त १३ करेंगे और मुझ अव्ययको यथार्थरूपसे जानकर मुक्त हो जायँगे ॥१३ ॥

तीसरे द्वापर युगके अन्तमें जब भार्गव [ नामक ] ॥ १४ व्यास होंगे, तब मैं दमन नामसे अवतार ग्रहण करूँगा ॥१४ ॥

उस समय भी विशोक, विशेष, विपाप और ॥ १५ पापनाशन नामक मेरे चार पुत्र ( शिष्य ) होंगे ॥ १५ ॥

हे चतुरानन! उस कलियुगमें मैं अपने शिष्योंके ॥ १६ द्वारा व्यासकी सहायता करूँगा तथा निवृत्तिमार्गको दृढ़ करूँगा ॥१६ ॥

। चौथे द्वापरमें जब अंगिरा व्यासरूपमें प्रसिद्ध होंगे, ॥ १७ तब मैं सुहोत्र नामसे अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी महात्मा योगसाधक मेरे चार पुत्र ( शिष्य ) होंगे । हे १८ ब्रह्मन्! मैं उनके नाम बता रहा हूँ । सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम और दुरतिक्रम । हे विधे! उस समय मैं अपने शिष्योंके ॥ १ ९ द्वारा व्यासकी सहायता करूँगा ॥ १७–१९ ॥ । पाँचवें द्वापरमें सविता नामक व्यास कहे गये हैं, ॥ २० उस समय मैं महातपस्वी कंक नामक योगीके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी मेरे चार ॥ २ ९ योगसाधक तथा महात्मा पुत्र ( शिष्य ) होंगे, उनके नाम मुझसे सुनिये - सनक, सनातन, प्रभु सनन्दन ॥ २२ और सर्वव्यापी निर्मल अहंकाररहित सनत्कुमार ॥ हे ब्रह्मन्! उस समय भी कंक नामक मैं सविता २३ व्यासकी सहायता करूँगा और निवृत्तिमार्गका संवर्धन करूँगा॥२०-२३ ॥ इसके बाद छठे द्वापरके आनेपर लोककी रचना ॥ २४ करनेवाले तथा वेदोंका विभाग करनेवाले मृत्यु नामक व्यास होंगे । उस समय भी मैं लोकाक्षि नामसे अवतार । ग्रहण करूँगा और व्यासकी सहायताके लिये निवृत्ति-॥ २५ मार्गका वर्धन करूँगा । उस समय भी सुधामा, विरजा, । संजय एवं विजय नामक मेरे चार दृढव्रती शिष्य २६ होंगे ॥ २४–२६ ॥

पृष्ठ 26

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२२ सप्तमे परिवर्त्ते तु यदा व्यासः शतक्रतुः तदाप्यहं भविष्यामि जैगीषव्यो विभुर्विधे योगं संद्रढयिष्यामि महायोगविचक्षणः काश्यां गुहान्तरे संस्थो दिव्यदेशे कुशास्तरिः साहाय्यं च करिष्यामि व्यासस्य हि शतक्रतोः उद्धरिष्यामि भक्तांश्च संसारभयतो विधे तत्रापि मम चत्वारो भविष्यन्ति सुता युगे सारस्वतश्च योगीशो मेघवाहः सुवाहनः अष्टमे परिवर्त्ते हि वसिष्ठो मुनिसत्तमः कर्त्ता वेदविभागस्य वेदव्यासो भविष्यति तत्राप्यहं भविष्यामि नामतो दधिवाहनः व्यासस्य हि करिष्यामि साहाय्यं योगवित्तम कपिलश्चासुरिः पञ्चशिखः शाल्वलपूर्वकः चत्वारो योगिनः पुत्रा भविष्यन्ति समा मम नवमे परिवर्त्ते तु तस्मिन्नेव युगे विधे । भविष्यति मुनिश्रेष्ठो व्यासः सारस्वताह्वयः व्यासस्य ध्यायतस्तस्य निवृत्तिपथवृद्धये । तदाप्यहं भविष्यामि ऋषभो नामतः स्मृतः पराशरश्च गर्गश्च भार्गवो गिरिशस्तथा । चत्वारस्तत्र शिष्या मे भविष्यन्ति सुयोगिनः

तैः साकं द्रढयिष्यामि योगमार्गं प्रजापते ।

करिष्यामि सहायं वै वेदव्यासस्य सन्मुने ॥

तेन रूपेण भक्तानां बहूनां दुःखिनां विधे ।

उद्धारं भवतोऽहं वै करिष्यामि दयाकरः ॥

सोऽवतारो विधे मे हि ऋषभाख्यः सुयोगकृत् ।

सारस्वतव्यासमन: कर्त्ता नानोतिकारकः ॥

अवतारेण मे येन भद्रायुर्नृपबालकः ।

जीवितो हि मृतः क्ष्वेडदोषतो जनकोज्झितः ॥

प्राप्तेऽथ षोडशे वर्षे तस्य राजशिशोः पुनः ।

ययौ तद्वेश्म सहसा ऋषभः स मदात्मकः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ विधे! सातवें द्वापरके आनेपर जब शतक्रतु । ॥ २७ [ नामक ] व्यास होंगे, उस समय भी मैं विभु । जैगीषव्य नामसे अवतरित होऊँगा और महायोगविचक्षण ॥ २८ होकर काशीकी गुफामें दिव्य स्थानमें कुशाके आसनपर । बैठकर योगमार्गको दृढ़ करूँगा तथा शतक्रतु व्यासकी ॥ २ ९ सहायता करूँगा एवं हे विधे! संसारके भयसे । भक्तोंका उद्धार करूँगा । उस युगमें भी सारस्वत, ॥ ३० योगीश, मेघवाह और सुवाहन नामक मेरे चार पुत्र ( शिष्य ) होंगे ॥ २७–३० ॥ । आठवें द्वापरयुगके आनेपर वेदोंका विभाग ॥ ३१ करनेवाले मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ वेदव्यास होंगे । हे योग जाननेवालोंमें श्रेष्ठ! उस समय मैं दधिवाहन नामसे । ॥ ३२ अवतार ग्रहण करूँगा और व्यासकी सहायता करूँगा । उस समय कपिल, आसुरि, पंचशिख और शाल्वल । नामक मेरे चार पुत्र ( शिष्य ) होंगे, जो मेरे ही समान ॥ ३३ | योगी होंगे ॥३१–३३ ॥ हे विधे! नौवें द्वापरयुगके आनेपर उसमें सारस्वत ॥ ३४ नामक मुनिश्रेष्ठ व्यास होंगे । उस समय वे व्यासजी निवृत्तिमार्गको बढ़ानेका विचार करेंगे, तब मैं ऋषभ ॥ ३५ नामसे विख्यात होकर अवतार लूँगा । उस समय पराशर, गर्ग, भार्गव एवं गिरिश नामक मेरे परम योगी ॥ ३६ शिष्य होंगे । हे प्रजापते! मैं उनके साथ योगमार्गको दृढ़ करूँगा और हे सन्मुने! मैं वेदव्यासकी सहायता ३७ करूँगा॥३४–३७ ॥ उस समय हे विधे! दयालु मैं अपने उस रूपसे ३८ बहुत - से दु: खित भक्तोंका और स्वयं आपका भी उद्धार करूँगा । हे विधे! मेरा वह ऋषभ नामक अवतार योगमार्गका प्रवर्तक, सारस्वत व्यासके मनको ३ ९ सन्तुष्ट करनेवाला तथा अनेक प्रकारकी लीला करनेवाला होगा ॥ ३८-३९ ॥ मेरे उस अवतारने भद्रायु नामक राजकुमारको, ४० जो विषके दोषसे मर गया था एवं जिसके पिताने त्याग दिया था, पुनः जीवित कर दिया था ॥ ४० ॥

उस राजकुमारके सोलह वर्षका होनेपर मेरे ४१ । अंशसे उत्पन्न ऋषभ पुनः सहसा उसके घर गये ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 27

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ]

पूजितस्तेन स मुनिः सद्रूपश्च कृपानिधिः ।

उपादिदेश तद्धर्मान् राजयोगान्प्रजापते ॥

ततः स कवचं दिव्यं शंखं खड्गं च भास्वरम् । ददौ तस्मै प्रसन्नात्मा सर्वशत्रुविनाशनम् ॥

तदङ्गं भस्मनामृश्य कृपया दीनवत्सलः ।

स द्वादशसहस्त्रस्य गजानां च बलं ददौ ॥

इति भद्रायुषं सम्यगनुश्वास्य समातृकम् ।

ययौ स्वैरगतिस्ताभ्यां पूजितस्त्वृषभः प्रभुः ॥

भद्रायुरपि राजर्षिर्जित्वा रिपुगणान्विधे ।

राज्यं चकार धर्मेण विवाह्य कीर्तिमालिनीम् ॥

इत्थंप्रभाव ऋषभोऽवतारः शङ्करस्य मे ।

सतां गतिर्दीनबन्धुर्नवमः कथितस्तव ॥

ऋषभस्य चरित्रं हि परमं पावनं महत् ।

स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥

शतरुद्रसंहिता २३ हे प्रजापते! उस राजकुमारने कृपानिधि तथा ४२ अति सुन्दर उन ऋषभजीका [ आदरपूर्वक ] पूजन किया और ऋषभजीने उसे उस समय राजयोगसे युक्त धर्मोपदेश दिया । तदनन्तर उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर ४३ दिव्य कवच, शंख तथा प्रकाशमान खड्ग प्रदान किया, जो शत्रुओंके विनाशमें समर्थ था ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर दीनवत्सल उन [ महात्मा ] ऋषभजीने ४४ उसके अंगोंमें भस्म लगाकर कृपापूर्वक बारह हजार हाथियोंका बल भी उसे प्रदान किया ॥ ४४ ॥

इस प्रकार मातासहित भद्रायुको भलीभाँति ४५ आश्वस्त करके तथा उन दोनोंसे पूजित होकर स्वेच्छागामी प्रभु ऋषभ चले गये ॥४५ ॥

हे विधे! राजर्षि भद्रायु भी अपने शत्रुओंको ४६ जीतकर कीर्तिमालिनीसे विवाहकर धर्मानुसार राज्य करने लगे ॥ ४६ ॥

मैंने इस प्रकारके प्रभाववाले, सज्जनोंको गति ४७ प्रदान करनेवाले तथा दीन - दु: खियोंके बन्धुरूप मुझ शंकरके नौवें ऋषभ अवतारका वर्णन आपसे किया ॥ ४७ ॥

ऋषभका चरित्र परम पवित्र, महान्, स्वर्ग देनेवाला यश तथा कीर्ति देनेवाला और आयुको ४८ । बढ़ानेवाला है, इसे यत्नपूर्वक सुनना चाहिये ॥ ४८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायामृषभचरित्रवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें ऋषभचरित्रवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः वाराहकल्पके दसवेंसे अट्ठाईसवें द्वापरतक होनेवाले व्यासों एवं शिवावतारोंका वर्णन शिव उवाच शिवजी बोले— [ हे ब्रह्मन्! ] दसवें द्वापरयुगमें दशमे द्वापरे व्यासस्त्रिधामा नामतो मुनिः । जब त्रिधामा नामक मुनि व्यास होंगे, उस समय मैं हिमवच्छिखरे रम्ये भृगुतुंगे नगोत्तमे ॥ १ हिमालय पर्वतके मनोहर भृगुतुंग नामक ऊँचे शिखरपर अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी मेरे श्रुतिसम्मित तत्रापि मम पुत्राश्च भृग्वाद्याः श्रुतिसंमिताः । तथा तपस्वी भृगु, बलबन्धु, नरामित्र तथा केतुभृंग

बलबन्धुर्नरामित्रः केतुश्रृंगस्तपोधनः ॥ २ । नामक पुत्र होंगे ॥ १-२ ॥

पृष्ठ 28

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४

एकादशे द्वापरे तु व्यासश्च त्रिवृतो यदा ।

गंगाद्वारे कलौ नाम्ना तपोऽहं भविता तदा ॥

लम्बोदरश्च लम्बाक्षः केशलम्बः प्रलम्बकः । तत्रापि पुत्राश्चत्वारो भविष्यन्ति दृढव्रताः

द्वादशे परिवर्त्ते तु शततेजाश्च वेदकृत् ।

तत्राप्यहं भविष्यामि द्वापरान्ते कलाविह ॥

हेमकंचुकमासाद्य नाम्ना ह्यत्रिः परिप्लुतः ।

व्यासस्यैव सहायार्थं निवृत्तिपथरोपणः ॥

सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः शर्वः सुयोगिनः ।

तत्रेति पुत्राश्चत्वारो भविष्यन्ति महामुने ॥

त्रयोदशे युगे तस्मिन्धर्मो नारायणः सदा ।

व्यासस्तदाहं भविता बलिर्नाम महामुनिः ॥

वालखिल्याश्रमे गंधमादने पर्वतोत्तमे । सुधामा काश्यपश्चैव वसिष्ठो विरजाः शुभाः

यदा व्यासस्तु रक्षाख्यः पर्याये तु चतुर्दशे ।

वंश आङ्गिरसे तत्र भविताहं च गौतमः ॥

तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति कलौ तदा ।

अत्रिश्च वशदश्चैव श्रवणोऽथ श्रविष्कटः ॥

व्यासः पञ्चदशे त्रय्यारुणिर्वै द्वापरे यदा । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ ग्यारहवें द्वापरयुगमें जब त्रिवृत नामक व्यास होंगे, ३ उस समय मैं कलियुगमें गंगाद्वारपर तप नामसे अवतरित होऊँगा । उस समय भी लम्बोदर, लम्बाक्ष, केशलम्ब एवं नामक चार दृढव्रती मेरे शिष्य होंगे ॥ ३-४ ॥ ॥ ४ प्रलम्बक बारहवें द्वापरयुगके आनेपर वेदोंके विभाग करनेवाले शततेजा नामक व्यास होंगे, तब मैं द्वापरके अन्त ५ होनेपर कलियुगमें यहाँ पृथिवीपर अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय हेमकंचुक नामक स्थानपर आविर्भूत ६ हुआ । मैं अत्रिके नामसे प्रसिद्ध होकर व्यासजीके सहायतार्थ निवृत्तिमार्गको दृढ़ करूँगा॥५-६ ॥ हे महामुने! उस समय सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य ७ एवं शर्व नामक मेरे परम योगी चार पुत्र होंगे ॥७ ॥

तेरहवें द्वापरयुगमें धर्मस्वरूप नारायण नामक व्यास ८ होंगे, उस समय मैं वालखिल्यके आश्रममें उत्तम गन्ध-मादन पर्वतपर बलि नामक महामुनिके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँपर सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और ॥ ९ विरजा नामक मेरे चार श्रेष्ठ पुत्र होंगे ॥ ८ - ९ ॥ चौदहवें द्वापरयुगके आनेपर जब रक्ष नामक व्यास १० होंगे, तब मैं आंगिरस वंशमें गौतम नामसे अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी कलियुगमें अत्रि, वशद, श्रवण ११ और श्रविष्कट नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ १०-११ ॥ पन्द्रहवें द्वापरयुगमें जब त्रय्यारुणि नामक व्यास तदाऽहं भविता वेदशिरा वेदशिरस्तथा ॥ १२ होंगे, उस समय मैं वेदशिरा नामसे अवतरित होऊँगा । महावीर्यं तदस्त्रं च वेदशीर्षश्च पर्वतः । हिमवत्पृष्ठमासाद्य सरस्वत्यास्तथोत्तरे

तत्रापि मम चत्वारो भविष्यन्ति सुता दृढाः ।

कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशरीरः कुनेत्रकः ॥

व्यासो युगे षोडशे तु यदा देवो भविष्यति तदा योगप्रदानाय गोकर्णी भविता ह्यहम् तत्रैव च सुपुण्यं च गोकर्णं नाम तद्वनम् तत्रापि योगिनः पुत्रा भविष्यन्त्यम्बुसंमिताः वेदशिरा नामक महावीर्यवान् मेरा अस्त्र होगा और सरस्वतीके उत्तर तथा हिमालयके पृष्ठभागमें मैं ॥ १३ वेदशीर्ष पर्वतपर निवास करूँगा । उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर और कुनेत्र नामक मेरे चार १४ शक्तिशाली पुत्र होंगे ॥ १२ - १४ ॥ । सोलहवें द्वापरयुगमें जब देव नामक व्यास होंगे, ॥ १५ उस समय मैं योगमार्गका उपदेश देनेके लिये गोकर्ण नामसे उत्पन्न होऊँगा । वहींपर परम पुण्यप्रद गोकर्ण नामक वन है । वहाँपर भी जलके समान निर्मल अन्तःकरणवाले काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति । नामक मेरे चार योगपरायण पुत्र होंगे और वे पुत्र भी ॥ १६ । योगमार्गसे शिवपदको प्राप्त करेंगे ॥ १५-१६ ॥

पृष्ठ 29

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] काश्यपोऽप्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः तेऽपि तेनैव मार्गेण गमिष्यन्ति शिवालयम् परिवर्त्ते सप्तदशे व्यासो देवकृतंजयः गुहावासीति नाम्नाहं हिमवच्छिखरे शुभे महालये महोत्तुंगे शिवक्षेत्रं हिमालयम् उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः परिवर्त्तेऽष्टादशे तु यदा व्यास ऋतंजयः शिखण्डीनामतोऽहं तद्धिमवच्छिखरे शुभे सिद्धक्षेत्रे महापुण्ये शिखण्डी नाम पर्वतः शिखण्डिनो वनं वापि यत्र सिद्धनिषेवितम् ॥ वाचःश्रवा रुचीकश्च श्यावास्यश्च यतीश्वरः एते पुत्रा भविष्यन्ति तत्रापि च तपोधनाः एकोनविंशे व्यासस्तु भरद्वाजो महामुनिः तदाप्यहं भविष्यामि जटी माली च नामतः हिमवच्छिखरे तत्र पुत्रा मेऽम्बुधिसंहिताः हिरण्यनामा कौशल्यो लोकाक्षी प्रधिमिस्तथा परिवर्त्ते विंशतिमे भविता व्यास गौतमः तत्राट्टहासनामाहमट्टहासप्रिया नराः तत्रैव हिमवत्पृष्ठे अट्टहासो महागिरिः देवमानुषयक्षेन्द्रसिद्धचारणसेवितः तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुयोगिनः सुमन्तुर्बर्बरिर्विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः एकविंशे युगे तस्मिन् व्यासो वाचः श्रवा यदा तदाहं दारुको नाम तस्माद्दारुवनं शुभम् तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुयोगिनः प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा द्वाविंशे परिवर्त्ते तु व्यासः शुष्मायणो यदा । तदाप्यहं भविष्यामि वाराणस्यां महामुनिः नाम्ना वै लांगली भीमो यत्र देवाः सवासवाः द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन्भवं चैव हलायुधम् ॥ तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः भल्लवी मधुपिंगश्च श्वेतकेतुस्तथैव च शतरुद्रसंहिता २५ । सत्रहवें द्वापरयुगके आगमनपर देवकृतंजय नामक ॥ १७ व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके उत्तम तथा ऊँचे । शिखरपर, हिमसे व्याप्त जो महालय नामका शिवक्षेत्र ॥ १८ है, वहाँ गुहावासी नामसे अवतार धारण करूँगा और । वहाँ भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल ॥ १ ९ नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ १७–१९ ॥ । अठारहवें द्वापरयुगके आनेपर जब ऋतंजय ॥ २० नामक व्यास होंगे, तब मैं उस हिमालयके मनोहर । शिखरपर शिखण्डी नामसे प्रकट होऊँगा । उस महापुण्यप्रद सिद्धक्षेत्रमें शिखण्डी नामक पर्वत है और उसी २१ नामवाला वन भी है, जहाँ सिद्ध निवास करते हैं, वहाँ । भी वाचःश्रवा, रुचीक, श्यावास्य एवं यतीश्वर — ये ॥ २२ मेरे चार महातपस्वी पुत्र होंगे ॥ २०–२२ ॥ । उन्नीसवें द्वापरयुगमें जब भरद्वाज मुनि व्यास ॥ २३ होंगे, तब हिमालयके शिखरपर जटाएँ धारण किया हुआ मैं माली नामसे अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँ । समुद्रके समान गम्भीर हिरण्यनामा, कौशल्य, लोकाक्षी ॥ २४ तथा प्रधिमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ २३-२४ ॥ । बीसवें द्वापरमें गौतम नामक व्यास होंगे, तब मैं ॥ २५ हिमालयपर्वतपर अट्टहास नामसे अवतीर्ण होऊँगा ॥ वहीं हिमालयके पृष्ठभागपर अट्टहास नामक महापर्वत है, जहाँ अट्टहासप्रिय मनुष्य निवास करते हैं और जो ॥२६ देव, मनुष्य, यक्षराज, सिद्ध और चारणोंसे सेवित है ॥ वहाँ भी सुमन्तु, विद्वान् बर्बरि, कबन्ध तथा कुशिकन्धर ॥ २७ नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे ॥ २५–२७ ॥ । इक्कीसवें द्वापरमें जब वाचः श्रवा नामक व्यास ॥ २८ होंगे, तब मैं दारुक नामसे अवतरित होऊँगा । इसलिये उस उत्तम वनका नाम भी दारुवन होगा । वहाँपर भी । प्लक्ष, दार्भायणी, केतुमान् और गौतम नामक मेरे चार ॥ २ ९ महायोगी पुत्र होंगे ॥ २८-२९ ॥ बाईसवें द्वापरयुगके आनेपर जब शुष्मायण नामक ॥ ३० व्यास होंगे, तब मैं लांगली भीम नामक महामुनिके । रूपमें वाराणसीमें अवतरित होऊँगा, जहाँ कलियुगमें ३१ इन्द्रसहित समस्त देवगण मुझ हलायुध शिवका दर्शन । करेंगे । वहाँ भी भल्लवी, मधु, पिंग तथा श्वेतकेतु नामक ॥ ३२ । मेरे चार परम धार्मिक पुत्र होंगे ॥ ३०–३२ ॥

पृष्ठ 30

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अ ० ५ श्रीशिवमहापुराण २६

परिवर्त्ते त्रयोविंशे तृणबिन्दुर्यदा मुनिः ।

श्वेतो नाम तदाऽहं वै गिरौ कालंजरे शुभे ॥

तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपस्विनः ।

उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च ॥

परिवर्त्ते चतुर्विंशे व्यासो यक्षो यदा विभुः ।

शूली नाम महायोगी तद्युगे नैमिषे तदा ॥

तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः । शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः पञ्चविंशे यदा व्यासः शक्तिर्नाम्ना भविष्यति । तदाप्यहं महायोगी दण्डी मुण्डीश्वरः प्रभुः तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः । छगलः कुण्डकर्णश्च कुम्भाण्डश्च प्रवाहकः व्यासः पराशरो यर्हि षड्विंशे भविताप्यहम् । पुरं भद्रवटं प्राप्य सहिष्णुर्नाम नामतः तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः । उलूको विद्युतश्चैव शम्बूको ह्याश्वलायनः

सप्तविंशे यदा व्यासो जातूकर्ण्यो भविष्यति ।

प्रभासतीर्थमाश्रित्य सोमशर्मा तदाप्यहम् ॥

तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः ।

अक्षपादः कुमारश्चोलूको वत्सस्तथैव च ॥

अष्टाविंशे द्वापरे तु पराशरसुतो हरिः ।

यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना द्वैपायनः प्रभुः ॥

तदा षष्ठेन चांशेन कृष्णः पुरुषसत्तमः ।

वसुदेवसुतः श्रेष्ठो वासुदेवो भविष्यति ॥

तदाप्यहं भविष्यामि योगात्मा योगमायया । लोकविस्मापनार्थाय ब्रह्मचारिशरीरकः श्मशाने मृतमुत्सृज्य दृष्ट्वा कायमनामयम् ब्राह्मणानां हितार्थाय प्रविष्टो योगमायया दिव्यां मेरुगुहां पुण्यां त्वया सार्धं च विष्णुना भविष्यामि तदा ब्रह्मन् लंकुली नाम नामतः कायावतार इत्येवं सिद्धक्षेत्रं परं तदा भविष्यति सुविख्यातं यावद् भूमिर्धरिष्यति तेईसवें द्वापरयुगके आनेपर जब मुनि तृणबिन्दु ३३ व्यास होंगे, तब मैं उत्तम कालंजरपर्वतपर श्वेत नामसँ अवतार लूँगा । उस समय उशिक, बृहदश्व, देवल एवं ३४ कवि नामक मेरे चार तपस्वी पुत्र होंगे॥३३-३४ ॥ चौबीसवें द्वापरयुगके प्राप्त होनेपर जब यक्ष ३५ नामक व्यास होंगे, उस समय मैं नैमिषक्षेत्रमें शूली नामक महायोगीके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँपर ॥ ३६ भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ३५-३६ ॥ पच्चीसवें द्वापरयुगमें जब शक्ति नामक व्यास ॥ ३७ होंगे, तब मैं दण्डधारी महायोगी मुण्डीश्वर प्रभुके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भाण्ड एवं प्रवाहक नामक चार तपस्वी ॥ ३८ शिष्य होंगे ॥ ३७-३८ ॥ छब्बीसवें द्वापरयुगमें जब पराशर नामक व्यास ॥ ३ ९ होंगे, उस समय मैं भद्रवटपुरमें आकर सहिष्णु नामसे अवतरित होऊँगा । वहाँपर भी उलूक, विद्युत, शम्बूक और आश्वलायन नामवाले मेरे चार तपस्वी शिष्य ॥ ४० होंगे ॥ ३ ९ -४० ॥ सत्ताईसवें द्वापरयुगमें जब जातूकर्ण्य व्यास होंगे, ४१ उस समय मैं प्रभासतीर्थमें आकर सोमशर्मा नामसे प्रकट होऊँगा । वहाँपर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स ४२ नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ४१-४२ ॥ अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें जब महाविष्णु पराशरके ४३ पुत्ररूपमें जन्म लेकर द्वैपायन नामक व्यास होंगे, तब छठे अंशसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भी वासुदेवके नामसे ४४ प्रसिद्ध और वसुदेवके पुत्ररूपमें अवतरित होंगे । उस समय मैं भी योगमायासे संसारको विस्मित करनेके ॥ ४५ लिये योगात्मा नामक ब्रह्मचारीका रूप धारण करूँगा । और शरीरको अनामय समझकर इसे मृतकी भाँति ॥ ४६ श्मशानमें छोड़कर ब्राह्मणोंके हितके लिये योगमायासे । आप ब्रह्मा एवं विष्णुके साथ दिव्य तथा पवित्र मेरुगुहामें ॥ ४७ प्रवेश करूँगा । हे ब्रह्मन्! उस समय मैं लंकुली नामसे । अवतार ग्रहण करूँगा । मेरे उत्पन्न होनेसे यह कायावतार ॥ ४८ । तीर्थ सिद्धक्षेत्रके नामसे उस समयतक विख्यात रहेगा,