शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 31–40

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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अ ० ५ ] तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः । कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रः कौरुष्य एव च

योगिनो ब्राह्मणा वेदपारगा ऊर्ध्वरेतसः ।

प्राप्य माहेश्वरं योगं गमिष्यन्ति शिवं पुरम् ॥

वैवस्वतेऽन्तरे सम्यक् प्रोक्ता हि परमात्मना । योगेश्वरावताराश्च सर्वावर्तेषु सुव्रताः व्यासाश्चैवाष्टविंशत्का द्वापरे द्वापरे विभो । योगेश्वरावताराश्च प्रारम्भे च कलौ कलौ योगेश्वरावताराणां योगमार्गप्रवर्द्धकाः महाशैवाश्च चत्वारः शिष्याः प्रत्येकमव्ययाः एते पाशुपताः शिष्या भस्मोद्धूलितविग्रहाः रुद्राक्षमालाभरणास्त्रिपुण्ड्रांकितमस्तकाः शिष्या धर्मरताः सर्वे वेदवेदांगपारगाः लिंगार्चनरता नित्यं बाह्याभ्यन्तरतः स्थिताः भक्त्या मयि च योगेन ध्याननिष्ठा जितेन्द्रियाः संख्यया द्वादशाधिक्यशतं च गणिता बुधैः इत्येतद्वै मया प्रोक्तमवतारेषु लक्षणम् मन्वादिकृष्णपर्यन्तमष्टाविंशद्युगक्रमात् तत्र श्रुतिसमूहानां विधानं ब्रह्मलक्षणम् भविष्यति तदा कल्पे कृष्णद्वैपायनो यदा इत्येवमुक्त्वा ब्रह्माणमनुगृह्य महेश्वरः पुनः संप्रेक्ष्य देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत शतरुद्रसंहिता २७ जबतक यह पृथ्वी रहेगी । उस समय भी कुशिक, ॥ ४ ९ गर्ग, मित्र एवं कौरुष्य नामक मेरे तपस्वी शिष्य होंगे । ये सभी योगी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदके पारगामी विद्वान् तथा ५० ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी होकर माहेश्वर योगको प्राप्तकर शिवलोकको जायँगे ॥ ४३–५० ॥ [ सूतजी बोले- ] हे उत्तम व्रतवाले मुनियो! ॥ ५१ इस प्रकार परमात्मा शिवने वैवस्वत मन्वन्तरके प्रत्येक कलियुगमें होनेवाले अपने योगावतारोंका सम्यक् वर्णन किया ॥५१ ॥

हे विभो! इसी प्रकार प्रत्येक द्वापरयुगमें अट्ठाईस ॥ ५२ व्यास तथा प्रत्येक कलियुगके प्रारम्भमें योगेश्वरके अवतार होते रहते हैं ॥५२ ॥

। प्रत्येक महायोगेश्वरके अवतारोंमें उनके चार ॥ ५३ महाशैव शिष्य भी होते रहते हैं, जो योगमार्गकी वृद्धि करनेवाले तथा अविनाशी होते हैं ॥ ५३ ॥

। ये सभी शिष्य पाशुपतव्रतका आचरण करनेवाले, ॥ ५४ शरीरमें भस्मलेपन करनेवाले, रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले तथा त्रिपुण्ड्रसे सुशोभित मस्तकवाले होते । हैं । सभी शिष्य धर्मपरायण, वेद - वेदांगके ज्ञाता, ॥ ५५ लिंगार्चनमें सदा तत्पर, बाहर तथा भीतरसे मुझमें । भक्ति रखनेवाले योगध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होते ॥ ५६ हैं । विद्वानोंद्वारा इनकी संख्या एक सौ बारह कही गयी है॥५४–५६ ॥ । इस प्रकार मैंने अट्ठाईस युगोंके क्रमसे मनुसे ॥५७ लेकर श्रीकृष्णावतारपर्यन्त [ शिवजीके ] अवतारोंका लक्षण कह दिया । इस कल्पमें जब कृष्णद्वैपायन व्यास । होंगे, तब श्रुतिसमूहोंका ब्रह्मलक्षणसम्पन्न विधान अर्थात् ॥ ५८ वेदान्तके रूपमें प्रयोग होगा ॥ ५७-५८ ॥ [ हे सनत्कुमार! ] देवेश्वर शिव ब्रह्मासे इतना । कहकर उनपर कृपा करके उनकी ओर पुनः देखकर ॥ ५ ९ । वहींपर अन्तर्हित हो गये ॥ ५ ९ इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां शिवावतारोपाख्याने एकोनविंशतिशिवावतारवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके शिवावतारोपाख्यानमें शिवके उन्नीस अवतारोंका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 32

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ २८ अथ षष्ठोऽध्यायः नन्दीश्वरावतारवर्णन सनत्कुमार उवाच भवान्कथमनुप्राप्तो महादेवांशजः शिवम् श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं वक्तुमर्हसि मे प्रभो नन्दीश्वर उवाच सनत्कुमार सर्वज्ञ सावधानतया शृणु यथाऽहं च शिवं प्राप्तो महादेवांशजो मुने प्रजाकामः शिलादोऽभूदुक्तः पितृभिरादरात् तदुद्धर्तुमना भक्त्या समुद्धारमभीप्सुभिः अधोदृष्टिः सुधर्मात्मा शिलादो नाम वीर्यवान् तस्यासीन्मुनिकैर्वृत्तिः शिवलोके च सोऽगमत् शक्रमुद्दिश्य स मुनिस्तपस्तेपे सुदुःसहम् निश्चलात्मा शिलादाख्यो बहुकालं दृढव्रतः ॥ तपतस्तस्य तपसा संतुष्टोऽभूच्छतक्रतुः जगाम च वरं दातुं सर्वदेवप्रभुस्तदा शिलादमाह सुप्रीत्या शक्रस्तुष्टोऽस्मि तेऽनघ । तेन त्वं मुनिशार्दूल वरयस्व वरानिति ततः प्रणम्य देवेशं स्तुत्वा स्तुतिभिरादरात् । शिलादो मुनिशार्दूलस्तमाह सुकृताञ्जलिः शिलाद उवाच शतक्रतो सुरेशान सन्तुष्टो यदि मे प्रभो । अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सुव्रतम् शक्र उवाच पुत्रं दास्यामि पुत्रार्थिन्योनिजं मृत्युसंयुतम् अन्यथा ते न दास्यामि मृत्युहीना न सन्ति वै न दास्यामि सुतं तेऽहं मृत्युहीनमयोनिजम् । हरिर्विधिश्च भगवान्किमुतान्ये महामुने सनत्कुमार बोले— [ हे नन्दीश्वर! ] आप | महादेवके अंशसे किस प्रकार उत्पन्न हुए और किस ॥ १ प्रकार शिवत्वको प्राप्त हुए? हे प्रभो! मैं वह सब सुनना चाहता हूँ, अतः आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

नन्दीश्वर बोले- हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! हे । मुने! जिस प्रकार शिवजीके अंशसे उत्पन्न होकर मैंने ॥ २ शिवत्वको प्राप्त किया है, उसको आप सावधानीपूर्वक सुनिये ॥२ ॥

। किसी समय उद्धारकी अभिलाषावाले पितरोंने ॥ ३ [ महर्षि ] शिलादसे आदरपूर्वक कहा कि सन्तान उत्पन्न करनेका प्रयत्न करें, तब शिलादने भक्तिपूर्वक उनका उद्धार करनेकी इच्छासे पुत्रोत्पत्ति करनेका विचार किया ॥ ३ ॥

। परम धर्मात्मा तथा तेजस्वी उन शिलादमुनिने ॥ ४ अधोदृष्टि एवं मुनिवृत्ति धारण कर ली और वे शिवलोकको गये । उन शिलादमुनिने स्थिर मन तथा । ५ दृढ़ व्रतवाला होकर इन्द्रको उद्देश्य करके बहुत समयतक अति कठोर तप किया ॥ ४-५ ॥ । तब तपोनिरत उनके तपसे सर्वदेवप्रभु इन्द्र ॥ ६ सन्तुष्ट हो गये और वर देनेहेतु गये तथा अत्यन्त प्रेमपूर्वक शिलादसे बोले- हे अनघ! मैं आपपर प्रसन्न ॥ ७ हूँ । अतः हे मुनिशार्दूल! आप वर माँगें ॥ ६-७ ॥ तब शिलादमुनि देवेश इन्द्रको प्रणामकर स्तोत्रोंके ॥ ८ द्वारा आदरपूर्वक स्तुति करके हाथ जोड़कर उनसे कहने लगे —॥८ ॥

शिलाद बोले – हे इन्द्र! हे सुरेशान! हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मैं आपसे अयोनिज, ॥ ९ अमर तथा उत्तम व्रतवाले पुत्रकी कामना करता हूँ ॥ ९ ॥

शक्र बोले — हे पुत्रार्थिन्! मैं आपको योनिसे । उत्पन्न तथा मृत्युको प्राप्त होनेवाला पुत्र दे सकता हूँ, ॥ १० इसके विपरीत नहीं; क्योंकि मृत्युहीन तो कोई नहीं है । मैं आपको अयोनिज तथा मृत्युरहित पुत्र नहीं दे सकता, हे महामुने! [ अयोनिज एवं अमर पुत्र तो ] भगवान् विष्णु, ब्रह्मा तथा कोई अन्य भी नहीं दे ॥ ११ | सकते हैं ॥ १०-११ ॥

पृष्ठ 33

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अ ० ६ ]

तावपि त्रिपुरार्यङ्गसम्भवौ मरणान्वितौ ।

तयोरप्यायुषां मानं कथितं निगमे पृथक् ॥

तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः ।

परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मक्षमं सुतम् ॥

किन्तु देवेश्वरो रुद्रः प्रसीदति महेश्वरः ।

सुदुर्लभो मृत्युहीनस्तव पुत्रो ह्ययोनिजः ॥

अहं च विष्णुर्भगवान् द्रुहिणश्च महामुने ।

अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रं दातुं न शक्नुमः ॥

आराधय महादेवं तत्पुत्रविनिकाम्यया ।

सर्वेश्वरो महाशक्तः स ते पुत्रं प्रदास्यति ॥

नन्दीश्वर उवाच

एवं व्याहृत्य विप्रेन्द्रमनुगृह्य च तं घृणी ।

देवैर्वृतः सुरेशानः स्वलोकं समगान्मुने ॥

गते तस्मिंश्च वरदे सहस्राक्षे शिलाशनः ।

आराधयन्महादेवं तपसाऽतोषयद्भवम् ॥

अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य द्विजस्य वै ।

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु गतं क्षणमिवाद्भुतम् ॥

वल्मीकेन वृताङ्गश्च लक्षकीटगणैर्मुनिः ।

वज्रसूचीमुखैश्चान्यै रक्तभुग्भिश्च सर्वतः ॥

निर्मांसरुधिरत्वग्वै बिले तस्मिन्नवस्थितः ।

अस्थिशेषोऽभवत्पश्चाच्छिलादो मुनिसत्तमः ॥

तुष्टः प्रभुस्तदा तस्मै दर्शयामास स्वां तनुम् ।

दिव्यां दिव्यगुणैर्युक्तामलभ्यां वामबुद्धिभिः ॥

दिव्यवर्षसहस्त्रेण तप्यमानाय शूलधृक् ।

सर्वदेवाधिपस्तस्मै वरदोऽस्मीत्यभाषत ॥

महासमाधिसंलीनः स शिलादो महामुनिः ।

नाशृणोत्तद्गिरं शम्भोर्भक्त्यधीनतरस्य वै ॥

शतरुद्रसंहिता २ ९ वे दोनों भी शिवके शरीरसे उत्पन्न होते हैं और १२ मरते रहते हैं एवं उन दोनोंकी आयुका प्रमाण भी वेदमें अलग कहा गया है ॥१२ ॥

इसलिये हे विप्रवर! मृत्युहीन एवं अयोनिज १३ पुत्रकी कामना प्रयत्नपूर्वक छोड़ें और अपने सामर्थ्यवाला पुत्र प्राप्त करें ॥ १३ ॥

हाँ, यदि देवाधिदेव महादेव रुद्र आपपर प्रसन्न १४ हो जायँ, तो आपको अत्यन्त दुर्लभ, मृत्युहीन और अयोनिज पुत्र प्राप्त हो सकता है ॥१४ ॥

हे महामुने! मैं, भगवान् विष्णु एवं ब्रह्मा भी १५ अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र नहीं दे सकते । यदि इस प्रकारके पुत्रको प्राप्त करनेकी कामनासे आप महादेवकी आराधना कीजिये, तो महान् सामर्थ्यवाले वे सर्वेश्वर १६ आपको इस प्रकारका पुत्र देंगे॥१५-१६ ॥ नन्दीश्वर बोले - – हे मुने! परम दयालु इन्द्र उन विप्रेन्द्रको इस प्रकारसे कहकर तथा उनपर अनुग्रह १७ करके देवताओंके साथ अपने लोकको चले गये ॥ १७ ॥

वरदाता इन्द्रके चले जानेपर वे शिलादमुनि १८ महादेवकी आराधना करते हुए अपनी तपस्यासे शिवको प्रसन्न करने लगे ॥१८ ॥

इस प्रकार रात - दिन तत्परतापूर्वक तपस्या करते १ ९ हुए उन द्विज [ शिलादमुनि ] -के दिव्य एक हजार वर्ष एक क्षणके समान बीत गये, यह आश्चर्यजनक था ॥ १ ९ ॥ उनका समस्त शरीर वज्रसूचीके समान मुखवाले २० एवं अन्यान्य रुधिरपान करनेवाले लाखों कीड़ोंसे तथा वल्मीकसे ढँक गया । उनका शरीर त्वचा, रुधिर एवं मांससे रहित हो गया, बाँबीमें स्थित उन मुनिश्रेष्ठ २१ शिलादकी हड्डियाँ ही बची रह गयी थीं ॥ २०-२१ ॥ तब शिवजीने प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य गुणोंसे २२ युक्त अपना दिव्य शरीर दिखलाया, जिसे कुटिल बुद्धि रखनेवाले नहीं प्राप्त कर सकते हैं ॥ २२ ॥

तब सभी देवताओंके स्वामी शूलधारी शिवने २३ देवताओंके एक हजार वर्षसे तप करते हुए उन शिलादमुनिसे कहा कि मैं आपको वर देनेहेतु आया हूँ ॥ २३ ॥

महासमाधिमें लीन वे महामुनि शिलाद भक्तिके अधीन रहनेवाले शिवजीकी उस वाणीको नहीं सुन २४ | सके ॥२४ ॥

पृष्ठ 34

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ ३०

यदा स्पृष्टो मुनिस्तेन करेण त्रिपुरारिणा ।

तदैव मुनिशार्दूल उत्ससर्ज तपःक्रमम् ॥

अथोन्मील्य मुनिर्नेत्रे सोमं शंभुं विलोकयन् ।

द्रुतं प्रणम्य समुदा पादयोर्न्यपतन्मुने ॥

हर्षगद्गदया वाचा नतस्कंधः कृताञ्जलिः ।

प्रसन्नात्मा शिलादः स तुष्टाव परमेश्वरम् ॥

ततः प्रसन्नो भगवान्देवदेवस्त्रिलोचनः ।

वरदोऽस्मीति तं प्राह शिलादं मुनिपुंगवम् ॥

तपसानेन किं कार्यं भवते हि महामते ।

ददामि पुत्रं सर्वज्ञं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ॥

ततः प्रणम्य देवेशं तच्छ्रुत्वा च शिलाशनः ।

हर्षगद्रदया वाचोवाच सोमविभूषणम् ॥

शिलाद उवाच

महेश यदि तुष्टोऽसि यदि वा वरदश्च मे ।

इच्छामि त्वत्समं पुत्रं मृत्युहीनमयोनिजम् ॥

नंदीश्वर उवाच

एवमुक्तस्ततो देवस्त्र्यम्बकस्तेन शङ्करः ।

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शिलादं मुनिसत्तमम् ॥

शिव उवाच

पूर्वमाराधितो विप्र ब्रह्मणाऽहं तपोधन ।

तपसा चावतारार्थं मुनिभिश्च सुरोत्तमैः ॥

तव पुत्रो भविष्यामि नन्दी नाम्ना त्वयोनिजः ।

पिता भविष्यसि मम पितुर्वै जगतां मुने ॥

नन्दीश्वर उवाच

एवमुक्त्वा मुनिं प्रेक्ष्य प्रणिपत्यास्थितं घृणी ।

सोमस्तूर्णं तमादिश्य तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥

गते तस्मिन्महादेवे स शिलादो महामुनिः ।

स्वमाश्रममुपागम्य ऋषिभ्योऽकथयत्ततः ॥

कियता चैव कालेन तदासौ जनकः स मे ।

यज्ञाङ्गणं चकर्षाशु यज्ञार्थं यज्ञवित्तमः ॥

जब शिवजीने अपने हाथसे मुनिका स्पर्श २५ किया, तब मुनिश्रेष्ठ शिलादने तपस्या छोड़ी ॥ २५ ॥

हे मुने! तदनन्तर नेत्र खोलकर पार्वतीसहित शिवका दर्शन प्राप्तकर शीघ्रतासे आनन्दपूर्वक प्रणाम २६ करके शिलादमुनि उनके चरणोंपर गिर पड़े ॥ २६ ॥

तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त वे शिलाद कंधा झुकाकर २७ हाथ जोड़कर हर्षके कारण गद्गद वाणीमें परमेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥२७ ॥

तदनन्तर प्रसन्न हुए देवाधिदेव त्रिलोचन भगवान् २८ शिवने उन मुनिश्रेष्ठ शिलादसे [ पुनः ] कहा- मैं आपको वर देने आया हूँ । हे महामते! इस तपस्यासे आपको क्या करना है? मैं आपको सर्वज्ञ तथा २ ९ सर्वशास्त्रार्थवेत्ता पुत्र दे रहा हूँ ॥ २८-२९ ॥ तब यह सुनकर शिलादने शिवजीको प्रणामकर हर्षके कारण गद्गद वाणीमें उन चन्द्रशेखरसे ३० कहा —॥३० ॥

शिलाद बोले - हे महेश्वर! यदि आप [ मुझपर ] प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं आपके समान ३१ ही अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र चाहता हूँ ॥ ३१ ॥

नन्दीश्वर बोले - [ हे सनत्कुमार! ] तब उनके ऐसा कहनेपर त्रिनेत्र भगवान् शिव प्रसन्नचित्त होकर ३२ मुनिश्रेष्ठ शिलादसे कहने लगे —॥३२ ॥

शिवजी बोले — हे विप्र! हे तपोधन! पूर्वकालमें ब्रह्मा, देवताओं तथा मुनियोंने [ मेरे ] अवतारके लिये ३३ तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की थी, इसलिये मैं नन्दी नामसे आपके अयोनिज पुत्रके रूपमें अवतरित होऊँगा और हे मुने! तब आप मुझ तीनों लोकोंके ३४ पिताके भी पिता बन जायँगे॥३३-३४ ॥ नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर प्रणाम करके स्थित मुनिकी ओर देखकर उन्हें आज्ञा देकर उमासहित ३५ दयालु शिव वहीं अन्तर्हित हो गये ॥३५ ॥

तब उन महादेवके अन्तर्धान हो जानेपर ३६ अपने आश्रममें आकर उन महामुनि शिलादने ऋषियोंको [ वह वृत्तान्त ] बताया ॥ ३६ ॥

[ हे सनत्कुमार! ] कुछ समय बाद यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मेरे पिता शिलादमुनि यज्ञ करनेके लिये यज्ञस्थलका ३७ । शीघ्रतासे कर्षण करने लगे ॥३७ ॥

पृष्ठ 35

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अ ० ६ ] ततः क्षणादहं शंभोस्तनुजस्तस्य चाज्ञया स जातः पूर्वमेवाहं युगान्ताग्निसमप्रभः अवर्षस्तदा पुष्करावर्तकाद्या जगुः खेचराः किन्नराः सिद्धसाध्याः । शिलादात्मजत्वं गते मय्यृषीन्द्राः समन्ताच्च वृष्टिं व्यधुः कौसुमी ते ॥

अथ ब्रह्मादयो देवा देवपल्यश्च सर्वशः ।

तत्राजग्मुश्च सुप्रीत्या हरिश्चैव शिवोऽम्बिका ॥

तदोत्सव महानासीन्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । आदृत्य मां तथालिंग्य तुष्टुवुर्हर्षिताश्च ते

सुप्रशस्य शिलादं तं स्तुत्वा च सुस्तवैः शिवौ ।

सर्वे जग्मुश्च धामानि शिवावप्यखिलेश्वरौ ॥

शिलादोऽपि च मां दृष्ट्वा कालसूर्यानलप्रभम् ।

त्र्यक्षं चतुर्भुजं बालं जटामुकुटधारिणम् ॥

त्रिशूलाद्यायुधं दीप्तं सर्वथा रुद्ररूपिणम् ।

महानन्दभरः प्रीत्या प्रणम्यं प्रणनाम च ॥

शिलाद उवाच

त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर ।

तस्मात्त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम् ॥

नन्दीश्वर उवाच

मया सह पिता हृष्टः सुप्रणम्य महेश्वरम् ।

उटजं स्वं जगामाशु निधिं लब्ध्वेव निर्धनः ॥

यदा गतोऽहमुटजं शिलादस्य महामुने ।

तदाहं तादृशं रूपं त्यक्त्वा मानुष्यमास्थितः ॥

शतरुद्रसंहिता ३१ । उसी समय [ यज्ञारम्भसे पूर्व ही ] शिवजीकी ॥ ३८ आज्ञासे प्रलयाग्निके सदृश देदीप्यमान होकर मैं उनके शरीरसे पुत्ररूपमें प्रकट हुआ ॥ ३८ ॥

उस समय शिलादमुनिके पुत्ररूपमें मेरे अवतरित होनेपर पुष्करावर्त आदि मेघ वर्षा करने लगे; आकाशचारी किन्नर, सिद्ध और साध्यगण गान ३ ९ करने लगे और ऋषिगण चारों ओरसे पुष्पवृष्टि करने लगे । इसके बाद ब्रह्मा आदि देवगण, देवपत्नियाँ, विष्णु, शिव, अम्बिका– ये सब अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक ४० वहाँ आये ॥३ ९ -४० ॥ उस समय वहाँपर बहुत बड़ा उत्सव हुआ । ॥ ४१ अप्सराएँ नाचने लगीं । वे सभी देवगण हर्षित होकर मेरा समादर तथा आलिंगन करके स्तुति करने लगे । वे लोग उन शिलादमुनिकी प्रशंसाकर तथा उत्तम ४२ स्तोत्रोंसे शिव एवं पार्वतीकी स्तुतिकर अपने - अपने धामोंको चले गये, अखिलेश्वर शिव - शिवा भी अपने धामको चले गये ॥ ४१-४२ ॥ [ महर्षि ] शिलाद भी प्रलयकालीन सूर्य और ४३ अग्निके समान कान्तिमान्, तीन नेत्रोंसे युक्त, चार भुजावाले, जटामुकुटधारी, त्रिशूल आदि शस्त्र धारण करनेवाले, देदीप्यमान रुद्रके समान रूपवाले तथा सब ४४ प्रकारसे प्रणम्य मुझ नन्दीश्वरको बालकके रूपमें देखकर परम आनन्दसे परिपूर्ण होकर प्रेमपूर्वक प्रणाम करने लगे॥४३-४४ ॥ शिलाद बोले - हे सुरेश्वर! आपने मुझे आनन्दित किया है, अतः आपका नाम नन्दी होगा ४५ और इसलिये आनन्दस्वरूप आप प्रभु जगदीश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४५ ॥

नन्दीश्वर बोले— [ हे सनत्कुमार! ] पिताजी उन महेश्वरको भलीभाँति प्रणाम करके मुझे साथ ४६ लेकर शीघ्रतापूर्वक पर्णकुटीमें चले गये । वे इतने प्रसन्न हुए, मानो किसी निर्धनको निधि मिल गयी हो ॥ ४६ ॥

हे महामुने! जब मैं [ महर्षि ] शिलादकी कुटीमें

गया, तब मैंने उस प्रकारके रूपको त्यागकर मनुष्य-४७ । शरीर धारण कर लिया ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 36

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३२ मानुष्यमास्थितं दृष्ट्वा पिता मे लोकपूजितः विललापातिदुःखार्त्तः स्वजनैश्च समावृतः जातकर्मादिकान्येव सर्वाण्यपि चकार मे शालंकायनपुत्रो वै शिलादः पुत्रवत्सलः वेदानध्यापयामास सांगोपांगानशेषतः शास्त्राण्यन्यान्यपि तथा पञ्चवर्षे पिता च माम् सम्पूर्णे सप्तमे वर्षे मित्रावरुणसंज्ञकौ मुनी तस्याश्रमं प्राप्तौ द्रष्टुं मां चाज्ञया विभोः सत्कृतौ मुनिना तेन सूपविष्टौ महामुनी ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः मित्रावरुणावूचतुः

तात नंदी तवाल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः ।

न दृष्टमेव चापश्यं ह्यायुर्वर्षादतः परम् ॥

विप्रयोरित्युक्तवतोः शिलादः पुत्रवत्सलः तमालिङ्ग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्

मृतवत्पतितं दृष्ट्वा पितरं च पितामहम् ।

प्रत्यवोचत्प्रसन्नात्मा स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥

केन त्वं तात दुःखेन वेपमानश्च रोदिषि दुःखं ते कुत उत्पन्नं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः पितोवाच तवाल्पमृत्युदुःखेन दुःखितोऽतीव पुत्रक को मे दुःखं हरतु वै शरणं तं प्रयामि हि पुत्र उवाच

देवो वा दानवो वापि यमः कालोऽथवापि हि ।

ऋध्येयुर्यद्यपि ह्येते मामन्येऽपि जनास्तथा ॥

अथापि चाल्पमृत्युर्मे न भविष्यति मा तुदः सत्यं ब्रवीमि जनक शपथं ते करोम्यहम् ॥ पितोवाच

किं तपः किं परिज्ञानं को योगश्च प्रभुश्च ते ।

येन त्वं दारुणं दुःखं वञ्चयिष्यसि पुत्र मे ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । तदनन्तर मुझे मनुष्य - शरीर धारण किया हुआ ॥ ४८ देखकर लोकपूजित मेरे पिता अपने कुटुम्बियोंसहित दुखी होकर विलाप करने लगे । शालंकायनमुनिके पुत्र । शिलादने मेरा समस्त जातकर्मादि संस्कार ॥ ४ ९ पुत्रवत्सल सम्पादित किया ॥ ४८-४९ ॥ । पाँचवें वर्षमें मेरे पिताने मुझे सांगोपांग वेदों तथा ॥ ५० सम्पूर्ण शास्त्रोंका भी अध्ययन कराया । सातवें वर्षके सम्पूर्ण । होनेपर मित्र और वरुण नामवाले दो मुनि शिवजीकी आज्ञासे ॥ ५१ मुझे देखनेके लिये उनके आश्रमपर आये ॥ ५०-५१ ॥ उन मुनि [ शिलाद ] -के द्वारा सत्कृत होकर । सुखपूर्वक बैठे हुए दोनों महात्मा महामुनि मुझे बार-॥ ५२ बार देखकर कहने लगे —॥५२ ॥

मित्र और वरुण बोले- हे तात! आपके पुत्र नन्दी - जैसा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत मुझे अभीतक ५३ | कोई दिखायी या सुनायी नहीं पड़ा, किंतु [ दुःख है कि ] यह अल्पायु है । अब इस वर्ष से अधिक इसकी आयु हमलोग देख नहीं पा रहे हैं ॥५३ ॥

। उन विप्रोंके ऐसा कहनेपर पुत्रवत्सल शिलाद ॥ ५४ उसका आलिंगनकर दुःखसे व्याकुल होकर ऊँचे स्वरमें अत्यधिक विलाप करने लगे ॥५४ ॥

तदनन्तर मृतकके समान गिरे हुए पिता एवं ५५ पितामहको देखकर वह बालक शिवके चरणकमलका ध्यानकर प्रसन्नचित्त होकर कहने लगा - हे तात! । आप किस दुःखसे दुखी होकर काँपते हुए रो रहे हैं, ॥ ५६ आपको यह दुःख कहाँसे उत्पन्न हुआ, मैं उसको यथार्थ रूपसे जानना चाहता हूँ॥५५-५६ ॥ पिता बोले — हे पुत्र! तुम्हारी अल्पावस्थामें । मृत्युके दुःखसे मैं अत्यधिक दुखी हूँ । मेरे दुःखको ॥ ५७ कौन दूर करेगा, मैं उसकी शरणमें जाऊँ ॥५७ ॥

पुत्र बोला - [ हे पिताजी! ] देवता, दानव, यमराज, काल अथवा अन्य कोई भी प्राणी यदि मुझे ५८ मारना चाहें, तो भी मेरी अल्पमृत्यु नहीं होगी, आप । दुखी न हों । हे पिताजी! मैं आपकी सौगन्ध खाता ५ ९ हूँ, यह सच कह रहा हूँ ॥ ५८-५९ ॥ पिता बोले — हे पुत्र! वह कौन - सा तप है, ज्ञान है अथवा योग है या कौन तुम्हारा प्रभु है, ६० जिससे तुम मेरे इस दारुण दुःखको दूर करोगे? ॥ ६० ॥

पृष्ठ 37

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II नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय 2224

पृष्ठ 38

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Deolalik भगवान् सदाशिवद्वारा विष्णुजीको चक्र प्रदान

पृष्ठ 39

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भगवती शाकम्भरी देवी

पृष्ठ 40

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) ० ० प्र मन्दिर म ( वर्तमान ज्योतिर्लिङ्ग श्रीमहाकालेश्वरका श्रीमहाकाल १ – ज्योतिर्लिङ्ग ) ० प्र ० मन्दिर आ ( वर्तमान ज्योतिर्लिङ्ग द्वादश श्रीमल्लिकार्जुनका श्रीमल्लिक ) मन्दिर गुजरात ( वर्तमान ज्योतिर्लिङ्ग श्रीसोमनाथका श्रीसोमनाथ