शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 341–350

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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अ ० ३३ ] कोटिरुद्रसंहिता ३२७

हा हतास्मि कृतं केन दुष्टं कर्म शुचिव्रते ।

इत्युच्चार्य रुरोदाति विविधं तत्प्रिया च सा ॥

ज्येष्ठा दुःखं तदापन्ना हा हतास्मि किलेति च ।

बहिर्दुःखं चकारासौ मनसा हर्षसंयुता ॥

घुश्मा चापि तदा तस्या वध्वा दुःखं निशम्य सा ।

न चचाल व्रतात्तस्मान्नित्यपार्थिवपूजनात् ॥

मनश्चैवोत्सुकं नैव जातं तस्या मनागपि ।

भर्तापि च तथैवासीद्यावद् व्रतविधिर्भवेत् ॥

मध्याह्ने पूजनांते च दृष्ट्वा शय्यां भयावहाम् ।

तथापि न तदा किञ्चित्कृतं दुःखं हि घुश्मया ॥

येनैव चार्पितश्चायं स वै रक्षां करिष्यति ।

भक्तप्रियः स विख्यातः कालकालः सतां गतिः ॥

यदि नो रक्षिता शंभुरीश्वरः प्रभुरेकलः ।

मालाकार इवासौ यान्युङ्क्ते तान्वियुनक्ति च ॥

अद्य मे चिन्तया किं स्यादिति तत्त्वं विचार्य सा ।

न चकार तदा दुःखं शिवे धैर्यं समागता ॥

पार्थिवांश्च गृहीत्वा सा पूर्ववत्स्वस्थमानसा । शंभोर्नामान्युच्चरन्ती जगाम सरसस्तटे क्षिप्त्वा च पार्थिवांस्तत्र परावर्तत सा यदा तदा पुत्रस्तडागस्थो दृश्यते स्म तटे तया पुत्र उवाच मातरेहि मिलिष्यामि मृतोऽहं जीवितोऽधुना तव पुण्यप्रभावाद्धि कृपया शंकरस्य वै ॥ सूत उवाच जीवितं तं सुतं दृष्ट्वा घुश्मा सा तत्प्रसूर्द्विजाः प्रहृष्टा नाभवत्तत्र दुःखिता न यथा पुरा हे शुचिव्रते! मैं तो मारी गयी, किसने यह २२ दुष्टकर्म किया है — ऐसा कहकर उसकी पत्नी अत्यधिक विलाप करने लगी । तब ज्येष्ठा सुदेहा भी बाहरसे दुःख प्रकट करने लगी और भीतरसे प्रसन्न हुई । वह २३ दुःखित होकर बोली- हाय! मैं तो निश्चय ही मर गयी ॥ २२-२३ ॥ वह घुश्मा अपनी पुत्रवधूके दुःखको सुनकर भी २४ नित्य पार्थिवपूजनरूप व्रतसे विचलित नहीं हुई ॥ २४ ॥

उसका मन [ पुत्रशोकसे ] थोड़ा भी उत्कण्ठित २५ नहीं हुआ और उसका पति भी जबतक व्रतविधि समाप्त नहीं हुई, तबतक वैसा ही रहा ॥ २५ ॥

पूजनके बाद मध्याह्नकालमें उस भयानक २६ शय्याको देखकर भी उस घुश्माने कुछ भी दुःख नहीं किया ॥ २६ ॥

जिन्होंने यह पुत्र दिया है, वे ही रक्षा भी करेंगे; २७ वे भक्तवत्सल, कालके भी काल और सज्जनोंकी रक्षा करनेवाले कहे गये हैं ॥ २७ ॥

यदि हमारी रक्षा करनेवाले एकमात्र प्रभु ईश्वर २८ सदाशिव हैं, तो चिन्ताकी बात ही क्या है? वे ही मालीके समान उन प्राणियोंका संयोग कराते हैं और पुन: उन्हें अलग भी कर देते हैं ॥ २८ ॥

इस समय मेरे चिन्ता करनेसे भी क्या होनेवाला २ ९ है, इस तत्त्वका विचारकर वह दुखी नहीं हुई और शिवजीका ध्यानकर धैर्य धारण किये रही ॥ २ ९ ॥ स्थिरचित्त होकर पूर्वकी भाँति पार्थिव शिवलिंगोंको ॥ ३० लेकर शिवके नामोंका उच्चारण करती हुई वह सरोवरके तटपर गयी । जब वहाँ पार्थिव लिंगोंको । डालकर वह लौटने लगी, तब उसने सरोवरके तटपर ॥ ३१ खड़े अपने पुत्रको देखा ॥ ३०-३१ ॥ पुत्र बोला — हे माता! आओ, मैं तुमसे मिलूँगा, । मैं तो मर गया था, किंतु तुम्हारे पुण्यके प्रभावसे और ३२ शंकरजीकी कृपासे अब जीवित हो गया हूँ ॥ ३२ ॥

सूतजी बोले- हे द्विजो! वह घुश्मा अपने उस पुत्रको जीवित देखकर भी वैसे ही अधिक प्रसन्न न । हुई, जैसा कि उसके मरनेपर दुखी न थी, किंतु ॥ ३३ । यथावत् शिवजीके ध्यानमें तत्पर रही ॥३३ ॥

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३२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ एतस्मिन्समये तत्र स्वाविरासीच्छिवो द्रुतम् । इसी समय वहाँ सन्तुष्ट हुए ज्योतिःस्वरूप सदाशिव ज्योतीरूपो महेशश्च संतुष्टः प्रत्युवाच ह ॥ ३४ शीघ्र प्रकट हो गये और उससे कहने लगे- ॥ ३४ शिव उवाच प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि दुष्टया मारितो ह्ययम् एनां च मारयिष्यामि त्रिशूलेन वरानने सूत उवाच

घुश्मा तदा वरं वव्रे सुप्रणम्य शिवं नता ।

रक्षणीया त्वया नाथ सुदेहेयं स्वसा मम ॥

शिव उवाच

अपकारः कृतस्तस्यामुपकारः कथं त्वया ।

क्रियते हननीया च सुदेहा दुष्टकारिणी ॥

घुश्मोवाच

तव दर्शनमात्रेण पातकं नैव तिष्ठति ।

इदानीं त्वां च वै दृष्ट्वा तत्पापं भस्मतां व्रजेत् ॥

अपकारेषु यश्चैव ह्युपकारं करोति च ।

तस्य दर्शनमात्रेण पापं दूरतरं व्रजेत् ॥

इति श्रुतं मया देव भगवद्वाक्यमद्भुतम् ।

तस्माच्चैवं कृतं येन क्रियतां च सदाशिव ॥

सूत उवाच

इत्युक्तस्तु तया तत्र प्रसन्नोऽत्यभवत्पुनः ।

महेश्वरः कृपासिंधुः तामूचे भक्तवत्सलः ॥

शिव उवाच

अन्यद्वरं ब्रूहि घुश्मे ददामि च हितं तव ।

त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नोऽस्मि निर्विकारस्वभावतः ॥

सूत उवाच सोवाच तद्वचः श्रुत्वा यदि देवो वरस्त्वया । लोकानां चैव रक्षार्थमत्र शिवजी बोले- हे वरानने! मैं प्रसन्न हूँ, ॥ तुम । वर माँगो, उस दुष्टाने इसे मारा था, अब मैं अपने ॥ ३५ त्रिशूलसे उसे मारूँगा ॥ ३५ ॥

सूतजी बोले- तब विनत हुई घुश्माने शिवजीको । प्रणामकर यह वर माँगा – हे नाथ! आप मेरी । इस ३६ बहन सुदेहाकी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥

शिवजी बोले — उसने तो अपकार किया है, फिर भी तुम उसका उपकार क्यों कर रही हो? ३७ दुष्टकर्म करनेवाली सुदेहा तो वधके योग्य है ॥ ३७ ॥

घुश्मा बोली- [ हे प्रभो! ] आपके दर्शनमात्रसे पाप नहीं रह जाता है, इसलिये आपका दर्शन करते ३८ ही उसके सभी पाप दूर हो गये ॥ ३८ ॥

जो पुरुष अपकार करनेवालोंके प्रति उपकार ३ ९ करता है, उसके दर्शनमात्रसे ही पाप दूर भाग जाते हैं । हे देव! मैंने भगवान्‌का ऐसा अद्भुत वाक्य सुना है, इसलिये हे सदाशिव! जिसने जैसा किया है, वह ४० वैसा करे ॥ ३ ९ -४० ॥ सूतजी बोले – उसके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भक्तवत्सल कृपासिन्धु महेश्वर अतीव प्रसन्न ४१ हो गये और उन्होंने पुनः कहा —॥४१ ॥

शिवजी बोले- हे घुश्मे! अब तुम कोई अन्य वर माँगो, मैं दूँगा । मैं तुम्हारी भक्तिसे तथा निर्विकार ४२ स्वभावसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसलिये तुम्हारा हित करना चाहता हूँ ॥४२ ॥

सूतजी बोले – उनका वचन सुनकर उसने कहा— यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो आप संसारकी स्थेयं मदाख्यया ॥ ४३ रक्षाके निमित्त मेरे नामसे यहींपर स्थित हो जाइये ॥ ४३ ॥

तदोवाच शिवस्तत्र सुप्रसन्नो महेश्वरः । तब अत्यन्त प्रसन्न हुए महेश्वर शिवजी स्थास्येऽत्र तव नाम्नाहं घुश्मेशाख्यः सुखप्रदः ॥ ४४ बोले- हे घुश्मे! मैं तुम्हारे नामसे घुश्मेश्वरके रूपमें प्रसिद्ध होकर यहाँ निवास करूँगा और सबको सुख प्रदान करूँगा ॥४४ ॥

घुश्मेशाख्यं सुप्रसिद्धं लिंगं मे जायतां शुभम् । यहाँपर मेरा घुश्मेश्वर नामक शुभ ज्योतिर्लिंग इदं सरस्तु लिंगानामालयं जायतां सदा ॥ ४५ प्रसिद्ध होगा और यह सरोवर सदा सभी लिंगोंका निवासस्थान होगा । इसलिये यह शिवालय नामसे तस्माच्छिवालयं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये । तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगा । यह सरोवर दर्शनमात्रसे सदा सर्वकामप्रदं ह्यैतद्दर्शनात्स्यात्सदा सरः ॥ ४६ | सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होगा । ४५-४६ ॥

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अ ० ३४ ] कोटिरुद्रसंहिता ३२ ९

तव वंशे शतं चैकं पुरुषावधि सुव्रते ।

ईदृशाः पुत्रकाः श्रेष्ठा भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४७

सुस्त्रीकाः सुधनाश्चैव स्वायुष्याश्च विचक्षणाः ।

विद्यावंतो ह्युदाराश्च भुक्तिमुक्तिफलाप्तये ॥ ४८

शतकोत्तरं चैव भविष्यन्ति गुणाधिकाः ।

ईदृशो वंशविस्तारो भविष्यति सुशोभनः ॥ ४ ९

सूत उवाच

इत्युक्त्वा च शिवस्तत्र लिंगरूपोऽभवत्तदा ।

घुश्मेशो नाम विख्यातः सरश्चैव शिवालयम् ॥५०

सुधर्मा स च घुश्मा च सुदेहा च समागताः ।

प्रदक्षिणं शिवस्याशु शतमेकोत्तरं दधुः ॥ ५१

पूजां कृत्वा महेशस्य मिलित्वा च परस्परम् ।

हित्वा चान्तर्मलं तत्र लेभिरे परमं सुखम् ॥ ५२

पुत्रं दृष्ट्वा सुदेहा सा जीवितं लज्जिताभवत् ।

तौ क्षमाप्याचरद्विप्रा निजपापापहं व्रतम् ॥ ५३

घुश्मेशाख्यमिदं लिंगमित्थं जातं मुनीश्वराः ।

तद् दृष्ट्वा पूजयित्वा हि सुखं संवर्धते सदा ॥ ५४

इति वश्च समाख्याता ज्योतिर्लिंगावली मया ।

द्वादशप्रमिता सर्वकामदा भुक्तिमुक्तिदा ॥ ५५

एतज्ज्योतिर्लिंगकथां यः पठेच्छृणुयादपि ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ ५६

हे सुव्रते! तुम्हारे वंशमें एक सौ एक पीढ़ीपर्यन्त इसी प्रकारके श्रेष्ठ पुत्र होते रहेंगे, इसमें सन्देह नहीं है, वे सुन्दर स्त्रीवाले, महाधनी, दीर्घजीवी, मेधावी, विद्वान्, उदार तथा भोग - मोक्षके फलको प्राप्त करनेवाले होंगे । इन सबको एक सौ एक पुत्र होंगे, जो गुणोंमें परस्पर एक - से - एक अधिक होंगे । इस प्रकार तुम्हारे वंशका अति सुन्दर विस्तार होगा ॥ ४७–४९ ॥ सूतजी बोले- ऐसा कहकर शिवजी वहाँ ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित हो गये । वे घुश्मेश्वर नामसे विख्यात हुए और वह सरोवर शिवालय नामसे विख्यात हुआ ॥५० ॥

उस समय वहाँपर आये हुए सुधर्मा, सुदेहा और घुश्माने बड़ी शीघ्रतासे शिवजीकी एक सौ एक बार परिक्रमा की । शिवजीकी पूजा करके परस्पर मिलकर तथा अपने अन्तःकरणका पाप दूरकर उन्होंने परम सुख प्राप्त किया ॥ ५१-५२ ॥ हे विप्रो! पुत्रको जीवित देखकर वह सुदेहा लज्जित हो गयी और उसने उन दोनोंसे क्षमा माँगकर अपने पापोंको दूर करनेवाले व्रतका आचरण किया ॥ ५३ ॥

हे मुनीश्वरो! इस प्रकार घुश्मेश्वर नामक यह लिंग उत्पन्न हुआ, उसका पूजन तथा दर्शन करनेसे सुखकी सदा वृद्धि होती है । इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे बारह ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन किया, जो सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और भोग तथा मोक्ष देनेवाले हैं॥५४-५५ ॥ जो इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथाओंको पढ़ता और सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और भोग । तथा मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ५६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां घुश्मेशज्योतिर्लिंगोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें घुश्मेशज्योतिर्लिंगोत्पत्ति-माहात्म्यवर्णन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः हरीश्वरलिंगका माहात्म्य और भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्र प्राप्त व्यासजी बोले- उन व्यास उवाच इति श्रुत्वा वचस्तस्य सूतस्य च मुनीश्वराः सुनकर सभी मुनीश्वरोंने उनकी सुप्रशस्य लोकानां हितकाम्यया ॥ १ कामनासे कहा —॥१ ॥

समूचुस्तं करनेकी कथा सूतजीका यह वचन प्रशंसा करके लोकहितकी

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३३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४ ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले- हे सूतजी! आप सब सूत सर्वं विजानासि ततः पृच्छामहे वयम् । | जानते हैं, इसीलिये हमलोग पूछ रहे हैं । हे प्रभो! कुछ अब। हरीश्वरस्य लिंगस्य महिमानं वद प्रभो ॥ | आप हरीश्वर लिंगका माहात्म्य कहिये । हमने सुना । | है कि पूर्वकालमें विष्णुने उनकी आराधनासे सुदर्शन चक्रं सुदर्शनं प्राप्तं विष्णुनेति श्रुतं पुरा । | चक्र प्राप्त किया था, इसलिये आप विशेष रूपसे उस तदाराधनतस्तात तत्कथां च विशेषतः ॥ ३ कथाको कहिये ॥ २-३ ॥ उवाच सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ ऋषियो! अब आपलोग सूत श्रूयतां च ऋषिश्रेष्ठा हरीश्वरकथा शुभा । | हरीश्वरकी शुभ कथा सुनिये, विष्णुने पूर्वकालमें । यतः सुदर्शनं लब्धं विष्णुना शंकरात्पुरा ॥ ४ शंकरजीसे सुदर्शनचक्र प्राप्त किया था । किसी समय

कस्मिंश्चित्समये दैत्याः संजाता बलवत्तराः ।

लोकांस्ते पीडयामासुर्धर्मलोपं च चक्रिरे ॥ ५

ते देवाः पीडिता दैत्यैर्महाबलपराक्रमैः ।

स्वं दुःखं कथयामासुर्विष्णुं निर्जररक्षकम् ॥ ६

देवा ऊचुः

कृपां कुरु प्रभो त्वं च दैत्यैः संपीडिता भृशम् ।

कुत्र यामश्च किं कुर्मः शरण्यं त्वां समाश्रिताः ॥ ७

सूत उवाच

इत्येवं वचनं श्रुत्वा देवानां दुःखितात्मनाम् ।

स्मृत्वा शिवपदांभोजं विष्णुर्वचनमब्रवीत् ॥ ८

विष्णुरुवाच करिष्यामि च वः कार्यमाराध्य गिरिशं सुराः बलिष्ठाः शत्रवो ह्येते विजेतव्याः प्रयत्नतः ॥ ९ सूत उवाच

इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।

मत्वा दैत्यान्हतान्दुष्टान्ययुर्धाम स्वकं स्वकम् ॥ १०

विष्णुरप्यमराणां तु जयार्थमभजच्छिवम् ।

सर्वामराणामधिपं सर्वसाक्षिणमव्ययम् ॥११

गत्वा कैलासनिकटे तपस्तेपे हरिः स्वयम् ।

कृत्वा कुण्डं च संस्थाप्य जातवेदसमग्रतः ॥ १२

पार्थिवेन विधानेन मंत्रैर्नानाविधैरपि ।

स्तोत्रैश्चैवाप्यनेकैश्च गिरिशं चाभजन्मुदा ॥ १३

कमलैः सरसो जातैर्मानसाख्यान्मुनीश्वराः ।

बद्ध्वा चैवासनं तत्र न चचाल हरिः स्वयम् ॥ १४ ।

। दैत्य महाबलवान् हो गये । वे लोकोंको पीड़ित करने और धर्मका लोप करने लगे । उसके अनन्तर महान् बल तथा पराक्रमवाले दैत्योंसे पीड़ित हुए उन देवताओंने देवरक्षक विष्णुसे अपना दुःख निवेदन किया॥४–६ ॥ देवगण बोले- हे प्रभो! आप कृपा कीजिये, हमलोगोंको दैत्य अत्यन्त पीड़ा दे रहे हैं, हमलोग कहाँ जायँ, क्या करें, हमलोग आप शरणदाताके आश्रित हैं ॥७ ॥

सूतजी बोले – - [ हे ऋषियो! ] दुखी मनवाले देवताओंका वचन सुनकर विष्णुने शिवके चरणकमलोंका ध्यान करके यह वचन कहा —॥८ ॥

विष्णुजी बोले- हे देवताओ! मैं भगवान् शिवकी आराधनाकर आपलोगोंका कार्य करूँगा; क्योंकि ये शत्रु बड़े बलवान् हैं, इन्हें प्रयत्नपूर्वक जीतना चाहिये ॥ ९ ॥

सूतजी बोले- [ हे ऋषियो! ] सर्वसामर्थ्यशाली विष्णुके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवता उन दुष्ट दैत्योंको हत मानकर अपने - अपने स्थानको चले गये । विष्णु भी देवताओंकी विजयके लिये सभी देवताओंके स्वामी, सर्वसाक्षी एवं अव्यय शिवकी आराधना करने लगे ॥ १०-११ ॥ वे कैलासपर्वतके समीप जाकर स्वयं कुण्डका निर्माणकर उसमें अग्निस्थापनकर उसीके समक्ष तप करने लगे । हे मुनीश्वरो! वे पार्थिव - विधिके अनुसार अनेक प्रकारके मन्त्रों एवं अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा मानसरोवरमें उत्पन्न हुए कमलोंसे प्रसन्नतापूर्वक शिवजीका पूजन करते रहे । वे हरि स्वयं आसन लगाकर स्थित रहे और विचलित नहीं हुए ॥ १२–१४ ॥

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अ ० ३४ ] कोटिरुद्रसंहिता ३३१

प्रसादावधि चैवात्र स्थेयं वै सर्वथा मया ।

इत्येवं निश्चयं कृत्वा समानर्च शिवं हरिः ॥

यदा नैव हरस्तुष्टो बभूव हरये द्विजाः ।

तदा स भगवान्विष्णुर्विचारे तत्परोऽभवत् ॥

विचार्यैवं स्वमनसि सेवनं बहुधा कृतम् ।

तथापि न हरस्तुष्टो बभूवोतिकरः प्रभुः ॥

ततः सुविस्मितो विष्णुर्भक्त्या परमयान्वितः ।

सहस्त्रैर्नामभिः प्रीत्या तुष्टाव परमेश्वरम् ॥

प्रत्येकं कमलं तस्मै नाममंत्रमुदीर्य च ।

पूजयामास वै शंभुं शरणागतवत्सलम् ॥

परीक्षार्थं विष्णुभक्तेस्तदा वै शंकरेण ह ।

कमलानां सहस्रात्तु हृतमेकं च नीरजम् ॥

न ज्ञातं विष्णुना तच्च मायाकारणमद्भुतम् ।

न्यूनं तच्चापि संज्ञाय तदन्वेषणतत्परः ॥

बभ्राम सकलां पृथ्वीं तत्प्रीत्यै सुदृढव्रतः ।

तदप्राप्य विशुद्धात्मा नेत्रमेकमुदाहरत् ॥

तं दृष्ट्वा स प्रसन्नोऽभूच्छंकरः सर्वदुःखहा ।

आविर्बभूव तत्रैव जगाद वचनं हरिम् ॥

शिव उवाच

प्रसन्नोऽस्मि हरे तुभ्यं वरं ब्रूहि यथेप्सितम् ।

मनोऽभिलषितं दद्मि नादेयं विद्यते तव ॥

सूत उवाच

तच्छ्रुत्वा शंभुवचनं केशवः प्रीतमानसः ।

महाहर्षसमापन्नो ह्यब्रवीत्साञ्जलिः शिवम् ॥

विष्णुरुवाच

वाच्यं किं मे त्वदग्रे वै ह्यन्तर्यामी त्वमास्थितः ।

तथापि कथ्यते नाथ तव शासनगौरवात् ॥

दैत्यैश्च पीडितं विश्वं सुखं नो नः सदाशिव ।

दैत्यान् हन्तुं मम स्वामिन्स्वायुधं न प्रवर्तते ॥

जबतक शिवजी प्रसन्न नहीं होंगे, तबतक मैं १५ इसी प्रकारसे स्थिर रहूँगा - ऐसा निश्चयकर विष्णुने शिवका अर्चन किया ॥ १५ ॥

हे ब्राह्मणो! जब सदाशिव विष्णुपर प्रसन्न नहीं १६ हुए, तब वे विष्णु विचार करने लगे । इस प्रकार अपने मनमें विचारकर वे नाना प्रकारसे भगवान् शिवकी १७ सेवा करने लगे, फिर भी लीलाविशारद प्रभु सदाशिव प्रसन्न नहीं हुए॥१६-१७ ॥ इसके बाद विष्णु आश्चर्यचकित हो अत्यन्त उत्तम १८ भक्तिसे युक्त होकर शिवके सहस्र नामोंसे प्रेमपूर्वक परमेश्वरकी स्तुति करने लगे । वे एक - एक नाममन्त्रका उच्चारणकर उन्हें एक - एक कमल अर्पित करते हुए १ ९ शरणागतवत्सल शम्भुकी पूजा करने लगे ॥ १८-१९ ॥ उस समय शिवने विष्णुकी भक्तिकी परीक्षाके २० लिये उन सहस्रकमलोंमेंसे एक कमलका अपहरण कर लिया । उस समय विष्णुको शिवकी मायासे हुए इस अद्भुत चरित्रका पता न चला । वे एक कमलको २१ कम जानकर उसे ढूँढ़नेमें तत्पर हो गये ॥ २०-२१ ॥ अविचल व्रतधारी विष्णुने उस कमलको प्राप्त २२ करनेके लिये सारी पृथ्वीका भ्रमण किया । परंतु उसके प्राप्त न होनेपर विशुद्ध आत्मावाले उन्होंने अपना एक नेत्र ही अर्पण कर दिया । तब यह देखकर सभी प्रकारके दुःखोंको दूर करनेवाले वे शंकर उनपर २३ प्रसन्न हो गये, वे वहींपर प्रकट हो गये और विष्णुसे यह वचन कहने लगे- ॥ २२-२३ ॥ शिवजी बोले- हे विष्णो! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, आप मनोवांछित वर माँगिये । मैं आपको मनोभिलषित २४ वर दूँगा, आपके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है ॥२४ ॥

सूतजी बोले- शिवजीकी यह बात सुनकर प्रसन्नचित्त भगवान् विष्णु परम हर्षसे युक्त होकर २५ हाथ जोड़कर शिवजीसे कहने लगे— ॥ २५ ॥

विष्णुजी बोले - हे नाथ! आप तो सर्वान्तर्यामी हैं, अतः मैं आपके सामने अपना मनोरथ क्या कहूँ, २६ फिर भी आपकी आज्ञासे कह रहा हूँ । हे सदाशिव! दैत्योंने सारे संसारको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है, २७ । इसलिये हम देवताओंको सुख प्राप्त नहीं हो रहा है ।

पृष्ठ 346

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३३२ किं करोमि क्व गच्छामि नान्यो मे रक्षकः परः अतोऽहं परमेशान शरणं त्वां समागतः सूत उवाच इत्युक्त्वा च नमस्कृत्य शिवाय परमात्मने । स्थितश्चैवाग्रतः शंभोः स्वयं च पुरुपीडितः

इति श्रुत्वा वचो विष्णोर्देवदेवो महेश्वरः ।

ददौ तस्मै स्वकं चक्रं तेजोराशिं सुदर्शनम् ॥

तत्प्राप्य भगवान्विष्णुर्दैत्यांस्तान्बलवत्तरान् ।

जघान तेन चक्रेण द्रुतं सर्वान्विना श्रमम् ॥

जगत्स्वास्थ्यं परं लेभे बभूवुः सुखिनः सुराः ।

सुप्रीतः स्वायुधं प्राप्य हरिरासीन्महासुखी ॥

ऋषय ऊचुः

किं तन्नामसहस्त्रं वै कथय त्वं हि शांकरम् ।

येन तुष्टो ददौ चक्रं हरये स महेश्वरः ॥

तन्माहात्म्यं मम ब्रूहि शिवसंवादपूर्वकम् ।

कृपालुत्वं च शंभोर्हि विष्णूपरि यथातथम् ॥

व्यास उवाच

इति तेषां वचः श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।

स्मृत्वा शिवपदांभोजं सूतो वचनमब्रवीत् ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ । । हे स्वामिन्! मेरा आयुध दैत्योंको मारनेमें समर्थ ॥ २८ हो पा रहा है । अब मैं क्या करता, कहा जाता नहीं | आपके अतिरिक्त कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं? | इसलिये हे महेश्वर! मैं आपकी शरणमें है,

आया ।

हूँ ॥ २६–२८ ॥

सूतजी बोले - – ऐसा कहकर परमात्मा शिवको नमस्कारकर दैत्योंसे अत्यन्त पीड़ित हुए स्वयं विष्णुजी ॥ २ ९ शिवजीके आगे खड़े हो गये ॥२ ९ ॥

विष्णुका यह वचन सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने ।

३० उन्हें अपना महातेजस्वी सुदर्शनचक्र प्रदान किया ॥ ३० ॥

तब उसे प्राप्तकर भगवान् विष्णुने उस चक्रसे ३१ बिना परिश्रमके शीघ्र ही उन महाबली राक्षसोंको विनष्ट कर दिया । इस प्रकार संसारमें शान्ति हुई । देवता सुखी हुए और सुन्दर सुदर्शनचक्र प्राप्तकर ३२ अतिप्रसन्न विष्णु भी परम सुखी हो गये ॥ ३१-३२ ॥ ऋषिगण बोले- शंकरजीका वह सहस्रनाम कौन - सा है, जिससे सन्तुष्ट हो शिवजीने विष्णुको ३३ सुदर्शनचक्र प्रदान किया, उसे आप कहिये । शिवकी चर्चासे पूर्ण उसके माहात्म्यको आप मुझसे यथार्थरूपसे कहिये, जिसके कारण विष्णुके ऊपर शिवजी कृपालु ३४ हुए ॥ ३३-३४ ॥ व्यासजी बोले — उदार चित्तवाले उन मुनियोंके इस वचनको सुनकर शिवजीके चरणकमलोंका ध्यान ३५ । करके सूतजी यह वचन कहने लगे —॥३५ ॥

विष्णुसुदर्शनचक्रलाभवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें विष्णुसुदर्शनचक्रलाभवर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः विष्णुप्रोक्त शिवसहस्त्रनामस्तोत्र सूत उवाच

श्रूयतां भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः ।

तदहं कथयाम्यद्य शैवं नामसहस्रकम् ॥

श्रीविष्णुरुवाच शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्करः पुष्पलोचनः । सूतजी बोले- हे मुनिवरो! आपलोग सुनें, जिससे महेश्वर सन्तुष्ट हुए थे, उस शिवसहस्रनामस्तोत्रको १ मैं कह रहा हूँ ॥१ ॥

भगवान् विष्णुने कहा – १. शिवः — कल्याण-स्वरूप, २. हरः— भक्तोंके पाप - ताप हर लेनेवाले, ३. मृडः — सुखदाता, ४. रुद्रः – दुःख दूर करनेवाले, ५. पुष्करः– आकाशस्वरूप, ६. पुष्पलोचनः-

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अ ० ३५ ] कोटिरुद्रसंहिता ३३३ अर्थिगम्यः सदाचारः शर्व: शंभुर्महेश्वरः ॥

चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विश्वं विश्वम्भरेश्वरः ।

वेदान्तसारसंदोहः कपाली नीललोहितः ॥

ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः ।

अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गस्वर्गसाधनः ॥

ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः ।

वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढः ॥

विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिसत्तमः सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः २ पुष्पके समान खिले हुए नेत्रवाले, ७. अर्थिगम्यः-प्रार्थियोंको प्राप्त होनेवाले, ८. सदाचारः - - श्रेष्ठ आचरणवाले, ९. शर्वः - संहारकारी, १०. शम्भुः-कल्याणनिकेतन, ११. महेश्वरः – महान् ईश्वर ॥२ ॥

१२. चन्द्रापीडः – चन्द्रमाको शिरोभूषणके रूपमें ३ धारण करनेवाले, १३. चन्द्रमौलिः – सिरपर चन्द्रमाका | मुकुट धारण करनेवाले, १४. विश्वम् - सर्वस्वरूप, १५. विश्वम्भरेश्वरः - विश्वका भरण - पोषण करनेवाले श्रीविष्णुके भी ईश्वर, १६. वेदान्तसारसंदोहः- — वेदान्तके सारतत्त्व सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकी साकार मूर्ति, १७. कपाली – हाथमें कपाल धारण करनेवाले, १८. नीललोहितः – ( गलेमें ) नील और ( शेष अंगोंमें ) लोहित वर्णवाले ॥ ३ ॥

१ ९. ध्यानाधारः— ध्यानके आधार, ४ २०. अपरि - च्छेद्यः – देश, काल और वस्तुकी सीमासे अविभाज्य, २१. गौरीभर्ता – गौरी अर्थात् पार्वतीजीके पति, २२. गणेश्वरः – प्रमथगणोंके स्वामी, २३. अष्टमूर्तिः– जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और यजमान – इन आठ रूपोंवाले, २४. विश्वमूर्तिः– अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् पुरुष, २५. त्रिवर्गस्वर्गसाधनः – धर्म, अर्थ, काम तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले ॥४ ॥

२६. ज्ञानगम्यः – ज्ञानसे ही अनुभवमें आनेके ५ योग्य, २७. दृढप्रज्ञः – सुस्थिर बुद्धिवाले, २८. देव-देवः — देवताओंके भी आराध्य, २ ९. त्रिलोचन: -सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रोंवाले, ३०. वाम - देव: - लोकके विपरीत स्वभाववाले देवता, ३१. महा - देवः – महान् देवता ब्रह्मादिकोंके भी पूजनीय, ३२. पटुः – सब कुछ करनेमें समर्थ एवं कुशल, ३३. परिवृढः – स्वामी, ३४. दृढः – कभी विचलित न होनेवाले ॥ ५ ॥

३५. विश्वरूपः – जगत्स्वरूप, ३६. विरू-पाक्षः — विकट नेत्रवाले, ३७. वागीशः -वाणीके अधिपति, ३८. शुचिसत्तमः - पवित्र पुरुषोंमें भी सबसे श्रेष्ठ, ३ ९. सर्वप्रमाणसंवादी – सम्पूर्ण प्रमाणोंमें सामंजस्य स्थापित करनेवाले, ४०. वृषाङ्कः- - -अपनी । ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, ४१. ॥ ६ वृषवाहनः - वृषभ या धर्मको वाहन बनानेवाले ॥ ६ ॥

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३३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरंतनः । ४२. ईशः - स्वामी या शासक तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटिः ॥ ७ पिनाकी – पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले , ४३. कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्वासाः पुरशासनः

दिव्यायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी परात्परः ।

अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधवः ॥

कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदुः ।

समाधिवेद्यः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी ॥

विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः । | ४४. खट्वाङ्गी – खाटके पायेकी आकृतिका, | आयुध धारण करनेवाले, ४५. चित्रवेषः - विचित्र एक | वेषधारी, ४६. चिरंतन: - पुराण ( अनादि ) पुरुषोत्तम ४७. तमोहरः - अज्ञानान्ध - कारको दूर करनेवाले, ४८. महायोगी — महान् योगसे सम्पन्न,, ४ ९. गोप्ता — रक्षक, ५०. ब्रह्मा — - सृष्टिकर्ता, ५१. धूर्जटि: - जटाके भारसे युक्त ॥७ ॥

। ५२. कालकालः – कालके भी काल, ५३. ॥ ८ कृत्तिवासाः - – [ गजासुरके ] चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, ५४. सुभगः – सौभाग्यशाली, ५५. प्रणवात्मकः — ओंकारस्वरूप अथवा प्रणवके वाच्यार्थ, ५६. उन्नध्रः — बन्धनरहित, ५७. पुरुषः - अन्तर्यामी आत्मा, ५८. जुष्यः– सेवन करनेयोग्य, ५ ९. दुर्वासाः - – ' दुर्वासा ' नामक मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ६०. पुरशासन: - तीन मायामय असुरपुरोंका दमन करनेवाले ॥ ८ ॥

६१. दिव्यायुधः – ' पाशुपत ' आदि दिव्य अस्त्र ९ धारण करनेवाले, ६२. स्कन्दगुरुः – कार्तिकेयजीके पिता, ६३. परमेष्ठी – अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेवाले, ६४. परात्परः - कारणके भी कारण, ६५. अनादिमध्यनिधनः- आदि, मध्य और अन्तसे रहित, ६६. गिरीशः — कैलासके अधिपति, ६७. गिरिजाधवः – पार्वतीके पति॥९॥

६८. कुबेरबन्धुः – कुबेरको अपना बन्धु ( मित्र ) १० माननेवाले, ६ ९. श्रीकण्ठः – श्यामसुषमासे सुशोभित कण्ठवाले, ७०. लोकवर्णोत्तमः – समस्त लोकों और वर्णोंसे श्रेष्ठ, ७१. मृदुः– कोमल स्वभाववाले, ७२. समाधिवेद्यः — समाधि अथवा चित्तवृत्तियोंके निरोधसे अनुभवमें आनेयोग्य, ७३. कोदण्डी – धनुर्धर, ७४. नीलकण्ठः — कण्ठमें हालाहल विषका नील चिह्न धारण करनेवाले, ७५. परश्वधी – परशुधारी ॥ १० ॥

७६. विशालाक्षः — बड़े - बड़े नेत्रोंवाले, ७७. | मृग - व्याधः - वनमें व्याध या किरातके रूपमें प्रकट हो शूकरके ऊपर बाण चलानेवाले, ७८. सुरेशः-देवताओंके स्वामी, ७ ९. सूर्यतापनः — - सूर्यको भी

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अ ० ३५ ] कोटिरुद्रसंहिता ३३५ धर्मधाम क्षमाक्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् ॥

उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परंतपः ।

दाता दयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः ॥

श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः ।

लोककर्ता मृगपतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमरतः सुखी ११ | दण्ड देनेवाले, ८०. धर्म - धाम- धर्मके आश्रय, ८१. क्षमाक्षेत्रम् - क्षमाके उत्पत्ति - स्थान, ८२. भगवान् –सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्यके आश्रय, ८३. भगनेत्रभित् — भगदेवताके । नेत्रका भेदन करनेवाले ॥ ११ ॥

८४. उग्रः — संहारकालमें भयंकर रूप धारण १२ करनेवाले, ८५. पशुपतिः– मायारूपमें बँधे हुए पाशबद्ध पशुओं ( जीवों ) को तत्त्वज्ञानके द्वारा मुक्त करके यथार्थरूपसे उनका पालन करनेवाले, ८६. तार्क्ष्यः – गरुड़रूप, ८७. प्रियभक्तः— भक्तोंसे प्रेम करनेवाले, ८८. परंतपः – शत्रुता रखनेवालोंको संताप देनेवाले, ८ ९. दाता - दानी, ९ ०. दयाकरः- -दयानिधान अथवा कृपा करनेवाले, ९ १. दक्षः- — कुशल, ९ २. कपर्दी - – जटाजूटधारी, ९ ३. काम-शासनः — कामदेवका दमन करनेवाले ॥ १२ ॥

९ ४. श्मशाननिलयः – श्मशानवासी, १३ | ९ ५. सूक्ष्मः - इन्द्रियातीत एवं सर्वव्यापी, ९ ६. श्मशानस्थः– श्मशानभूमिमें विश्राम करनेवाले, ९ ७. महेश्वरः– महान् ईश्वर या परमेश्वर, ९ ८. लोककर्ता — जगत् की सृष्टि करनेवाले, ९९. मृगपतिः — मृगके पालक या पशुपति, १००. महाकर्ता — विराट् ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेके समय महान् कर्तृत्वसे सम्पन्न, १०१. महौषधिः - भवरोगका निवारण करनेके लिये महान् ओषधिरूप ॥ १३ ॥

१०२. उत्तरः — संसार - सागरसे पार उतारनेवाले, १०३. गोपतिः – स्वर्ग, पृथ्वी, पशु, वाणी, किरण, इन्द्रिय और जलके स्वामी, १०४. गोप्ता - रक्षक, १०५. ज्ञानगम्यः – तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञानस्वरूपसे ही जाननेयोग्य, १०६. पुरातनः - सबसे पुराने, १०७. नीतिः - न्यायस्वरूप, १०८. सुनीतिः - उत्तम नीतिवाले, १० ९. शुद्धात्मा – विशुद्ध आत्मस्वरूप, ११०. सोमः– उमासहित, १११. सोमरतः-। चन्द्रमापर प्रेम रखनेवाले, ११२. सुखी - आत्मानन्दसे ॥ १४ | परिपूर्ण ॥१४ ॥

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३३६ सोमपोऽमृतपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः तेजोमयोऽमृतमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः

अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः ।

लोककरो वेदकरः सूत्रकारः सनातनः ॥

महर्षिकपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः ।

पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सुधीः ॥

धातृधामा धामकरः सर्वगः सर्वगोचरः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ । ११३. सोमपः – सोमपान करनेवाले अथवा ॥ १५ | सोमनाथरूपसे चन्द्रमाके पालक, ११४. अमृतपः-| समाधिके द्वारा स्वरूपभूत अमृतका आस्वादन करनेवाले | ११५. सौम्यः - भक्तोंके लिये सौम्यरूपधारी, ११६. महातेजाः- महान् तेजसे सम्पन्न, ११७, . महाद्युतिः – परमकान्तिमान्, ११८. तेजोमयः-प्रकाशस्वरूप, ११ ९. अमृतमयः - अमृतरूप, १२०. अन्नमयः — अन्नरूप, १२१. सुधापतिः– अमृतके पालक ॥ १५ ॥

१२२. अजातशत्रुः - जिनके मनमें कभी किसीके १६ प्रति शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ, ऐसे समदर्शी, १२३. आलोकः - प्रकाशस्वरूप, १२४. सम्भाव्यः. -सम्माननीय, १२५. हव्यवाहनः - अग्निस्वरूप, १२६. | लोककर: - जगत्के स्रष्टा, १२७. वेदकरः-वेदोंको प्रकट करनेवाले, १२८. सूत्रकारः - ढक्कानादके रूपमें चतुर्दश माहेश्वर सूत्रोंके प्रणेता, १२ ९. सनातनः — नित्यस्वरूप ॥ १६ ॥

१३०. महर्षिकपिलाचार्य: - सांख्यशास्त्रके १७ प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, १३१. विश्वदीप्तिः-अपनी प्रभासे सबको प्रकाशित करनेवाले, १३२. त्रिलोचनः - तीनों लोकोंके द्रष्टा, १३३. पिनाकपाणिः — हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, १३४. भूदेवः - पृथ्वीके देवता - ब्राह्मण अथवा पार्थिवलिंगरूप, १३५. स्वस्तिदः -कल्याणदाता, १३६. स्वस्तिकृत् — कल्याणकारी, १३७. सुधीः – विशुद्ध बुद्धिवाले ॥१७ ॥

१३८. धातृधामा — विश्वका धारण - पोषण करनेमें समर्थ तेजवाले, १३ ९. धामकरः - तेजकी सृष्टि करनेवाले, १४०. सर्वगः – सर्वव्यापी, १४१. सर्वगोचरः — सबमें व्याप्त, १४२. ब्रह्मसृक्-ब्रह्माजीके उत्पादक, १४३. विश्वसृक् – जगत्के स्रष्टा, १४४. सर्गः – सृष्टिस्वरूप, १४५. कर्णिकारप्रियः —– कर्णिकारके फूलको पसन्द ब्रह्मसृग्विश्वसृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कविः ॥ १८ | करनेवाले, १४६. कविः — त्रिकालदर्शी ॥ १८ ॥