शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 431–440
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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अ ० ५ ]
नाभिनन्दंति ये दृष्ट्वा शिवपूजां प्रकल्पिताम् ।
न नमन्त्यर्चितं दृष्ट्वा शिवलिङ्गं स्तुवन्ति न ॥
यथेष्टचेष्टा निःशंकाः संतिष्ठन्ते रमंति च ।
उपचारविनिर्मुक्ताः शिवाग्रे गुरुसन्निधौ ॥
स्थानसंस्कारपूजां च ये न कुर्वन्ति पर्वसु ।
विधिवद्वा गुरूणां च कर्मयोगव्यवस्थिताः ॥
ये त्यजन्ति शिवाचारं शिवभक्ताद्विषन्ति च ।
असंपूज्य शिवज्ञानं येऽधीयते लिखन्ति च ॥
अन्यायतः प्रयच्छन्ति शृण्वन्त्युच्चारयन्ति च ।
विक्रीडन्ति च लोभेन कुज्ञाननियमेन च ॥
असंस्कृतप्रदेशेषु यथेष्टं स्वापयन्ति च ।
शिवज्ञानकथाक्षेपं यः कृत्वान्यत्प्रभाषते ॥
न ब्रवीति च यः सत्यं न प्रदानं करोति च ।
अशुचिर्वाशुचिस्थाने यः प्रवक्ति शृणोति च ॥
गुरुपूजामकृत्वैव यः शास्त्रं श्रोतुमिच्छति ।
न करोति च शुश्रूषामाज्ञां च भक्तिभावतः ॥
नाभिनन्दति तद्वाक्यमुत्तरं च प्रयच्छति ।
गुरुकर्मण्यसाध्यं यत्तदुपेक्षां करोति च ॥
गुरुमार्तमशक्तं च विदेशं प्रस्थितं तथा ।
वैरिभिः परिभूतं वा यः संत्यजति पापकृत् ॥
तद्भार्यापुत्रमित्रेषु यश्चावज्ञां करोति च ।
एवं सुवाचकस्यापि गुरोर्धर्मानुदर्शिनः ॥
एतानि खलु सर्वाणि कर्माणि मुनिसत्तम ।
सुमहत्पातकान्याहुः शिवनिन्दासमानि च ॥
ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
महापातकिनस्त्वेते तत्संयोगी च पञ्चमः ॥
क्रोधाल्लोभाद्भयाद् द्वेषाद्ब्राह्मणस्य वधे तु यः ।
मर्मान्तिकं महादोषमुक्त्वा स ब्रह्महा भवेत् ॥
उमासंहिता ४१७ जो लोग दूसरोंके द्वारा किये गये शिवपूजनको ११ देखकर प्रसन्न नहीं होते, अर्चित शिवलिंगको देखकर नमस्कार नहीं करते और न उसकी स्तुति करते हैं, सदाशिवके आगे तथा गुरुके पास निःशंक होकर १२ मनमानी चेष्टाएँ करते हुए बैठते हैं - क्रीडा - विनोद करते हैं और शिष्टाचारका अनुपालन नहीं करते हैं, १३ जो लोग कर्मयोगमें स्थित रहते हुए अर्थात् उपासनापद्धतिके अनुरूप पर्वके दिनोंमें शिवजीके १४ मन्दिरकी साफ - सफाई, पूजा आदि तथा गुरुओंकी विधिवत् पूजा नहीं करते, जो शिवाचारका त्याग करते हैं एवं शिवजीके भक्तोंसे द्वेष करते हैं, जो १५ [ परम्पराके अनुसार इष्ट, गुरु आदिका ] बिना पूजन किये शिवज्ञानका अध्ययन तथा बेचनेके लिये शिव-१६ ज्ञानसम्बन्धी ग्रन्थका लेखन करते हैं, जो अन्यायसे दान करते हैं, अन्यायसे कथा सुनते एवं सुनाते हैं, लोभवश तथा अज्ञानतावश शिवज्ञानका उपहास १७ करते हैं, संस्कारविहीन स्थानोंमें इच्छानुसार शिवकी स्थापना करते हैं, जो शिवज्ञानकथामें आक्षेप करके १८ दूसरी बात करता है, जो सत्यभाषण नहीं करता है और दान नहीं देता है, जो अपवित्र रहकर या अपवित्र स्थानमें शिवकथाका वाचन अथवा श्रवण १ ९ करता है, जो गुरुकी पूजा किये बिना ही शास्त्रका अध्ययन करना चाहता है, भक्तिभावसे उनकी सेवा तथा आज्ञापालन नहीं करता है, उनकी आज्ञाका २० आदर नहीं करता है तथा उत्तर देता है, गुरुकार्यको असाध्य कहकर उसकी उपेक्षा करता है, जो पापपरायण २१ व्यक्ति रोगी, अशक्त, परदेश गये हुए अथवा शत्रुओंसे प्रताड़ित गुरुको छोड़ देता है, जो उनकी भार्या, पुत्र २२ तथा मित्रकी अवज्ञा करता है और इसी प्रकार श्रेष्ठ कथावाचक तथा धर्मोपदेशक गुरुकी भी आज्ञा नहीं मानता है — हे मुनिश्रेष्ठ! ये समस्त कार्य शिवनिन्दाके समान महापातक कहे गये हैं ॥ ११ - २२ ॥ ब्रह्महत्यारा, सुरापान करनेवाला, चोर, गुरु-२३ पत्नीगामी एवं इनके साथ सम्पर्क रखनेवाला — ये महापापी होते हैं । क्रोध, लोभ, भय अथवा द्वेषवश ब्राह्मण - वधविषयक मर्मान्तक कथनके अपराधसे भी २४ मनुष्य ब्रह्मघाती होता है ॥ २३-२४ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_15_1_Front
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४१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ ब्राह्मणं यः समाहूय दत्त्वा यश्चाददाति च । ब्राह्मणको बुलाकर उसे दान देकर जो निर्दोषं दूषयेद्यस्तु स नरो ब्रह्महा भवेत् ॥ २५ वापस ले लेता है और जो निर्दोष ब्राह्मणको पुनः उस
यश्च विद्याभिमानेन निस्तेजयति सुद्विजम् ।
उदासीनं सभामध्ये ब्रह्महा स प्रकीर्तितः ॥
मिथ्यागुणैर्य आत्मानं नयत्युत्कर्षतां बलात् ।
गुणानपि निरुद्वास्य स च वै ब्रह्महा भवेत् ॥
गवां वृषाभिभूतानां द्विजानां गुरुपूर्वकम् ।
य: समाचरते विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
देवद्विजगवां भूमिं प्रदत्तां हरते तु यः ।
प्रनष्टामपि कालेन तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
देवद्विजस्वहरणमन्यायेनार्जितं तु यत् । लगाता है, वह मनुष्य ब्रह्महत्यारा होता है दोष जो अपनी विद्याके अभिमानवश ॥ २५ ॥
२६ हुए अर्थात् तटस्थ भावसे व्यवहार करनेवाले उदासीन ब्राह्मणको सभामें हतप्रभ करता है, वह ब्रह्महत्यारा श्रेष्ठ कहा गया है ॥२६ ॥ ।
जो दूसरेके गुणोंपर आक्षेप करके २७ अपने मिथ्या गुणोंके द्वारा अपनेको हठपूर्वक उत्कृष्ट प्रदर्शित | करता है, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है वृषभोंके द्वारा बाही जाती हुई गायों और ॥ २७ ॥
२८ उपदेश ग्रहण करते हुए द्विजोंके कार्यमें जो विघ्न गुरुसे उपस्थित करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है । जो देवता, ब्राह्मण एवं गायोंके निमित्त दानमें दी गयी २ ९ भूमिके उपेक्षित रहनेपर भी कुछ समय बाद उसका हरण करता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है ॥ २८-२९ ॥ देवता एवं ब्राह्मणके धनका ब्रह्महत्यासमं ज्ञेयं पातकं नात्र संशयः ॥ ३० अन्यायद्वारा किया अपहरण एवं गया धनोपार्जन है, उसे ब्रह्महत्याके अधीत्य यो द्विजो वेदं ब्रह्मज्ञानं समान पाप समझना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३० ॥
शिवात्मकम् । यदि कोई ब्राह्मण वेदका अध्ययनकर मोहवश यदि त्यजति यो मूढः सुरापानस्य तत्समम् ॥ ३१ शिवात्मक ब्रह्मज्ञानका त्याग करता है, तो यह यत्किंचिद्धि व्रतं गृह्य नियमं यजनं सुरापानके समान [ पाप ] है ॥३१ ॥
संत्यागः पञ्चयज्ञानां तथा । जिस किसी भी व्रत, नियम तथा यज्ञके करनेका सुरापानस्य तत्समम् ॥ ३२ संकल्पकर उसका त्याग करना तथा पंच[ महा ] पितृमातृपरित्यागः यज्ञोंका त्याग करना सुरापानके समान [ पाप ] है ॥ ३२ ॥
आमिषं कूटसाक्ष्यं द्विजानृतम् । माता - पिताका त्याग करना, झूठी गवाही देना, शिवभक्तानामभक्ष्यस्य च भक्षणम् ॥ ३३ ब्राह्मणसे मिथ्या भाषण करना, शिवभक्तोंको मांस खिलाना वने निरपराधानां प्राणिनां चापघातनम् एवं अभक्ष्यका भक्षण करना तथा वनमें निरपराध । द्विजार्थं प्रक्षिपेत्साधुर्न धर्मार्थं नियोजयेत् ॥ ३४ प्राणियोंका वध करना - [ ये सभी पाप ब्रह्महत्याके ही
गवां मार्गे वने ग्रामे यैश्चैवाग्निः प्रदीयते ।
इति पापानि घोराणि ब्रह्महत्यासमानि च ॥ ३५
दीनसर्वस्वहरणं नरस्त्रीगजवाजिनाम्
।
गोभूरजतवस्त्राणामौषधीनां रसस्य च ॥ ३६
चन्दनागरुकर्पूरकस्तूरीपट्टवाससाम् 1 विक्रयस्त्वविपत्तौ यः कृतो ज्ञानाद् द्विजातिभिः ॥ ३७ तुल्य हैं । ] साधुपुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणके धनको त्याग दे तथा उसे धर्मके कार्यमें भी न लगाये [ अन्यथा उसे ब्रह्महत्याका दोष लगता है ] ॥ ३३–३५ ॥ दीनोंके धनका हरण, स्त्री, पुरुष, हाथी, घोड़ा, गाय, भूमि, चाँदी, वस्त्र, औषधि, रस, चन्दन, अगुरु, कपूर, कस्तूरी एवं रेशमी वस्त्र आदि वस्तुओंका ब्राह्मणके द्वारा बिना आपत्तिके जान - बूझकर किया गया विक्रय, अपने पासमें रखी गयी धरोहरका 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_15_1_Back
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अ ० ६ ]
हस्तन्यासापहरणं रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ।
कन्यानां वरयोग्यानामदानं सदृशे वरे ॥
पुत्रमित्रकलत्रेषु गमनं भगिनीषु च ।
कुमारीसाहसं घोरमद्यपस्त्रीनिषेवणम् ॥
सवर्णायाश्च गमनं गुरुभार्यासमं स्मृतम् ।
महापापानि चोक्तानि शृणु त्वमुपपातकम् ॥
उमासंहिता ४१ ९ अपहरण करना - यह सब सुवर्णकी चोरीके समान ३८ माना गया है । विवाहके योग्य कन्याओंको योग्य वरको न प्रदान करना, पुत्र तथा मित्रकी स्त्रियोंसे, बहनसे तथा कुमारीके साथ गमन करना, मद्य ३ ९ पीनेवाली स्त्रीसे संसर्ग करना और समान गोत्रवाली स्त्रीसे संसर्ग करना - गुरुकी भार्याके साथ गमन करनेके समान कहा गया है । [ हे व्यास! ] मैंने महापातकोंको कह दिया, अब उपपातकोंका श्रवण ४० | कीजिये ॥ ३६–४० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां महापातकवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें महापातकवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः पापभेदनिरूपण सनत्कुमार उवाच
द्विजद्रव्यापहरणमपि दायव्यतिक्रमः ।
अतिमानोऽतिकोपश्च दांभिकत्वं कृतघ्नता ॥
अत्यन्तविषयासक्तिः कार्पण्यं साधुमत्सरम् ।
परदाराभिगमनं साधुकन्यासु दूषणम् ॥
परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते ।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥
शिवाश्रमतरूणां च पुष्पारामविनाशनम् ।
यः पीडामाश्रमस्थानामाचरेदल्पिकामपि ॥
सभृत्यपरिवारस्य पशुधान्यधनस्य च ।
कुप्यधान्यपशुस्तेयमपां व्यापावनं तथा ॥
यज्ञारामतडागानां दारापत्यस्य विक्रयम् ।
तीर्थयात्रोपवासानां व्रतोपनयकर्मिणाम् ॥
स्त्रीधनान्युपजीवन्ति स्त्रीभिरत्यन्तनिर्जिताः ।
अरक्षणं च नारीणां मायया स्त्रीनिषेवणम् ॥
कालागताप्रदानं च धान्यवृद्धयुपसेवनम् ।
निंदिताच्च धनादानं पण्यानां कूटजीवनम् ॥
* बड़े भाईके अविवाहित रहते जो छोटा भाई सनत्कुमार बोले- ब्राह्मणके धनका अपहरण, पैतृक सम्पत्तिके बँटवारेमें उलट - फेर करना, अत्यन्त १ अहंकार, अत्यन्त क्रोध, पाखण्ड, कृतघ्नता, विषयोंमें अत्यधिक आसक्ति, कृपणता, सज्जनोंसे द्वेष, परस्त्रीगमन, कुलीन सच्चरित्र कन्याओंको दूषित करना, परिवित्ति, २ परिवेत्ता * *. एवं जिस कन्यासे ये दोनों दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हींको कन्यादान करना एवं उन्हींका यज्ञ कराना, ३ शिवजीके लिये बनाये गये आश्रममें स्थित वृक्षों, पुष्पों एवं बगीचोंको नष्ट करना, आश्रममें रहनेवालोंको ४ थोड़ी भी पीड़ा पहुँचाना, भृत्य- सहित परिवार, पशु, धान्य, धन, ताँबा आदि धातुओं और पशुओंकी चोरी ५ करना, जलको अपवित्र करना, यज्ञ, वाटिका, तडाग, स्त्री, पुत्रका सौदा करना, तीर्थयात्रा, उपवास, व्रत, उपनयन आदि करके उसका विक्रय करना, जो ६ स्त्रियोंके धनसे आजीविका चलाते हैं, जो स्त्रियोंके वशीभूत हैं ( ऐसा होना ), स्त्रियोंकी रक्षा न करना, ७ छलपूर्वक स्त्रीका सेवन करना, धन लेकर समयसे ऋण न चुकाना, धान्यको वृद्धिपर देकर उससे निर्वाह करना, ८ निन्दितसे धन ग्रहण करना, व्यापारमें कपटपूर्ण अपना विवाह कर लेता है तथा अग्निहोत्र ग्रहण करता है, वह छोटा भाई ‘ परिवेत्ता ' तथा बड़ा भाई ' परिवित्ति ' कहलाता है - दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते । परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥ ( मनु ० ३।१७१ ) 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_15_2_Front
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४२० विषमारणमन्त्राणां सततं वृषवाहनम् उच्चाटनाभिचारं च धान्यादानं भिषक्क्रिया ॥
जिह्वाकामोपभोगार्थं यस्यारंभः सुकर्मसु ।
मूलेनाध्यापको नित्यं वेदज्ञानादिकं च यत् ॥
ब्राह्मयादिव्रतसंत्यागश्चान्याचारनिषेवणम् ।
असच्छास्त्राधिगमनं शुष्कतर्कावलम्बनम् ॥
देवाग्निगुरुसाधूनां निन्दा या ब्राह्मणस्य च ।
प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा राज्ञां मण्डलिनामपि ॥
उत्सन्नपितृदेवेज्याः स्वकर्मत्यागिनश्च ये ।
दुःशीला नास्तिकाः पापाः सदा वासत्यवादिनः ॥
पर्वकाले दिवा वाप्सु वियोनौ पशुयोनिषु ।
रजस्वलाया योनौ च मैथुनं य: समाचरेत् ॥
स्त्रीपुत्रमित्रसम्प्राप्ते आशाच्छेदकराश्च ये । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । । व्यवहार करना, विष देना तथा मारण मन्त्रोंका ९ करना, बैलकी सवारी करना, उच्चाटन आदि प्रयोग | कर्म करना, धान्योंका हरण करना, वैद्यवृत्तिसे अभिचार | करना, जिह्वा एवं कामोपभोगके लिये निर्वाह १० जिसकी प्रवृत्ति हो ( ऐसा होना ), वेदज्ञानको सत्कर्मोंमें | उसके मूल्यसे आजीविका चलाना ब्राह्मणोचित पढ़ाकर , आचारका ११ त्याग करना, दूसरोंके आचारका सेवन करना, असत् | शास्त्रोंका अध्ययन करना, व्यर्थ तर्कका आश्रय १२ / देवता, अग्नि, गुरु, साधु, ब्राह्मण तथा चक्रवर्ती लेना, | राजाओंकी प्रत्यक्ष या परोक्षमें निन्दा करना | पितृयज्ञ, देवयज्ञ तथा अपने कर्मका त्याग करनेवाले , जो १३ हैं, जो दुःशील, नास्तिक, पापी तथा सदा असत्य भाषण करनेवाले हैं, जो पर्व समयमें, दिनमें, जलमें, १४ विकृत योनिमें, पशुयोनियोंमें तथा रजस्वला स्त्रीसे संसर्ग करता है, जो स्त्री, पुत्र, मित्रकी प्राप्तिविषयक जनस्याप्रियवक्तारः क्रूराः समयभेदिनः ॥ १५ आशाको नष्ट करते हैं, लोगोंसे कटु वचन बोलते हैं, भेत्ता तडागकूपानां विक्रेतारो रसस्य च । क्रूर हैं, प्रतिज्ञाको भंग करते हैं, तालाब तथा कूप एकपंक्तिस्थितानां च पाकभेदं आदिको विनष्ट करते हैं एवं रसोंको बेचते हैं, इसी करोति यः ॥ १६ प्रकार जो पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंमें भोजनका भेद करते इत्येतैः स्त्रीनराः पापैरुपपातकिनः स्मृताः । हैं, इन पापोंसे युक्त स्त्री एवं पुरुष उपपातकी कहे गये युक्ता एभिस्तथान्येऽपि शृणु तांस्तु ब्रवीमि ते ॥ १७ हैं । अन्य उपपातकी भी हैं । [ हे व्यासजी! ] मैं उन्हें ये गोब्राह्मणकन्यानां आपको बता रहा हूँ, आप सुनें ॥ १-१७ ॥ स्वामिमित्रतपस्विनाम् । जो लोग गौ, ब्राह्मण, कन्या, स्वामी, मित्र विनाशयन्ति कार्याणि ते नरा नारकाः स्मृताः ॥ १८ एवं तपस्वियोंके कार्योंको बिगाड़ते हैं, वे नारकी परस्त्रियाभितप्यन्ते ये परद्रव्यसूचकाः मनुष्य कहे गये हैं ॥ १८ ॥
परद्रव्यहरा नित्यं । जो परस्त्री [ की अभिलाषा ] -से दुखी रहते हैं, तौलमिथ्यानुसारकाः ॥ १ ९ जो दूसरेके द्रव्यपर दृष्टि रखते हैं, दूसरेके द्रव्यका द्विजदुःखकरा ये च प्रहारं चोद्धरन्ति ये । हरण करते हैं, मिथ्या तौल करते हैं, जो ब्राह्मणोंको सेवन्ते तु द्विजाः शूद्रां सुरां बध्नन्ति कामतः पीड़ा देते हैं, जो उन्हें मारनेके लिये शस्त्र उठाये रहते ॥ २० हैं, जो द्विज होकर शूद्र - स्त्रीका सेवन करते
ये पापनिरताः क्रूराः येऽपि हिंसाप्रिया नराः ।
वृत्त्यर्थं येऽपि कुर्वन्ति दानयज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २१
गोष्ठाग्निजलरथ्यासु तरुच्छायानगेषु च ।
त्यजन्ति ये पुरीषाद्यानारामायतनेषु च ॥ २२
लज्जाश्रमप्रसादेषु मद्यपानरताश्च ये ।
कृतकेलिभुजङ्गाश्च रन्ध्रान्वेषणतत्पराः ॥ २३
हैं, स्वेच्छासे जो सुराका सेवन करते हैं, जो मनुष्य क्रूर एवं पापपरायण हैं, जो हिंसाप्रिय हैं, जो अपनी आजीविकाके लिये दान, यज्ञ आदि क्रियाएँ करते हैं, जो गोशाला, अग्नि, जल, मार्ग, वृक्षकी छाया, पर्वत, वाटिका एवं देवमन्दिरोंमें मल- -मूत्रादिका त्याग करते हैं, जो लज्जाके स्थान, आश्रम एवं मन्दिरोंमें मद्यपान करते हैं, चोरीसे दूसरोंकी स्त्रीसे रमण करते हैं, दूसरोंका 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_15_2_Back
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अ ० ६ ] वंशेष्टकाशिलाकाष्ठैः शृङ्गैः शंकुभिरेव च ये मार्गमनुरुन्धन्ति परसीमां हरन्ति ये कूटशासनकर्तारः कूटकर्मक्रियारताः कूटपाकान्नवस्त्राणां कूटसंव्यवहारिणः धनुषः शस्त्रशल्यानां कर्ता यः क्रयविक्रयी निर्दयोऽतीव भृत्येषु पशूनां दमनश्च यः ॥ मिथ्या प्रवदतो वाच आकर्णयति यः शनैः स्वामिमित्रगुरुद्रोही मायावी चपलः शठः
ये भार्यापुत्रमित्राणि बालवृद्धकृशातुरान् ।
भृत्यानतिथिबन्धूंश्च त्यक्त्वाश्नन्ति बुभुक्षितान् ॥
यः स्वयं मिष्टमश्नाति विप्रेभ्यो न प्रयच्छति वृथापाकः स विज्ञेयो ब्रह्मवादिषु गर्हितः नियमान् स्वयमादाय ये त्यजन्त्यजितेन्द्रियाः । प्रव्रज्यावासिता ये च हरस्यास्यप्रभेदकाः
ये ताडयन्ति गां क्रूरा दमयन्ते मुहुर्मुहुः ।
दुर्बलान्ये न पुष्णन्ति सततं ये त्यजन्ति च ॥
पीडयन्त्यतिभारेणासहन्तं वाहयन्ति च ।
योजयन्त्यकृताहारान्न विमुंचन्ति संयतान् ॥
ये भारक्षतरोगार्तान् गोवृषांश्च क्षुधातुरान् ।
न पालयन्ति यत्नेन गोघ्नास्ते नारकाः स्मृताः ॥
वृषाणां वृषणान्ये च पापिष्ठा गालयन्ति च ।
वाहयन्ति च गां वन्ध्यां महानारकिनो नराः ॥
आशया समनुप्राप्तान् क्षुत्तृष्णाश्रमकर्शितान् ।
अतिथींश्च तथानाथान् स्वतन्त्रान् गृहमागतान् ॥
अन्नाभिलाषान् दीनान्वा बालवृद्धकृशातुरान् ।
नानुकम्पन्ति ये मूढास्ते यान्ति नरकार्णवम् ॥
उमा संहिता ४२१ । छिद्रान्वेषण करते हैं, जो बाँस, ईंट, पत्थर, काष्ठ, ॥ २४ सींग एवं काँटों [ अथवा कीलों ] -से मार्गमें अवरोध उत्पन्न करते हैं, जो दूसरोंकी सीमा ( मेड़ ) नष्ट करते । हैं, जो फूट डालकर शासन करते हैं, मिथ्या ॥ २५ छलप्रपंचमें संलग्न रहते हैं और कपट करके लाये । हुए पाक, अन्न तथा वस्त्रोंका छलपूर्वक व्यवहार करते हैं, जो धनुष, शस्त्र तथा बाणका निर्माण करते २६ हैं एवं उनका क्रय - विक्रय करते हैं, जो अपने । नौकरोंके प्रति दयाहीन हैं, पशुओंका दमन करते हैं, ॥ २७ जो झूठ बोलनेवालोंकी बात धीरे - धीरे सुनता है, स्वामी, मित्र, गुरुसे द्रोह करता है, मायावी है, धूर्त है, जो अपनी स्त्री, पुत्र, मित्र, बालक, वृद्ध, कमजोर, २८ रोगी, भृत्य, अतिथि एवं बान्धवोंको भूखा छोड़कर [ स्वयं ] भोजन करते हैं, जो स्वयं मिष्टान्नका भोजन । करते हैं, किंतु ब्राह्मणोंको नहीं देते हैं, उसका वह ॥ २ ९ । भोजन निरर्थक जानना चाहिये, वह ब्रह्मवादियोंमें निन्दित है, जो अजितेन्द्रिय स्वयं नियमोंको ग्रहण करनेके बाद उनका त्याग कर देते हैं, जो संन्यास ले ॥ ३० करके भी घरमें निवास करते हैं, शिवमूर्तियोंको तोड़ते हैं, जो लोग क्रूर होकर गायोंको मारते हैं एवं बार-३१ बार उनका दमन करते हैं, जो दुर्बलोंका पोषण नहीं करते तथा सदा त्याग करते हैं, जो अत्यधिक भारसे [ भारवाहक ] पशुओंको पीड़ित करते हैं, भार सहन ३२ न कर पानेवाले पशुको जोतते हैं, बिना उनको खिलाये कार्यमें जोत देते हैं, जुते हुएको चरनेके लिये नहीं छोड़ते, जो भारसे आहत, रोगी, क्षुधापीड़ित, ३३ गाय - बैलोंका भलीभाँति पालन नहीं करते, वे गोहत्यारे तथा नरक जानेके योग्य कहे गये हैं ॥ १ ९ –३३ ॥ जो पापी बैलोंके अण्डकोष कुटवा देते हैं और ३४ | वन्ध्या गायको जोतते हैं, वे महानारकी मनुष्य कहे गये हैं ॥३४ ॥
भूख - प्यास - श्रमसे पीड़ित तथा [ भोजनकी ] ३५ आशासे घरपर आये हुए अतिथियों, अनाथों, स्वेच्छासे विचरण करनेवालों, अन्नके इच्छुकों, दीनों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियोंपर जो लोग दया नहीं करते, ३६ । वे मूढ़ नरकसमुद्रमें जाते हैं ॥ ३५-३६ ॥
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४२२
गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशानादपि बान्धवाः ।
सुकृतं दुष्कृतं चैव गच्छन्तमनुगच्छति ॥
अजाविको माहिषिकः सामुद्रो वृषलीपतिः ।
शूद्रवत्क्षत्रवृत्तिश्च नारकी स्याद् द्विजाधमः ॥
शिल्पिनः कारवो वैद्या हेमकारा नृपध्वजाः ।
भृतकाः कूटसंयुक्ताः सर्वे ते नारकाः स्मृताः ॥
यश्चोचितमतिक्रम्य स्वेच्छयैवाहरेत्करम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ [ मनुष्यके मरनेपर ] धन घरमें ही पड़ा ३७ है, भाई एवं बन्धु श्मशानसे [ पुनः घर रह जात हैं, किंतु पुण्य एवं पाप अन्तमें जाते ] लौट आत पीछे - पीछे जाता है ॥ ३७ ॥ हुए जीवक
बकरी - भेड़ तथा भैंसके क्रय - विक्रयसे ३८ जीविका चलानेवाला, नमक बेचनेवाला अपनी शूद्रके समान आचरण करनेवाला, शूद्राका पति, तथा क्षत्रियवृत्तिसं | जीवनयापन करनेवाला अधम द्विज नरक जानेयोग्य होता है ॥ ३८ ॥
शिल्पी, बढ़ई, वैद्य, स्वर्णकार, अपनेको राजाके ३ ९ रूपमें प्रदर्शित करनेवाले, कपटसे युक्त होकर नौकरी करनेवाले — वे सभी नारकी कहे गये हैं ॥ ३ ९ ॥ जो [ शासक ] औचित्यका अतिक्रमण नरके पच्यते सोऽपि योऽपि दण्डरुचिर्नरः ॥ ४० मनमानी रीतिसे कर ग्रहण करता करके है और जो दण्ड उत्कोचकै देनेमें रुचि रखता है, वह [ राजा ] भी नरकोंमें दु: ख रुचिक्रीतैस्तस्करैश्च प्रपीड्यते । भोगता है । जिस राजाके राज्यमें प्रजा घूस लेनेवालों यस्य राज्ञः प्रजा राष्ट्रे पच्यते नरकेषु सः ॥ ४१ इच्छानुसार [ वस्तुका ] क्रय करनेवालों तथा चोरोंसे, पीड़ित की जाती है, वह राजा भी नरकोंमें दुःख भोगता है ॥ ४०-४१ ॥ ये द्विजाः परिगृह्णन्ति नृपस्यान्यायवर्तिनः । जो ब्राह्मण अन्यायपरायण ते प्रयान्ति तु घोरेषु नरकेषु न संशयः ॥ ४२ करते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, राजासे इसमें संशय दान ग्रहण नहीं है ॥ ४२ ॥
अन्यायात्समुपादाय द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति । प्रजाभ्यः पच्यते सोऽपि नरकेषु नृपो यथा जो राजा प्रजाओंसे अन्यायपूर्वक धन ग्रहणकर ॥ ४३ ब्राह्मणोंको दान देता है, वह राजा भी नरकोंमें यातना
पारदारिकचौराणां चण्डानां विद्यते त्वघम् ।
परदाररतस्यापि राज्ञो भवति नित्यशः ॥ ४४
अचौरं चौरवत्पश्येच्चौरं वाचौररूपिणम्
।
अविचार्य नृपस्तस्माद् घातयन्नरकं व्रजेत् ॥ ४५
घृततैलान्नपानानि मधुमांससुरासवम् ।
गुडेक्षुशाकदुग्धानि दधिमूलफलानि च ॥ ४६
तृणं काष्ठं पत्रपुष्पमौषधं चात्मभोजनम् ।
उपानच्छत्रशकटमासनं च कमण्डलुम् ॥ ४७
ताम्रसीसत्रपुः शस्त्रं शंखाद्यं च जलोद्भवम् ।
प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३ ॥
परदारगमन करनेवाले, चोर तथा क्रूर पुरुषोंको जो पाप लगता है, परायी स्त्रीमें निरत रहनेवाले राजाको भी वही पाप लगता है ॥४४ ॥
जो राजा बिना विचार किये ही चोरीसे रहित पुरुषको चोरके समान और चोरको चोरीसे रहित समझे, इस प्रकार [ निरपराध व्यक्तिको ] दण्ड देनेवाला वह राजा नरकगामी होता है ॥ ४५ ॥
जो लोग लोभपूर्वक घी, तेल, अन्न, पीनेकी वस्तु, मधु, मांस, सुरा, आसव, गुड़, ईख, शाक, दूध, दही, मूल, फल, तृण, काष्ठ, पत्र, पुष्प, ओषधि, अपना भोजन, जूता, छाता, गाड़ी, आसन, कमण्डलु, ताँबा, सीसा, राँगा, शस्त्र, जलसे उत्पन्न शंख आदि
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अ ० ७ ] वाद्यं च वैणवं चान्यद्गृहोपस्करणानि च ॥ और्णकार्पासकौशेयपट्टसूत्रोद्भवानि
च ।
स्थूलसूक्ष्माणि वस्त्राणि ये लोभाद्धि हरन्ति च ॥
एवमादीनि चान्यानि द्रव्याणि विविधानि च ।
नरकेषु ध्रुवं यान्ति चापहृत्याल्पकानि च ॥
तद्वा यद्वा परद्रव्यमपि सर्षपमात्रकम् ।
अपहृत्य नरा यान्ति नरकं नात्र संशयः ॥
एवमाद्यैर्नरः पापैरुत्क्रान्तिसमनन्तरम् ।
शरीरयातनार्थाय सर्वाकारमवाप्नुयात् ॥
यमलोकं व्रजन्त्येते शरीरेण यमाज्ञया ।
यमदूतैर्महाघोरैर्नीयमानाः सुदुःखिताः ॥
देवतिर्यङ्मनुष्याणामधर्मनिरतात्मनाम् 1 धर्मराजः स्मृतः शास्ता सुघोरैर्विविधैर्वधैः ॥
नियमाचारयुक्तानां प्रमादात्स्खलितात्मनाम् ।
प्रायश्चित्तैर्गुरुः शास्ता न बुधैरिष्यते यमः ॥
पारदारिकचौराणामन्यायव्यवहारिणाम् 1 नृपतिः शासकः प्रोक्तः प्रच्छन्नानां स धर्मराट् ॥
तस्मात् कृतस्य पापस्य प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।
नाभुक्तस्यान्यथा नाशः कल्पकोटिशतैरपि ॥
यः करोति स्वयं कर्म कारयेच्चानुमोदयेत् ।
कायेन मनसा वाचा तस्य पापगतिः फलम् ॥
उमा संहिता ४२३ ४८ | वस्तुएँ, बाँसके बने हुए वाद्य, ऊनी - सूती - रेशमी-पट्टसूत्रसे बने हुए स्थूल तथा सूक्ष्म वस्त्रोंका हरण ४ ९ करते हैं और इसी प्रकार अन्य विविध वस्तुओंका थोड़ा भी हरण करते हैं, वे निश्चित रूपसे नरकोंमें ५० जाते हैं । इतना ही नहीं, सरसोंके बराबर भी दूसरेकी वस्तुका अपहरण करके मनुष्य नरकमें पड़ते हैं, इसमें ५१ संशय नहीं है ॥ ४६–५१ ॥ इस प्रकारके पापोंके द्वारा मनुष्य प्राणोत्क्रमणके ५२ बाद शारीरिक यातना प्राप्त करनेके लिये सभी अवयवोंसे युक्त नूतन शरीर प्राप्त करता है ॥५२ ॥
यमराजकी आज्ञासे महाभयानक यमदूतोंद्वारा ले ५३ जाये जाते हुए ये पापी अत्यन्त दुःखित होकर यातना - शरीरके साथ यमलोकको जाते हैं ॥ ५३ ॥
यमराज अनेक प्रकारके भयानक दण्डोंके द्वारा ५४ अधर्मपरायण मनवाले देवता, तिर्यग् योनियों एवं मनुष्योंके शास्ता कहे गये हैं । नियम तथा सदाचारमें तत्पर होनेपर भी प्रमादवश विचलित चित्तवाले लोगोंके ५५ लिये प्रायश्चित्तोंके द्वारा गुरु ही शास्ता हैं, यमराज नहीं; ऐसा विद्वानोंका अभिमत है ॥ ५४-५५ ॥ परस्त्रीगामियों, चोरों तथा अन्यायसे व्यवहार ५६ करनेवालोंका शास्ता राजा कहा गया है, किंतु प्रच्छन्न पाप करनेवालोंके शासक धर्मराज ही हैं । इसलिये [ अपने द्वारा ] किये गये पापका प्रायश्चित्त ५७ कर लेना चाहिये; अन्यथा बिना भोगे हुए पापका नाश करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं होता है ॥ ५६-५७ ॥ जो अपने शरीर, वाणी तथा मनसे पापोंको स्वयं करता है, कराता है अथवा उसका अनुमोदन करता ५८ है, उसका फल पापगति ही है ॥ ५८ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां पापभेदवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें पापभेदवर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः यमलोकका मार्ग एवं यमदूतोंके स्वरूपका वर्णन सनत्कुमार उवाच सनत्कुमार बोले – चार प्रकारके पापोंके कारण अथ पापैर्नरा यान्ति यमलोकं चतुर्विधैः । विवश होकर समस्त शरीरधारी मनुष्य भयको उत्पन्न
सन्त्रासजननं घोरं विवशाः सर्वदेहिनः ॥ १ । करनेवाले घोर यमलोकको जाते हैं ॥१ ॥
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४२४
गर्भस्थैर्जायमानैश्च बालैस्तरुणमध्यमैः ।
स्त्रीपुन्नपुंसकैर्जीवैर्ज्ञातव्यं सर्वजन्तुषु ॥
शुभाशुभफलं चात्र देहिनां संविचार्यते ।
चित्रगुप्तादिभिः सर्वैः वसिष्ठप्रमुखैस्तथा ॥
न केचित्प्राणिनः सन्ति ये न यान्ति यमक्षयम् ।
अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यं तद्विचार्यताम् ॥
तत्र ये शुभकर्माणः सौम्यचित्ता दयान्विताः ।
ते नरा यान्ति सौम्येन पूर्वं यमनिकेतनम् ॥
ये पुनः पापकर्माणः पापा दानविवर्जिताः ।
ते घोरेण पथा यान्ति दक्षिणेन यमालयम् ॥
षडशीतिसहस्राणि योजनानामतीत्य तत् ।
वैवस्वतपुरं ज्ञेयं नानारूपमवस्थितम् ॥
समीपस्थमिवाभाति नराणां पुण्यकर्मणाम् ।
पापिनामतिदूरस्थं यथा रौद्रेण गच्छताम् ॥
तीक्ष्णकण्टकयुक्तेन शर्कराविचितेन च । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ यह बात गर्भस्थ, उत्पन्न बालक, युवा २ वृद्ध, स्त्री, पुरुष, नपुंसक आदि समस्त, मध्यम, । विषयमें जाननी चाहिये । यहाँपर चित्रगुप्तादि जीवोंके ३ [ यमपरिचर ] एवं वसिष्ठादि प्रमुख महर्षिगण सभी । शुभ - अशुभ फलपर विचार करते हैं॥२-३ जीवोंक । ऐसे कोई भी प्राणी नहीं हैं, जो यमलोक ॥ ४ जाते, इसे अच्छी तरह विचार कर लीजिये कि अपने नहीं किये कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है उनमें जो शुभ कर्म करनेवाले, सौम्यचित्त ॥४ एवं ॥ ५ दयालु होते हैं, वे मनुष्य यमलोकमें सौम्यमार्ग तथा पूर्वद्वारसे जाते हैं, किंतु जो पापी पापकर्ममें निरत एवं दानसे रहित हैं, वे घोर मार्गद्वारा दक्षिणद्वारसे यमलोकमें जाते हैं॥५-६ ॥ [ मर्त्यलोकसे ] छियासी हजार योजनकी ७ दूरी पार करके अनेक रूपोंमें स्थित सूर्यपुत्र यमके पुरको जानना चाहिये । यह पुर पुण्य कर्मवाले मनुष्योंको समीपमें स्थित - सा जान पड़ता है, किंतु ८ घोरमार्गसे जाते हुए पापियोंको बहुत दूर स्थित प्रतीत होता है ॥ ७-८ ॥ तीक्ष्ण काँटोंसे युक्त, कंकड़ोंसे युक्त, छुरीकी क्षुरधारानिभैस्तीक्ष्णैः पाषाणै रचितेन च ॥ ९ धारके समान तीखे पाषाणोंसे बने हुए, कहीं जोंकोंसे क्वचित्पङ्केन महता जलौकाभिश्च सङ्कुलैः । भरे हुए तथा बहुत कीचड़से युक्त, कहीं लोहेकी लोहसूचीनिभैर्दर्भैः सम्पन्नेन पथा क्वचित् ॥ १० सूईके समान नुकीले कुशोंसे युक्त, कहीं नदीतट - जैसे तटप्रायातिविषमैः पर्वतैर्वृक्षसंकुलैः । दुर्गम स्थानोंसे अति विषम तथा वृक्षोंसे परिपूर्ण, प्रतप्ताङ्गारयुक्तेन यान्ति मार्गेण पर्वतोंसे युक्त और प्रतप्त अंगारोंसे युक्त मार्गसे दुःखित दुःखिताः ॥ ११ होकर [ पापीलोग ] जाते हैं॥९ –११ ॥
क्वचिद्विषमगर्तैश्च क्वचिल्लोष्ठैः सुदुष्करैः ।
सुतप्तबालुकाभिश्च तथा तीक्ष्णैश्च शंकुभिः ॥ १२
अनेकशाखाविततैर्व्याप्तं वंशवनैः क्वचित् ।
कष्टेन तमसा मार्गेणानालम्बेन कुत्रचित् ॥ १३
अयः शृंगाटकैस्तीक्ष्णैः क्वचिद्दावाग्निना पुनः ।
क्वचित्तप्तशिलाभिश्च क्वचिद्व्याप्तं हिमेन च ॥१४
क्वचिद्वालुकया व्याप्तमाकण्ठान्तःप्रवेशया ।
क्वचिद्दुष्टाम्बुना व्याप्तं क्वचिच्च करिषाग्निना ॥ १५
वह मार्ग कहीं भयानक गड्ढोंसे, कहीं अत्यन्त दुष्कर ढेलोंसे, कहीं अत्यन्त जलती हुई रेतोंसे, कहीं तीक्ष्ण काँटोंसे, कहीं अनेक शाखाओंवाले फैले हुए बाँसके वनोंसे व्याप्त है । मार्गमें कहीं भयानक अन्धकार है और कहीं पकड़नेके लिये कोई आधार नहीं है, वह मार्ग कहीं लोहेके तीखे शृंगाटकोंसे, कहीं दावानलसे, कहीं प्रतप्त शिलाओंसे तथा कहीं बर्फसे व्याप्त है । वह मार्ग कहीं कण्ठतक शरीरको डुबो देनेवाली रेतसे, कहीं दुर्गन्धयुक्त जलसे तथा । कहीं कण्डोंकी अग्निसे व्याप्त है ॥ १२-१५ ॥
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अ ० ७ ]
क्वचित् सिंहैर्वृकैर्व्याघ्रैर्मशकैश्च सुदारुणैः ।
क्वचिन्महाजलौकाभिः क्वचिच्चाजगरैस्तथा ॥
मक्षिकाभिश्च रौद्राभिः क्वचित् सर्वैर्विषोल्बणैः ।
मत्तमातङ्गयूथैश्च बलोन्मत्तैः प्रमाथिभिः ॥
पंथानमुल्लिखद्भिश्च सूकरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रिभिः ।
तीक्ष्णशृंगैश्च महिषैः सर्वभूतैश्च श्वापदैः ॥
डाकिनीभिश्च रौद्राभिर्विकरालैश्च राक्षसैः ।
व्याधिभिश्च महाघोरैः पीड्यमाना व्रजन्ति हि ॥
महाधूलिविमिश्रेण महाचण्डेन वायुना ।
महापाषाणवर्षेण हन्यमाना निराश्रयाः ॥
क्वचिद्विद्युत्प्रपातेन दह्यमाना व्रजन्ति च ।
महता बाणवर्षेण विध्यमानाश्च सर्वतः ॥
पतद्भिर्वज्रपातैश्च उल्कापातैश्च दारुणैः ।
प्रदीप्ताङ्गारवर्षेण दह्यमानाश्च सन्ति हि ॥
महता पांसुवर्षेण पूर्यमाणा रुदन्ति च ।
महामेघरवैर्घोरैस्त्रस्यन्ते च मुहुर्मुहुः ॥
निशितायुधवर्षेण भिद्यमानाश्च सर्वतः ।
महाक्षाराम्बुधाराभिः सिच्यमाना व्रजन्ति च ॥
महाशीतेन मरुता रूक्षेण परुषेण च ।
समन्ताद् बाध्यमानाश्च शुष्यन्ते संकुचन्ति च ॥
इत्थं मार्गेण रौद्रेण पाथेयरहितेन च ।
निरालम्बेन दुर्गेण निर्जलेन समन्ततः ॥
विषमेणैव महता निर्जनापाश्रयेण च ।
तमोरूपेण कष्टेन सर्वदुष्टाश्रयेण च ॥
नीयन्ते देहिनः सर्वे ये मूढाः पापकर्मिणः । उमासंहिता ४२५ [ वे नारकीय जीव ] कहीं अति भयानक १६ सिंहों, भेड़ियों, बाघों तथा मच्छरोंसे, कहीं बड़ी - बड़ी जोंकोंसे, कहीं अजगरोंसे, कहीं भयंकर मक्खियोंसे, १७ कहीं विषधर सर्पोंसे, कहीं बलसे उन्मत्त होकर रौंद डालनेवाले मतवाले हाथियोंसे, [ अपने ] नुकीले दाँतोंसे १८ मार्गको खोदते हुए सूकरोंसे, तीक्ष्ण सींगवाले भैंसोंसे, सम्पूर्ण हिंसक जन्तुओंसे, भयानक डाकिनियोंसे, १ ९ विकराल राक्षसोंसे और घोर व्याधियोंसे पीड़ित होते हुए [ यमलोक ] जाते हैं॥१६–१९ ॥ [ वे पापीजन ] कहीं अत्यधिक धूलसे भरी प्रचण्ड २० आँधी और बड़े - बड़े पाषाणोंकी वृष्टिसे आहत किये जाते हुए, कहीं दारुण विद्युत् - पातसे जलाये जाते हुए और कहीं चारों ओरसे महती बाणवृष्टिसे बींधे जाते २१ हुए आश्रयहीन होकर [ यमलोक ] जाते हैं ॥ २०-२१ ॥ वे गिरते हुए वज्रपातोंसे, दारुण उल्कापातों एवं २२ धधकते हुए अंगारोंकी वर्षासे जलाये जाते हैं ॥ २२ ॥
वे प्रचुर धूलिवर्षासे आच्छादित होकर रोते हैं और महामेघोंकी घोर ध्वनिसे बारम्बार भयभीत २३ होते हैं ॥२३ ॥
वे चारों ओरसे बरसते हुए तीखे शस्त्रोंसे आहत २४ किये जाते हुए तथा अत्यन्त क्षारीय जलधाराओंसे सिंचित किये जाते हुए [ यमलोक ] गमन करते हैं ॥ २४ ॥
रूखी तथा कठोर स्पर्शवाली अत्यन्त शीतल २५ वायुके द्वारा पीड़ित होकर [ पापी ] लोग सिकुड़ जाते हैं तथा सूख जाते हैं ॥ २५ ॥
इस प्रकारके भयंकर, पाथेयरहित, निरालम्ब, २६ कठिन, चारों ओर सर्वथा जलहीन, अत्यन्त विषम, निर्जन, आश्रयहीन घोर अन्धकारसे परिव्याप्त, कष्टकारक २७ तथा सम्पूर्ण दुष्ट आश्रयोंसे युक्त मार्गसे जो मूढ़ तथा पापकर्मवाले जीव हैं, वे सब यमराजके आज्ञाकारी महाघोर दूतोंद्वारा बलपूर्वक [ यमलोक ] ले जाये जाते यमदूतैर्महाघोरैस्तदाज्ञाकारिभिर्बलात् ॥२८ । हैं ॥ २६–२८ ॥ एकाकिनः पराधीना मित्रबन्धुविवर्जिताः । वे अकेले, पराधीन, मित्रों और बन्धुओंसे रहित शोचन्तः स्वानि कर्माणि रुदन्तश्च मुहुर्मुहुः ॥ २ ९ होकर अपने कर्मोंको सोचते हुए बार - बार रोते हैं वे प्रेत बनकर वस्त्रहीन, शुष्क कण्ठ, ओष्ठ एवं प्रेता भूत्वा विवस्त्राश्च शुष्ककण्ठौष्ठतालुकाः । तालुवाले, अशान्त, भयभीत, जलते हुए एवं क्षुधासे असौम्या भयभीताश्च दह्यमानाः क्षुधान्विताः ॥ ३० व्याकुल [ होकर चलते ] रहते हैं ॥ २ ९ -३० ॥
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४२६ बद्धाः श्रृंखलया केचिदुत्तानपादका नराः कृष्यन्ते कृष्यमाणाश्च यमदूतैर्बलोत्कटैः उरसाधोमुखाश्चान्ये घृष्यमाणाः सुदुःखिताः केशपाशनिबन्धेन सङ्कृष्यन्ते च रज्जुना
ललाटे चांकुशेनान्ये भिन्ना दुष्यन्ति देहिनः ।
उत्तानाः कंटकपथा क्वचिदङ्गारवर्त्मना ॥
पश्चाद् बाहुनिबद्धाश्च जठरेण प्रपीडिताः ।
पूरिताः शृंखलाभिश्च हस्तयोश्च सुकीलिताः ॥
ग्रीवापाशेन कृष्यन्ते प्रयान्त्यन्ये सुदुःखिताः ।
जिह्वांकुशप्रवेशेन रज्ज्वाकृष्यन्त एव ते ॥
नासाभेदेन रज्ज्वा च त्वाकृष्यन्ते तथापरे ।
भिन्नाः कपोलयो रज्ज्वा कृष्यन्तेऽन्ये तथैौष्ठयोः ॥
छिन्नाग्रपादहस्ताश्च छिन्नकर्णोष्ठनासिकाः । संछिन्नशिश्नवृषणाः छिन्नभिन्नाङ्गसन्धयः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ । कोई मनुष्य जंजीरसे बाँधकर ऊपरकी ॥ ३१ करके बलवान् यमदूतोंद्वारा खींचे जाते ओर पैर । जाते हैं । कोई छातीके बल नीचेकी ओर हुए ले जाये । मुख किये । घसीटे जाते हैं और अति दुःखित होते हैं । कोई केशपाशमें हुए ॥ ३२ रस्सीसे बाँधकर घसीटे जाते हैं ॥ ३१-३२ ॥ अन्य प्राणी ललाटको अंकुशसे विदीर्ण किये ३३ जानेके कारण अत्यन्त दुःखित होते हैं । उत्तान किये | हुए कुछ लोग काँटोंके मार्गसे तथा अंगारोंके मार्गसे ले जाये जाते हैं ॥ ३३ ॥
किसीके दोनों हाथ पीछेकी ओर बाँधकर, ३४ किसीके पेटको [ रस्सी आदिसे ] जकड़कर, किसीको जंजीरोंमें कसकर, किसीके दोनों हाथोंमें कील ठोंककर और किसीके गलेमें रस्सी लगाकर खींचते हुए दुःख ३५ देकर ले जाया जाता है । कुछ लोग जीभमें अंकुश चुभाकर रस्सीसे खींचे जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥ कुछ लोग नाक छेदकर [ नथुनोंमें ] रस्सी ३६ [ डालकर ] उससे खींचे जाते हैं और गालों तथा ओठोंको छेदकर उनमें रस्सी डालकर खींचे जाते हैं ॥ ३६ ॥
किसीका हाथ, किसीका पैर, किसीका कान, ॥ ३७ किसीका ओठ, किसीकी नाक, किसीका लिंग, आभिद्यमानाः कुन्तैश्च भिद्यमानाश्च सायकैः किसीका अण्डकोश, किसीके शरीरके जोड़को काट इतश्चेतश्च । दिया जाता है, कुछ लोग भालों तथा बाणोंसे बींधे धावन्तः क्रन्दमाना निराश्रयाः ॥ ३८ | जाते हैं और वे आश्रयरहित होकर इधर - उधर भागते मुद्गरैर्लोहदण्डैश्च तथा क्रन्दन करते हैं ॥ ३७-३८ ॥ कंटकैर्विविधैर्घोरैर्ज्वलनार्कसमप्रभैः हन्यमाना मुहुर्मुहुः । वे मुद्गरोंसे तथा लौहदण्डोंसे बार - बार पीटे ॥३ ९ जाते हैं, और अग्नि तथा सूर्यके समान तेजवाले भिन्दिपालैर्विभिद्यन्ते विविध भयंकर काँटोंसे तथा भिन्दिपालोंसे बेधे जाते स्रवन्तः पूयशोणितम् । हैं, इस प्रकार रक्त एवं मवादका स्राव करते हुए तथा शकृता कृमिदिग्धाश्च नीयन्ते विवशा नराः ॥ ४० विष्ठा और कृमिसे भरे हुए [ मार्गसे ] मनुष्य विवश होकर [ यमपुरीमें ] ले जाये जाते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ याचमानाश्च सलिलमन्नं वापि बुभुक्षिताः । वे भूखसे व्याकुल होकर अन्न - पानी माँगते हैं, छायां प्रार्थयमानाश्च शीतार्ताश्चानलं पुनः ॥ ४१ [ धूपसे सन्तप्त हो ] छायाकी याचना करते हैं और शीतसे दुखी हो अग्निके लिये प्रार्थना करते हैं ॥ ४१ ॥
जिन लोगोंने दान नहीं दिया है, वे इसी प्रकार दानहीनाः प्रयान्त्येवं प्रार्थयन्तः सुखकी याचना करते हुए यमालय जाते हैं, परंतु जिन सुखं नराः । लोगोंने पहलेसे ही दानरूपी पाथेय ले रखा है, वे
गृहीतदानपाथेयाः सुखं यान्ति यमालयम् ॥ ४२ । सुखपूर्वक यमालयको जाते हैं ॥४२ ॥