शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 421–430

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अ ० ३ ] उमासंहिता ४०७ अथ तृतीयोऽध्यायः श्रीकृष्णकी तपस्या तथा शिव - पार्वतीसे सनत्कुमार उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य सोऽब्रवीत्तं महामुनिम् ।

विस्मयं परमं गत्वोपमन्युं शान्तमानसम् ॥

वासुदेव उवाच

धन्यस्त्वमसि विप्रेन्द्र कस्त्वां स्तोतुमलं कृती ।

यस्य देवादिदेवस्ते सान्निध्यं कुरुते श्रमे ॥

दर्शनं मुनिशार्दूल दद्यात्स भगवान् शिवः ।

अपि तावन्ममाप्येवं प्रसादं वा करोत्वसौ ॥

उपमन्युरुवाच

अचिरेणैव कालेन महादेवं न संशयः ।

तस्यैव कृपया त्वं वै द्रक्ष्यसे पुरुषोत्तम ॥

षोडशे मासि सुवरान् प्राप्स्यसि त्वं महेश्वरात् ।

सपत्नीकात्कथं नो दास्यते देवो वरान्हरे ॥

पूज्योऽसि दैवतैः सर्वैः श्लाघनीय: सदा गुणैः ।

जाप्यं तेऽहं प्रवक्ष्यामि श्रद्दधानाय चाच्युत ॥

तेन जपप्रभावेण सत्यं द्रक्ष्यसि शङ्करम् ।

आत्मतुल्यबलं पुत्रं लभिष्यसि महेश्वरात् ॥

जपो नमः शिवायेति मन्त्रराजमिमं हरे ।

सर्वकामप्रदं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥

सनत्कुमार उवाच

एवं कथयतस्तस्य महादेवाश्रिताः कथाः ।

दिनान्यष्टौ प्रयातानि मुहूर्तमिव तापस ॥

नवमे तु दिने प्राप्ते मुनिना स च दीक्षितः ।

मन्त्रमध्यापितं शार्वमाथर्वशिरसं महत् ॥

दण्डी मुण्डी च सद्योऽसौ बभूव सुसमाहितः ।

पादाङ्गुष्ठोद्धृततनुस्तेपे चोर्ध्वभुजस्तथा ॥

संप्राप्ते षोडशे मासि सन्तुष्टः परमेश्वरः ।

पार्वत्या सहितः शंभुर्ददौ कृष्णाय दर्शनम् ॥

वरदानकी प्राप्ति, अन्य शिवभक्तोंका वर्णन सनत्कुमार बोले— उनकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने अति विस्मित होकर शान्तचित्त उन १ महामुनिसे कहा —॥१ ॥

वासुदेव बोले- हे विप्रेन्द्र! आप धन्य हैं, आप [ विशुद्धात्मा ] -की स्तुति करनेमें कौन समर्थ हो २ सकता है, जिन आपके आश्रममें देवताओंके आदिदेव निवास करते हैं । हे मुनिश्रेष्ठ! वे भगवान् सदाशिव मुझे भी जिस प्रकार दर्शन दें तथा मुझपर कृपा करें, ३ आप ऐसा उपाय बतायें॥२-३ ॥ उपमन्यु बोले — हे पुरुषोत्तम! आप थोड़े ही समयमें महादेवका दर्शन उन्हींकी कृपासे प्राप्त करेंगे, ४ इसमें सन्देह नहीं है ॥४ ॥

आप सोलहवें महीनेमें पार्वतीसहित सदाशिवसे उत्तम वरदान प्राप्त करेंगे । हे हरे! वे प्रभु शिव आपको ५ वरदान क्यों नहीं देंगे, आप सभी देवगणोंसे पूजायोग्य एवं सर्वदा गुणोंके कारण प्रशंसनीय हैं, हे अच्युत! मैं ६ आप श्रद्धालुको जपनीय मन्त्र बताऊँगा॥५-६ ॥ उस जपके प्रभावसे आप निश्चय ही शिवका ७ दर्शन प्राप्त कर लेंगे और महेश्वरसे अपने समान ही बलवाला पुत्र प्राप्त करेंगे ॥७ ॥

हे हरे! ' ॐ नमः शिवाय ' इस दिव्य मन्त्रराजका ८ जप सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला एवं भोग और मोक्षको प्रदान करनेवाला है ॥८ ॥

सनत्कुमार बोले - हे तापस! इस प्रकार महादेवसम्बन्धी कथाओंको कहते हुए उन [ उपमन्यु ] -९ के आठ दिन एक मुहूर्तके समान बीत गये॥९॥

[ उसके अनन्तर ] नौवाँ दिन आनेपर मुनि १० उपमन्युने उन श्रीकृष्णको दीक्षा प्रदान की और शिव-अथर्वशीर्षका महामन्त्र उन्हें बताया ॥ १० ॥

वे शीघ्र ही सिर मुड़ाकर दण्डधारी हो गये और ११ एकाग्रचित्त होकर ऊपर भुजा उठाये पैरके एक अँगूठेपर खड़े होकर तप करने लगे ॥११ ॥

इसके बाद सोलहवाँ महीना आनेपर प्रसन्न होकर पार्वतीसहित परमेश्वर शम्भुने कृष्णको दर्शन १२ | दिया ॥१२ ॥

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४०८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३ पार्वत्या सहितं देवं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् । तीन नेत्रवाले, चन्द्रमाको मस्तकपर धारण ब्रह्माद्यैः स्तूयमानं तु पूजितं सिद्धकोटिभिः ॥ १३ ब्रह्मा आदिसे स्तुति किये जाते हुए, करोड़ों सिद्धजनोंसे किये, दिव्यमाल्याम्बरधरं भक्तिनम्रैः सुरासुरैः । पूजित, दिव्य माला तथा वस्त्र धारण किये हुए | भक्तिसे विनम्र देवताओं एवं असुरोंसे नमस्कृत प्रणतं च विशेषेण नानाभूषणभूषितम् ॥ १४ | आभूषणोंसे विभूषित सम्पूर्ण आश्चर्यसे, अनेक , परिपूर्ण सर्वाश्चर्यमयं कान्तं महेशमजमव्ययम् । | कान्तिमान्, अनेक गणों तथा दोनों पुत्रोंसे, नानागणान्वितं तुष्टं पुत्राभ्यां संयुतं प्रभुम् श्रीकृष्णः प्राञ्जलिर्दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः ईदृशं शङ्करं प्रीतः प्रणनाम महोत्सवः नानाविधैः स्तुतिपदैर्वाड्मयेनार्चयत्तदा सहस्रनाम्ना देवेशं तुष्टाव नतकंधरः

ततो देवाः सगंधर्वा विद्याधरमहोरगाः ।

मुमुचुः पुष्पवृष्टिं च साधुवादान् मनोनुगान् ॥

पार्वत्याश्च मुखं दृष्ट्वा भगवान् भक्तवत्सलः ।

उवाच केशवं तुष्टो रुद्रश्चाथ महेश्वरः ॥

श्रीमहादेव उवाच

कृष्ण जानामि भक्तं त्वां मयि नित्यं दृढव्रतम् ।

वृणीष्व त्वं वरान् मत्तः पुण्यांस्त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥

सनत्कुमार उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णः प्राञ्जलिरादरात् ।

प्राह सर्वेश्वरं शम्भुं सुप्रणम्य पुनः पुनः ॥

श्रीकृष्ण उवाच

देवदेव महादेव याचेऽहं ह्युत्तमान् वरान् ।

त्वत्तोऽष्टप्रमितान्नाथ त्वयोद्दिष्टान् महेश्वर ॥

तव धर्मे मतिर्नित्यं यशश्चाप्रचलं महत् ।

त्वत्सामीप्यं स्थिरा भक्तिस्त्वयि नित्यं ममास्त्विति ॥

स्त्रीणां मम दशाद्यानां पुत्राः शम्भो भवन्तु वै ।

वध्याश्च रिपवः सर्वे संग्रामे बलदर्पिताः ॥

अपमानो भवेन्नैव क्वचिन्मे शत्रुतः प्रभो ।

योगिनामपि सर्वेषां भवेयमतिवल्लभः ॥

इत्यष्टौ सुवरान्देहि देवदेव नमोऽस्तु ते ।

सर्वेश्वरस्त्वमेवासि मत्प्रभुश्च विशेषतः ॥

युक्त एवं ॥ १५ अति प्रसन्न पार्वतीसहित ऐसे अजन्मा - अविनाशी-। | प्रभु भगवान् महेश्वरको देखकर विस्मयसे प्रफुल्लित | नेत्रोंवाले तथा परम उत्साहसे युक्त श्रीकृष्णने ॥ १६ जोड़कर प्रसन्न होकर शंकरजीको प्रणाम किया हाथ ॥ उन्होंने शास्त्रविधिसे उनकी पूजा की और सिर ॥ १७ झुकाकर अनेकविध स्तोत्ररूप वाचिक उपचारसे तथा सहस्रनामसे देवेश्वरकी स्तुति की ॥ १३ - १७ ॥ उसके अनन्तर गन्धर्वोंके सहित देवताओं, विद्याधरों १८ एवं महानागोंने श्रीकृष्णपर पुष्पवृष्टिकर उन्हें मनोनुकूल साधुवाद प्रदान किया । उसके बाद भक्तवत्सल भगवान् महेश्वर रुद्रने पार्वतीके मुखकी ओर देखकर प्रसन्न १ ९ | होकर कृष्णसे कहा- - ॥ १८-१९ ॥ श्रीमहादेव बोले – हे कृष्ण! मेरे प्रति दृढ़व्रतवाले आप भक्तको मैं जानता हूँ, अतः आप तीनों लोकोंमें २० दुर्लभ एवं पवित्र वरोंको मुझसे माँग लीजिये ॥ २० ॥

सनत्कुमार बोले— उनके उस वचनको सुनकर श्रीकृष्णने हाथ जोड़कर आदरसहित सर्वेश्वर शिवको २१ बार - बार प्रणाम करके उनसे कहा— ॥ २१ ॥

श्रीकृष्ण बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे नाथ! हे महेश्वर! मैं आपके द्वारा कहे गये अत्युत्तम २२ आठ वरोंको आपसे माँगता हूँ । मेरी बुद्धि सदा शिवधर्ममें लगी रहे, मेरा यश सदा अधिक तथा अविचल रहे, मुझे आपका सामीप्य सदा प्राप्त हो और २३ निरन्तर आपमें मेरी भक्ति बनी रहे । हे शम्भो! मेरी प्रमुख पत्नियोंके दस - दस पुत्र उत्पन्न हों और संग्राममें २४ मैं समस्त बलाभिमानी शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ होऊँ । हे प्रभो! शत्रुओंसे कभी मेरा अपमान न हो और मैं सभी योगियोंका भी अत्यन्त प्रिय होऊँ, हे २५ देवाधिदेव! मुझे ये आठ उत्तम वर प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है । आप सर्वेश्वर हैं और विशेष २६ रूपसे मेरे प्रभु हैं ॥ २२ - २६ ॥

पृष्ठ 423

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अ ० ३ ] सनत्कुमार उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तमाह भगवान् भवः ।

सर्वं भविष्यतीत्येवं पुनः तं प्राह शूलधृक् ॥

साम्बो नाम महावीर्यः पुत्रस्ते भविता बली ।

घोरसंवर्तकादित्यः शप्तो मुनिभिरेव च ॥

मानुषो भवितासीति स ते पुत्रो भविष्यति ।

यद्यच्च प्रार्थितं किञ्चित्तत्तत्सर्वं लभस्व वै ॥

सनत्कुमार उवाच

एवं लब्ध्वा वरान् सर्वान् श्रीकृष्णः परमेश्वरात् ।

नानाविधाभिर्बह्वीभिः स्तुतिभिः समतोषयत् ॥

तमाहाथ शिवा तुष्टा पार्वती भक्तवत्सला ।

वासुदेवं महात्मानं शंभुभक्तं तपस्विनम् ॥

पार्वत्युवाच

वासुदेव महाबुद्धे कृष्ण तुष्टास्मि तेऽनघ ।

गृहाण मत्तश्च वरान् मनोज्ञान् भुवि दुर्लभान् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पार्वत्याः स यदूद्वहः ।

उवाच सुप्रसन्नात्मा भक्तियुक्तेन चेतसा ॥

श्रीकृष्ण उवाच

देवि त्वं परितुष्टासि चेद्ददासि वरान्हि मे ।

तपसानेन सत्येन ब्राह्मणान् प्रति मास्मभूत् ॥

द्वेषः कदाचिद्भद्रं तु पूजयेयं द्विजान् सदा ।

तुष्टौ च मातापितरौ भवेतां मम सर्वदा ॥

सर्वभूतेष्वानुकूल्यं भजेयं यत्र तत्रगः ।

कुले प्रसूतिरुचिता ममास्तु तव दर्शनात् ॥

तर्पयेयं सुरेन्द्रादीन्देवान् यज्ञशतेन तु । यतीनामतिथीनां च सहस्त्राण्यथ सर्वदा भोजयेयं सदा गेहे श्रद्धापूतं तु भोजनम् । बांधवैः सह प्रीतिस्तु नित्यमस्तु सुनिर्वृतिः

देवि भार्यासहस्राणां भवेयं प्राणवल्लभः ।

अक्षीणा काम्यता तासु प्रसादात्तव शाङ्करि ॥

आसां च पितरो लोके भवेयुः सत्यवादिनः इत्याद्याः सुवराः सन्तु प्रसादात्तव पार्वति उमा संहिता ४० ९ सनत्कुमार बोले- उनका यह वचन सुनकर

भगवान् शिवने उनसे कहा- यह सब [ पूर्ण ] होगा ।

२७ शिवजीने उनसे पुनः कहा ॥ २७ ॥

आपका साम्ब नामक एक महाबलवान् पुत्र होगा । २८ पूर्व समयमें मुनिलोगोंने घोर संवर्तकादित्यको शाप दिया था कि तुम मनुष्यरूप धारण करोगे, इस प्रकार वे ही संवर्तकादित्य आपके पुत्र होंगे । आपने जो कुछ २ ९ भी माँगा है, वह सब आपको प्राप्त हो॥२८-२९ ॥ सनत्कुमार बोले- इस प्रकार परमेश्वरसे समस्त वर प्राप्तकर श्रीकृष्णने अनेक प्रकारकी बहुत - सी ३० स्तुतियोंसे उन्हें प्रसन्न किया । उसके बाद सन्तुष्ट हुई भक्तवत्सला शिवा पार्वतीने उन महात्मा शिवभक्त ३१ महातपस्वी वासुदेवसे कहा – ॥ ३०-३१ ॥ पार्वती बोलीं – हे वासुदेव! हे महाबुद्धे! हे कृष्ण! हे अनघ! मैं आपसे प्रसन्न हूँ, अब आप ३२ पृथ्वीपर सर्वथा दुर्लभ तथा सुन्दर वरोंको मुझसे प्राप्त करें ॥३२ ॥

सनत्कुमार बोले- उन पार्वतीका यह वचन सुनकर उन श्रीकृष्णने अतिप्रसन्नचित्त होकर भक्तियुक्त ३३ मनसे उनसे कहा- ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्ण बोले — हे देवि! यदि आप [ मुझपर ] प्रसन्न हैं और मेरे इस सत्यतपसे वरदान देना चाहती हैं तो [ मुझे यही वरदान दीजिये कि ] मुझे ब्राह्मणोंसे ३४ कभी द्वेष न हो, मेरा कल्याण हो और मैं सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करता रहूँ, मेरे माता - पिता सदा ३५ मुझपर प्रसन्न रहें, मैं जहाँ कहीं भी जाऊँ, वहाँ मैं सभी प्राणियोंके प्रति अनुकूलता रखूँ । आपके दर्शनके ३६ कारण अच्छे कुलमें मेरा जन्म हो, इन्द्र आदि देवगणोंको सैकड़ों यज्ञोंके द्वारा तृप्त करता रहूँ, ॥ ३७ हजारों यतियों तथा अतिथियोंको सदा अपने घरपर श्रद्धासे पवित्र भोजन कराता रहूँ, अपने बान्धवजनोंके साथ मेरी प्रीति रहे तथा मैं सदा सुखी रहूँ । हे देवि! ॥ ३८ मैं अपनी हजारों स्त्रियोंका प्राणप्रिय बना रहूँ और हे शांकरि! आपकी कृपासे उनमें मेरी अक्षीण ३ ९ प्रीति रहे । उनके माता - पिता लोकमें सत्यवादी रहें ॥ हे पार्वति! ये सुन्दर वर आपकी कृपासे मुझे प्राप्त ॥ ४० | हों ॥ ३४–४० ॥

पृष्ठ 424

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४१० सनत्कुमार उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवी तं चाह विस्मिता । एवमस्त्विति भद्रं ते शाश्वती सर्वकामदा

तस्मिंस्तांश्च वरान् दत्त्वा पार्वतीपरमेश्वरौ ।

तत्रैवान्तश्च दधतुः कृत्वा कृष्णस्य सत्कृपाम् ॥

कृष्णः कृतार्थमात्मानममन्यत मुनीश्वर ।

उपमन्योर्मुनेराशु प्रापाश्रममनुत्तमम् ॥

प्रणम्य शिरसा तत्र तं मुनिं केशिहा ततः ।

तथा वृत्तं च तस्मै तत् समाचष्टोपमन्यवे ॥

स च तं प्राह कोऽन्यः स्याच्छर्वाद्देवाज्जनार्दन ।

महादानपतिर्लोके क्रोधे वातीव दुःसहः ॥

ज्ञाने तपसि वा शौर्ये स्थैर्ये वा पद एव च ।

शृणु शंभोस्तु गोविन्द देवैश्वर्यं महायशाः ॥

तच्छ्रुत्वा श्रद्धया युक्तोऽभवच्छंभोस्तु भक्तिमान् ।

पप्रच्छ शिवमाहात्म्यं स तं प्राह मुनीश्वरः ॥

उपमन्युरुवाच

भगवान् शङ्करः पूर्वं ब्रह्मलोके महात्मना ।

स्तुतो नामसहस्त्रेण तण्डिना ब्रह्मयोगिना ॥

सांख्याः पठन्ति तद्गीतं विस्तीर्णं च निघंटुवत् ।

दुर्ज्ञानं मानुषाणां तु स्तोत्रं तत्सर्वकामदम् ॥

स्मरन्नित्यं शङ्करं त्वं गच्छ कृष्ण गृहं सुखी ।

भविष्यसि सदा तात शिवभक्तगणाग्रणीः ॥

इत्युक्तस्तं नमस्कृत्य वासुदेवो मुनीश्वरम् ।

मनसा संस्मरन् शम्भुं केशवो द्वारकां ययौ ॥

सनत्कुमार उवाच

एवं कृष्णः समाराध्य शङ्करं लोकशङ्करम् ।

कृतार्थोऽभून्मुनिश्रेष्ठ सर्वाजेयोऽभवत्तथा ॥

तथा दाशरथी रामः शिवमाराध्य भक्तितः ।

कृतार्थोऽभून्मुनिश्रेष्ठ विजयी सर्वतोऽभवत् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ सनत्कुमार बोले- उनके इस वचनको स सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सनातनी सुनकर देवीने ॥ ४१ विस्मित होकर कहा- ऐसा ही हो ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीकृष्णपर सत्कृपा करके उन्हें ४२ | उन वरोंको देकर शिव - पार्वती वहीं अन्तर्हित गये ॥४२ ॥ हो

हे मुनीश्वर! श्रीकृष्ण अपनेको कृतार्थ समझने । ४३ लगे, तदनन्तर वे शीघ्रताके साथ महर्षि उपमन्युके श्रेष्ठ आश्रममें गये । वहाँपर उन मुनिको नतमस्तक हो प्रणामकर | केशिहा ( केशी दैत्यका वध करनेवाले ) कृष्णने उन ४४ उपमन्युसे उस वृत्तान्तको बताया- ॥ ४३-४४ ॥ तब उन्होंने उनसे कहा - हे जनार्दन! लोकमें ४५ उन प्रभु सदाशिवसे बढ़कर महादानपति तथा क्रोधके करनेमें अतिशय दुःसह कौन हो सकता है? ॥ ४५ ॥

ज्ञान, तपस्या, शूरता, स्थिरता तथा पदमें भी उनसे ४६ अधिक कौन हो सकता है? हे गोविन्द! हे महायशस्वी! अब आप शिवजीके ऐश्वर्यको सुनें । यह सुनकर वे श्रद्धासम्पन्न एवं शिवभक्तिपरायण हो शिवके माहात्म्यको ४७ पूछने लगे । तब मुनीश्वरने उनसे कहा- -- ॥ ४६-४७ ॥ उपमन्यु बोले — पूर्व समयमें ब्रह्मलोकमें ब्रह्मयोगी महात्मा तण्डीने शिवसहस्रनामसे भगवान् शिवकी ४८ । स्तुति की थी ॥ ४८ ॥

निघण्टुके समान विस्तृत [ अभिप्रायवाले तथा ४ ९ महात्मा तण्डिके द्वारा ] गाये गये उस स्तोत्रका सांख्यवेत्ता पारायण करते हैं, मनुष्योंके लिये दुर्ज्ञेय वह स्तोत्र सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । हे कृष्ण! आप शिवका ५० स्मरण करते हुए सुखपूर्वक घर जाइये । हे तात! आप शिवके भक्तोंमें सदा अग्रणी रहेंगे । ४ ९ -५० ॥ उनके ऐसा कहनेपर वासुदेव श्रीकृष्ण उन ५१ मुनीश्वर महर्षिको नमस्कार करके मनसे शिवका स्मरण करते हुए द्वारका चले गये ॥५१ ॥

सनत्कुमार बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीकी आराधनाकर ५२ श्रीकृष्ण कृतार्थ हुए और सभीसे अजेय हो गये ॥५२ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! इसी तरह दशरथपुत्र श्रीराम भी भक्तिके साथ शिवकी आराधना करके कृतकृत्य हुए ५३ और सभीसे अजेय हो गये ॥५३ ॥

पृष्ठ 425

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अ ० ३ ]

तपस्तत्प्वातिविपुलं पुरा राम्रो गिरौ मुने ।

शिवाद्धनुः शरं चापं ज्ञानं वै परमुत्तमम् ॥

रावणं सगणं हत्वा सेतुं बद्ध्वाम्भसां निधौ ।

सीतां प्राप्य गृहं यातो बुभुजे निखिलां महीम् ॥

तथा च भार्गवो रामो ह्याराध्य तपसा विभुम् ।

निरीक्ष्य दुःखितः शर्वात्पितरं क्षत्रियैर्हतम् ॥

तीक्ष्णं स परशुं लेभे निर्ददाह च तेन तान् ।

त्रिःसप्तकृत्वः क्षत्रांश्च प्रसन्नात्परमेश्वरात् ॥

अजेयश्चामरश्चैव सोऽद्यापि तपसां निधिः ।

लिङ्गार्चनरतो नित्यं दृश्यते सिद्धचारणैः ॥

महेन्द्रपर्वते रामः स्थितस्तपसि तिष्ठति ।

कल्पान्ते पुनरेवासावृषिस्थानमवाप्स्यति ॥

असितस्यानुजः पूर्वं पीडया कृतवांस्तपः ।

मूलग्राहेण विश्वस्य देवलो नाम तापसः ॥

पुरन्दरेण शप्तस्तु तपस्वी यश्च सुस्थिरम् ।

अधर्म्यं धर्ममलभल्लिङ्गमाराध्य कामदम् ॥

चाक्षुषस्य मनोः पुत्रो मृगोऽभूत्तु मरुस्थले ।

वसिष्ठशापाद् गृत्समदो दण्डकारण्य एकलः ॥

हृदये संस्मरन् भक्त्या प्रणवेन युतं शिवम् ।

तस्मान्मृत्युमुखाकारो गणो मृगमुखोऽभवत् ॥

अजरामरतां नीतस्तीर्त्वा शापं पुनश्च सः । शङ्करेण कृतः प्रीत्या नित्यं लम्बोदरानुगः गार्ग्याय प्रददौ शर्वो मोक्षं च भुवि दुर्लभम् कामचारी महाक्षेत्रं कालज्ञानं महर्द्धिमत् ॥ चतुष्पादं सरस्वत्याः पारगत्वं च शाश्वतम् । न तुल्यं च सहस्रं तु पुत्राणां प्रददौ शिवः वेदव्यासं तु योगीन्द्रं पुत्रं तुष्टः पिनाकधृक् पराशराय च ददौ जरामृत्युविवर्जितम् उमासंहिता ४११ हे मुने! पहले श्रीरामने पर्वतपर अतिशय तप ५४ करके शिवजीसे अत्युत्तम ज्ञान और धनुष - बाण प्राप्त किया था । तत्पश्चात् वे समुद्रपर पुल बाँधकर सपरिवार रावणका वधकर जानकीको साथ लेकर घर लौटे ५५ और सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करने लगे ॥ ५४-५५ ॥ इसी प्रकार क्षत्रियों द्वारा मारे गये अपने पिताको ५६ देखकर दुखी होकर भृगुपुत्र परशुरामने तपस्याके द्वारा शिवकी आराधना करके प्रसन्न हुए परमेश्वर शिवसे तीक्ष्ण परशुको प्राप्त किया और उससे इक्कीस बार ५७ उन क्षत्रियोंका संहार किया॥५६-५७ ॥ वे महातपस्वी [ परशुराम ] अजेय और अमर ५८ हैं । वे आज भी सिद्ध और चारणोंके साथ शिवलिंगका पूजन करते हुए देखे जाते हैं ॥५८ ॥

वे परशुराम [ इस समय भी ] महेन्द्रपर्वतपर स्थित ५ ९ रहकर तपस्यामें रत हैं । कल्पका अन्त होनेपर वे पुनः ऋषिस्थान प्राप्त करेंगे । महर्षि असितके अनुज देवल नामक तपस्वीने अपने भाईके द्वारा सर्वस्व अपहरणके ६० बाद दुखी होकर शिवकी आराधना की थी ॥ ५ ९ -६० ॥ अधर्मयुक्त कार्य करनेपर इन्द्रके द्वारा शापित ६१ किसी तपस्वीने कामनाकी पूर्ति करनेवाले शिवलिंगकी आराधना करके सुस्थिर धर्मकी प्राप्ति की थी ॥ ६१ ॥

चाक्षुष मनुका पुत्र गृत्समद वसिष्ठके शापसे ६२ दण्डकारण्यके मरुस्थलमें [ क्रूर ] पशु हुआ और अपने मनमें प्रणवयुक्त शिवमन्त्रका भक्तिपूर्वक स्मरण करता हुआ अकेले घूमा करता था, [ वह भगवान् ६३ शिवकी कृपासे ] मृत्युके समान मुखाकृतिवाला मृगमुख नामक शिवका गण हुआ॥६२-६३ ॥ इस प्रकार शिवने प्रेमपूर्वक उसके शापको ॥ ६४ दूरकर उसे अजर - अमर कर दिया और गणेशजीका अनुगामी बना दिया ॥ ६४ ॥

। स्वेच्छासे विचरण करनेवाले सदाशिवने गार्ग्यको ६५ भूलोकमें दुर्लभ मोक्ष, महासमृद्धिसम्पन्न महाक्षेत्र, कालज्ञान, धर्मादि चारों पदार्थ प्रदान किये तथा सदाके लिये भगवती भारतीका पारंगत विद्वान् बनाया । ॥ ६६ शिवजीने उन्हें अतुलनीय हजार पुत्रोंकी प्राप्तिका वरदान भी दिया ॥ ६५-६६ ॥ । सन्तुष्ट हुए पिनाकधारी शिवने पराशरको जरा-॥ ६७ | मरणरहित वेदव्यास नामक योगीश्वर पुत्र प्रदान

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४१२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ मांडव्यः शङ्करेणैव जीवं दत्त्वा विसर्जितः । किया । शिवजीने शूलके अग्रभागपर दस लाख वर्षोंसे वर्षाणां दश लक्षाणि शूलाग्रादवरोपितः दरिद्रो ब्राह्मणः कश्चिन्निक्षिप्य गुरुवेश्मनि पुत्रं तु गालवं यश्च पूर्वमासीद् गृहाश्रमी गुप्तो वा मुनिशालायां भिक्षुरायाति तद्गृहम् भार्यामुवाच यः कश्चिदवश्यं निर्धनो यतः स तु वाच्यो भवत्या च न दृश्यन्त इति प्रियः अतिथेरागतस्यापि किं दास्यामि गृहे वसन् कदाचिदतिथिः कश्चित्क्षुत्तृषाक्षामतर्षितः । तामुवाच स भर्ता ते क्व गतश्चेति तं च सा

प्राह भर्ता मदीयस्तु सांप्रतं न च दृश्यते ।

स ऋषिस्तामुवाचेदं ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा ॥

गृहस्थितः प्रतिच्छन्नस्तत्रैव स मृतो द्विजः ।

विश्वामित्राभ्यनुज्ञातस्तत्पुत्रो गालवस्तथा ॥

गृहमागत्य मातुः स श्रुत्वा शापं सुदारुणम् ।

आराध्य शङ्करं देवं पूजां कृत्वा तु शाम्भवीम् ॥

गृहादसौ विनिष्क्रान्तः संस्मरन् शङ्करं हृदा ।

अथ तं तनयं दृष्ट्वा पिता तं प्राह साञ्जलिम् ॥

महादेवप्रसादाच्च कृतकृत्योऽस्मि कृत्यतः ।

धनवान् पुत्रवांश्चैव मृतोऽहं जीवितः पुनः ॥

इति वः कथितमशेषं नाहं शक्तः समासतो व्यासात् ।

वक्तुं शंभोश्च गुणान् शेषस्यापि न मुखानि स्युः ॥

॥ ६८ चढ़े हुए माण्डव्य ऋषिको जीवनदान देकर किया ॥ ६७-६८ ॥ मुक्त । पूर्व समयमें कोई निर्धन गृहस्थ ब्राह्मण ॥ ६ ९ पुत्र गालवको गुरुके घरमें रखकर मुनियोंके अपने छिप गया । उसके घरपर भिक्षुक आते - जाते रहते आश्रम थे में ॥ । धनहीन होनेके कारण उस ब्राह्मणने अपनी ॥ ७० । कह दिया था कि जो कोई भिक्षुक आये उससे स्त्रीसे कह दिया करो कि मेरे पति घरपर दिखायी , नहीं तुम देते । हैं; क्योंकि आये हुए अतिथिको मैं गृहस्थ होते ॥ ७१ भी क्या प्रदान करूँ? ॥ ६ ९ –७१ ॥ हुए इसके बाद किसी समय भूख और प्याससे दुर्बल ॥ ७२ और अतिशय व्याकुल कोई अतिथि पहुँचा, उसने उस ब्राह्मणीसे पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ गया है? तब उस ब्राह्मणीने उससे कहा कि मेरे पति तो इस समय दिखायी ही नहीं दे रहे हैं । इसके बाद दिव्य दृष्टिसे उसको देखकर ७३ भिक्षुकरूप महर्षिने उससे यह कहा – तुम्हारा पति घरमें कहीं छिपकर बैठा हुआ है और [ उसके ऐसा कहते ही ] वह ब्राह्मण वहींपर मर गया ॥ ७२-७३ ॥ तत्पश्चात् विश्वामित्रसे सभी वृत्तान्त जानकर ७४ उसका पुत्र गालव अपने घर आया और मातासे दारुण शापकी बात जानकर उसने शैव विधानके अनुसार पूजा करते हुए शिवजीकी आराधना की । [ तब ७५ शिवजीकी कृपासे जीवित हुआ उसका पिता ] मनमें शंकरजीका स्मरण करता हुआ घरसे निकला । इसके ७६ बाद उस पुत्रको देखकर उसके पिताने हाथ जोड़कर कहा — मैं महादेवजीकी कृपासे कृतकृत्य हो गया हूँ । मैं धनवान् तथा पुत्रवान् हो गया हूँ और मरकर पुनः ७७ जीवित हो गया हूँ ॥ ७४–७७ ॥ [ हे मुनिगण! ] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें वर्णन कर दिया, मैं पूर्णरूपसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ । शेष - नागके [ हजार ] मुख भी विस्तारपूर्वक सदाशिवके ७८ गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥७८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां कृष्णादिशिवभक्तोद्धारण-शिवमाहात्म्यवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें कृष्णादिशिवभक्तोद्धारण-शिवमाहात्म्यवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

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अ ० ४ ] उमासंहिता ४१३ अथ चतुर्थोऽध्यायः शिवकी मुनय ऊचुः

तात तात महाभाग धन्यस्त्वं हि महामते ।

अद्भुतेयं कथा शंभोः श्राविता परभक्तिदा ॥

पुनर्ब्रूहि कथां शंभोर्व्यासप्रश्नानुसारतः ।

सर्वज्ञस्त्वं व्यासशिष्यः शिवतत्त्वविचक्षणः ॥

सूत उवाच

एवमेव गुरुर्व्यासः पृष्टवान् मेऽजसंभवम् ।

सनत्कुमारं सर्वज्ञं शिवभक्तं मुनीश्वरम् ॥

व्यास उवाच

सनत्कुमार सर्वज्ञ श्रावितेयं शुभा कथा ।

शङ्करस्य महेशस्य नानालीलाविहारिणः ॥

पुनर्ब्रह महादेवमहिमानं विशेषतः ।

श्रद्धा च महती श्रोतुं मम तात प्रवर्धते ॥

महिम्ना येन शंभोस्तु ये ये लोके विमोहिताः ।

मायया ज्ञानमाहृत्य नानालीलाविहारिणः ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास महाबुद्धे शाङ्करीं सुखदां कथाम् ।

यस्याः श्रवणमात्रेण शिवे भक्तिः प्रजायते ॥

शिवः सर्वेश्वरो देवः सर्वात्मा सर्वदर्शनः ।

महिम्ना तस्य सर्वं हि व्याप्तं च सकलं जगत् ॥

शिवस्यैव परा मूर्तिर्ब्रह्मविष्ण्वीश्वरात्मिका ।

सर्वभूतात्मभूताख्या त्रिलिङ्गालिङ्गरूपिणी ॥

देवानां योनयश्चाष्टौ मानुषी नवमी च या ।

तिरश्चां योनयः पञ्च भवन्त्येवं चतुर्दश ॥

भूता वा वर्तमाना वा भविष्याश्चैव सर्वशः ।

शिवात्सर्वे प्रवर्तन्ते लीयन्ते वृद्धिमागताः ॥

मायाका प्रभाव मुनिगण बोले- हे तात! हे तात! हे महाभाग! हे महामते! आप धन्य हैं; क्योंकि आपने परम भक्ति १ प्रदान करनेवाली यह अद्भुत शिवकथा सुनायी है ॥ १ ॥

[ हे सूतजी! ] व्यासदेवके प्रश्नके अनुसार पुनः २ शिवकी कथा कहिये । आप सर्वज्ञ, व्यासजीके शिष्य और शिवतत्त्वके ज्ञाता हैं ॥२ ॥

सूतजी बोले- इसी प्रकार मेरे गुरु व्यासजीने सब कुछ जाननेवाले शिवभक्त मुनीश्वर ब्रह्मपुत्र ३ सनत्कुमारजीसे पूछा था ॥३ ॥

व्यासजी बोले- हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! आपने अनेक प्रकारसे लीलाविहार करनेवाले महेश्वर शंकरकी ४ यह शुभ कथा सुनायी । आप पुनः महादेव शिवकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन करें । हे तात! मेरी बहुत ५ अधिक श्रद्धा उसे सुननेके लिये बढ़ रही है ॥ ४-५ ॥ विविध प्रकारसे लीलाविहार करनेवाले ६ सदाशिवकी जिस महिमा तथा मायाके प्रभावसे ज्ञानरहित होकर लोकमें जो - जो लोग विमोहित हुए, उनकी कथा सुनाइये ॥ ६ ॥

सनत्कुमार बोले- हे व्यास! हे महामते! शंकरकी सुखदायिनी कथाको सुनिये, जिसके सुननेमात्रसे ७ शिवजीके प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥७ ॥

शिवजी ही सर्वेश्वर देवता, सर्वात्मा एवं सभीके ८ द्रष्टा हैं, उनकी महिमासे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है ॥ ८ ॥

ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रके रूपमें भगवान् शिवकी ९ ही त्रिलिंगात्मिका परामूर्ति अभिव्यक्त हो रही है और समस्त प्राणियोंकी आत्माके रूपमें उन्हींकी निष्कल मूर्ति स्थित है॥९॥

आठ प्रकारकी देवयोनियाँ, नौवीं मनुष्ययोनि १० एवं पाँच प्रकारकी तिर्यग् योनियाँ – इन सबको मिलाकर चौदह योनियाँ होती हैं । जो हो चुके हैं, विद्यमान हैं तथा आगे होनेवाले हैं- ये सभी [ प्राणि - पदार्थ ] शिवसे ही उत्पन्न होते हैं, वृद्धिको प्राप्त होते हैं और ११ । अन्तमें शिवमें ही विलीन हो जाते हैं ॥ १०-११ ॥

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४१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां देवदानवभोगिनाम् ।

गंधर्वाणां मनुष्याणामन्येषां वापि सर्वशः ॥ १२

बंधुर्मित्रमथाचार्यो रक्षन्नेतार्थवान् गुरुः ।

कल्पद्रुमोऽथ वा भ्राता पिता माता शिवो मतः ॥ १३

शिवः सर्वमयः पुंसां स्वयं वेद्यः परात्परः ।

वक्तुं न शक्यते यश्च परं चानुपरं च यत् ॥ १४

तन्माया परमा दिव्या सर्वत्र व्यापिनी मुने ।

तदधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १५

कामेन स्वसहायेन प्रबलेन मनोभुवा ।

सर्वः प्रधर्षितो वीरो विष्ण्वादिप्रबलोऽपि हि ॥ १६

शिवमायाप्रभावेणाभूद्धरिः काममोहितः ।

परस्त्रीधर्षणं चक्रे बहुवारं मुनीश्वर ॥ १७

इन्द्रस्त्रिदशपो भूत्वा गौतमस्त्रीविमोहितः । पापं चकार दुष्टात्मा शापं प्राप मुनेस्तदा । १८

पावकोऽपि जगच्छ्रेष्ठो मोहितः शिवमायया ।

कामाधीनः कृतो गर्वात्ततस्तेनैव चोद्धृतः ॥ १ ९

जगत्प्राणोऽपि गर्वेण मोहितः शिवमायया ।

कामेन निर्जितो व्यास चक्रेऽन्यस्त्रीरतिं पुरा ॥ २०

चण्डरश्मिस्तु मार्तण्डो मोहितः शिवमायया ।

कामाकुलो बभूवाशु दृष्ट्वाश्वीं हयरूपधृक् ॥ २१

चन्द्रश्च मोहितः शम्भोर्मायया कामसंकुलः ।

गुरुपत्नीं जहाराथ युतस्तेनैव चोद्धृतः ॥ २२

पूर्वं तु मित्रावरुणौ घोरे तपसि संस्थितौ ।

मोहितौ तावपि मुनी शिवमायाविमोहितौ ॥ २३

उर्वशीं तरुणीं दृष्ट्वा कामुकौ सम्बभूवतुः ४ ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, चन्द्र, देवता, दानव गन्धर्व, मनुष्य तथा अन्य सभी प्राणियोंके बन्धु, नाग, | आचार्य, रक्षक, नेता, धनदाता, गुरु, भाई, पिता, मित्र, | एवं [ वांछित फलोंको देनेवाले ] कल्पवृक्षस्वरूप , माता शिवजी ही माने गये हैं ॥ १२-१३ ॥ शिव सर्वमय हैं, वे ही मनुष्योंके लिये जाननेयोग्य हैं तथा परसे भी परे हैं, जिनका वर्णन नहीं किया | सकता और जो पर तथा अनुपर हैं, उनकी माया जा | दिव्य तथा सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली है और हे परम देवता, असुर एवं मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् उसीके मुने! अधीन है ॥ १४-१५ ॥ शिवजीकी मायाने मनसे उत्पन्न होनेवाले, अपने प्रबल सहयोगी कामके द्वारा विष्णु आदि सभी प्रबल वीर देवताओंको भी अपने अधीन कर लिया है ॥ १६ ॥

हे मुनीश्वर! शिवकी मायाके प्रभावसे विष्णु भी कामसे मोहित हो गये । देवताओंके स्वामी दुष्टात्मा इन्द्र भी गौतमकी पत्नीपर मोहित होकर पापकर्ममें प्रवृत्त हुए, तब उनको मुनिने शाप दे दिया । १७-१८ ॥ जगत्में श्रेष्ठ अग्निदेव भी अहंकारके कारण शिवकी मायासे मोहित हो कामके अधीन हो गये, बादमें उन [ शिवजी ] -ने ही उनका उद्धार किया ॥ १ ९ ॥ हे व्यास! जगत्के प्राणस्वरूप वायु भी शिवकी मायासे मोहित होकर कामके वशीभूत होकर प्रेममें आसक्त हो गये ॥ २० ॥

शिवकी मायासे मोहित हुए प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेवने भी घोड़ी [ के रूपमें स्थित अपनी पत्नी संज्ञा ] -को देखकर कामसे व्याकुल होकर घोड़ेका स्वरूप धारण किया ॥ २१ ॥

शिवमायासे विमोहित होकर कामसे व्याकुल चन्द्रमाने भी आसक्त होकर गुरुपत्नीका अपहरण किया, बादमें उन शिवने ही उनका उद्धार किया ॥ २२ ॥

पूर्व समयमें मित्र एवं वरुण– -दोनों मुनि तपस्यामें स्थित थे, तब शिवकी मायासे मोहित हुए वे दोनों उर्वशी [ अप्सरा ] -को देखकर मुग्धचित्त तथा कामनायुक्त मित्रः कुम्भे जहौ रेतो वरुणोऽपि तथा । हो गये । तब मित्रने अपना तेज घड़ेमें और वरुणने जले ॥ २४ जलमें छोड़ दिया । तत्पश्चात् उस कुम्भसे वडवाग्निके ततः कुम्भात्समुत्पन्नो वसिष्ठो मित्रसंभवः । समान कान्तिवाले अगस्त्य उत्पन्न हुए और वरुणके अगस्त्यो वरुणाज्जातो वडवाग्निसमद्युतिः ॥ २५ | तेजसे जलसे वसिष्ठका जन्म हुआ ॥ २३–२५ ॥

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अ ० ४ ]

दक्षश्च मोहितः शंभोर्मायया ब्रह्मणः सुतः ।

भ्रातृभिः स भगिन्यां वै भोक्तुकामोऽभवत्पुरा ॥

ब्रह्मा च बहुवारं हि मोहितः शिवमायया ।

अभवद्भोक्तुकामश्च स्वसुतायां परासु च ॥

च्यवनोऽपि महायोगी मोहितः शिवमायया ।

सुकन्यया विजहे स कामासक्तो बभूव ह ॥

कश्यपः शिवमायातो मोहितः कामसंकुलः ।

ययाचे कन्यकां मोहाद्धन्वनो नृपतेः पुरा ॥

गरुडः शांडिलीं कन्यां नेतुकामः सुमोहितः ।

विज्ञातस्तु तया सद्यो दग्धपक्षो बभूव ह ॥

विभांडको मुनिर्नारीं दृष्ट्वा कामवशं गतः ।

ऋष्यशृङ्गसुतस्तस्य मृग्यां जातः शिवाज्ञया ॥

गौतमश्च मुनिः शंभोर्मायामोहितमानसः ।

दृष्ट्वा शारद्वतीं नग्नां रराम क्षुभितस्तया ॥

रेतः स्कन्नं दधार स्वं द्रोण्यां चैव स तापसः ।

तस्माच्च कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ॥

पराशरो महायोगी मोहितः शिवमायया ।

मत्स्योदर्या च चिक्रीडे कुमार्या दाशकन्यया ॥

विश्वामित्रो बभूवाथ मोहितः शिवमायया । रेमे मेनकया व्यास वने कामवशं गतः वसिष्ठेन विरोधं तु कृतवान्नष्टचेतनः । पुनः शिवप्रसादाच्च ब्राह्मणोऽभूत्स एव वै

रावणो वैश्रवाः कामी बभूव शिवमायया ।

सीतां जह्रे कुबुद्धिस्तु मोहितो मृत्युमाप च ॥

बृहस्पतिर्मुनिवरो मोहितः शिवमायया उमासंहिता ४१५ पूर्वकालमें ब्रह्माके पुत्र दक्ष भी शिवमायासे २६ मोहित हो गये और भाइयोंके साथ वे अपनी भगिनीसे सम्पर्ककी कामनावाले हो गये ॥ २६ ॥

शिवमायासे मोहित होकर ब्रह्मा भी अनेक बार २७ स्त्री - संगकी कामनावाले हो गये ॥ २७ ॥

महायोगी च्यवन भी शिवकी मायासे मोहित हो २८ गये और उन्होंने कामासक्त हो [ अपनी पत्नी ] सुकन्याके साथ विहार किया ॥२८ ॥

पूर्वकालमें [ महर्षि ] कश्यपने शिवमायासे २ ९ मोहित होकर कामके अधीन हो मोहपूर्वक राजा धन्वासे उनकी कन्याकी याचना की । शिवकी मायासे मोहित हुए गरुड़ने भी शांडिली नामक कन्याको ग्रहण करनेकी ३० इच्छा की, तब उनके अभिप्रायको जान लेनेके बाद उसने उनके पंखोंको भस्म कर दिया ॥ २ ९ -३० ॥ मुनि विभांडक स्त्रीको देखकर कामके अधीन ३१ हो गये और शिवकी प्रेरणासे हरिणीसे ऋष्यश्रृंग नामक पुत्र उन्हें उत्पन्न हुआ ॥३१ ॥

शिवमायासे मोहित चित्तवाले महर्षि गौतम ३२ शारद्वतीको वस्त्रहीन देखकर क्षुब्ध हो गये और उन्होंने उसके साथ रमण किया ॥३२ ॥

तपस्वी [ भारद्वाज ] -ने [ घृताची अप्सराको ३३ देखकर ] अपने स्खलित वीर्यको द्रोणीमें रख दिया, तब उस कलशसे शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य उत्पन्न हुए ॥३३ ॥

शिवकी मायासे मोहित होकर महायोगी पराशरने ३४ भी निषादराजकी कुमारी कन्या मत्स्योदरीके साथ विहार किया ॥ ३४ ॥

हे व्यास! विश्वामित्र भी शिवमायासे मोहित हो ॥ ३५ गये और उन्होंने कामके वशीभूत हो वनमें मेनकाके साथ रमण किया । नष्ट बुद्धिवाले उन्होंने वसिष्ठके साथ विरोध किया और शिवकी कृपासे ही पुनः वे ॥ ३६ [ क्षत्रियसे ] ब्राह्मण हो गये ॥ ३५-३६ ॥ विश्रवाके पुत्र कामासक्त दुर्बुद्धि रावणने ३७ शिवकी मायासे विमोहित होकर सीताका अपहरण किया और अन्तमें उसकी मृत्यु हुई ॥३७ ॥

शिवकी मायासे विमोहित हुए जितेन्द्रिय मुनिवर । बृहस्पतिने अपने भाईकी पत्नीके साथ रमण किया, भ्रातृपल्या वशी रेमे भरद्वाजस्ततोऽभवत् ॥ ३८ उसके फलस्वरूप महर्षि भरद्वाज उत्पन्न हुए ॥३८ ॥

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४१६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० इति मायाप्रभावो हि शङ्करस्य महात्मनः । हे व्यास! इस प्रकार मैंने महात्मा | मायाके प्रभावका आपसे वर्णन कर दिया शिवक वर्णितस्ते मया व्यास किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ३ ९ | आगे और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ३ ९, ॥ अब आ इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां शिवमायाप्रभाववर्णनं नाम चतुर्थोऽ ध्यायः ॥ ४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें शिवमाया-प्रभाववर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः महापातकों का वर्णन व्यास उवाच

ये पापनिरता जीवा महानरकहेतवः ।

भगवंस्तान् समाचक्ष्व ब्रह्मपुत्र नमोऽस्तु ते ॥

सनत्कुमार उवाच

ये पापनिरता जीवा महानरकहेतवः ।

ते समासेन कथ्यन्ते सावधानतया शृणु ॥

परस्त्रीद्रव्यसंकल्पश्चेतसानिष्टचिन्तनम् ।

अकार्याभिनिवेशश्च चतुर्धा कर्म मानसम् ॥

अविबद्धप्रलापत्वमसत्यं चाप्रियं च यत् ।

परोक्षतश्च पैशुन्यं चतुर्धा कर्म वाचिकम् ॥

अभक्ष्यभक्षणं हिंसा मिथ्याकार्यनिवेशनम् ।

परस्वानामुपादानं चतुर्धा कर्म कायिकम् ॥

इत्येतद् द्वादशविधं कर्म प्रोक्तं त्रिसाधनम् ।

अस्य भेदान् पुनर्वक्ष्ये येषां फलमनन्तकम् ॥

ये द्विषन्ति महादेवं संसारार्णवतारकम् ।

सुमहत्पातकं तेषां निरयार्णवगामिनाम् ॥

ये शिवज्ञानवक्तारं निन्दन्ति च तपस्विनम् ।

गुरून् पितॄनथोन्मत्तास्ते यान्ति निरयार्णवम् ॥

शिवनिन्दा गुरोर्निन्दा शिवज्ञानस्य दूषणम् ।

देवद्रव्यापहरणं द्विजद्रव्यविनाशनम् ॥

हरन्ति ये च संमूढाः शिवज्ञानस्य पुस्तकम् । व्यासजी बोले – हे भगवन्! हे | महानरकमें जानेवाले जो पापपरायण जीव हैं ब्रह्मपुत्र! १ वर्णन कीजिये, आपको नमस्कार है ॥१ ॥, उनका

सनत्कुमार बोले — हे व्यासजी! पापोंमें संलग्न जो महानरकगामी जीव हैं, मैं उनका संक्षेपमें वर्णन २ कर रहा हूँ, आप सावधानीपूर्वक सुनें । दूसरोंकी स्त्री तथा पराये धनकी इच्छा, मनसे दूसरोंका अनिष्टचिन्तन तथा बुरे कामोंमें प्रवृत्ति - ये चार प्रकारके मानस ३ पापकर्म हैं॥२-३ ॥ असम्बद्ध प्रलाप, असत्य, अप्रिय भाषण तथा ४ पीठपीछे चुगलखोरी – ये चार प्रकारके वाचिक पापकर्म हैं । अभक्ष्यभक्षण, हिंसा, अनुचित कर्मके प्रति आग्रह ५ एवं परधनका अपहरण – ये चार प्रकारके कायिक पाप- -कर्म हैं ॥४-५ ॥ इस प्रकार ये मन, वाणी तथा शरीररूप साधनोंसे ६ होनेवाले बारह प्रकारके पापकर्म कहे गये हैं, अब मैं इनके भेदोंका वर्णन करता हूँ, जिनके [ अनिष्ट ] परिणामोंका कोई अन्त नहीं है ॥ ६ ॥

जो संसारसमुद्रसे पार करनेवाले महादेवकी ७ निन्दा करते हैं, नरकसमुद्रमें पड़नेवाले उन लोगोंको महापाप लगता है । जो उन्मत्त होकर शिवज्ञानके उपदेशक, तपस्वी, गुरुओं एवं पितृजनोंकी निन्दा ८ करते हैं, वे नरकसमुद्रमें जाते हैं॥७-८ ॥ शिवनिन्दा करना, गुरुनिन्दा करना, शैवसिद्धान्तका ९ खण्डन करना, देवद्रव्यका अपहरण करना, द्विजद्रव्यका नाश करना और मूर्खतावश शिवज्ञानविषयक पुस्तकका अपहरण करना — ये छ: अनन्त फल देनेवाले महापातक

महान्ति पातकान्याहुरनन्तफलदानि षट् ॥ १० । कहे गये हैं॥९ -१० ॥