शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 461–470

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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अ ० १२ ] व्यास उवाच

तपसो मे फलं ब्रूहि पुनरेव विशेषतः ।

सर्वेषां चैव वर्णानां ब्राह्मणानां तपोधन ॥

सनत्कुमार उवाच

प्रवक्ष्यामि तपोऽध्यायं सर्वकामार्थसाधकम् ।

सुदुश्चरं द्विजातीनां तन्मे निगदतः शृणु ॥

तपो हि परमं प्रोक्तं तपसा विद्यते फलम् ।

तपोरता हि ये नित्यं मोदन्ते सह दैवतैः ॥

तपसा प्राप्यते स्वर्गस्तपसा प्राप्यते यशः ।

तपसा प्राप्यते कामस्तपः सर्वार्थसाधनम् ॥

तपसा मोक्षमाप्नोति तपसा विन्दते महत् ।

ज्ञानविज्ञानसम्पत्तिः सौभाग्यं रूपमेव च ॥

नानाविधानि वस्तूनि तपसा लभते नरः ।

तपसा लभते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति ॥

नातप्ततपसो यान्ति ब्रह्मलोकं कदाचन ।

नातप्ततपसां प्राप्यः शंकरः परमेश्वरः ॥

यत्कार्यं किंचिदास्थाय पुरुषस्तपते तपः ।

तत्सर्वं समवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥

सुरापः परदारी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।

तपसा तरते सर्वं सर्वतश्च विमुञ्चति ॥

अपि सर्वेश्वरः स्थाणुर्विष्णुश्चैव सनातनः ।

ब्रह्मा हुताशनः शक्रो ये चान्ये तपसान्विताः ॥

अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ।

तपसा दिवि मोदन्ते समेता दैवतैः सह ॥

तपसा लभ्यते राज्यं स च शक्रः सुरेश्वरः ।

तपसापालयत्सर्वमहन्यहनि वृत्रहा ॥

सूर्याचन्द्रमसौ देवौ सर्वलोकहिते रतौ ।

तपसैव प्रकाशन्ते नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥

उमा संहिता ४४७ व्यासजी बोले- हे तपोधन! सभी वर्गों एवं विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी तपस्याका फल पुनः मुझसे ३७ कहिये ॥ ३७ ॥

सनत्कुमार बोले - हे व्यासजी! मैं द्विजातियोंके लिये सभी प्रकारकी कामनाओं एवं अर्थोंको सिद्ध करनेवाले अत्यन्त कठिन तपोऽध्यायका वर्णन करूँगा, ३८ उसे कहते हुए मुझसे आप सुनें । तप सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, सभी प्रकारके फल तपस्यासे ही प्राप्त होते ३ ९ हैं । जो निरन्तर तपका सेवन करते हैं, वे देवगणोंके साथ आनन्द प्राप्त करते हैं ॥ ३८-३९ ॥ तपसे स्वर्ग मिलता है, तपसे यश मिलता है, ४० तपस्यासे सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और तप सभी प्रकारके अर्थोंका साधन है ॥ ४० ॥

तपसे मोक्ष प्राप्त होता है, तपस्यासे परमात्मा ४१ प्राप्त होते हैं, तपस्यासे ज्ञान, विज्ञान, सम्पत्ति, सौभाग्य एवं रूप प्राप्त होता है ॥४१ ॥

मनुष्य तपस्यासे नाना प्रकारकी वस्तुएँ प्राप्त करता ४२ है, वह मनसे जिस - जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, वह सब कुछ तपस्यासे प्राप्त कर लेता है ॥ ४२ ॥

तप न करनेवाले कभी भी ब्रह्मलोक नहीं जा ४३ सकते हैं और तप न करनेवालोंके लिये कभी परमेश्वर शिवजी प्राप्त नहीं हो सकते हैं ॥ ४३ ॥

पुरुष जिस कार्यको उद्देश्य करके तप करता है, ४४ वह उसे इस लोकमें तथा परलोकमें प्राप्त कर लेता है । मदिरा पीनेवाला, परस्त्रीगमन करनेवाला, ब्रह्महत्यारा एवं गुरुपत्नीगामी भी तपस्याके प्रभावसे अपने सभी ४५ पापोंसे मुक्त हो जाता है और तर जाता है ॥ ४४-४५ ॥ सर्वेश्वर शिव, सनातन विष्णु, ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र ४६ तथा अन्य लोग भी तपस्यापरायण रहते हैं ॥ ४६ ॥

ऊर्ध्वरेता अट्ठासी हजार [ बालखिल्य आदि ] ४७ महर्षि भी तपके प्रभावसे ही देवगणोंके साथ स्वर्गमें आनन्द प्राप्त करते हैं ॥ ४७ ॥

तपस्यासे राज्य प्राप्त होता है, तपस्यासे ही ४८ वृत्रासुरका नाशकर इन्द्र देवताओंके स्वामी बने हुए हैं और प्रतिदिन सबका पालन करते हैं । तपस्याके प्रभावसे ही सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेमें लगे हुए सूर्य, ४ ९ । चन्द्रमा, नक्षत्र एवं ग्रह प्रकाशित होते हैं ॥ ४८-४९ ॥

पृष्ठ 462

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४४८ न चास्ति तत्सुखं लोके यद्विना तपसा किल तपसैव सुखं सर्वमिति वेदविदो विदुः

ज्ञानं विज्ञानमारोग्यं रूपवत्त्वं तथैव च ।

सौभाग्यं चैव तपसा प्राप्यते सर्वदा सुखम् ॥

तपसा सृज्यते विश्वं ब्रह्मा विश्वं विना श्रमम् ।

पाति विष्णुर्हरोऽप्यत्ति धत्ते शेषोऽखिलां महीम् ॥

विश्वामित्रो गाधिसुतस्तपसैव महामुने ।

क्षत्रियोऽथाभवद्विप्रः प्रसिद्धं त्रिभवे त्विदम् ॥

इत्युक्तं ते महाप्राज्ञ तपोमाहात्म्यमुत्तमम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । जगत्में ऐसा कोई सुख नहीं है, जो तपके ॥ ५० प्राप्त होता हो, तपसे ही सारा सुख प्राप्त होता बिना है-ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा है ॥ ५० ॥

ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, रूप, सौभाग्य तथा ५१ सर्वदा तपस्यासे ही प्राप्त होते हैं ॥ ५१ ॥ सुख

तपस्याके द्वारा ही ब्रह्माजी बिना श्रमके सम्पूर्ण ५२ संसारकी रचना करते हैं, विष्णु रक्षा करते हैं, शिवजी संहार करते हैं और शेषनाग सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करते हैं ॥५२ ॥

हे महामुने! गाधिपुत्र [ महर्षि ] विश्वामित्र ५३ तपस्याके प्रभावसे ही क्षत्रियसे ब्राह्मण हो गये थे; यह बात त्रैलोक्यमें प्रसिद्ध है ॥५३ ॥

हे महाप्राज्ञ! इस प्रकार मैंने तपका श्रेष्ठ माहात्म्य आपसे कहा, अब तपसे भी श्रेष्ठ [ वेदोंके ]

शृण्वध्ययनमाहात्म्यं तपसोऽधिकमुत्तमम् ॥५४ । अध्ययनकी महिमाको सुनिये ॥ ५४ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां तपोमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें तपस्याका माहात्म्यवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः पुराणमाहात्म्यनिरूपण सनत्कुमार उवाच

तपस्तपति योऽरण्ये वन्यमूलफलाशनः ।

योऽधीते ऋचमेकां हि फलं स्यात्तत्समं मुने ॥

श्रुतेरध्ययनात्पुण्यं यदाप्नोति द्विजोत्तमः ।

तदध्यापनतश्चापि द्विगुणं फलमश्नुते ॥

जगद्यथा निरालोकं जायतेऽशशिभास्करम् ।

विना तथा पुराणं ह्यध्येयमस्मान्मुने सदा ॥

तप्यमानं सदाज्ञानान्निरये योऽपि शास्त्रतः ।

सम्बोधयति लोकं तं तस्मात् पूज्यः पुराणगः ॥

सर्वेषां चैव पात्राणां मध्ये श्रेष्ठः पुराणवित् ।

पतनात् त्रायते यस्मात् तस्मात्पात्रमुदाहृतम् ॥

सनत्कुमार बोले - – हे मुने! जो वनके कन्द-मूल एवं फल खाकर अरण्यमें तपस्या करता है और १ जो वेदकी एक ऋचामात्रका अध्ययन करता है, उन दोनोंका समान फल होता है ॥१ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदके अध्ययनसे जो पुण्य प्राप्त २ करता है, उसके अध्यापनसे उसका दूना फल प्राप्त होता है । हे मुने! जैसे सूर्य और चन्द्रमाके बिना सम्पूर्ण संसार प्रकाशरहित हो जाता है, वैसे ही पुराणके ३ अध्ययनके बिना लोग ज्ञानरहित हो जाते हैं, इसलिये सदा पुराणका अध्ययन करना चाहिये ॥ २-३ ॥ पुराण जाननेवाला ही शास्त्रका उपदेश देकर ४ अज्ञानके कारण नरकमें दुःख प्राप्त करनेवाले मनुष्यको भलीभाँति बोध कराता है, इसलिये पुराणका वक्ता [ सर्वदा ] पूजनीय होता है । सत्पात्रोंमें पुराण जाननेवाला ही सर्वश्रेष्ठ है; वह पतनसे रक्षा करता है, इसलिये ५ । उसे पात्र कहा गया है ॥४-५ ॥

पृष्ठ 463

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अ ० १३ ] उमा सहिता ४४ ९ कर्तव्या पुराणज्ञे कदाचन । मर्त्यबुद्धिर्न सर्ववेत्ता ब्रह्मा विष्णुर्हरो गुरुः ॥ पुराणज्ञः

धनं धान्यं हिरण्यं च वासांसि विविधानि च ।

देयं पुराणविज्ञाय परत्रेह च शर्मणे ॥

यो ददाति महाप्रीत्या पुराणज्ञाय सज्जनः ।

शुभवस्तूनि स याति परमां गतिम् ॥

पात्राय

महीं गां वा स्यंदनांश्च गजानश्वांश्च शोभनान् ।

यः प्रयच्छति पात्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

अक्षयान्सर्वकामांश्च परत्रेह च जन्मनि ।

अश्वमेधमखस्यापि स फलं लभते पुमान् ॥

महीं ददाति यस्तस्मै कृष्टां फलवतीं शुभाम् ।

स तारयति वै वंश्यान्दश पूर्वान् दशापरान् ॥

इह भुक्त्वाखिलान् कामानन्ते दिव्यशरीरवान् ।

विमानेन च दिव्येन शिवलोकं स गच्छति ॥

न यज्ञैस्तुष्टिमायान्ति देवाः प्रोक्षणकैरपि ।

बलिभिः पुष्पपूजाभिर्यथा पुस्तकवाचनैः ॥

शम्भोरायतने यस्तु कारयेद्धर्मपुस्तकम् ।

विष्णोरर्कस्य कस्यापि शृणु तस्यापि तत्फलम् ॥

राजसूयाश्वमेधानां फलमाप्नोति मानवः ।

सूर्यलोकं च भित्त्वाशु ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥

स्थित्वा कल्पशतान्यत्र राजा भवति भूतले ।

भुङ्क्ते निष्कण्टकं भोगान्नात्र कार्या विचारणा ॥

अश्वमेधसहस्त्रस्य यत्फलं समुदाहृतम् ।

तत्फलं समवाप्नोति देवाग्रे यो जपं चरेत् ॥

इतिहासपुराणाभ्यां शम्भोरायतने शुभे नान्यत्प्रीतिकरं शम्भोस्तथान्येषां दिवौकसाम् तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्यं पुस्तकवाचनम् पुराणवेत्ताको कभी भी मनुष्यके रूपमें नहीं ६ समझना चाहिये । पुराणका ज्ञाता सर्वज्ञ, ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं गुरु है । इस लोक एवं परलोकमें [ अपने ] ७ कल्याणके लिये पुराण- वेत्ताको धन - धान्य, सुवर्ण एवं विविध वस्त्र देना चाहिये । जो सज्जन पुराण जाननेवालेको प्रेमपूर्वक शुभ वस्तुएँ प्रदान करता है, ८ वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ६-८ ॥ जो सत्पात्रको पृथ्वी, गौ, रथ, हाथी और श्रेष्ठ घोड़ा ९ देता है, उसके पुण्यके फलका श्रवण करो । वह मनुष्य इस जन्ममें तथा परलोकमें सभी अक्षय कामनाओंको १० तथा अश्वमेधयज्ञके फलको प्राप्त करता है ॥ ९ -१० ॥ जो पुराणवेत्ताको हलसे जोती गयी फसलयुक्त ११ भूमि प्रदान करता है, वह अपनेसे पूर्वकी दस पीढ़ी तथा आगे आनेवाली दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ११ ॥

वह व्यक्ति इस लोकमें सभी सुखोंका भोग १२ करके दिव्य शरीरसे युक्त होकर दिव्य विमानसे शिवलोक जाता है । देवतालोग यज्ञ, प्रोक्षण, बलि, पुष्पार्पण तथा पूजासे उतने प्रसन्न नहीं होते, जितना १३ पुराण - ग्रन्थके वाचनसे होते हैं ॥ १२-१३ ॥ जो शिवालय, विष्णुमन्दिर, सूर्यमन्दिर अथवा १४ किसी भी देवमन्दिरमें धर्मशास्त्रका वाचन कराता है, उसके फलका श्रवण कीजिये । वह मनुष्य राजसूय तथा अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है और सूर्यलोकका १५ भेदनकर ब्रह्मलोकको जाता है ॥ १४-१५ ॥ वहाँ सैकड़ों कल्पतक निवास करके वह यहाँ १६ पृथ्वीपर राजा होता है और निष्कण्टक सभी सुखोंका भोग करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥

जो किसी देवताके सान्निध्यमें जप करता है, वह १७ हजार अश्वमेधका जो फल कहा गया है, उस फलको प्राप्त करता है । शिवमन्दिरमें एवं अन्य देवमन्दिरोंमें । इतिहास - पुराणोंके वाचनके बिना शिवजीको प्रसन्न ॥ १८ करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है । इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नसे देवमन्दिरोंमें धर्मपुस्तकोंका वाचन तथा । प्रेमपूर्वक करना चाहिये, वह सभी प्रकारकी तथास्य श्रवणं प्रेम्णा सर्वकामफलप्रदम् ॥ १ ९ कामनाओंका श्रवण फल प्रदान करनेवाला है ॥ १७–१९ ॥ शिवपुराणके सुननेसे पुरुष पापहीन हो जाता है जायते नरः । और सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर [ अन्तमें ] शिवलोकको

पुराणश्रवणात् शम्भोर्निष्पापो ॥ २० । प्राप्त करता है ॥२० ॥

भुक्त्वा भोगान् सुविपुलान् शिवलोकमवाप्नुयात् 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_16_1_Front

पृष्ठ 464

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४५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ यत्पुण्यमग्निष्टोमशतेन च । सैकड़ों राजसूय एवं अग्निष्टोमयज्ञ करनेसे जो राजसूयेन तत्पुण्यं लभते शम्भोः कथाश्रवणमात्रतः ॥ २१ पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्यकी प्राप्ति शिवजी की सर्वतीर्थावगाहेन गवां कोटिप्रदानतः तत् फलं लभते शम्भोः कथाश्रवणतो मुने ये शृण्वन्ति कथां शम्भोः सदा भुवनपावनीम् ते मनुष्या न मन्तव्या रुद्रा एव न संशयः शृण्वतां शिवसत्कीर्तिं सतां कीर्तयतां च ताम् पादाम्बुजरजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः ॥

गन्तुं निःश्रेयसं स्थानं येऽभिवांछन्ति देहिनः ।

कथां पौराणिकीं शैवीं भक्त्या शृण्वन्तु ते सदा ॥

कथां पौराणिकीं श्रोतुं यद्यशक्तः सदा भवेत् ।

नियतात्मा प्रतिदिनं शृणुयाद्वा मुहूर्तकम् ॥

यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तो मानवो भवेत् ।

पुण्यमासादिषु मुने शृणुयाच्छांकरीं कथाम् ॥

शैवीं कथां हि शृण्वानः पुरुषो हि मुनीश्वर ।

स निस्तरति संसारं दग्ध्वा कर्ममहाटवीम् ॥

कथां शैवीं मुहूर्तं वा तदर्धं वा क्षणं च वा ।

शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिर्भवेत् ॥

यत्पुण्यं सर्वदानेषु सर्वयज्ञेषु वा मुने ।

शम्भोः पुराणश्रवणात्तत्फलं निश्चलं भवेत् ॥

विशेषतः कलौ व्यास पुराणश्रवणादृते ।

परो धर्मो न पुंसां हि मुक्तिध्यानपरः स्मृतः ॥

पुराणश्रवणं शम्भोर्नामसंकीर्तनं तथा ।

कल्पद्रुमफलं रम्यं मनुष्याणां न संशयः ॥

कलौ दुर्मेधसां पुंसां धर्माचारोज्झितात्मनाम् । हिताय विदधे शम्भुः पुराणाख्यं । कथा सुनानेमात्रसे हो जाती है । हे मुने! सभी तीर्थोंमें । । स्नान करनेसे तथा करोड़ों गौओंका दान करनेसे जो ॥ २२ फल मिलता है, उस फलको मनुष्य शिवकी कथा सुननेमात्रसे ही प्राप्त करता है॥२१-२२ ॥ । जो मनुष्य तीनों भुवनोंको पवित्र करनेवाली ॥ २३ शिवकथाको सुनते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं समझना चाहिये, वे साक्षात् रुद्र ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥२३ ॥

। मुनियोंने शिवजीके उत्तम यशका श्रवण करनेवाले २४ तथा उसका कीर्तन करनेवाले सत्पुरुषोंके चरणकमलकी धूलिको ही तीर्थ कहा है । जो प्राणी मोक्षकी स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सदा भक्तिपूर्वक शिवपुराणकी २५ कथा सुननी चाहिये ॥ २४-२५ ॥ यदि मनुष्य पुराणकी कथाको सदा सुननेमें २६ असमर्थ हो तो संयतचित्त होकर प्रतिदिन केवल एक मुहूर्त ही कथाका श्रवण करे । हे मुने! यदि मनुष्य प्रतिदिन कथा सुननेमें असमर्थ हो तो पवित्र महीनोंमें २७ ही शिवकी कथाका श्रवण करे ॥ २६-२७ ॥ हे मुनीश्वर! शिवकी कथाका श्रवण करता हुआ २८ वह पुरुष कर्मरूपी महारण्यको भस्म करके संसारसे पार हो जाता है । जो मनुष्य मुहूर्तमात्र अथवा उसका आधा या क्षणमात्र भी शिवकी कथाको भक्तिपूर्वक २ ९ सुनते हैं, उनकी दुर्गति नहीं होती है ॥ २८-२९ ॥ हे मुने! सभी दानों अथवा सभी यज्ञोंसे जो ३० पुण्य मिलता है, वह शिवपुराणके श्रवणसे अचल हो जाता है ॥ ३० ॥

हे व्यासजी! विशेष रूपसे कलियुगमें मनुष्योंके ३१ लिये पुराणके श्रवणसे अतिरिक्त और कोई भी श्रेष्ठ धर्म नहीं है, वही उनके लिये मोक्ष एवं ध्यानरूपी फल देनेवाला बताया गया है । शिवपुराणका श्रवण ३२ एवं शिवनामका कीर्तन मनुष्योंके लिये कल्पवृक्षका मनोरम फल है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३१-३२ ॥ कलियुगमें धर्माचरणसे रहित चित्तवाले दुर्बुद्धि मनुष्योंके हितके लिये शिवजीने शिवपुराण सुधारसम् ॥ ३३ । नामक अमृतरसका निर्माण किया है । अमृतका पान 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_16_1_Back

पृष्ठ 465

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अ ० १४ ]

एकोऽजरामरः स्याद्वै पिबन्नेवामृतं पुमान् ।

शम्भोः कथामृतापानात् कुलमेवाजरामरम् ॥

या गतिः पुण्यशीलानां यज्विनां च तपस्विनाम् ।

सा गतिः सहसा तात पुराणश्रवणात्खलु ॥

ज्ञानावाप्तिर्यदा न स्याद्योगशास्त्राणि यत्नतः ।

अध्येतव्यानि पौराणं शास्त्रं श्रोतव्यमेव च ॥

पापं संक्षीयते नित्यं धर्मश्चैव विवर्धते ।

पुराणश्रवणाज्ज्ञानी न संसारं प्रपद्यते ॥

अतएव पुराणानि श्रोतव्यानि प्रयत्नतः ।

धर्मार्थकामलाभाय मोक्षमार्गाप्तये तथा ॥

यज्ञैर्दानैस्तपोभिस्तु यत्फलं तीर्थसेवया । तत्फलं समवाप्नोति पुराणश्रवणान्नरः न भवेयुः पुराणानि धर्ममार्गेक्षणानि तु । यद्यत्र यद् व्रती स्थाता कोऽत्र पारत्रिकीं कथाम् षड्विंशति पुराणानां मध्येऽप्येकं शृणोति यः पठेद्वा भक्तियुक्तस्तु स मुक्तो नात्र संशयः अन्यो न दृष्टः सुखदो हि मार्गः पुराणमार्गे हि सदा वरिष्ठः शास्त्रं विना सर्वमिदं न भाति सूर्येण हीना इव जीवलोकाः उमासहिता ४५१ करनेवाला मात्र एक ही व्यक्ति अजर - अमर होता है, ३४ किंतु शिवकथारूपी सुधाके पानसे सम्पूर्ण कुल ही अजर - अमर हो जाता है ॥ ३३-३४ ॥ हे तात! जो गति पुण्यात्माओं, यज्ञ करनेवालों ३५ एवं तपस्वियोंकी होती है, वह गति केवल पुराणके श्रवणमात्रसे ही हो जाती है । यदि ज्ञानकी प्राप्ति न हो सके, तो यत्नपूर्वक योगशास्त्रोंका अध्ययन करना चाहिये ३६ और पुराण - शास्त्रका श्रवण करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥ पुराणका श्रवण करनेसे पापका नाश होता है और ३७ धर्मकी अभिवृद्धि होती है एवं व्यक्ति ज्ञानवान् होकर पुनः संसारके आवागमनके बन्धनमें नहीं पड़ता है । इसलिये धर्म, अर्थ, कामकी सिद्धि तथा मोक्ष - मार्गकी प्राप्तिके ३८ लिये प्रयत्नपूर्वक पुराणोंको सुनना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ यज्ञ, दान, तप एवं तीर्थसेवनसे जो फल मिलता ॥ ३ ९ है, उस फलको मनुष्य केवल पुराणश्रवणसे प्राप्त कर लेता है । यदि धर्ममार्गका प्रदर्शन करनेवाले पुराण न होते तो लोक तथा परलोककी कथाको सुनानेवाला ॥ ४० कौन व्रती रहता? ॥३ ९ -४० ॥॥ छब्बीस पुराणोंमें एक भी पुराणको जो भक्तियुक्त ॥ ४१ होकर सुनता है या पढ़ता है, वह मुक्त हो जाता है, । इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४१ ॥

अन्य कोई भी सुखप्रद मार्ग नहीं है, पुराणमार्ग । ही सर्वदा श्रेष्ठ मार्ग है । [ पुराणरूप इस अनुशासक ] शास्त्रके बिना यह संसार आलोकित नहीं होता है, जैसे ॥ ४२ । सूर्यके बिना जीवलोक आलोकयुक्त नहीं होता ॥ ४२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां पुराणमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें पुराणमाहात्म्यवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः दानमाहात्म्य तथा दानके भेदका वर्णन सनत्कुमार बोले- हे व्यासजी! जो घोरदान सनत्कुमार उवाच तथा महादान कहे गये हैं, उन्हें सदा सत्पात्रको ही शस्तानि घोरदानानि महादानानि नित्यशः । देना चाहिये, ये आत्माका उद्धार करते हैं ॥१ ॥

पात्रेभ्यस्तु प्रदेयानि आत्मानं तारयन्ति च ॥ १ हे द्विजोत्तम! सुवर्णदान, गोदान, भूमिदान — इनको भूमिदानं द्विजोत्तम । ग्रहण करनेवाला पवित्र रहता है तथा ये दान लेनेवाले हिरण्यदानं गोदानं स्वमेव तम् ॥ २ और दान देनेवाले दोनोंका उद्धार करनेवाले हैं ॥ २ ॥

गृह्णन्तो वै पवित्राणि तारयन्ति 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_16_2_Front

पृष्ठ 466

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४५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च । सुवर्णदान, गोदान एवं भूमिदान - इन उत्तम एतानि श्रेष्ठदानानि कृत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥ ३ दानोंको करके मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३ पृथ्वी सरस्वती । तुलादान, गोदान, पृथ्वीदान तथा विद्यादान- ये ॥ तुलादानानि शस्तानि गावः द्वे तु तुल्यबले शस्ते ह्यधिका च सरस्वती नित्यं ह्यनडुहो गावश्छत्रं वस्त्रमुपानहौ देयानि याचमानेभ्यः पानमन्नं तथैव च संकल्पविहितो योऽर्थो ब्राह्मणेभ्यः प्रदीयते अर्थिभ्योऽपीडितेभ्यश्च मनस्वी तेन जायते कनकं च तिला नागाः कन्या दासी गृहं रथः । मणयः कपिला गावो महादानानि वै दश गृहीत्वैतानि सर्वाणि ब्राह्मणो ज्ञानवित्सदा । ॥ ४ । प्रशस्त दान कहे गये हैं । इनमें दो दान तो समान हैं किंतु सरस्वतीदान सबसे बढ़कर है ॥४ ॥,

। नित्य दुही जानेवाली गौएँ, छत्र, वस्त्र, जूता एवं ॥ ५ अन्न - पान — ये वस्तुएँ याचकोंको देते रहना चाहिये ॥५ ॥

। • संकल्प किया गया जो द्रव्य ब्राह्मणों तथा अपीड़ित ॥ ६ याचकों को दिया जाता है, उससे दान करनेवाला मनस्वी होता है । सुवर्ण, तिल, हाथी, कन्या, दासी, गृह, रथ, ॥ ७ मणि तथा कपिला गाय - ये दस महादान हैं ॥ ६-७ ॥ ज्ञानी ब्राह्मण इन महादानोंको ग्रहणकर शीघ्र वदान्यांस्तारयेत्सद्यो ह्यात्मानं च न संशयः ॥ ८ ही दान करनेवालोंको तथा स्वयं अपनेको तार देता

सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति नराः शुद्धेन चेतसा ।

देवतास्तं प्रयच्छन्ति समन्तादिति मे श्रुतम् ॥

अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च हुताशनः ।

तस्मात् सुवर्णं दत्त्वा च दत्ताः स्युः सर्वदेवताः ॥

पृथ्वीदानं महाश्रेष्ठं सर्वकामफलप्रदम् ।

सौवर्णं च विशेषेण यत्कृतं पृथुना पुरा ॥

दीयमानां प्रपश्यन्ति पृथ्वीं रुक्मसमन्विताम् ।

सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥

अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि दानं सर्वोत्तमं मुने ।

कान्तारं यन्न पश्यन्ति यमस्य बहुदुःखदम् ॥

कुर्यात् कान्तारदानं हि विधिना शुद्धमानसः ।

न्यायार्जितेन द्रव्येण वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥

तिलप्रस्थमयीं कृत्वा धेनुं सर्वगुणान्विताम् ।

धेनुवत्सं सुवर्णं च सुदिव्यं सर्वलक्षणम् ॥

पद्ममष्टदलं कृत्वा कुंकुमाक्ताक्षतैः शुभैः ।

पूजयेत्तत्र रुद्रादीन् सर्वान् देवान् सुभक्तितः ॥

एवं सम्पूज्य तां दद्याद् ब्राह्मणाय स्वशक्तितः । है, इसमें संशय नहीं । जो मनुष्य शुद्धचित्तसे सुवर्ण दान करते हैं, उन्हें देवतालोग चारों ओरसे सब कुछ ९ देते हैं - ऐसा मैंने सुना है ॥ ८ - ९ ॥ अग्नि सर्वदेवमय हैं और सुवर्ण अग्निस्वरूप है, १० अतः सुवर्णका दान करनेसे मानो सभी देवताओंको दान दे दिया गया । पृथ्वीदान अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, उसमें भी सुवर्णमयी ११ भूमिका दान विशेष उत्तम है, जिसे पूर्वकालमें राजा पृथुने किया था ॥ १०-११ ॥ जो लोग सुवर्णसे युक्त पृथ्वीका दान होते हुए १२ अपनी आँखोंसे देखते हैं, वे सभी पापोंसे सर्वथा मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥

हे मुने! अब मैं सर्वश्रेष्ठ दानका वर्णन १३ करता हूँ, जिससे प्राणी यमराजके अति दुःखदायी असिपत्रवनको नहीं देखते हैं ॥१३ ॥

न्यायपूर्वक अर्जित किये गये धनसे खरीदे गये १४ वनका विधिपूर्वक शुद्धचित्त होकर तथा धनकी कृपणतासे रहित होकर दान करना चाहिये ॥१४ ॥

प्रस्थ परिमाणमात्र तिलके द्वारा सभी गुणोंसे १५ सम्पन्न गाय तथा सभी लक्षणोंसे युक्त दिव्य सोनेका बछड़ा बनाये और कुंकुम - मिश्रित शुभ अक्षतोंसे अष्टदल कमल बनाकर उसमें भक्तिपूर्वक रुद्र आदि १६ सभी देवताओंकी पूजा करे । इस प्रकार पूजा सम्पन्नकर अपने सामर्थ्यके अनुसार रत्न, सुवर्ण एवं सभी 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_16_2_Back

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अ ० १४ ] उमासहिता ४५३ सरत्नां सहिरण्यां च सर्वाभरणभूषिताम् ॥ १७ आभूषणोंसे अलंकृत उस धेनुको ब्राह्मणको दान दे । ततो नक्तं समश्नीयाद्दीपान् दद्यात्तु विस्तरात् । उसके बाद रातमें भोजन करे और विस्तारपूर्वक दीपोंका कार्तिक्यामिति कर्तव्यं पूर्णिमायां प्रयत्नतः ॥ १८ दान करे । कार्तिकीपूर्णिमाको प्रयत्नपूर्वक इसे करना

एवं यः कुरुते सम्यग्विधानेन स्वशक्तितः ।

यममार्गभयं घोरं नरकं च न पश्यति ॥

कृत्वा पापान्यशेषाणि सबन्धुः ससुहृज्जनः ।

दिवि संक्रीडते व्यास यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

विधितो गोश्च दानं वै सर्वोत्तममिह स्मृतम् ।

न तेन सदृशं व्यास परं दानं प्रकीर्तितम् ॥

प्रयच्छते यः कपिलां सवत्सां स्वर्णशृङ्गिकाम् ।

कांस्यपात्रां रौप्यखुरां सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥

तैस्तैर्गुणैः कामदुघा भूत्वा सा गौरुपैति तम् ।

प्रदातारं नरं व्यास परत्रेह च जन्मनि ॥

यद्यदिष्टतमं लोके तदस्ति दयितं गृहे ।

तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥

तुलापुरुषदानं हि दानानां दानमुत्तमम् ।

तुलासंरोहणं कार्यं यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥

यत्कृत्वा मुच्यते पापैर्वधबंधकृतोद्भवैः । तुलादानं महत्पुण्यं सर्वपापक्षयंकरम् तुलादानं करोति यः चाहिये ॥ १५–१८ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य अपनी शक्तिभर शास्त्रोक्त १ ९ विधि - विधानसे भलीभाँति यह दान करता है, वह | यममार्गकी भयावहतासे त्रस्त नहीं होता और भीषण नरकोंको नहीं देखता ॥ १ ९ ॥ हे व्यासजी! वह सभी तरहके पापोंको करके २० भी इस परम दानके प्रभावसे अपने बन्धु - बान्धव एवं मित्रोंके साथ चौदह इन्द्रोंके कालतक स्वर्गमें आनन्द करता है ॥२० ॥

हे व्यासजी! इस लोकमें विधानके साथ गौका २१ दान सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है । अन्य कोई भी दान उसके समान नहीं बताया गया है ॥ २१ ॥

हे व्यासजी! जो बछड़ेसहित सोनेकी सींगवाली, २२ चाँदीके खुरवाली तथा काँसेकी दोहनीयुक्त सभी लक्षणोंसे सम्पन्न कपिला गौका दान करता है, वह गाय उन - उन गुणोंसे युक्त होकर इस लोकमें और परलोकमें कामधेनु २३ बनकर उस दाताके पास उपस्थित होती है ॥ २२-२३ ॥ जो मनुष्य अक्षय फलको प्राप्त करना चाहता २४ है, वह इस लोकमें जो जो अत्यन्त अभीष्ट पदार्थ है तथा वह यदि घरमें हो तो उसे गुणवान् ब्राह्मणको प्रदान करे ॥२४ ॥

तुलापुरुषका दान सभी दानोंमें श्रेष्ठ दान है । यदि मनुष्य अपने कल्याणकी कामना करता हो तो २५ तुलादान [ अवश्य ] करे । इसे करके मनुष्य वध-बन्धनके कारण उत्पन्न होनेवाले पापोंसे छुटकारा ॥ २६ पाता है । तुलादान अतिशय पुण्यकारक और सभी तरहके पापोंको नष्ट करनेवाला है ॥ २५-२६ ॥ । सभी तरहके पापोंको करनेके बाद भी जो कृत्वा पापान्यशेषाणि यात्यसंशयम् ॥ २७ तुलादान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पाकर सर्वैस्तु पातकैर्मुक्तः स दिवं निस्सन्देह स्वर्गको जाता है ॥२७ ॥

पापं कृतं यद्दिवसे निशायां जो पाप दिनमें, रातमें, दोनों सन्ध्याओंमें, द्विसंध्ययोर्मध्यदिने निशान्ते । दोपहरमें, रात्रिके अन्तिम भागमें, तीनों कालों, शरीर, कालत्रये कायमनोवचोभिः मन एवं वाणीसे किया गया रहता है, उसे तुलापुरुष

तदपाकरोति ॥ २८ । नष्ट कर देता है ॥२८ ॥

तुलापुमान्वै

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४५४ बालेन वृद्धेन मया हि यूना विजानता ज्ञानपरेण पापम् । तत्सर्वमेवाशु कृतं मदीयं तुलापुमान् वै हरतु स्मरारिः ॥ पात्रे प्रयुक्तं द्रविणं मयाद्य प्रमाणपूर्णं निहितं तुलायाम् । तेनैव सार्धं तु ममावशेषं कृताकृतं यत्सुकृतं समेतु ॥ सनत्कुमार उवाच

एवमुच्चार्य तं दद्यात् द्विजेभ्यः सर्वदा हितः ।

नैकस्यापि प्रदातव्यं न निस्तारस्ततो भवेत् ॥

ददात्येवं तु यो व्यास तुलापुरुषमुत्तमम् ।

हत्वा पापं दिवं तिष्ठेद्यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ मैंने बाल्यावस्थामें, युवावस्थामें, वृद्धावस्थामें ज्ञान - पूर्वक या अज्ञानपूर्वक जो भी पाप किया है, मेरे द्वारा किये गये उन समस्त पापोंको तुलापुरुष महादेवजी २ ९ शीघ्र नष्ट करें ॥२ ९ ॥ अपने परिमाणके तुल्य जो भी द्रव्य तुलामें | रखकर मैंने सत्पात्रको समर्पण किया है, उसीके साथ | मेरे द्वारा किया गया तथा न किया गया सम्पूर्ण पाप ३० पुण्यरूप हो जाय ॥३० ॥

| सनत्कुमार बोले - अपने हितकी कामना करनेवाला मनुष्य इस प्रकारसे उच्चारणकर उस धनको ३१ ब्राह्मणोंको प्रदान करे । यह धन किसी एक व्यक्तिको प्रदान न करे, ऐसा करनेसे उद्धार नहीं होता ॥ ३१ ॥

हे व्यासजी! जो मनुष्य इस प्रकार उत्तम तुलापुरुष दान करता है, वह सभी पापोंको नष्टकर चौदह इन्द्रोंके ३२ । कालतक स्वर्गलोकमें वास करता है ॥ ३२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां सामान्यदानवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें सामान्यदानवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः ब्रह्माण्डदानकी महिमाके व्यास उवाच

येनैकेन हि दत्तेन सर्वेषां प्राप्यते फलम् ।

दानानां तन्ममाख्याहि मानुषाणां हितार्थतः ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु काले प्रदत्ताद्वै फलं विंदन्ति मानवाः ।

एकस्मादपि सर्वेषां दानानां तद्वदामि ते ॥

दानानामुत्तमं दानं ब्रह्माण्डं खलु मानवैः ।

दातव्यं मुक्तिकामैस्तु संसारोत्तारणाय वै ॥

ब्रह्माण्डे सकले दत्ते यत्फलं लभते नरः ।

तदेकभावादाप्नोति सप्तलोकाधिपो भवेत् ॥

यावच्चन्द्रदिवाकरौ नभसि वा यावत् स्थिरा मेदिनी तावत्सोऽपि नरः स्वबान्धवयुतः स्वर्गौकसामोकसि । प्रसंगमें पाताललोकका निरूपण व्यासजी बोले- हे सनत्कुमारजी! जिस एक ही दानके करनेसे सभी दानोंका फल मिल जाता है, १ मनुष्योंके हितके लिये उस दानको आप मुझसे कहें ॥ १ ॥

सनत्कुमार बोले — समयपर जिस एक ही दानके करनेसे मनुष्य सभी दानोंका फल प्राप्त कर २ लेता है, उसे मैं आपसे कहता हूँ, आप सुनिये ॥२ ॥

सभी दानोंमें ब्रह्माण्डका दान निश्चय ही श्रेष्ठ ३ है, मुक्तिकी कामना करनेवाले मनुष्योंको संसारसे पार होनेके लिये यह दान अवश्य करना चाहिये ॥ ३ ॥

मनुष्य सभी दानोंको करनेसे जिस फलको प्राप्त ४ करता है, उतना ही फल ब्रह्माण्डके दानसे प्राप्त करता है और वह सातों लोकोंका स्वामी भी हो जाता है । जबतक आकाशमें चन्द्रमा एवं सूर्य हैं और जबतक पृथ्वी स्थिर है, तबतक ब्रह्माण्डका दान करनेवाला वह मनुष्य अपने बन्धु - बान्धवोंके साथ सम्पूर्ण कामनाओंको

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अ ० १५ ] उमासहिता ४५५ सर्वेष्वेव मनोनुगेषु ककुभि-ब्रह्माण्डदः क्रीडते पश्चाद्याति पदं सुदुर्लभतरं देवैर्मुदे माधवम् ॥ व्यास उवाच

भगवन् ब्रूहि ब्रह्माण्डं यत्प्रमाणं यदात्मकम् ।

यदाधारं यथाभूतं येन मे प्रत्ययो भवेत् ॥

सनत्कुमार उवाच

मुने शृणु प्रवक्ष्यामि यदुत्सेधं तु विस्तरम् ।

ब्रह्माण्डं तत्तु संक्षेपाच्छ्रुत्वा पापात्प्रमुच्यते ॥

यत्तत्कारणमव्यक्तं व्यक्तं शिवमनामयम् ।

तस्मात्संजायते ब्रह्मा द्विधाभूताद्धि कालतः ॥

ब्रह्माण्डं सृजति ब्रह्मा चतुर्दशभवात्मकम् ।

तद्वच्मि क्रमतस्तात समासाच्छृणु यत्नतः ॥

पातालानि तु सप्तैव भुवनानि तथोर्ध्वतः ।

उच्छ्रायो द्विगुणस्तस्य जलमध्ये स्थितस्य च ॥

तस्याधारः स्थितो नागः स च विष्णुः प्रकीर्तितः ।

ब्रह्मणो वचसां हेतोर्बिभर्ति सकलं त्विदम् ॥

शेषस्यास्य गुणान् वक्तुं न शक्ता देवदानवाः ।

योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवर्षिगणपूजितः ॥

शिरःसहस्त्रयुक्तः स सर्वा विद्योतयन्दिशः ।

फणामणिसहस्त्रेण स्वस्तिकामलभूषणः ॥

मदाघूर्णितनेत्रोऽसौ साग्निः श्वेत इवाचलः ।

स्रग्वी किरीटी ह्याभाति यः सदैवैककुण्डलः ॥

साभ्रगङ्गाप्रवाहेन श्वेतशैलोपशोभितः ।

नीलवासा मदोद्रिक्तः कैलासाद्रिरिवापरः ॥

लाङ्गलासक्तहस्ताग्रो बिभ्रन्मुसलमुत्तमम् । योऽर्च्यते नागकन्याभिः स्वर्णवर्णाभिरादरात् प्राप्तकर देवताओंके घर स्वर्गमें आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करता है और बादमें देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ विष्णुपदको प्राप्त करता है ॥ ४-५ ॥ ५ व्यासजी बोले- हे भगवन्! इस ब्रह्माण्डका प्रमाण, इसका स्वरूप, इसका आधार और यह जिस रूपमें उत्पन्न हुआ है — यह सब मुझे बताइये, जिससे ६ मुझे विश्वास हो जाय ॥६ ॥

सनत्कुमार बोले – हे मुने! सुनिये, मैं संक्षेपमें

इस ब्रह्माण्डकी ऊँचाई तथा विस्तारको कहता हूँ ।

७ इसे सुनकर व्यक्ति पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥७ ॥

इसके कारणभूत, अव्यक्त, व्यक्त तथा निर्विकार ८ जो शिव हैं, दो भागों में ( प्रकृति तथा पुरुषके रूपमें ) विभक्त हुए उन्हीं कालस्वरूपसे ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं । तब ब्रह्माजी चौदह भुवनवाले ब्रह्माण्डकी रचना ९ करते हैं । हे तात! मैं क्रमसे संक्षेपमें उसे कहता हूँ, आप सावधान होकर सुनिये ॥ ८ - ९ ॥ जलके मध्यमें स्थित ब्रह्माण्डके नीचे सात १० पाताल हैं और ऊपर ( स्वर्गादि ) सात भुवन हैं । उनकी ऊँचाई क्रमशः एककी अपेक्षा दुगुनी है ॥ १० ॥

सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके आधार शेषनाग हैं, उन्हींको ११ विष्णु कहा गया है । ब्रह्माकी आज्ञाके अनुसार वे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं ॥११ ॥

शेषनागके इन गुणोंका वर्णन करनेमें देवता तथा

१२ दानव भी समर्थ नहीं हैं, उन्हें अनन्त भी कहा जाता है ।

सिद्ध, देवता तथा ऋषिगण उनकी पूजा करते हैं ॥ १२ ॥

हजार फणोंसे युक्त वे शेषनाग अपने हजार फणोंकी १३ मणियोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं, वे फणोंपर निर्मल स्वस्तिकका आभूषण धारण करते हैं । वे मदसे घूमते हुए नेत्रोंवाले तथा अग्निसे युक्त १४ श्वेतपर्वतके समान हैं । वे माला, मुकुट तथा सर्वदा ही । एक कुण्डलको धारणकर शोभायमान हैं ॥ १३-१४ ॥ वे आकाशगंगाके प्रवाहसे युक्त श्वेतवर्णके १५ पहाड़के समान सुशोभित होते हैं । मदसे परिव्याप्त वे नील वस्त्रको धारणकर दूसरे कैलासपर्वतकी भाँति शोभित होते हैं । वे अपने आयुध हलमें हाथका अग्रभाग लगाये रहते हैं तथा उत्तम मूसल धारण किये रहते हैं । स्वर्णके समान वर्णवाली नागकन्याएँ ॥ १६ । आदरपूर्वक उनकी पूजा करती हैं॥१५-१६ ॥

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४५६ संकर्षणात्मको रुद्रो विषानलशिखोज्ज्वलः कल्पान्ते निष्क्रमन्ते यद्वक्त्रेभ्योऽग्निशिखा मुहुः दग्ध्वा जगत्त्रयं शान्ता भवन्तीत्यनुशुश्रुमः आस्ते पातालमूलस्थः सशेषः क्षितिमण्डलम् बिभ्रत्स्वपृष्ठे भूतेशः शेषोऽशेषगुणार्चितः तस्य वीर्यप्रभावश्च साकाङ्क्षैस्त्रिदशैरपि श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । वे संकर्षण नामके रुद्र विषाग्निकी ज्वालाओंसे । । अत्यन्त देदीप्यमान हैं । कल्पके अन्तमें उनके मुखोंसे ॥ १७ / अग्निकी लपटें बार - बार निकलती हैं, जो तीनों लोकोंको भस्म करके ही शान्त होती हैं - ऐसा हमने सुना है । सभी गुणोंसे अलंकृत तथा सभी प्राणियोंके स्वामी वे ॥। १८ शेष अपनी पीठपर क्षितिमण्डलको धारण करते हुए पातालके मूल स्थानमें स्थित हैं ॥ १७-१८ ॥ । देवगण इच्छा करते हुए भी उनके पराक्रमके न हि वर्णयितुं शक्यः स्वरूपं ज्ञातुमेव वा ॥ १ ९ प्रभावका वर्णन करनेमें तथा उनके स्वरूपको जाननेमें

आस्ते कुसुममालेव फणामणिशिखारुणा ।

यस्यैषा सकला पृथ्वी कस्तद्वीर्यं वदिष्यति ॥

यदा विजृम्भतेऽनन्तो मदाघूर्णितलोचनः ।

तदा चलति भूरेषा साद्रितोयाधिकानना ॥

दशसाहस्त्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम ।

अतलं वितलं चैव सुतलं च रसातलम् ॥

तलं तलातलं चाग्र्यं पातालं सप्तमं मतम् ।

भूमेरधः सप्तलोका इमे ज्ञेया विचक्षणैः ॥

उच्छ्रायो द्विगुणश्चैषां सर्वेषां रत्नभूमयः ।

रत्नवन्तोऽथ प्रासादा भूमयो हेमसम्भवाः ॥

तेषु दानवदैतेया नागानां जातयस्तथा ।

निवसन्ति महानागा राक्षसा दैत्यसम्भवाः ॥

प्राह स्वर्गसदोमध्ये पातालानीति नारदः ।

स्वर्लोकादति रम्याणि तेभ्योऽसावागतो दिवि ॥

नानाभूषणभूषाश्च मणयो यत्र सुप्रभाः । समर्थ नहीं हैं । जिनके फणोंमें स्थित मणियोंकी अरुणकान्तिसे रंजित यह सम्पूर्ण पृथ्वी [ उनके २० शिरः पृष्ठमें ] पुष्पोंकी मालाके समान विराजमान है, उनके पराक्रमका वर्णन कौन करेगा! ॥ १ ९ -२० ॥ जब मदसे घूर्णित नेत्रवाले शेषनागजी जम्भाई २१ लेते हैं, तब पर्वत, समुद्र तथा वनोंसहित यह पृथ्वी डगमगा जाती है ॥२१ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! प्रत्येक पाताल दस हजार योजन २२ विस्तार - वाला है । अतल, वितल, सुतल, रसातल, तल, तलातल एवं सातवाँ पाताल माना गया है, विद्वानोंको २३ पृथ्वीके नीचे स्थित इन सात लोकोंको जानना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ इनकी ऊँचाई एक - दूसरेसे दूनी है । इन सातों २४ लोकोंकी भूमियाँ स्वर्णमय हैं तथा भवन रत्नमय हैं और आँगन भी स्वर्णमय हैं । उनमें दानव, दैत्य, नागोंकी जातियाँ, महानाग, राक्षस तथा दैत्योंसे उत्पन्न अन्य २५ उपजातियाँ निवास करती हैं ॥ २४-२५ ॥ उन पातालादि लोकोंसे लौटकर स्वर्ग आये हुए २६ नारदजीने स्वर्गकी सभामें ऐसा कहा था कि ये पाताल स्वर्गसे भी अधिक रमणीय हैं ॥ २६ ॥

जहाँ विविध प्रकारके आभूषणोंमें विभूषित आह्लादकारिणः शुभ्राः पातालं केन तत्समम् ॥ २७ करनेवाली स्वच्छ एवं कान्तिमय मणियाँ लगी हैं, उस पातालके समान कौन लोक है! ॥ २७ ॥

दैत्यकन्याएँ एवं दानवकन्याएँ जिस पाताललोकमें पाताले कस्य न प्रीतिरितश्चेतश्च इधर - उधर शोभायमान हो रही हैं, उस लोकमें दैत्यदानवकन्याभिर्विमुक्तस्याभिजायते शोभिते । [ निवासके लिये ] किस मुक्तपुरुषकी अभिरुचि नहीं ॥ २८ | होगी? ॥ २८ ॥