शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 471–480
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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अ ० १६ ]
दिवार्करश्मयो यत्र न भवन्ति विधोर्निशि ।
शीतमातपो यत्र मणितेजोऽत्र केवलम् ॥
न
भक्ष्यभोज्यान्नपानानि भुज्यन्ते मुदितैर्भृशम् ।
यत्र न ज्ञायते कालो गतोऽपि मुनिसत्तम ॥
पुंस्कोकिलरुतं यत्र पद्मानि कमलाकराः ।
नद्यः सरांसि रम्याणि मनोज्ञान्यम्बराणि च ॥
भूषणान्यतिशुभ्राणि गन्धाढ्यं चानुलेपनम् । वीणावेणुमृदङ्गानां स्वना गेयानि च द्विज दैत्योरगैश्च भुज्यन्ते पाताले वै सुखानि च तपसा समवाप्नोति दानवैः सिद्धमानवैः उमासहिता ४५७ यहाँ दिनमें सूर्यकी तथा रातमें चन्द्रमाकी किरणें २ ९ नहीं होती हैं और यहाँ शीत तथा आतप भी नहीं रहता है, यहाँ केवल मणियोंके तेज विद्यमान हैं ॥ २ ९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! यहाँ आनन्दमग्न लोग भक्ष्य-३० भोज्य, अन्नपान आदि ग्रहण करते हैं । यहाँ बीते हुए समयका ज्ञान भी नहीं रहता है ॥ ३० ॥
हे द्विज! यहाँ नरकोकिलोंका शब्द सुनायी देता ३१ है । कमल तथा कमलोंकी खान नदियाँ, रमणीक सरोवर, मनोहर वस्त्र, अतिशय मनोरम अलंकार तथा अनुलेपन, वीणा - वेणु - मृदंगोंकी ध्वनियाँ, गीत तथा नानाविध सुख ॥ ३२ हैं, जिनका भोग दैत्य, दानव, सिद्ध, मानव एवं नागगण । करते हैं, उस पातालका आनन्द [ बहुत बड़ी ] तपस्यासे ॥ ३३ । प्राप्त किया जाता है ॥ ३१–३३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां ब्रह्माण्डकथने पाताललोकवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें ब्रह्माण्डकथनमें पाताललोकवर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः विभिन्न पापकर्मोंसे प्राप्त होनेवाले नरकोंका वर्णन और शिव - नाम - स्मरणकी महिमा सनत्कुमार उवाच
तेषां मूर्धोपरिष्टाद्वै नरकांस्तान् शृणुष्व च ।
मत्तो मुनिवरश्रेष्ठ पच्यन्ते यत्र पापिनः ॥
रौरवः शूकरो रोधस्तालो विवसनस्तथा ।
महाज्वालस्तप्तकुम्भो लवणोऽपि विलोहितः ॥
वैतरणी पूयवहा कृमिशः कृमिभोजनः ।
असिपत्रवनं घोरं लालाभक्षश्च दारुणः ॥
तथा पूयवहः प्रायो वह्निज्वालो ह्यधः शिराः ।
संदंशः कालसूत्रश्च तमश्चावीचिरोधनः ॥
श्वभोजनोऽथ रुष्टश्च महारौरवशाल्मली ।
इत्याद्या बहवस्तत्र नरका दुःखदायकाः ॥
पच्यन्ते तेषु पुरुषाः पापकर्मरतास्तु ये ।
क्रमाद्वक्ष्ये तु तान् व्यास सावधानतया शृणु ॥
कूटसाक्ष्यं तु यो वक्ति विना विप्रान् सुरांश्च गाः ।
सदानृतं वदेद्यस्तु स नरो याति रौरवम् ॥
सनत्कुमार बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! उन लोकोंके ऊपर स्थित नरकोंको मुझसे सुनिये, जहाँपर पापीजन १ दुःख भोगते हैं ॥१ ॥
रौरव, शूकर, रोध, ताल, विवसन या विशसन, २ महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विलोहित, पूयवहा वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, घोर असिपत्रवन, ३ दारुण लालाभक्ष, पूयवह, वह्निज्वाल, अधः शिरा, संदंश, कालसूत्र, तम, अवीचिरोधन, श्वभोजन, रुष्ट, ४ महारौरव, शाल्मली इत्यादि बहुतसे पीड़ादायक ५ नरक हैं॥२–५ ॥ हे व्यासजी! पापकर्ममें निरत जो पुरुष उनमें ६ दुःख भोगते हैं, मैं उनका वर्णन क्रमश: कर रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनिये ॥६ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मण, देवता एवं गौओंके पक्षको छोड़कर अन्यत्र झूठी गवाही करता है और सदा मिथ्या - भाषण करता है, वह रौरव नरकमें जाता ७ है ॥७ ॥
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४५८ भ्रूणहा स्वर्णहर्ता च गोरोधी विश्वघातकः सुरापो ब्रह्महन्ता च परद्रव्यापहारकः यस्तत्संगी स वै याति मृतो व्यास गुरोर्वधात् तप्तकुम्भे स्वसुर्मातुर्गोश्चैव दुहितुस्तथा साध्व्या विक्रयकृच्चाथ वार्द्धकी केशविक्रयी तप्तलोहेषु पच्यन्ते यश्च भक्तं परित्यजेत् ॥
अवमन्ता गुरूणां यः पश्चाद्भोक्ता नराधमः ।
देवदूषयिता चैव देवविक्रयिकश्च यः ॥
अगम्यगामी यश्चान्ते याति सप्तबलं द्विज । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ । हे व्यासजी! भ्रूणहत्या करनेवाला, स्वर्ण ॥ ८ चुरानेवाला , गायोंको रोकनेवाला, विश्वासघाती | सुरापान करनेवाला, ब्राह्मणका वध करनेवाला, दूसरोंके । । द्रव्यको चुरानेवाला तथा इनका साथ देनेवाला और ॥ ९ गुरु, माता, गौ तथा कन्याका वध करनेवाला मरनेपर तप्तकुम्भ नामक नरकमें जाता है ॥ ८ - ९ ॥ । साध्वी स्त्रीको बेचनेवाला, [ अधिक ] ब्याज १० लेनेवाला, व्यभिचारी अथवा केशका विक्रय करनेवाला और जो अपने भक्तका त्याग कर देता है — ये सब तप्तलोह नामक नरकमें दुःख भोगते हैं ॥ १० ॥
हे द्विज! जो अधम मनुष्य गुरुओंका अपमान ११ करनेवाला, दुर्वचन कहनेवाला, वेदनिन्दक, वेदोंको बेचनेवाला तथा अगम्या स्त्रीके साथ संसर्ग करनेवाला है, वह अन्तमें सप्तबल नामक नरकमें जाता है ॥११३ ॥
चौरो गोघ्नो हि पतितो मर्यादादूषकस्तथा ॥१२ जो चोर, गोहत्यारा, पतित, मर्यादाको तोड़नेवाला,
देवद्विजपितृद्वेष्टा रत्नदूषयिता च यः ।
स याति कृमिभक्षं वै कृमीनत्ति दुरिष्टिकृत् ॥
पितृदेवसुरान् यस्तु पर्यश्नाति नराधमः ।
लालाभक्षं स यात्यज्ञो यः शास्त्रकूटकृन्नरः ॥
यश्चान्त्यजेन संसेव्यो ह्यसद्ग्राही तु यो द्विजः ।
अयाज्ययाजकश्चैव तथैवाभक्ष्यभक्षकः ॥
रुधिरौघे पतन्त्येते सोमविक्रयिणश्च ये ।
मधुहा ग्रामहा याति क्रूरां वैतरणीं नदीम् ॥
नवयौवनमत्ताश्च मर्यादाभेदिनश्च ये ।
ते कृम्यं यान्त्यशौचाश्च कुलटाजीविनश्च ये ॥
असिपत्रवनं याति वृक्षच्छेदी वृथैव यः । देवता - ब्राह्मण - पितरोंसे द्वेष करनेवाला, रत्नोंको दूषित करनेवाला, दूषित यज्ञ करनेवाला है, वह पापी १३ कृमिभक्ष नरकमें जाता है और वहाँ कीड़ोंका भोजन करता है॥१२-१३ ॥ जो नराधम पितरों एवं देवताओंको अर्पण किये १४ बिना खाता है एवं जो शास्त्रोंमें कुतर्क करता है, वह मूर्ख लालाभक्ष नामक नरकमें जाता है ॥ १४ ॥
जो द्विज अन्त्यजसे सेवा कराता है, नीचोंसे १५ प्रतिग्रह ग्रहण करता है, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ कराता है एवं अभक्ष्य वस्तुओंका भक्षण करता है और जो सोमका विक्रय करता है- ये सब रुधिरौघ १६ नामक नरकमें जाते हैं । मधुका हरण करनेवाला तथा ग्रामका ध्वंस करनेवाला घोर वैतरणी नदीमें जाता है ॥ १५-१६ ॥ जो नव यौवनसे मदमत्त होकर मर्यादाका उल्लंघन १७ करते हैं, अपवित्र रहते हैं और कुलटा स्त्रियोंसे जीविका चलाते हैं, वे कृमि नामक नरकमें जाते हैं ॥ १७ ॥
जो व्यर्थमें वृक्षोंको काटता है, वह असिपत्रवनको जाता है । चाकूसे काटकर जीविका - यापन करनेवाले अर्थात् मांसविक्रयी तथा मृगोंका वध करनेवाले क्षुरभ्रका मृगव्याधा वह्निज्वाले पतन्ति ते ॥ १८ | वह्निज्वाल नामक नरकमें जाते हैं ॥१८ ॥
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अ ० १६ ] उमासहिता ४५ ९ भ्रष्टाचारो हि यो विप्रः क्षत्रियो वैश्य एव च । हे द्विज! भ्रष्टाचार करनेवाला ब्राह्मण, यात्यन्ते द्विज तत्रैव यः श्वपाकेषु वह्निदः ॥ १ ९ क्षत्रिय तथा वैश्य उसी वह्निज्वाल नरकमें जाते
व्रतस्य लोपका ये च स्वाश्रमाद्विच्युताश्च ये ।
संदंशयातनामध्ये पतन्ति भृशदारुणे ॥
वीर्यं स्वप्नेषु स्कंदेयुर्ये नरा ब्रह्मचारिणः ।
नाध्यापिता यैश्च ते पतन्ति श्वभोजने ॥
पुत्रा
एते चान्ये च नरकाः शतशोऽथ सहस्रशः ।
येषु दुष्कृतकर्माणः पच्यन्ते यातनागताः ॥
तथैव पापान्येतानि तथान्यानि सहस्रशः ।
भुज्यन्ते यानि पुरुषैर्नरकान्तरगोचरैः ॥
वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वंति ये नराः ।
कर्मणा मनसा वाचा निरये तु पतन्ति ते ॥
अधः शिरोभिर्दृश्यन्ते नारका दिवि दैवतैः ।
देवानधोमुखान् सर्वानधः पश्यन्ति नारकाः ॥
स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च पक्षिणः पशवो नराः ।
धार्मिकास्त्रिदशास्तद्वन्मोक्षिणश्च यथाक्रमम् ॥
यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः । पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः गुरूणि गुरुभिश्चैव लघूनि लघुभिस्तथा । प्रायश्चित्तानि कालेय मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् यानि तेषामशेषाणां कर्माण्युक्तानि तेषु वै हैं और आग लगानेवाला श्वपाक नामक नरकमें जाता है ॥१ ९ ॥ जो व्रतका लोप करनेवाले हैं और जो अपने २० आश्रमसे च्युत हो गये हैं, वे अत्यन्त भयानक संदंश नामक नरकमें जाते हैं ॥ २० ॥
जो ब्रह्मचारी मनुष्य स्वप्नमें वीर्य स्खलित २१ करते हैं तथा जो गृहस्थ अपने पुत्रोंको नहीं पढ़ाते हैं, वे श्वभोजन नरकमें गिरते हैं । ये सब तथा अन्य २२ भी सैकड़ों, हजारों नरक हैं, जिनमें पाप करनेवाले यातना भोगते हुए पड़े रहते हैं॥२१-२२ ॥ इसी प्रकार ये सभी तथा अन्य भी हजारों पाप २३ हैं, जिन्हें नरकोंमें पड़े हुए मनुष्य भोगते रहते हैं ॥ २३ ॥
जो मनुष्य मन, वचन तथा कर्मसे २४ वर्णाश्रमधर्मके विपरीत आचरण करते हैं, वे नरकमें गिरते हैं ॥ २४ ॥
देवगण उन नारकी प्राणियोंको नीचेकी ओर २५ शिर किये हुए देखते हैं और वे भी सभी देवताओंको नीचेकी ओर मुख किये हुए देखते रहते हैं ॥ २५ ॥
[ पापकर्मा मनुष्य ] क्रमशः उन्नति करते हुए २६ स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा, देवता तथा मुमुक्षु होते हैं और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । जितने प्राणी स्वर्गमें हैं, उतने ही नरकमें भी ॥ २७ स्थित हैं । प्रायश्चित्तसे विमुख पापी नरकको जाता है ॥ २६-२७ ॥ हे व्यास! स्वायम्भुव मनुने बड़े पापोंके लिये ॥ २८ महान् प्रायश्चित्त तथा अल्प पापोंके लिये अल्प प्रायश्चित्त कहे हैं । उन सभी पापोंके जो प्रायश्चित्त । कर्म कहे गये हैं, उनमें विशेष रूपसे शिवजीका प्रायश्चित्तमशेषेण हरानुस्मरणं परम् ॥२ ९ नामस्मरणरूप प्रायश्चित्त सबसे श्रेष्ठ है ॥ २८-२९ ॥ जिस पुरुषके चित्तमें पापकर्म करनेके अनन्तर प्रायश्चित्तं यस्य पुंसः प्रजायते । पश्चात्ताप होता है, उसके लिये तो एकमात्र शिवजीका
तु तस्यैकं शिवसंस्मरणं परम् ॥ ३० । स्मरण ही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है ॥३० ॥
कृते पापेऽनुतापोऽपि
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ ४६०
माहेश्वरमवाप्नोति मध्याह्नादिषु संस्मरन् ।
प्रातर्निशि च संध्यायां क्षीणपापो भवेन्नरः ॥ ३१
मुक्तिं प्रयाति स्वर्गं वा समस्तक्लेशसंक्षयम् ।
शिवस्य स्मरणादेव तस्य शंभोरुमापतेः ॥ ३२
पापान्तरायो विप्रेन्द्र जपहोमार्चनादि च ।
भवत्येव न कुत्रापि त्रैलोक्ये मुनिसत्तम ॥ ३३
महेश्वरे मतिर्यस्य जपहोमार्चनादिषु ।
यत्पुण्यं तत्कृतं तेन देवेन्द्रत्वादिकं फलम् ॥ ३४
पुमान्न नरकं याति यः स्मरेद् भक्तितो मुने ।
अहर्निशं शिवं तस्मात् स क्षीणाशेषपातकः ॥ ३५
नरकस्वर्गसंज्ञे वै पापपुण्ये द्विजोत्तम ।
ययोस्त्वेकं तु दुःखायान्यत्सुखायोद्भवाय च ॥ ३६
तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते ।
तत्स्माद्दुःखात्मकं नास्ति न च किंचित्सुखात्मकम् ॥ ३७
मनसः परिणामोऽयं सुखदुःखोपलक्षणः ।
ज्ञानमेव परं ब्रह्म ज्ञानं तत्त्वाय कल्पते ॥ ३८
ज्ञानात्मकमिदं विश्वं सकलं सचराचरम् ।
परविज्ञानतः किंचित् विद्यते न परं मुने ॥ ३ ९
एवमेतन्मयाख्यातं सर्वं नरकमण्डलम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि साम्प्रतं मण्डलं भुवः ॥ ४० ।
प्रातः, रात्रि, सन्ध्या तथा मध्याह्नमें शिवका स्मरण करनेवाला मनुष्य पापरहित हो जाता है और । शिवलोकको प्राप्त करता है । उन उमापति शम्भु | शिवके स्मरणमात्रसे ही वह सभी प्रकारके दुःखोंसे | मुक्त हो जाता है और स्वर्ग अथवा मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ३१-३२ ॥ हे मुनिसत्तम! [ भगवान् शंकरके स्मरणके प्रभावसे ] इस त्रिलोकीमें कहीं भी जप, होम, अर्चन आदि सत्कर्मोंमें विघ्न नहीं होता तथा [ स्मरणकर्ताके चित्तमें ] पाप [ -का संक्रमण भी ] नहीं होता ॥ ३३ ॥
हे विप्रेन्द्र! जिसकी बुद्धि महादेवमें लगी हो, उसे जप, होम एवं पूजा आदि करनेसे जो पुण्य मिलता है, वह पुण्य प्राप्त हो जाता है एवं देवेन्द्रत्व आदिका फल प्राप्त हो जाता है । हे मुने! जो पुरुष दिन - रात भक्तिपूर्वक शिवका स्मरण करता है, वह समस्त पापोंसे रहित हो जाता है और इसीलिये
नरकमें नहीं पड़ता है ॥। ३४-३५ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! नरक एवं स्वर्ग नामका तात्पर्य पाप और पुण्य है, जिनमें नरक दुःखके लिये और स्वर्ग सुख तथा समृद्धिके लिये होता है ॥ ३६ ॥
वही एक वस्तु प्रसन्नताके लिये होकर बादमें दुःखका कारण बन जाती है । इसलिये कोई भी वस्तु न दुःख देनेवाली है और न सुख देनेवाली ॥ ३७ ॥
सुख - दुःखका उपलक्षणरूप यह तो केवल मनका परिणाममात्र है । ज्ञान ही परब्रह्म है, वह ज्ञान ही तत्त्वका बोध कराता है ॥ ३८ ॥
हे मुने! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् ज्ञानस्वरूप है, वस्तुतः परतत्त्वके विज्ञानसे बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ पदार्थ नहीं है ॥३ ९ ॥ इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण नरकोंका वर्णन कर दिया है, अब इसके बाद मैं भूमण्डलका वर्णन करूँगा ॥ ४० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां ब्रह्माण्डवर्णने नरकोद्धारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें ब्रह्माण्डवर्णनमें नरकोद्धारवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
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अ ० १७ ] उमासहिता ४६१ अथ सप्तदशोऽध्यायः ब्रह्माण्डके वर्णन - प्रसंगमें जम्बूद्वीपका निरूपण सनत्कुमार उवाच
पाराशर्य सुसंक्षेपाच्छृणु त्वं वदतो मम ।
मण्डलं च भुवः सम्यक् सप्तद्वीपादिसंयुतम् ॥
जम्बू: प्लक्षः शाल्मलिश्च कुशः क्रौञ्चश्च शाककः ।
पुष्करः सप्तमः सर्वे समुद्रैः सप्तभिर्वृताः ॥
Marat सर्पिर्दधिदुग्धजलाशयाः ।
जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यतः स्थितः ॥
तस्यापि मेरुः कालेय मध्ये कनकपर्वतः ।
प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्योजनैस्तस्य चोच्छ्रयः ॥
चतुरशीतिमानैस्तैर्द्वात्रिंशन्मूनि विस्तृतः ॥
भूमिपृष्ठस्थशैलोऽयं विस्तरस्तस्य सर्वतः ॥
मूले षोडशसाहस्रः कर्णिकाकारसंस्थितः ।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे ॥
नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः । दशसाहस्त्रिका ह्येते रत्नवन्तोऽरुणप्रभाः सहस्त्रयोजनोत्सेधास्तावद्विस्तारिणश्च ते । भारतं प्रथमं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्
हरिवर्षं ततोऽन्यद्वै मेरोर्दक्षिणतो मुने ।
रम्यकं चोत्तरे पार्श्वे तस्यांशे तु हिरण्मयम् ॥
उत्तरे कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा नवसाहस्त्रमेकैकमेतेषां मुनिसत्तम इलावृतं तु तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्त्रमुच्छ्रितम् इलावृतमृषिश्रेष्ठ चत्वारश्चात्र पर्वताः विष्कंभा रचिता मेरोर्योजिताः पुनरुच्छ्रिताः पूर्वे हि मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः विपुलः पश्चिमे भागे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्थितः सनत्कुमार बोले — हे पराशरपुत्र [ व्यासजी! ] आप सातों द्वीपोंसे समन्वित भूमण्डलका संक्षेपमें १ वर्णन करते हुए मुझसे भलीभाँति सुनिये ॥१ ॥
भूमण्डलमें जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, २ कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और सातवाँ पुष्करद्वीप है— ये सभी द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं ॥ २ ॥
लवण, इक्षुरस, घी, दही, दूध और जलके जो समुद्र हैं, इन सभीके मध्यमें जम्बूद्वीप स्थित है ॥ ३ ॥
हे व्यासजी! उसके भी मध्यमें कनकमय सुमेरु ४ पर्वत वर्तमान है, जो पृथ्वीके नीचे सोलह हजार योजन धँसा हुआ है और चौरासी हजार योजन ऊँचा है । उसका शिखर बत्तीस हजार योजन विस्तृत है । पृथ्वीतलपर ५ स्थित इस पर्वतका मूलभाग सोलह हजार योजन विस्तृत है, यह [ मेरुपर्वत पृथ्वीरूपी कमलकी ] कर्णिकाके आकारमें स्थित है । इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट ६ और निषधपर्वत और उत्तर भागमें नील, श्वेत और शृंगी पर्वत हैं । इन पर्वतोंकी लम्बाई दस हजार योजन ॥ ७ है । ये रत्नोंसे युक्त और अरुण कान्तिवाले हैं । ये हजार योजन ऊँचे हैं और उतने ही विस्तारवाले हैं ॥ ४–७ ॥ हे मुने! मेरुके दक्षिणमें प्रथम भारतवर्ष और ॥ ८ इसके बाद किम्पुरुष और हरिवर्ष है । इसके उत्तर भागमें रम्यक और उसीके पास हिरण्मयवर्ष है । उत्तरमें ९ कुरुदेश है । हे मुनिश्रेष्ठ! भारतवर्षकी भाँति इन सभीका । विस्तार नौ - नौ हजार योजन है ॥ ८-१० ॥ ॥ १० उनके मध्यमें इलावृतवर्ष है, जिसके मध्यमें । उन्नत सुमेरुपर्वत है । इस सुमेरुके चारों ओर नौ हजार ॥ ११ योजन विस्तृत इलावृतवर्ष है । हे ऋषिश्रेष्ठ! वहाँ चार । पर्वत सुमेरुपर्वतके शिखरके रूपमें अवस्थित हैं । ये ॥ १२ ऊँचाईमें सुमेरुपर्वतसे मिले हुए हैं ॥ ११-१२ ॥॥ पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल ॥ १३ और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत स्थित हैं ॥ १३ ॥
कदम्ब, जामुन, पीपल तथा वटके वृक्ष इन पिप्पलो वट एव च । पर्वतोंकी ध्वजाके रूपमें ग्यारह सौ योजन विस्तारमें
कदम्बो जम्बुवृक्षश्च पादपा गिरिकेतवः ॥ १४ । फैले हुए हैं ॥ १४ ॥
एकादशशतायामाः
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४६२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ जम्बूद्वीपस्य नाम्नो वै हेतुं शृणु महामुने । हे महामुने! जम्बूद्वीपका नाम पड़नेका कारण विराजन्ते महावृक्षास्तत्स्वभावं वदामि ते ॥ १५ आप सुनें ॥ यहाँपर [ जामुन, कदम्ब, पीपल तथा वटके ] बड़े - बड़े वृक्ष हैं, मैं उनका स्वभाव आपको बताता हूँ ॥ १५ ॥
महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च । उस जामुनके बड़े - बड़े हाथीके परिमाणवाले पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः ॥ १६ | फल पर्वतके ऊपर गिरकर फूट जाते हैं और चारों
रसेन तेषां विख्याता तत्र जम्बूनदीति वै ।
परितो वर्तते तत्र पीयते तन्निवासिभिः ॥ १७
न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा चेन्द्रियग्रहः ।
तस्यास्तटे स्थितानां तु जनानां तन्न जायते ॥ १८
तीरमृत्स्नां च सम्प्राप्य सुखवायुविशोषिताम् ।
जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम् ॥ १ ९
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे ।
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्य इलावृतम् ॥ २०
वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनः ।
विभ्राजं पश्चिमे तद्वदुत्तरे नन्दनं स्मृतम् ॥ २१
अरुणोदं महाभद्रं शीतोदं मानसं स्मृतम् ।
सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वशः ॥ २२
शीतांजन: कुरुंगश्च कुररो माल्यवांस्तथा ।
एकैकप्रमुखा मेरोः पूर्वतः केसराचलाः ॥२३
त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा ।
निषधः कपिलाद्याश्च दक्षिणे केसराचलाः ॥ २४
सिनीवासः कुसुंभश्च कपिलो नारदस्तथा ।
नागादयश्च गिरयः पश्चिमे केसराचलाः ॥ २५
शंखचूडोऽथ ऋषभो हंसो नाम महीधरः ।
कालंजराद्याश्च तथा उत्तरे केसराचलाः ॥ २६
मेरोरुपरि मध्ये हि शातकौम्भं विधेः पुरम् ।
चतुर्दशसहस्त्राणि योजनानि च संख्यया ॥ २७
अष्टानां लोकपालानां परितस्तदनुक्रमात् ।
यथादिशं यथारूपं पुरोऽष्टावुपकल्पिताः ॥ २८ ।
ओर फैल जाते हैं ॥ १६ ॥
उनके रससे जम्बू नामक विख्यात नदी चारों ओर बहती है, जिसके रसको वहाँके निवासी पीते हैं ॥ १७ ॥
उसके तटपर रहनेवाले लोगोंको पसीना, दुर्गन्ध, बुढ़ापा एवं किसी प्रकारकी इन्द्रियपीड़ा आदि नहीं होते हैं । सुखद वायुसे सुखायी गयी उसके तटकी मिट्टीसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण बन जाता है, जो सिद्धोंके द्वारा भूषणके रूपमें धारण किया जाता है ॥ १८-१९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सुमेरुपर्वतके पूर्वमें भद्राश्व तथा पश्चिममें केतुमाल नामक दो अन्य वर्ष हैं, उनके मध्यमें इलावृतवर्ष है । उसके पूर्वमें चैत्ररथ, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विभ्राज और उसके उत्तरमें नन्दनवन बताया गया है ॥ २०-२१ ॥ अरुणोद, महाभद्र, शीतोद तथा मानस नामक ये चार सरोवर कहे गये हैं, जो सब प्रकारसे देवताओंके भोगनेयोग्य हैं । शीतांजन, कुरंग, कुरर एवं माल्यवान् – ये प्रत्येक प्रमुख पर्वत मेरुके पूर्वमें कर्णिकाके केसरके समान स्थित हैं ॥ २२-२३ ॥ त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक, निषध, कपिल आदि पर्वत दक्षिणमें केसराचलके रूपमें स्थित हैं ॥ २४ ॥
सिनीवास, कुसुम्भ, कपिल, नारद, नाग आदि पर्वत पश्चिम भागमें केसराचलके रूपमें स्थित हैं ॥ २५ ॥
शंखचूड़, ऋषभ, हंस, कालंजर आदि पर्वत उत्तरमें केसराचलके रूपमें स्थित हैं ॥ २६ ॥
सुमेरुके ऊपर मध्य भागमें ब्रह्माका सुवर्णमय नगर है, जो चौदह हजार योजन विस्तृत है । उसके चारों ओर क्रमसे आठों लोकपालोंके आठ पुर उनकी दिशाओंके अनुसार तथा उनके अनुरूप निर्मित किये गये हैं ॥ २७-२८ ॥
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अ ० १७ ] उमासहिता ४६३ तस्यां च ब्रह्मणः पुर्यां प्लावयित्वेन्दुमण्डलम् । भगवान् विष्णुके चरणोंसे निकली वे गंगाजी विष्णुपादविनिष्क्रान्ता गङ्गा पतति वै नदी ॥ २ ९ चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती हुई ब्रह्माजीकी उस पुरीमें [ चारों ओर ] गिरती हैं । वे वहाँ गिरकर सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च वै क्रमात् । क्रमशः सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामक चार सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा प्रत्यपद्यत ॥३० धाराओंके रूपमें चारों दिशाओंमें प्रवाहित होती
सीता पूर्वेण शैलं हि नन्दा चैव तु दक्षिणे ।
सा चक्षुः पश्चिमे चैव भद्रा चोत्तरतो व्रजेत् ॥
गिरीनतीत्य सकलांश्चतुर्दिक्षु महांबुधिम् ।
सा ययौ प्रयता भूता गङ्गा त्रिपथगामिनी ॥
सुनीलनिषधौ यौ तौ माल्यवद्गन्धमादनौ ।
तेषां मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः ॥
भारतः केतुमालश्च भद्राश्वः कुरवस्तथा ।
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादालोकपर्वताः ॥
जठरं देवकूटश्च आयामे दक्षिणोत्तरे ।
गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चिमतो गतौ ॥
पूर्वपश्चिमतो मेरोर्निषधो नीलपर्वतः ।
दक्षिणोत्तरमायातौ कर्णिकान्तर्व्यवस्थितौ ॥
जठराद्याः स्थिता मेरोर्येषां द्वौ द्वौ व्यवस्थितौ ।
केसराः पर्वता एते श्वेताद्याः सुमनोरमाः ॥
शैलानामन्तरे द्रोण्यः सिद्धचारणसेविताः ।
सुरम्याणि तथा तासु काननानि पुराणि च ॥
सर्वेषां चैव देवानां यक्षगंधर्वरक्षसाम् । क्रीडन्ति देवदैतेयाः शैलप्रायेष्वहर्निशम् धर्मिणामालया ह्येते भौमाः स्वर्गाः प्रकीर्तिताः न तेषु पापकर्तारो यान्ति पश्यन्ति कुत्रचित् यानि किंपुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने न तेषु शोको नापत्त्यो नोद्वेगः क्षुद्भयादिकम् स्वस्थाः प्रजा निरातंकाः सर्वदुःखविवर्जिताः दशद्वादशवर्षाणां सहस्त्राणि स्थिरायुषः
हैं ॥। २ ९ -३० ॥
सुमेरुपर्वतके पूर्वमें सीता, दक्षिणमें अलकनन्दा, ३१ पश्चिममें चक्षु और उत्तरमें भद्रा नदी बहती है ॥ ३१ ॥
वे त्रिपथगामिनी गंगा सम्पूर्ण पर्वतोंको लाँघकर ३२ [ अपने चारों धारारूपोंसे ] चारों दिशाओंके महासमुद्रमें जाकर मिल जाती हैं । जो सुनील तथा निषध नामक दो पर्वत हैं और जो माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक ३३ दो पर्वत हैं, उनके मध्यमें स्थित सुमेरुपर्वत कर्णिकाके आकारमें विराजमान है ॥ ३२-३३ ॥ भारत, केतुमाल, भद्राश्व एवं कुरुवर्ष – ये ३४ लोकरूपी पद्मके पत्र हैं । इस लोकपद्मके ये मर्यादापर्वत– जठर तथा देवकूट दक्षिणसे उत्तरकी ओर फैले हैं, ३५ गन्धमादन तथा कैलास पूर्व - पश्चिममें फैले हैं । मेरुके पूर्व तथा पश्चिमकी ओर निषध तथा नीलपर्वत ३६ दक्षिणसे उत्तरकी ओर फैले हुए हैं और वे कर्णिकाके मध्य भागमें स्थित हैं ॥३४–३६ ॥ मेरुपर्वतके चारों ओर ये जठर, कैलास आदि ३७ मनोहर केसर पर्वत भलीभाँति अवस्थित हैं ॥३७ ॥
उन पर्वतोंके मध्यमें सिद्ध तथा चारणोंसे सेवित अनेक द्रोणियाँ हैं और उनमें देवताओं, ३८ गन्धर्वों एवं राक्षसोंके मनोहर नगर तथा वन विद्यमान हैं । देवता तथा दैत्य इन पर्वतनगरोंमें रात - दिन ॥ ३ ९ क्रीड़ा करते हैं ॥ ३८-३९ ॥ । [ हे मुने! ] ये धर्मात्माओंके निवासस्थान हैं ॥ ४० और पृथ्वीके स्वर्ग कहे गये हैं । उनमें पापीजन नहीं जा सकते और न तो कहीं कुछ देख ही सकते हैं ॥ ४० ॥
। हे महामुने! जो किम्पुरुष आदि आठ वर्ष हैं, ॥ ४१ उनमें न शोक, न विपत्ति, न उद्वेग, न भूख तथा न भय आदि ही रहता है । यहाँकी प्रजाएँ स्वस्थ, । निर्द्वन्द्व, सभी दुःखोंसे रहित तथा दस - बारह हजार ॥ ४२ । वर्षोंकी स्थिर आयुवाली होती हैं ॥ ४१-४२ ॥
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४६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ भौमान्यंभांसि सर्वतः । वहाँ कृतयुग एवं त्रेतायुग ही होते हैं वहाँ कृतत्रेतादिकाश्चैव स्थानेषु कल्पना ॥ ४३ सर्वत्र पृथ्वीका ही जल है और उनमें मेघ वर्षा, नहीं न तेषु वर्षते देवस्तेषु । करते हैं । इन सातों द्वीपोंमें निर्मल जल तथा सुवर्णमय सप्तस्वेतेषु नद्यश्च सुजाताः स्वर्णवालुकाः । | वालुकावाली सैकड़ों क्षुद्र नदियाँ भी बहती हैं; उनमें शतशः सन्ति क्षुद्राश्च तासु क्रीडेच्छुभो जनः ॥ ४४ | उत्तम लोग विहार करते हैं॥४३-४४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां ब्रह्माण्डकथने जम्बूद्वीपवर्षवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें ब्रह्माण्डकथनमें जम्बूद्वीपवर्षवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः भारतवर्ष तथा प्लक्ष आदि छः द्वीपोंका वर्णन सनत्कुमार उवाच
वक्ष्येऽहं भारतं वर्षं हिमाद्रेश्चैव दक्षिणे ।
उत्तरे तु समुद्रस्य भारती यत्र संसृतिः ॥ १
नवयोजनसाहस्त्रो विस्तारो ऽस्य महामुने ।
स्वर्गापवर्गयोः कर्मभूमिरेषा स्मृता बुधैः ॥ २
अतः संप्राप्यते पुंभिः स्वर्गो नरक एव च ।
भारतस्यापि वर्षस्य नव भेदान् ब्रवीमि ते ॥ ३
इन्द्रद्युम्नः कसेरुश्च ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः ॥ ४
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंभृतः ।
योजनानां सहस्त्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥ ५
पूर्वे किराता यस्य स्युर्दक्षिणे यवनाः स्थिताः ।
पश्चिमे च तथा ज्ञेया उत्तरे हि तपस्विनः ॥ ६
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भूयशः ।
इज्यायुद्धपणासेवा वर्तयन्तो व्यवस्थिताः ॥ ७
महेन्द्रो मलयः सह्यः सुदामा चर्क्षपर्वतः ।
विंध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥ ८
वेदस्मृतिपुराणाद्याः पारियात्रोद्भवा मुने ।
सर्वपापहरा ज्ञेया दर्शनात्स्पर्शनादपि ॥ ९
नर्मदा सुरसाद्याश्च सप्तान्याश्च सहस्रशः ।
विन्ध्योद्भवा महानद्यः सर्वपापहराः शुभाः ॥ १० ।
सनत्कुमार बोले – [ हे व्यास! ] अब मैं हिमालयके दक्षिण तथा समुद्रके उत्तर भागमें स्थित भारतवर्षका वर्णन करूँगा, जहाँ भारती सृष्टि है ॥१ ॥
हे महामुने! इसका विस्तार नौ हजार योजन है, विद्वानोंने इसे स्वर्ग और मोक्षकी कर्मभूमि कहा है । मनुष्य यहींसे स्वर्ग तथा नरक प्राप्त करते हैं । मैं भारतवर्षके भी नौ भेदोंको आपसे कहता हूँ ॥२-३ ॥ इन्द्रद्युम्न, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुण - [ ये आठ द्वीप हैं । ] उनमें सागरसे घिरा हुआ यह [ भारत ] नौवाँ द्वीप है । यह द्वीप हजार योजन परिमाणमें दक्षिणसे उत्तरपर्यन्त फैला हुआ है, जिसके पूर्वमें किरात तथा दक्षिण और पश्चिममें यवन स्थित हैं । इसके उत्तरमें तपस्वियोंको स्थित जानना चाहिये । इसके मध्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र क्रमशः यज्ञ, युद्ध, व्यापार तथा सेवावृत्ति करते हुए स्थित हैं॥४–७ ॥ इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, सुदामा, ऋक्ष, विन्ध्य एवं पारियात्र- ये सात कुलपर्वत हैं ॥८ ॥
हे मुने! वेद, स्मृति, पुराण आदि पारियात्रमें ही आविर्भूत हुए हैं, दर्शन तथा स्पर्शसे इन्हें सभी पापोंका नाश करनेवाला जानना चाहिये ॥९ ॥
नर्मदा, सुरसा आदि सात और इनके अतिरिक्त हजारों शुभ महानदियाँ विन्ध्यपर्वतसे उत्पन्न हुई हैं, जो सम्पूर्ण पापोंका हरण करती हैं ॥१० ॥
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अ ० १८ ] गोदावरीभीमरथीतापीप्रमुखनिम्नगाः गिरेर्विनिर्गता ऋक्षात्सद्यः पापभयापहाः ॥
सह्यपादोद्भवा नद्यः कृष्णावेण्यादिकास्तथा ।
कृतमालाताम्रपर्णीप्रमुखा मलयोद्भवाः ॥
त्रियामा चर्षिकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः ।
ऋषिकुल्या कुमार्याद्याः शुक्तिमत्पादसंभवाः ॥
नानाजनपदास्तेषु मण्डलेषु वसन्ति वै ।
आसां पिबन्ति पानीयं सरःसु विविधेषु च ॥
चत्वारि भारते वर्षे युगान्यासन् महामुने ।
कृतादीनि न चान्येषु द्वीपेषु प्रभवन्ति हि ॥
दानानि चात्र दीयन्ते सुकृतैश्चात्र याज्ञिकैः ।
तपस्तपन्ति यतयः परलोकार्थमादरात् ॥
यतो हि कर्मभूरेषा जम्बूद्वीपे महामुने ।
अत्रापि भारतं श्रेष्ठमतोऽन्या भोगभूमयः ॥
कदाचिल्लभते मर्त्यः सहस्त्रैर्मुनिसत्तम ।
अत्र जन्मसहस्त्राणां मानुष्यं पुण्यसञ्चयैः ॥
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते धन्यास्तु भारतभूमिभागे । गायन्ति देवाः किल गीतकानि भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरास्ते अवाप्य मानुष्यमयं कदाचिद् विहृत्य शंभो: परमात्मरूपे फलानि सर्वाणि तु कर्म यास्याम्यहं तत्तनुतां हि तस्य आप्स्यन्ति धन्याः खलु ते मनुष्याः सुखैर्युताः कर्मणि सन्निविष्टाः जनुर्हि येषां खलु भारतेऽस्ति ते स्वर्गमोक्षोभयलाभवन्तः लक्षयोजनविस्तारः समस्तपरिमण्डलः जम्बूद्वीपो मया ख्यातः क्षारोदधिसुसंवृतः उमासहिता ४६५ गोदावरी, भीमरथी एवं तापी आदि प्रमुख ११ नदियाँ ऋक्षपर्वतसे निकली हैं, जो शीघ्र ही पाप तथा भयका हरण करती हैं ॥ ११ ॥
इसी प्रकार कृष्णा, वेणी आदि नदियाँ सह्यपर्वतके १२ चरणोंसे निकली हैं । कृतमाला, ताम्रपर्णी आदि [ नदियाँ ] मलयाचलसे निकली हैं ॥ १२ ॥
त्रियामा, ऋषिकुल्या आदि नदियाँ महेन्द्रपर्वतसे १३ निकली हुई कही गयी हैं । ऋषिकुल्या, कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हैं ॥१३ ॥
उन मण्डलोंमें अनेक जनपद निवास करते हैं, वे १४ इन नदियों तथा अन्य सरोवरोंका जल पीते हैं ॥१४ ॥
हे महामुने! इस भारतवर्षमें ही सत्ययुग आदि १५ चारों युग होते हैं, अन्य द्वीपोंमें ये नहीं होते ॥ १५ ॥
यहींपर यज्ञ करनेवाले पुण्यात्मा लोग श्रद्धापूर्वक १६ दान करते हैं और यहींपर परलोककी प्राप्तिके लिये यतिलोग तपस्या करते हैं ॥१६ ॥
हे महामुने! जम्बूद्वीपमें यह भूमि ही कर्मभूमि १७ है, और उसमें भी यह भारतवर्ष सर्वश्रेष्ठ है, इसके अतिरिक्त अन्य सभी भोगभूमियाँ हैं ॥१७ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! यहाँपर जीव हजारों जन्मोंका १८ पुण्यसंचय होनेपर कभी - कभी मनुष्यका जन्म प्राप्त करता है ॥१८ ॥
स्वर्ग एवं मोक्षके साधनभूत इस भारतवर्षका गुणगान देवतालोग भी करते हैं । अहा! यह भारतभूमि धन्य है, जहाँ देवतालोग भी पुरुष बनकर जन्म ग्रहण ॥ १ ९ करते हैं । हम देवतालोग कब इस भारत -9 - भूमिमें । मनुष्य - जन्म पाकर परमात्मस्वरूप शिवमें अपने सारे कर्मोंका फल समर्पितकर शिवस्वरूप हो ॥ २० जायँगे ॥ १ ९ -२० ॥ सुखोंसे युक्त तथा कर्ममें निरत वे मनुष्य । निश्चय ही धन्य हैं, जिनका जन्म भारतवर्षमें होता है; क्योंकि वे स्वर्ग तथा मोक्ष दोनोंका लाभ प्राप्त ॥ २१ करते हैं ॥ २१ ॥
एक लाख योजन विस्तारवाले, सभी मण्डलोंसे । युक्त तथा क्षारसमुद्रसे घिरे हुए इस जम्बूद्वीपका वर्णन ॥ २२ । मैंने किया ॥२२ ॥
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४६६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ क्षारमुदधिं शतसाहस्त्रसम्मितम् । हे ब्रह्मन्! क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ एक लाख संवेष्ट्य ततो हि द्विगुणो ब्रह्मन् प्लक्षद्वीपः प्रकीर्तितः गोमन्तश्चैव चन्द्रश्च नारदो दर्दुरस्तथा सोमकः सुमनाः शैलो वैभ्राजश्चैव सत्तमः वर्षाचलेषु रम्येषु सहिताः सततं प्रजाः वसन्ति देवगंधर्वा वर्षेष्वेतेषु नित्यशः नाधयो व्याधयो वापि जनानां तत्र कुत्रचित् । दश वर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः
अनुतप्ता शिखी चैव पापघ्नी त्रिदिवा कृपा ।
अमृता सुकृता चैव सप्तैवात्र च निम्नगाः ॥
क्षुद्रनद्यस्तथा शैलास्तत्र सन्ति सहस्रशः ।
ताः पिबन्ति सुसंहृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ॥
न तत्रापि युगावस्था यथा स्थानेषु सप्तसु ।
त्रेतायुगसमः कालः सर्वदैव महामुने ॥
विप्रक्षत्रियवैश्यास्ते शूद्राश्च मुनिसत्तम ।
कल्पवृक्षसमानस्तु तन्मध्ये सुमहातरुः ॥
प्लक्षस्तन्नामसंज्ञो वै प्लक्षद्वीपो द्विजोत्तम ।
इज्यते तत्र भगवान् शंकरो लोकशंकरः ॥
हरिश्च भगवान् ब्रह्मा यन्त्रैर्मन्त्रैश्च वैदिकैः ।
संक्षेपेण तथा भूयः शाल्मलिं त्वं निशामय ॥
सप्तवर्षाणि तत्रैव तेषां नामानि मे शृणु ।
श्वेतोऽथ हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा ॥
वैकलो मानसश्चैव सुप्रभः सप्तमो मुने ।
शाल्मलेन तु वृक्षेण द्वीपः शाल्मलिसंज्ञकः ॥
द्विगुणेन समुद्रेण सततं संवृतः स्थितः ।
वर्षाभिव्यंजका नद्यस्तासां नामानि मे शृणु ॥
शुक्ला रक्ता हिरण्या च चन्द्रा शुभ्रा विमोचना ।
निवृत्तिः सप्तमी तासां पुण्यतोयाः सुशीतलाः ॥
सप्तैव तानि वर्षाणि चतुर्वर्णैर्युतानि च ।
भगवन्तं सदा शंभुं यजन्ते विविधैर्मखैः ॥
देवानां तत्र सान्निध्यमतीव सुमनोरमे । ॥ २३ / योजन विस्तारवाला, जो जम्बूद्वीप है, उससे दुगुने । परिमाणका प्लक्षद्वीप कहा गया है 1 । यहाँपर गोमन्त । । चन्द्र, नारद, दर्दुर, सोमक, सुमना तथा वैभ्राज नामके, ॥२४ उत्तम पर्वत हैं ॥ २३-२४ ॥ । इन मनोरम वर्षाचलोंमें प्रजाएँ, देवता एवं ॥ २५ गन्धर्व सुखपूर्वक नित्य - निरन्तर निवास करते हैं ॥ २५ ॥
यहाँपर लोगोंको आधि - व्याधि कभी नहीं होती ॥ २६ है और यहाँके मनुष्य दस हजार वर्ष जीते हैं ॥ २६ ॥
यहाँपर अनुतप्ता, शिखी, पापघ्नी, त्रिदिवा, कृपा २७ अमृता, सुकृता - ये सात नदियाँ हैं । छोटी नदियाँ तथा, | पहाड़ तो हजारोंकी संख्यामें हैं, यहाँके निवासी अत्यन्त २८ प्रसन्न होकर इन नदियोंका जल पीते हैं ॥ २७-२८ ॥ हे महामुने! इन सातों स्थानोंमें चारों युगोंकी स्थिति नहीं होती, वहाँ सदा त्रेतायुगके समान काल-२ ९ व्यवस्था है । हे मुनिसत्तम! वहाँपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र निवास करते हैं । उसके मध्यमें कल्पवृक्षके ३० समान एक बहुत बड़ा वृक्ष है । हे द्विजश्रेष्ठ! उसका नाम प्लक्ष है, इसी वृक्षके कारण इसका नाम प्लक्षद्वीप ३१ है । लोकका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर, भगवान् विष्णु तथा ब्रह्माकी पूजा यहाँपर वैदिक मन्त्रों तथा ३२ यन्त्रोंके द्वारा की जाती है । अब आप संक्षेपमें शाल्मलीद्वीपका वर्णन सुनिये ॥ २ ९ –३२ ॥ वहाँपर भी सात वर्ष हैं, उनके नाम मुझसे ३३ सुनिये । श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैकल, मानस और सातवाँ सुप्रभ । हे मुने! शाल्मली वृक्षके कारण ३४ इस द्वीपका नाम शाल्मलीद्वीप है ॥ ३३-३४ ॥ यह भी परिमाणमें दुगुने समुद्रसे निरन्तर घिरा ३५ हुआ स्थित है । वर्षोंको सूचित करनेवाली नदियाँ भी वहाँ विद्यमान हैं, उनके नाम मुझसे सुनिये । शुक्ला, रक्ता,
हिरण्या, चन्द्रा, शुभ्रा, विमोचना और सातवीं निवृत्ति ।
३६ वे सब पवित्र तथा शीतल जलवाली हैं ॥ ३५-३६ ॥
वे सातों वर्ष चारों वर्णोंसे युक्त हैं, वे लोग विविध ३७ यज्ञोंसे सदा भगवान् शिवका यजन करते हैं ॥ ३७ ॥
उस अत्यन्त मनोरम द्वीपमें देवताओंका सर्वदा सान्निध्य रहता है । यह द्वीप सुरोद नामक समुद्रसे
एष द्वीपः समुद्रेण सुरोदेन समावृतः ॥ ३८ । घिरा हुआ है ॥३८ ॥