शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 51–60
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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अ ० ८ ] शतरुद्रसंहिता ३ ९ देवर्षय ऊचुः
देवदेव प्रजानाथ सृष्टिकृल्लोकनायक ।
तत्त्वतो वद चास्मभ्यं किमेकं तत्त्वमव्ययम् ॥ १०
नन्दीश्वर उवाच
स मायया महेशस्य मोहितः पद्मसम्भवः ।
अविज्ञाय परं भावं संभावं प्रत्युवाच ह ॥ ११ ।
ब्रह्मोवाच
हे सुरा ऋषयः सर्वे सुमत्या शृणुतादरात् ।
वच्म्यहं परमं तत्त्वमव्ययं वै यथार्थतः ॥ १२
जगद्योनिरहं धाता स्वयम्भूरज ईश्वरः ।
अनादिभागहं ब्रह्म ह्येक आत्मा निरञ्जनः ॥ १३
प्रवर्तको हि जगतामहमेव निवर्त्तकः ।
संवर्तको मदधिको नान्यः कश्चित्सुरोत्तमाः ॥ १४
नन्दीश्वर उवाच
तस्यैवं वदतो धातुर्विष्णुस्तत्र स्थितो मुने ।
प्रोवाच प्रहसन्वाक्यं संक्रुद्धो मोहितोऽजया ॥। १५
न चैतदुचिता ब्रह्मन्योगयुक्तस्य मूर्खता ।
अविज्ञाय परं तत्त्वं वृथैतत्ते निगद्यते ॥ १६
कर्ताऽहं सर्वलोकानां परमात्मा परः पुमान् ।
यज्ञो नारायणो देवो मायाधीशः परागतिः ॥ १७
ममाज्ञया त्वया ब्रह्मन् सृष्टिरेषा विधीयते ।
जगतां जीवनं नैव मामनादृत्य चेश्वरम् ॥ १८
एवं विप्रकृतौ मोहात्परस्परजयैषिणौ ।
प्रोचतुर्निगमांश्चात्र प्रमाणे सर्वथा तनौ ॥ १ ९
प्रष्टव्यास्ते विशेषेण स्थिता मूर्तिधराश्च ते ।
पप्रच्छतुः प्रमाणज्ञानित्युक्त्वा चतुरोऽपि तान् ॥ २०
विधिविष्णू ऊचतुः वेदाः प्रमाणं सर्वत्र प्रतिष्ठां परमामिताः । देवता तथा ऋषि बोले- हे देवदेव! हे प्रजानाथ! हे सृष्टिकर्ता! हे लोकनायक! आप हमें ठीक - ठीक बताइये कि अद्वितीय तथा अविनाशी तत्त्व क्या है? ॥१० ॥
नन्दीश्वर बोले- शिवजीकी मायासे मोहित वे ब्रह्माजी परम तत्त्वको न समझकर सामान्य बात कहने लगे ॥ ११ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे देवताओ तथा ऋषियो! आप सब आदरपूर्वक सद्बुद्धिसे मेरी बात सुनें । मैं यथार्थ रूपसे अव्यय परम तत्त्वको बता रहा हूँ ॥ १२ ॥
मैं जगत्का मूल कारण हूँ । मैं धाता, स्वयम्भू, अज, ईश्वर, अनादिभाक्, ब्रह्म, अद्वितीय एवं निरंजन आत्मा हूँ । मैं ही सारे जगत्का प्रवर्तक, संवर्तक तथा निवर्तक हूँ । हे श्रेष्ठ देवताओ! मुझसे बड़ा दूसरा कोई नहीं है॥१३-१४ ॥ नन्दीश्वर बोले – हे मुने! जब ब्रह्माजी इस बातको कह रहे थे, उसी समय वहाँ स्थित विष्णुने सनातनी मायासे विमोहित होकर हँसते हुए क्रुद्ध होकर यह वचन कहा— ॥ १५ ॥
हे ब्रह्मन्! योगसे युक्त होते हुए भी आपकी यह मूर्खता उचित नहीं है । परमतत्त्वको न जानकर आप यह व्यर्थ बोल रहे हैं ॥ १६ ॥
सम्पूर्ण लोकोंका कर्ता, परमपुरुष, परमात्मा, यज्ञस्वरूप नारायण, मायाधीश एवं परमगति प्रभु मैं ही हूँ ॥१७ ॥
हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञासे ही इस सृष्टिकी रचना करते हैं । मुझ ईश्वरका अनादरकर यह जगत् किसी भी प्रकार जीवित नहीं रह सकता ॥१८ ॥
इस प्रकार परस्पर तिरस्कृत होकर वे दोनों ही अर्थात् ब्रह्मा एवं विष्णु मोहवश एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छाकर आपसमें विवाद करते हुए अपने - अपने विषयमें वेदप्रामाण्यकी अपेक्षासे प्रमाणतत्त्वज्ञ, मूर्तिधारी चारों वेदोंके पास जाकर पूछने लगे— ॥ १ ९ -२० ॥ ब्रह्मा एवं विष्णु बोले- हे वेदो! आपलोगोंका सर्वत्र प्रामाण्य है और आपलोगोंको परम प्रतिष्ठा भी प्राप्त हुई है, अतः विश्वासपूर्वक कहिये कि एकमात्र
यूयं वदत विश्रब्धं किमेकं तत्त्वमव्ययम् ॥ २१ । अविनाशी तत्त्व क्या है? ॥२१ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ ४० नन्दीश्वर बोले- उन दोनोंका यह वचन सुनकर नन्दीश्वर उवाच | ऋक् आदि सभी वेद परमेश्वर शिवका स्मरण करते
इत्याकर्ण्य तयोर्वाचं पुनस्ते हि ऋगादयः । यथार्थ बात कहने लगे ॥ २२ ॥
अवदंस्तत्त्वतः सर्वे परेशं संस्मरन् प्रभुम् ॥ २२ हुए हे सृष्टिस्थितिकर्ता, सर्वव्यापी देवो! यदि
यदि मान्या वयं देवौ सृष्टिस्थितिकरौ विभू ।
तदा प्रमाणं वक्ष्यामो भवत्सन्देहभेदकम् ॥ २३
नन्दीश्वर उवाच
श्रुत्युक्तविधिमाकर्ण्य प्रोचतुस्तौ सुरौ श्रुतीः ।
युष्मदुक्तं प्रमाणं नौ किं तत्त्वं सम्यगुच्यताम् ॥ २४
ऋग्वेद उवाच
यदन्तःस्थानि भूतानि यतः सर्वं प्रवर्त्तते ।
यदाहुः परमं तत्त्वं स रुद्रस्त्वेक एव हि ॥ २५
यजुर्वेद उवाच
यो यज्ञैरखिलैरीशो योगेन च समिज्यते ।
येन प्रमाणं खलु नः स एकः सर्वदृक् शिवः ॥ २६
सामवेद उवाच
येनेदं भ्रम्यते विश्वं योगिभिर्यो विचिन्त्यते ।
यद्भासा भासते विश्वं स एकस्त्र्यम्बकः परः ॥ २७
अथर्वणवेद उवाच
यं प्रपश्यन्ति देवेशं भक्त्यनुग्रहिणो जनाः ।
तमाहुरेकं कैवल्यं शङ्करं दुःखतः परम् ॥ २८
नन्दीश्वर उवाच
श्रुत्युक्तमिदमाकर्ण्यतीव मायाविमोहितौ ।
स्मित्वाहतुर्विधिहरी निगमांस्तान्विचेतनौ ॥ २ ९
विधिहरी ऊचतुः
हे वेदाः किमिदं यूयं भाषन्ते गतचेतनाः ।
किं जातं वोऽद्य सर्वं हि नष्टं सुवयुनं परम् ॥ ३०
कथं प्रमथनाथोऽसौ रममाणो निरन्तरम् । दिगम्बरः पीतवर्णो शिवया धूलिधूसरः ॥ ३१ विरूपवेषो जटिलो वृषगो व्यालभूषणः परं ब्रह्मत्वमापन्नः क्व च तत्संगवर्जितम् । ॥ ३२ | हम [ आपलोगोंको ] मान्य हैं, तो आपलोगोंके सन्देहको दूर करनेवाले प्रमाणको हमलोग कह रहे हैं ॥ २३ ॥
नन्दीश्वर बोले- वेदोंके द्वारा कही गयी विधिको | सुनकर ब्रह्मा एवं विष्णुने वेदोंसे कहा कि जो कुछ / भी आपलोग कहेंगे, वही प्रमाण हमलोग मान लेंगे अतः तत्त्व क्या है, इसे भलीभाँति कहें ॥२४ ॥,
ऋग्वेद बोला – जिनके भीतर सम्पूर्ण भूत स्थित हैं, जिनसे सब कुछ प्रवृत्त होता है एवं जिन्हें परम तत्त्व कहते हैं, वे एकमात्र रुद्र ही हैं ॥ २५ ॥
यजुर्वेद बोला — मनुष्य योग एवं समस्त यज्ञोंके द्वारा जिन ईश्वरकी आराधना करता है और जिनसे निश्चय ही हमलोग प्रमाणित हैं, वे एकमात्र सबके द्रष्टा शिव ही परमतत्त्व हैं ॥ २६ ॥
सामवेद बोला — यह जगत् जिनके द्वारा भ्रमण कर रहा है, योगीजन जिनका चिन्तन करते हैं और जिनके प्रकाशसे यह संसार प्रकाशित हो रहा है, वे एकमात्र त्र्यम्बक शिव ही परमतत्त्व हैं ॥ २७ ॥
अथर्ववेद बोला - जिनकी भक्तिका अनुग्रह प्राप्तकर भक्तजन उनका साक्षात्कार करते हैं, उन्हीं दुःखरहित एवं कैवल्यस्वरूप एकमात्र शंकरको परमतत्त्व कहा गया है ॥२८ ॥
नन्दीश्वर बोले- वेदोंका यह वचन सुनकर शिवजीकी मायासे अत्यन्त विमोहित ब्रह्मा एवं विष्णु अचेतसे हो गये, फिर मुसकराकर उन वेदोंसे कहने लगे— ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मा एवं विष्णु बोले — हे वेदो! आपलोग चेतनाहीन होकर यह क्या प्रलाप कर रहे हैं? आज आपलोगोंको क्या हो गया है? अवश्य ही आपलोगोंका सारा श्रेष्ठ ज्ञान नष्ट हो गया है ॥३० ॥
प्रमथनाथ, दिगम्बर, पीतवर्णवाले, धूलिधूसरित, निरन्तर पार्वतीके साथ रमण करनेवाले, अत्यन्त विकृत रूपवाले, जटाधारी, बैलपर सवारी करनेवाले तथा सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले वे शिव निःसंग परम ब्रह्म किस प्रकार हो सकते हैं? ॥ ३१-३२ ॥
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अ ० ८ ] शतरुद्रसंहिता ४१
इत्युदीरितमाकर्ण्य प्रणवः सर्वगस्तयोः ।
अमूर्तो मूर्तिमान्प्रीत्या जृम्भमाण उवाच तौ ॥ ३३
प्रणव उवाच
न हीशो भगवान् शक्त्या ह्यात्मनो व्यतिरिक्तया ।
कदाचिद्रमते रुद्रो लीलारूपधरो हरः ॥ ३४
असौ हि परमेशानः स्वयंज्योतिः सनातनः ।
आनन्दरूपा तस्यैषा शक्तिर्नागन्तुकी शिवा ॥ ३५
नन्दीश्वर उवाच
इत्येवमुक्तोऽपि तदा विधेर्विष्णोश्च वै तदा ।
नाज्ञानमगमन्नाशं श्रीकण्ठस्यैव मायया ॥ ३६
प्रादुरासीत्ततो ज्योतिरुभयोरन्तरे महत् ।
पूरयन्निजया भासा द्यावाभूम्योर्यदन्तरम् ॥ ३७
ज्योतिर्मण्डलमध्यस्थो ददृशे पुरुषाकृतिः ।
विधिक्रतुभ्यां तत्रैव महाद्भुततनुर्मुने ॥ ३८
प्रजज्वालाथ कोपेन ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः ।
आवयोरन्तरे कोऽसौ बिभृयात्पुरुषाकृतिम् ॥ ३ ९
विधिः संभावयेद्यावत्तावत्स त्रिविलोचनः ।
दृष्टः क्षणेन च महापुरुषो नीललोहितः ॥ ४०
त्रिशूलपाणिर्भालाक्षो नागोडुपविभूषणः ।
हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा विहसन्प्राह मोहितः ॥ ४१
ब्रह्मोवाच
नीललोहित जाने त्वां मा भैषीश्चन्द्रशेखर ।
भालस्थलान्मम पुरा रुद्रः प्रादुरभूद्भवान् ॥ ४२
रोदनाद् रुद्रनामापि योजितोऽसि मया पुरा ।
मामेव शरणं याहि पुत्र रक्षां करोमि ते ॥ ४३
नन्दीश्वर उवाच
अथेश्वरः पद्मयोनेः श्रुत्वा गर्ववतीं गिरम् ।
चुकोपातीव च तदा कुर्वन्निव लयं मुने ॥ ४४
उस समय उन दोनोंकी इस बातको सुनकर सर्वत्र व्यापक तथा निराकार प्रणवने मूर्तिमान् प्रकट होकर उनसे कहा- ॥ ३३ ॥
प्रणव बोला- लीलारूपधारी, हर भगवान् रुद्र अपनी शक्तिके बिना कभी भी रमण करनेमें समर्थ नहीं होते ॥३४ ॥
ये परमेश्वर शिव सनातन तथा स्वयं ज्योतिःस्वरूप हैं और ये शिवा उन्हींकी आह्लादिनी शक्ति हैं, अतः आगन्तुक नहीं हैं, अपितु उन्हींके समान नित्य [ तथा उनसे अभिन्न ] हैं ॥ ३५ ॥
नन्दीश्वर बोले- उस समय ॐकारके इस प्रकार कहनेपर भी शिवमायासे मोहित ब्रह्मा एवं विष्णुका अज्ञान जब दूर नहीं हुआ, तब उसी समय अपने प्रकाशसे पृथ्वी तथा आकाशके अन्तरालको पूर्ण करती हुई एक महान् ज्योति उन दोनोंके बीचमें प्रकट हो गयी ॥ ३६-३७ ॥ हे मुने! उस ज्योतिसमूहके बीचमें स्थित एक अत्यन्त अद्भुत शरीरवाले पुरुषको ब्रह्मा एवं विष्णुने देखा ॥३८ ॥
तब क्रोधके कारण ब्रह्माजीका पाँचवाँ सिर जलने लगा कि हम दोनोंके मध्य यह पुरुषशरीरको धारण किये हुए कौन है? ॥ ३ ९ ॥ जबतक ब्रह्माजी यह विचार कर ही रहे थे कि इतनेमें उसी क्षण वह महापुरुष त्रिलोचन, नीललोहित सदाशिवके रूपमें दिखायी पड़ा । हाथमें त्रिशूल धारण किये, मस्तकपर नेत्रवाले, सर्प एवं चन्द्रमाको भूषणके रूपमें धारण किये उन्हें देखकर मोहित हुए ब्रह्माजी हँसते हुए कहने लगे— ॥ ४०-४१ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे नीललोहित! हे चन्द्रशेखर! मैं तुम्हें जानता हूँ, डरो मत । तुम पूर्व समयमें मेरे ललाट-प्रदेशसे रोते हुए उत्पन्न हुए थे । पहले मैंने ही रोनेके कारण तुम्हारा नाम रुद्र रखा था । हे पुत्र! मेरी शरणमें आओ, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा ॥ ४२-४३ ॥ नन्दीश्वर बोले — हे मुने! उसके बाद ब्रह्माकी अहंकारयुक्त वाणी सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रोधित हुए, उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो प्रलय | कर देंगे ॥४४ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ ४२ उस समय परमेश्वर शिव अपने क्रोधके स कोपतः समुत्पाद्य पुरुषं भैरवं क्वचित् । तेजसे देदीप्यमान भैरव नामक एक द्वारा प्रज्वलन्तं प्रीत्या च परमेश्वरः ॥ ४५ परम पुरुषको सुमहसा ईश्वर उवाच
प्राक् च पंकजजन्मासौ शास्यस्ते कालभैरव ।
कालवद्राजसे साक्षात्कालराजस्ततो भवान् ॥४६
विश्वं भर्त्तुं समर्थोऽसि भरणाद्भैरवः स्मृतः ।
त्वत्तो भेष्यति कालोऽपि ततस्त्वं कालभैरवः ॥ ४७
आमर्दयिष्यति भवान्रुष्टो दुष्टात्मनो यतः ।
आमर्दक इति ख्यातिं ततः सर्वत्र यास्यसि ॥ ४८
यतः पापानि भक्तानां भक्षयिष्यसि तत्क्षणात् ।
पापभक्षण इत्येव तव नाम भविष्यति ॥ ४ ९
या मे मुक्तिपुरी काशी सर्वाभ्योऽपि गरीयसी ।
आधिपत्यं च तस्यास्ते कालराज सदैव हि ॥ ५०
तत्र ये पातकिनरास्तेषां शास्ता त्वमेव हि ।
शुभाशुभं च तत्कर्म चित्रगुप्तो लिखिष्यति ॥ ५१
नन्दीश्वर उवाच
एतान्वरान्प्रगृह्याथ तत्क्षणात्कालभैरवः ।
वामांगुलिनखाग्रेण चकर्त च विधेश्शिरः ॥ ५२
यदंगमपराध्नोति कार्यं तस्यैव शासनम् ।
अतो येन कृता निन्दा तच्छिन्नं पञ्चमं शिरः ॥ ५३
अथ छिन्नं विधिशिरो दृष्ट्वा भीततरो हरिः ।
शातरुद्रियमन्त्रैश्च भक्त्या तुष्टाव शङ्करम् ॥५४
भीतो हिरण्यगर्भोऽपि जजाप शतरुद्रियम् ।
इत्थं तौ गतगर्वौ हि संजातौ तत्क्षणान्मुने ॥ ५५
परब्रह्म शिवः साक्षात्सच्चिदानन्दलक्षणः ।
परमात्मा गुणातीत इति ज्ञानमवापतुः ॥ ५६
सनत्कुमार सर्वज्ञ शृणु मे परमं शुभम् । यावद्रवों भवेत्तावज्ज्ञानगुप्तिर्विशेषतः ॥ ५७ उत्पन्न करके प्रेमपूर्वक [ उससे कहने लगे - ] ॥ ४५ ॥
ईश्वर बोले — हे कालभैरव! सर्वप्रथम तुम इस पद्मयोनि ब्रह्माको दण्ड दो, तुम साक्षात् कालके सदृश | शोभित हो रहे हो, अत: तुम कालराज [ नामसे विख्यात ] होओगे ॥ ४६ ॥
तुम संसारका पालन करनेमें सर्वथा समर्थ हो, उसका भरण - पोषण करनेसे तुम भैरव कहे गये हो, तुमसे काल भी डरेगा । अतः तुम कालभैरव कहे जाओगे ॥४७ ॥
तुम रुष्ट होनेपर दुष्टात्माओंका मर्दन करोगे, इसलिये सर्वत्र आमर्दक नामसे विख्यात होओगे ॥ ४८ ॥
तुम भक्तोंके पापोंका तत्काल भक्षण करोगे, इसलिये तुम्हारा नाम पापभक्षण भी होगा ॥ ४ ९ ॥ हे कालराज! सभी पुरियोंसे श्रेष्ठ जो मेरी मुक्तिपुरी काशी है, तुम सदा उसके अधिपति बनकर रहोगे । वहाँ जो पापी मनुष्य होंगे, उनके शासक तुम ही रहोगे, उनके अच्छे - बुरे कर्मको चित्रगुप्त लिखेंगे ॥ ५०-५१ ॥ नन्दीश्वर बोले — कालभैरवने इस प्रकारके वरोंको प्राप्तकर अपनी बाँयीं अँगुलियोंके नखोंके अग्रभागसे ब्रह्माका पाँचवाँ सिर तत्क्षण ही काट डाला ॥५२ ॥
जो अंग अपराध करता है, उसीको दण्ड देना चाहिये, अतः जिस सिरने निन्दा की थी, उस पाँचवें सिरको उन्होंने काट दिया ॥५३ ॥
उसके बाद ब्रह्माके सिरको कटा हुआ देखकर विष्णु बहुत भयभीत हो गये और शतरुद्रिय मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥५४ ॥
हे मुने! तब भयभीत हुए ब्रह्माजी भी शतरुद्रिय मन्त्रका जप करने लगे । इस प्रकार वे दोनों ही उसी क्षण अहंकाररहित हो गये ॥५५ ॥
उन दोनोंको यह ज्ञान हो गया कि साक्षात् शिव ही सच्चिदानन्द लक्षणसे युक्त परमात्मा, गुणातीत तथा परब्रह्म हैं ॥ ५६ ॥
हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! मेरा यह उत्तम शुभ वचन सुनिये, जबतक अहंकार रहता है, तबतक विशेषरूपसे ज्ञान लुप्त रहता है ॥५७ ॥
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अ ० ९ ] शतरुद्रसंहिता ४३
त्यक्त्वाभिमानं पुरुषो जानाति परमेश्वरम् ।
गर्विणं हन्ति विश्वेशो जातो गर्वापहारकः ॥
अथ विष्णुविधी ज्ञात्वा विगव परमेश्वरः ।
प्रसन्नोऽभून्महादेवोऽकरोत्तावभयौ प्रभुः ॥
आश्वास्य तौ महादेवः प्रीतः प्रणतवत्सलः ।
प्राह स्वां मूर्तिमपरां भैरवं तं कपर्द्दिनम् ॥
महादेव उवाच
त्वया मान्यो विष्णुरसौ तथा शतधृतिः स्वयम् ।
कपालं वैधसं वापि नीललोहित धारय ॥
ब्रह्महत्यापनोदाय व्रतं लोकाय दर्शय ।
चर त्वं सततं भिक्षां कपालव्रतमाश्रितः ॥
इत्युक्त्वा पश्यतस्तस्य तेजोरूपः शिवोऽब्रवीत् ।
उत्पाद्य चैकां कन्यां तु ब्रह्महत्याभिविश्रुताम् ॥
यावद्वाराणसीं दिव्यां पुरीमेषां गमिष्यति ।
तावत्त्वं भीषणं कालमनुगच्छोग्ररूपिणम् ॥
सर्वत्र ते प्रवेशोऽस्ति त्यक्त्वा वाराणसीं पुरीम् । अहंकारका त्याग करनेपर ही मनुष्य ५८ परमेश्वरको जान पाता है । विश्वेश्वर शिव अहंकारी [ के अहंकार ] -का नाश करते हैं, क्योंकि वे गर्वापहारक कहे गये हैं ॥५८ ॥
इसके बाद ब्रह्मा तथा विष्णुको अहंकाररहित ५ ९ जानकर परमेश्वर महादेव प्रसन्न हो गये और उन प्रभुने उन दोनोंको भयरहित कर दिया ॥ ५ ९ ॥ प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महादेव उन्हें आश्वस्त ६० करके अपने दूसरे स्वरूप उन कपर्दी भैरवसे कहने लगे —॥६० ॥
महादेव बोले – [ हे भैरव! ] ये ब्रह्मा एवं विष्णु तुम्हारे मान्य हैं । हे नीललोहित! तुम ब्रह्माके [ कटे हुए ] ६१ इस कपालको धारण करो और ब्रह्महत्याको दूर करनेके लिये संसारके समक्ष व्रत प्रदर्शित करो, कपालव्रत ६२ धारणकर तुम निरन्तर भिक्षाचरण करो ॥ ६१-६२ ॥ इस प्रकार [ कालभैरवसे ] कहकर उनके देखते ही ब्रह्महत्या नामक कन्याको उत्पन्नकर तेजोरूप ६३ शिवजीने उससे कहा —॥६३ ॥
तुम उग्र रूप धारण करनेवाले इन भयंकर ६४ कालभैरवके पीछे - पीछे तबतक चलो, जबतक ये वाराणसीपुरीतक नहीं जाते । इनके वाराणसीमें जाते ही तुम मुक्त हो जाओगी । वाराणसीपुरीको छोड़कर वाराणसीं यदा गच्छेत्तन्मुक्तो भव तत्क्षणात् ॥ ६५ सर्वत्र तुम्हारा प्रवेश होगा ॥ ६४-६५ ॥ नन्दीश्वर उवाच नन्दीश्वर बोले- वे परम अद्भुत प्रभु भगवान् नियोज्यतामिति तदा ब्रह्महत्यां च तां प्रभुः । शंकर भी उस ब्रह्महत्याको [ उस यात्राके लिये ] महाद्भुतश्च स शिवोऽप्यन्तर्धानमगात्ततः ॥ ६६ नियुक्त करके अन्तर्हित हो गये ॥६६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीयायां शतरुद्रसंहितायां भैरवावतारवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें भैरवावतारवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः भैरवावतारलीलावर्णन नन्दीश्वर उवाच नन्दीश्वर बोले — हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! सनत्कुमार सर्वज्ञ भैरवीमपरां कथाम् । अब आप महादोषोंको दूर करनेवाली और भक्तिको शृणु प्रीत्या महादोषसंहर्त्री भक्तिवर्द्धिनीम् ॥ १ बढ़ानेवाली दूसरी भैरवी कथाको प्रेमपूर्वक सुनिये ॥१ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ ४४
तत्सान्निध्यं भैरवोऽपि कालोऽभूत्कालकालनः ।
स देवदेववाक्येन बिभ्रत्कापालिकं व्रतम् ॥ २
कपालपाणिर्विश्वात्मा चचार भुवनत्रयम् ।
नात्याक्षीच्चापि तं देवं ब्रह्महत्यापि दारुणा ॥ ३
प्रतितीर्थं भ्रमन् नापि विमुक्तो ब्रह्महत्यया ।
अतः कामारिमहिमा सर्वोऽपि ह्यवगम्यताम् ॥ ४
प्रमथैः सेव्यमानोऽपि ह्येकदा विहरन्हरः ।
कापालिको ययौ स्वैरी नारायणनिकेतनम् ॥ ५
अथायान्तं महाकालं त्रिनेत्रं सर्पकुण्डलम् ।
महादेवांशसम्भूतं पूर्णाकारं च भैरवम् ॥ ६
पपात दण्डवद्भूमौ तं दृष्ट्वा गरुडध्वजः ।
देवाश्च मुनयश्चैव देवनार्य्यः समन्ततः ॥ ७
अथ विष्णुः प्रणम्यैनं प्रयातः कमलापतिः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय तुष्टाव विविधैः स्तवैः ॥ ८
सानन्दोऽथ हरिः प्राह प्रसन्नात्मा महामुने ।
क्षीरोदमथनोद्भूतां पद्मां पद्मालयां मुदा ॥ ९
विष्णुरुवाच
प्रिये पश्याब्जनयने धन्यासि सुभगेऽनघे ।
धन्योऽहं देवि सुश्रोणि यत्पश्यावो जगत्पतिम् ॥ १०
अयं धाता विधाता च लोकानां प्रभुरीश्वरः ।
अनादिः शरणः शान्तः पुरः षड्विंशसंमितः ॥ ११
सर्वज्ञः सर्वयोगीशः सर्वभूतैकनायकः ।
सर्वभूतान्तरात्माऽयं सर्वेषां सर्वदः सदा ॥ १२
ये विनिद्रा विनिःश्वासाः शान्ताः ध्यानपरायणाः ।
धिया पश्यन्ति हृदये सोऽयं पद्मे समीक्षताम् ॥ १३
यं विदुर्वेदतत्त्वज्ञा योगिनो यतमानसाः ।
अरूपो रूपवान्भूत्वा सोऽयमायाति सर्वगः ॥ १४ ।
काशीका सान्निध्य प्राप्तकर वे कालभैरव कालके भी भक्षक महाकाल हुए । देवदेवके आदेशसे कापालिक । व्रत धारण किये हुए वे विश्वात्मा भैरव हाथमें [ ब्रह्माका ] कपाल लेकर तीनों लोकोंमें घूमने लगे किंतु उस दारुण ब्रह्महत्याने कहीं भी उन प्रभुका, पीछा करना न छोड़ा ॥ २-३ ॥ प्रत्येक तीर्थमें घूमते हुए भी वे ब्रह्महत्यासे नहीं मुक्त हुए, इसमें भी सभीको शिवकी अद्भुत महिमा ही जाननी चाहिये ॥४ ॥
एक बार प्रमथगणोंसे सेवित होते हुए भी कापालिक वेषवाले शिवजी [ कालभैरव ] विहार करते हुए अपनी इच्छासे विष्णुके निवासस्थानपर पहुँचे ॥ ५ ॥
उस समय महादेवके अंशसे उत्पन्न हुए, सर्पका कुण्डल धारण किये, त्रिनेत्र, महाकाल तथा पूर्णाकार उन भैरवको आता हुआ देखकर गरुडध्वज विष्णुने तथा देवों, मुनियों एवं देवस्त्रियोंने भी दण्डवत् प्रणाम किया । इसके बाद लक्ष्मीपति विष्णुने उन्हें तत्त्वतः जानते हुए पुनः प्रणामकर सिरपर अंजलि रखकर नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति की ॥ ६–८ ॥ हे महामुने! तदनन्तर आनन्दसे पूर्ण हुए विष्णु प्रसन्नचित्त होकर क्षीरसागरसे उत्पन्न हुई कमलनिवासिनी लक्ष्मीसे प्रेमपूर्वक कहने लगे — ॥९ ॥
विष्णुजी बोले - हे प्रिये! हे कमलनयने! हे सुभगे! हे अनघे! हे देवि! हे सुश्रोणि! देखो, तुम धन्य हो और मैं भी धन्य हूँ, जो कि हम दोनों जगत्पति [ शिव ] -का साक्षात् दर्शन कर रहे हैं ॥ १० ॥
ये ही धाता, विधाता तथा लोकके प्रभु, ईश्वर, अनादि, सबको शरण देनेवाले, शान्त तथा छब्बीस तत्त्वोंके रूपमें भी ये ही अभिव्यक्त हो रहे हैं ॥ ११ ॥
ये सर्वज्ञ, सभी योगियोंके स्वामी, सभी प्राणियोंके एकमात्र नायक, सर्वभूतान्तरात्मा एवं सबको सदा सब कुछ देनेवाले हैं ॥ १२ ॥
हे पद्मे! निद्राको त्यागकर तथा श्वासको रोककर शान्त स्वभाववाले जन जिन्हें ध्यान लगाकर बुद्धिके द्वारा हृदयमें देखते हैं, वे ये ही हैं, आप उनको देखें ॥ १३ ॥
वेदतत्त्वज्ञ एवं स्थिर मनवाले योगीजन जिन्हें जानते हैं, वे ही सर्वव्यापक शिव अरूप होते हुए भी स्वरूप धारणकर यहाँ आ रहे हैं ॥ १४ ॥
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अ ० ९ ] शतरुद्रसंहिता ४५
अहो विचित्रं देवस्य चेष्टितं परमेष्ठिनः ।
यस्याख्यां ब्रुवतो नित्यं न देहः सोऽपि देहभृत् ॥
तं दृष्ट्वा न पुनर्जन्म लभ्यते मानवैर्भुवि ।
सोऽयमायाति भगवांस्त्र्यम्बकः शशिभूषणः ॥
पुण्डरीकदलायामे धन्ये मेऽद्य विलोचने ।
यद् दृश्यते महादेवो ह्याभ्यां लक्ष्मि महेश्वरः ॥
धिग्धिक्पदं तु देवानां परं दृष्ट्वा न शङ्करम् ।
लभ्यते यत्र निर्वाणं सर्वदुःखान्तकृत्तु यत् ॥
देवत्वादशुभं किञ्चिद्देवलोके न विद्यते ।
दृष्ट्वापि सर्वे देवेशं यन्मुक्तिं न लभामहे ॥
नन्दीश्वर उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशः संप्रहृष्टतनूरुहः ।
प्रणिपत्य महादेवमिदमाह वृषध्वजम् ॥
विष्णुरुवाच
किमिदं देवदेवेन सर्वज्ञेन त्वया विभो ।
क्रियते जगतां धात्रा सर्वपापहराव्यय ॥
क्रीडेयं तव देवेश त्रिलोचन महामते ।
किं कारणं विरूपाक्ष चेष्टितं ते स्मरार्दन ॥
किमर्थं भगवञ्छम्भो भिक्षां चरसि शक्तिप ।
संशयो मे जगन्नाथ एष त्रैलोक्यराज्यद ॥
नन्दीश्वर उवाच
एवमुक्तस्ततः शम्भुर्विष्णुना भैरवो हरः ।
प्रत्युवाचाद्भुतोतिः स विष्णुं हि विहसन्प्रभुः ॥
भैरव उवाच
ब्रह्मणस्तु शिरश्छिन्नमंगुल्याग्रनखेन ह ।
तदघं प्रतिहन्तुं हि चराम्येतद् व्रतं शुभम् ॥
नन्दीश्वर उवाच
एवमुक्तो महेशेन भैरवेण रमापतिः ।
स्मृत्वा किञ्चिन्नतशिराः पुनरेवमजिज्ञपत् ॥
अहो, इन परमेष्ठीकी चेष्टा भी अद्भुत है कि १५ जिनके चरित्रका वर्णन करनेवाला मनुष्य शरीरधारी होकर भी विदेह हो जाता है एवं जिनका दर्शन करनेसे मनुष्योंको पुनः पृथ्वीपर जन्म ग्रहण नहीं १६ करना पड़ता, वे ही त्र्यम्बक शशिभूषण भगवान् शिव आ रहे हैं ॥ १५-१६ ॥ हे लक्ष्मि! श्वेत कमलदलके समान बड़े - बड़े ये १७ मेरे नेत्र आज धन्य हुए, जो इनके द्वारा महेश्वर महादेवका दर्शन किया जा रहा है ॥ १७ ॥
देवताओंके उस पदको धिक्कार है, जिन्होंने १८ शंकरका दर्शन नहीं किया, जो समस्त दु: खोंका नाश करनेवाले तथा मोक्षदायक हैं ॥१८ ॥
यदि देवदेवेश शिवका दर्शनकर हम सभीने १ ९ मुक्ति न प्राप्त की, तो देवलोकमें देवता होनेसे बढ़कर और कुछ भी अशुभ बात नहीं है ॥ १ ९ ॥ नन्दीश्वर बोले- [ लक्ष्मीसे ] इस प्रकार कहकर रोमांचित शरीरवाले विष्णु वृषभध्वज महादेवको २० प्रणाम करके यह कहने लगे - ॥ २० ॥
विष्णुजी बोले- हे विभो! हे सर्वपापहर! हे अव्यय! हे सर्वज्ञ तथा संसारके धाता देवदेव! आप २१ यह क्या कर रहे हैं? ॥२१ ॥
हे देवेश! हे त्रिलोचन! हे महामते! यह २२ आपकी क्रीड़ा किसलिये हो रही है? हे विरूपाक्ष! हे स्मरार्दन! आपकी इस प्रकारकी चेष्टाका क्या कारण है? ॥२२ ॥
हे भगवन्! हे शम्भो! हे शक्तिपते! आप किस २३ कारणसे भिक्षाटन कर रहे हैं? हे जगन्नाथ! हे त्रैलोक्यका राज्य देनेवाले! मुझे यह सन्देह हो रहा है ॥ २३ ॥
नन्दीश्वर बोले- विष्णु ने जब इस प्रकार शिवरूप भैरवसे कहा, तब अद्भुत लीला करनेवाले २४ उन प्रभुने विष्णुजीसे हँसते हुए कहा- ॥२४ ॥
भैरव बोले- मैंने अपने अँगुलीके नखाग्रसे ब्रह्मदेवका सिर काट लिया है, उसी पापको दूर करनेके २५ निमित्त इस शुभ व्रतका अनुष्ठान कर रहा हूँ ॥ २५ ॥
नन्दीश्वर बोले- महेशरूप भैरवके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मीपति कुछ स्मरण करके सिर झुकाकर २६ । पुनः इस प्रकार कहने लगे —॥२६ ॥
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४६ विष्णुरुवाच यथेच्छसि तथा क्रीड सर्वविघ्नापनोदक माया मां महादेव नाच्छादयितुमर्हसि । नाभीकमलकोशात्तु कोटिशः कमलासनाः कल्पे कल्पे पुरा ह्यासंस्त्वन्नियोगबलाद्विभो त्यज मायामिमां देव दुस्तरामकृतात्मभिः ब्रह्मादयो महादेव मायया तव मोहिताः यथावदनुगच्छामि चेष्टितं ते शिवापते । तवैवानुग्रहाच्छम्भो सर्वेश्वर सतांगते
संहारकाले संप्राप्ते सदेवान्निखिलान्मुनीन् ।
लोकान्वर्णाश्रमवतो हरिष्यसि यदा हर ॥
तदा कृते महादेव पापं ब्रह्मवधादिकम् ।
पारतन्त्र्यं न ते शम्भो स्वैरं क्रीडत्यतो भवान् ॥
अतीत ब्रह्मणां ह्यस्नां स्त्रक्कण्ठे तव भासते ।
तथाप्यनुगता शम्भो ब्रह्महत्या तवानघ ॥
कृत्वापि सुमहत्पापं यस्त्वां स्मरति मानवः ।
आधारं जगतामीश तस्य पापं विलीयते ॥
यथा तमो न तिष्ठेत सन्निधावंशुमालिनः ।
तथैव तव यो भक्तः पापं तस्य व्रजेत्क्षयम् ॥
यश्चिन्तयति पुण्यात्मा तव पादाम्बुजद्वयम् ।
ब्रह्महत्याकृतमपि पापं तस्य व्रजेत्क्षयम् ॥
तव नामानुरक्ता वाग्यस्य पुंसो जगत्पते ।
अप्यद्रिकूटतुलितं नैनस्तमनुबाधते ॥
परमात्मन्परं धाम स्वेच्छाभिधृतविग्रह ।
कुतूहलं तवेशेदं कृपणाधीनतेश्वर ॥
अद्य धन्योऽस्मि देवेश यन्न पश्यन्ति योगिनः ।
पश्यामि तं जगन्मूर्त्तिं परमेश्वरमव्ययम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ विष्णुजी बोले- सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले । । हे महादेव! आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी क्रीड़ा , परंतु मुझे अपनी मायासे मोहित न करें । कोड़ा २७ कीजिये विभो! आपकी आज्ञाशक्तिसे मेरे नाभिकमलके
। । कोशसे कल्प - कल्पमें करोड़ों ब्रह्मा पहले उत्पन्न हो ।
॥ २८ चुके हैं ॥ २८ ॥
हे देव! आप पुण्यहीन मनुष्योंके लिये दुस्तर ॥ । २ ९ इस मायाका त्याग करें । हे महादेव! आपकी मायास ब्रह्मा आदि भी मोहित हो जाते हैं ॥ २ ९ ॥ सत्पुरुषोंको गति देनेवाले हे पार्वतीपते! हे शम्भो! हे सर्वेश्वर! मैं आपकी कृपासे ही आपकी ॥ ३० समस्त चेष्टाएँ ठीक - ठीक जानता हूँ ॥ ३० ॥
हे हर! संहारकालके उपस्थित होनेपर जब आप ३१ समस्त देवताओं, मुनियों एवं वर्णाश्रमी जनोंको उपसंहृत करेंगे, तब भी हे महादेव! आपको ब्रह्मवध आदिका ३२ पाप नहीं लगेगा । हे शिव! आप पराधीन नहीं हैं । अत: आप स्वतन्त्र होकर क्रीड़ा करते हैं ॥ ३१-३२ ॥ आपके कण्ठमें पूर्वमें उत्पन्न हो चुके ब्रह्माओंकी ३३ अस्थियोंकी माला भासित हो रही है, तब भी हे निष्पाप शिव! आपके पीछे ब्रह्महत्या लगी है ॥ ३३ ॥
हे ईश! जो मनुष्य महान् पाप करके भी आप ३४ जगदाधारका स्मरण करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है ॥३४ ॥
जिस प्रकार सूर्यके समीप अन्धकार टिक नहीं ३५ सकता, उसी प्रकार जो आपका भक्त है, उसका पाप विनष्ट हो जाता है ॥ ३५ ॥
जो पुण्यात्मा आपके दोनों चरणकमलोंका स्मरण ३६ करता है, उसका ब्रह्महत्याजनित पाप भी नष्ट हो जाता है । हे जगत्पते! जिस मनुष्यकी वाणी आपके ३७ नाममें अनुरक्त है, पर्वतसमूहके समान भारी - से - भारी पाप भी उसे बाधित नहीं कर सकता है ॥ ३६-३७ ॥ हे परमात्मन्! हे परमधाम! स्वेच्छासे शरीर ३८ धारण करनेवाले हे ईश्वर! यह भक्तोंकी अधीनता भी आपका कुतूहलमात्र है ॥ ३८ ॥
हे देवेश! आज मैं धन्य हूँ; क्योंकि योगीजन भी जिन्हें नहीं देख पाते हैं, उन जगन्मूर्ति अव्यय ३ ९ परमेश्वरका मैं दर्शन कर रहा , हूँ ॥ ३ ९ ॥
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अ ० ९ ] शतरुद्रसंहिता ४७
अद्य मे परमो लाभस्त्वद्य मे मंगलं परम् ।
तं दृष्ट्वामृततृप्तस्य तृणं स्वर्गापवर्गकम् ॥ ४०
इत्थं वदति गोविन्दे विमला पद्मया तया ।
मनोरथवती नाम भिक्षा पात्रे समर्पिता ॥ ४१
भिक्षाटनाय देवोऽपि निरगात्परया मुदा ।
अन्यत्रापि महादेवो भैरवश्चात्तविग्रहः ॥ ४२
दृष्ट्वानुयायिनीं तां तु समाहूय जनार्दनः ।
संप्रार्थयद् ब्रह्महत्यां विमुञ्च त्वं त्रिशूलिनम् ॥ ४३
ब्रह्महत्योवाच
अनेनापि मिषेणाहं संसेव्यामुं वृषध्वजम् ।
आत्मानं पावयिष्यामि त्वपुनर्भवदर्शनम् ॥ ४४
नन्दीश्वर उवाच
सा तत्याज न तत्पार्श्वं व्याहृतापि मुरारिणा ।
तमूचेऽथ हरिं शंभुः स्मेरास्यो भैरवो वचः ॥ ४५
भैरव उवाच
त्वद्वाक्पीयूषपानेन तृप्तोऽस्मि बहुमानद ।
स्वभावोऽयं हि साधूनां यत्त्वं वदसि मापते ॥ ४६
वरं वृणीष्व गोविन्द वरदोऽस्मि तवानघ ।
अग्रणीर्मम भक्तानां त्वं हरे निर्विकारवान् ॥ ४७
नो माद्यन्ति तथा भैक्ष्यैर्भिक्षवोऽप्यतिसंस्कृतैः ।
यथा मानसुधापानैर्ननु भिक्षाटनज्वराः ॥ ४८
नन्दीश्वर उवाच
इत्याकर्ण्य वचः शंभोभैरवस्य परात्मनः ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा समवोचन्महेश्वरम् ॥ ४ ९
विष्णुरुवाच
एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं देवताधिपम् ।
पश्यामि त्वां देवदेव मनोवाणीपथातिगम् ॥ ५०
अदभ्रेयं सुधादृष्टिरनया मे महोत्सवः ।
अयत्ननिधिलाभोऽयं वीक्षणं हर ते सताम् ॥ ५१
आज मुझे परम लाभ मिला और मेरा परम कल्याण हो गया । उन आपके दर्शनसे मैं अमृतपानकर तृप्त हुएके समान तृप्त हो गया । मुझे स्वर्ग और मोक्ष तृणके समान ज्ञात हो रहे हैं ॥ ४० ॥
गोविन्द विष्णुके इस प्रकार कहनेके पश्चात् उन महालक्ष्मीने अत्यन्त निर्मल मनोरथवती नामकी भिक्षा उनके पात्रमें दे दी । तब लीलासे भैरवरूपधारी वे महादेव भी परम प्रसन्न हो भिक्षाटनके लिये अन्यत्र चलनेको उद्यत हो गये॥४१-४२ ॥ उस समय विष्णुने उनके पीछे - पीछे जानेवाली ब्रह्महत्याको बुलाकर उससे प्रार्थना की कि तुम इन त्रिशूलधारी भैरवको छोड़ दो ॥ ४३ ॥
ब्रह्महत्या बोली- जिनका दर्शन करनेसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती, ऐसे वृषभध्वजकी सेवाकर इस बहानेसे मैं भी अपनेको पवित्र कर लूँगी ॥ ४४ ॥
नन्दीश्वर बोले- विष्णुके कहनेसे भी जब ब्रह्महत्याने भैरवका पीछा नहीं छोड़ा, तब भैरव शम्भुने मुसकराकर हरिसे यह वचन कहा— ॥ ४५ ॥
भैरव बोले — हे बहुमानद! आपके वचनामृतका पानकर मैं तृप्त हो गया । हे लक्ष्मीके पति! सज्जनोंके स्वभावके अनुरूप ही आप वचन बोल रहे हैं ॥ ४६ ॥
हे गोविन्द! तुम वर माँगो । हे निष्पाप! मैं तुम्हें वर देनेवाला हूँ । हे विकाररहित हरे! तुम मेरे भक्तोंमें अग्रगण्य रहोगे ॥ ४७ ॥
भिक्षाटनरूपी ज्वरसे पीड़ित भिक्षु मानसुधाका पानकर जैसी तृप्ति प्राप्त करते हैं, वैसी तृप्ति अतिसंस्कृत भिक्षाओंसे भी नहीं प्राप्त करते हैं ॥ ४८ ॥
नन्दीश्वर बोले- परमात्मा शम्भुके अवतार भैरवके इन वचनोंको सुनकर विष्णु परम प्रसन्न होकर महेश्वरसे बोले —॥४ ९ ॥ विष्णु बोले – हे देवदेव! मेरे लिये यही वह प्रशंसनीय है, जिससे कि मैं [ आज ] मन और वाणीसे अगोचर देवताओंके स्वामी आपका दर्शन प्राप्त कर रहा हूँ ॥५० ॥
आपकी जो अमृतमयी पूर्ण दृष्टि [ मुझपर ] पड़ रही है, इसीसे मुझे महान् हर्ष हो रहा है । हे हर! सज्जनोंके लिये आपका दर्शन बिना यत्नके प्राप्त निधिके समान है ॥ ५१ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ ४८
अवियोगोऽस्तु मे देव त्वदङ्घ्रियुगलेन वै ।
एष एव वरः शंभो नान्यं कञ्चिद् वृणे वरम् ॥ ५२
श्रीभैरव उवाच
एवं भवतु ते तात यत्त्वयोक्तं महामते ।
सर्वेषामपि देवानां वरदस्त्वं भविष्यसि ॥५३
नन्दीश्वर उवाच
अनुगृह्येति दैत्यारिं केंद्राद्रिभुवने चरन् ।
भेजेऽविमुक्तनगरीं नाम्ना वाराणसीं पुरीम् ॥ ५४
क्षेत्रे प्रविष्टमात्रेऽथ भैरवे भीषणाकृतौ ।
हाहेत्युक्त्वा ब्रह्महत्या पातालं चाविशत्तदा ॥ ५५
कपालं ब्रह्मणः सद्यो भैरवस्य करांबुजात् ।
पपात भुवि तत्तीर्थमभूत्कापालमोचनम् ॥ ५६
कपालं ब्रह्मणो रुद्रः सर्वेषामेव पश्यताम् ।
हस्तात्पतन्तमालोक्य ननर्त परया मुदा ॥ ५७
विधेः कपालं नामुंचत्करमत्यन्तदुस्सहम् ।
परस्य भ्रमतः क्वापि तत्काश्यां क्षणतोऽपतत् ॥ ५८
शूलिनो ब्रह्मणो हत्या नापैति स्म च या क्वचित् ।
सा काश्यां क्षणतो नष्टा तस्मात्सेव्या हि काशिका ॥ ५ ९
कपालमोचनं काश्यां यः स्मरेत्तीर्थमुत्तमम् ।
इहान्यत्रापि यत्पापं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥ ६०
आगत्य तीर्थप्रवरे स्नानं कृत्वा विधानतः ।
तर्पयित्वा पितॄन्देवान्मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ६१
कपालमोचनं तीर्थं पुरस्कृत्वा तु भैरवः ।
तत्रैव तस्थौ भक्तानां भक्षयन्नघसन्ततिम् ॥ ६२
कृष्णाष्टम्यां तु मार्गस्य मासस्य परमेश्वरः ।
आविर्बभूव सल्लीलो भैरवात्मा सतां प्रियः ॥ ६३ ।
हे देव! आपके चरणयुगलसे मेरा वियोग न हो हे शम्भो! यही मेरे लिये वरदान है । मैं किसी अन्य, । वरका वरण नहीं करता हूँ ॥५२ ॥
श्रीभैरव बोले- महामते तात! जैसा आपने । कहा है, वैसा ही हो । आप सभी देवताओंको वर देनेवाले होंगे ॥ ५३ ॥
नन्दीश्वर बोले— [ ब्रह्माण्डके ] भुवनोंसहित केन्द्रभूत सुमेरुपर्वतपर विचरण करते हुए दैत्यशत्र विष्णुको इस प्रकार अनुगृहीतकर भैरव विमुक्तनगरी वाराणसीपुरीमें जा पहुँचे ॥ ५४ ॥
भयंकर आकृतिवाले भैरवके उस क्षेत्रमें प्रवेश करनेमात्रसे ही ब्रह्महत्या उसी समय हाहाकार करके पातालमें चली गयी ॥ ५५ ॥
उसी समय भैरवके हस्तकमलसे ब्रह्माका कपाल पृथिवीपर गिर पड़ा । तबसे वह तीर्थ कपालमोचन नामसे प्रसिद्ध हो गया ॥५६ ॥
अपने हाथसे ब्रह्माके कपालको गिरता हुआ देखकर रुद्र सबके सामने परमानन्दसे नाचने लगे ॥५७ ॥
अत्यन्त दुस्सह जो ब्रह्माजीका कपाल [ अन्य क्षेत्रोंमें ] भ्रमण करते हुए परमेश्वरके हाथसे कहीं नहीं छूट पाया था, वह काशीमें क्षणमात्रमें छूटकर गिर पड़ा । शूल धारण करनेवाले शिवकी जो ब्रह्महत्या कहीं भी नहीं दूर हो सकी, वह काशीमें आते ही क्षणभरमें नष्ट हो गयी, इसलिये काशीका ही सेवन करना चाहिये ॥ ५८-५९ ॥ जो मनुष्य काशीमें [ स्थित ] कपालमोचन नामक उत्तम तीर्थका स्मरण करता है, उसका यहाँ अथवा अन्यत्रका किया हुआ पाप भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥६० ॥
इस श्रेष्ठ तीर्थमें आकर विधानके अनुसार स्नानकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल जाता है ॥६१ ॥
कपालमोचन नामक तीर्थको समादृतकर भैरव भक्तोंके पापसमूहका भक्षण करते हुए वहींपर विराजमान हो गये ॥६२ ॥
सुन्दर लीला करनेवाले, सज्जनोंके प्रिय, भैरवात्मा परमेश्वर शिव मार्गशीर्षमासके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको आविर्भूत हुए ॥ ६३ ॥