शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 621–630
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
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अ ० ५१ ] उमासंहिता ६०७ ये भविष्यन्ति येऽतीता आकल्पात्पुरुषाः कुले । कृतकृत्य हो जाता है । उसके कुलमें कल्पसे लेकर तांस्तांस्तारयते देव्या मूर्ति संस्थाप्य शोभनाम् ॥ २५ जितनी भी पीढ़ियाँ हैं और जो भी आगे उत्पन्न होंगी,
त्रिलोकीस्थापनात्पुण्यं यद्भवेन्मुनिपुंगव ।
तत्कोटिगुणितं पुण्यं श्रीदेवीस्थापनाद्भवेत् ॥
मध्ये देवीं स्थापयित्वा पञ्चायतनदेवताः ।
चतुर्दिक्षु स्थापयेद्यस्तस्य पुण्यं न गण्यते ॥
विष्णोर्नाम्नां कोटिजपाद् ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ।
यत्फलं लभ्यते तस्माच्छतकोटिगुणोत्तरम् ॥
शिवनाम्नो जपादेव तस्मात्कोटिगुणोत्तरम् ।
श्रीदेवीनामजापात्तु ततः कोटिगुणोत्तरम् ॥
देव्याः प्रासादकरणात्पुण्यं तु समवाप्यते ।
स्थापिता येन सा देवी जगन्माता त्रयीमयी ॥
न तस्य दुर्लभं किंचित् श्रीमातुः करुणावशात् ।
वर्धन्ते पुत्रपौत्राद्या नश्यत्यखिलकश्मलम् ॥
मनसा ये चिकीर्षन्ति मूर्तिस्थापनमुत्तमम् ।
तेऽप्युमायाः परं लोकं प्रयान्ति मुनिदुर्लभम् ॥
क्रियमाणं तु यः प्रेक्ष्य चेतसा ह्यनुचिन्तयेत् कारयिष्याम्यहं यर्हि संपन्मे संभविष्यति एवं तस्य कुलं सद्यो याति स्वर्गं न संशयः महामायाप्रभावेण दुर्लभं किं जगत्त्रये श्रीपराम्बां जगद्योनिं केवलं ये समाश्रिताः उन सभीको वह देवीकी उत्तम मूर्तिकी स्थापना करके तार देता है॥२४-२५ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! त्रिलोकीके स्थापित करनेसे जो २६ पुण्य होता है, उसका करोड़ों गुना पुण्य श्रीदेवीकी प्रतिष्ठा करनेसे होता है ॥ २६ ॥
जो मन्दिरके मध्यमें देवीकी प्रतिष्ठाकर उनके २७ चारों ओर पंचायतन देवताओंको स्थापित करता है, उसके पुण्यकी गणना नहीं की जा सकती है ॥ २७ ॥
सूर्य - चन्द्रग्रहणमें विष्णुके नामोंको करोड़ों बार २८ जपनेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उससे सौ करोड़ गुना अधिक पुण्यफल शिवनामके जपसे होता है, उससे भी करोड़ गुना पुण्यफल देवीके नाम - जपसे २ ९ होता है और उससे भी करोड़ गुना अधिक पुण्यफल देवीके मन्दिरका निर्माण करानेसे प्राप्त होता है । ३० जिसने वेदरूपा तथा त्रिगुणात्मिका जगज्जननी देवीको प्रतिष्ठापित किया, श्रीमाताकी दयासे उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है । उसके पुत्र - पौत्रादि निरन्तर ३१ बढ़ते रहते हैं और उसका सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाता है ॥ २८-३१ ॥ १६. जो लोग मनमें भी देवीकी उत्तम मूर्तिस्थापनाकी ३२ इच्छा करते हैं, वे मुनियोंके लिये भी दुर्लभ उमादेवीके परमलोकको प्राप्त करते हैं ॥ ३२ ॥
किसीके द्वारा बनवाये जाते हुए मन्दिरको । ॥ ३३ देखकर जो मनमें यह सोचता है कि जब मुझे सम्पत्ति होगी, तब मैं भी मन्दिर बनवाऊँगा । इस प्रकार । सोचनेवालेका कुल शीघ्र ही स्वर्गको जाता है, इसमें ॥ ३४ संशय नहीं है । महामायाके प्रभावसे त्रिलोकीमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है॥३३-३४ ॥ जो जगत्कारणभूता श्रीपराम्बाका एकमात्र आश्रय । ग्रहण करते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं समझना चाहिये, वे
साक्षाद्देवीगणाश्च ते ॥ ३५ । तो देवीके साक्षात् गण हैं ॥ ३५ ॥
मनुष्या न मन्तव्याः
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६०८ ये व्रजन्तः स्वपन्तश्च तिष्ठन्तो वाप्यहर्निशम् । उमेति द्व्यक्षरं नाम ब्रुवते ते शिवागणाः
नित्ये नैमित्तिके देवीं ये यजन्ति परां शिवाम् ।
पुष्पैर्धूपैस्तथा दीपैस्ते प्रयास्यन्त्युमालयम् ॥
ये देवीमण्डपं नित्यं गोमयेन मृदाथवा ।
उपलिम्पन्ति मार्जन्ति ते प्रयास्यन्त्युमालयम् ॥
यैर्देव्या मन्दिरं रम्यं निर्मापितमनुत्तमम् ।
तत्कुलीनाञ्जनान्माता ह्याशिषः संप्रयच्छति ॥
मदीयाः शतवर्षाणि जीवन्तु प्रेमभाजनाः ।
नापदामयनानीत्थं श्रीमाता वक्त्यहर्निशम् ॥
येन मूर्तिर्महादेव्या उमायाः कारिता शुभा ।
नरायुतं तत्कुलजं मणिद्वीपे महीयते ॥
स्थापयित्वा महामायामूर्तिं सम्यक्प्रपूज्य च ।
यं यं प्रार्थयते कामं तं तं प्राप्नोति साधकः ॥
यः स्नापयति श्रीमातुः स्थापितां मूर्तिमुत्तमाम् ।
घृतेन मधुनाक्तेन तत्फलं गणयेत्तु कः ॥
चन्दनागुरुकर्पूरमांसीमुस्तादियुग्जलैः एकवर्णगवां क्षीरैः स्नापयेत्परमेश्वरीम् ॥
धूपेनाष्टादशांगेन दद्यादाहुतिमुत्तमाम् ।
नीराजनं चरेद्देव्याः साज्यकर्पूरवर्तिभिः ॥
कृष्णाष्टम्यां नवम्यां वामायां वा पञ्चदिक्तिथौ ।
पूजयेज्जगतां धात्रीं गंधपुष्पैर्विशेषतः ॥
संपठञ्जननीसूक्तं श्रीसूक्तमथवा पठन् ।
देवीसूक्तमथो वापि मूलमन्त्रमथापि वा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५१ जो चलते - सोते अथवा बैठे हुए उमा — इस दो ॥ ३६ अक्षरके नामका उच्चारण करते रहते हैं, वे तो शिवाके साक्षात् गण हैं ॥ ३६ ॥
जो लोग नित्य तथा नैमित्तिक कर्मोंमें पुष्पों, ३७ धूपों तथा दीपोंसे परा शिवाकी पूजा करते हैं, वे उमालोक प्राप्त करते हैं ॥ ३७ ॥
जो लोग प्रतिदिन गोमयसे अथवा मृत्तिकासे ३८ देवी - मण्डपका उपलेप करते हैं तथा उसका मार्जन करते हैं, वे उमालोक प्राप्त करते हैं ॥ ३८ ॥
जिन्होंने देवीके रम्य तथा उत्तम मन्दिरका ३ ९ निर्माण करवाया है, उनके कुलमें उत्पन्न लोगोंको देवी आशीर्वाद देती हैं- ' मेरे प्रेमपात्र भक्त सौ वर्षतक जीवित रहें और उनपर कदापि कोई ४० विपत्ति न आये ' – ऐसा वे श्रीमाता रात - दिन कहती हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ जिसने महादेवी उमाकी शुभ मूर्तिका निर्माण ४१ करवाया है, उसके कुलके दस हजार पीढ़ियोंतकके लोग मणिद्वीपमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ॥ ४१ ॥
साधक महामायाकी मूर्ति स्थापित करके और ४२ उसकी विधिवत् पूजाकर जिस - जिस मनोरथके लिये प्रार्थना करता है, उसे [ अवश्य ही ] प्राप्त कर लेता है ॥४२ ॥
जो श्रीमाताकी स्थापित की गयी उत्तम मूर्तिको ४३ मधुमिश्रित घृतसे स्नान कराता है, उसके फलकी गणना कौन कर सकता है ॥४३ ॥
एक वर्णवाली गौओंके दूधसे तथा चन्दन, ४४ अगरु, कपूर, जटामांसी, मोथा आदिसे मिश्रित जलसे परमेश्वरीको स्नान कराना चाहिये ॥ ४४ ॥
अठारह [ सुगन्धित ] द्रव्योंसे बनाये गये धूपसे ४५ उत्तम आहुति प्रदान करनी चाहिये । घी तथा कपूरयुक्त बत्तियोंसे देवीकी आरती करनी चाहिये ॥ ४५ ॥
कृष्णपक्षकी अष्टमी, नवमी, अमावास्यामें अथवा ४६ [ शुक्लपक्षकी ] पूर्णिमा तिथिको मातृसूक्त, श्रीसूक्त पढ़ते हुए अथवा देवीसूक्त पढ़ते हुए अथवा मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए गन्ध - पुष्पोंद्वारा विशेष रूपसे ४७ । जगज्जननीका पूजन करना चाहिये॥४६-४७ ॥
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अ ० ५१ ] उमासंहिता ६० ९ विष्णुक्रान्तां च तुलसीं वर्जयित्वाखिलं सुमम् । विष्णुकान्ता एवं तुलसीको छोड़कर अन्य सभी देवीप्रीतिकरं ज्ञेयं कमलं तु विशेषतः ॥ ४८ पुष्पोंको देवीके लिये प्रीतिकर जानना चाहिये तथा कमल विशेषरूपसे देवीको प्रिय है । जो देवीको अर्पयेत्स्वर्णपुष्पं यो देव्यै राजतमेव वा । | स्वर्णपुष्प अथवा रजतपुष्प समर्पित करता है, वह स याति परमं धाम सिद्धकोटिभिरन्वितम् ॥ ४ ९ करोड़ों सिद्धोंके द्वारा सेवित परम धामको जाता है ॥ ४८-४९ ॥ पूजनान्ते सदा कार्यं दासैरेनः क्षमापनम् । भक्तोंको चाहिये कि वे पूजनके अन्तमें अपने प्रसीद परमेशानि जगदानन्ददायिनि ॥ ५० पापोंके लिये क्षमा - प्रार्थना करें । हे परमेश्वरि! हे
इति वाक्यैः स्तुवन्मन्त्री देवीभक्तिपरायणः ।
ध्यायेत्कण्ठीरवारूढां वरदाभयपाणिकाम् ॥
इत्थं ध्यात्वा महेशानीं भक्ताभीष्टफलप्रदाम् ।
नानाफलानि पक्वानि नैवेद्यत्वे प्रकल्पयेत् ॥
नैवेद्यं भक्षयेद्यस्तु शंभुशक्तेः परात्मनः ।
स निर्धूयाखिलं पङ्कं निर्मलो मानवो भवेत् ॥
चैत्रशुक्लतृतीयायां यो भवानीव्रतं चरेत् ।
भवबन्धननिर्मुक्तः प्राप्नुयात्परमं पदम् ॥
अस्यामेव तृतीयायां कुर्याद्दोलोत्सवं बुधः ।
पूजयेज्जगतां धात्रीमुमां शंकरसंयुताम् ॥
कुसुमैः कुंकुमैर्वस्त्रैः कर्पूरागुरुचन्दनैः । धूपैर्दीपैः सनैवेद्यैः स्त्रग्गन्धैरपरैरपि आन्दोलयेत्ततो देवीं महामायां महेश्वरीम् । जगदानन्ददायिनि! प्रसन्न होइये । देवीभक्तिपरायण साधकको इन वाक्योंसे स्तुति करते हुए सिंहपर आरूढ़ ५१ तथा हाथोंमें वरद एवं अभयमुद्रा धारण करनेवाली भगवतीका ध्यान करना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ इस प्रकार भक्तोंको अभीष्ट फल देनेवाली महेश्वरीका ध्यान करके नैवेद्यके रूपमें अनेक प्रकारके ५२ पके हुए फल अर्पित करना चाहिये ॥५२ ॥
जो मनुष्य परमेश्वरी शम्भुशक्तिके नैवेद्यका ५३ भक्षण करता है, वह अपने सम्पूर्ण पापपंकको धोकर निर्मल हो जाता है ॥ ५३ ॥
जो चैत्र शुक्ल तृतीयाको भवानीव्रतका अनुष्ठान ५४ करता है, वह सांसारिक बन्धनसे छूटकर परमपद प्राप्त करता है ॥५४ ॥
बुद्धिमान् पुरुष इसी तृतीया तिथिको दोलोत्सव ५५ सम्पन्न करे और पुष्प, कुंकुम, वस्त्र, कपूर, अगुरु, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, माला एवं अन्य मनोहर गन्धोंसे ॥ ५६ शिवसहित जगद्धात्रीका पूजन करे ॥ ५५-५६ ॥ इसके बाद सबका कल्याण करनेवाली महामाया भगवती महेश्वरी श्रीगौरीको शिवसहित [ पालनेमें श्रीगौरीं शिवसंयुक्तां सर्वकल्याणकारिणीम् ॥ ५७ बैठाकर ] झुलाये । जो इस तिथिको प्रतिवर्ष नियमानुसार प्रत्यब्दं कुरुते योऽस्यां व्रतमान्दोलनं तथा नियमेन शिवा तस्मै सर्वमिष्टं प्रयच्छति माधवस्य सिते पक्षे तृतीया याक्षयाभिधा तस्यां यो जगदम्बा व्रतं कुर्यादतन्द्रितः मल्लिकामालतीचंपाजपाबन्धूकपंकजैः । व्रत तथा झूलनोत्सव करता है, उसे शिवा समस्त ॥ ५८ अभीष्ट फल प्रदान करती हैं ॥५७-५८ ॥ वैशाख शुक्लपक्षमें जो अक्षय तृतीया नामक । तिथि है, उसमें जो आलस्यरहित होकर जगदम्बाका ॥५ ९ व्रत करता है एवं मल्लिका, मालती, चम्पा, जपा, । बन्धूक तथा कमलपुष्पोंसे शिवसमेत पार्वतीका 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_21_1_Front
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६१० कुसुमैः पूजयेद्गौरीं शंकरेण समन्विताम् ॥
कोटिजन्मकृतं पापं मनोवाक्कायसम्भवम् ।
निर्धूय चतुरो वर्गानक्षयानिह सोऽश्नुते ॥
ज्येष्ठे शुक्लतृतीयायां व्रतं कृत्वा महेश्वरीम् ।
योऽर्चयेत्परमप्रीत्या तस्यासाध्यं न किंचन ॥
आषाढशुक्लपक्षीयतृतीयायां रथोत्सवम् ।
देव्याः प्रियतमं कुर्याद्यथावित्तानुसारतः ॥
रथं पृथ्वीं विजानीयाद्रथांगे चन्द्रभास्करौ ।
वेदानश्वान्विजानीयात्सारथिं पद्मसंभवम् ॥
नानामणिगणाकीर्णं पुष्पमालाविराजितम् ।
एवं रथं कल्पयित्वा तस्मिन् संस्थापयेच्छिवाम् ॥
लोकसंरक्षणार्थाय लोकं द्रष्टुं पराम्बिका ।
रथमध्ये संस्थितेति भावयेन्मतिमान्नरः ॥
रथे प्रचलिते मन्दं जयशब्दमुदीरयेत् ।
पाहि देवि जनानस्मान्प्रपन्नान्दीनवत्सले ॥
इति वाक्यैस्तोषयेच्च नानावादित्रनिःस्वनैः ।
सीमान्ते तु रथं नीत्वा तत्र संपूजयेद्रथे ॥
नानास्तोत्रैस्ततः स्तुत्वाप्यानयेत्तां स्ववेश्मनि ।
प्रणिपातशतं कृत्वा प्रार्थयेज्जगदम्बिकाम् ॥
एवं यः कुरुते विद्वान्पूजाव्रतरथोत्सवम् ।
इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्सोऽन्ते देवीपदं व्रजेत् ॥
शुक्लायां तु तृतीयायामेवं श्रावणभाद्रयोः ।
यो व्रतं कुरुतेऽम्बायाः पूजनं च यथाविधि ॥
मोदते पुत्रपौत्राद्यैर्धनाद्यैरिह सन्ततम् ।
सोऽन्ते गच्छेदुमालोकं सर्वलोकोपरि स्थितम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५१ ६० | पूजन करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें मन, वाणी तथा शरीरसे किये गये पापोंको विनष्टकर अक्षय चतुर्वर्ग [ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ] को प्राप्त कर लेता ६१ है ॥ ५ ९ –६१ ॥ जो ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको व्रत करके परम प्रीतिसे महेश्वरीका पूजन करता है, उसके ६२ लिये कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ ६२ ॥
आषाढमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको अपने ६३ धनसामर्थ्यके अनुसार देवीका अतिप्रिय रथोत्सव सम्पन्न करना चाहिये । उसमें पृथ्वीको रथ और चन्द्रमा तथां सूर्यको रथके दोनों पहिये समझना ६४ चाहिये, वेदोंको घोड़े तथा ब्रह्माको सारथि समझना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥ इस प्रकार अनेक मणियोंसे जटित एवं ६५ पुष्पमालाओंसे सुशोभित रथका निर्माणकर उसपर शिवाको स्थापित करे । उस समय बुद्धिमान् मनुष्य [ मनमें ] यह भावना करे कि श्रीपराम्बा लोककी ६६ रक्षाके लिये एवं लोकका अवलोकन करनेके लिये रथके मध्यमें बैठी हुई हैं ॥ ६५-६६ ॥ रथके धीरे - धीरे चलनेपर देवीकी जयकार करे ६७ और प्रार्थना करे कि हे देवि! हे दीनवत्सले! हम शरणागत जनोंकी रक्षा कीजिये । इन वचनोंसे तथा अनेक वाद्योंकी ध्वनियोंसे भगवतीको सन्तुष्ट करे ६८ और सीमापर्यन्त रथ ले जाकर वहाँ रथमें भगवतीका पूजन करे । इसके बाद अनेक स्तोत्रोंसे स्तुति करके ६ ९ उन जगदम्बाको अपने घर ले आये और सैकड़ों प्रणाम करके उनकी प्रार्थना करे ॥ ६७-६९ ॥ जो विद्वान् इस प्रकार देवीका पूजन, व्रत एवं ७० रथोत्सव करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंका उपभोग करके अन्तमें देवीके धामको जाता है ॥ ७० ॥
इसी प्रकार श्रावण और भाद्रपदमासकी शुक्ल ७१ तृतीयाको जो विधिपूर्वक अम्बाका व्रत और पूजन करता है, वह इस लोकमें पुत्र, पौत्र एवं धन आदिसे सम्पन्न होकर सदा आनन्दित रहता है तथा अन्तमें सब लोकोंसे ऊपर विराजमान उमालोकको जाता ७२ है ॥ ७१-७२ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part Section 21 1 Back
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अ ० ५१ ] उमासंहिता ६११ आश्विने धवले पक्षे नवरात्रव्रतं चरेत् । आश्विनमासके शुक्लपक्षमें नवरात्रव्रत करना यत्कृते सकलाः कामाः सिद्ध्यन्त्येव न संशयः ॥ ७३ चाहिये, जिसे करनेपर सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो प्रभावं वक्तुमीश्वरः । नवरात्रव्रतस्यास्य न पञ्चास्यो न षडास्यो न कोऽपरः ॥ ७४ चतुरास्यो
नवरात्रव्रतं कृत्वा भूपालो विरथात्मजः ।
हृतं राज्यं निजं लेभे सुरथो मुनिसत्तमाः ॥ ७५
ध्रुवसंधिसुतो धीमानयोध्याधिपतिर्नृपः ।
सुदर्शनो हृतं राज्यं प्रापदस्य प्रभावतः ॥ ७६
व्रतराजमिमं कृत्वा समाराध्य महेश्वरीम् ।
संसारबन्धनान्मुक्तः समाधिर्मुक्तिभागभूत् ॥ ७७
तृतीयायां च पञ्चम्यां सप्तम्यामष्टमीतिथौ ।
नवम्यां वा चतुर्दश्यां यो देवीं पूजयेन्नरः ॥ ७८
आश्विनस्य सिते पक्षे व्रतं कृत्वा विधानतः ।
तस्य सर्वं मनोऽभीष्टं पूरयत्यनिशं शिवा ॥ ७ ९
यः कार्त्तिकस्य मार्गस्य पौषस्य तपसस्तथा ।
तपस्यस्य सिते पक्षे तृतीयायां व्रतं चरेत् ॥ ८०
लोहितैः करवीराद्यैः पुष्पैर्धूपैः सुगन्धितैः ।
जाती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७३ ॥
इस नवरात्रव्रतके प्रभावका वर्णन करनेमें ब्रह्मा, महादेव तथा कार्तिकेय भी समर्थ नहीं हैं, फिर दूसरा कौन समर्थ हो सकता है । हे मुनिवरो! नवरात्रव्रतका अनुष्ठान करके विरथके पुत्र राजा सुरथने छीने गये अपने राज्यको [ पुनः ] प्राप्त कर लिया था ॥ ७४-७५ ॥ अयोध्याके अधिपति बुद्धिमान् ध्रुवसन्धिपुत्र राजा सुदर्शनने इसके प्रभावसे ही [ शत्रुओंके द्वारा ] छीना गया अपना राज्य प्राप्त किया था ॥ ७६ ॥
इस व्रतराजका अनुष्ठान करके तथा महेश्वरीकी आराधना करके समाधि [ नामक वैश्य ] संसारबन्धनसे मुक्त होकर मोक्षका भागी हुआ ॥ ७७ ॥
जो मनुष्य आश्विनमासके शुक्लपक्षमें तृतीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशी तिथियोंको विधिपूर्वक व्रत करके देवीका पूजन करता है, उसकी सभी मनोवांछाओंको शिवा निरन्तर पूर्ण करती रहती हैं ॥ ७८-७९ ॥ जो कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन मासके शुक्लपक्षमें तृतीयाको व्रत करता है तथा लाल कनेर आदिके फूलों एवं सुगन्धित धूपोंसे मंगलमयी देवीकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मंगलको प्राप्त कर पूजयेन्मङ्गलां देवीं स सर्वं मंगलं लभेत् ॥ ८१ लेता है ॥ ८०-८१ ॥ स्त्रियोंको अपने सौभाग्यके लिये इस महान् सौभाग्याय सदा स्त्रीभिः कार्यमेतन्महाव्रतम् । व्रतका सदा अनुष्ठान करना चाहिये और पुरुषोंको भी विद्याधनसुताप्त्यर्थं विधेयं पुरुषैरपि ॥ ८२ विद्या, धन एवं पुत्रप्राप्तिके लिये इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये ॥८२ ॥
। इसी प्रकार देवीको प्रिय लगनेवाले उमा-उमामहेश्वरादीनि व्रतान्यन्यानि यान्यपि ॥ ८३ महेश्वर आदि जो भी अन्य व्रत हैं, उनका अनुष्ठान देवीप्रियाणि कार्याणि स्वभक्त्यैवं मुमुक्षुभिः मोक्षकी अभिलाषा रखनेवालोंको भक्तिभावसे करना चाहिये ॥ ८३ ॥
यह उमासंहिता परम पुण्यमयी, शिवभक्तिको । बढ़ानेवाली, अनेक आख्यानोंसे युक्त, भोग तथा मोक्ष संहितेयं महापुण्या शिवभक्तिविवर्धिनी और कल्याणकारिणी है ॥८४ ॥
भुक्तिमुक्तिप्रदा शिवा ॥ ८४ प्रदान करनेवाली नानाख्यानसमायुक्ता 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_21_2_Front
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५१ ६१२
य एनां शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः ।
पठेद्वा पाठयेद्वापि स याति परमां गतिम् ॥ ८५
यस्य गेहे स्थिता चेयं लिखिता ललिताक्षरैः ।
संपूजिता च विधिवत्सर्वान्कामान्स आप्नुयात् ॥ ८६
भूतप्रेतपिशाचादिदुष्टेभ्यो न भयं क्वचित् ।: पुत्रपौत्रादिसम्पत्तीर्लभत्येव न संशयः ॥ ८७
तस्मादियं महापुण्या रम्योमासंहिता सदा ।
श्रोतव्या पठितव्या च शिवभक्तिमभीप्सुभिः ॥ ८८ ।
जो सावधान होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है अथवा सुनाता है, पढ़ता है या पढ़ाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥
जिसके घरमें सुन्दर अक्षरोंमें लिखी गयी यह संहिता स्थित रहती है और विधिवत् पूजित होती है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है । उसे भूत, प्रेत, पिशाच आदि दुष्टोंसे कभी भय नहीं होता और वह पुत्र - पौत्र आदि तथा सम्पत्तिको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८६-८७ ॥ अतः शिवकी भक्ति चाहनेवालोंको इस परम पुण्यमयी तथा रम्य उमासंहिताका सदा श्रवण एवं पाठ करना चाहिये ॥ ८८ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे पञ्चम्यामुमासंहितायां क्रियायोगनिरूपणं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें क्रियायोगनिरूपण नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥
॥ समाप्तेयं पञ्चम्युमासंहिता ॥ ५ ॥
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण षष्ठी कैलाससंहिता अथ प्रथमोऽध्यायः व्यासजीसे शौनकादि ऋषियोंका संवाद
नमः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे ।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे ॥ १
ऋषय ऊचुः
श्रुतोमासंहिता रम्या नानाख्यानसमन्विता ।
कैलाससंहितां ब्रूहि शिवतत्त्वविवर्धिनीम् ॥ २
व्यास उवाच
शृणुत प्रीतितो वत्साः कैलासाख्यां हि संहिताम् ।
शिवतत्त्वपरां दिव्यां वक्ष्ये वः स्नेहतः पराम् ॥ ३
हिमवच्छिखरे पूर्वं तपस्यन्तो महौजसः ।
वाराणसीं गन्तुकामा मुनयः कृतसंविदः ॥ ४
निर्गत्य तस्मात्सम्प्राप्य गिरेः काशीं समाहिताः ।
स्नातव्यमेवेति तदा ददृशुर्मणिकर्णिकाम् ॥ ५
तत्र स्नात्वा सुसन्तर्प्य देवादीनथ जाह्नवीम् ।
दृष्ट्वा स्नात्वा मुनीशास्ते विश्वेशं त्रिदशेश्वरम् ॥ ६
नमस्कृत्याथ सम्पूज्य भक्त्या परमयान्विताः ।
शतरुद्रादिभिः स्तुत्वा स्तुतिभिर्वेदपारगाः ॥ ७
आत्मानं मेनिरे सर्वे कृतार्था वयमित्युत ।
शिवप्रीत्या सुपूर्णार्थाः शिवभक्तिरताः सदा ॥ ८
तस्मिन्नवसरे सूतं पञ्चक्रोशदिदृक्षया ।
गत्वा समागतं वीक्ष्य मुदा ते तं ववन्दिरे ॥ ९
जो प्रधान ( प्रकृति ) और पुरुषके नियन्ता तथा सृष्टि- पालन - संहारके कारण हैं, उन पार्वतीसहित शिवजीको पार्षदों और पुत्रोंके साथ नमस्कार है ॥ १ ॥
ऋषि बोले- हमने अनेक आख्यानोंसे समन्वित मनोहर उमासंहिता सुनी, अब आप शिवतत्त्वको बढ़ानेवाली कैलाससंहिताका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
व्यासजी बोले – - हे वत्स! शिवतत्त्वसे युक्त, दिव्य तथा उत्कृष्ट कैलास नामक संहिताका वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग प्रेमपूर्वक सुनिये । पूर्वसमयमें हिमालयपर तप करनेवाले महातेजस्वी ऋषियोंने आपसमें विचारकर काशी जानेकी इच्छा की॥३-४ ॥ उस पर्वतसे चलकर एकाग्रचित्त हो काशी पहुँचकर वे स्नान करनेकी इच्छासे मणिकर्णिकाको देखने लगे ॥५ ॥
वेदमें पारंगत उन मुनियोंने वहाँ स्नानकर देवता आदिका तर्पण करके पुनः गंगाजीका दर्शनकर उस [ जल ] - में स्नान करके देवाधिदेव विश्वेश्वरको नमस्कारकर परम भक्तिसे युक्त होकर उनका पूजन करके शतरुद्रिय आदि मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करके अपनेको कृतार्थ समझा और कहा कि सर्वदा शिवभक्तिपरायण हमलोग [ आज ] शिवकृपासे पूर्णमनोरथवाले हो गये॥६–८ ॥ उसी समय पंचक्रोशको देखनेकी इच्छासे ( अर्थात् पंचक्रोशी परिक्रमा करनेके लिये ) आये हुए सूतजीको देखकर उनके पास जाकर उन सभीने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया॥९॥
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६१४ सोऽपि विश्वेश्वरं साक्षाद्देवदेवमुमापतिम् नमस्कृत्याथ तैः साकं मुक्तिमण्डपमाविशत् ॥ तत्रासीनं महात्मानं सूतं पौराणिकोत्तमम् अर्घ्यादिभिस्तदा सर्वे मुनयः समुपाचरन् ततः सूतः प्रसन्नात्मा मुनीनालोक्य सुव्रतान् । पप्रच्छ कुशलं तेऽपि प्रोचुः कुशलमात्मनः ते तु संहृष्टहृदयं ज्ञात्वा तं वै मुनीश्वराः । प्रणवार्थावगत्यर्थमूचुः प्रास्ताविकं वचः मुनय ऊचुः
व्यासशिष्य महाभाग सूत पौराणिकोत्तम ।
धन्यस्त्वं शिवभक्तो हि सर्वविज्ञानसागरः ॥
भवन्तमेव भगवान्व्यासः सर्वजगद्गुरुः ।
अभिषिच्य पुराणानां गुरुत्वे समयोजयत् ॥
तस्मात्पौराणिकी विद्या भवतो हृदि संस्थिता ।
पुराणानि च सर्वाणि वेदार्थं प्रवदन्ति हि ॥
वेदाः प्रणवसम्भूताः प्रणवार्थो महेश्वरः ।
अतो महेश्वरस्थानं त्वयि धिष्ण्यं प्रतिष्ठितम् ॥
त्वन्मुखाब्जपरिस्यन्दन्मकरंदमनोहरम् प्रणवार्थामृतं पीत्वा भविष्यामो गतज्वराः ॥
विशेषतो गुरुस्त्वं हि नान्योऽस्माकं महामते ।
परं भावं महेशस्य परया कृपया वद ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा सूतो व्यासप्रियः सुधीः ।
गणेशं षण्मुखं साक्षान्महेशानं महेश्वरीम् ॥
शिलादतनयं देवं नन्दीशं सुयशापतिम् ।
सनत्कुमारं व्यासं च प्रणिपत्येदमब्रवीत् ॥
सूत उवाच साधु साधु महाभागा मुनयः क्षीणकल्मषाः 1 मतिर्दृढतरा जाता दुर्लभा सापि दुष्कृताम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । इसके बाद उन्होंने भी साक्षात् देवाधिदेव उमापति १० विश्वेश्वरको प्रणामकर उन सभीके साथ मुक्तिमण्डपमें । प्रवेश किया । उसके अनन्तर सभी मुनियोंने अर्घ्यादि । [ पूजनद्रव्यों ] -से वहाँपर बैठे हुए पौराणिकोत्तम ॥ ११ महात्मा सूतजीका पूजन किया ॥ १०-११ ॥ तत्पश्चात् सूतजीने प्रसन्नचित्त होकर उत्तम ॥ १२ व्रतवाले मुनियोंकी ओर देखकर उनका कुशलक्षेम पूछा, तब उन सभीने भी अपना कुशल बताया । इसके बाद उन मुनीश्वरोंने उन्हें प्रसन्नचित्त जानकर प्रणवका ॥ १३ अर्थ जाननेके लिये प्रास्ताविक वचन कहना प्रारम्भ किया ॥ १२-१३ ॥ मुनि बोले — हे व्यासशिष्य! हे महाभाग! हे पौराणिकोत्तम सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि आप १४ समस्त विज्ञानके सागर एवं शिवभक्त हैं । सम्पूर्ण संसारके गुरु भगवान् व्यासजीने आपको सभी पुराणों गुरुरूपमें अभिषिक्तकर सर्वाधिक महत्त्व १५ प्रदान किया है । अतः [ समग्र ] पौराणिकी विद्या आपके हृदयमें स्थित है । सभी पुराण वेदार्थका १६ प्रतिपादन करते हैं । समग्र वेद प्रणवसे उत्पन्न हुए हैं और प्रणवका तात्पर्य [ स्वयं ] महेश्वर हैं, अतः महेश्वरका स्थान आपके [ हृदय- ] स्थलमें प्रतिष्ठित १७है । हमलोग आपके मुखकमलसे निकलते हुए सुन्दर मकरन्दसदृश प्रणवार्थरूप अमृतको पीकर १८ सन्तापरहित हो जायँगे । हे महामते! आप ही हम-लोगोंके विशेष गुरु हैं, कोई दूसरा नहीं, अतः आप १ ९ परम कृपापूर्वक महेश्वरके श्रेष्ठ श्रेष्ठ ज्ञानका उपदे कीजिये ॥ १४–१९ ॥ उनके इस वचनको सुनकर व्यासजीके परम २० प्रिय शिष्य विद्वान् सूतजी गणेश, कार्तिकेय, साक्षात् महेश्वर, शिलादके पुत्र तथा सुयशाके पति प्रभु नन्दीश्वर, सनत्कुमार तथा व्यासजीको नमस्कारकर २१ यह कहने लगे — ॥२०-२१ ॥ सूतजी बोले- हे पापरहित महाभाग्यशाली मुनियो! आपलोग धन्य हैं, जो कि आपलोगोंकी ऐसी अत्यन्त दृढ़ मति है, वह पापियोंके लिये [ सर्वथा ] २२ | दुर्लभ है ॥ २२ ॥
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अ ० १ ] कैलाससंहिता ६१५ पाराशर्येण गुरुणा नैमिषारण्यवासिनाम् । हे महर्षियो! पूर्व समयमें पराशरपुत्र गुरुदेव मुनीनामुपदिष्टं यद् वक्ष्ये तन्मुनिपुङ्गवाः ॥ २३ व्यासजीने नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंको जो उपदेश दिया था, उसीको मैं [ आपलोगोंसे ] कह रहा हूँ, यस्य श्रवणमात्रेण शिवभक्तिर्भवेन्नृणाम् । जिसके सुननेमात्रसे मनुष्योंमें शिवभक्ति उत्पन्न हो भवन्तोऽद्य शृण्वन्तु परया मुदा ॥ २४ जाती है, अब आपलोग सावधान होकर परम सावधाना प्रसन्नताके साथ उसे सुनिये ॥ २३-२४ ॥ स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं तपस्यन्तो दृढव्रताः । पूर्वकालमें स्वारोचिष मन्वन्तरमें दृढ़ व्रतवाले ऋषयो नैमिषारण्ये सर्वसिद्धनिषेविते ॥ २५ ऋषिगण सभी सिद्धोंके द्वारा निषेवित नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रं वितन्वन्तो रुद्रमध्वरनायकम् । तप करते हुए तथा यज्ञाधिपति रुद्रको प्रसन्न करते प्रीणयन्तः परं भावमैश्वर्यं ज्ञातुमिच्छवः ॥ २६ हुए उनके परम ऐश्वर्यको जाननेकी इच्छासे दीर्घसत्र करने
निवसन्ति स्म ते सर्वे व्यासदर्शनकांक्षिणः ।
शिवभक्तिरता नित्यं भस्मरुद्राक्षधारिणः ॥
तेषां भावं समालोक्य भगवान्बादरायणः ।
प्रादुर्बभूव सर्वात्मा पराशरतपः फलम् ॥
तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे प्रहृष्टवदनेक्षणाः ।
अभ्युत्थानादिभिः सर्वैरुपचारैरुपाचरन् ॥
सत्कृत्य प्रददुस्तस्मै सौवर्णं विष्टरं शुभम् ।
सुखोपविष्टः स तदा तस्मिन्सौवर्णविष्टरे ।
प्राह गंभीरया वाचा पाराशर्यो महामुनिः ॥
व्यास उवाच
कुशलं किं नु युष्माकं प्रब्रूतास्मिन्महामखे ।
अर्चितः किं नु युष्माभिः सम्यगध्वरनायकः ॥
किमर्थमत्र युष्माभिरध्वरे युष्माभिरध्वरे परमेश्वरः । स्वर्चितो भक्तिभावेन साम्बः संसारमोचकः युष्मत्प्रवृत्तिर्मे भाति शुश्रूषापूर्वमेव हि । लगे । इस प्रकार वे सब व्यासजीके दर्शनकी इच्छावाले महर्षि शिवभक्तिपरायण हो भस्म एवं रुद्राक्ष धारण २७ किये हुए वहाँ निवास करने लगे ॥ २५-२७ ॥ उनकी ऐसी भावना देखकर महर्षि पराशरके २८ तपः फलरूप सर्वात्मा भगवान् वेदव्यास वहींपर प्रकट हो गये । उन्हें देखकर प्रसन्न मुखकमल तथा नेत्रवाले मुनियोंने प्रत्युत्थान ( अगवानी ) आदि सभी उपचारोंसे २ ९ उनका पूजन किया और सत्कार करके उन्हें सुवर्णमय उत्तम आसन प्रदान किया । तब उस सुवर्णमय आसनपर सुखपूर्वक बैठे हुए महामुनि व्यासजी ३० गम्भीर वाणीमें कहने लगे - ॥ २८-३० ॥ व्यासजी बोले- आपलोग बतायें कि इस महायज्ञमें आपलोगोंका कुशल तो है, आपलोगोंने ३१ यज्ञाधिपति शिवका पूजन अच्छी प्रकार कर तो लिया है? आपलोगोंने इस यज्ञमें संसारसे मुक्त करनेवाले ॥ ३२ पार्वतीसहित सदाशिवका भक्तिभावसे किसलिये पूजन किया है? मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा है कि महेश्वर शिवके परभावमें आपलोगोंकी इस प्रकारकी प्रवृत्ति परभावे महेशस्य मुक्तिहेतोः शिवस्य च ॥३३ एवं शुश्रूषा मोक्ष पानेके लिये ही हुई है ॥ ३१-३३ ॥ एवमुक्ता मुनीन्द्रेण व्यासेनामिततेजसा मुनयो नैमिषारण्यवासिनः परमौजसः प्रणिपत्य महात्मानं पाराशर्यं महामुनिम् शिवानुरागसंहृष्टमानसं च तमब्रुवन् मुनय ऊचुः । अमित तेजस्वी व्यासजीके द्वारा इस प्रकार कहे ॥ ३४ जानेपर नैमिषारण्यवासी परम ओजस्वी मुनियोंने शिवके । अनुरागसे प्रसन्नचित्त उन महात्मा महामुनि व्यासजीको ॥ ३५ प्रणाम करके कहा- ॥ ३४-३५ ॥ मुनि बोले- साक्षात् विष्णुजीके अंशसे अवतार । धारण करनेवाले हे भगवन्! हे मुनिश्रेष्ठ! हे कृपानिधान! भगवन्मुनिशार्दूल साक्षान्नारायणांशज प्रभो ॥ ३६ हे महाप्राज्ञ! हे सर्वविद्येश्वर! हे प्रभो! आप सम्पूर्ण कृपानिधे महाप्राज्ञ सर्वविद्याधिप । जगत्के स्वामी, सृष्टिकर्ता एवं पार्वती तथा गणोंसंहित त्वं हि सर्वजगद्भर्तुर्महादेवस्य वेधसः
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ६१६ साम्बस्य सगणस्यास्य प्रसादानां निधिः स्वयम् ॥ ३७ त्वत्पादाब्जरसास्वादमधुपायितमानसाः 1 कृतार्था वयमद्यैव भवत्पादाब्जदर्शनात् ॥ ३८
त्वदीयचरणाम्भोजदर्शनं खलु पापिनाम् ।
दुर्लभं लब्धमस्माभिस्तस्मात्सुकृतिनो वयम् ॥ ३ ९
अस्मिन्देशे महाभाग नैमिषारण्यसंज्ञके ।
दीर्घसत्रान्विताः सर्वे प्रणवार्थप्रकाशकाः ॥ ४०
श्रोतव्यः परमेशान इति कृत्वा विनिश्चिताः ।
परस्परं चिन्तयन्तः परं भावं महेशितुः ॥ ४१
अज्ञातवन्त एवैते वयं तस्माद्भवान्प्रभो ।
छेत्तुमर्हति तान्सर्वान् संशयानल्पचेतसाम् ॥ ४२
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न हि जगत्त्रये ।
तस्मादपारगंभीरव्यामोहाब्धौ निमज्जतः ॥ ४३
तारयस्व शिवज्ञानपोतेनास्मान्दयानिधे ।
शिवसद्भक्तितत्त्वार्थं ज्ञातुं श्रद्धालवो वयम् ॥ ४४
एवमभ्यर्थितस्तत्र मुनिभिर्वेदपारगैः ।
सर्ववेदार्थविन्मुख्यः शुकतातो महामुनिः ।
वेदान्तसारसर्वस्वं प्रणवं परमेश्वरम् ॥ ४५
ध्यात्वा हृत्कर्णिकामध्ये साम्बं संसारमोचकम् ।
प्रहृष्टमानसो भूत्वा व्याजहार महामुनिः ॥ ४६ ।
इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां । इन महादेवकी कृपाके साक्षात् समुद्र हैं । आप | चरणकमलके मकरन्दके स्वादमें [ आसक्त हुए ] भ्रमरस्वरूप मनवाले हमलोग आज आपके चरण-कमलके दर्शनसे कृतार्थ हो गये हैं । हमलोगोंने पापीजनोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ आपके चरणकमलका दर्शन प्राप्त किया, अतः हमलोग महान् पुण्यवाले हैं ॥ ३६–३९ ॥ हे महाभाग! प्रणवके अर्थको प्रकाशित करनेकी इच्छावाले हमलोग नैमिषारण्य नामक इस महातीर्थमें महासत्र सम्पादित कर रहे हैं । महेश्वरके परम भावका चिन्तन करते हुए हमलोगोंने यह निश्चय किया है कि परमेश्वरके विषयमें सुनना चाहिये । हे प्रभो! अभीतक हमलोग उनकी महिमाको नहीं जान पाये हैं । अतः आप हम अल्पबुद्धिवालोंके उन समस्त सन्देहोंको दूर करनेकी कृपा करें । इस त्रिलोकीमें आपके अतिरिक्त कोई दूसरा इस संशयको दूर करनेवाला नहीं है । अतः हे दयानिधे! आप इस अपार तथा अथाह भ्रम - सागरमें डूबते हुए हमलोगोंको शिवज्ञानरूपी नौकासे पार कर दीजिये; हमलोग शिवकी उत्तम भक्तिके तत्त्वार्थको जाननेके लिये श्रद्धायुक्त हैं॥४०–४४ ॥ इस प्रकार वेदोंमें पारंगत मुनियोंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर समस्त वेदार्थके ज्ञाताओंमें मुख्य शुकदेवके पिता महामुनि व्यासजी वेदान्तके सारसर्वस्व प्रणवरूप तथा संसारसे मुक्त करनेवाले पार्वतीसहित परमेश्वरका अपने हदयकमलमें ध्यान करके प्रसन्नचित्त होकर कहने लगे - ॥ ४५-४६ ॥ व्यासशौनकादिसंवादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
कीहर ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें व्यासशौनकादिसंवाद नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवान् शिवसे पार्वतीजीकी प्रणवविषयक जिज्ञासा व्यास उवाच व्यासजी बोले — हे ब्राह्मणो! परम सौभाग्यशाली साधु पृष्टमिदं विप्रा भवद्भिर्भाग्यवत्तमैः । आपलोगोंने यह बहुत अच्छी बात पूछी है; क्योंकि प्रणवार्थको प्रकाशित करनेवाला शिवज्ञान [ सर्वथा ] दुर्लभं हि शिवज्ञानं प्रणवार्थप्रकाशकम् ॥ १ दुर्लभ है ॥ १ ॥