शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 661–670

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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अ ० ९ ] कैलाससंहिता ६४७

गुरुभक्ताय शान्ताय मदर्थे योगभागिने ।

ममाज्ञामतिलंघ्यैतद्यो ददाति विमूढधीः ॥ ४५

स नारकी मम द्रोही भविष्यति न संशयः ।

मद्भक्तदानाद्देवेशि मत्प्रियश्च भवेद् ध्रुवम् ।

इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्मत्सान्निध्यमवाप्नुयात् ॥ ४६

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा महादेवी महादेवेन भाषितम् ।

स्तुत्वा तु विविधैः स्तोत्रैर्देवं वेदार्थगर्भितैः ॥ ४७

श्रीमत्पादाब्जयोः पत्युः प्रणामं परमेश्वरी ।

अतिप्रहृष्टहृदया मुमोद मुनिसत्तमाः ॥ ४८

अतिगुह्यमिदं विप्राः प्रणवार्थप्रकाशकम् ।

शिवज्ञानपरं ह्येतद्भवतामार्तिनाशनम् ॥ ४ ९

सूत उवाच

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलः पाराशर्यो महातपाः ।

पूजितः परया भक्त्या मुनिभिर्वेदवादिभिः ॥ ५०

कैलासाद्रिमनुस्मृत्य ययौ तस्मात्तपोवनात् ।

तेऽपि प्रहृष्टहृदयाः सत्रान्ते परमेश्वरम् ॥ ५१

सम्पूज्य परया भक्त्या सोमं सोमार्धशेखरम् ।

यमादियोगनिरताः शिवध्यानपराभवन् ॥ ५२

गुहाय कथितं ह्येतद्देव्या तेनापि नन्दिने ।

सनत्कुमारमुनये प्रोवाच भगवान् हि सः ॥५३

तस्माल्लब्धं मद्गुरुणा व्यासेनामिततेजसा ।

तस्माल्लब्धमिदं पुण्यं मयापि मुनिपुङ्गवाः ॥ ५४

मया वः श्रावितं ह्येतद् गुह्याद् गुह्यतरं परम् ।

ज्ञात्वा शिवप्रियान्भक्त्या भवतो गिरिशप्रियम् ॥ ५५

भवद्भिरपि दातव्यमेतद् गुह्यं शिवप्रियम् ।

यतिभ्यः शान्तचित्तेभ्यो भक्तेभ्यः शिवपादयोः ॥ ५६

महाभागः सूतः पौराणिकोत्तमः । गुरुभक्त, शान्तचित्त तथा मेरी प्राप्तिके लिये योगपरायण [ यति ] -को ही इसे प्रदान करे, किंतु मेरी आज्ञाका उल्लंघनकर जो बुद्धिहीन इसे अपात्रको देता है, वह मेरा द्रोही है और वह नरकमें जायगा, इसमें सन्देह नहीं है । हे देवेशि! इस पूजाको जो मेरे भक्तोंको देता है, वह मेरा प्रिय होता है, वह इस लोकके सभी भोगोंको भोगकर अन्तमें मेरा सान्निध्य प्राप्त कर लेता है ॥ ४५-४६ ॥ व्यासजी बोले- हे मुनिगणो! शिवजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर अतिप्रसन्न हृदयवाली परमेश्वरी पार्वती वेदार्थयुक्त अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुतिकर तथा अपने पतिके श्रीसम्पन्न चरण - कमलोंमें प्रेमपूर्वक नमस्कारकर बहुत ही हर्षित हुईं ॥ ४७-४८ ॥ हे ब्राह्मणो! प्रणवार्थकी प्रकाशिका यह विधि अत्यन्त गुप्त है, शिवज्ञानसे पूर्ण है और आपलोगोंके सभी दुःखोंको दूर करनेवाली है ॥४ ९ ॥ सूतजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार कहकर महातपस्वी पराशरपुत्र व्यासदेव वेदवेत्ता महर्षियोंसे परम भक्तिपूर्वक पूजित हो [ शिवजीका ] स्मरणकर उस तपोवनसे कैलासपर्वतकी ओर चले गये । ऋषिगण भी प्रसन्नचित्त होकर यज्ञके अन्तमें उत्तम भक्तिभावपूर्वक चन्द्रशेखर परमेश्वर शंकरका पूजनकर यमादि योगोंमें तत्पर हो शिवध्यानपरायण हो गये ॥ ५०–५२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो! इस कथाको देवीने स्कन्दसे, स्कन्दने नन्दीसे, भगवान् नन्दीने मुनिवर सनत्कुमारसे कहा था और सनत्कुमारने भगवान् वेदव्याससे कहा । इसके पश्चात् उन महातेजस्वी व्यासजीद्वारा यह पवित्र प्रसंग मैंने प्राप्त किया॥५३-५४ ॥ [ हे मुनिश्रेष्ठ! ] मैंने यह गुह्यातिगुह्य तथा शिवप्रिय चरित्र आपलोगोंको शिवभक्त जानकर भक्तिपूर्वक सुनाया ॥ ५५ ॥

शिवजीको प्रिय, अत्यन्त गुप्त तथा प्रणवार्थप्रकाशक, जो यह चरित्र है, उसे आपलोगोंको भी शिवजीके चरणोंमें भक्ति रखनेवाले शान्तचित्त यतियोंको ही देना चाहिये ॥ ५६ ॥

पुराणवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी इस प्रकार कहकर एतदुक्त्वा पृथिवीमिमाम् ॥ ५७ | तीर्थयात्राके प्रसंगसे पृथ्वीपर भ्रमण करने लगे ॥ ५७ ॥

तीर्थयात्राप्रसङ्गेन चचार

पृष्ठ 662

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० ६४८ इसके पश्चात् सूतजीसे इस गुप्त रहस्यको एतद्रहस्यं परमं लब्ध्वा सूतान्मुनीश्वराः । | ग्रहणकर वे सभी ऋषि काशीमें निवासकर मुक्त हो

समासीना मुक्ताः शिवपदं ययुः ॥ ५८ । गये और शिवजीके धामको चले गये ॥ ५८ ॥

काश्यामेव प्रणवार्थपद्धतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां प्रणवार्थपद्धति-॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें वर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः सूतजीका काशीमें आगमन व्यास उवाच गतेऽथ सूते मुनयः सुविस्मिता विचिन्त्य चान्योऽन्यमिदं तु विस्मृतम् यद्वामदेवस्य मतं मुनीश्वर प्रसूचितं तत्खलु कष्टमद्य नः ॥ कदानुभूयान्मुनिवर्यदर्शनं भवाब्धिदुःखौघहरं परं हि तत् । महेश्वराराधनपुण्यतोऽधुना मुनीश्वरः सत्वरमाविरस्तु नः ॥

इति चिन्तासमाविष्टा मुनयो मुनिपुङ्गवम् ।

व्यासं संपूज्य हृत्पद्मे तस्थुस्तद्दर्शनोत्सुकाः ॥

संवत्सरान्ते स पुनः काशीं प्राप महामुनिः ।

शिवभक्तिरतो ज्ञानी पुराणार्थप्रकाशकः ॥

तं दृष्ट्वा सूतमायान्तं मुनयो हृष्टचेतसः ।

अभ्युत्थानासनार्घ्यादिपूजया समपूजयन् ॥

सोऽपि तान्मुनिशार्दूलानभिनन्द्य स्मितोदरम् ।

प्रीत्या स्नात्वा जाह्नवीये जले परमपावने ॥

ऋषीन्संतर्प्य च सुरान् पितॄंश्च तिलतण्डुलैः ।

तीरमागत्य सम्प्रोक्ष्य वाससी परिधाय च ॥

द्विराचम्य समादाय भस्म सद्यादिमन्त्रतः ।

उद्धूलनादिक्रमतो विधार्याथ मुनीश्वरः ॥

रुद्राक्षमालाभरणः कृतनित्यक्रियः सुधीः । व्यासजी बोले- हे मुनीश्वर! सूतजीके चले जानेपर मुनिगण बहुत ही आश्चर्यचकित हुए और । आपसमें विचार करके कहने लगे कि वामदेवका मत जिसे सूतजीने कहा था और जो बहुत कठिन है, उसे १ तो हमलोगोंने भुला दिया ॥१ ॥

अब यही ज्ञात नहीं कि उन मुनिवर्यके कब दर्शन होंगे? उनका उत्तम दर्शन तो संसारसागरके दुःखसमूहसे पार करनेवाला है । हमारी इच्छा है कि महेश्वरके आराधनरूप पुण्यप्रतापसे शीघ्र ही सूतजीका २ दर्शन प्राप्त हो ॥२ ॥

इस प्रकारकी चिन्तामें निमग्न सभी मुनिगण ३ हृदयकमलमें व्यासजीकी पूजा करके उत्सुकतापूर्वक उनके दर्शनकी प्रतीक्षा करते हुए वहीं स्थित हो गये । एक संवत्सरके बीत जानेके बाद शिवभक्त, ज्ञानी एवं ४ पुराणार्थ - प्रकाशक महामुनि सूतजी पुनः काशीमें आये ॥ ३-४ ॥ सूतजीको आता हुआ देखकर ऋषिगण बहुत ५ ही प्रसन्न हुए और उन्होंने स्वागत, आसनदान तथा अर्घ्यदान आदिसे उनकी पूजा की ॥ ५ ॥

इसके पश्चात् सूतजीने उन श्रेष्ठ मुनिगणोंद्वारा ६ पूजित हो प्रसन्नतापूर्वक मन्द - मन्द मुसकराकर उनका अभिनन्दन किया । तदनन्तर उन्होंने गंगाजीके परम पवित्र जलमें स्नानकर ऋषिगणों, देवगणों और पितरोंका ७ अक्षत एवं तिलादिसे तर्पणकर तटपर आ करके शरीरको पोंछकर वस्त्र एवं उत्तरीय धारण किया और दो बार ८ आचमन करके भस्म लेकर सद्योजातादि मन्त्रसे क्रमशः भस्मोद्धूलन किया । रुद्राक्षमाला धारणकर उन बुद्धिमान् सूतजीने अपना नित्यकर्म सम्पादन किया

पृष्ठ 663

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अ ० १० ] कैलाससंहिता ६४ ९ यथोक्ताङ्गेषु विधिना त्रिपुण्ड्रं रचति स्म ह ॥ ९ ।

विश्वेश्वरमुमाकान्तं ससुतं सगणाधिपम् । ।

पूजयामास सद्भक्त्या ह्यस्तौ नत्वा मुहुर्मुहुः ॥ १०

काल भैरवनाथं च संपूज्याथ विधानतः ।

प्रदक्षिणीकृत्य पुनस्त्रेधा नत्वा च पञ्चधा ॥ ११

पुनः प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य भुवि दण्डवत् ।

तुष्टाव परया स्तुत्या संस्मरंस्तत्पदाम्बुजम् ॥ १२

श्रीमत्पञ्चाक्षरीं विद्यामष्टोत्तरसहस्रकम् ।

संजप्य पुरतः स्थित्वा क्षमापय्य महेश्वरम् ॥ १३

चण्डीशं सम्प्रपूज्याथ मुक्तिमण्डपमध्यतः ।

निर्दिष्टमासनं भेजे मुनिभिर्वेदपारगैः ॥ १४

एवं स्थितेषु सर्वेषु नमस्कृत्य समन्त्रकम् ।

अथ प्राह मुनीन्द्राणां भाववृद्धिकरं वचः ॥ १५

सूत उवाच

धन्या यूयं महाप्राज्ञा मुनयः शंसितव्रताः ।

भवदर्थमिह प्राप्तोऽहं तद्वृत्तमिदं शृणु ॥ १६

यदाहमुपदिश्याथ भवतः प्रणवार्थकम् ।

गतस्तीर्थाटनार्थाय तद्वृत्तान्तं ब्रवीमि वः ॥ १७

इतो निर्गत्य सम्प्राप्य तीरं दक्षपयोनिधेः ।

स्नात्वा सम्पूज्य विधिवद्देवीं कन्यामयीं शिवाम् ।

पुनरागत्य विप्रेन्द्राः सुवर्णमुखरीतटम् ॥ १८

श्रीकालहस्तिशैलाख्यनगरे परमाद्भुते ।

सुवर्णमुखरीतोये स्नात्वा देवानृषीनपि ॥ १ ९

सन्तर्प्य विधिवद्भक्त्या समुद्रं गिरिशं स्मरन् ।

समर्च्य कालहस्तीशं चन्द्रकान्तसमप्रभम् ॥ २०

पश्चिमाभिमुखं पञ्चशिरसं परमाद्भुतम् । और विधिपूर्वक उन - उन स्थानोंपर त्रिपुण्ड्र लगाकर प्रधान गण तथा गणपतिसहित उमाकान्त भगवान् विश्वेश्वरका उत्तम भक्तिभावसे पूजन किया तथा बार - बार हाथ जोड़कर नमस्कार किया ॥ ६–१० ॥ इसके बाद उन्होंने विधिविधानसे काल-भैरवनाथकी पूजाकर तीन बार प्रदक्षिणापूर्वक पाँच बार उन्हें नमस्कार किया और पुनः प्रदक्षिणापूर्वक पृथ्वीपर साष्टांग प्रणामकर उनके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए पराभक्तिसे युक्त हो उनकी स्तुति की ॥ ११-१२ ॥ उन्होंने एक हजार आठ बार ऐश्वर्यमयी पंचाक्षरी विद्याका जपकर महेश्वरके सम्मुख स्थित हो उनसे क्षमा - प्रार्थना की । इसके बाद वे मुक्ति मण्डपके बीचमें चण्डीश्वरकी पूजाकर वेदविद्याविशारद महर्षियोंके द्वारा निर्दिष्ट आसनपर बैठे ॥ १३-१४ ॥ जब सभी लोग बैठ गये । तब वे मन्त्रपूर्वक शान्तिपाठ, मंगलाचरणादि करनेके उपरान्त मुनिगणोंके हृदयमें सद्भावकी वृद्धि करते हुए इस प्रकार कहने लगे —॥१५ ॥

सूतजी बोले- प्रशंसनीय व्रतवाले हे महाप्राज्ञ ऋषियो! आपलोग धन्य हैं, आपलोगोंके पास मैं जिस उद्देश्यसे आया हूँ, उसका वृत्तान्त आपलोग सुनें ॥ १६ ॥

आपलोगोंको प्रणवका उपदेश देकर उस समयमें मैं तीर्थयात्रा करने चला गया था, अब उसका वृत्तान्त आपलोगोंसे कह रहा हूँ ॥१७ ॥

सर्वप्रथम मैं यहाँसे चलकर दक्षिण समुद्रतटपर गया, वहाँपर स्नानकर विधिपूर्वक कन्याकुमारी देवी शिवाका पूजन किया । इसके पश्चात् हे ब्राह्मणो! वहाँसे सुवर्णमुखरीके तटपर गया । वहाँ कालहस्ती शैल नामक अत्यन्त अद्भुत नगर है, जहाँ सुवर्णमुखरीके जलमें स्नान करके देवगणों तथा ऋषिगणोंका भक्तिके साथ विधिपूर्वक तर्पणकर समुद्र और भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए चन्द्रकान्तके समान प्रभामण्डलसे युक्त पश्चिमाभिमुख स्थित, पाँच सिरवाले, अत्यन्त अद्भुत, एक ही बारके दर्शनसे सारे पापोंको विनष्ट सकृद्दर्शनमात्रेण सर्वाघक्षयकारणम् ॥ २१ करनेवाले, सभी प्रकारकी सिद्धि, भुक्ति तथा मुक्ति भुक्तिमुक्तिदं त्रिगुणेश्वरम् । देनेवाले त्रिगुणेश्वर कालहस्तीश्वरका पूजन किया सर्वसिद्धिप्रदं

पृष्ठ 664

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० ६५० ततश्च परया भक्त्या तस्य दक्षिणगां शिवाम् ॥ २२

ज्ञानप्रसूनकलिकां समर्च्य हि जगत्प्रसूम् ।

श्रीमत्पञ्चाक्षरीं विद्यामष्टोत्तरसहस्रकम् ॥ २३

जप्त्वा प्रदक्षिणीकृत्य स्तुत्वा नत्वा मुहुर्मुहुः ॥ २४

ततः प्रदक्षिणीकृत्य गिरिं प्रत्यहमादरात् ।

आमोदतीव मनसि प्रत्यहं नियमास्थितः ॥ २५

अनयन् चतुरो मासानेवं तत्र मुनीश्वराः ।

ज्ञानप्रसूनकलिकामहादेव्याः प्रसादतः ॥ २६

एकदा तु समास्तीर्य चैलाजिनकुशोत्तरम् ।

आसनं परमं तस्मिन् स्थित्वा रुद्धेन्द्रियो मुनिः ॥ २७

समाधिमास्थाय सदा परमानंदचिद्धनः ।

परिपूर्णः शिवोऽस्मीति निर्व्यग्रहृदयोऽभवम् ॥ २८

एतस्मिन्नेव समये मद्गुरुः करुणानिधिः ।

नीलजीमूतसङ्काशो विद्युत्पिङ्गजटाधरः ॥ २ ९

प्रांशुः कमण्डलूदण्डकृष्णाजिनधरः स्वयम् ।

भस्मावदातसर्वाङ्गः सर्वलक्षणलक्षितः ॥ ३०

त्रिपुण्ड्रविलसद्भालो रुद्राक्षालङ्कृताकृतिः । पद्मपत्रारुणायामविस्तीर्णनयनद्वयः ॥ ३१

प्रादुर्भूय हृदम्भोजे तदानीमेव सत्वरम् ।

विमोहितस्तदैवासमेतदद्भुतमास्तिकाः ॥ ३२

तत उन्मील्य नयने विलापं कृतवानहम् ।

आसीन्ममाश्रुपातश्च गिरिनिर्झरसन्निभः ॥ ३३

एतस्मिन्नेव समये श्रुता वागशरीरिणी ।

व्योम्नो महाद्भुता विप्रास्तामेव शृणुतादरात् ॥ ३४

सूतपुत्र महाभाग गच्छ वाराणसीं पुरीम् । तत्रासन्मुनयः पूर्वमुपदिष्टास्त्वयाधुना | और बादमें मैंने भक्तिभावसमन्वित हो उनके | दक्षिण भागमें विराजमान पार्वती, जो जगत्को | उत्पन्न करनेवाली तथा ब्रह्मज्ञानरूपी पुष्पकी कली हैं उनका पूजन किया और एक हजार आठ बार, | ऐश्वर्यशालिनी पंचाक्षरी महाविद्याका जपकर उनकी | प्रदक्षिणा तथा स्तुति करके बार - बार उन्हें नमस्कार किया॥१८–२४ ॥ इसके बाद मैं प्रसन्नतापूर्वक प्रतिदिन काल-हस्तीश्वरकी प्रदक्षिणा करते हुए नियमपूर्वक उसी क्षेत्रमें निवास करने लगा । हे मुनीश्वरो! इस प्रकार मैंने ज्ञानप्रसूनकी कलिका श्रीमहादेवीकी कृपासे चार महीनेका समय उस क्षेत्रमें बिताया ॥ २५ - २६ ॥ तदनन्तर एक बार जब मैं कुशा, मृगचर्म एवं उसके ऊपर वस्त्रका आसन बिछाकर उसपर बैठकर मौन धारण करके इन्द्रियोंको रोककर समाधिस्थ हो ‘ मैं सर्वदा परमानन्द चिद्धन परिपूर्ण शिव हूँ ' – इस प्रकार ध्यान करता हुआ हृदयमें शान्तिका अनुभव कर रहा था कि इतनेमें ही नीले मेघके समान कान्तियुक्त, बिजलीके समान पीली जटा धारण किये, विशालकाय, कमण्डलुदण्ड एवं कृष्णाजिन धारण किये, सम्पूर्ण अंगोंमें भस्म लगाये हुए, सभी प्रकारके लक्षणोंसे युक्त, ललाटपर त्रिपुण्ड्र धारण किये तथा रुद्राक्षसे अलंकृत देहवाले मेरे सद्गुरु करुणा - वरुणालय व्यासजी मेरे हृदयकमलमें प्रकट हो गये । हे मुनियो! उनके दोनों नेत्र कमलदलके समान अरुण तथा विस्तृत थे । हे आस्तिक मुनियो! इस प्रकार अपने हृदयकमलमें [ परिपूर्ण शोभासे समन्वित ] व्यासजीके अद्भुत प्राकट्यको देखकर मैं सर्वथा मोहित हो गया ॥ २७–३२ ॥ इसके पश्चात् मैं नेत्र खोलकर विलाप करने लगा । उस समय पर्वतके झरनेके समान मेरे नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी । हे विप्रो! ठीक उसी समय मुझे आकाशमण्डलसे परम आश्चर्यमयी अव्यक्त वाणी सुनायी पड़ी । आपलोग उसे आदरपूर्वक सुनें ॥ ३३-३४ ॥ हे महाभाग! हे लोमहर्षण! हे सूतपुत्र! तुम शीघ्र ही वाराणसीपुरी जाओ, पूर्व समयमें वहाँपर ॥ ३५ । जिन मुनियोंको तुमने उपदेश दिया था, वे मुनिगण

पृष्ठ 665

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अ ० ११ ] कैलाससंहिता ६५१

त्वदुपागमकल्याणं कांक्षन्ते विवशा भृशम् ।

तिष्ठन्ति ते निराहारा इत्युक्त्वा विरराम सा ॥

तत उत्थाय तरसा देवं देवीं च भक्तितः ।

प्रदक्षिणीकृत्य पुनः प्रणम्य भुवि दण्डवत् ॥

द्विषड्वारं गुरोराज्ञां विज्ञाय शिवयोरथ ।

क्षेत्रान्निर्गत्य तरसा चत्वारिंशद्दिनान्तरे ॥

आगतोऽस्मि मुनिश्रेष्ठा अनुगृह्णन्तु मामिह ।

मया किमद्य वक्तव्यं भवन्तस्तद् ब्रुवन्तु मे ॥

इति सूतवचः श्रुत्वा ऋषयो हृष्टमानसाः । अवोचन्मुनिशार्दूलं व्यासं नत्वा मुहुर्मुहुः निराहार व्रत करते हुए अपने कल्याणकी कामनासे ३६ तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, ऐसा कहकर आकाशवाणी विरत गयी ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर मैं शीघ्र ही उठकर शिव तथा शिवाको ३७ भक्तिपूर्वक भूमिपर दण्डवत् प्रणाम करके पुनः बारह बार उनकी प्रदक्षिणाकर गुरुकी आज्ञाको जानकर शिव ३८ तथा शिवाके उस क्षेत्रसे शीघ्र निकलकर अब चालीस दिनके बाद यहाँ पहुँचा हूँ । हे मुनिश्रेष्ठो! अब आपलोग मेरे ऊपर दया कीजिये । मैं आपलोगोंसे इस समय ३ ९ क्या कहूँ, उसे आपलोग मुझसे कहिये ॥ ३७–३९ ॥ सूतजीका यह वचन सुनकर ऋषियोंने प्रसन्नचित्त होकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको बारंबार प्रणाम करके ॥ ४० यह कहा - ॥ ४० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां सूतोपदेशो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें सूतोपदेश नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः भगवान् कार्तिकेयसे ऋषय ऊचुः

सूत सूत महाभाग त्वमस्मद्गुरुरुत्तमः ।

अतस्त्वां परिपृच्छामो भवतोऽनुग्रहो यदि ॥

श्रद्धालुषु च शिष्येषु त्वादृशा गुरवः सदा ।

स्निग्धभावा इतीदं नो दर्शितं भवताधुना ॥

विरजाहोमसमये वामदेवमतं पुरा ।

सूचितं भवतास्माभिर्न श्रुतं विस्तरान्मुने ॥

तदिदानीं श्रोतुकामाः श्रद्धया परमादरात् ।

वयं सर्वे कृपासिंधो प्रीत्या तद्वक्तुमर्हसि ॥

इति तेषां वचः श्रुत्वा सूतो हृष्टतनूरुहः ।

नमस्कृत्य महादेवं गुरोः परतरं गुरुम् ॥

महादेवीं त्रिजननीं गुरुं व्यासं च भक्तितः ।

प्राह गम्भीरया वाचा मुनीनाह्लादयन्निदम् ॥

सूत उवाच

स्वस्त्यस्तु मुनयः सर्वे सुखिनः सन्तु सर्वदा ।

शिवभक्ताः स्थिरात्मानः शिवभक्तिप्रवर्तकाः ॥

वामदेवमुनिकी प्रणवजिज्ञासा ऋषिगण बोले - – हे सूतजी! हे महाभाग! आप हमलोगोंके श्रेष्ठ गुरु हैं, आपकी [ हम सबपर बड़ी ] १ कृपा है, इसीलिये हमलोग आपसे पूछ रहे हैं । आप-जैसे गुरु श्रद्धालु शिष्योंके प्रति सदा स्नेहभाव रखते हैं, २ ऐसा आपने इस समय प्रदर्शित कर दिया ॥ १-२ ॥ हे मुने! पहले आपने विरजाहोमके उपदेशके ३ समय वामदेवके मतको बताया था, उसे हमलोगोंने विस्तारपूर्वक नहीं सुना है । हे कृपासिन्धो! इस समय हम सभी लोग श्रद्धा और बड़े ही आदरसे उसे सुनना ४ चाहते हैं, अतः आप प्रेमपूर्वक उसे कहिये ॥ ३-४ ॥ उनका यह वचन सुनकर सूतजी हर्षसे प्रफुल्लित ५ हो गुरुसे भी श्रेष्ठ गुरु महादेवको, तीनों लोकोंकी जननी महादेवीको तथा [ अपने ] गुरु व्यासजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके मुनियोंको प्रसन्न करते हुए ६ गम्भीर वाणीमें यह कहने लगे ॥५-६ ॥ सूतजी बोले- हे मुनियो! आप सभीका कल्याण हो, आपलोग सर्वदा सुखी रहें, आपलोग शिवभक्त, ७ स्थिरचित्त तथा शिवभक्तिका प्रचार करनेवाले हैं । मैंने

पृष्ठ 666

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ ६५२ तदतीव विचित्रं हि श्रुतं गुरुमुखाम्बुजात् । गुरुके मुखकमलसे यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनी थी, इतः पूर्वं मया नोक्तं गुह्यप्राकट्यशंकया यूयं खलु महाभागाः शिवभक्ता दृढव्रताः इति निश्चित्य युष्माकं वक्ष्यामि श्रूयतां मुदा पुरा रथन्तरे कल्पे वामदेवो महामुनिः गर्भमुक्तः शिवज्ञानविदां गुरुतमः स्वयम् वेदागमपुराणादिसर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् देवासुरमनुष्यादिजीवानां जन्मकर्मवित् भस्मावदातसर्वाङ्गो जटामण्डलमण्डितः । निराश्रयो निःस्पृहश्च निर्द्वन्द्वो निरहंकृतिः

दिगंबरो महाज्ञानी महेश्वर इवापरः ।

शिष्यभूतैर्मुनीन्द्रैश्च तादृशैः परिवारितः ॥

पर्यटन्पृथिवीमेतां स्वपादस्पर्शपुण्यतः ।

पवित्रयन्परे धाम्नि निमग्नहृदयोऽन्वहम् ॥

कुमारशिखरं मेरोर्दक्षिणं प्राविशन्मुदा ।

यत्रास्ते भगवानीशतनयः शिखिवाहनः ॥

ज्ञानशक्तिधरो वीरः सर्वासुरविमर्दनः ।

गजावल्लीसमायुक्तः सर्वैर्देवैर्नमस्कृतः ॥

तत्र स्कन्दसरो नाम सरः सागरसन्निभम् ।

शिशिरस्वादुपानीयं स्वच्छागाधबहूदकम् ॥

सर्वाश्चर्यगुणोपेतं विद्यते स्वामिसन्निधौ ।

तत्र स्नात्वा वामदेवः सहशिष्यैर्महामुनिः ॥

कुमारं शिखरासीनं मुनिवृन्दनिषेवितम् ।

उद्यदादित्यसंकाशं मयूरवरवाहनम् ॥

चतुर्भुजमुदाराङ्गं मुकुटादिविभूषितम् ।

शक्तिरत्नद्वयोपास्यं शक्तिकुक्कुटधारिणम् ॥

वरदाभयहस्तं च दृष्ट्वा स्कन्दं मुनीश्वरः ।

सम्पूज्य परया भक्त्या स्तोतुं समुपचक्रमे ॥

॥ ८ परंतु इस गुह्य रहस्यको प्रकट हो जानेके भयसे । आजतक किसीसे नहीं कहा । आपलोग निश्चितरूपसे । । शिवभक्त, दृढव्रती एवं महाभाग्यशाली हैं- ऐसा ॥ ९ सोचकर मैं आपलोगोंसे कह रहा हूँ, प्रसन्नतापूर्वक सुनिये ॥७ – ९ ॥ । पूर्व समयमें रथन्तर कल्पमें महामुनि वामदेवजी ॥ १० गर्भसे उत्पन्न होते ही सभी शिवज्ञानवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाने लगे । वे वेद, आगम, पुराण आदि ॥ ११ । सभी शास्त्रोंके अर्थतत्त्वके ज्ञाता और देव, असुर, मनुष्य आदि सभी जीवोंके जन्म एवं कर्मके वेत्ता थे । वे सम्पूर्ण शरीरमें भस्मलेपसे युक्त, जटामण्डलसे ॥ १२ मण्डित, निराश्रय, निःस्पृह, निर्द्वन्द्व, अहंकारहीन, दिगम्बर, महाज्ञानी तथा दूसरे शिवके समान थे और १३ अपने ही सदृश बड़े - बड़े शिष्यरूप मुनियोंसे सदा घिरे रहते थे । परब्रह्ममें सदा निमग्न चित्तवाले, भ्रमणनिरत तथा अपने चरणोंके स्पर्शजनित पुण्यसे इस पृथ्वीको १४ पवित्र करते हुए वे एक समय मेरुके दक्षिणमें स्थित कुमारशिखरपर प्रसन्नतापूर्वक पहुँचे, जहाँ ज्ञानरूपी १५ शक्तिको धारण करनेवाले, महावीर, सभी असुरोंके विनाशक [ अपनी पत्नी ] गजावल्लीसे सुशोभित तथा १६ सभी देवगणोंके द्वारा नमस्कृत शिवपुत्र भगवान् कार्तिकेय विराजमान थे॥१०–१६ ॥ वहाँ स्कन्दसर नामका सरोवर था, जो सागरके १७ समान गम्भीर, शीतल एवं स्वादिष्ट जलसे परिपूर्ण, अत्यन्त स्वच्छ, अगाध तथा पर्याप्त जलवाला था । सभी आश्चर्यमय गुणोंसे युक्त वह सरोवर स्वामी १८ कार्तिकेयके समीप विद्यमान था । महामुनि वामदेव अपने शिष्योंके साथ उसमें स्नान करके कुमारशिखरपर १ ९ विराजमान, मुनिवृन्दद्वारा सेवित, उदीयमान सूर्यके समान तेजस्वी, श्रेष्ठ मयूरपर आरूढ़, चार भुजाओंवाले, मनोहर विग्रहवाले, मुकुट आदिसे विभूषित, रत्नभूत २० दो शक्तियोंसे उपासित, [ अपने चारों हाथोंमें ] शक्ति, कुक्कुट, वर तथा अभय मुद्रा धारण करनेवाले स्कन्दको देखकर परम भक्तिसे उनका पूजन करके २१ | स्तुति करने लगे ॥१७- २१ ॥

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अ ० ११ ] कैलाससंहिता ६५३ वामदेव उवाच

ॐ नमः प्रणवार्थाय प्रणवार्थविधायिने ।

प्रणवाक्षरबीजाय प्रणवाय नमो नमः ॥ २२

वेदान्तार्थस्वरूपाय वेदान्तार्थविधायिने ।

वेदान्तार्थविदे नित्यं विदिताय नमो नमः ॥२३

नमो गुहाय भूतानां गुहासु निहिताय च ।

गुह्याय गुह्यरूपाय गुह्यागमविदे नमः ॥ २४

अणोरणीयसे तुभ्यं महतोऽपि महीयसे ।

नमः परावरज्ञाय परमात्मस्वरूपिणे ॥ २५

स्कन्दाय स्कन्दरूपाय मिहिरारुणतेजसे ।

नमो मन्दारमालोद्यन्मुकुटादिभृते सदा ॥ २६

शिवशिष्याय पुत्राय शिवस्य शिवदायिने ।

शिवप्रियाय शिवयोरानन्दनिधये नमः ॥ २७

गाङ्गेयाय नमस्तुभ्यं कार्तिकेयाय धीमते ।

उमापुत्राय महते शरकाननशायिने ॥ २८

षडक्षरशरीराय षड्विधार्थविधायिने ।

षडध्वातीतरूपाय षण्मुखाय नमो नमः ॥ २ ९

द्वादशायतनेत्राय द्वादशोद्यतबाहवे ।

द्वादशायुधधाराय द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥ ३०

चतुर्भुजाय शान्ताय शक्तिकुक्कुटधारिणे ।

वरदाभयहस्ताय नमोऽसुरविदारिणे ॥ ३१

गजावल्लीकुचालिप्तकुङ्कुमाङ्कितवक्षसे ।

नमो गजाननानन्दमहिमानंदितात्मने ॥ ३२

ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमान-गाथाविशेषशुचिचिन्तितकीर्त्तिधाम्ने ।

वृन्दारकामलकिरीटविभूषणस्त्रक्-पूज्याभिरामपदपङ्कज ते नमोऽस्तु ॥ ३३

वामदेव बोले- प्रणवके अर्थ - स्वरूप तथा प्रणवार्थके प्रतिपादकको नमस्कार है । प्रणवाक्षररूप बीज एवं प्रणवस्वरूप आपको बार - बार नमस्कार है ॥ २२ ॥

वेदान्तके अर्थस्वरूप, वेदान्तके अर्थका विधान करनेवाले, वेदान्तके अर्थके वेत्ता एवं सर्वत्र व्याप्त आपको बार - बार प्रणाम है । सभी प्राणियोंके अन्तःकरणरूपी गुहामें स्थित कार्तिकेयको नमस्कार है, गुह्य, गुह्यरूप एवं गुह्यशास्त्रवेत्ताको बार - बार नमस्कार है ॥ २३-२४ ॥ सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्से भी महान्, पर-अपरके ज्ञाता एवं परमात्मस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

स्कन्दस्वरूप, आदित्यके समान अरुण तेजवाले, मन्दारमाला एवं कान्तिमान् मुकुट धारण करनेवाले आप स्कन्दको सर्वदा नमस्कार है ॥ २६ ॥

शिवके शिष्य, शिवके पुत्र, कल्याण करनेवाले, शिवप्रिय एवं शिव - शिवाके आनन्दनिधिस्वरूप आपको नमस्कार है । गंगापुत्र, परम बुद्धिमान्, महान्, उमापुत्र एवं सरकण्डोंके वनमें शयन करनेवाले आप कार्तिकेयको नमस्कार है ॥ २७-२८ ॥ षडक्षररूप शरीरवाले, छः प्रकारके अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाले तथा षडध्वाओंसे अतीत रूपवाले षण्मुखको बार - बार नमस्कार है । बड़े - बड़े बारह नेत्रोंवाले, उठी हुई बारह भुजाओंवाले, बारह आयुध धारण करनेवाले एवं बारह रूपोंवाले आपको नमस्कार है ॥ २ ९ -३० ॥ चार भुजाओंवाले, शान्त, शक्ति - कुक्कुट, वर तथा अभयमुद्रा धारण करनेवाले, वर प्रदान करनेवाले तथा असुरोंका वध करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥

[ अपनी भार्या ] गजावल्लीके स्तनोंपर लिप्त कुंकुमसे अंकित वक्षःस्थलवाले, गजाननको आनन्द प्रदान करनेवाले और अपनी महिमासे स्वयं आनन्दित रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥३२ ॥

जिनकी गाथाका ब्रह्मादि देवता, ऋषि एवं किन्नरगण गान करते हैं और जिनकी कीर्ति पवित्र चरित्रवाले महात्माओंके द्वारा गायी जा रही है । देवताओंके निर्मल किरीटको विभूषित करनेवाली पुष्पमालासे पूजित मनोहर चरणकमलोंवाले [ भगवन्! ] । आपको नमस्कार है ॥ ३३ ॥

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ ६५४ भाषितम् । वामदेवजीके द्वारा कहे गये इस दिव्य इति स्कन्दस्तवं दिव्यं वामदेवेन जो पढ़ता है अथवा सुनता है, ' यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम् ॥ ३४ कार्तिकेयस्तोत्रको गतिको प्राप्त होता है । यह [ स्तोत्र ] विशद वह

महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्धनम् ।

आयुरारोग्यधनकृत्सर्वकामप्रदं सदा ॥ ३५

इति स्तुत्वा वामदेवो देवं सेनापतिं प्रभुम् ।

प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा प्रणम्य भुवि दण्डवत् ॥ ३६

साष्टाङ्गं च पुनः कृत्वा प्रदक्षिणनमस्कृतम् ।

अभवत्पार्श्वतस्तस्य विनयावनतो द्विजाः ॥ ३७

वामदेवकृतं स्तोत्रं परमार्थविजृम्भितम् ।

श्रुत्वाभवत्प्रसन्नो हि महेश्वरसुतः प्रभुः ॥ ३८

तमुवाच महासेनः प्रीतोऽस्मि तव पूजया ।

भक्त्या स्तुत्या च भद्रं ते किमद्य करवाण्यहम् ॥ ३ ९

मुने त्वं योगिनां मुख्यः परिपूर्णश्च निःस्पृहः ।

भवादृशां हि लोकेऽस्मिन् प्रार्थनीयं न विद्यते ॥ ४०

तथापि धर्मरक्षायै लोकानुग्रहकांक्षया ।

त्वादृशाः साधवः सन्तो विचरन्ति महीतले ॥ ४१

श्रोतव्यमस्ति चेद् ब्रह्मन् वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ।

तदिदानीमहं वक्ष्ये लोकानुग्रहहेतवे ॥ ४२

इति स्कन्दवचः श्रुत्वा वामदेवो महामुनिः ।

प्रश्रयावनतः प्राह मेघगम्भीरया गिरा ॥ ४३

वामदेव उवाच

भगवन्परमेशस्त्वं परावरविभूतिदः ।

सर्वज्ञः सर्वकर्त्ता च सर्वशक्तिधरः प्रभुः ॥ ४४

जीवा वयं तु ते वक्तुं सन्निधौ परमेशितुः ।

तथाप्यनुग्रहोऽयं ते यत्त्वं वदसि मां प्रति ॥ ४५

कृतार्थोऽहं महाप्राज्ञ विज्ञानकणमात्रतः ।

प्रेरितः परिपृच्छामि क्षन्तव्योऽतिक्रमो मम ॥ ४६

प्रणवो हि परः साक्षात्परमेश्वरवाचकः ।

वाच्यः पशुपतिर्देवः पशूनां पाशमोचकः ॥ ४७

| परम | बुद्धि प्रदान करनेवाला, शिवभक्तिको बढ़ानेवाला – आयु - आरोग्य - धनकी वृद्धि करनेवाला एवं सभी, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ३४-३५ ॥ हे द्विजो! वामदेवजी देवताओंके सेनापति प्रभु कार्तिकेयकी इस प्रकार स्तुति करके तीन बार प्रदक्षिणाकर पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करके पुनः साष्टांग प्रणाम तथा प्रदक्षिणा करके विनयावनत हो उनके समीप बैठ गये । वामदेवजीद्वारा किये गये परमार्थयुक्त स्तोत्रको सुनकर महेश्वरपुत्र प्रभु स्कन्द प्रसन्न हो गये ॥ ३६-३८ ॥ इसके बाद कार्तिकेयजीने उनसे कहा- मैं आपकी पूजा, भक्ति तथा स्तुतिसे प्रसन्न हूँ, मैं इस समय आपका कौन - सा कल्याण करूँ? हे मुने! आप योगियोंमें प्रधान, | परिपूर्णकाम और नि: स्पृह हैं, इस लोकमें आप - जैसे लोगोंके लिये कुछ भी प्रार्थनीय नहीं है । फिर भी धर्मकी रक्षाके लिये तथा लोगोंपर कृपा करनेकी कामनासे आप-जैसे साधु - सन्त पृथ्वीपर भ्रमण करते हैं । हे ब्रह्मन्! जो आप सुनना चाहते हैं, उसे इस समय पूछिये; मैं लोककल्याणके लिये उसे अवश्य कहूँगा ॥ ३ ९ -४२ ॥ स्कन्दजीका यह वचन सुनकर महामुनि वामदेवजी विनयावनत होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने लगे - ॥ ४३ ॥

वामदेव बोले — हे भगवन्! आप पर तथा अवर विभूतिको देनेवाले, सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाले, समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले तथा सर्वसमर्थ परमेश्वर हैं । हमलोग तो जीव हैं और आप परमेश्वरके सन्निधानमें कुछ कहनेमें असमर्थ हैं, यह तो आपकी कृपा है, जो आप मुझसे ऐसा कह रहे हैं 11 ॥ ४४-४५ ॥ हे महाप्राज्ञ! मैं कृतकृत्य हो गया, फिर भी कणमात्र ज्ञानसे प्रेरित होकर कुछ पूछ रहा हूँ, मेरे इस दुस्साहसको क्षमा कीजिये ॥४६ ॥

प्रणव श्रेष्ठ [ मन्त्र ] है, यह साक्षात् परमेश्वरका वाचक है एवं जीवोंको बन्धनसे मुक्त करनेवाले पशुपति देव इसके वाच्य हैं । प्रणवरूप वाचकसे

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अ ० १२ ] कैलाससंहिता ६५५

वाचकेन समाहूतः पशून्मोचयते क्षणात् ।

तस्माद्वाचकतासिद्धिः प्रणवेन शिवं प्रति ॥

ओमितीदं सर्वमिति श्रुतिराह सनातनी ।

ओमिति ब्रह्म सर्वं हि ब्रह्मेति च समब्रवीत् ॥

देवसेनापते तुभ्यं देवानां पतये नमः ।

नमो यतीनां पतये परिपूर्णाय ते नमः ॥

एवं स्थिते जगत्यस्मिन् शिवादन्यन्न विद्यते ।

सर्वरूपधरः स्वामी शिवो व्यापी महेश्वरः ॥

समष्टिव्यष्टिभावेन प्रणवार्थः श्रुतो मया ।

न जातुचिन्महासेन संप्राप्तस्त्वादृशो गुरुः ॥

अतः कृत्वानुकम्पां वै तमर्थं वक्तुमर्हसि उपदेशविधानेन सदाचारक्रमेण च ॥

स्वाम्येकः सर्वजन्तूनां पाशच्छेदकरो गुरुः ।

अतस्त्वत्कृपया सोऽर्थः श्रोतव्यो हि मया गुरो ॥

इति स मुनिना पृष्टः स्कन्दः प्रणम्य सदाशिवं प्रणववपुषं साष्टत्रिंशत्कलावरलक्षितम् । सहितमुमया शश्वत्पार्श्वे मुनिप्रवरान्वितं गदितुमुपचक्राम श्रेयः श्रुतिष्वपि गोपितम् ॥ भलीभाँति आहूत होनेपर वे [ पशुपति ] क्षणमात्रमें ४८ जीवोंको मुक्त कर देते हैं, इसलिये प्रणवकी शिवजीके प्रति वाचकता सिद्ध हो जाती है ॥ ४७-४८ ॥ सनातन श्रुतिमें भी कहा गया है ' ओमितीदं ४ ९ सर्वम्, ओमिति ब्रह्म सर्वम् ' यह सब कुछ ॐकार है और ॐकार ही ब्रह्म है । हे देवसेनापते! देवताओंके स्वामी आपको नमस्कार है, यतियोंके पतिको नमस्कार ५० है, परिपूर्णस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ ४ ९ -५० ॥ ऐसा होनेपर इस संसारमें शिवजीके अतिरिक्त ५१ अन्य कोई भी नहीं है । महेश्वर शिव ही सभी रूप धारण करनेवाले, व्यापक और सबके स्वामी हैं ॥५१ ॥

मैंने समष्टि - व्यष्टिभावसे प्रणवका अर्थ सुना ५२ है । हे महासेन! मुझे आपके समान गुरु नहीं प्राप्त हुआ है । इसलिये मेरे ऊपर कृपा करके उपदेशविधिसे ५३ तथा सदाचारक्रमके साथ उस अर्थको बतानेकी कृपा करें । आप सभी जन्तुओंके एकमात्र स्वामी एवं भव-बन्धनको काटनेवाले गुरु हैं, अतः हे गुरो! मैं आपकी ५४ कृपासे उस अर्थको सुनना चाहता हूँ ॥ ५२–५४ ॥ जब मुनिने कार्तिकेयसे इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने अड़तीस उत्तम कलाओंसे समन्वित प्रणव-शरीरवाले, श्रेष्ठ मुनियोंसे घिरे हुए तथा पार्श्वभागमें निरन्तर विराजमान पार्वतीसहित शिवजीको प्रणाम करके वेदोंमें भी छिपे हुए श्रेयको मुनिसे कहना ५५ | आरम्भ किया ॥ ५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां वामदेवब्रह्मवर्णनं नामैकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें वामदेवब्रह्मवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः प्रणवरूप शिवतत्त्वका वर्णन श्रीसुब्रह्मण्य उवाच

साधु साधु महाभाग वामदेव मुनीश्वर ।

त्वमतीव शिवे भक्तः शिवज्ञानवतां वरः ॥

त्वया त्वविदितं किंचिन्नास्ति लोकेषु कुत्रचित् ।

तथापि तव वक्ष्यामि लोकानुग्रहकारिणः ॥

तथा संन्यासांगभूत नान्दीश्राद्ध - विधि श्रीब्रह्मण्य [ स्कन्दजी ] बोले- हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! हे वामदेवजी! आप धन्य हैं, आप शिवजीके १ परमभक्त हैं तथा शिवज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १ ॥

सभी लोकोंमें कहीं भी आप [ अन्तर्यामी ] -को कुछ भी अविदित नहीं है, फिर भी मैं लोकपर कृपा २ । करनेवाले आपसे कह रहा हूँ ॥२ ॥

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ ६५६ । इस लोकमें सभी जीव विविध शास्त्रोंके व्यामोहमें लोकेऽस्मिन्पशवः सर्वे नानाशास्त्रविमोहिताः हैं और परमेश्वरकी अति विचित्र मायासे ठगे वञ्चिताः परमेशस्य माययातिविचित्रया ॥ ३ पड़े हुए गये हैं । वे महेश्वर सगुण, निर्गुण, परब्रह्मरूप तथा न जानन्ति परं साक्षात्प्रणवार्थं महेश्वरम् । तीनों देवोंको उत्पन्न करनेवाले हैं । प्रणव अर्थ सगुणं निर्गुणं ब्रह्म त्रिदेवजनकं परम् दक्षिणं बाहुमुद्धृत्य शपथं प्रब्रवीमि ते सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यं सत्यं पुनः पुनः प्रणवार्थः शिवः साक्षात्प्राधान्येन प्रकीर्तितः श्रुतिषु स्मृतिशास्त्रेषु पुराणेष्वागमेषु च यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं यस्य वै विद्वान्न बिभेति कुतश्चन यस्माज्जगदिदं सर्वं विधिविष्णिवन्द्रपूर्वकम् । सह भूतेन्द्रियग्रामैः प्रथमं सम्प्रसूयते

न सम्प्रसूयते यो वै कुतश्चन कदाचन ।

यस्मिन्न भासते विद्युन्न च सूर्यो न चन्द्रमाः ॥

यस्य भासा विभातीदं जगत्सर्वं समन्ततः ।

सर्वैश्वर्येण सम्पन्नो नाम्ना सर्वेश्वरः स्वयम् ॥

यो वै मुमुक्षुभिर्थ्येयः शम्भुराकाशमध्यगः ।

सर्वव्यापी प्रकाशात्मा भासरूपो हि चिन्मयः ॥

यस्य पुंसः परा शक्तिर्भावगम्या मनोहरा ।

निर्गुणा स्वगुणैरेव निगूढा निष्कला शिवा ॥

तदीयं त्रिविधं रूपं स्थूलं सूक्ष्मं परं ततः ।

ध्येयं मुमुक्षुभिर्नित्यं क्रमतो योगिभिर्मुने ॥

निष्कलः सर्वदेवानामादिदेवः सनातनः ।

ज्ञानक्रियास्वभावो यः परमात्मेति गीयते ॥

तस्य देवाधिदेवस्य मूर्त्तिः साक्षात्सदाशिवः ।

पञ्चमन्त्रतनुर्देवः कलापञ्चकविग्रहः ॥

शुद्धस्फटिकसंकाशः प्रसन्नः शीतलद्युतिः ।

पञ्चवक्त्रो दशभुजस्त्रिपञ्चनयनः प्रभुः ॥

ईशानमुकुटोपेतः पुरुषास्यः पुरातनः ।

अघोरहृदयो वामदेवगुह्यप्रदेशवान् ॥

सद्यपादश्च तन्मूर्त्तिः साक्षात्सकलनिष्कलः ।

सर्वज्ञत्वादिषट्शक्तिषडंगीकृतविग्रहः ॥

॥ ४ । साक्षात् शिव ही हैं । श्रुतियों, स्मृति - शास्त्रों, पुराणों । । तथा आगमोंमें प्रधानतया उन्हींको प्रणवका वाच्यार्थ ॥ ५ बताया गया है । जहाँसे मनसहित वाणी आदि सभी । इन्द्रियाँ उस परमेश्वरको न पाकर लौट आती हैं, ॥ ६ जिसके आनन्दका अनुभव करनेवाला पुरुष किसीसे डरता नहीं, ब्रह्मा - विष्णु तथा इन्द्रसहित यह सम्पूर्ण ॥ ७ जगत् भूतों और इन्द्रियसमुदायके साथ सर्वप्रथम जिससे प्रकट होता है, जो परमात्मा स्वयं किसीसे और कभी भी उत्पन्न नहीं होता, जिसके निकट ॥ ८ विद्युत्, सूर्य और चन्द्रमाका प्रकाश काम नहीं देता तथा जिसके ही प्रकाशसे यह सम्पूर्ण जगत् सब ९ ओरसे प्रकाशित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण स्वयं ही सर्वेश्वर १० ' शिव ' नाम धारण करता है । जो सर्वव्यापी, प्रकाशात्मा, प्रकाशरूप एवं चिन्मय शम्भु मुमुक्षुओंके द्वारा हृदयाकाशमें १ ९ ध्यान किये जानेयोग्य हैं, जिन परम पुरुषकी परा शक्ति शिवा भावगम्य, मनोहर, निर्गुण, अपने गुणोंसे १२ निगूढ़ तथा निष्कल हैं, हे मुने! उनके स्थूल, सूक्ष्म तथा उससे भी परे - – इन तीन प्रकारके रूपोंका ध्यान मोक्ष चाहनेवाले योगियोंको क्रमसे नित्य करना १३ चाहिये ॥ ३–१३ ॥ वे सम्पूर्ण देवोंके आदिदेव, सनातन एवं निष्कल १४ हैं, जो ज्ञान, क्रिया, स्वभाव एवं परमात्मा कहे जाते हैं; उन देवाधिदेवकी साक्षात् मूर्ति ही साक्षात् सदाशिव १५ हैं । वे देव पंचमन्त्रात्मक शरीरवाले, पंचकलात्मक विग्रहवाले, शुद्ध स्फटिकके सदृश, प्रसन्न, शीतल कान्तिवाले, पाँच मुखवाले, दस भुजाओंसे युक्त तथा १६ पन्द्रह नेत्रोंवाले हैं॥१४–१६ ॥ ईशानमन्त्र उनका मुकुटमण्डित शिरोभाग है, १७ | तत्पुरुषमन्त्र उन पुरातन पुरुषका मुख है, अघोरमन्त्र हृदय है, वामदेवमन्त्र गुह्यप्रदेश है तथा सद्योजातमन्त्र । उनका पाददेश है । वे ही साक्षात् साकार तथा १८ । निराकार परमात्मा हैं । सर्वज्ञत्व आदि छः शक्तियाँ ही