शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 731–740

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

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अ ० २३ ] कैलाससंहिता ७१७ सनकश्च सनन्दश्च सनातनमुनिस्ततः । सनक, सनन्दन, सनातनमुनि और सनत्सुजात— सनत्सुजात इत्येते योगिवर्याः शिवप्रियाः ॥ ३१ ये योगियोंमें श्रेष्ठ, शिवप्रिय तथा सभी वेदार्थोंके ज्ञाता सनत्कुमारशिष्यास्ते सर्ववेदार्थवित्तमाः ।

गुरुश्च परमश्चैव परात्परगुरुस्ततः ।

परमेष्ठिगुरुश्चैते पूज्याः स्युः शुकयोगिनः ॥

इदं प्रणवविज्ञानं स्थितं वर्गचतुष्टये ।

सर्वोत्कृष्टनिदानं च काश्यां सन्मुक्तिकारणम् ॥

एतन्मण्डलमद्भुतं परशिवाधिष्ठानरूपं सदा वेदान्तार्थविचारपूर्णमतिभिः पूज्यं यतीन्द्रैः परम् । वेदादिप्रविभागकल्पितमहाकाशादिनाप्यावृतं त्वत्सन्तोषकरं तथास्तु जगतां श्रेयस्करं श्रीप्रदम् ॥ इदं रहस्यं परमं शिवोदितं वेदान्तसिद्धांतविनिश्चितं परम् । मत्तः श्रुतं यद्भवता ततो मुने भवन्मतं प्राज्ञतमा वदन्ति ॥ तस्मादनेनैव पथा गतः शिवं शिवोऽहमस्मीति शिवो भवेद्यतिः । पितामहादिप्रविभागमुक्तये नद्यो यथा सिन्धुमिमाः प्रयान्ति ॥ सूत उवाच एवं मुनीश्वरायैतदुपदिश्य सुरेश्वरः । संस्मृत्य चरणाम्भोजे पित्रोः सर्वसुरार्चिते कैलासशिखरं प्राप कुमारः शिखरावृतम् । राजितं परमाश्चर्यं दिव्यज्ञानप्रदो गुरुः वामदेवोऽपि सच्छिष्यैः संवृतः शिखिवाहनम् मुनिगण सनत्कुमारके शिष्य होंगे । गुरु, परमगुरु, परात्परगुरु और परमेष्ठी गुरु- यह [ गुरुचतुष्टय ] ३२ योगी शुकदेवजीका पूज्य है॥३१-३२ ॥ यह प्रणव - विज्ञान इन्हीं व्यास, वामदेव, सनत्कुमार ३३ एवं शुकदेव - इन चार वर्गोंकी परम्परामें सुरक्षित रहेगा । यह ज्ञान सर्वोत्तम है और काशीमें मुक्ति प्रदान करनेवाला है ॥३३ ॥

जो अद्भुत स्वरूपवाला, परमशिवका साक्षात् अधिष्ठान, वेदान्तके तात्पर्य - विचारमें निरत बुद्धिवाले यतीन्द्रोंके द्वारा परम पूजनीय तथा वेदादिकी शाखा-प्रशाखाओंमें उपनिबद्ध और महाकाश आदिके द्वारा ३४ आवृत है, ऐसा वह संसारको श्रेय तथा श्री प्रदान करनेवाला [ प्रणववेत्ताओंका ] मण्डल आपको परम आनन्द प्रदान करनेवाला हो ॥ ३४ ॥

मुने! यह साक्षात् भगवान् शिवका कहा हुआ उत्तम रहस्य है, जो वेदान्तके सिद्धान्तसे निश्चित किया गया है । तुमने मुझसे जो कुछ सुना है, उसे ३५ विद्वान् पुरुष तुम्हारा ही मत कहेंगे । यति इसी मार्गसे चलकर ' शिवोऽहमस्मि ' ( मैं शिव हूँ ) इस रूपमें आत्मस्वरूप शिवकी भावना करता हुआ शिवरूप हो ३६ जाता है ॥३५-३६ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार मुनीश्वर वामदेवको उपदेश देकर दिव्य ज्ञानदाता गुरु देवेश्वर ॥ ३७ कार्तिकेय पिता - माताके सर्वदेव - वन्दित चरणार-विन्दोंका चिन्तन करते हुए अनेक शिखरोंसे आवृत, शोभाशाली एवं परम आश्चर्यमय कैलासशिखरको ॥ ३८ चले गये ॥ ३७-३८ ॥ श्रेष्ठ शिष्योंसहित वामदेव भी मयूर - वाहन । करके शीघ्र ही परम अद्भुत सम्प्रणम्य जगामाशु कैलासं परमाद्भुतम् ॥ ३ ९ । कार्तिकेयको प्रणाम कैलासशिखरपर जा पहुँचे और महादेवजीके निकट जा उन्होंने उमासहित महेश्वरके मायानाशक

गत्वा कैलासशिखरं प्राप्येशनिकटं मुनिः । चरणोंका दर्शन किया ॥ ३ ९ -४० ॥

ददर्श मोक्षदं मायानाशं चरणमीशयोः ॥ ४० । मोक्षदायक

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७१८ भक्त्या चार्पितसर्वाङ्गो विस्मृत्य स्वकलेवरम् पपात सन्निधौ भूयो भूयो नत्वा समुत्थितः ततो बहुविधैः स्तोत्रैर्वेदागमरसोत्कटैः तुष्टाव परमेशानं सांबिकं ससुतं मुनिः निधाय चरणाम्भोजं देवदेव्योः स्वमूर्धनि पूर्णानुग्रहमासाद्य तत्रैव न्यवसत्सुखम् भवन्तोऽपि विदित्वैवं प्रणवार्थं महेश्वरम् वेदगुह्यं च सर्वस्वं तारकं ब्रह्म मुक्तिदम्

अत्रैव सुखमासीनाः श्रीविश्वेश्वरपादयोः ।

सायुज्यरूपामतुलां भजध्वं मुक्तिमुत्तमाम् ॥

अहं गुरुपदाम्भोजसेवायै बादराश्रमम् ।

गमिष्ये भवतां भूयः सत्सम्भाषणमस्तु मे ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ फिर भक्तिभावसे अपना सारा कलेवर भगवान् । शिवको समर्पित करके, वे शरीरकी सुधि भुलाकर ॥ ४१ | उनके निकट दण्डकी भाँति पड़ गये और बारंबार । उठ उठकर नमस्कार करने लगे । तत्पश्चात् उन्होंने | भाँति - भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा, जो वेदों और आगमोंके । रससे पूर्ण थे, जगदम्बा और पुत्रसहित परमेश्वर ॥ ४२ शिवका स्तवन किया ॥ ४१-४२ ॥ इसके बाद देवी पार्वती और महादेवजीके । ॥ ४३ चरणारविन्दको अपने मस्तकपर रखकर उनका पूर्ण अनुग्रह प्राप्त करके वे वहीं सुखपूर्वक रहने लगे ॥ तुम सभी ऋषि भी इसी प्रकार प्रणवके अर्थभूत महेश्वरका तथा वेदोंके गोपनीय रहस्य, वेदसर्वस्व ॥ ४४ और मोक्षदायक तारक मन्त्र ॐकारका ज्ञान प्राप्त करके यहीं सुखसे रहो तथा विश्वनाथजीके चरणोंमें [ अवस्थित ] सायुज्यरूपा अनुपम एवं उत्तम मुक्तिका ४५ चिन्तन किया करो ॥ ४३–४५ ॥ अब मैं गुरुदेवकी सेवाके लिये बदरिकाश्रम-तीर्थको जाऊँगा । तुम्हें फिर मेरे साथ सम्भाषणका ४६ । एवं सत्संगका अवसर प्राप्त हो ॥४६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां द्वादशाहकृत्यवर्णनपूर्वक-व्यासादिशिष्यवर्गकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें द्वादशाहकृत्यवर्णनपूर्वक व्यासादिशिष्यवर्गकथनवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

॥ समाप्तेयं षष्ठी कैलाससंहिता ॥ ६ ॥

॥ छठी कैलाससंहिता पूर्ण हुई ।

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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण सप्तम्याः वायवीयसंहितायाः पूर्वखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः ऋषियोंद्वारा सम्मानित सूतजीके द्वारा पुराणोंका परिचय तथा व्यास उवाच

नमः शिवाय सोमाय सगणाय ससूनवे ।

प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे ॥ १

शक्तिरप्रतिमा यस्य ह्यैश्वर्यं चापि सर्वगम् ।

स्वामित्वं च विभुत्वं च स्वभावं सम्प्रचक्षते ॥ २

तमजं विश्वकर्माणं शाश्वतं शिवमव्ययम् ।

महादेवं महात्मानं व्रजामि शरणं शिवम् ॥ ३

धर्मक्षेत्रे महातीर्थे गंगाकालिंदिसंगमे ।

प्रयागे नैमिषारण्ये ब्रह्मलोकस्य वर्त्मनि ॥ ४

मुनयः शंसितात्मानः सत्यव्रतपरायणाः ।

महौजसो महाभागा महासत्रं वितेनिरे ॥ ५

तत्र सत्रं समाकर्ण्य तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।

साक्षात्सत्यवतीसुनोर्वेदव्यासस्य धीमतः ॥ ६

शिष्यो महात्मा मेधावी त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

पंचावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित् ॥ ७

उत्तरोत्तरवक्ता च ब्रुवतोऽपि बृहस्पतेः ।

मधुरश्रवणानां च मनोज्ञपदपर्वणाम् ॥ ८

कथानां निपुणो वक्ता कालविन्नयवित्कविः ।

आजगाम स तं देशं सूतः पौराणिकोत्तमः ॥ ९

तं दृष्ट्वा सूतमायान्तं मुनयो हृष्टमानसाः ।

तस्मै साम च पूजां च यथावत्प्रत्यपादयन् ॥ १०

कथाका आरम्भ, विद्यास्थानों एवं वायुसंहिताका प्रारम्भ व्यासजी बोले – जो जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तथा प्रकृति और पुरुषके ईश्वर हैं, उन प्रमथगण, पुत्रद्वय तथा उमासहित भगवान् शिवको नमस्कार है ॥१ ॥

जिनकी शक्तिकी कहीं तुलना नहीं है, जिनका ऐश्वर्य सर्वत्र व्यापक है तथा स्वामित्व और विभुत्व जिनका स्वभाव कहा गया है, उन विश्वस्रष्टा, सनातन, अजन्मा, अविनाशी, महान् देव, मंगलमय परमात्मा शिवकी मैं शरण लेता हूँ॥२-३ ॥ किसी समय धर्मक्षेत्र, महातीर्थ, ब्रह्मलोकके मार्गभूत तथा गंगा - यमुनाके संगमसे युक्त प्रयागतीर्थवाले नैमिषारण्यमें विशुद्ध अन्तःकरणवाले, सत्यव्रतपरायण, महातेजस्वी एवं महाभाग्यशाली मुनियोंने महायज्ञका आयोजन किया था ॥ ४-५ ॥ अक्लिष्ट कर्म करनेवाले उन महर्षियोंके यज्ञका वृत्तान्त सुनकर सत्यवतीसुत महाबुद्धिमान् वेदव्यासके साक्षात् शिष्य सूतजी, जो महात्मा, मेधावी, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध, पंचावयवसे युक्त वाक्यके गुण-दोषोंको जाननेवाले, बृहस्पतिको भी वादमें निरुत्तर करनेवाले, श्रवणसुखद तथा मनोहर शब्दोंसे संघटित कथाओंके निपुण वाचक, कालवेत्ता, नीतिके ज्ञाता, कवि एवं पौराणिकोंमें श्रेष्ठ हैं, वे उस स्थानपर आये ॥ ६ – ९ ॥ उन सूतजीको आते हुए देखकर प्रसन्नचित्त मुनियोंने उनका यथोचित स्वागत तथा | पूजन किया ॥ १० ॥

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ७२० । मुनियोंके द्वारा की गयी उस पूजाको ग्रहणकर प्रतिगृह्य स तां पूजां मुनिभिः प्रतिपादिताम् उनके द्वारा दिये गये अपने उचित आसनपर उद्दिष्टमासनं भेजे नियुक्तो युक्तमात्मनः ॥ ११ सूतजी

ततस्तत्संगमादेव मुनीनां भावितात्मनाम् ।

सोत्कंठमभवच्चित्तं श्रोतुं पौराणिक कथाम् ॥

तदा तमनुकूलाभिर्वाग्भिः पूज्य महर्षयः अतीवाभिमुखं कृत्वा वचनं चेदमब्रुवन् ऋषय ऊचुः रोमहर्षण सर्वज्ञ भवान्नो भाग्यगौरवात् । संप्राप्तोऽद्य महाभाग शैवराज महामते

पुराणविद्यामखिलां व्यासात्प्रत्यक्षमीयिवान् ।

तस्मादाश्चर्यभूतानां कथानां त्वं हि भाजनम् ॥

रत्नानामुरुसाराणां रत्नाकर इवार्णवः ।

यच्च भूतं यच्च भव्यं यच्चान्यद्वस्तु वर्तते ॥

न तवाविदितं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते । त्वमदृष्टवशादस्मद्दर्शनार्थमिहागतः अकुर्वन्किमपि श्रेयो न वृथा गन्तुमर्हसि ॥

तस्माच्छ्राव्यतरं पुण्यं सत्कथाज्ञानसंहितम् ।

वेदांतसारसर्वस्वं पुराणं श्रावयाशु नः ॥

एवमभ्यर्थितः सूतो मुनिभिर्वेदवादिभिः ।

श्लक्ष्णां च न्यायसंयुक्तां प्रत्युवाच शुभां गिरम् ॥

सूत उवाच

पूजितोऽनुगृहीतश्च भवद्भिरिति चोदितः ।

कस्मात्सम्यङ् न विब्रूयां पुराणमृषिपूजितम् ॥

अभिवन्द्य महादेवं देवीं स्कन्दं विनायकम् ।

नंदिनं च तथा व्यासं साक्षात्सत्यवतीसुतम् ॥

वक्ष्यामि परमं पुण्यं पुराणं वेदसम्मितम् ।

शिवज्ञानार्णवं साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥

विराजमान हुए ॥ ११ ॥

इसके पश्चात् सद्भावयुक्त मनवाले उन १२ मुनियोंका चित्त उनकी उपस्थितिमात्रसे हो | पौराणिक कथा सुननेके लिये उत्कण्ठित हो उठा ॥ | तब सभी महर्षिगण प्रिय वचनोंसे उनकी स्तुतिकर ॥ १३ उन्हें अत्यधिक अभिमुख करके यह वचन कहने लगे ॥ १२-१३ ॥ ऋषिगण बोले- हे रोमहर्षण! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे शैवराज! हे महामते! आप हमलोगोंके ॥ १४ सौभाग्यसे आज यहाँ आये हुए हैं । आपने व्यासजीसे समस्त पुराणविद्या प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त की है । अत: आप निश्चय ही आश्चर्यपूर्ण कथाओंके पात्र हैं । १५ जिस प्रकार बड़े - बड़े अनमोल रत्नोंका भण्डार समुद्र है, [ उसी प्रकार आप भी उत्तमोत्तम पुराणकथाओंके १६ मानो समुद्र ही हैं । ] तीनों लोकोंमें जो भी भूत एवं भविष्यकी बात तथा अन्य जो भी वस्तु है, आपके लिये कोई भी अविदित नहीं है । आप हमलोगोंके भाग्यसे ही दर्शन देनेके लिये यहाँ आये हैं । अब १७ हमलोगोंका कुछ कल्याण किये बिना आप यहाँसे व्यर्थ मत जाइये । अतः सुननेके योग्य, पुण्यप्रद, उत्तम कथा एवं ज्ञानसे युक्त तथा वेदान्तके सारस्वरूप १८ पुराणको हमें सुनाइये ॥ १४–१८ ॥ इस प्रकार वेदज्ञाता मुनिजनोंके द्वारा प्रार्थना १ ९ किये जानेपर सूतजी मधुर, न्याययुक्त एवं शुभ वाणीमें कहने लगे —॥१ ९ ॥ सूतजी बोले — आपलोगोंने मेरी पूजाकर अनुगृहीत कर दिया है, इसलिये मैं आपलोगोंके कहनेपर २० ऋषियोंद्वारा समादृत पुराणका भलीभाँति वर्णन क्यों नहीं करूँगा ॥२० ॥

महादेव, भगवती, स्कन्द, गणेश, नन्दी तथा २१ साक्षात् सत्यवतीपुत्र व्यासजीको नमस्कारकर उस पुराणको कहूँगा, जो परम पुण्यको देनेवाला, वेदतुल्य, | शिवविषयक ज्ञानका समुद्र, साक्षात् भोग तथा मोक्षको २२ | देनेवाला और [ यथोचित ] शब्द तथा [ तदनुकूल ]

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अ ० १ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७२१ शब्दार्थन्यायसंयुक्तैरागमार्थैर्विभूषितम् श्वेतकल्पप्रसंगेन वायुना कथितं पुरा ॥

विद्यास्थानानि सर्वाणि पुराणानुक्रमं तथा ।

तत्पुराणस्य चोत्पत्तिं ब्रुवतो मे निबोधत ॥

अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।

पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्याश्चैताश्चतुर्दश ॥

आयुर्वेदो धनुर्वेदो गांधर्वश्चेत्यनुक्रमात् ।

अर्थशास्त्रं परं तस्माद्विद्या ह्यष्टादश स्मृताः ॥

अष्टादशानां विद्यानामेतासां भिन्नवर्त्मनाम् ।

आदिकर्त्ता कविः साक्षाच्छूलपाणिरिति श्रुतिः ॥

स हि सर्वजगन्नाथः सिसृक्षुरखिलं जगत् ।

ब्रह्माणं विदधे साक्षात्पुत्रमग्रे सनातनम् ॥

तस्मै प्रथमपुत्राय ब्रह्मणे विश्वयोनये ।

विद्याश्चेमा ददौ पूर्वं विश्वसृष्ट्यर्थमीश्वरः ॥

पालनाय हरिं देवं रक्षाशक्तिं ददौ ततः ।

मध्यमं तनयं विष्णुं पातारं ब्रह्मणोऽपि हि ॥

लब्धविद्येन विधिना प्रजासृष्टिं वितन्वता ।

प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् ॥

अनन्तरं तु वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।

प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां तन्मुखादभवत्ततः ॥

यदास्य विस्तरं शक्ता नाधिगन्तुं प्रजा भुवि । तदा विद्यासमासार्थं विश्वेश्वरनियोगतः द्वापरान्तेषु विश्वात्मा विष्णुर्विश्वंभरः प्रभुः । व्यासनाम्ना चरत्यस्मिन्नवतीर्य महीतले एवं व्यस्ताश्च वेदाश्च द्वापरे द्वापरे द्विजाः निर्मितानि पुराणानि अन्यानि च ततः परम् स पुनर्द्वापरे चास्मिन्कृष्णद्वैपायनाख्यया अरण्यामिव हव्याशी सत्यवत्यामजायत तर्कसंगत अभिप्रायवाले शैवागमोक्त सिद्धान्तोंसे विभूषित २३ है । पूर्वकालमें वायुने श्वेतकल्पके प्रसंगसे इसका वर्णन किया था ॥ २१–२३ ॥ अब मैं विद्याके सभी स्थान, पुराणानुक्रम एवं २४ उस पुराणकी उत्पत्तिका वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग सुनिये । चारों वेद, उनके छः अंग, मीमांसा, न्याय, २५ पुराण एवं धर्मशास्त्र- ये चौदह विद्याएँ हैं । इनके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा अर्थशास्त्र [ – ये चार उपांग हैं ], इन्हें मिलाकर कुल अठारह २६ विद्याएँ कही गयी हैं ॥ २४ – २६ ॥ भिन्न - भिन्न मार्गोंवाली इन अठारह विद्याओंके २७ आदिकर्ता कवि साक्षात् महेश्वर हैं - ऐसा श्रुति कहती है । सम्पूर्ण जगत् के स्वामी उन सदाशिवने समस्त जगत्को उत्पन्न करनेकी इच्छा की तो उन्होंने २८ सबसे पहले सनातन ब्रह्मदेवको साक्षात् पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ २७-२८ ॥ सदाशिवने विश्वके कारणभूत अपने प्रथम पुत्र २ ९ ब्रह्माको विश्वसृष्टिके लिये इन विद्याओंको प्रदान किया । तत्पश्चात् उन्होंने ब्रह्माजीकी भी रक्षा करनेवाले अपने मध्यम पुत्र श्रीहरि भगवान् विष्णुको जगत्के ३० पालनके लिये रक्षाशक्ति प्रदान की ॥ २ ९ -३० ॥ शिवजीसे विद्याओंको प्राप्त किये हुए ब्रह्माजीने ३१ प्रजासृष्टिका विस्तार करते हुए सभी शास्त्रोंके पहले पुराणका स्मरण किया ॥ ३१ ॥

इसके पश्चात् उनके मुखसे वेद उत्पन्न हुए ।

३२ तदनन्तर उनके मुखसे सभी शास्त्र उत्पन्न हुए ॥ ३२ ॥

जब पृथ्वीपर प्रजाएँ इन विस्तृत विद्याओंको ॥ ३३ धारण करनेमें असमर्थ हो जाती हैं, उस समय उन विद्याओंको संक्षिप्त करनेके लिये विश्वेश्वरकी आज्ञासे प्रत्येक द्वापरके अन्तमें विश्वात्मा विश्वम्भर ॥ ३४ प्रभु विष्णु व्यासरूपसे इस पृथ्वीपर अवतार लेकर विचरण करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ । हे द्विज! इस प्रकार प्रत्येक ॥ ३५ वेदोंका विभाग करते हैं और इसके भी रचना करते हैं । वे इस द्वापरमें । सत्यवतीसे [ वैसे ही ] उत्पन्न || ३६ | अरणीसे अग्नि उत्पन्न होती है द्वापरके अन्तमें वे बाद अन्य पुराणोंकी कृष्णद्वैपायन नामसे हुए, जिस प्रकार ॥ ३५-३६ ॥

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७२२ संक्षिप्य स पुनर्वेदांश्चतुर्द्धा कृतवान्मुनिः संक्षिप्तान् स पुनर्वेदान् चक्रेऽष्टादशधा मुनिः व्यस्तवेदतया लोके वेदव्यास इति श्रुतः पुराणानां च संक्षिप्तं चतुर्लक्षप्रमाणतः । अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् यो विद्याच्चतुरो वेदान् सांगोपनिषदो द्विजः न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।

बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥

दशधा चाष्टधा चैतत्पुराणमुपदिश्यते । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । उन महर्षिने बादमें वेदोंको संक्षिप्तकर उन्हें । । चार भागोंमें विभक्त किया । इसके बाद उन मुनिने वेदोंका संक्षेपण करनेके अनन्तर [ पुराणवाङ्मयको ॥ ३७ । अठारह भागों में विभक्त किया । वेदोंका विभाग ] | करनेके कारण उन्हें लोकमें वेदव्यास कहा गया है ॥३७ ॥

पुराण आज भी देवलोकमें सौ करोड़ श्लोक-॥ ३८ संख्यावाले हैं, उन्हें वेदव्यासने संक्षिप्तकर चार लाख

श्लोकोंका बना दिया ॥ ३८ ॥

। जो ब्राह्मण छहों अंगों एवं उपनिषदों के ॥ ३ ९ सहित सभी वेदोंको जानता है, परंतु पुराणको नहीं जानता, वह विद्वान् नहीं है । इतिहास तथा पुराणोंके द्वारा वेदोंका उपबृंहण ( विस्तार ) करना चाहिये । ४० अल्पज्ञसे वेद डरता है कि यह मुझपर प्रहार कर बैठेगा ॥ ३ ९ -४० ॥ सृष्टि, सृष्टिका प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा ४१ वंशानुचरित - ये पुराणोंके पाँच लक्षण हैं ॥ ४१ ॥

तत्त्वदर्शी मुनियोंने स्थूल - सूक्ष्मके भेदसे बृहत्सूक्ष्मप्रभेदेन मुनिभिस्तत्त्ववित्तमैः ॥ ४२ पुराणोंकी संख्या अठारह कही है – ब्रह्मपुराण,

ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ।

भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम् ॥

आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैंगं वाराहमेव च ।

स्कान्दं च वामनं चैव कौर्मं मात्स्यं च गारुडम् ॥

ब्रह्माण्डं चेति पुण्योऽयं पुराणानामनुक्रमः ।

तत्र शैवं तुरीयं यच्छार्वं सर्वार्थसाधकम् ॥

ग्रंथो लक्षप्रमाणं तद्व्यस्तं द्वादशसंहितम् ।

निर्मितं तच्छिवेनैव तत्र धर्मः प्रतिष्ठितः ॥

तदुक्तेनैव धर्मेण शैवास्त्रैवर्णिका नराः ।

तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन् शिवमेव समाश्रयेत् ॥

तमाश्रित्यैव देवानामपि मुक्तिर्न चान्यथा ॥

यदिदं शैवमाख्यातं पुराणं वेदसंमितम् ।

तस्य भेदान्समासेन ब्रुवतो मे निबोधत ॥

पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदीयपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ४३ ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिंगपुराण, वाराहपुराण, स्कन्दपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुडपुराण ४४ एवं ब्रह्माण्डपुराण – यह पुराणोंका पुण्यप्रद अनुक्रम है । उनमें भगवान् शंकरसे सम्बन्धित जो चौथा शिवपुराण है, वह सभी प्रकारके मनोरथोंको पूर्ण ४५ करनेवाला है॥४२–४५ ॥ यह ग्रन्थ एक लाख श्लोकों तथा बारह ४६ संहिताओंवाला है । इसका निर्माण स्वयं शिवजीने किया है, इसमें साक्षात् धर्म प्रतिष्ठित है ॥ ४६ ॥

उसके द्वारा बताये गये धर्मसे तीनों वर्णोंके पुरुष ४७ शिवभक्त हो जाते हैं । अतः मुक्तिकी इच्छा करते हुए । शिवका ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये । उनका ४८ आश्रय लेनेसे ही देवगणोंकी भी मुक्ति सम्भव है, अन्यथा नहीं । यह शिवपुराण वेदसम्मित कहा गया है । अब मैं संक्षिप्त रूपसे इसके भेदोंको कह रहा हूँ, ४ ९ | आपलोग सुनिये ॥ ४७–४९ ॥।

पृष्ठ 737

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अ ० १ ] वायवीयसंहिता

विद्येश्वरं तथा रौद्रं वैनायकमनुत्तमम् ।

औमं मातृपुराणं च रुद्रैकादशकं तथा ॥ ५०

कैलासं शतरुद्रं च कोटिरुद्राख्यमेव च ।

सहस्रकोटिरुद्राख्यं वायवीयं ततः परम् ॥५१

धर्मसंज्ञं पुराणं चेत्येवं द्वादश संहिताः ।

विद्येशं दशसाहस्त्रमुदितं ग्रंथसंख्यया ॥ ५२

रौद्रं वैनायकं चौमं मातृकाख्यं ततः परम् ।

प्रत्येकमष्टसाहस्त्रं त्रयोदशसहस्त्रकम् ॥५३

रुद्रैकादशकाख्यं यत् कैलासं षट्सहस्त्रकम् ।

शतरुद्रं त्रिसाहस्त्रं कोटिरुद्रं ततः परम् ॥५४

सहस्त्रैर्नवभिर्युक्तं सर्वार्थज्ञानसंयुतम् ।

सहस्रकोटिरुद्राख्यमेकादशसहस्रकम् ॥५५

चतुस्सहस्त्रसंख्येयं वायवीयमनुत्तमम् ।

धर्मसंज्ञं पुराणं यत्तद् द्वादशसहस्रकम् ॥ ५६

तदेवं लक्षमुद्दिष्टं शैवं शाखाविभेदतः ।

पुराणं वेदसारं तद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ५७

व्यासेन तत्तु संक्षिप्तं चतुर्विंशत्सहस्रकम् ।

शैवं तत्र पुराणं वै चतुर्थं सप्तसंहितम् ॥ ५८

विद्येश्वराख्या तत्राद्या द्वितीया रुद्रसंहिता ।

तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका ॥ ५ ९

पंचमी कथिता चोमा षष्ठी कैलाससंहिता ।

सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता इह ॥ ६०

विद्येश्वरं द्विसाहस्त्रं रौद्रं पंचशतायुतम् ।

त्रिंशत्तथा द्विसाहस्त्रं साद्धैकशतमीरितम् ॥ ६१

शतरुद्रं तथा कोटिरुद्रं व्योमयुगाधिकम् ।

द्विसाहस्रं च द्विशतं तथौमं भूसहस्रकम् ॥ ६२

चत्वारिंशत्साष्टशतं कैलासं भूसहस्रकम् ।

चत्वारिंशच्च द्विशतं वायवीयमतः परम् ॥ ६३

चतुस्साहस्रसंख्याकमेवं संख्याविभेदतः ।

श्रुतं परमपुण्यं तु पुराणं शिवसंज्ञकम् ॥ ६४

( पूर्वखण्ड ) ७२३ विद्येश्वरसंहिता, रुद्र, विनायक, उमा, मातृसंहिता, एकादशरुद्रसंहिता, कैलाससंहिता, शतरुद्रसंहिता, कोटिरुद्र, सहस्रकोटिरुद्र, वायवीयसंहिता तथा धर्मसंहिता — ये बारह संहिताएँ हैं । श्लोकसंख्याकी दृष्टिसे विद्येश्वरसंहिता दस हजार श्लोकोंवाली कही गयी है । रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता, उमासंहिता और मातृसंहिता – इनमें - से प्रत्येक संहितामें आठ-आठ हजार श्लोक हैं । एकादश - रुद्रसंहितामें तेरह | हजार श्लोक हैं और कैलाससंहितामें छ: हजार

श्लोक हैं । शतरुद्रसंहितामें तीन हजार श्लोक हैं ।

इसके बाद कोटिरुद्रसंहिता नौ हजार श्लोकोंसे युक्त है तथा इसमें समस्त तत्त्वज्ञान भरा हुआ है । सहस्र-कोटिरुद्रसंहितामें ग्यारह हजार श्लोक हैं । सर्वोत्कृष्ट वायवीयसंहितामें चार हजार श्लोक हैं तथा जो धर्मसंहिता है, वह बारह हजार श्लोकोंसे युक्त है॥५०–५६ ॥ इस प्रकार शाखा - भेदके अनुसार शिवपुराणके

श्लोकोंकी संख्या एक लाख कही गयी है । यह पुराण

वेदोंका सारभूत और भोग तथा मोक्षको देनेवाला है ॥ ५७ ॥

व्यासजीने इसे संक्षिप्तकर चौबीस हजार

श्लोकोंवाला बना दिया । इस प्रकार यह चौथा

शिवपुराण अब सात संहिताओंसे युक्त है । पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रुद्रसंहिता, तीसरी शतरुद्रसंहिता एवं चौथी कोटिरुद्रसंहिता, पाँचवीं उमासंहिता, छठी कैलाससंहिता तथा सातवीं वायवीयसंहिता है । इस प्रकार इसमें सात संहिताएँ हैं॥५८–६० ॥ विद्येश्वरसंहिता दो हजार, रुद्रसंहिता दस हजार और शतरुद्रसंहिता दो हजार एक सौ अस्सी श्लोंकोसे युक्त कही गयी है । कोटिरुद्रसंहिता दो हजार दो सौ बीस, उमासंहिता एक हजार आठ सौ चालीस, कैलाससंहिता एक हजार दो सौ चालीस और वायवीयसंहिता चार हजार श्लोकोंसे युक्त है । इस प्रकार यह परम पुण्यप्रद शिवपुराण संख्याभेदसे सुना गया है ॥६१–६४ ॥

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७२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । हमने पहले जिस वायवीयसंहिताके श्लोकोंकी चतुःसहस्त्रकं यत्तु वायवीयमुदीरितम् संख्या चार हजार कही है, वह दो भागोंमें तदिदं वर्त्तयिष्यामि भागद्वयसमन्वितम् ॥ ६५ / विभक्त है । अब मैं उसका वर्णन करूँगा । इस उत्तम शास्त्रका उपदेश वेद तथा पुराणको न जाननेवाले नावेदविदुषे वाच्यमिदं शास्त्रमनुत्तमम् । | और इसके प्रति श्रद्धा न रखनेवालेको नहीं न चैवाश्रद्दधानाय नापुराणविदे तथा ॥ ६६ करना चाहिये ॥ ६५-६६ ॥ परीक्षिताय शिष्याय धार्मिकायानसूयवे । परीक्षा किये गये ", धर्मनिष्ठ, ईर्ष्यारहित, शिवभक्त प्रदेयं शिवभक्ताय शिवधर्मानुसारिणे ॥ ६७ तथा शिवधर्मके अनुसार आचरण करनेवाले शिष्यको । इसका उपदेश करना चाहिये । जिनकी कृपासे मुझे पुराणसंहिता यस्य प्रसादान्मयि वर्तते । यह पुराणसंहिता प्राप्त हुई है, उन महातेजस्वी नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ॥ ६८ | भगवान् व्यासजीको मेरा नमस्कार है ॥ ६७-६८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे विद्यावतारकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें विद्यावतारकथन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः ऋषियोंका ब्रह्माजीके पास जाकर उनकी स्तुति करके उनसे परमपुरुषके विषयमें प्रश्न करना और ब्रह्माजीका सूत उवाच

पुरा कालेन महता कल्पेऽतीते पुनः पुनः ।

अस्मिन्नुपस्थिते कल्पे प्रवृत्ते सृष्टिकर्मणि ॥

प्रतिष्ठितायां वार्तायां प्रबुद्धासु प्रजासु च ।

मुनीनां षट्कुलीयानां ब्रुवतामितरेतरम् ॥

इदं परमिदं नेति विवादः सुमहानभूत् ।

परस्य दुर्निरूपत्वान्न जातस्तत्र निश्चयः ॥

तेऽभिजग्मुर्विधातारं द्रष्टुं ब्रह्माणमव्ययम् ।

यत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा स्तूयमानः सुरासुरैः ॥

मेरुशृंगे शुभे रम्ये देवदानवसंकुले ।

सिद्धचारणसंबाधे यक्षगंधर्वसेविते ॥

विहंगसंघसंघुष्टे मणिविद्रुमभूषिते ।

निकुंजकंदरदरीगुहानिर्झरशोभिते ॥

आनन्दमग्न हो ' रुद्र ' कहकर उत्तर देना सूतजी बोले- पूर्व समयमें अनेक कल्पोंके पुनः-पुनः बीत जानेके बाद जब यह वर्तमान [ श्वेतवाराह ] १ कल्प उपस्थित हुआ और सृष्टिका कार्य उपस्थित हुआ, जब जीविकाओंकी प्रतिष्ठा हो गयी और प्रजाएँ सजग हो गयीं, उस समय छः कुलोंमें उत्पन्न २ हुए मुनिगण आपसमें कहने लगे- ॥ १-२ ॥ यह परब्रह्म है, यह नहीं है - इस प्रकारका ३ बहुत बड़ा विवाद उनमें होने लगा और परब्रह्मका निरूपण बहुत कठिन होनेके कारण उस समय कोई निर्णय नहीं हो सका ॥ ३ ॥

तब वे मुनिगण सृष्टिकर्ता तथा अविनाशी ४ । ब्रह्माजीके दर्शनके लिये [ वहाँ ] गये, जहाँ देवताओं । तथा दानवोंके द्वारा निषेवित, सिद्धों तथा चारणोंसे युक्त, | यक्षों तथा गन्धर्वोंसे सेवित पक्षिसमूहके कलरवसे भरे ५ हुए, मणियों तथा मूँगोंसे विभूषित , और नाना प्रकार | निकुंज - कन्दराओं - गुफाओं तथा झरनोंसे शोभित सुन्दर | तथा रम्य [ स्थानमें ] देवताओं दानवोंसे स्तुत ६ । होते हुए वे भगवान् तथा ॥ ब्रह्मा विराजमान थे ॥ ४-६

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अ ० २ ] वायवीयसंहिता

तत्र ब्रह्मवनं नाम नानामृगसमाकुलम् ।

दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥ ७

सुरसामलपानीयपूर्णरम्यसरोवरम् 1 मत्तभ्रमरसंछन्नरम्यपुष्पितपादपम् ॥ ८

तरुणादित्यसंकाशं तत्र चारु महत्पुरम् ।

दुर्द्धर्षबलदृप्तानां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ९

तप्तजांबूनदमयं प्रांशुप्राकारतोरणम् । उ निर्यूहवलभीकूटप्रतोलीशतमंडितम् ॥ १० महार्हमणिचित्राभिर्लेलिहानमिवांबरम् 1 महाभवनकोटीभिरनेकाभिरलंकृतम् ॥ ११

तस्मिन्निवसति ब्रह्मा सभ्यैः सार्द्धं प्रजापतिः ।

तत्र गत्वा महात्मानं साक्षाल्लोकपितामहम् ॥ १२

ददृशुर्मुनयो देवा देवर्षिगणसेवितम् ।

शुद्धचामीकरप्रख्यं सर्वाभरणभूषितम् ॥ १३

प्रसन्नवदनं सौम्यं पद्मपत्रायतेक्षणम् ।

दिव्यकांतिसमायुक्तं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ १४

दिव्यशुक्लांबरधरं दिव्यमालाविभूषितम् ।

सुरासुरेन्द्रयोगीन्द्रवंद्यमानपदांबुजम् ॥ १५

सर्वलक्षणयुक्ताङ्गया लब्धचामरहस्तया ।

भ्राजमानं सरस्वत्या प्रभयेव दिवाकरम् ॥ १६

तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे प्रसन्नवदनेक्षणाः ।

शिरस्यञ्जलिमाधाय तुष्टुवुः सुरपुङ्गवम् ॥ १७

मुनय ऊचुः

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं सर्गस्थित्यन्तहेतवे ।

पुरुषाय पुराणाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥ १८

नमः प्रधानदेहाय प्रधानक्षोभकारिणे । ( पूर्वखण्ड ) ७२५ वहाँ ब्रह्मवन नामसे प्रसिद्ध एक वन था, जो दस योजन विस्तृत, सौ योजन लम्बा, अनेकविध वन्य पशुओंसे युक्त, सुमधुर तथा स्वच्छ जलसे पूर्ण रमणीय सरोवरसे सुशोभित और मत्त भ्रमरोंसे भरे हुए सुन्दर एवं पुष्पित वृक्षोंसे युक्त था ॥ ७-८ ॥ वहाँपर मध्याह्नकालीन सूर्यके जैसी आभावाला एक विशाल, सुन्दर नगर था, जो कि बलसे उन्मत्त दैत्य - दानव - राक्षसादिके लिये अत्यन्त दुर्धर्ष था । वह नगर तपे हुए जाम्बूनदस्वर्णसे निर्मित, ऊँचे गोपुर तथा तोरणवाला था । वह हाथीदाँतसे बनी सैकड़ों छतों तथा मार्गोंसे शोभायमान था और आकाशको मानो चूमते हुए - से प्रतीत होनेवाले, बहुमूल्य मणियोंसे चित्रित भवनसमूहोंसे अलंकृत था॥९ –११ ॥ उसमें प्रजापति ब्रह्मदेव अपने सभासदोंके साथ निवास करते हैं । वहाँ जाकर उन मुनियोंने देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित, शुद्ध सुवर्णके समान प्रभावाले, सभी आभूषणोंसे विभूषित, प्रसन्न मुखमण्डलवाले, सौम्य, कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले, दिव्य कान्तिसे युक्त, दिव्य गन्धका अनुलेप किये हुए, दिव्य श्वेत वस्त्र पहने, दिव्य मालाओंसे विभूषित, देवता-असुर एवं योगीन्द्रोंसे वन्द्यमान चरणकमलवाले, सभी लक्षणोंसे समन्वित अंगोंवाली तथा हाथमें चामर धारण की हुई सरस्वतीके साथ प्रभासे युक्त सूर्यकी भाँति सुशोभित होते हुए महात्मा साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माको देखा । उन्हें देखकर प्रसन्नमुख तथा नेत्रोंवाले सभी मुनिगण सिरपर अंजलि बाँधकर उन देवश्रेष्ठकी स्तुति करने लगे ॥ १२-१७ ॥ मुनिगण बोले- संसारका सृजन, पालन और संहार करनेवाले, त्रिमूर्तिस्वरूप, पुराणपुरुष तथा परमात्मा आप ब्रह्मदेवको नमस्कार है ॥१८ ॥

प्रकृति जिनका स्वरूप है, जो प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं तथा प्रकृतिरूपमें तेईस त्रयोविंशतिभेदेन विकृतायाविकारिणे ॥ १ ९ प्रकारके विकारोंसे युक्त होकर भी स्वयं अविकृत रहनेवाले हैं — ऐसे आपको नमस्कार है । ब्रह्माण्डरूप शरीरवाले, ब्रह्माण्डके बीचमें निवास करनेवाले, सम्यक् ब्रह्माण्डोदरवर्तिने । रूपसे सिद्ध कार्य एवं करणस्वरूप आपको नमस्कार नमो ब्रह्माण्डदेहाय

संसिद्धकरणाय च ॥ २० । है ॥ १ ९ -२० ॥

तत्र संसिद्धकार्याय

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७२६ ( नमोऽस्तु सर्वलोकाय सर्वलोकविधायिने सर्वात्मदेहसंयोगवियोगविधिहेतवे त्वयैव निखिलं सृष्टं संहृतं पालितं जगत् । तथापि मायया नाथ न विद्मस्त्वां पितामह सूत उवाच एवं ब्रह्मा महाभागैर्महर्षिभिरभिष्टुतः प्राह गंभीरया वाचा मुनीन् प्रह्लादयन्निव ब्रह्मोवाच ऋषयो हे महाभागा महासत्त्वा महौजसः किमर्थं संहिताः सर्वे यूयमत्र समागताः तमेवंवादिनं देवं ब्रह्माणं ब्रह्मवित्तमाः वाग्भिर्विनयगर्भाभिः सर्वे प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ॥ मुनय ऊचुः भगवन्नन्धकारेण महता वयमावृताः खिन्ना विवदमानाश्च न पश्यामोऽत्र यत्परम् ॥ त्वं हि सर्वजगद्धाता सर्वकारणकारणम् त्वया ह्यविदितं नाथ नेह किंचन विद्यते कः पुमान् सर्वसत्त्वेभ्यः पुराणः पुरुषः परः विशुद्धः परिपूर्णश्च शाश्वतः परमेश्वरः ॥ केनैव चित्रकृत्येन प्रथमं सृज्यते जगत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । जो सर्वलोकस्वरूप, सम्पूर्ण लोकके कर्ता ॥२१ । सभीके आत्मा तथा देहका संयोग - वियोग करानेवाले एवं हैं, [ उन ] आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

हे नाथ! आप ही इस समग्र संसारके ॥ २२ । उत्पत्तिकर्ता, पालक तथा संहारकर्ता हैं, तथापि | हे पितामह! आपकी मायाके कारण हमलोग आपको नहीं समझ पाते ॥२२ ॥

सूतजी बोले- महाभाग्यशाली महर्षियोंके । । द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर ब्रह्माजी उन ॥ २३ मुनियोंको हर्षित - सा करते हुए गम्भीर वाणीमें कहने लगे— ॥ २३ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे महाभाग्यशाली, महाप्राण । । एवं महातेजस्वी ऋषियो! आप सभी लोग मिलकर ॥ २४ एक साथ यहाँ क्यों आये हैं? ॥ २४ ॥

। जब देवाधिदेव ब्रह्माजीने उन लोगोंसे ऐसा कहा, तब हाथ जोड़कर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वे सभी ऋषिगण २५ विनयसे समन्वित वाणीमें कहने लगे- ॥ २५ ॥

मुनिगण बोले- हे भगवन्! हमलोग घोर । अज्ञानान्धकारसे घिरे हुए हैं, अतः परस्पर विवाद करते २६ हुए दुखी हैं, हमलोगोंको परमतत्त्वका ज्ञान अभीतक । नहीं हो पाया है । आप सम्पूर्ण जगत्के पालक हैं और सभी कारणोंके भी कारण हैं । हे नाथ! आपको इस ॥ २७ जगत्में कुछ भी अविदित नहीं है ॥ २६-२७ ॥ । कौन पुरुष सभी प्राणियोंसे प्राचीन, परम पुरुष, २८ विशुद्ध, परिपूर्ण, शाश्वत तथा परमेश्वर है ॥२८ ॥

वह अपने किस विचित्र कृत्यसे सर्वप्रथम इस तत्त्वं वद महाप्राज्ञ स्वसंदेहापनुत्तये ॥२ ९ जगत्का निर्माण करता है । हे महाप्राज्ञ! हमारे

एवं पृष्टस्तदा ब्रह्मा विस्मयस्मेरवीक्षणः ।

देवानां दानवानां च मुनीनामपि सन्निधौ ॥

उत्थाय सुचिरं ध्यात्वा रुद्र इत्युच्चरन् गिरम् ।

आनंदक्लिन्नसर्वांगः कृताञ्जलिरभाषत ॥

सन्देहको दूर करनेके लिये आप इसे कहिये ॥ २ ९ ॥

ऐसा पूछे जानेपर ब्रह्माजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल ३० उठे और वे देवताओं, दानवों तथा मुनियोंके सामने उठ करके बहुत देरतक ध्यान करते रहे, तदुपरान्त आनन्दसे सिक्त समस्त अंगोंवाले वे ' रुद्र - रुद्र ' इस प्रकारका शब्द उच्चारण करते हुए हाथ जोड़कर ३१ | कहने लगे - ॥ ३०-३१ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे मुनिप्रस्ताववर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके ॥ २ ॥

मुनिप्रस्ताववर्णन नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ पूर्वखण्डमें