शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 741–750
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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अ ० ३ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७२७ अथ तृतीयोऽध्यायः ब्रह्माजीके द्वारा परमतत्त्वके रूपमें भगवान् शिवकी महत्ताका प्रतिपादन तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना ब्रह्मोवाच
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं यस्य वै विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ॥
यस्मात्सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम् ।
सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं संप्रसूयते ॥
कारणानां च यो धाता ध्याता परमकारणम् ।
न संप्रसूयतेऽन्यस्मात्कुतश्चन कदाचन ॥
सर्वैश्वर्येण संपन्नो नाम्ना सर्वेश्वरः स्वयम् ।
सर्वैर्मुमुक्षुभिर्थ्येयः शंभुराकाशमध्यगः ॥
योऽग्रे मां विदधे पुत्रं ज्ञानं च प्रहिणोति मे ।
तत्प्रसादान्मया लब्धं प्राजापत्यमिदं पदम् ॥
ईशो वृक्ष इव स्तब्धो य एको दिवि तिष्ठति ।
येनेदमखिलं पूर्णं पुरुषेण महात्मना ॥
एको बहूनां जंतूनां निष्क्रियाणां च सक्रियः ।
य एको बहुधा बीजं करोति स महेश्वरः ॥
जीवैरेभिरिमाँल्लोकान्सर्वानीशो य ईशते ।
य एको भगवान् रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन ॥
सदा जनानां हृदये संनिविष्टोऽपि यः परैः ।
अलक्ष्यो लक्षयन्विश्वमधितिष्ठति सर्वदा ॥
यस्तु कालात्प्रमुक्तानि कारणान्यखिलान्यपि अनन्तशक्तिरेवैको भगवानधितिष्ठति न यस्य दिवसो रात्रिर्न समानो न चाधिकः स्वाभाविकी पराशक्तिर्नित्या ज्ञानक्रिये अपि ब्रह्माजी बोले- मनके साथ वाणी जिनको प्राप्त किये बिना ही लौट आती है, जिनके आनन्दमय १ स्वरूपको प्राप्तकर विद्वान् पुरुष किसीसे भयभीत नहीं होता, जिनसे ये सभी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एवं इन्द्रादि देवता उत्पन्न हुए हैं एवं जो सभीके साथ पंचमहाभूतों २ एवं इन्द्रियोंकी सृष्टि करते हैं, जो सभी कारणोंके कारण हैं, जो धाता एवं ध्याता दोनों हैं, जो अन्य ३ किसीसे कभी भी उत्पन्न नहीं होते, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होनेके कारण स्वयं सर्वेश्वर हैं हृदयाकाशमें रहनेवाले वे महेश्वर सभी मुमुक्षुओंके ४ द्वारा ध्यान किये जानेयोग्य हैं ॥ १-४ ॥ जिन्होंने सर्वप्रथम मुझे पुत्ररूपसे उत्पन्न किया ५ और [ वेदोंका ] ज्ञान प्रदान किया तथा उन्हींकी कृपासे मैंने इस प्रजापतिपदको प्राप्त किया है ॥ ५ ॥
जो ईश्वर अकेले ही वृक्षके समान निश्चल हो आकाशमें विराजमान हैं, जिन महात्मा पुरुषसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, जो अकेले ही सभी निष्क्रिय जीवोंको सक्रिय बनाते हैं और जो अकेले ही एक ७ बीजको अनेक रूपोंमें परिणत कर देते हैं, वे ही महान् ऐश्वर्यवाले हैं॥६-७ ॥ जो ईश्वर इन जीवोंसे युक्त सभी लोकोंपर ८ शासन करते हैं, वे एकमात्र भगवान् रुद्र हैं, दूसरा कोई नहीं है ॥८ ॥
जो सर्वदा सभी लोगोंके हृदयमें सन्निविष्ट ९ हो करके विश्वको देखते हुए भी दूसरोंके द्वारा देखे नहीं जा पाते और [ जगत्में ] अधिष्ठित रहते हैं, जो अनन्त शक्तिशाली एकमात्र भगवान् [ रुद्र ] । कालसे भी परे और आत्मा एवं आकाशादि सभी ॥ १० कारणोंमें व्याप्त हैं, जिनके लिये दिन एवं रात्रि कुछ नहीं है, जिनके समान अथवा अधिक कोई नहीं । है, जिनकी ज्ञान [ बल और ] क्रियारूपा पराशक्ति ॥ ११ । नित्या तथा स्वाभाविकी है, जो क्षर एवं अव्यक्त
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७२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
यदिदं क्षरमव्यक्तं यदप्यमृतमक्षरम् ।
तावुभावक्षरात्मानावेको देवः स्वयं हरः ॥ १२
ईशते तदभिध्यानाद् योजनात्तत्त्वभावतः ।
भूयो ह्यस्य पशोरन्ते विश्वमाया निवर्तते ॥ १३
यस्मिन्न भासते विद्युन्न सूर्यो न च चन्द्रमाः ।
यस्य भासा विभातीदमित्येषा शाश्वती श्रुतिः ॥ १४
एको देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः ।
न तस्य परमं किंचित्पदं समधिगम्यते ॥ १५
अयमादिरनाद्यन्तः स्वभावादेव निर्मलः ।
स्वतन्त्रः परिपूर्णश्च स्वेच्छाधीनचराचरः ॥ १६
अप्राकृतवपुः श्रीमाँल्लक्ष्यलक्षणवर्जितः ।
अयं मुक्तो मोचकश्च ह्यकालः कालचोदकः ॥ १७
सर्वोपरिकृतावासः सर्वावासश्च सर्ववित् ।
षड्विधाध्वमयस्यास्य सर्वस्य जगतः पतिः ॥ १८
उत्तरोत्तरभूतानामुत्तरश्च निरुत्तरः ।
अनन्तानन्दसन्दोहमकरंदमध्रुवतः ॥ १ ९
अखंडजगदण्डानां पिंडीकरणपंडितः ।
औदार्यवीर्यगांभीर्यमाधुर्यमकरालयः ॥२०
नैवास्य सदृशं वस्तु नाधिकं चापि किंचन । ।
अतुलः सर्वभूतानां राजराजश्च तिष्ठति ॥ २१ ।
३ | हैं, अक्षर और अमृत हैं - इस प्रकार अक्षरभावसे स्थित हैं, वे एकमात्र महेश्वरदेव क्षर एवं [ सर्वोपरि ] हैं ॥ ९ –१२ ॥ ही भगवान् शिवके साथ मन: संयोग करनेसे तथा तात्त्विक रूपसे अपनेको उनसे अभिन्न चिन्तन | करनेसे जीव सामर्थ्यवान् हो जाता है, उनके ध्यानसे | इस जगत्का शासक हो जाता है और उनकी कृपासे अन्तमें पशुरूप जीवकी माया भी निवृत्त हो जाती है ॥१३ ॥
जिसको विद्युत्, सूर्य एवं चन्द्रमा कोई भी प्रकाशित नहीं करता, किंतु जिसके प्रकाशसे यह जगत् प्रकाशित होता है - ऐसा सनातन श्रुति भी कहती है । ऐसे एकमात्र प्रभु महेश्वर महादेव ही जाननेयोग्य हैं, उनसे श्रेष्ठ कोई भी पद प्राप्त नहीं किया जा सकता है ॥ १४-१५ ॥ वे सबके आदि, स्वयं आदि एवं अन्तसे रहित, स्वभावसे निर्मल, स्वतन्त्र, परिपूर्ण तथा चराचर विश्वको अपने अधीन किये हुए हैं ॥ १६ ॥
समस्त ऐश्वर्यसे युक्त ये प्रकृतिसे भिन्न ( दिव्य ) शरीरवाले, लक्ष्य तथा लक्षणसे रहित, स्वयं मुक्त, दूसरोंको मुक्त करनेवाले और स्वयं कालके वशमें न रहकर कालके भी प्रेरक हैं ॥१७ ॥
उनका स्थान सबके ऊपर है तथा वे ही सबके आश्रय स्थान एवं सबको जाननेवाले हैं । वे छः प्रकारके मार्गवाले इस सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं तथा उत्तरोत्तर उत्कृष्ट प्राणियोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, उनसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं है, वे अनन्त आनन्दराशिरूप मकरन्दका पान करनेवाले भ्रमर हैं ॥ १८-१९ ॥ वे अखण्ड गतिशील ब्रह्माण्डोंके पिण्डीकरणमें पण्डित हैं और औदार्य, पराक्रम, गाम्भीर्य एवं माधुर्यके समुद्र हैं । इनके समान कोई भी वस्तु अर्थात् परमतत्त्व नहीं है और इनसे अधिक भी कोई वस्तु नहीं है । ये सभी प्राणियोंमें अतुलनीय हैं और राजराजेश्वर होकर विराजमान हैं ॥ २०-२१ ॥
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अ ० ३ ] वायवीयसंहिता
अनेन चित्रकृत्येन प्रथमं सृज्यते जगत् ।
अंतकाले पुनश्चेदं तस्मिन्प्रलयमेष्यति ॥ २२
अस्य भूतानि वश्यानि अयं सर्वनियोजकः ।
अयं तु परया भक्त्या दृश्यते नान्यथा क्वचित् ॥ २३
व्रतानि सर्वदानानि तपांसि नियमास्तथा ।
कथितानि पुरा सद्भिर्भावार्थं नात्र संशयः ॥ २४
हरिश्चाहं च रुद्रश्च तथान्ये च सुरासुराः ।
तपोभिरुग्रैरद्यापि तस्य दर्शनकांक्षिणः ॥ २५
अदृश्यः पतितैर्मूढैर्दुर्जनैरपि कुत्सितैः ।
भक्तैरन्तर्बहिश्चापि पूज्यः संभाष्य एव च ॥ २६
तदिदं त्रिविधं रूपं स्थूलं सूक्ष्मं ततः परम् ।
अस्मदाद्यमरैर्दृश्यं स्थूलं सूक्ष्मं तु योगिभिः ॥ २७
ततः परं तु यन्नित्यं ज्ञानमानन्दमव्ययम् ।
तन्निष्ठैस्तत्परैर्भक्तैर्दृश्यं तद् व्रतमाश्रितैः ॥ २८
बहुनाऽत्र किमुक्तेन गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।
शिवे भक्तिर्न सन्देहस्तया युक्तो विमुच्यते ॥ २ ९
प्रसादादेव सा भक्तिः प्रसादो भक्तिसंभवः ।
यथा चांकुरतो बीजं बीजतो वा यथांकुरः ॥ ३०
प्रसादपूर्विका एव पशोः सर्वत्र सिद्धयः ।
स एव साधनैरन्ते सर्वैरपि च साध्यते ॥ ३१
धर्मः स च वेदेन दर्शितः । ( पूर्वखण्ड ) ७२ ९ ये अपने अद्भुत क्रिया - कलापोंसे जगत्की सृष्टि करते हैं और पुनः अन्तःकाल उपस्थित होनेपर यह जगत् उनमें विलीन हो जाता है । समस्त जीव इनके वशमें हैं, ये सबके प्रेरक हैं, ये परम भक्तिसे ही देखे जा सकते हैं, अन्य उपायोंसे कभी नहीं ॥ २२-२३ ॥ महात्माओंने इनकी प्राप्तिके लिये ही व्रतों, सर्वविध दानों, तपों एवं नियमोंका निरूपण किया है, इसमें सन्देह नहीं है । विष्णु, मैं [ ब्रह्मा ], रुद्र, अन्य देवता एवं असुर आज भी कठोर तपोंके द्वारा उनके दर्शनकी आकांक्षा रखते हैं ॥ २४-२५ ॥ वे पतित, मूढ, कुत्सित तथा दुर्जन पुरुषोंके लिये अदृश्य हैं, किंतु भक्तजनोंके द्वारा बाहर - भीतर पूज्य हैं और सम्भाषणके योग्य हैं ॥२६ ॥
उनके तीन रूप हैं, स्थूल, सूक्ष्म एवं उनसे भी परे । हम देवताओंसे उनका स्थूल रूप दृश्य है, योगियोंसे उनका सूक्ष्म रूप दृश्य है, किंतु उससे भी परे जो उनका नित्य - ज्ञानमय, आनन्दमय एवं अविनाशी रूप है, वह तो उनमें निष्ठा रखनेवाले, उनके प्रति परायण रहनेवाले तथा उनके व्रतमें आश्रित जनोंके द्वारा ही दृश्य है ॥ २७-२८ ॥ बहुत कहनेका क्या प्रयोजन? उस परमात्माका परस्वरूप गुप्तसे भी गुप्ततर है । शिवजीमें भक्ति रखनी चाहिये, उससे युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है । वह भक्ति शिवकी कृपासे ही हो सकती है और उनकी कृपा भक्तिसे उत्पन्न होती है, जैसे अंकुरसे बीज और बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है ॥ २ ९ -३० ॥ उस ईश्वरका प्रसाद प्राप्त हो जानेपर जीवको सर्वत्र सिद्धि प्राप्त हो जाती है । सभी लोग सम्पूर्ण साधनोंसे अन्तमें उसीको प्राप्त करते हैं । परमात्मा शिवको प्रसन्न करनेका साधन धर्म है और वेदने उस धर्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया है । उसका अभ्यास करते रहनेसे पूर्वजन्मार्जित पुण्य एवं पापमें समता आ प्रसादसाधनं पूर्वयोः पुण्यपापयोः ॥ ३२ जाती है॥३१-३२ ॥ तदभ्यासवशात्साम्यं
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( ७३० साम्यात्प्रसादसंपर्को धर्मस्यातिशयस्ततः धर्मातिशयमासाद्य पशोः पापपरिक्षय: एवं प्रक्षीणपापस्य बहुभिर्जन्मभिः क्रमात् साम्बे सर्वेश्वरे भक्तिर्ज्ञानपूर्वा प्रजायते भावानुगुणमीशस्य प्रसादो व्यतिरिच्यते प्रसादात्कर्मसन्त्यागः फलतो न स्वरूपतः तस्मात्कर्मफलत्यागाच्छिवधर्मान्वयः शुभः श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३ । उस साम्यसे प्रसाद [ प्रसन्नता या चित्तशुद्धि ॥ ३३ की उपलब्धि होती है, उससे धर्मकी वृद्धि होती ] -| और धर्मकी वृद्धिको प्राप्त करके जीवके पापका है विनाश । । हो जाता है । इस प्रकार क्रमसे बहुत जन्म - जन्मान्तरोंमें ॥ / हुए पापोंका विनाश हो जानेपर साम्बसदाशिवमें ३४ ज्ञानपूर्विका भक्ति उत्पन्न होती है ॥ ३३-३४ ॥ । भक्तोंके भावोंके अनुरूप ही शिवका अनुग्रह || ३५ | प्राप्त होता है, उनका प्रसाद प्राप्त हो जानेपर ही | कर्मका त्याग होता है, जिसमें फलवासना नहीं होती यद्यपि भक्त स्वरूपतः कर्म करता रहता है ॥ ३५ ॥,
। तदुपरान्त कर्मफलके त्यागसे जीवका शुभ स च गुर्वनपेक्षश्च तदपेक्ष इति द्विधा ॥ ३६ सम्बन्ध शिवधर्मसे हो जाता है । वह [ धर्म ] भी दौ तत्रानपेक्षात्सापेक्षो मुख्यः शतगुणाधिकः शिवधर्मान्वयस्यास्य शिवज्ञानसमन्वयः ज्ञानान्वयवशात्पुंसः संसारे दोषदर्शनम् । ततो विषयवैराग्यं वैराग्याद्भावसाधनम् भावसिद्ध्युपपन्नस्य ध्याने निष्ठा न कर्मणि ज्ञानध्यानाभियुक्तस्य पुंसो योगः प्रवर्तते योगेन तु परा भक्तिः प्रसादस्तदनंतरम् प्रसादान्मुच्यते जंतुर्मुक्तः शिवसमो भवेत्
अनुग्रहप्रकारस्य क्रमोऽयमविवक्षितः ।
यादृशी योग्यता पुंसस्तस्य तादृगनुग्रहः ॥
गर्भस्थो मुच्यते कश्चिज्जायमानस्तथापरः ।
बालो वा तरुणो वाथ वृद्धो वा मुच्यते परः ॥
तिर्यग्योनिगतः कश्चिन्मुच्यते नारकोऽपरः । प्रकारका होता है — एक गुरुकी अपेक्षासे रहित तथा दूसरा गुरुकी अपेक्षा रखनेवाला ॥ ३६ ॥
। उसमें गुरुकी अपेक्षा रखनेवाला शिवधर्म गुरुकी ॥ ३७ अपेक्षा न करनेवालेसे सौ गुना अधिक उत्तम है । जो गुरुकी शिक्षाद्वारा शिवधर्ममें तत्पर रहता है, वह शीघ्र ही शिव - ज्ञानकी प्राप्ति कर लेता है ॥ ३७ ॥
ज्ञानयुक्त हो जानेसे मनुष्यको इस जगत्में ॥ ३८ दोष दिखायी पड़ने लगता है, तदनन्तर विषयोंके प्रति वैराग्य हो जाता है और वैराग्यसे भावसिद्धि हो जाती है ॥३८ ॥
। भावसिद्धिको प्राप्त हुए व्यक्तिकी निष्ठा ध्यानमें ॥ । ३ ९ होती है, कर्ममें नहीं । ज्ञान तथा ध्यानसे युक्त मनुष्यको योगकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ९ ॥ । योगसे पराभक्ति प्राप्त होती है, इसके पश्चात् ॥ ४० [ भक्तिकी महिमासे ] शिवका प्रसाद उपलब्ध होता | है, शिवके प्रसादसे जीव मुक्त हो जाता है और मुक्त हो जानेपर वह शिवके समान हो जाता है ॥ ४० ॥
इस प्रकार शिवजीके अनुग्रहका जो यह स्वरूप ४१ है, वह इसी प्रकारका है — यह कहना सम्भव नहीं है । मनुष्यकी जैसी योग्यता होती है, उसीके अनुरूप उसे शिवजीका अनुग्रह प्राप्त होता है ॥४१ ॥
कोई गर्भमें निवास करते ही मुक्त हो जाता है । ४२ कोई उत्पन्न होते ही, कोई बालक होकर, कोई युवा होकर और कोई वृद्ध होकर मुक्त हो जाता है । कोई । पशु - पक्षियोंकी योनिमें मुक्त हो जाता है । कोई नरकमें
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अ ० ३ ] वायवीयसंहिता अपरस्तु पदं प्राप्तो मुच्यते स्वपदक्षये ॥ ४३ ।
कश्चित्क्षीणपदो भूत्वा पुनरावर्त्य मुच्यते ।
कश्चिदध्वगतस्तस्मिन् स्थित्वा स्थित्वा विमुच्यते ॥ ४४
तस्मान्नैकप्रकारेण नराणां मुक्तिरिष्यते ।
ज्ञानभावानुरूपेण प्रसादेनैव निर्वृतिः ॥ ४५
तस्मादस्य प्रसादार्थं वाङ्मनोदोषवर्जिताः ।
ध्यायन्तश्शिवमेवैकं सदारतनयाग्नयः ॥ ४६
तन्निष्ठास्तत्पराः सर्वे तद्युक्तास्तदुपाश्रयाः ।
सर्वक्रियाः प्रकुर्वाणास्तमेव मनसा गताः ॥ ४७
दीर्घसत्रसमारब्धं दिव्यवर्षसहस्त्रकम् ।
सत्रांते मंत्रयोगेन वायुस्तत्र गमिष्यति ॥ ४८
स एव भवतां श्रेयः सोपायं कथयिष्यति ।
ततो वाराणसी पुण्या पुरी परमशोभना ॥ ४ ९
गन्तव्या यत्र विश्वेशो देव्या सह पिनाकधृक् ।
सदा विहरति श्रीमान् भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ५०
तत्राश्चर्यं महद् दृष्ट्वा मत्समीपं गमिष्यथ ।
ततो वः कथयिष्यामि मोक्षोपायं द्विजोत्तमाः ॥ ५१
येनैकजन्मना मुक्तिर्युष्मत्करतले स्थिता ।
अनेकजन्मसंसारबंधनिर्मोक्षकारिणी ॥५२
एतन्मनोमयं चक्रं मया सृष्टं विसृज्यते ।
यत्रास्य शीर्यते नेमिः स देशस्तपसः शुभः ॥ ५३
चक्रं दृष्ट्वा मनोमयम् । ( पूर्वखण्ड ) ७३१ और कोई वैकुण्ठादि उत्तम लोक प्राप्तकर पुण्य - क्षय हो जानेपर मुक्त हो जाता है । कोई [ पुण्यशेष होनेपर ] अपने पदसे च्युत होकर संसारमें जन्म लेकर मुक्त होता है । कोई संसाररूपी मार्गमें क्रमशः जन्म - मरणका चक्र प्राप्तकर धीरे - धीरे मुक्त होता है॥४२–४४ ॥ अतः मनुष्योंकी मुक्ति अनेक प्रकारसे होती है । ज्ञान और भक्तिके अनुरूप शिवकी कृपा प्राप्त होनेपर मुक्ति होती है ॥४५ ॥
अतः इन्हें प्रसन्न करनेके लिये वाणी, मन तथा शरीरके दोषोंको त्यागकर स्त्री- पुत्रों एवं अग्नियोंके सहित आप सभीको शिवजीका ध्यान, उनमें निष्ठा, भक्ति, शिवशरणागति एवं मनसे उनका ध्यान करते हुए समस्त क्रियाएँ करनी चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ इस समय आपलोगोंने जो दिव्य सहस्रवर्षवाला दीर्घ यज्ञानुष्ठान प्रवर्तित किया है, उस यज्ञके अन्तमें मन्त्रद्वारा आवाहन करनेपर वायुदेव वहाँ पधारेंगे । वे ही आपलोगोंके कल्याणका साधन एवं उपाय बतायेंगे । इसके पश्चात् आपलोग परम सुन्दर तथा पुण्यमयी वाराणसी पुरी चले जाना, जहाँ पिनाकपाणि भगवान् विश्वनाथ भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवी पार्वतीके साथ सदा विहार करते हैं ॥ ४८–५० ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आपलोग वहाँ बड़ा भारी आश्चर्य देखकर मेरे पास आना, तब मैं आपलोगोंको मुक्तिका उपाय बताऊँगा, जिससे जन्म - जन्मान्तरके संसार - बन्धनसे छुटकारा दिलानेवाली मुक्ति आपलोगोंको एक ही जन्ममें मिल जायगी॥५१-५२ ॥ मैंने इस मनोमय चक्रका निर्माण किया है, मैं इस चक्रको छोड़ रहा हूँ, जहाँ इसकी नेमि टूटकर गिर जाय, वही देश तपस्याके लिये शुभ होगा— ऐसा कहकर पितामहने उस सूर्यतुल्य मनोमय चक्रकी इत्युक्त्वा सूर्यसंकाशं विससर्ज पितामहः ॥ ५४ ओर देखकर और महादेवजीको प्रणामकर उसे छोड़ प्रणिपत्य महादेवं दिया ॥ ५३-५४ ॥ वे ब्राह्मण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर लोकनाथ जगतां प्रभुम् । ब्रह्माजीको प्रणाम करके उस स्थानके लिये चल दिये, तेऽपि हृष्टतरा विप्राः प्रणम्य ॥ ५५ | जहाँ उस चक्रकी नेमि विशीर्ण होनेवाली थी । इसके प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिरशीर्यत
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७३२ ( 20 श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ संक्षिप्तं श्लक्ष्णं चारुशिलातले । | पश्चात् वह फेंका गया कान्तिमय चक्र स्वादिष्ट चक्रं तदपि वने क्वचित् ॥ ५६ एवं विमल जलसे युक्त [ सरोवरवाले ] किसी विमलस्वादुपानीये निपपात वनमें | एक मनोहर शिलातलपर गिर पड़ा, इसी कारणसे | वह वन मुनिपूजित नैमिषारण्य नामसे विख्यात तद्वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् । | जो अनेक यक्ष, गन्धर्व और विद्याधरोंसे हुआ, अनेकयक्षगंधर्वविद्याधरसमाकुलम् ॥५७ व्याप्त
अष्टादश समुद्रस्य द्वीपानश्नन्पुरूरवाः ।
विलासवशमुर्वश्या यातो दैवेन चोदितः ॥
अक्रमेणाहरन्मोहाद्यज्ञवाटं हिरण्मयम् ।
मुनिभिर्यत्र संक्रुद्धैः कुशवग्रैर्निपातितः ॥
विश्वं सिसृक्षमाणा वै यत्र विश्वसृजः पुरा ।
सत्रमारेभिरे दिव्यं ब्रह्मज्ञा गार्हपत्यगाः ॥
ऋषिभिर्यत्र विद्वद्भिः शब्दार्थन्यायकोविदैः ।
शक्तिप्रज्ञाक्रियायोगैर्विधिरासीदनुष्ठितः ॥
यत्र वेदविदो नित्यं वेदवादबहिष्कृतान् ।
वादजल्पबलैर्ध्नन्ति वचोभिरतिवादिनः ॥
स्फटिकमयमहीभृत्पादजाभ्यश्शिलाभ्यः प्रसरदमृतकल्पस्वच्छपानीयरम्यम् । अतिरसफलवृक्षप्रायमव्यालसत्त्वं तपस उचितमासीन्नैमिषं तन्मुनीनाम् ॥ है ॥ ५५–५७ ॥ समुद्रोंसे वेष्टित अठारह द्वीपोंका उपभोग ५८ करनेवाले महाराज पुरूरवा * प्रारब्धसे प्रेरित होकर उर्वशीके रूपसौन्दर्यके वशीभूत हो गये और उन्होंने अज्ञानवश धर्मका अतिक्रमण करके [ ऋषियोंकी ] सुवर्णमयी यज्ञशालाका हरण कर लिया, तब कुपित ५ ९ मुनियोंने अभिमन्त्रित होनेसे वज्रसदृश प्रभाववाले कुशोंसे उन्हें विनष्ट कर दिया॥५८-५९ ॥ जहाँपर पूर्वकालमें वेदज्ञ, गार्हपत्याग्निके ६० उपासक एवं विश्वकी सृष्टि करनेवाले महर्षियोंने ब्रह्मदेवके उद्देश्यसे यज्ञका प्रारम्भ किया था, जिस यज्ञमें शब्दशास्त्र, अर्थशास्त्र और न्यायशास्त्रके ज्ञाता ६१ विद्वान् महर्षियोंने अपनी शक्ति, प्रज्ञा तथा क्रियाके माध्यमसे शास्त्रीय विधिका अनुष्ठान किया था, जहाँपर वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदोंको न माननेवाले और ६२ स्वच्छन्द शास्त्रका निर्माण करनेवाले नास्तिकोंको तार्किक प्रक्रियाके द्वारा निरन्तर पराजित करते हैं, जहाँ स्फटिक मणिमय पर्वतकी शिलाओंसे अमृतके समान मधुर निर्मल जल प्रवाहित होता रहता है, वृक्षोंपर स्वादिष्ट रसीले फल लगे रहते हैं एवं अनेक जीव - जन्तु निवास करते हैं- इस प्रकारका वह ६३ । नैमिषारण्य मुनियोंके तपके योग्य है ॥ ६०–६३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे नैमिषोपाख्यानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें नैमिषोपाख्यान नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
मत्स्यपुराण अ ० २४ के अनुसार धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी पूजाके प्रसंगमें राजर्षि पुरूरवाको उनके द्वारा किंचित् उपेक्षित काम तथा अर्थने शाप दिया था, इसी कारण वे उर्वशीके वियोगदुःख तथा अर्थलोभसे आक्रान्तहुए ।
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अ ० ४ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७३३ अथ चतुर्थोऽध्यायः नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें सूत उवाच
तस्मिन्देशे महाभागा मुनयः शंसितव्रताः ।
अर्चयन्तो महादेवं सत्रमारेभिरे तदा ॥
तच्च सत्रं प्रववृते सर्वाश्चर्यं महर्षिणाम् ।
विश्वं सिसृक्षमाणानां पुरा विश्वसृजामिव ॥
अथ काले गते सत्रे समाप्ते भूरिदक्षिणे ।
पितामहनियोगेन वायुस्तत्रागमत्स्वयम् ॥
शिष्यः स्वयंभुवो देवः सर्वप्रत्यक्षदृग्वशी ।
आज्ञायां मरुतो यस्य संस्थिताः सप्तसप्तकाः ॥
प्रेरयञ्छश्वदङ्गानि प्राणाद्याभिः स्ववृत्तिभिः ।
सर्वभूतशरीराणां कुरुते यश्च धारणम् ॥
अणिमादिभिरष्टाभिरैश्वर्यैश्च समन्वितः ।
तिर्यक् करादिभिर्मेध्यैर्भुवनानि बिभर्ति यः ॥
आकाशयोनिर्द्विगुणः स्पर्शशब्दसमन्वयात् ।
तेजसां प्रकृतिश्चेति यमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः ॥
तमाश्रमगतं दृष्ट्वा मुनयो दीर्घसत्रिणः ।
पितामहवचः स्मृत्वा प्रहर्षमतुलं ययुः ॥
अभ्युत्थाय ततः सर्वे प्रणम्याम्बरसम्भवम् ।
चामीकरमयं तस्मै विष्टरं समकल्पयन् ॥
सोऽपि तत्र समासीनो मुनिभिः सम्यगर्चितः ।
प्रतिनंद्य च तान् सर्वान् पप्रच्छ कुशलं ततः ॥
वायुरुवाच
अत्र वः कुशलं विप्राः कच्चिद्वृत्ते महाक्रतौ ।
कच्चिद्यज्ञहनो दैत्या न बाधेरन्सुरद्विषः ॥
मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन सूतजी बोले- उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग्यवान् उन ऋषियोंने १ महादेवका अर्चन करते हुए उस स्थानमें यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ किया ॥१ ॥
उन महर्षियोंका वह यज्ञ अनेक प्रकारके २ आश्चर्योंसे वैसे ही परिपूर्ण था, जिस प्रकार पूर्व समयमें सृष्टिकी इच्छा करनेवाले विश्वस्रष्टा प्रजापतियोंका यज्ञ था ॥२ ॥
कुछ समय बीत जानेपर प्रचुर दक्षिणावाला वह ३ यज्ञ जब समाप्त हो गया, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे वहाँ स्वयं वायुदेव आये ॥ ३ ॥
वे वायुदेव साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीके शिष्य, ४ सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले थे । जिनकी आज्ञामें उनचास मरुद्गण सर्वदा समुद्यत रहते हैं, जो प्राण आदि अपनी ५ वृत्तियोंके द्वारा अंगोंको चेष्टावान् करते रहते हैं, जो समस्त प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं, जो अणिमादि आठ प्रकारकी सिद्धियों तथा नानाविध ६ ऐश्वर्योंसे युक्त हैं, जो तिरछी पड़नेवाली अपनी पवित्र गतियोंसे भुवनोंको धारण करते हैं, जो आकाशसे उत्पन्न हुए हैं, जो स्पर्श एवं शब्द नामक दो ७ गुणोंवाले हैं, तत्त्ववेत्ता लोग जिन्हें तेजोंकी प्रकृति कहते हैं — उन्हें आश्रममें आया देखकर दीर्घकालिक यज्ञ करनेवाले मुनिगण ब्रह्माजीके वचनका स्मरणकर ८ अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥४-८ ॥ तब सभीने उठकर आकाशजन्मा वायुदेवको प्रणामकर उन्हें [ बैठनेके लिये ] सुवर्णमय आसन ९ प्रदान किया ॥ ९ ॥
इसके पश्चात् मुनियोंने उस आसनपर बैठे हुए १० वायुदेवकी भलीभाँति पूजा की और उन्होंने भी उन सभीकी प्रशंसाकर उनसे कुशल पूछा ॥ १० ॥
वायु बोले — हे ब्राह्मणो! इस महायज्ञके पूरे होनेतक आपलोग सकुशल तो रहे; यज्ञमें विघ्न ११ डालनेवाले देवशत्रु दैत्योंने कहीं विघ्न तो उपस्थित
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७३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४
प्रायश्चित्तं दुरिष्टं वा न कश्चित्समजायत ।
स्तोत्रमन्त्रजपैर्देवान् पितृन् पित्र्यैश्च कर्मभिः ॥
कच्चिदभ्यर्च्य युष्माभिर्विधिरासीत्स्वनुष्ठितः ।
निवृत्ते च महासत्रे पश्चात्किं वश्चिकीर्षितम् ॥
इत्युक्ता मुनयः सर्वे वायुना शिवभाविना ।
प्रहृष्टमनसः पूताः प्रत्यूचुर्विनयान्विताः ॥
मुनय ऊचुः
अद्य नः कुशलं सर्वमद्य साधु भवेत्तपः ।
अस्मच्छ्रेयोऽभिवृद्ध्यर्थं भवानत्रागतो यतः ॥
शृणु चेदं पुरावृत्तं तमसाक्रान्तमानसैः ।
उपासितः पुरास्माभिर्विज्ञानार्थं प्रजापतिः ॥
सोऽप्यस्माननुगृह्याह शरण्यः शरणागतान् ।
सर्वस्मादधिको रुद्रो विप्राः परमकारणम् ॥
तमप्रतर्क्यं याथात्म्यं भक्तिमानेव पश्यति ।
भक्तिश्चास्य प्रसादेन प्रसादादेव निर्वृतिः ॥
तस्मादस्य प्रसादार्थं नैमिषे सत्रयोगतः ।
यजध्वं दीर्घसत्रेण रुद्रं परमकारणम् ॥
तत्प्रसादेन सत्रान्ते वायुस्तत्रागमिष्यति ।
तन्मुखाज्ज्ञानलाभो वस्तत्र श्रेयो भविष्यति ॥
इत्यादिश्य वयं सर्वे प्रेषिताः परमेष्ठिना ।
अस्मिन्देशे महाभाग तवागमनकांक्षिणः ॥
दीर्घसत्रं समासीना दिव्यवर्षसहस्त्रकम् ।
अतस्तवागमादन्यत्प्रार्थ्यं नो नास्ति किंचन ॥
| नहीं किया? आपके इस यज्ञमें कोई प्रत्यवाय अथवा १२ उपद्रव तो नहीं हुआ? आपलोगोंने स्तवन तथा | मन्त्रजपके द्वारा देवगणोंका तथा पितृ - कमोंके पितरों का पूजनकर ठीक तरहसे यज्ञानुष्ठानकी विधि द्वारा १३ सम्पन्न तो कर ली । अब इस महायज्ञके समाप्त हो | जानेके अनन्तर आपलोगोंकी क्या करनेकी इच्छा है? ॥ ११–१३ ॥ तब शिवभक्त वायुके द्वारा इस प्रकार पूछे गये १४ सभी मुनि प्रसन्नचित्त तथा विनयावनत होकर कहने लगे— ॥ १४ ॥
मुनि बोले- जब आप हमारे कल्याणकी वृद्धिके लिये यहाँ आ गये हैं तो आज हमलोगोंका १५ पूर्णत: मंगल हो गया और हमारी तपस्या सफल हो गयी ॥ १५ ॥
अब आप पहलेका एक वृत्तान्त सुनिये । तमोगुणसे १६ आक्रान्त मनवाले हमलोगोंने पूर्वकालमें विशिष्ट ज्ञानके निमित्त प्रजापति ब्रह्माजीकी उपासना की थी ॥ १६ ॥
तब शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले उन्होंने १७ हम शरणागतोंपर कृपा करके कहा— हे ब्राह्मणो! सभी कारणोंके कारण रुद्रदेव सर्वश्रेष्ठ हैं । तर्कसे परे उन रुद्र देवताको यथार्थ रूपसे भक्तिमान् ही १८ देख सकता है और इन्हींकी प्रसन्नतासे भक्ति मिलती है और [ अन्तमें ] मुक्ति भी प्राप्त होती है ॥ १७-१८ ॥ अतः आपलोग इनकी प्रसन्नता प्राप्त करने हेतु १ ९ नैमिषारण्यमें यज्ञनियमोंमें दीक्षित होकर दीर्घसत्रके द्वारा परमकारण रुद्रका यजन कीजिये । तब उनकी प्रसन्नतासे यज्ञके अन्तमें वायुदेव आयेंगे । उनके २० मुखसे आपलोगोंको ज्ञानलाभ होगा और कल्याणकी प्राप्ति होगी ॥ १ ९ -२० ॥ इस प्रकारका आदेश देकर ब्रह्माजीने हमलोगोंको २१ इस स्थानपर भेजा है । हे महाभाग! हमलोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २१ ॥
दिव्य हजार वर्षपर्यन्त हमलोग यहाँ बैठकर जो
। दीर्घसत्र कर रहे थे, उसका उद्देश्य आपके आगमन ।
२२ । अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं था ॥२२ ॥
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अ ०५ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७३५ इत्याकर्ण्य पुरावृत्तमृषीणां दीर्घसत्रिणाम् । तब प्रसन्न मनसे वायुदेवने दीर्घसत्र करनेवाले वायुः प्रीतमना भूत्वा तत्रासीन्मुनिसंवृतः ॥ २३ ऋषियोंके उस प्राचीन वृत्तान्तका श्रवण किया और मुनियोंसे घिरे हुए वे वहींपर विराजमान हो गये ॥ २३ ॥
इसके पश्चात् मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर शिवमें उनकी भक्ति बढ़ानेके लिये सर्वव्यापक ततस्तैर्मुनिभिः पृष्टस्तेषां भावविवृद्धये । वायुदेवने सृष्टिकी उत्पत्ति एवं शिवका ऐश्वर्य संक्षेपमें सर्गादि शार्वमैश्वर्यं समासादवदद् विभुः ॥ २४ । बताया ॥ २४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे वायुसमागमो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें वायुसमागम नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः ऋषियोंके पूछनेपर वायुदेवद्वारा पशु सूत उवाच
तत्र पूर्वं महाभागा नैमिषारण्यवासिनः ।
प्रणिपत्य यथान्यायं पप्रच्छुः पवनं प्रभुम् ॥
नैमिषीया ऊचुः
भवान् कथमनुप्राप्तो ज्ञानमीश्वरगोचरम् ।
कथं च शिष्यभावस्ते ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥
वायुरुवाच
एकोनविंशतिः कल्पो विज्ञेयः श्वेतलोहितः ।
तस्मिन्कल्पे चतुर्वक्त्रः स्त्रष्टुकामोऽतपत्तपः ॥
तपसा तेन तीव्रेण तुष्टस्तस्य पिता स्वयम् ।
दिव्यं कौमारमास्थाय रूपं रूपवतां वरः ॥
श्वेतो नाम मुनिर्भूत्वा दिव्यां वाचमुदीरयन् ।
दर्शनं प्रददौ तस्मै देवदेवो महेश्वरः ॥
तं दृष्ट्वा पितरं ब्रह्मा ब्रह्मणोऽधिपतिं पतिम् ।
प्रणम्य परमज्ञानं गायत्र्या सह लब्धवान् ॥
ततः स लब्धविज्ञानो विश्वकर्मा चतुर्मुखः ।
असृजत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥
यतः श्रुत्वाऽमृतं लब्धं ब्रह्मणा परमेश्वरात् ।
ततस्तद्वदनादेव मया लब्धं तपोबलात् ॥
, पाश एवं पशुपतिका तात्त्विक विवेचन सूतजी बोले – हे महाभाग्यवान् ऋषियो! नैमिषारण्यनिवासी उन ऋषियोंने विधिपूर्वक वायुदेवको १ प्रणामकर उनसे पहले पूछा ॥१ ॥
नैमिषारण्यके ऋषियोंने पूछा- देव! आपने ईश्वरविषयक ज्ञान कैसे प्राप्त किया? तथा आप २ अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके शिष्य किस प्रकार हुए? ॥२ ॥
वायुदेवता बोले — महर्षियो! उन्नीसवें कल्पका नाम श्वेतलोहितकल्प समझना चाहिये । उसी कल्पमें चतुर्मुख ब्रह्माने सृष्टिकी कामनासे तपस्या की । ३ उनकी उस तीव्र तपस्यासे संतुष्ट हो स्वयं उनके पिता देवदेव महेश्वरने उन्हें दर्शन दिया । वे दिव्य कुमारावस्थासे ४ युक्त रूप धारण करके रूपवानोंमें श्रेष्ठ श्वेत नामक मुनि होकर दिव्य वाणी बोलते हुए उनके सामने ५ उपस्थित हुए । वेदोंके अधिपति तथा सबके पालक पिता महेश्वरका दर्शन करके गायत्रीसहित ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया और उन्हींसे उत्तम ज्ञान पाया । ६ ज्ञान पाकर विश्वकर्मा चतुर्मुख ब्रह्मा सम्पूर्ण चराचर भूतोंकी सृष्टि करने लगे । साक्षात् परमेश्वर शिवसे ७ सुनकर ब्रह्माजीने अमृतस्वरूप ज्ञान प्राप्त किया था, इसलिये मैंने तपस्याके बलसे उन्हींके मुखसे उस ८ ज्ञानको उपलब्ध किया॥३–८ ॥
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७३६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ मुनय ऊचुः मुनियोने पूछा — आपने वह कौन - सा ज्ञान किं तज्ज्ञानं त्वया लब्धं तथ्यात्तथ्यतरं शुभम् । | प्राप्त किया, जो सत्यसे भी परम सत्य एवं शुभ ॥ ९ तथा जिसमें उत्तम निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्दको है । यत्र कृत्वा परां निष्ठां पुरुषः सुखमृच्छति वायुरुवाच पशुपाशपतिज्ञानं यल्लब्धं तु मया पुरा तत्र निष्ठा परा कार्या पुरुषेण सुखार्थिना अज्ञानप्रभवं दुःखं ज्ञानेनैव निवर्त्तते ज्ञानं वस्तुपरिच्छेदो वस्तु च त्रिविधं स्मृतम् अजडं च जडं चैव नियन्तृ च तयोरपि पशुः पाशः पतिश्चेति कथ्यते तत्त्रयं क्रमात् अक्षरं च क्षरं चैव क्षराक्षरपरं तथा तदेतत्त्रितयं भूम्ना कथ्यते तत्त्ववेदिभिः अक्षरं पशुरित्युक्तः क्षरं पाश उदाहृतः क्षराक्षरपरं यत्तत् पतिरित्यभिधीयते मुनय ऊचुः किं तच्च क्षरमित्युक्तं किं चाक्षरमुदाहृतम् तयोश्च परमं किं वा तदेतद् ब्रूहि मारुत वायुरुवाच प्रकृतिः क्षरमित्युक्तं पुरुषोऽक्षर उच्यते ताविमौ प्रेरयत्यन्यः स परः परमेश्वरः मुनय ऊचुः कैषा प्रकृतिरित्युक्ता क एष पुरुषो मतः अनयोः केन सम्बन्धः कोऽयं प्रेरक ईश्वरः वायुरुवाच मायाप्रकृतिरुद्दिष्टा पुरुषो माययाऽऽवृतः सम्बन्धो मलकर्मभ्यां शिवः प्रेरक ईश्वरः मुनय ऊचुः
केयं माया समाख्याता किंरूपो मायया वृतः ।
मलं कीदृक् कुतो वास्य किं शिवत्वं कुतश्शिवः ॥
प्राप्त करता है? ॥९ ॥
वायुदेवता बोले — महर्षियो! मैंने पूर्वकालमें । । पशु - पाश और पशुपतिका जो ज्ञान प्राप्त किया ॥ १० था, सुख चाहनेवाले पुरुषको उसीमें ऊँची निष्ठा । रखनी चाहिये । अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला । । ज्ञानसे ही दूर होता है । वस्तुके विवेकका नाम दुःख ज्ञान ॥ ११ है । वस्तुके तीन भेद माने गये हैं - जड ( प्रकृति ), चेतन ( जीव ) और उन दोनोंका नियन्ता ( परमेश्वर ), ॥ | इन्हीं तीनोंको क्रमसे पाश, पशु तथा पशुपति कहते ॥ १२ हैं ॥१०–१२ ॥ । तत्त्वज्ञ पुरुष प्रायः इन्हीं तीन तत्त्वोंको क्षर, ॥ १३ अक्षर तथा उन दोनोंसे अतीत कहते हैं । अक्षर ही पशु कहा गया है । क्षर तत्त्वका ही नाम पाश है तथा क्षर । और अक्षर दोनोंसे परे जो परमतत्त्व है, उसीको पति ॥ १४ या पशुपति कहते हैं ॥ १३-१४ ॥ मुनिगण बोले- हे मारुत! क्षर किसे कहा । गया है और अक्षर किसे कहते हैं एवं उन दोनों ॥ १५ क्षराक्षरसे परे क्या है? उसका वर्णन कीजिये ॥ १५ ॥
वायुदेव बोले- प्रकृतिको ही क्षर कहा गया । है । पुरुष ( जीव ) -को अक्षर कहते हैं और जो इन ॥ १६ दोनोंको प्रेरित करता है, वह क्षर और अक्षर दोनोंसे भिन्न तत्त्व ही परमेश्वर कहा गया है ॥ १६ ॥
मुनिगण बोले — हे देव! यह प्रकृति कौन । कही गयी है, और यह पुरुष कौन कहा गया है? ॥ १७ इनका सम्बन्ध किसके द्वारा होता है और यह प्रेरक ईश्वर कौन है? ॥ १७ ॥
वायुदेव बोले — मायाका ही नाम प्रकृति है ॥ पुरुष उस मायासे आवृत है । मल और कर्मके द्वारा ॥ १८ प्रकृतिका पुरुषके साथ सम्बन्ध होता है । शिव ही इन दोनोंके प्रेरक ईश्वर हैं ॥ १८ ॥
मुनिगण बोले- माया किसे कहते हैं, मायासे । आच्छादित होनेपर पुरुष किस रूपका हो जाता है, । | यह मल क्या है और कहाँसे आया शिवतत्त्व क्या १ ९ है तथा शिव कौन है? ॥ १ ९ ॥,