शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 761–770
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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अ ० ६ ] वायवीयसंहिता
न तस्य विद्यते कार्यं कारणं च न विद्यते ।
न तत्समोऽधिकश्चापि क्वचिज्जगति दृश्यते ॥ ५ ९
परास्य विविधा शक्तिः श्रुतौ स्वाभाविकी श्रुता ।
ज्ञानं बलं क्रियां चैव याभ्यो विश्वमिदं कृतम् ॥ ६०
न तस्यास्ति पतिः कश्चिन्नैव लिङ्गं न चेशिता ।
कारणं कारणानां च स तेषामधिपाधिपः ॥ ६१
न चास्य जनिता कश्चिन्न च जन्म कुतश्चन ।
न जन्महेतवस्तद्वन्मलमायादिसंज्ञकाः ॥ ६२
स एकः सर्वभूतेषु गूढो व्याप्तश्च विश्वतः ।
सर्वभूतान्तरात्मा च धर्माध्यक्षः स कथ्यते ॥ ६३
सर्वभूताधिवासश्च साक्षी चेता च निर्गुणः ।
एको वशी निष्क्रियाणां बहूनां विवशात्मनाम् ॥ ६४
नित्यानामप्यसौ नित्यश्चेतनानां च चेतनः ।
एको बहूनां चाकामः कामानीशः प्रयच्छति ॥ ६५
सांख्ययोगाधिगम्यं यत् कारणं जगतां पतिम् ।
ज्ञात्वा देवं पशुः पाशैः सर्वैरेव विमुच्यते ॥ ६६
विश्वकृद् विश्ववित् स्वात्मयोनिज्ञः कालकृद्गुणी ।
प्रधान: क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः पाशमोचकः ॥ ६७
ब्रह्माणं विदधे पूर्वं वेदांश्चोपादिशत्स्वयम् ।
यो देवस्तमहं बुद्ध्वा स्वात्मबुद्धिप्रसादतः ॥ ६८
मुमुक्षुरस्मात् संसारात् प्रपद्ये शरणं शिवम् ।
निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं निरंजनम् ॥ ६ ९
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ ७०
( पूर्वखण्ड ) ७४७ उनके शरीररूप कार्य और इन्द्रिय तथा मनरूपी करण नहीं हैं, उनके समान और उनसे अधिक भी इस जगत्में कोई नहीं दिखायी देता । ज्ञान, बल और क्रियारूप उनकी स्वाभाविक पराशक्ति वेदोंमें नाना प्रकारकी सुनी गयी है । उन्हीं शक्तियोंसे इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है ॥५ ९ -६० ॥ उसका न कोई स्वामी है, न कोई निश्चित चिह्न है, न उसपर किसीका शासन है । वह समस्त कारणोंका कारण होता हुआ ही उनका अधीश्वर भी है । उनका न कोई जन्मदाता है, न जन्म है, न जन्मके माया - मलादि हेतु ही हैं । वह एक ही सम्पूर्ण विश्वमें, समस्त भूतोंमें गुह्यरूपसे व्याप्त है । वही सब भूतोंका अन्तरात्मा और धर्माध्यक्ष कहलाता है॥६१–६३ ॥ वह सब भूतोंके अंदर बसा हुआ, [ सबका द्रष्टा ] साक्षी, चेतन और निर्गुण है । वह एक है, वशी | है, अनेकों विवशात्मा निष्क्रिय पुरुषोंको वशमें रखनेवाला है । वह नित्योंका नित्य, चेतनोंका चेतन है । वह एक है, कामनारहित है और बहुतोंकी कामना पूर्ण करनेवाला ईश्वर है ॥ ६४-६५ ॥ सांख्य और योग अर्थात् ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य सबके कारणरूप उन जगदीश्वर परमदेवको जानकर जीव सम्पूर्ण पाशों ( बन्धनों ) -से मुक्त हो जाता है । वे सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यके हेतु, ज्ञानस्वरूप, कालके भी स्रष्टा, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न, प्रकृति और जीवात्माके स्वामी, समस्त गुणोंके शासक तथा संसार - बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं ॥ ६६-६७ ॥ जिन परमदेवने सबसे पहले ब्रह्माजीको उत्पन्न किया और स्वयं उन्हें वेदोंका ज्ञान दिया, अपने स्वरूपविषयक बुद्धिको प्रसन्न ( निर्मल ) करनेवाले उन परमेश्वर शिवको जानकर मैं इस संसारबन्धनसे छूटनेके लिये उनकी शरणमें जाता हूँ ॥६८१ / २ ॥ निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निष्कलंक, निरंजन, अमृत - स्वरूप मोक्षके परमसेतु तथा काष्ठके दग्ध हो जानेपर देदीप्यमान होनेवाली अग्निके समान निर्विकार [ परमेश्वर शिवकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ] ॥६ ९ -७० ॥
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७४८ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः तदा शिवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति तप: प्रभावाद्देवस्य प्रसादाच्च महर्षयः आत्माश्रमोचितज्ञानं पवित्रं पापनाशनम् वेदान्ते परमं गुह्यं पुरा कल्पप्रचोदितम् । ब्रह्मणो वदनाल्लब्धं मयेदं भाग्यगौरवात्
नाप्रशांताय दातव्यमेतज्ज्ञानमनुत्तमम् ।
न पुत्रायासुवृत्ताय नाशिष्याय च सर्वथा ॥
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः अतश्च संक्षेपमिदं शृणुध्वं शिवः परस्तात्प्रकृतेश्च पुंसः । स सर्गकाले च करोति सर्वं संहारकाले पुनराददाति ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे श्रीशिवमहापुराण [ अ ०७ । यदि कोई आकाशको चमड़ेके समान ॥ ७१ शरीरमें ] लपेट ले, तब वह शिवको बिना जाने [ अपने | दुःख दूर कर सकता है अर्थात् शिवके ज्ञानके अपना बिना दुःखका अन्त असम्भव है ॥ ७१ ॥
। हे महर्षियो! अपनी तपस्याके प्रभाव शिवके अनुग्रहसे संन्यासाश्रमोचित और ॥ ७२, पापनाशक | पवित्र, वेदान्तमें परम गुप्त और पूर्वकल्पमें कहे, गये ॥ ७३ । इस ज्ञानको मैंने अपने भाग्यके प्रभावसे ब्रह्माजीके मुखसे प्राप्त किया है ॥ ७२-७३ ॥ यह श्रेष्ठ ज्ञान न अस्थिर चित्तवाले व्यक्तिको ७४ न सदाचारविहीन पुत्रको तथा न तो अयोग्य शिष्यको, ही देना चाहिये ॥ ७४ ॥
जिनकी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति है, जैसे ॥ ७५ परमेश्वरमें है, वैसे ही गुरुमें भी है, उस महात्मा पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं । अतः संक्षेपसे यह सिद्धान्तकी बात सुनो । भगवान् शिव प्रकृति और पुरुषसे परे हैं । वे ही सृष्टिकालमें जगत्को रचते और संहारकालमें पुन: ७६ । सबको आत्मसात् कर लेते हैं ॥ ७५-७६ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे शिवतत्त्वज्ञानवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें शिवतत्त्वज्ञानवर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः कालकी महिमाका वर्णन मुनय ऊचुः
कालादुत्पद्यते सर्वं कालादेव विपद्यते ।
न कालनिरपेक्षं हि क्वचित्किंचन विद्यते ॥
यदास्यान्तर्गतं विश्वं शश्वत्संसारमण्डलम् । सर्गसंहृतिमुद्राभ्यां चक्रवत्परिवर्तते ॥
ब्रह्मा हरिश्च रुद्रश्च तथान्ये च सुरासुराः ।
यत्कृतां नियतिं प्राप्य प्रभवो नातिवर्तितुम् ॥
भूतभव्यभविष्याद्यैर्विभज्य जरयन् प्रजाः । मुनिगण बोले- कालसे ही सब कुछ उत्पन्न
होता है और कालसे ही सब कुछ नष्ट हो जाता है ।
१ कालके बिना कहीं कुछ भी नहीं होता है ॥१ ॥
यह सारा संसारमण्डल कालके मुखमें वर्तमान रहकर उत्पत्ति तथा प्रलयरूप लक्षणोंसे लक्षित चक्रकी २ भाँति निरन्तर घूमता रहता है ॥२ ॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा अन्य देवता एवं ३ असुर जिसके द्वारा बनाये गये नियमको प्राप्तकर उसका उल्लंघन करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, अत्यन्त भयानक वह काल भूत, भविष्य वर्तमान आदि रूपों में ,
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अ ० ७ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७४ ९ अतिप्रभुर स्वैरं वर्ततेऽतिभयंकरः ॥
क एष भगवान् कालः कस्य वा वशवर्त्ययम् ।
क एवास्य वशे न स्यात्कथयैतद्विचक्षण ॥
वायुरुवाच
कलाकाष्ठानिमेषादिकलाकलितविग्रहम् ।
कालात्मेति समाख्यातं तेजो माहेश्वरं परम् ॥
यदलङ्घ्यमशेषस्य स्थावरस्य चरस्य च ।
नियोगरूपमीशस्य बलं विश्वनियामकम् ॥
तस्यांशांशमयी शक्तिः कालात्मनि महात्मनि ।
ततो निष्क्रम्य संक्रांता विसृष्टाग्नेरिवायसि ॥
तस्मात्कालवशे विश्वं न स विश्ववशे स्थितः ।
शिवस्य तु वशे कालो न कालस्य वशे शिवः ॥
यतोऽप्रतिहतं शार्वं तेजः काले प्रतिष्ठितम् ।
महती तेन कालस्य मर्यादा हि दुरत्यया ॥
कालं प्रज्ञाविशेषेण कोऽतिवर्तितुमर्हति ।
कालेन तु कृतं कर्म न कश्चिदतिवर्तते ॥
एकच्छत्रां महीं कृत्स्नां ये पराक्रम्य शासति ।
तेऽपि नैवातिवर्तन्ते कालं वेलामिवाब्धयः ॥
ये निगृह्येन्द्रियग्रामं जयन्ति सकलं जगत् ।
न जयन्त्यपि ते कालं कालो जयति तानपि ॥
आयुर्वेदविदो वैद्याः त्वनुष्ठितरसायनाः ।
न मृत्युमतिवर्तन्ते कालो हि दुरतिक्रमः ॥
श्रिया रूपेण शीलेन बलेन च कुलेन च ।
अन्यच्चिन्तयते जंतुः कालोऽन्यत्कुरुते बलात् ॥
४ | अपनेको विभक्तकर प्रजाओंको क्षीण करता हुआ सर्वसमर्थ होकर स्वच्छन्दतापूर्वक व्यवहार करता रहता है॥३-४ ॥ यह भगवत्स्वरूप काल कौन है, यह किसके ५ अधीन रहनेवाला है और कौन इसके वशमें नहीं है? हे विचक्षण! इसे बताइये ॥५ ॥
वायु बोले – कला, काष्ठा, निमेष आदि इकाइयोंसे घटित मूर्तस्वरूप धारण करनेवाला ६ महेश्वरका परम तेज ही कालात्मा कहा गया है, जिसका उल्लंघन समस्त स्थावर तथा जंगम रूपवाला कोई भी [ प्राणी ] नहीं कर सकता । वह ईश्वरका ७ आदेशरूप है और विश्वको अपने वशमें रखनेवाला ईश्वरका [ साक्षात् ] बल है॥६-७ ॥ उन परमेश्वरकी अंशांशरूपा शक्ति उनसे ८ निकलकर महिमामय कालात्मामें उसी प्रकार संक्रान्त हो गयी है, जिस प्रकार दाहिका शक्ति अग्निसे निकलकर लोहेमें संक्रान्त हो जाती है । इसलिये ९ सम्पूर्ण जगत् तो कालके वशमें है, पर काल विश्वके वशमें नहीं है और वह काल शिवके वशमें है, किंतु शिव कालके वशमें नहीं हैं । शिवजीका अप्रतिहत १० तेज कालमें सन्निविष्ट है, इसलिये कालकी महान् मर्यादा मिटायी नहीं जा सकती ॥ ८ - १० ॥ अपनी विशिष्ट बुद्धिसे भी भला कौन कालका ११ अतिक्रमण करनेमें समर्थ है । कोई भी कालके द्वारा किये गये कर्मको नहीं मिटा सकता है ॥ ११ ॥
जो पराक्रम करके सम्पूर्ण पृथ्वीपर एकछत्र १२ शासन करते हैं, वे भी कालकी मर्यादाको नहीं मिटा सकते, जैसे तटकी मर्यादाको सागर नहीं मिटा सकते ॥ १२ ॥
जो लोग इन्द्रियोंको वशमें करके सारे संसारको १३ जीत लेते हैं, वे भी कालको नहीं जीत पाते, अपितु काल ही उन्हें जीत लेता है । आयुर्वेदके ज्ञाता और रसायनका प्रयोग करनेवाले वैद्य भी मृत्युको नहीं टाल १४ सकते हैं; क्योंकि काल दुरतिक्रम है॥१३-१४ ॥ श्री ( धन ), रूप, शील, बल और कुलके द्वारा [ समृद्ध ] प्राणी कुछ और सोचता है, किंतु काल १५ । बलपूर्वक कुछ और ही कर देता है ॥ १५ ॥
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७५० अप्रियैश्च प्रियैश्चैव ह्यचिन्तितसमागमैः संयोजयति भूतानि वियोजयति चेश्वरः यदैव दुःखितः कश्चित्तदैव सुखितः परः दुर्विज्ञेयस्वभावस्य कालस्याहो विचित्रता यो युवा स भवेद् वृद्धो यो बलीयान्स दुर्बलः यः श्रीमान्सोऽपि निःश्रीकः कालश्चित्रगतिर्द्विजाः नाभिजात्यं न वै शीलं न बलं न च नैपुणम् । भवेत्कार्याय पर्याप्तं कालश्चेत् प्रतिरोधकः ये सनाथाश्च दातारो गीतवाद्यैरुपस्थिताः । ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः फलन्त्यकाले न रसायनानि सम्यक् प्रयुक्तान्यपि चौषधानि । तान्येव कालेन समाहृतानि सिद्धिं प्रयान्त्याशु सुखं दिशन्ति ॥ नाकालतोऽयं म्रियते जायते वा नाकालतः पुष्टिमग्र्यामुपैति । नाकालतः सुखितं दुःखितं वा नाकालिकं वस्तु समस्ति किंचित् ॥ कालेन शीतः प्रतिवाति वातः वृष्टिर्जलदानुपैति । कान चोष्मा प्रशमं प्रयाति कालेन सर्वं सफलत्वमेति ॥ कालश्च सर्वस्य भवस्य हेतुः कालेन सस्यानि भवंति नित्यम् । कालेन सस्यानि लयं प्रयांति कालेन संजीवति जीवलोकः ॥ श्रीशिवमहापुरा [ अ ०७ । वह सामर्थ्यशाली काल प्रिय और ॥ १६ घटनाओंके अकल्पित समागमके अप्रिय द्वारा कभी | प्राणियोंका संयोग और कभी वियोग प्राप्त कराता रहता है ॥१६ ॥
। जिस समय कोई दुखी रहता है, उसी समय ॥ १७ कोई दूसरा सुखी रहता है । अहो! कठिनतासे | जाननेयोग्य स्वभाववाले कालकी कैसी विचित्रता
।
है!॥ १७ ॥
। जो युवा है, वह वृद्ध हो जाता है, जो बलवान् ॥ १८ है, वह दुर्बल हो जाता है और जो श्रीसम्पन्न है, वह निर्धन भी हो सकता है । हे ब्राह्मणो! कालकी गति बड़ी विचित्र है । कालके प्रतिकूल होनेपर कुलीनता, ॥ १ ९ शील, सामर्थ्य तथा कुशलता – ये कोई भी गुण कार्यसिद्धिमें सफलता नहीं दे पाते ॥ १८-१९ ॥ जो प्राणी सनाथ हैं, दानशील हैं और जिनका ॥ २० मनोरंजन गीत - वाद्यादिके द्वारा किया जाता है, वे लोग और जो अनाथ हैं तथा दूसरोंके द्वारा दिये गये अन्नका भोजन करते हैं - उन सभीके प्रति काल समान व्यवहारवाला होता है ॥ २० ॥
असमयमें अच्छी तरहसे प्रयोगमें लाये गये रसायन तथा औषध कारगर नहीं होते हैं, किंतु समयसे दिये जानेपर वे ही सफल होते हैं तथा सुख २१ प्रदान करते हैं । यह जीव बिना समयके न मरता है, न जन्म ही लेता है और न उत्तम पोषण ही प्राप्त करता है । बिना कालके कोई सुखी अथवा दुखी भी नहीं होता है । [ इस संसारमें ] कोई वस्तु ऐसी नहीं २२ है, जो अकालिक हो॥२१-२२ ॥ समयसे ही ठण्डी हवा चलती है समयसे ही मेघोंसे वर्षा होती है और समयसे, ही गर्मी २३ | शान्त होती है, कालसे ही सब कुछ सफल होता है ॥ २३ ॥
काल ही सभीकी उत्पत्तिका कारण है । समयपर | ही फसलें होती हैं और समयपर ही फसलें कटती हैं, २४ । कालसे ही सब लोग जीवित रहते हैं ॥ २४ ॥
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अ ० ८ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७५१ इत्थं कालात्मनस्तत्त्वं यो विजानाति तत्त्वतः । इस प्रकार जो कालात्माके तात्त्विक कालात्मानमतिक्रम्य कालातीतं स पश्यति ॥ २५ स्वरूपको यथार्थरूपसे जानता है, वह कालात्माका अतिक्रमणकर कालसे परे निर्गुण परमेश्वरका दर्शन कर लेता है ॥ २५ ॥
न यस्य कालो न च बंधमुक्ती जिसका न काल है, न बन्धन है और न न यः पुमान्न प्रकृतिर्न विश्वम् । मुक्ति है; जो न पुरुष है, न प्रकृति है तथा न विश्व विचित्ररूपाय शिवाय तस्मै है - उस विचित्र रूपवाले परात्पर परमेश्वर शिवको
नमः परस्मै परमेश्वराय ॥ २६ । नमस्कार है ॥२६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे कालमहिमवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें कालमहिमवर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः कालका परिमाण एवं ऋषय ऊचुः
केन मानेन कालेऽस्मिन्नायुः संख्या प्रकल्प्यते ।
संख्यारूपस्य कालस्य कः पुनः परमोऽवधिः ॥
वायुरुवाच
आयुषोऽत्र निमेषाख्यमाद्यमानं प्रचक्षते ।
संख्यारूपस्य कालस्य शान्त्यतीतकलावधिः ॥
अक्षिपक्ष्मपरिक्षेपो निमेषः परिकल्पितः ।
तादृशानां निमेषाणां काष्ठा दश च पञ्च च ॥
काष्ठास्त्रिंशत्कला नाम कलास्त्रिंशन्मुहूर्तकः ।
मुहूर्त्तानामपि त्रिंशदहोरात्रं प्रचक्षते ॥
त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रैर्मासः पक्षद्वयात्मकः ॥
ज्ञेयं पित्र्यमहोरात्रं मासः कृष्णसितात्मकः ॥
मासैस्तैरयनं षड्भिर्वर्षं द्वे चायनं मतम् ।
लौकिकेनैव मानेन ह्यब्दो यो मानुषः स्मृतः ॥
एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रस्य निश्चयः ।
दक्षिणं चायनं रात्रिस्तथोदगयनं दिनम् ॥
त्रिदेवोंके आयुमानका वर्णन ऋषिगण बोले- इस कालमें किस प्रमाणके द्वारा आयु - गणनाकी कल्पना की जाती है और १ संख्यारूप कालकी परम अवधि क्या है? ॥१ ॥
वायुदेव बोले- आयुका पहला मान निमेष कहा जाता है । संख्यारूप कालकी शान्त्यतीत कला २ चरम सीमा है । पलक गिरनेमें जो समय लगता है, उसे ही निमेष कहा गया है । उस प्रकारके पन्द्रह ३ निमेषोंकी एक काष्ठा होती है॥२-३ ॥ तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका ४ एक मुहूर्त और तीस मुहूर्तोंका एक अहोरात्र कहा जाता है । मास तीस दिन - रातका तथा दो पक्षोंवाला ५ होता है । एक मासके बराबर पितरोंका एक अहोरात्र होता है, जिसमें रात्रि कृष्णपक्ष और और दि दिन शुक्लपक्ष ६ माना जाता है॥४-६ ॥ छः महीनोंका एक अयन होता है । दो ७ अयनोंका एक वर्ष माना गया है, जिसे लौकिक मानसे मनुष्योंका वर्ष कहा जाता है । यही एक वर्ष देवताओंका एक अहोरात्र होता है - ऐसा शास्त्रका निश्चय है । दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि एवं उत्तरायण ८ दिन होता है ॥ ७-८ ॥
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७५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८
मासस्त्रिंशदहोरात्रैर्दिव्यो मानुषवत्स्मृतः ।
संवत्सरोऽपि देवानां मासैर्द्वादशभिस्तथा ॥
त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षयुतान्यपि ॥
दिव्यः संवत्सरो ज्ञेयो मानुषेण प्रकीर्तितः ॥
दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रवर्तते ।
चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयो विदुः ॥
पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते ।
द्वापरं च कलिश्चैव युगान्येतानि कृत्स्नशः ॥
चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥
इतरेषु ससन्ध्येषु ससन्ध्यांशेषु च त्रिषु ।
एकापायेन वर्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च ॥
एतद्द्वादशसाहस्त्रं साधिकं च चतुर्युगम् ।
चतुर्युगसहस्त्रं यत्संकल्प इति कथ्यते ॥
चतुर्युगैकसप्तत्या मनोरन्तरमुच्यते ।
कल्पे चतुर्दशैकस्मिन्मनूनां परिवृत्तयः ॥
एतेन क्रमयोगेन कल्पमन्वन्तराणि च ।
सप्रजानि व्यतीतानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥
अज्ञेयत्वाच्च सर्वेषामसंख्येयतया पुनः ।
शक्यो नैवानुपूर्व्याद्वै तेषां वक्तुं सुविस्तरः ॥
कल्पो नाम दिवा प्रोक्तो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
कल्पानां वै सहस्रं च ब्राह्मं वर्षमिहोच्यते ॥
मनुष्योंकी भाँति देवताओंके भी तीस अहोरात्रोंको उनका एक मास कहा गया है और | इस प्रकारके बारह महीनोंका देवताओंका भी एक वर्ष होता है । मनुष्योंके तीन सौ साठ वर्षोंका १०। देवताओंका एक वर्ष जानना चाहिये 1 । उसी दिव्य । वर्षसे युगसंख्या होती है । विद्वानोंने भारतवर्षमें चार ११ युगोंकी कल्पना की है॥९ –११ ॥ सबसे पहले कृतयुग ( सत्ययुग ), इसके बाद १२ त्रेतायुग होता है, फिर द्वापर तथा कलियुग होते हैं— इस प्रकार कुल ये ही चार युग हैं ॥ १२ ॥
इनमें देवताओंके चार हजार वर्षोंका सत्ययुग १३ होता है, इसके अतिरिक्त चार सौ वर्षोंकी सन्ध्या तथा इतने ही वर्षोंका सन्ध्यांश होता है ॥ १३ ॥
अन्य तीन युगोंमें वर्ष तथा सन्ध्या - सन्ध्यांशमें १४ एक - एक पाद क्रमशः हजार तथा सौ कम होता | है अर्थात् त्रेता तीन हजार वर्षका, उसकी सन्ध्या एवं सन्ध्यांश तीन सौ वर्षके, द्वापर दो हजार उसकी सन्ध्या एवं सन्ध्यांश दो सौ कलियुग एक हजार वर्षका तथा उसकी सन्ध्यांश एक - एक सौ वर्षके होते हैं सन्ध्या एवं सन्ध्यांशके सहित चारों युग १५ वर्षके होते हैं । एक हजार चतुर्युगीका कहा जाता है॥१४-१५ ॥ इकहत्तर चतुर्युगीका एक मन्वन्तर वर्षका तथा वर्षके और सन्ध्या एवं । इस तरह बारह हजार एक कल्प कहा जाता १६ है । एक कल्पमें चौदह मनुओंका आवर्तन होता है ॥ १६ ॥
इस क्रमयोगसे प्रजाओंसहित सैकड़ों - हजारों १७ कल्प और मन्वन्तर बीत चुके हैं । उन सभीको न जाननेके कारण तथा उनकी गणना न कर सकनेके कारण क्रमबद्धरूपसे उनके विस्तारका १८ निरूपण नहीं किया जा सकता है । एक कल्पके बराबर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है तथा यहाँपर हजार कल्पोंका ब्रह्माका एक १ ९ | वर्ष कहा जाता है ॥ १७–१९ ॥
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अ ० ८ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७५३
वर्षाणामष्टसाहस्त्रं यच्च तद्ब्रह्मणो युगम् ।
सवनं युगसाहस्त्रं ब्रह्मण: पद्मजन्मनः ॥
सवनानां सहस्त्रं च त्रिगुणं त्रिवृतं तथा ।
कल्प्यते सकलः कालो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥
तस्य वै दिवसे यान्ति चतुर्दश पुरंदराः ।
शतानि मासे चत्वारि विशंत्या सहितानि च ॥
अब्दे पञ्च सहस्राणि चत्वारिंशद्युतानि च ।
चत्वारिंशत्सहस्त्राणि पञ्च लक्षाणि चायुषि ॥
ब्रह्मा विष्णोर्दिने चैको विष्णू रुद्रदिने तथा ।
ईश्वरस्य दिने रुद्रः सदाख्यस्य तथेश्वरः ॥
साक्षाच्छिवस्य तत्संख्यस्तथा सोऽपि सदाशिवः ।
चत्वारिंशत्सहस्त्राणि पञ्चलक्षाणि चायुषि ॥
तस्मिन्साक्षाच्छिवेनैष कालात्मा सम्प्रवर्तते ।
यत्तत्सृष्टेः समाख्यातं कालान्तरमिह द्विजाः ॥
एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहवैं पारमेश्वरम् ।
रात्रिश्च तावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः ॥
अहस्तस्य तु या सृष्टी रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः ।
अहर्न विद्यते तस्य न रात्रिरिति धारयेत् ॥
एषोपचारः क्रियते लोकानां हितकाम्यया । प्रजाः प्रजानां पतयो मूर्तयश्च सुरासुराः इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च तन्मात्राण्यथ भूतादिर्बुद्धिश्च सह दैवतैः अहस्तिष्ठन्ति सर्वाणि परमेशस्य धीमतः अहरन्ते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसंभवः ऐसे आठ हजार वर्षोंका ब्रह्माका एक युग होता २० | है और पद्मयोनि ब्रह्माके हजार युगोंका एक सवन होता है । एक हजार सवनोंका तीन गुना तथा उस २१ तीन गुनाका भी तीन गुना अर्थात् नौ हजार सवनोंका ब्रह्माजीका कालमान कहा गया है । उनके एक दिनमें २२ चौदह, एक मासमें चार सौ बीस, एक वर्षमें पाँच हजार चालीस तथा उनकी पूरी आयुमें पाँच लाख २३ चालीस हजार इन्द्र व्यतीत हो जाते हैं ॥ २०–२३ ॥ ब्रह्मा विष्णुके एक दिनपर्यन्त, विष्णु रुद्रके एक २४ दिनपर्यन्त, रुद्र ईश्वरके एक दिनपर्यन्त और ईश्वर सत् नामक शिवके एक दिनपर्यन्त रहते हैं ॥ २४ ॥
यही साक्षात् शिवके लिये कालकी संख्या २५ है, उन्हें सदाशिव भी कहा जाता है । इनकी पूर्ण आयुमें पूर्वोक्त क्रमसे पाँच लाख चालीस हजार रुद्र हो जाते हैं ॥२५ ॥
उन साक्षात् सदाशिवके द्वारा ही वह कालात्मा २६ प्रवर्तित होता है । हे ब्राह्मणो! सृष्टिके कालान्तरका मैंने वर्णन कर दिया, इतने कालको परमेश्वरका एक २७ दिन जानना चाहिये और उतने ही कालको परमेश्वरकी एक पूर्ण रात्रि भी जाननी चाहिये । सृष्टिको दिन और प्रलयको रात्रि कहा गया है, किंतु उनके लिये न दिन २८ है और न रात्रि - ऐसा समझना चाहिये ॥ २६–२८ ॥ यह औपचारिक व्यवहार तो लोकके हितकी कामनासे किया जाता है । प्रजा, प्रजापति, नानाविध ॥ २ ९ शरीर, सुर, असुर, इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके विषय, पंचमहाभूत, तन्मात्राएँ, भूतादि ( अहंकार ), देवगणोंके साथ बुद्धि-। ये सब धीमान् परमेश्वरके दिनमें स्थित रहते हैं और ॥ ३० दिनके अन्तमें प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं, इसके बाद रात्रिके अन्तमें पुनः विश्वकी उत्पत्ति होती है ॥ २ ९ -३० ॥ जो विश्वात्मा हैं और काल, कर्म तथा स्वभावादि अर्थमें जिनकी शक्तिका उल्लंघन नहीं किया जा सकता । और जिनकी आज्ञाके अधीन यह समस्त जगत् ॥ ३१ । है, उन महान् शंकरको नमस्कार है ॥३१ ॥
सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे कालप्रभावे त्रिदेवायुर्वर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें कालप्रभावमें ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके त्रिदेवोंका आयुवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
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७५४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ अथ नवमोऽध्यायः सृष्टिके पालन एवं मुनय ऊचुः
कथं जगदिदं कृत्स्नं विधाय च निधाय च ।
आज्ञया परमां क्रीडां करोति परमेश्वरः ॥ १
किं तत्प्रथमसंभूतं केनेदमखिलं ततम् ।
केन वा पुनरेवेदं ग्रस्यते पृथुकुक्षिणा ॥ २
वायुरुवाच
शक्तिः प्रथमसम्भूता शान्त्यतीतपदोत्तरा ।
ततो माया ततोऽव्यक्तं शिवाच्छक्तिमतः प्रभोः ॥ ३
शान्त्यतीतपदं शक्तेस्ततः शान्तिपदं क्रमात् ।
ततो विद्यापदं तस्मात्प्रतिष्ठापदसम्भवः ॥ ४
निवृत्तिपदमुत्पन्नं प्रतिष्ठापदतः क्रमात् ।
एवमुक्ता समासेन सृष्टिरीश्वरचोदिता ॥ ५
आनुलोम्यात्तथैतेषां प्रातिलोम्येन संहृतिः ।
अस्मात्पञ्चपदोद्दिष्टात्परः स्रष्टा समिष्यते ॥ ६
कलाभिः पञ्चभिर्व्याप्तं तस्माद्विश्वमिदं जगत् ।
अव्यक्तं कारणं यत्तदात्मना समनुष्ठितम् ॥ ७
महदादिविशेषान्तं सृजतीत्यपि सम्मतम् ।
किं तु तत्रापि कर्तृत्वं नाव्यक्तस्य न चात्मनः ॥ ८
अचेतनत्वात्प्रकृतेरज्ञत्वात्पुरुषस्य च ।
प्रधानपरमाण्वादि यावत्किञ्चिदचेतनम् ॥ ९
तत्कर्तृकं स्वयं दृष्टं बुद्धिमत्कारणं विना ।
जगच्च कर्तृसापेक्षं कार्यं सावयवं यतः ॥ १०
प्रलयकर्तृत्वका वर्णन मुनिगण बोले— [ हे वायुदेव! ] परमात्मा शिव किस प्रकारसे इस सम्पूर्ण जगत्का निर्माणक इसे स्थापित करके अपनी शक्तिके साथ उत्तम क्रीड़ा पुनः करते हैं? ॥१ ॥
यह संसार सर्वप्रथम किस प्रकारसे उत्पन्न हुआ, किसने इस सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया | और विशाल उदरवाला कौन इसे बादमें ग्रास बना लेता है? ॥२ ॥
वायु बोले — सबसे पहले शक्तिकी उत्पत्ति हुई, इसके पश्चात् शान्त्यतीतपद उत्पन्न हुआ, तदनन्तर शक्तिमान् प्रभु शिवसे माया एवं अव्यक्त प्रकृति उत्पन्न हुई ॥३ ॥
[ प्रथमोत्पन्न ] शक्तिसे शान्त्यतीतपद, इसके पश्चात् शान्तिपद, तदनन्तर विद्यापद, उसके आगे प्रतिष्ठापद और उसके आगे निवृत्तिपद क्रमशः उत्पन्न हुए । इस प्रकार मैंने ईश्वरप्रेरित सृष्टिका वर्णन संक्षेपमें किया है॥४-५ ॥ सृष्टिकी उत्पत्ति अनुलोम क्रमसे होती है और प्रतिलोम क्रमसे उसका संहार होता है । इन पाँच पदोंसे उपदिष्ट सृष्टिके अतिरिक्त एक स्रष्टा भी कहा जाता है ॥६ ॥
अव्यक्त कारण जो पाँच कलाओंसे व्याप्त हैं तथा जिससे इस विश्वकी उत्पत्ति है और जो चेतनसे अधिष्ठित है, वह अव्यक्त महत्तत्त्वसे लेकर विशेष-तत्त्वपर्यन्त इस संसारकी सृष्टि करता है — यह सर्व-सम्मत है, फिर भी इसमें अव्यक्त तथा जीवका कर्तृत्व नहीं है॥७-८ ॥ प्रकृतिके अचेतन होनेसे और पुरुषके अज्ञानी होनेसे प्रधान, परमाणु आदि जो कुछ भी हैं, सभी अचेतन ही हैं ॥ ९ ॥
उनका कर्ता कोई चेतन होना चाहिये, जो बुद्धिसे युक्त हो, इसके बिना कार्य - कारणभावकी संगति नहीं बैठती, क्योंकि यह जगत् कार्यरूप है, सावयव है और कर्तृसापेक्ष है ॥ १० ॥
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अ ० ९ ] वायवीयसहिता ( पूर्वखण्ड ) ७५५ तस्माच्छक्तः स्वतन्त्रो यः सर्वशक्तिश्च सर्ववित् । अतएव जो समर्थ, स्वतन्त्र, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अनादिनिधनश्चायं महदैश्वर्यसंयुतः ॥ ११ आदि - अन्तसे परे और महान् ऐश्वर्यसे समन्वित हैं,
स एव जगतः कर्ता महादेवो महेश्वरः ।
पाता हर्ता च सर्वस्य ततः पृथगनन्वयः ॥
परिणामः प्रधानस्य प्रवृत्तिः पुरुषस्य च ।
सर्वं सत्यव्रतस्यैव शासनेन प्रवर्तते ॥
इतीयं शाश्वती निष्ठा सतां मनसि वर्तते ।
न चैनं पक्षमाश्रित्य वर्तते स्वल्पचेतनः ॥
यावदादिसमारंभो यावद्यः प्रलयो महान् ।
तावदप्येति सकलं ब्रह्मणः शरदां शतम् ॥
परमित्यायुषो नाम ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
तत्पराख्यं तदर्द्धं च परार्द्धमभिधीयते ॥
परार्द्धद्वयकालान्ते प्रलये समुपस्थिते ॥
अव्यक्तमात्मनः कार्यमादायात्मनि तिष्ठति ॥
आत्मन्यवस्थितेऽव्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते ।
साधर्म्येणाधितिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ ॥
तमः सत्त्वगुणावेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ ।
अनुद्रिक्तावनूनौ तावोतप्रोतौ परस्परम् ॥
गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभागे तमोदये शांतवातैकनीरे च न प्राज्ञायत किंचन अप्रज्ञाते जगत्यस्मिन्नेक एव महेश्वरः उपास्य रजनीं कृत्स्नां परो माहेश्वरीं ततः वे महेश्वर महादेव ही सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, पालन करनेवाले तथा संहार करनेवाले हैं १२ और सबसे पृथक् तथा अन्वयरहित हैं॥११-१२ ॥ प्रधानका परिणाम तथा पुरुषकी प्रवृत्ति - यह १३ सब कुछ उस सत्यव्रत [ परमेश्वर ] -के शासनसे ही प्रवर्तित होता है । सज्जनोंके मनमें यह शाश्वत निष्ठा बनी हुई है, किंतु अल्पबुद्धिवाला इस पक्षको ग्रहण १४ नहीं कर पाता है ॥ १३-१४ ॥ जबसे इस सृष्टिका आरम्भ होता है और १५ जबतक प्रलय होता है, तबतक ब्रह्मदेवके पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जाते हैं ॥ १५ ॥
अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी आयुका नाम ' पर ' है । १६ | उस परके आधे भागको प्रथम परार्ध तथा द्वितीय भागको द्वितीय परार्ध कहते हैं । दोनों परार्थोंके बीत जानेके बाद प्रलयके उपस्थित होनेपर अव्यक्त अपने १७ कार्यभूत जगत्को लेकर अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है॥१६-१७ ॥ अव्यक्तके स्वस्वरूपमें अवस्थित हो जानेपर १८ तथा [ जगद्रूप ] विकारका प्रतिलोमक्रमसे विलय हो जानेपर प्रधान और पुरुष दोनों समान धर्मसे स्थित हो जाते हैं ॥१८ ॥
तब तम तथा सत्त्वगुण – ये दोनों समरूपमें १ ९ स्थित रहते हैं । वे दोनों वृद्धि और न्यूनतासे रहित होकर परस्पर चेष्टाशून्य ओत - प्रोत रहते हैं ॥ १ ९ ॥ । उस समय गुणोंकी साम्यावस्था होनेसे परस्पर ॥ २० वे अविभक्त थे तथा [ सर्वत्र घनीभूत ] अन्धकार व्याप्त था । वायु तथा जलकी गति शान्त थी और कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था । उस समय जब संसारमें कुछ भी प्रतीत नहीं हो रहा था, तब एकमात्र । ॥ २१ महेश्वर ही विद्यमान थे । उन परमात्मा महेश्वरने उस सम्पूर्ण माहेश्वरी रात्रिको व्यतीत किया । रात्रिके अवसान तथा प्रभातके आगमनपर उन्होंने मायाके प्रधानपुरुषावुभौ । योगसे प्रधान तथा पुरुषमें प्रविष्ट होकर उनको क्षुब्ध
प्रभातायां तु शर्वर्यां ॥ २२ । कर दिया ॥ २०–२२ ॥
प्रविश्य क्षोभयामास मायायोगान्महेश्वरः
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७५६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १०
ततः पुनरशेषाणां भूतानां प्रभवाप्ययात् ।
अव्यक्तादभवत्सृष्टिराज्ञया परमेष्ठिनः ॥
विश्वोत्तरोत्तरविचित्रमनोरथस्य यस्यैकशक्तिशकले सकलः समाप्तः । आत्मानमध्वपतिमध्वविदो वदंति तस्मै नमः सकललोकविलक्षणाय ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे इसके बाद परमेष्ठीकी आज्ञासे अव्यक्तसे २३ पुनः उत्पत्ति और लयके निमित्त सभी प्राणियों की । सृष्टि हुई । जिनकी इच्छाके द्वारा यह विचित्र विश्व | उत्तरोत्तर उत्पन्न हुआ था, जिनकी शक्तिके मात्र | एक अंशमें यह समस्त जगत् लयको प्राप्त हो जाता | है | मोक्षमार्गको जाननेवाले लोग जिन्हें मोक्षमार्गका | नियामक तथा आत्मस्वरूप बताते हैं, उन सर्वलोक-२४ | विलक्षण [ परमेश्वर ] -को नमस्कार है॥२३-२४ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे सृष्टिपालनप्रलयकर्तृत्ववर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें सृष्टिपालन तथा प्रलयकर्तृत्ववर्णन नामक नवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः ब्रह्माण्डकी स्थिति, स्वरूप आदिका वर्णन वायुरुवाच पुरुषाधिष्ठितात्पूर्वमव्यक्तादीश्वराज्ञया बुद्ध्यादयो विशेषान्ता विकाराश्चाभवन् क्रमात् ॥
ततस्तेभ्यो विकारेभ्यो रुद्रो विष्णुः पितामहः ।
कारणत्वेन सर्वेषां त्रयो देवाः प्रजज्ञिरे ॥
सर्वतो भुवनव्याप्तिशक्तिमव्याहतां क्वचित् ।
ज्ञानमप्रतिमं शश्वदैश्वर्यं चाणिमादिकम् ॥
सृष्टिस्थितिलयाख्येषु कर्मसु त्रिषु हेतुताम् ।
प्रभुत्वेन सहैतेषां प्रसीदति महेश्वरः ॥
कल्पान्तरे पुनस्तेषामस्पर्द्धाबुद्धिमोहिनाम् ।
सर्गरक्षालयाचारं प्रत्येकं प्रददौ च सः ॥
एते परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ।
परस्परेण वर्द्धन्ते परस्परमनुव्रताः ॥
क्वचिद्ब्रह्मा क्वचिद्विष्णुः क्वचिद् रुद्रः प्रशस्यते ।
नानेन तेषामाधिक्यमैश्वर्यं चातिरिच्यते ॥
मूर्खा निन्दन्ति तान्वाग्भिः संरम्भाभिनिवेशिनः ।
यातुधाना भवन्त्येव पिशाचाश्च न संशयः ॥
वायु बोले- पहले ईश्वरकी आज्ञासे पुरुषसे समन्वित अव्यक्तसे बुद्धि आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त १ सभी विकार क्रमशः उत्पन्न हुए ॥१ ॥
इसके बाद उन्हीं विकारोंसे रुद्र, विष्णु एवं २ पितामह – ये तीन जगत्कारणभूत देवता उत्पन्न हुए ॥२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने [ ब्रह्मा आदिको ] इस संसारमें ३ सभी जगह व्याप्त रहनेवाली अप्रतिहत शक्ति, अप्रतिम ज्ञान, अणिमादि ऐश्वर्य और सृष्टि, स्थिति तथा लय– इन तीन कार्योंका सामर्थ्य प्रदान किया, [ इस प्रकार ] ४ उन ब्रह्मादि देवोंको प्रभुत्वसे [ अनुगृहीत करते हुए ] उनपर महेश्वर प्रसन्न हुए । उन्होंने कल्पान्तरमें स्पर्धारहित ५ तथा निर्भ्रान्त बुद्धिवाले इन देवगणोंको सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयका कार्य क्रमसे सौंपा॥३–५ ॥ ये [ देवगण ] परस्पर उत्पन्न होकर आपसमें एक-६ दूसरेको धारण करते हैं और परस्पर एक - दूसरेका अनुवर्तन करते हुए वृद्धिको प्राप्त होते रहते हैं ॥ ६ ॥
कभी ब्रह्मा, कभी विष्णु तथा कभी रुद्र प्रशंसित ७ होते हैं, परंतु इससे उनके ऐश्वर्यकी न्यूनता अथवा । अधिकता नहीं होती है । दुराग्रहसे युक्त मूर्खलोग | वाणीसे उनकी निन्दा करते हैं और [ उस अपराध | कारण ] वे [ दूसरे जन्ममें ] राक्षस और पिशाच होते ८ हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७-८ ॥