शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 771–780

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780

पृष्ठ 771

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अ ० १० ] वायवीयसहिता ( पूर्वखण्ड ) ७५७

देवी गुणत्रयातीतश्चतुर्व्यूहो महेश्वरः ।

सकलः सकलाधारः शक्तेरुत्पत्तिकारणम् ॥

सोऽयमात्मा त्रयस्यास्य प्रकृतेः पुरुषस्य च ।

लीलाकृतजगत्सृष्टिरीश्वरत्वे व्यवस्थितः ॥

यः सर्वस्मात्परो नित्यो निष्कलः परमेश्वरः ।

स एव च तदाधारस्तदात्मा तदधिष्ठितः ॥

तस्मान्महेश्वरश्चैव प्रकृतिः पुरुषस्तथा ।

सदाशिवो भवो विष्णुर्ब्रह्मा सर्वं शिवात्मकम् ॥

प्रधानात्प्रथमं जज्ञे बुद्धिः ख्यातिर्मतिर्महान् ।

महत्तत्त्वस्य संक्षोभादहंकारस्त्रिधाऽभवत् ॥

अहंकारश्च भूतानि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च ।

वैकारिकादहंकारात्सत्त्वोद्रिक्तात्तु सात्त्विकः ॥

वैकारिकः स सर्गस्तु युगपत्संप्रवर्तते ।

बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च ॥

एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम् । वे चतुर्व्यूहरूप महेश्वर देव तीनों गुणोंसे परे, ९ कलायुक्त, सबको धारण करनेमें समर्थ तथा शक्तिकी उत्पत्तिके कारण हैं । लीलामात्रसे जगत्की रचना करनेवाले वे शिवजी [ ब्रह्मा आदि ] तीनों देवताओं, १० प्रकृति तथा पुरुषके अधीश्वरके रूपमें विराजमान रहते हैं॥९ -१० ॥ जो परमेश्वर सबसे परे, नित्य तथा निष्कल हैं, वे ११ ही सबके आधार, सबकी आत्मा तथा सभीमें अधिष्ठित हैं । अतः महेश्वर, प्रकृति पुरुष, सदाशिव, भव, विष्णु, १२ ब्रह्मा- ये सभी शिवात्मक हैं ॥ ११-१२ ॥ प्रधानसे सर्वप्रथम बुद्धि, ख्याति, मति तथा १३ महत्तत्त्व उत्पन्न हुए, पुनः महत्तत्त्वके संक्षोभसे तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ । पंचमहाभूत, पंचतन्मात्राएँ एवं इन्द्रियाँ - ये अहंकारसे उत्पन्न हुए । १४ सत्त्वप्रधान उस वैकारिक अहंकारसे सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ ॥ १३-१४ ॥ यह वैकारिक सर्ग एक साथ ही प्रवृत्त होता १५ है । पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन दस इन्द्रियोंके अतिरिक्त ग्यारहवाँ मन भी एक इन्द्रिय है, जो अपने गुणोंसे कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय दोनों है — ये तमोयुक्तादहंकाराद्भूततन्मात्रसंभवः ॥१६ उत्पन्न हुए । तामस अहंकारसे महाभूतों तथा तन्मात्राओंकी

भूतानामादिभूतत्वाद् भूतादिः कथ्यते तु सः ।

भूतादेः शब्दमात्रं स्यात्तत्र चाकाशसंभवः ॥

आकाशात्स्पर्श उत्पन्नः स्पर्शाद्वायुसमुद्भवः ।

वायो रूपं ततस्तेजस्तेजसो रससंभवः ॥

रसादापः समुत्पन्नास्ताभ्यो गन्धसमुद्भवः ।

गन्धाच्च पृथिवी जाता भूतेभ्योऽन्यच्चराचरम् ॥

पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च महदादिविशेषान्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते तत्र कार्यं च करणं संसिद्धं ब्रह्मणो यदा तदण्डे सुप्रवृद्धोऽभूत् क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञितः स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते उत्पत्ति हुई । पंचभूतोंसे पहले उत्पन्न होनेके कारण १७ उसे भूतादि कहा जाता है । भूतादि अहंकारसे सर्वप्रथम शब्दतन्मात्राकी उत्पत्ति हुई, जिससे आकाश उत्पन्न १८ हुआ । आकाशसे स्पर्श उत्पन्न हुआ, स्पर्शसे वायुकी उत्पत्ति हुई । वायुसे रूप, रूपसे तेज, तेजसे रस उत्पन्न हुआ । रससे जल उत्पन्न हुआ, जलसे गन्ध उत्पन्न हुआ १ ९ और गन्धसे पृथ्वी उत्पन्न हुई और इन पंचभूतोंद्वारा अन्य चराचरकी उत्पत्ति हुई ॥ १५–१९ ॥ । वे पुरुषके अधिष्ठित होनेसे और अव्यक्तके ॥ २० अनुग्रहसे महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त समस्त ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति करते हैं । इस प्रकारका जब ब्रह्माजीका कार्य - कारणभाव सिद्ध हो गया, तब । अण्डमें ब्रह्मसंज्ञक क्षेत्रज्ञ वृद्धिको प्राप्त होने ॥ २१ उस लगा ॥ २०-२१ ॥ वही प्रथम शरीरी है और उसीको पुरुष भी । कहा जाता है । प्राणियोंके कर्ता वही ब्रह्मा सबसे आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत ॥ २२ पहले उत्पन्न हुए ॥२२ ॥

पृष्ठ 772

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७५८ तस्येश्वरस्याप्रतिमा ज्ञानवैराग्यलक्षणा धर्मैश्वर्यकरी बुद्धिर्ब्राह्मी जज्ञेऽभिमानिनः अव्यक्ताज्जायते तस्य मनसा यद्यदीप्सितम् वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यात्सापेक्षत्वात्स्वभावतः ॥ त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्ये संप्रवर्त्तते सृजते ग्रसते चैव वीक्षते च त्रिभिः स्वयम् चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकः स्मृतः सहस्रमूर्द्धा पुरुषस्तिस्रोऽवस्थास्स्वयंभुवः सत्त्वं रजश्च ब्रह्मत्वे कालत्वे च तमो रजः विष्णुत्वे केवलं सत्त्वं गुणवृद्धिस्त्रिधा विभोः ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे संक्षिपत्यपि पुरुषत्वेऽत्युदासीनः कर्म च त्रिविधं विभोः एवं त्रिधा विभिन्नत्वाद् ब्रह्मा त्रिगुण उच्यते चतुर्द्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः हिरण्मयस्तु यो मेरुस्तस्योल्बं सुमहात्मनः गर्भोदकं समुद्राश्च जरायुश्चाऽपि पर्वताः तस्मिन्नण्डे त्विमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् चंद्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम् आपो दशगुणेनैव तेजसा बहिरावृताः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० । तदनन्तर क्षेत्राभिमानी उन ब्रह्माजीकी ज्ञान-॥ २३ | वैराग्यसे युक्त, धर्मैश्वर्यप्रदायिनी, अतुलनीया ब्राह्मी । बुद्धि उत्पन्न हुई । उन ब्रह्माजीने अपने मनमें जो - जो । कामना की, वह सब अव्यक्त [ प्रकृति ] -से उत्पन्न हुई ॥ २३१/२ ॥ २४ वे ब्रह्माजी स्वभावतः त्रिगुणके वशीभूत एवं [ [ प्रकृतिके ] सापेक्ष होनेके कारण अपनेको तीन । । रूपोंमें विभक्तकर त्रैलोक्यमें भलीभाँति अधिष्ठित होते | हैं और इन तीनों रूपोंके द्वारा सृजन, पालन तथा ॥ २५ संहार करते हैं॥२४-२५ ॥ । वे सृष्टि करते समय चतुर्मुख ब्रह्मा,, लयकालमें ॥ २६ रुद्र तथा पालनकालमें सहस्र सिरवाले पुरुष विष्णु कहे गये हैं । स्वयम्भू परमात्माकी ये तीन अवस्थाएँ हैं ॥ २६ ॥

। उन विभुके ब्रह्मरूप धारण करनेमें सत्त्वगुण ॥ २७ तथा रजोगुण, [ संहारक ] कालस्वरूप धारण करनेमें रजोगुण एवं तमोगुण तथा विष्णुरूप धारण करनेमें सत्त्वगुणकी कारणता कही जाती है । ये गुणवृद्धिके तीन प्रकार हैं । वे ब्रह्माके रूपमें लोकोंकी रचना करते हैं, रुद्ररूपमें लोकोंका संहार करते हैं और पुरुष । विष्णुरूपमें अत्यन्त उत्कृष्टरूपमें स्थित रहकर पालन ॥ २८ करते हैं । यही उन विभुका तीन प्रकारका कर्म है ॥ २७-२८ ॥ । इस प्रकार तीन रूपोंमें विभक्त होनेके कारण ॥ २ ९ ब्रह्मा त्रिगुणात्मक कहे जाते हैं तथा चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण वे चतुर्व्यूह कहे जाते हैं ॥ २ ९ ॥ । वे सबके आदि होनेसे आदिदेव तथा अजन्मा ॥ ३० होनेसे अज कहे गये हैं । वे सभी प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, अतः प्रजापति कहे गये हैं ॥ ३० ॥

। सुवर्णमय जो मेरु पर्वत है, वह उन महात्माका ॥ ३१ गर्भाशय है, समुद्र उस गर्भका जल है तथा पर्वत । जरायु हैं । उस अण्डमें ये लोक स्थित हैं, इसीके ॥ ३२ भीतर नक्षत्र, ग्रह वायुके सहित सूर्य तथा चन्द्रमा और यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है ॥ ३१-३२ ॥ यह अण्ड बाहरसे अपने दस गुने परिमाणवाले । जलसे व्याप्त है, जल बाहरसे अपनेसे दस गुने ॥ ३३ । परिमाणवाले तेजसे व्याप्त है और तेज भी बाहरसे ।

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अ ० १० ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७५ ९

तेजो दशगुणेनैव वायुना बहिरावृतम् ।

आकाशेनावृतो वायुः खं च भूतादिनाऽऽवृतम् ॥

भूतादिर्महता तद्वदव्यक्तेनावृतो महान् ।

एतैरावरणैरण्डं सप्तभिर्बहिरावृतम् ॥

चान्योऽन्यमष्टौ प्रकृतयः स्थिताः । एतदावृत्य सृष्टिपालनविध्वंसकर्मकर्भ्यो द्विजोत्तमाः ॥

एवं परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ।

आधाराधेयभावेन विकारास्तु विकारिषु ॥

कूर्मो ऽङ्गानि यथा पूर्वं प्रसार्य्यं विनियच्छति ।

विकारांश्च तथाऽव्यक्तं सृष्ट्वा भूयो नियच्छति ॥

अव्यक्तप्रभवं सर्वमानुलोम्येन जायते ।

प्राप्ते प्रलयकाले तु प्रातिलोम्येऽनुलीयते ॥

गुणाः कालवशादेव भवंति विषमाः समाः ।

गुणसाम्ये लयो ज्ञेयो वैषम्ये सृष्टिरुच्यते ॥

तदिदं ब्रह्मणो योनिरेतदण्डं घनं महत् । ब्रह्मणः क्षेत्रमुद्दिष्टं ब्रह्मा क्षेत्रज्ञ उच्यते इतीदृशानामण्डानां कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्य्यगूर्ध्वमधः स्थिताः तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा ब्रह्माणो हरयो भवाः सृष्टाः प्रधानेन तथा लब्ध्वा शंभोस्तु सन्निधिम् महेश्वरः परोव्यक्तादंडमव्यक्तसंभवम् अण्डाज्जज्ञे विभुर्ब्रह्मा लोकास्तेन कृतास्त्विमे अबुद्धिपूर्वः कथ मयैषः प्रधानसर्गः प्रथमः प्रवृत्तः आत्यन्तिकश्च प्रलयोऽन्तकाले अपनेसे दस गुने परिमाणवाले वायुसे व्याप्त है, वायु ३४ आकाशसे आवृत है और आकाश भूतादिसे आवृत है । भूतादि महान्से और महान् अव्यक्त तत्त्वसे आवृत है । इस प्रकार यह ब्रह्माण्ड बाहरसे इन सात ३५ आवरणोंसे घिरा हुआ है ॥३३–३५ ॥ ये आठ प्रकृतियाँ एक - दूसरेको आवृतकर ३६ स्थित हैं । हे ब्राह्मणो! ये सृष्टि, पालन तथा संहारका कार्य करती रहती हैं । इस प्रकार ये एक - दूसरेसे उत्पन्न होकर एक - दूसरेको धारण करती हैं । इनका ३७ परस्पर आधार - आधेयभावसे विकारियोंमें विकार होता है ॥ ३६-३७ ॥ जिस प्रकार कछुआ पहले अपने अंगोंको ३८ फैलाकर पुनः समेट लेता है, उसी प्रकार अव्यक्त भी विकारोंकी सृष्टिकर उन्हें पुनः समेट लेता है ॥ ३८ ॥

यह संसार अनुलोमक्रमसे अव्यक्तसे उत्पन्न ३ ९ होता है और प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रतिलोम क्रमसे विलयको प्राप्त होता है ॥ ३ ९ ॥ कालके प्रभावसे ही गुण सम और विषम होते ४० हैं । गुणोंमें साम्यकी स्थितिमें लय समझना चाहिये और वैषम्यकी स्थितिमें सृष्टि कही जाती है ॥ ४० ॥

यह घनीभूत महान् अण्ड ब्रह्माकी उत्पत्तिमें ॥ ४१ कारण है । यह ब्रह्मदेवका क्षेत्र कहा जाता है और ब्रह्मा क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं । इस प्रकारके हजारों ब्रह्माण्डसमूहोंको जानना चाहिये । प्रधानके सर्वत्र । व्याप्त होनेसे ये ऊपर - नीचे तथा तिरछे विद्यमान ॥ ४२ हैं ॥ ४१-४२ ॥ । उन सभी स्थानोंमें चतुर्मुख ब्रह्मा, विष्णु और ॥ ४३ रुद्र स्थित हैं, जो शिवका सान्निध्य प्राप्त करके प्रधानके द्वारा सृजित किये गये हैं ॥४३ ॥

। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं । यह अण्ड अव्यक्तसे ॥ ४४ उत्पन्न हुआ है, अण्डसे विभु ब्रह्मा उत्पन्न हुए हैं और उन्होंने ही इन लोकोंकी रचना की है ॥४४ ॥

मैंने प्रथम प्रवृत्त हुई अबुद्धिपूर्वा प्रधान । सृष्टिका वर्णन किया, जिसका अन्तकालमें आत्यन्तिक लय हो जाता है, यह चेष्टा ईश्वरकी

लीलाकृतः केवलमीश्वरस्य ॥ ४५ । लीलामात्र है ॥ ४५ ॥

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७६० यत्तत्स्मृतं कारणमप्रमेयं ब्रह्म प्रधानं प्रकृतेः प्रसूतिः अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यं शुक्लं सुरक्तं पुरुषेण युक्तम् उत्पादकत्वाद्रजसोऽतिरेका-ल्लोकस्य संतानविवृद्धिहेतून् । अष्टो विकारानपि चादिका सृष्ट्वा समश्नाति तथान्तकाले प्रकृत्यवस्थापितकारणानां या च स्थितिर्या च पुनः प्रवृत्तिः तत्सर्वमप्राकृतवैभवस्य संकल्पमात्रेण महेश्वरस्य श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ वह जो ब्रह्म जगत्का प्रधान कारण । अप्रमेय, प्रकृतिका उत्पादक, आदि - मध्य - अन्तसे, | रहित, अनन्तवीर्य [ सत्त्वगुणान्वित होनेपर ] शुक्लवर्ण ॥ ४६ [ रजोगुणान्वित होनेसे ] रक्तवर्ण तथा [ सृष्टिकर्ता,] पुरुषसे युक्त है । वह जगत्के उत्पादक रजोगुणकी | अभिवृद्धिके द्वारा लोककी सन्तानपरम्पराकी | वृद्धिमें हेतुभूत आठ विकारोंको सृष्टिके आदिकालमें ॥४७ । उत्पन्न करता है और अन्तमें उनका लय कर देता है ॥ ४६-४७ ॥ प्रकृतिद्वारा स्थापित किये गये कारणोंकी जो । स्थिति एवं पुनः प्रवृत्ति है, वह सब अप्राकृत ऐश्वर्यवाले महेश्वरके संकल्पमात्रसे सम्भव होती ॥ ४८ | है ॥ ४८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे ब्रह्माण्डस्थितिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें ब्रह्माण्डस्थितिवर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः अवान्तर सर्ग मुनय ऊचुः

मन्वन्तराणि सर्वाणि कल्पभेदांश्च सर्वशः ।

तेष्वेवान्तरसर्गं च प्रतिसर्गं च नो वद ॥

वायुरुवाच

कालसंख्याविवृत्तस्य परार्द्धा ब्रह्मणः स्मृतः ।

तावांश्चैवास्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते ॥

दिवसे दिवसे तस्य ब्रह्मणः पूर्वजन्मनः ।

चतुर्दश महाभागा मनूनां परिवृत्तयः ॥

अनादित्वादनंतत्वादज्ञेयत्वाच्च कृत्स्नशः ।

मन्वन्तराणि कल्पाश्च न शक्या वचनात्पृथक् ॥

उक्तेष्वपि च सर्वेषु शृण्वतां वो वचो मम ।

किमिहास्ति फलं तस्मान्न पृथग वक्तुमुत्सहे ॥

और प्रतिसर्गका वर्णन मुनि बोले— [ हे देव! ] अब सभी मन्वन्तरों, समस्त कल्पभेदों और उनमें होनेवाले अवान्तर सर्ग १ तथा प्रतिसर्गका वर्णन हमलोगोंसे कीजिये ॥ १ ॥

वायु बोले— [ हे मुनियो! ] मैंने कालगणनाके प्रसंगमें कहा है कि ब्रह्माकी आयु परार्धपर्यन्त है । २ | जब परार्धकाल पूर्ण हो जाता है, तो सृष्टि विनष्ट हो जाती है । सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले उन ब्रह्माजीके ३ एक - एक दिनमें चौदह - चौदह मनुओंका काल व्यतीत होता है । अनादि, अनन्त तथा अज्ञेय होनेसे सभी मन्वन्तर और कल्पोंका वर्णन अलग - अलग नहीं ४ किया जा सकता है ॥२–४ ॥ आपलोग मेरी बात सुनिये । उन सभीका | वर्णन किये जानेपर भी उस वर्णनका कोई फल नहीं है, इसीलिये मैं उन्हें पृथकरूपसे नहीं कह ५ | सकता ॥५ ॥

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अ ० ११ ] वायवीयसंहिता

य एव खलु कल्पेषु कल्पः संप्रति वर्तते ।

तत्र संक्षिप्य वर्तन्ते सृष्टयः प्रतिसृष्टयः ॥ ६

यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहो नाम नामतः ।

अस्मिन्नपि द्विजश्रेष्ठा मनवस्तु चतुर्दश ॥ ७

स्वायंभुवादयः सप्त सप्त सावर्णिकादयः ।

तेषु वैवस्वतो नाम सप्तमो वर्तते मनुः ॥ ८

मन्वन्तरेषु सर्वेषु सर्गसंहारवृत्तयः ।

प्रायः समा भवन्तीति तर्कः कार्यो विजानता ॥ ९

पूर्वकल्पे परावृत्ते प्रवृत्ते कालमारुते ।

समुन्मूलितमूलेषु वृक्षेषु च वनेषु च ॥ १०

जगति तृणवत्त्रीणि देवे दहति पावके ।

वृष्ट्या भुवि निषिक्तायां विवेलेष्वर्णवेषु च ॥ ११

दिक्षु सर्वासु मग्नासु वारिपूरे महीयसि ।

तदद्भिश्चटुलाक्षेपैस्तरङ्गभुजमण्डलैः ॥ १२

प्रारब्धचण्डनृत्येषु ततः प्रलयवारिषु ।

ब्रह्मा नारायणो भूत्वा सुष्वाप सलिले सुखम् ॥ १३

इमं चोदाहरन्मन्त्रं श्लोकं नारायणं प्रति ।

तं शृणुध्वं मुनिश्रेष्ठास्तदर्थं चाक्षराश्रयम् ॥ १४

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।

अयनं तस्य ता यस्मात्तेन नारायणः स्मृतः ॥ १५

शिवयोगमयीं निद्रां कुर्वन्तं त्रिदशेश्वरम् ।

बद्धाञ्जलिपुटाः सिद्धा जनलोकनिवासिनः ॥ १६

स्तोत्रैः प्रबोधयामासुः प्रभातसमये सुराः ।

यथा सृष्ट्यादिसमये ईश्वरं श्रुतयः पुरा ॥ १७

ततः प्रबुद्ध उत्थाय शयनात्तोयमध्यगात् ।

उदैक्षत दिशः सर्वा योगनिद्रालसेक्षणः ॥ १८

( पूर्वखण्ड ) ७६१ इस समय कल्पोंके क्रममें जो वर्तमान कल्प चल रहा है, उसीमें संक्षिप्त रूपसे सृष्टि और संहार होते हैं । हे द्विजश्रेष्ठो! यह जो वाराह नामक कल्प चल रहा है, इसमें भी चौदह मनु हैं॥६-७ ॥ स्वायम्भुव आदि [ जो पूर्ववर्ती ] सात मनु हैं तथा सावर्णि आदि [ जो उत्तरवर्ती ] सात मनु हैं । उनमें इस समय सातवें वैवस्वत मनु वर्तमान हैं ॥ ८ ॥

सभी मन्वन्तरोंमें सृष्टि और संहारका क्रम समान ही होता है— विद्वानोंको ऐसा जानना चाहिये॥९ ॥

इस कल्पके पहले जब प्रलयकाल उपस्थित हुआ, तब बड़े जोरसे आँधी चलने लगी, वृक्ष एवं वन उखड़कर नष्ट हो गये, अग्निदेवने तीनों लोकोंको तृणके समान जला डाला, वर्षासे पृथ्वी भर उठी, सभी समुद्र उद्वेलित हो उठे, महान् जलराशिमें सभी दिशाएँ मग्न हो गयीं, उस प्रलय-कालीन जलमें समुद्र अपनी चंचल तरंगरूपी भुजाओंको ऊपर उठा - उठाकर भयानक नृत्य करने लगे, उस समय ब्रह्माजी नारायणरूप होकर सुखपूर्वक जलमें शयन कर रहे थे । उन नारायणके प्रति यह मन्त्रात्मक

श्लोक कहा गया है, हे मुनिश्रेष्ठो! अक्षर [ परमतत्त्व ] -का प्रतिपादन करनेवाले उस अर्थको सुनिये - जलको

नार कहा गया है; क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नरसे हुई है । वही जल पूर्वकालमें उनके रहनेका स्थान हुआ, इसीलिये उन्हें नारायण कहा गया है ॥ १० – १५ ॥ इसके पश्चात् प्रात: काल उपस्थित होनेपर शिव-योगमयी निद्रा लेते हुए देवेश्वर [ नारायणस्वरूप ब्रह्माजी ] -को जनलोकनिवासी सिद्धगण तथा देवता हाथ जोड़कर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे जगाने लगे, जैसे पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भमें श्रुतियाँ ईश्वरको जगाती रही हैं । तब योगनिद्रासे अलसाये नेत्रोंवाले वे [ नारायणस्वरूप ब्रह्माजी ] निद्रा त्यागकर तथा जलके मध्यमें स्थित शय्यासे उठ करके सभी दिशाओंको देखने लगे॥१६–१८ ॥

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( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ ७६२

नापश्यत्स तदा किंचित्स्वात्मनो व्यतिरेकि यत् ।

सविस्मय इवासीनः परां चिंतामुपागमत् ॥ १ ९

|

क्व सा भगवती या तु मनोज्ञा महती मही । ।

नानाविधमहाशैलनदीनगरकानना ॥२०

एवं संचिन्तयन्ब्रह्मा बुबुधे नैव भूस्थितिम् ।

तदा सस्मार पितरं भगवन्तं त्रिलोचनम् ॥ २१

स्मरणाद्देवदेवस्य भवस्यामिततेजसः ।

ज्ञातवान्सलिले मग्नां धरणीं धरणीपतिः ॥ २२

ततो भूमेः समुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः ।

जलक्रीडोचितं दिव्यं वाराहं रूपमस्मरत् ॥ २३

महापर्वतवर्माणं महाजलदनिःस्वनम् ।

नीलमेघप्रतीकाशं दीप्तशब्दं भयानकम् ॥ २४

पीनवृत्तघनस्कंधं पीनोन्नतकटीतटम् ।

ह्रस्ववृत्तोरुजंघाग्रं सुतीक्ष्णखुरमण्डलम् ॥ २५

पद्मरागमणिप्रख्यं वृत्तभीषणलोचनम् ।

वृत्तदीर्घमहागात्रं स्तब्धकर्णस्थलोज्ज्वलम् ॥ २६

उदीर्णोच्छ्वासनिःश्वासघूर्णितप्रलयार्णवम् ।

विस्फुरत्सुसटाच्छन्नकपोलस्कंधबंधुरम् ॥ २७

मणिभिर्भूषणैश्चित्रैर्महारत्नैः परिष्कृतम् ।

विराजमानं विद्युद्भिर्मेघसंघमिवोन्नतम् ॥ २८

आस्थाय विपुलं रूपं वाराहममितं विधिः ।

पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ॥ २ ९

स तदा शुशुभेऽतीव सूकरो गिरिसंनिभः ।

लिंगाकृतेर्महेशस्य पादमूलं गतो यथा ॥ ३०

ततः स सलिले मग्नां पृथिवीं पृथिवीधरः ।

उद्धृत्यालिंग्य दंष्ट्राभ्यामुन्ममज्ज रसातलात् ॥ ३१

तं दृष्ट्वा मुनयः सिद्धा जनलोकनिवासिनः ।

मुमुदुर्ननृतुर्मूर्ध्नि तस्य पुष्पैरवाकिरन् ॥ ३२

जब उन्होंने अपने अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखा तब विस्मित होकर यह चिन्ता करने लगे - अनेक, प्रकारके महाशैल, नदी, नगर तथा वनवाली, मनोहर एवं विशाल जो ऐश्वर्यशालिनी पृथ्वी थी, वह कहाँ चली गयी? ॥१ ९ -२० ॥ इस तरह सोचते हुए ब्रह्माजीको जब पृथ्वीकी स्थितिका ज्ञान नहीं हुआ, तो वे अपने । पिता भगवान् सदाशिवका स्मरण करने लगे । तब अमित तेजस्वी देवदेव सदाशिवका स्मरण करते ही धरणीपति ब्रह्मदेवने जान लिया कि पृथ्वी जल में निमग्न है॥२१-२२ ॥ तत्पश्चात् पृथ्वीका उद्धार करनेकी इच्छावाले प्रजापतिने जलक्रीडाके योग्य दिव्य वाराहरूपका स्मरण किया । महान् पर्वतके समान शरीरवाले, महामेघके समान गर्जनवाले, नीलमेघसदृश कान्तिवाले तथा उत्कट, भयानक शब्द करते हुए, मोटे सुपुष्ट और गोल कन्धेवाले, मोटे और ऊँचे कटिप्रदेशवाले, छोटे एवं गोल ऊरु तथा जंघाके अग्रभागवाले, तीक्ष्ण खुरमण्डलवाले, पद्मराग - मणिके समान आभावाले, गोल एवं भयानक नेत्रवाले और दीर्घ गोल गात्रवाले, स्तब्ध तथा उज्ज्वल कर्णप्रदेश - वाले, छोड़े गये दीर्घ श्वासोच्छ्वाससे प्रलयकालीन समुद्रको क्षुब्ध करनेवाले, बिखरे अयालोंसे आच्छन्न कपोल एवं स्कन्धभागवाले, मणिजटित आभूषणों तथा अद्भुत महारत्नोंसे अलंकृत, मानो विद्युत्से सुशोभित ऊँचा मेघमण्डल ही स्थित हो — ऐसे अत्यधिक विशाल वराहरूपको धारण करके पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये ब्रह्माजी रसातलमें प्रविष्ट हुए ॥ २३–२९ ॥ पर्वतके समान [ विशाल ] शूकररूपधारी वे ब्रह्माजी शिवलिंगके पादपीठके समान अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे । इसके पश्चात् वे जलमें निमग्न पृथ्वीको उठाकर अपने दाढ़के ऊपर धारणकर रसातलसे ऊपर आये ॥ ३०-३१ ॥ उन्हें देखकर जनलोकनिवासी मुनि एवं सिद्धगण हर्षित होकर नृत्य करने लगे और उनके मस्तकपर । फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३२ ॥

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शिव महापुराण - २, पृष्ठ 777 का मूल पृष्ठ
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अ ० १२ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७६३

वपुर्महावराहस्य शुशुभे पुष्पसंवृतम् ।

पतद्भिरिव खद्योतैः प्राशुरंजनपर्वतः ॥

संस्थानमानीय वराहो महतीं महीम् । ततः स्वमेव रूपमास्थाय स्थापयामास वै विभुः ॥

पृथिवीं च समीकृत्य पृथिव्यां स्थापयन् गिरीन् ।

भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत् ॥

इति स ह महतीं महीं महीधैः प्रलयमहाजलधेरधःस्थमध्यात् । उपरि च विनिवेश्य विश्वकर्मा चरमचरं च जगत्ससर्ज भूयः ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सृष्ट्यादिवर्णनं उस समय पुष्पोंसे आच्छादित महावाराहका ३३ शरीर उड़ - उड़कर गिरते हुए खद्योतोंसे आवृत अंजनपर्वतके समान शोभायमान हो रहा था ॥३३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् वराहने महती पृथ्वीको ३४ लाकर अपना रूप धारण करके उसे यथास्थान स्थापित कर दिया । उन्होंने पृथ्वीको समतल करके उस पृथ्वीपर पर्वतोंकी स्थापना करते हुए पूर्वकी ३५ भाँति भूः आदि चार लोकोंको भी स्थापित किया । इस प्रकार प्रलय - कालीन महासागरके नीचे स्थित जलके बीचसे पर्वतों - सहित विशाल पृथ्वीको जलके | ऊपर स्थापित करके पुनः उन विश्वकर्माने उसपर ३६ । चराचर जगत्की रचना की ॥ ३४–३६ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें सृष्टि आदिवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः ब्रह्माजीकी मानसी सृष्टि, ब्रह्माजीकी मूर्च्छा, उनके मुखसे रुद्रदेवका प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्माजीके द्वारा रुद्रकी आज्ञासे वायुरुवाच

सर्गं चिन्तयतस्तस्य तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ।

प्रध्यानकाले मोहस्तु प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥

तमोमोहो महामोहस्तामिस्त्रश्चान्धसंज्ञितः ।

अविद्या पञ्चमी चैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥

पञ्चधाऽवस्थितः सर्गो ध्यायतस्त्वभिमानिनः ।

सर्वतस्तमसातीव बीजकुम्भवदावृतः ॥

बहिरन्तश्चाप्रकाशः स्तब्धो निःसंज्ञ एव च ।

तस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्मुखानि करणानि च ॥

तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ।

तं दृष्ट्वासाधकं ब्रह्मा प्रथमं सर्गमीदृशम् ॥

आठ नामोंसे महेश्वरकी स्तुति तथा ब्रह्माद्वारा सृष्टि - रचना वायु बोले- इसके पश्चात् बुद्धिपूर्विका सृष्टिका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माजीको ध्यानकालमें तमोमय १ मोहकी प्राप्ति हुई । उस समय उन महात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र नामक पंचपर्वा २ अविद्या उत्पन्न हुई ॥ १-२ ॥ उस समय उन अभिमानी ब्रह्माके ध्यान करते रहनेपर यह सर्ग पाँच प्रकारसे प्रकट हुआ, यह सभी ३ ओरसे अन्धकारसे पूर्णतः उसी प्रकार व्याप्त था, जैसे कुम्भ बीजको आवृत किये रहता है ॥३ ॥

वह बाहर - भीतरसे प्रकाशरहित, निश्चल तथा ४ संज्ञाहीन था, अतः उसमें होनेवालोंकी बुद्धि, मुख तथा इन्द्रियाँ — ये सब ढँके हुए थे । अतः आवृत स्वरूपवाले वे सब नग कहे गये और यह सर्ग मुख्य ५ सर्ग कहलाया । तब इस प्रकारके उस प्रथम सर्गको

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७६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२

अप्रसन्नमना भूत्वा द्वितीयं सोऽभ्यमन्यत ।

तस्याभिध्यायतः सर्गं तिर्य्यक्स्त्रोतोऽभ्यवर्त्तत ॥

अन्तःप्रकाशास्तिर्य्यंच आवृताश्च बहिः पुनः ।

पश्चात्मानस्ततो जाता उत्पथग्राहिणश्च ते ॥

तमप्यसाधकं ज्ञात्वा सर्गमन्यममन्यत ।

तदोर्ध्वस्स्रोतसो वृत्तो देवसर्गस्तु सात्त्विकः ॥

ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च नावृताः ।

प्रकाशा बहिरन्तश्च स्वभावादेव संज्ञिताः ॥

ततोऽभिध्यायतोऽव्यक्तादर्वाक्स्त्रोतस्तु साधकः ।

मनुष्यनामा सञ्जातः सर्गों दुःखसमुत्कटः ॥

प्रकाशा बहिरन्तस्ते तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः ।

पंचमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा संव्यवस्थितः ॥

विपर्य्ययेण शक्त्या च तुष्ट्या सिद्ध्या तथैव च ।

तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः ॥

खादनाश्चाप्यशीलाश्च भूताद्याः परिकीर्तिताः ।

प्रथमो महतः सर्गो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥

तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ।

वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥

इत्येष प्रकृतेः सर्गः सम्भूतोऽबुद्धिपूर्वकः ।

मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥

तिर्य्यक्स्स्रोतस्तु यः प्रोक्तस्तिर्यग्योनिः स पञ्चमः ।

तदूर्ध्वस्स्रोतसः षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥

ततोऽर्वाक् स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।

अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः कौमारो नवमः स्मृतः ॥

अनुपयोगी देखकर ब्रह्मा अप्रसन्नमन होकर दूसरे ६ सर्गका विचार करने लगे । तब उस सर्गका ध्यान करते हुए ब्रह्माका तिर्यक्स्रोत नामक सर्ग उत्पन्न हुआ॥४–६ ॥ वे पशु - पक्षी आदि भीतरसे प्रकाश ( ज्ञान ) -७ युक्त तथा बाहरसे अज्ञानयुक्त थे, अतः उन्होंने भी सन्मार्गको ग्रहण नहीं किया ॥ ७ ॥

तब उसे भी अनुपयोगी समझकर वे दूसरे प्रकारकी सृष्टि करनेका विचार करने लगे । उन्होंने ८ | सत्त्वगुणयुक्त ऊर्ध्वस्रोत नामक देवसर्ग प्रारम्भ किया । वे देवता स्वभावसे ही सुख तथा प्रीतिसे परिपूर्ण, बाहर - भीतरसे अज्ञानरहित तथा ज्ञानसम्पन्न ९ हुए ॥ ८ - ९ ॥ इसके बाद ब्रह्माजीके ध्यान करते समय १० अव्यक्तसे अर्वाक्त्रोत ( संसारकी ओर सृष्टि-प्रवाहवाला ), [ पुरुषार्थोंको ] सिद्ध करनेवाला किंतु महान् दुःखोंसे युक्त मनुष्य नामक सर्ग उत्पन्न हुआ । वे [ मनुष्य ] बाहर - भीतरसे ज्ञानयुक्त और तमोगुण ११ तथा रजोगुणवाले थे । पाँचवाँ अनुग्रह नामक सर्ग विपर्यय, शक्ति, तुष्टि तथा सिद्धिके द्वारा चार प्रकारसे बँटा हुआ व्यवस्थित था । [ इस सर्गके अन्तर्गत १२ जिनकी उत्पत्ति हुई ] वे सब अपरिग्रही, संविभागरत, खाने - पीनेवाले तथा शीलरहित भूत - प्रेत आदि कहे गये॥१०–१२ ॥ परमेष्ठी ब्रह्माका पहला सर्ग महत्तत्त्वका है । १३ तन्मात्राओंका जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग कहा जाता है । तीसरा वैकारिक सर्ग इन्द्रियोंका कहा गया १४ है । प्रकृतिकी यह सृष्टि बुद्धिपूर्वक हुई, यह जो चौथा मुख्य सर्ग है, इसके अन्तर्गत मुख्य रूपसे स्थावर कहे १५ गये हैं ॥ १३–१५ ॥ तिर्यक् स्रोत नामक सर्ग पाँचवाँ है, जो तिर्यक् १ ९ ६ योनियोंका सर्ग कहा गया है । जो ऊर्ध्वस्रोत नामक छठा सर्ग है, वह देवसर्ग कहा गया है ॥ १६ ॥

इसके बाद जो सातवाँ अर्वाक्स्रोत सर्ग है, वह मनुष्योंका सर्ग है । आठवाँ अनुग्रह सर्ग है १७ तथा नौवाँ कौमार सर्ग कहा गया है । जो प्रथम तीन

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अ ० १२ ] वायवीयसंहिता

प्राकृताश्च त्रयः पूर्वे सर्गास्तेऽबुद्धिपूर्वकाः ।

बुद्धिपूर्वं प्रवर्त्तन्ते मुख्याद्याः पञ्च वैकृताः ॥ १८

अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ।

सनन्दं सनकं चैव विद्वांसञ्च सनातनम् ॥ १ ९

ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वमेव प्रजापतिः । सर्वे ते योगिनो ज्ञेया वीतरागा विमत्सराः १ ९. ॥ २०

ईश्वरासक्तमनसो न चक्रुः सृष्टये मतिम् ।

तेषु सृष्ट्यनपेक्षेषु गतेषु सनकादिषु ॥ २१

स्त्रष्टुकामः पुनर्ब्रह्मा तताप परमं तपः ।

तस्यैवं तप्यमानस्य न किंचित्समवर्त्तत ॥ २२

ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो व्यजायत ।

क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ॥ २३

ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तदाभवन् ।

सर्वांस्तानश्रुजान्दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिंदत ॥ २४

तस्य तीव्राऽभवन्मूर्च्छा क्रोधामर्षसमुद्भवा ।

मूर्च्छितस्तु जहौ प्राणान्क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥ २५

ततः प्राणेश्वरो रुद्रो भगवान्नीललोहितः ।

प्रसादमतुलं कर्त्तुं प्रादुरासीत्प्रभोर्मुखात् ॥ २६

दशधा चैकधा चक्रे स्वात्मानं प्रभुरीश्वरः ।

ते तेनोक्ता महात्मानो दशधा चैकधा कृताः ॥ २७

यूयं सृष्टा मया वत्सा लोकानुग्रहकारणात् ।

तस्मात्सर्वस्य लोकस्य स्थापनाय हिताय च ॥ २८

प्रजासन्तानहेतोश्च प्रयतध्वमतन्द्रिताः । ( पूर्वखण्ड ) ७६५ प्राकृत सर्ग हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवृत्त हुए हैं । मुख्य आदि पाँच वैकारिक सर्ग बुद्धिपूर्वक प्रवृत्त हुए हैं ॥ १७-१८ ॥ इसके अनन्तर प्रजापति ब्रह्माने सर्वप्रथम अपने ही समान मानसपुत्रों सनन्दन, सनक, विद्वान् सनातन, ऋभु और सनत्कुमारको उत्पन्न किया । उन सभीको योगी, वीतराग तथा अभिमानरहित जानना चाहिये । ईश्वरमें आसक्त मनवाले उन सबका मन सृष्टिकार्यमें नहीं लगा ॥ १ ९ -२०१ / २ ॥ सृष्टिकी अपेक्षासे रहित उन सनक आदिके चले जानेपर सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माने महान् तप किया । इस प्रकार बहुत समयतक तप करते हुए ब्रह्माको जब कोई भी फल नहीं मिला, तब दुःखके कारण उन्हें क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ २१-२२१ / २ ॥ क्रोधसे आविष्ट उन ब्रह्माके नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरने लगीं, तब उन आँसूकी बूँदोंसे भूत - प्रेत उत्पन्न हुए । अपने आँसुओंसे उत्पन्न उन सभीको देखकर ब्रह्मदेवने अपनी निन्दा की । उस समय क्रोध और अमर्षके कारण उनको तीव्र मूर्च्छा आ गयी और मूर्च्छित तथा क्रोधाविष्ट प्रजापतिने अपने प्राण त्याग दिये॥२३–२५ ॥ तब प्राणोंके अधिष्ठाता भगवान् नीललोहित रुद्र उनपर असीम कृपा करनेके लिये उन प्रभु ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट हुए । उत्पन्न होकर उन सामर्थ्यशाली रुद्रने स्वयंको ग्यारह भागोंमें विभक्त कर लिया । तत्पश्चात् भगवान् शिवने उन एकादश रुद्रोंसे कहा— हे पुत्रो! मैंने लोकके कल्याणके लिये तुमलोगोंकी सृष्टि की है, अत: तुमलोग समस्त लोकोंकी स्थापना, उनके कल्याण तथा प्रजासन्तानकी वृद्धिके लिये आलस्यरहित होकर प्रयत्न करो ॥ २६-२८१ / २ ॥ समन्ततः ॥ २ ९ तब इस प्रकार कहे गये वे सभी रोने एवमुक्ताश्च रुरुदुर्दुद्रुवुश्च लगे और चारों ओर भागने लगे । रुदन करने और भागनेके कारण वे रुद्र नामसे प्रसिद्ध हुए । जो रुद्र रोदनाद् द्रावणाच्चैव ते रुद्रा नामतः स्मृताः । हैं, वे ही प्राण हैं, जो प्राण हैं, वे ही महामना रुद्र ये रुद्रास्ते खलु प्राणाये प्राणास्ते महात्मकाः ॥ ३० । हैं ॥ २ ९ -३० ॥

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७६६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२

ततो मृतस्य देवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

घृणी ददौ पुनः प्राणान् ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ॥

प्रहृष्टवदनो रुद्रः प्राणप्रत्यागमाद्विभोः ।

अभ्यभाषत विश्वेशो ब्रह्माणं परमं वचः ॥

मा भैर्माभैर्महाभाग विरिञ्चे जगतां गुरो ।

मया ते प्राणिताः प्राणाः सुखमुत्तिष्ठ सुव्रत ॥

स्वप्नानुभूतमिव तच्छ्रुत्वा वाक्यं मनोहरम् ।

हरं निरीक्ष्य शनकैर्नेत्रैः फुल्लाम्बुजप्रभैः ॥

तथा प्रत्यागतप्राणः स्निग्धगम्भीरया गिरा ।

उवाच वचनं ब्रह्मा तमुद्दिश्य कृताञ्जलिः ॥

त्वं हि दर्शनमात्रेण चानन्दयसि मे मनः ।

को भवान् विश्वमूर्त्या वा स्थित एकादशात्मकः ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा व्याजहार महेश्वरः ।

स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्माणं सुसुखाभ्यां सुरेश्वरः ॥

मां विद्धि परमात्मानं तव पुत्रत्वमागतम् ।

एते चैकादश रुद्रास्त्वां सुरक्षितुमागताः ॥

तस्मात्तीव्रामिमां मूर्च्छा विधूय मदनुग्रहात् ।

प्रबुद्धस्व यथापूर्वं प्रजा वै स्त्रष्टुमर्हसि ॥

एवं भगवता प्रोक्तो ब्रह्मा प्रीतमना ह्यभूत् ।

नामाष्टकेन विश्वात्मा तुष्टाव परमेश्वरम् ॥

ब्रह्मोवाच नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे ।

नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ।

शर्वाय क्षितिरूपाय सदासुरभये नमः ॥

ईशाय वसवे तुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने ।

पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे ।

भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ॥

उग्रायोग्रस्वरूपाय यजमानात्मने नमः ।

महाशिवाय सोमाय नमोऽस्त्वमृतमूर्तये ॥

इसके पश्चात् दयालु ब्रह्मपुत्र महेश्वरने मरे: ३१ परमेष्ठी ब्रह्मदेवको पुनः प्राण प्रदान किये ॥ ३१ हुए ब्रह्माजीके शरीरमें पुनः प्राणसंचार ॥हो | जानेसे प्रसन्नमुखवाले विश्वेश्वर रुद्र ब्रह्माजीसे ३२ उत्तम वचन कहने लगे — हे विरिंचे! हे जगद्गुरो! हे महाभाग! भय मत कीजिये, भय मत कीजिये । | हे सुव्रत! मैंने आपको प्राणदान दिया है, अतः ३३ सुखपूर्वक उठिये ॥ ३२-३३ ॥ इसके पश्चात् स्वप्नके अनुभवके समान उस ३४ मनोहर वाक्यको सुनकर विकसित कमल समान नेत्रोंसे शिवजीकी ओर धीरे - धीरे देख करके लौटे हुए प्राणवाले ब्रह्मदेवने हाथ जोड़कर उन्हें ३५ उद्देश्य करके कोमल तथा गम्भीर वाणीमें कहा— आप अपने दर्शनमात्रसे मेरे मनको आह्लादित कर रहे हैं । आप कौन हैं, जो सम्पूर्ण जगत्के रूपमें स्थित ३६ हैं, क्या वे ही भगवान् आप ग्यारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं? ॥ ३४–३६ ॥ उनके उस वचनको सुनकर देवताओंके स्वामी ३७ महेश्वरने अपने परम सुखद हाथोंसे ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए कहा — मुझ परमात्माको अपने पुत्ररूपमें आया हुआ समझिये और ये एकादश रुद्र आपकी ३८ रक्षाहेतु यहाँ आये हैं । अतः मेरे अनुग्रहसे इस तीव्र मूर्च्छाका त्याग करके जागिये और पूर्वकी भाँति ३ ९ प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये ॥ ३७-३९ ॥ भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर विश्वात्मा ब्रह्मा ४० प्रसन्नचित्त हो गये और आठ नामों [ -वाले स्तोत्र ] -से परमेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥४० ॥

ब्रह्माजी बोले — हे भगवन्! रुद्र! अमित तेजस्वी, सूर्यमूर्ति आप ईशानको नमस्कार है । रसस्वरूप जलमय विग्रहवाले आप भवदेवताको नमस्कार है । सर्वदा गन्ध गुणसे समन्वित पृथ्वीरूपधारी आप शर्वको ४१ नमस्कार है । स्पर्शमय वसु [ वायु ] -रूपधारी, उग्रस्वरूप आप उग्रको नमस्कार है । यजमानमूर्ति आप पशुपतिको नमस्कार है । अतीव तेजोमय अग्निमूर्ति आप रुद्रको ४२ नमस्कार है । शब्दतन्मात्रासे युक्त आकाशमूर्ति आप भीमको नमस्कार है । सोम - स्वरूप अमृतमूर्ति * आप ४३ । महादेव शिवजीको नमस्कार है ॥ ४१-४३ ॥