शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 781–790
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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अ ० १२ ] वायवीयसंहिता
एवं स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
प्रार्थयामास विश्वेशं गिरा प्रणतिपूर्वया ॥ ४४
भगवन् भूतभव्येश मम पुत्र महेश्वर ।
सृष्टिहेतोस्त्वमुत्पन्नो ममाङ्गेऽनङ्गनाशन ॥ ४५
तस्मान्महति कार्येऽस्मिन् व्यापृतस्य जगत्प्रभो ।
सहायं कुरु सर्वत्र स्त्रष्टुमर्हसि सुप्रजाः ॥ ४६
तेनैवं प्रार्थितो देवो रुद्रस्त्रिपुरमर्दनः ।
बाढमित्येव तां वाणीं प्रतिजग्राह शंकरः ॥ ४७
ततः स भगवान् ब्रह्मा हृष्टं तमभिनन्द्य च ।
स्त्रष्टुं तेनाभ्यनुज्ञातस्तथान्याश्चासृजत्प्रजाः ॥ ४८
मरीचिभृग्वंगिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन्मनसैव च ।
पुरस्तादसृजद् ब्रह्मा धर्मं संकल्पमेव च ॥ ४ ९
इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा द्वादशादौ प्रकीर्तिताः ।
सह रुद्रेण संभूताः पुराणा गृहमेधिनः ॥ ५०
तेषां द्वादश वंशाः स्युर्दिव्या देवगणान्विताः ।
प्रजावन्तः क्रियावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥ ५१
अथ देवासुरान् पितृन् मनुष्यांश्च चतुष्टयम् ।
सह रुद्रेण सिसृक्षुरम्भस्येतानि वै विधिः ॥ ५२
स सृष्ट्यर्थं समाधाय ब्रह्मात्मानमयूयुजत् ।
मुखादजनयद्देवान् पितॄंश्चैवोपपक्षतः ॥ ५३
जघनादसुरान् सर्वान् प्रजनादपि मानुषान् ।
अवस्करे क्षुधाविष्टा राक्षसास्तस्य जज्ञिरे ॥ ५४
पुत्रास्तमोरजःप्राया बलिनस्ते निशाचराः ।
सर्पा यक्षास्तथा भूता गंधर्वाः संप्रजज्ञिरे ॥ ५५
वयांसि पक्षतः सृष्टाः पक्षिणो वक्षसोऽसृजत् । ( पूर्वखण्ड ) ७६७ इस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा विश्वेश्वर महादेवकी स्तुतिकर अत्यन्त विनीत वाणीसे उनकी प्रार्थना करने लगे । हे भगवन्! हे भूतभव्येश! हे मेरे पुत्र महेश्वर! हे कामनाशक! आप सृष्टिके निमित्त मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए हैं । हे जगत्प्रभो! इस महान् कार्यमें संलग्न मेरी सभी जगह श्रेष्ठ सहायता कीजिये और श्रेष्ठ प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये ॥ ४४–४६ ॥ उनके द्वारा इस प्रकार प्रार्थित हुए त्रिपुरमर्दन शंकर रुद्रदेवने ' ठीक है'- ऐसा कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली । इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्मदेव उन हर्षित रुद्रका अभिनन्दन करके सृष्टि करनेके लिये उनकी आज्ञा लेकर अन्य प्रजाओंकी रचना करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठको अपने मनसे उत्पन्न किया, फिर उन्होंने धर्म तथा संकल्पकी रचना की ॥ ४ ९ ॥ सबसे पहले ब्रह्माजीके ये बारह पुत्र कहे गये हैं । ये सभी पुराणपुरुष और गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले हैं, जो रुद्रके साथ उत्पन्न हुए हैं ॥ ५० ॥
देवगणोंसहित इनके बारह दिव्य वंश कहे गये हैं । वे सभी प्रजावान्, क्रियावान् तथा महर्षियोंसे विभूषित हैं । तत्पश्चात् जलमें स्थित हुए रुद्रसहित ब्रह्माजीने देवता, असुर, पितर तथा मनुष्य – इन चारोंको रचनेकी इच्छा की॥५१-५२ ॥ अतः सृष्टिके लिये ब्रह्माजीने समाधिस्थ होकर चित्तको एकाग्र किया । उन्होंने अपने मुखसे देवगणोंको, कक्षसे पितरोंको, जघनदेशसे सभी असुरोंको तथा शिश्नभागसे मनुष्योंको उत्पन्न किया । उनके गुदास्थानसे भूखे राक्षस उत्पन्न हुए । उनके वे पुत्र तमोगुण तथा रजोगुणसे समन्वित महाबली निशाचर हुए । इसी प्रकार सर्प, यक्ष, भूत तथा गन्धर्व उत्पन्न हुए ॥ ५३–५५ ॥ उन्होंने पक्षभागसे शब्द करनेवाले पक्षियोंको तथा अन्य पक्षियोंको छातीसे उत्पन्न किया, मुखसे मुखतोऽजांस्तथा पार्श्वादुरगांश्च विनिर्ममे ॥ ५६ | अजोंको तथा पार्श्वस्थानसे सर्पोंको उत्पन्न किया ।
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७६८
पद्भ्यां चाश्वान्समातङ्गान् शरभान् गवयान् मृगान् । ।
उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यंकूनन्यांश्च जातयः ॥५७
औषध्यः फलमूलानि रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
गायत्रीं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम् ॥ ५८
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ।
यजूंषि त्रैष्टुभं छंदः स्तोमं पंचदशं तथा ॥ ५ ९
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् ।
सामानि जगतीछंदः स्तोमं सप्तदशं तथा ॥ ६०
वैरूप्यमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन् मुखात् ।
एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च ॥६१
अनुष्टुभं स वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ।
उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ॥ ६२
यक्षाः पिशाचा गंधर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ।
नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगाः ॥ ६३
अव्ययं चैव यदिदं जगत् स्थावरजंगमम् ।
तेषां वै यानि कर्माणि प्राक्सृष्टानि प्रपेदिरे ॥ ६४
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ।
हिंस्राहिंत्रे मृदु क्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ॥ ६५
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ।
महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मुक्तिषु ॥ ६६
विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधत्स्वयम् ।
नामरूपं च भूतानां प्राकृतानां प्रपञ्चनम् ॥६७
वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममेऽसौ पितामहः ।
आर्षाणि चैव नामानि याश्च वेदेषु वृत्तयः ॥ ६८
१२ उन्होंने पैरसे घोड़े, हाथी, शरभ, गवय, मृग , बारहसिंघा तथा अन्य पशु जातियोंको, ऊँट, खच्चर उत्पन्न किया ॥ ५६-५७ ॥ रोमावलियोंसे ओषधियों और फल - मूलोंका प्राकट्य हुआ । ब्रह्माजीके पूर्ववर्ती मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत् स्तोम, रथन्तर साम तथा । अग्निष्टोम नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई । उनके दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदश स्तोम , बृहत्साम और उक्थ नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई । | उन्होंने अपने पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द सप्तदश स्तोम, वैरूप्य साम और अतिरात्र नामक, यज्ञको प्रकट किया । उनके उत्तरवर्ती मुखसे एकविंश स्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्याम नामक याग, अनुष्टुप्छन्द और वैराज नामक सामका प्रादुर्भाव हुआ । उनके अंगोंसे और भी बहुत - से छोटे - बड़े प्राणी उत्पन्न हुए ॥ ५८–६२ ॥ उन्होंने यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सराओंके समुदाय, मनुष्य, किंनर, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर- र - जंगम जगत्की रचना की । उनमेंसे जिन्होंने जैसे - जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें अपनाये थे, पुनः - पुनः सृष्टि होनेपर उन्होंने फिर उन्हीं कर्मोंको अपनाया । [ नूतन सृष्टि होनेपर भी वे प्राणी ] अपनी पूर्व भावनासे भावित होकर हिंसा - अहिंसासे युक्त मृदु - कठोर, धर्म - अधर्म तथा सत्य और मिथ्या कर्मको अपनाते हैं; क्योंकि पहलेकी वासनाके अनुकूल कर्म ही उन्हें अच्छे लगते हैं ॥ ६३–६५१ / २ ॥ इस प्रकार विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय, भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता एवं व्यवहारकी सृष्टि की है । उन पितामहने कल्पके | आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके नाम, रूप तथा कार्य - विस्तारको वेदोक्त वर्णनके अनुसार ही | निश्चित किया । ऋषियोंके नाम तथा जीविका-| साधक कर्म भी उन्होंने वेदोंके ही निर्दिष्ट अनुसार | किये ॥ ६६-६८ ॥
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अ ० १२ ] वायवीयसहिता ( पूर्वखण्ड ) ७६ ९ शर्वर्य्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददावजः । अपनी रात्रिके व्यतीत होनेपर अजन्मा ब्रह्माने यथावृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्य्यये ॥ ६ ९ स्वरचित प्राणियोंको वे ही नाम और कर्म दिये, जो पूर्वकल्पमें उन्हें प्राप्त थे । जिस प्रकार भिन्न - भिन्न ऋतुओंके पुनः - पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं, उसी प्रकार युगादिकालमें दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु । भी उनके पूर्वभाव ही दृष्टिगोचर होते हैं । इस प्रकार इत्येष कारणोद्भूतो लोकसर्गः स्वयंभुवः ॥ ७० स्वयम्भू ब्रह्माजीकी लोकसृष्टि उन्हींके विभिन्न अंगोंसे
प्रकट हुई है । ६ ९ -७० ॥
महदाद्यो विशेषान्तो विकारः प्रकृतेः स्वयम् । महत्से लेकर विशेषपर्यन्त सब कुछ चंद्रसूर्यप्रभाजुष्टो ग्रहनक्षत्रमंडितः ॥७१ प्रकृतिका विकार है । यह प्राकृत जगत् चन्द्रमा
नदीभिश्च समुद्रैश्च पर्वतैश्च स मंडितः ।
पुरैश्च विविधै रम्यैः स्फीतैर्जनपदैस्तथा ॥
तस्मिन् ब्रह्मवनेऽव्यक्तो ब्रह्मा चरति सर्ववित् ।
अव्यक्तबीजप्रभव ईश्वरानुग्रहे स्थितः ॥
बुद्धिस्कंध महाशाख इन्द्रियांतरकोटरः । और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित, ग्रह और नक्षत्रोंसे मण्डित, नदियों, पर्वतों तथा समुद्रोंसे अलंकृत और भाँति - भाँतिके रमणीय नगरों एवं समृद्धिशाली ७२ जनपदोंसे सुशोभित है । [ इसीको ब्रह्माजीका वन या ब्रह्मवृक्ष कहते हैं ] ॥७१-७२ ॥ उस ब्रह्मवनमें अव्यक्त एवं सर्वज्ञ ब्रह्मा ७३ विचरते हैं । वह सनातन ब्रह्मवृक्ष अव्यक्तरूपी बीजसे प्रकट एवं ईश्वरके अनुग्रहपर स्थित है । बुद्धि इसका तना और बड़ी - बड़ी डालियाँ है । विशेषामलपल्लवः ॥७४ इन्द्रियाँ भीतरके खोखले हैं । महाभूत इसकी सीमा महाभूतप्रमाणश्च
धर्माधर्मसुपुष्पाढ्यः सुखदुःखफलोदयः ।
आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः ॥
द्यां मूर्द्धानं तस्य विप्रा वदंति खं वै नाभिं चंद्रसूर्यौ च नेत्रे । दिशः श्रोत्रे चरणौ च क्षितिं च सोऽचिन्त्यात्मा सर्वभूतप्रणेता ॥ वक्त्रात्तस्य ब्राह्मणाः संप्रसूताः तद्वक्षसः क्षत्रियाः पूर्वभागात् । वैश्या ऊरुभ्यां तस्य पद्भ्यां च शूद्राः सर्वे वर्णा गात्रतः संप्रसूताः हैं । विशेष पदार्थ इसके निर्मल पत्ते हैं । धर्म और अधर्म इसके सुन्दर फूल हैं । इसमें सुख और ७५ दुःखरूपी फल लगते हैं तथा यह सम्पूर्ण भूतोंके जीवनका सहारा है॥७३–७५ ॥ ब्राह्मणलोग द्युलोकको उनका मस्तक, आकाशको नाभि, चन्द्रमा और सूर्यको नेत्र, दिशाओंको कान और पृथ्वीको उनके पैर बताते हैं । वे अचिन्त्यस्वरूप महेश्वर ही सब भूतोंके ७६ निर्माता हैं । उनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुए हैं । वक्ष: स्थलके ऊपरी भागसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, दोनों जाँघोंसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं । इस प्रकार उनके अंगोंसे ही सम्पूर्ण वर्णोंका ॥ ७७ प्रादुर्भाव हुआ है॥७६-७७ ॥ पूर्वखण्डे सृष्टिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डमें ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके सृष्टिवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ ७७० अथ त्रयोदशोऽध्यायः कल्पभेदसे त्रिदेवों ( ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ) - के एक - दूसरेसे प्रादुर्भावका वर्णन ऋषय ऊचुः भवता कथिता सृष्टिर्भवस्य परमात्मनः चतुर्मुखमुखात्तस्य संशयो नः प्रजायते देवश्रेष्ठो विरूपाक्षो दीप्तः शूलधरो हरः कालात्मा भगवान् रुद्रः कपर्दी नीललोहितः सब्रह्मकमिमं लोकं सविष्णुमपि पावकम् यः संहरति संक्रुद्धो युगान्ते समुपस्थिते यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रणामं कुरुतो भयात् लोकसंकोचकस्यास्य यस्य तौ वशवर्तिनौ योऽयं देवः स्वकादंगाद् ब्रह्मविष्णू पुरासृजत् ऋषि बोले— [ हे वायुदेव! ] आपने परमात्मा । । शिवकी उत्पत्ति ब्रह्माजीके मुखसे बतायी, इस विषयमें ॥ १ हमलोगोंको संशय हो रहा है ॥१ ॥
जो देवताओंमें श्रेष्ठ, विरूपाक्ष, दीप्तिमान् । । शूल धारण करनेवाले, हर, कालात्मा, जटाधारी, ॥ २ । तथा नीललोहित हैं । जो भगवान् रुद्र युगान्तमें । । कुपित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा पावकसहित इस ॥ ३ लोकका संहार करते हैं, जिन्हें ब्रह्मा तथा विष्णु । भयसे नमस्कार करते हैं, सभी लोकोंका संहार ॥ ४ करनेवाले जिन रुद्रके वशमें वे दोनों रहते हैं, । जिन देवने पूर्वकालमें अपने शरीरसे ब्रह्मा तथा स एव हि तयोर्नित्यं योगक्षेमकरः प्रभुः ॥ ५ विष्णुको उत्पन्न किया और जो प्रभु उन दोनोंका स कथं भगवान् रुद्र आदिदेवः पुरातनः पुत्रत्वमगमच्छंभुर्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥
प्रजापतिश्च विष्णुश्च रुद्रस्यैतौ परस्परम् ।
सृष्टौ परस्परस्यांगादिति प्रागपि शुश्रुम ॥
कथं पुनरशेषाणां भूतानां हेतुभूतयोः ।
गुणप्रधानभावेन प्रादुर्भावः परस्परात् ॥
नापृष्टं भवता किंचिन्नाश्रुतं च कथंचन ।
भगवच्छिष्यभूतेन भवता सकलं स्मृतम् ॥
तत्त्वं वद यथा ब्रह्मा मुनीनामवदद्विभुः ।
वयं श्रद्धालवस्तात श्रोतुमीश्वरसद्यशः ॥
वायुरुवाच
स्थाने पृष्टमिदं विप्रा भवद्भिः प्रश्नकोविदैः ।
इदमेव पुरा पृष्टो मम प्राह पितामहः ॥
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा रुद्रसमुद्भवः ।
यथा च पुनरुत्पत्तिर्ब्रह्मविष्ण्वोः परस्परम् ॥
। नित्य योगक्षेम वहन करते हैं I । वे आदिदेव पुरातन ६ अव्यक्तजन्मा शम्भु भगवान् रुद्र ब्रह्माजीके पुत्र किस प्रकार हुए? ॥२–६ ॥ हमलोग पहले भी सुन चुके हैं कि रुद्रके शरीरसे ७ ब्रह्मा और विष्णु एक - एक करके उत्पन्न हुए हैं ॥ ७ ॥
इतना ही नहीं, जब वे दोनों ही सृष्टिके हेतुभूत ८ हैं, तब इनकी मुख्यता और गौणता एवं उत्तरोत्तर प्रादुर्भाव किस प्रकार कहा गया? ॥८ ॥
ऐसी कोई बात नहीं है, जो आपने ब्रह्मदेवसे न ९ पूछी हो और कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपने उनसे न सुनी हो । आप ब्रह्माजीके प्रधान शिष्य हैं, अतः सभी बातें आपको स्मरण भी हैं ॥ ९ ॥
हे तात! जैसा सर्वव्यापी ब्रह्माने आपसे कहा है, १० उसे आप हम मुनियोंको बताइये, हमलोग ईश्वरका उत्तम चरित्र सुननेके लिये श्रद्धायुक्त हैं ॥ १० ॥
वायु बोले - हे विप्रो! प्रश्न करनेमें प्रवीण आपलोगोंने यह उचित ही प्रश्न किया है । यही ११ बात मैंने ब्रह्माजीसे भी पूछी थी, तब उन्होंने मुझे बताया था । जिस प्रकार रुद्रकी उत्पत्ति हुई तथा [ उस कल्पमें पुनः ] ब्रह्मा और विष्णुकी परस्पर | उत्पत्ति जिस प्रकार हुई, मैं वह सब आपलोगोंसे १२ कहूँगा ॥ ११-१२ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_26_1_Back
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अ ० १३ ] वायवीयसहिता ( पूर्वखण्ड ) ७७१ यस्ते कारणात्मानो जाताः साक्षान्महेश्वरात् । इस चराचर जगत्के सृष्टि, पालन तथा संहारके चराचरस्य विश्वस्य सर्गस्थित्यन्तहेतवः ॥ १३ कारणभूत तीनों ही देवता साक्षात् महेश्वरसे उत्पन्न परमैश्वर्यसंयुक्ताः परमेश्वरभाविताः । हुए हैं । वे परम ऐश्वर्यसे युक्त, परमेश्वरसे भावित तच्छक्त्याधिष्ठिता नित्यं तत्कार्यकरणक्षमाः ॥ १४ तथा उनकी शक्तिसे अधिष्ठित होकर उनके कार्यक करनेमें सर्वथा समर्थ हैं ॥१३-१४ ॥ पित्रा नियमिताः पूर्वं त्रयोऽपि त्रिषु कर्मसु । पितृरूप परमेश्वरने पूर्व कालमें इन तीनोंको ब्रह्मा सर्गे हरिस्त्राणे रुद्रः संहरणे तथा ॥ १५ तीन कार्योंमें नियुक्त किया है । ब्रह्माको सृजनके
तथाप्यन्योऽन्यमात्सर्यादन्योऽन्यातिशयाशिनः ।
तपसा तोषयित्वा स्वं पितरं परमेश्वरम् ॥
लब्ध्वा सर्वात्मना तस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः ।
ब्रह्मनारायणौ पूर्वं रुद्रः कल्पान्तरेऽसृजत् ॥
कल्पान्तरे पुनर्ब्रह्मा रुद्रविष्णू जगन्मयः ।
विष्णुश्च भगवान् रुद्रं ब्रह्माणमसृजत्पुनः ॥
नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणं च पुनर्भवः ।
एवं कल्पेषु कल्पेषु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
परस्परेण जायन्ते परस्परहितैषिणः ।
तत्तत्कल्पान्तवृत्तान्तमधिकृत्य महर्षिभिः ॥
प्रभावः कथ्यते तेषां परस्परसमुद्भवात् ।
शृणु तेषां कथां चित्रां पुण्यां पापप्रमोचिनीम् ॥
कल्पे तत्पुरुषे वृत्तां ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।
पुरा नारायणो नाम कल्पे वै मेघवाहने ॥
दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु मेघो भूत्वावहद्धराम् । तस्य भावं समालक्ष्य विष्णोर्विश्वजगद्गुरुः सर्वः सर्वात्मभावेन प्रददौ शक्तिमव्ययाम् शक्तिं लब्ध्वा तु सर्वात्मा शिवात्सर्वेश्वरात्तदा ससर्ज भगवान् विष्णुर्विश्वं विश्वसृजा सह लिये, विष्णुको पालनके लिये तथा रुद्रको संहारके लिये नियुक्त किया है । फिर भी परस्पर मत्सरताके कारण वे अपने उत्पत्ति - कर्ता परमेश्वरको तपस्यासे १६ सन्तुष्टकर एक - दूसरेसे अधिक सामर्थ्यकी अपेक्षा रखते हैं॥१५-१६ ॥ उन परमेष्ठीकी पूर्णरूपसे प्रसन्नता प्राप्तकर १७ पूर्वकल्पमें रुद्रने ब्रह्मा और नारायणको उत्पन्न किया । पुनः किसी दूसरे कल्पमें जगन्मय ब्रह्माने रुद्र और विष्णुको उत्पन्न किया । इसी प्रकार किसी १८ [ अन्य ] कल्पमें भगवान् विष्णुने रुद्र तथा ब्रह्माको उत्पन्न किया । पुनः किसी कल्पमें ब्रह्मा नारायणको १ ९ और किसी कल्पमें रुद्रदेवने ब्रह्माको उत्पन्न किया है, इस प्रकार प्रतिकल्पमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर २० परस्पर हित करनेकी इच्छासे एक - दूसरेके द्वारा उत्पन्न होते रहते हैं । महर्षिगण उन - उन कल्पोंके वृत्तान्तको लेकर आपसमें समुद्भवकी दृष्टिसे उनके २१ प्रभावका वर्णन करते हैं । अब आपलोग उनकी अद्भुत, पुण्यप्रद तथा पापनाशक कथाको सुनिये, जो परमेष्ठी ब्रह्माके तत्पुरुष नामक कल्पमें घटित हुई थी ॥ १७–२११ / २ ॥ २२ पूर्वकालमें मेघवाहन नामक कल्पमें भगवान् नारायणने मेघ बनकर दिव्य सहस्रवर्षपर्यन्त पृथ्वीको धारण किया । तब उन विष्णुका भाव ॥ २३ देखकर समस्त जगत्के गुरु सर्वात्मा शिवने उन्हें सर्वात्मभावके साथ अव्यय शक्ति दी । इस प्रकार । सर्वेश्वर शिवसे शक्तिको प्राप्तकर सर्वात्मा भगवान् ॥ २४ विष्णु ब्रह्माको साथ लेकर जगत् की रचना करने । लगे ॥ २२–२४१ / २ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_26_2_Front
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( ७७२ विष्णोस्तद्वैभवं दृष्ट्वा सृष्टस्तेन पितामहः ईर्ष्यया परया ग्रस्तः प्रहसन्निदमब्रवीत् गच्छ विष्णो मया ज्ञातं तव सर्गस्य कारणम् आवयोरधिकश्चास्ति स रुद्रो नात्र संशयः तस्य देवाधिदेवस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः स्त्रष्टा त्वं भगवानाद्यः पालकः परमार्थतः ॥ अहं च तपसाराध्य रुद्रं त्रिदशनायकम् । त्वया सह जगत्सर्वं स्त्रक्ष्याम्यत्र न संशयः
एवं विष्णुमुपालभ्य भगवानब्जसम्भवः ।
एवं विज्ञापयामास तपसा प्राप्य शंकरम् ॥
भगवन् देवदेवेश विश्वेश्वर महेश्वर ।
तव वामाङ्गजो विष्णुर्दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम् ॥
मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः ।
स मत्सरादुपालब्धस्त्वदाश्रयबलान्मया ॥
मद्भावान्नाधिकस्तेऽतिभावस्त्वयि महेश्वरे ।
त्वत्त एव समुत्पत्तिरावयोः सदृशी यतः ॥
तस्य भक्त्या यथापूर्वं प्रसादं कृतवानसि ।
तथा ममापि तत्सर्वं दातुमर्हसि शंकर ॥
इति विज्ञापितस्तेन भगवान् भगनेत्रहा ।
न्यायेन वै ददौ सर्वं तस्यापि स घृणानिधिः ॥
लब्ध्वैवमीश्वरादेव ब्रह्मा सर्वात्मतां क्षणात् ।
त्वरमाणोऽथ संगम्य ददर्श पुरुषोत्तमम् ॥
क्षीरार्णवालये शुभ्रे विमाने सूर्यसंनिभे ।
हेमरत्नान्विते दिव्ये मनसा तेन निर्मिते ॥
अनंतभोगशय्यायां शयानं पंकजेक्षणम् ।
चतुर्भुजमुदाराङ्कं सर्वाभरणभूषितम् ॥
शंखचक्रधरं सौम्यं चन्द्रबिंबसमाननम् ।
श्रीवत्सवक्षसं देवं प्रसन्नमधुरस्मितम् ॥
धरामृदुकरांभोजस्पर्शरक्तपदांबुजम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ विष्णुके ऐश्वर्यको देखकर उन्हींसे उत्पन्न ॥ २५ । होनेपर भी महान् ईर्ष्यासे ग्रस्त ब्रह्माजीने हँसते । । कहा- हे विष्णो! अब चले जाओ, मैंने आपकी हुए ॥ । २६ सृष्टिका कारण जान लिया । वे रुद्र हमदोनोंसे बढ़कर हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २५-२६ ॥ उन्हीं देवाधिदेव परमात्माके परम अभीष्ट । २७ अनुग्रहसे आप भगवान् इस जगत्के आदि स्रष्टा और । पालक हैं । तपसे मैं भी देवताओंके नायक रुद्रकी आराधनाकर आपके साथ सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि ॥ २८ करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार विष्णुको उलाहना देकर पद्मयोनि २ ९ भगवान् ब्रह्माजीने तपसे शिवजीका साक्षात्कार किया और वे इस प्रकार शंकरजीसे कहने लगे — हे भगवन्! देवाधिदेव! विश्वेश्वर! हे महेश्वर! बायें अंगसे विष्णु ३० तथा दाहिने अंगसे मैं उत्पन्न हुआ हूँ तो भी मेरे साथ उत्पन्न होकर विष्णुने सारा जगत् उत्पन्न किया । इस ३१ समय मैंने भी आपके आश्रयके बलपर मत्सरतापूर्वक उनको तिरस्कृत किया । चूँकि हमदोनोंकी समान उत्पत्ति आपसे ही हुई है और आप महेश्वरमें उनकी भक्ति ३२ भी मेरी अपेक्षा अधिक नहीं है । इसलिये हे महेश्वर! जिस प्रकार पूर्वमें आपने उनकी भक्तिके कारण उनपर ३३ अनुग्रह किया है, उसी प्रकार मुझपर अनुग्रह करके वह सब कुछ प्रदान कीजिये ॥ २ ९ –३३ ॥ इस प्रकार उनके द्वारा प्रार्थित दयानिधि ३४ भगनेत्रनाशक भगवान् शिवने न्यायतः उन्हें भी सारी शक्ति प्रदान की ॥ ३४ ॥
इस प्रकार ब्रह्मदेवने क्षणमात्रमें शिवद्वारा सर्वात्मता ३५ प्राप्तकर शीघ्रतासे जाकर विष्णुको देखा । वहाँ क्षीरसागरके मध्यमें सूर्यके समान प्रकाशित, सुवर्ण-रत्नजटित और अपने मनसे उत्पन्न किये गये धवल ३६ तथा दिव्य विमानमें अनन्तनागकी शय्यापर शयन करते हुए कमलनयन, चार भुजाओंवाले, कोमल अंगोंवाले, ३७ सभी आभूषणोंसे विभूषित, शंख - चक्र धारण किये हुए, सौम्य, चन्द्रबिम्बके समान मुखवाले, श्रीवत्सचिह्नसे ३८ | शोभित वक्षःस्थलवाले, खिली हुई मधुर मुसकानसे | युक्त, स्थलकमलके समान कोमल करकमलको अपने | चरणकमलपर स्थित किये हुए, क्षीरसागरके [ मन्थन 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_26_2_Back
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अ ० १४ ] वायवीयसहिता क्षीरार्णवामृतमिव शयानं योगनिद्रया ॥ ३ ९ ।
तमसा कालरुद्राख्यां रजसा कनकाण्डजम् ।
सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम् ॥ ४०
तं दृष्ट्वा पुरुषं ब्रह्मा प्रगल्भमिदमब्रवीत् ।
ग्राम त्वामहं विष्णो त्वमात्मानं यथा पुरा ॥ ४१
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रतिबुद्ध्य पितामहम् ।
उदैक्षत महाबाहुः स्मितमीषच्चकार च ॥ ४२
तस्मिन्नवसरे विष्णुर्ग्रस्तस्तेन महात्मना ।
सृष्टश्च ब्रह्मणा सद्यो भ्रुवोर्मध्यादयत्नतः ॥ ४३
तस्मिन्नवसरे साक्षाद्भगवानिन्दुभूषणः ।
शक्तिं तयोरपि द्रष्टुमरूपो रूपमास्थितः ॥ ४४
प्रसादमतुलं कर्तुं पुरा दत्तवरस्तयोः ।
आगच्छत्तत्र यत्रेमौ ब्रह्मनारायणौ स्थितौ ॥ ४५
अथ तुष्टुवतुर्देवं प्रीतौ भीतौ च कौतुकात् ।
प्रणेमतुश्च बहुशो बहुमानेन दूरतः ॥ ४६
भवोऽपि भगवानेतावनुगृह्य पिनाकधृक् । ( पूर्वखण्ड ) ७७३ उत्पन्न रत्नभूत ] अमृतके समान, योगनिद्रामें शयन करते हुए तमोगुणसे कालरुद्र, रजोगुणसे हिरण्यगर्भ, सत्त्वगुणसे सर्वव्यापक विष्णु तथा निर्गुण होनेसे साक्षात् परमेश्वररूप उस पुरुष ( विष्णु ) -को देखकर ब्रह्माजीने साभिमान यह कहा - हे विष्णो! जिस प्रकार पूर्व समयमें आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार मैं भी आपको ग्रसता हूँ॥३५–४१ ॥ उनका वचन सुनकर महाबाहु विष्णुने जागकर ब्रह्माकी ओर देखा और थोड़ा - सा मुसकराने लगे ॥ ४२ ॥
उसी समय उन महात्मा ब्रह्माने विष्णुको ग्रस लिया, किंतु वे तत्काल ही ब्रह्माके भ्रूमध्यसे बिना यत्नके ही प्रकट हो गये । उस समय साक्षात् निराकार भगवान् चन्द्रमौलिने उन दोनोंकी शक्ति देखनेके लिये साकार रूप धारण कर लिया॥४३-४४ ॥ पूर्व समयमें उन्होंने दोनोंको ही वर प्रदान किया था, इसलिये उनपर अतुल अनुग्रह करनेके लिये वे वहाँ आये, जहाँ ये दोनों ब्रह्मा तथा विष्णु स्थित थे ॥४५ ॥
तब उनके इस कौतुकसे प्रसन्न एवं भयभीत वे दोनों दूरसे ही शिवकी स्तुति करने लगे और सम्मानपूर्वक उन्हें बारंबार प्रणाम करने लगे । पिनाकधारी भगवान् सदाशिव भी उनपर अनुग्रह करके उन दोनोंके आदरपूर्वक देखते - देखते अन्तर्धान
सादरं पश्यतोरेव तयोरन्तरधीयत ॥ ४७ । हो गये॥४६-४७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे ब्रह्मविष्णुसृष्टिकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें ब्रह्माविष्णुसृष्टिकथन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः प्रत्येक कल्पमें ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन वायुरुवाच
प्रतिकल्पं प्रवक्ष्यामि रुद्राविर्भावकारणम् ।
यतोऽविच्छिन्नसंताना ब्रह्मसृष्टिः प्रवर्तते ॥
कल्पे कल्पे प्रजाः सृष्ट्वा ब्रह्मा ब्रह्माण्डसंभवः ।
अवृद्धिहेतोर्भूतानां मुमोह भृशदुःखितः ॥
वायुदेव बोले- अब मैं प्रत्येक कल्पमें रुद्रके आविर्भावका कारण बताऊँगा, जिससे ब्रह्मसृष्टिका प्रवाह अविच्छिन्न रूपसे चलता रहता है ॥ १ ॥
१ ब्रह्माण्डको उत्पन्न करनेवाले ब्रह्माजी प्रत्येक कल्पमें प्रजाओंकी रचनाकर उसका विस्तार नहीं कर २ पानेके कारण जब अत्यन्त दुखी और किंकर्तव्यविमूढ़
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ७७४
तस्य दुःखप्रशान्त्यर्थं प्रजानां च विवृद्धये ।
तत्तत्कल्पेषु कालात्मा रुद्रो रुद्रगणाधिपः ॥
निर्दिष्टः परमेशेन महेशो नीललोहितः ।
पुत्रो भूत्वानुगृह्णाति ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽनुजः ॥
स एव भगवानीशस्तेजोराशिरनामयः ।
अनादिनिधनो धाता भूतसंकोचको विभुः ॥
परमैश्वर्यसंयुक्तः परमेश्वरभावितः ।
तच्छक्त्याधिष्ठितः शश्वत्तच्चित्रैरपि चिह्नितः ॥
तन्नामनामा तद्रूपस्तत्कार्यकरणक्षमः ।
तत्तुल्यव्यवहारश्च तदाज्ञापरिपालकः ॥
सहस्त्रादित्यसंकाशश्चन्द्रावयवभूषणः भुजंगहारकेयूरवलयो मुञ्जमेखलः ॥ जलंधरविरिञ्चेन्द्रकपालशकलोज्ज्वलः गङ्गातुंगतरंगार्द्रपिंगलाननमूर्द्धजः ॥ भग्नदंष्ट्राङ्कुराक्रान्तप्रान्तकान्तधराधरः 1 सव्यश्रवणपार्वान्तमंडलीकृतकुण्डलः ॥
महावृषभनिर्याणो महाजलदनिःस्वनः ।
महानलसमप्रख्यो महाबलपराक्रमः ॥
एवं घोरमहारूपो ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ।
विज्ञानं ब्रह्मणे दत्त्वा सर्गं सह करोति च ॥
तस्माद् रुद्रप्रसादेन प्रतिकल्पं प्रजापतेः ।
प्रवाहरूपतो नित्या प्रजासृष्टिः प्रवर्तते ॥
कदाचित्प्रार्थितः स्रष्टुं ब्रह्मणा नीललोहितः ।
स्वात्मना सदृशान् सर्वान् ससर्ज मनसा विभुः ॥
| हो जाते हैं, तब उनके दुःखके प्रशमनहेतु ३ तथा प्रजाओंकी वृद्धिके लिये उन - उन कल्पाये परमेश्वरसे प्रेरित होकर रुद्रगणोंके अधिपति | कालात्मा, नीललोहित, महेश्वर, रुद्र [ अजन्मा होते ४ हुए भी ] बादमें ब्रह्माके पुत्र होकर ब्रह्मदेवपर कृपा करते हैं॥२–४ ॥ वे ही तेजोराशि, निरामय, आदि - अन्तसे रहित ५ सबके निर्माता, प्राणियोंके संहारक, सर्वव्यापक, | भगवान् ईश परम ऐश्वर्यसे समन्वित, परमेश्वरसे भावित और सदा उन्हींकी शक्तिसे अधिष्ठित हो ६ उन्हींके चिह्नोंको धारण करते हैं॥५-६ ॥ उनके नामके समान नामवाले, उन्हींका रूप ७ धारण करनेवाले, उनका कार्य करनेमें समर्थ, उन्हीं परमेश्वरके समान व्यवहारवाले तथा उन्हींकी आज्ञाका पालन करनेवाले वे रुद्र हजार सूर्योंके समान दीप्तिमान्, चन्द्रखण्डका भूषण धारण करनेवाले, सर्पमय हार-८ केयूर - कंकण धारण करनेवाले तथा मूँजकी मेखला धारण करनेवाले हैं ॥ ७-८ ॥ वे रुद्रदेव जलको धारण करनेवाले ९ वरुण - ब्रह्मा - इन्द्रके कपालखण्डोंसे उज्ज्वल, गंगाकी उत्तुंग तरंगोंसे आर्द्र तथा पिंगल मुख एवं केशोंवाले, [ प्रलयकालमें अपनी भयानक ] दाढ़ोंके अग्रभागसे १० पर्वतोंके प्रान्तभागको आक्रान्त करनेवाले, अपने दाहिने कानके पार्श्व भागमें मण्डलाकार कुण्डल धारण करनेवाले, महावृषभपर सवारी करनेवाले, ११ महामेघके समान गम्भीर वाणीवाले, प्रचण्ड अग्निके समान कान्तिवाले और महान् बल तथा पराक्रमवाले १२ हैं । इस प्रकारके महाघोर रूपवाले ब्रह्मपुत्र महेश्वर ब्रह्माको ज्ञान देकर सृष्टिकार्यमें उन्हें साहाय्य प्रदान करते हैं॥९ –१२ ॥ इस प्रकार प्रत्येक कल्पमें रुद्रकी कृपासे १३ उन प्रजापति ब्रह्मासे नित्य प्रजा - सृष्टि प्रवाहरूपसे । होती रहती है । किसी समय ब्रह्माजीने [ प्रजाओंकी ] सृष्टि करनेहेतु प्रार्थना की, तब उन नीललोहित १४ | प्रभुने मनसे अपने समान ही समस्त प्रजाओंकी
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अ ० १५ ] वायवीयसहिता ( पूर्वखण्ड ) ७७५
कपर्दिनो निरातकान्नीलग्रीवाँस्त्रिलोचनान् ।
जरामरणनिर्मुक्तान् दीप्तशूलवरायुधान् ॥
तैस्तु संछादितं सर्वं चतुर्दशविधं जगत् ।
तान्दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् रुद्रमाह पितामहः ॥
नमस्ते देवदेवेश मास्स्राक्षीरीदृशीः प्रजाः ।
अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा मृत्युसमन्विताः ॥
इत्युक्तः प्रहसन्प्राह ब्रह्माणं परमेश्वरः ।
नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः ॥
येत्विमे मनसा सृष्टा महात्मानो महाबलाः ।
चरिष्यन्ति मया सार्द्धं सर्व एव हि याज्ञिकाः ॥
इत्युक्त्वा विश्वकर्माणं विश्वभूतेश्वरो हरः ।
सह रुद्रैः प्रजासर्गान्निवृत्तात्माध्यतिष्ठत ॥
ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूते प्रजाः शुभाः ।
ऊर्ध्वरेताः स्थितः स्थाणुर्यावदाभूतसंप्लवम् ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सृष्टि की । उन्होंने जटाजूटधारी, भयरहित, नीलकण्ठ, १५ त्रिलोचन, उन्होंने जरामरणरहित तथा देदीप्यमान त्रिशूलरूप श्रेष्ठ आयुध धारण किये हुए समस्त । रुद्रोंकी सृष्टि की ॥ १३–१५ ॥ उन लोगोंने समस्त चौदह भुवनोंको आच्छादित १६ कर लिया, [ तब ] उन विविध रुद्रोंको देखकर ब्रह्माजीने रुद्रसे कहा- हे देवदेवेश! आपको नमस्कार है, आप इस प्रकारकी प्रजाओंकी रचना मत कीजिये १७ आप मरणधर्मयुक्त अन्य प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये, आपका कल्याण हो॥१६-१७ ॥ ऐसा कहे जानेपर परमेश्वरने ब्रह्माजीसे हँसते १८ हुए कहा - मेरी सृष्टिमें ऐसी प्रजा नहीं हो सकती, अतः ऐसी अशुभ प्रजाकी सृष्टि आप ही करें । मैंने मनसे जिन महा - बलवान् एवं महान् आत्मावाले १ ९ रुद्रगणोंकी सृष्टि की है, वे सभी याज्ञिक बनकर मेरे साथ विचरण करेंगे ॥ १८-१९ ॥ विश्वकर्ता ब्रह्मदेवसे ऐसा कहकर समग्र २० प्राणियोंके ईश्वर शिवजी रुद्रोंके साथ प्रजासर्गसे उपरत हो [ स्थाणुके समान ] अवस्थित हो गये । उसी समयसे उन शिवजीने शुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की और वे ऊर्ध्वरेता बनकर प्रलय - कालतकके २१ । लिये स्थाणुरूपमें स्थित हो गये॥२०-२१ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे रुद्राविर्भाववर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें रुद्राविर्भाववर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट शिवकी ब्रह्माजीद्वारा स्तुति वायुरुवाच
यदा पुनः प्रजाः सृष्टा न व्यवर्द्धन्त वेधसः ।
तदा मैथुनजां सृष्टिं ब्रह्मा कर्तुममन्यत ॥
न निर्गतं पुरा यस्मान्नारीणां कुलमीश्वरात् । तेन मैथुनजां सृष्टिं न शशाक पितामहः । वायुदेव बोले- जब ब्रह्माजीद्वारा रची गयी प्रजाओंका पुनः विस्तार नहीं हुआ, तब १ ब्रह्माजीने मैथुनी सृष्टि करनेका विचार किया । पूर्व समयमें तबतक स्त्रियोंका कुल ईश्वरसे उत्पन्न नहीं हुआ था, इस कारणसे ब्रह्माजी मैथुनी सृष्टि २ नहीं कर सके॥१-२ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ ७७६
ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम् ।
प्रजानामेव वृद्ध्यर्थं प्रष्टव्यः परमेश्वरः ॥ ३
प्रसादेन विना तस्य न वर्द्धेरन्निमाः प्रजाः ।
एवं संचिन्त्य विश्वात्मा तपः कर्तुं प्रचक्रमे ॥ ४
तदाद्या परमा शक्तिरनंता लोकभाविनी ।
आद्या सूक्ष्मतरा शुद्धा भावगम्या मनोहरा ॥ ५
निर्गुणा निष्प्रपञ्चा च निष्कला निरुपप्लवा ।
निरन्तररता नित्या नित्यमीश्वरपार्श्वगा ॥ ६
तया परमया शक्त्या भगवन्तं त्रियम्बकम् ।
संचिन्त्य हृदये ब्रह्मा तताप परमं तपः ॥ ७
तीव्रेण तपसा तस्य युक्तस्य परमेष्ठिनः ।
अचिरेणैव कालेन पिता संप्रतुतोष ह ॥ ८
ततः केनचिदंशेन मूर्तिमाविश्य कामपि ।
अर्द्धनारीश्वरो भूत्वा ययौ देवः स्वयं हरः ॥ ९
तं दृष्ट्वा परमं देवं तमसः परमव्ययम् ।
अद्वितीयमनिर्देश्यमदृश्यमकृतात्मभिः ॥१०
सर्वलोकविधातारं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ।
सर्वलोकविधायिन्या शक्त्या परमया युतम् ॥ ११
अप्रतर्क्यमनाभासममेयमजरं ध्रुवम् ।
अचलं निर्गुणं शांतमनंतमहिमास्पदम् ॥ १२
सर्वगं सर्वदं सर्वसदसद्व्यक्तिवर्जितम् ।
सर्वोपमाननिर्मुक्तं शरण्यं शाश्वतं शिवम् ॥ १३
प्रणम्य दंडवद् ब्रह्मा समुत्थाय कृताञ्जलिः ।
श्रद्धाविनयसंपन्नैः श्राव्यैः संस्कारसंयुतैः ॥ १४
यथार्थयुक्तसर्वार्थैर्वेदार्थपरिबृंहितैः तुष्टाव देवं देवीं च सूक्तैः सूक्ष्मार्थगोचरैः ॥ १५ ब्रह्मोवाच
जय देव महादेव जयेश्वर महेश्वर । ।
जय सर्वगुणश्रेष्ठ जय सर्वसुराधिप ॥ १६ ।
उसके बाद ब्रह्माजीको अपना कार्य सिद्ध करनेवाली बुद्धि उत्पन्न हुई कि प्रजाओंकी वृद्धिके | लिये परमेश्वरसे पूछना चाहिये; क्योंकि उनके | अनुग्रहके बिना इन प्रजाओंकी वृद्धि नहीं हो सकती-ऐसा विचारकर विश्वात्मा ब्रह्माजीने तप करनेका निश्चय किया॥३-४ ॥ तब जो आद्या, अनन्ता, लोकभाविनी, आदिशक्ति , अत्यन्त सूक्ष्म, शुद्ध, भावगम्य, मनोहर, निर्गुण, | प्रपंचरहित, निष्कल, उपद्रवरहित, सदा तत्पर रहनेवाली नित्य तथा सर्वदा ईश्वरके पास रहनेवाली हैं, उन, परम शक्तिसे संवलित भगवान् शिवका मनमें चिन्तन करके ब्रह्माजी कठोर तप करने लगे ॥ ५ - ७ ॥ तब कठोर तपमें लीन उन ब्रह्मापर शिवजी थोड़े ही समयमें सन्तुष्ट हो गये । इसके बाद अपने अनिर्वचनीय अंशसे किसी अद्भुत मूर्तिमें प्रविष्ट हो अर्धनारीश्वररूप धारणकर शिवजी स्वयं ब्रह्माजीके समीप गये ॥८ - ९ ॥ तमसे परे, अविनाशी, अद्वितीय, अनिर्देश्य, पापियोंके लिये अदृश्य, सभी लोकोंके विधाता, सभी लोकोंके ईश्वरके भी ईश्वर, सर्वलोक-विधायिनी परम शक्तिसे समन्वित, अप्रतर्क्स, प्रत्यक्षके अविषय, अप्रमेय, अजर, ध्रुव, अचल, निर्गुण, शान्त, अनन्त महिमासे युक्त, सर्वगामी, सर्वदाता, सत् - असत् अभिव्यक्तिसे रहित, सभी उपमानोंसे रहित, शरण्य तथा शाश्वत उन परमदेव शिवजीको ब्रह्माजीने देखा, [ तब वे ] उठकर हाथ जोड़कर दण्डवत् प्रणाम करके श्रद्धा - विनयसे सम्पन्न, सुनानेयोग्य, संस्कार तथा यथार्थतासे युक्त, सम्पूर्ण अर्थोंसे समन्वित, वेदार्थसे परिबृंहित, सूक्ष्म अर्थोंसे परिपूर्ण सूक्तोंसे शिव तथा पार्वतीकी स्तुति करने लगे॥१०–१५ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे देव! आपकी जय हो, हे महादेव! आपकी जय हो । हे ईश्वर! हे महेश्वर! आपकी जय हो, सर्वगुणश्रेष्ठ! आपकी जय हो, हे सभी देवताओंके अधीश्वर! आपकी जय हो ॥१६ ॥