शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 821–830
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830
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अ ० २२ ] वायवीयसंहिता
स च विष्णुः पुनर्भद्रं भद्रो विष्णुं तथा पुनः ।
स च तं च स तं विप्राः शरैस्तावनुजघ्नतुः ॥ २३
तयोः परस्परं वेगाच्छरानाशु विमुञ्चतोः ।
द्वयोः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ २४
तद्दृष्ट्वा तुमुलं युद्धं तयोरेव परस्परम् ।
हाहाकारो महानासीदाकाशे खेचरेरितः ॥ २५
ततस्त्वनलतुण्डेन शरेणादित्यवर्चसा ।
विव्याध सुदृढं भद्रं विष्णोर्महति वक्षसि ॥ २६
स तु तीव्रप्रपातेन शरेण दृढमाहतः ।
महतीं रुजमासाद्य निपपात विमोहितः ॥ २७
पुनः क्षणादिवोत्थाय लब्धसंज्ञस्तदा हरिः ।
सर्वाण्यपि च दिव्यास्त्राण्यथैनं प्रत्यवासृजत् ॥ २८
स च विष्णुर्धनुर्मुक्तान्सर्वान् शर्वचमूपतिः ।
सहसा वारयामास घोरैः प्रतिशरैः शरान् ॥ २ ९
ततो विष्णुः स्वनामाङ्कं बाणमव्याहतं क्वचित् ।
ससर्ज क्रोधरक्ताक्षः तमुद्दिश्य गणेश्वरम् ।
तं बाणं बाणवर्येण भद्रो भद्राह्वयेण तु ॥ ३०
अप्राप्तमेव भगवान् चिच्छेद शतधा पथि ।
अथैकेनेषुणा शार्ङ्गं द्वाभ्यां पक्षौ गरुत्मतः ॥ ३१
निमेषादेव चिच्छेद तदद्भुतमिवाभवत् ।
ततो योगबलाद्विष्णुर्देहाद्देवान् सुदारुणान् ॥ ३२
शंखचक्रगदाहस्तान् विससर्ज सहस्त्रशः ।
सर्वांस्तान्क्षणमात्रेण त्रैपुरानिव शंकरः ॥ ३३
निर्ददाह महाबाहुर्नेत्रसृष्टेन वह्निना ।
ततः क्रुद्धतरो विष्णुश्चक्रमुद्यम्य सत्वरः ॥ ३४
तस्मिन्वीरे समुत्स्त्रष्टुं तदानीमुद्यतोऽभवत् । ( पूर्वखण्ड ) ८०७ हे विप्रो! इस तरह वे विष्णु उन वीरभद्रपर और वे वीरभद्र उन विष्णुपर अपने - अपने बाणोंसे बार - बार प्रहार करने लगे । उस समय तीव्र वेगसे शीघ्रतापूर्वक एक - दूसरेपर बाण छोड़ते हुए उन दोनोंमें रोमांचकारी घोर युद्ध होने लगा ॥ २३-२४ ॥ उन दोनोंके परस्पर घनघोर युद्धको देखकर आकाशगामी देवताओंमें महान् हाहाकार होने लगा ॥ २५ ॥
इसके बाद वीरभद्रने सूर्यके समान तेजस्वी तथा उल्कायुक्त अग्रभागवाले बाणसे अत्यन्त दृढ़तापूर्वक विष्णुके चौड़े वक्ष: स्थलपर आघात किया ॥ २६ ॥
उस बाणके तीव्र प्रहारसे अत्यधिक आहत हुए वे विष्णु महान् पीड़ा प्राप्त करके मूच्छित होकर गिर पड़े । इसके बाद क्षणभरमें चेतनाको प्राप्तकर वे विष्णु उठ करके उनपर सभी दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करने लगे । शिवजीके सेनापति वीरभद्रने भी विष्णुके धनुषसे छूटे हुए सभी बाणोंको अपने घोर बाणोंसे सरलतापूर्वक | काट दिया ॥ २७–२९ ॥ तदनन्तर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले विष्णुने अपने नामसे अंकित और कहीं भी प्रतिरुद्ध न होनेवाले बाणको गणेश्वर वीरभद्रको लक्ष्य करके छोड़ा । भगवान् वीरभद्रने भी अपने भद्र नामक श्रेष्ठ बाणसे उस बाणको अपने पास बिना आये ही उसके मार्गमें सैकड़ों टुकड़े कर दिये । पुनः एक बाणसे विष्णुके शार्ङ्गधनुषको और दो बाणोंसे गरुड़के पंखोंको एक निमेषमें काट दिया, यह अद्भुत घटना हो गयी॥३०-३११ / २ ॥ इसके बाद योगबलके द्वारा विष्णुने हाथोंमें शंख, चक्र और गदा धारण किये हुए हजारों भयंकर देवताओंको अपने शरीरसे उत्पन्न किया, किंतु महाबाहु वीरभद्रने अपने नेत्रसे निकली हुई अग्निसे उन सभीको क्षणमात्रमें इस तरह दग्ध कर दिया, जिस तरह शिवजीने तीनों पुरोंको भस्म कर दिया था॥३२-३३१ / २ ॥ तब विष्णु अति क्रोधित हो शीघ्रतासे अपना चक्र उठाकर उसे वीरभद्रपर चलानेके लिये उद्यत हुए । उस समय अपने सामने चक्र उठाकर उन्हें खड़ा
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ ८०८ देखकर वीरभद्रने हँसते हुए बिना प्रयत्न किये ही तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य पुरतः समुपस्थितम् ॥ ३५ | उसे स्तम्भित कर दिया । तब वीरभद्रपर आघात स्मयन्निव गणेशानो व्यष्टंभयदयत्नतः स्तंभिताङ्गस्तु तच्चक्रं घोरमप्रतिमं क्वचित्
इच्छन्नपि समुत्स्रष्टुं न विष्णुरभवत्क्षमः ।
श्वसन्निवैकमुद्धृत्य बाहुं चक्रसमन्वितम् ॥
अतिष्ठदलसो भूत्वा पाषाणमिव निश्चलः । विशरीरो यथा जीवो विशृङ्गो वा यथा वृषः विदंष्ट्रश्च यथा सिंहस्तथा विष्णुरवस्थितः ।
तं दृष्ट्वा दुर्दशापन्नं विष्णुमिन्द्रादयः सुराः ।
समुन्नद्धा गणेन्द्रेण मृगेन्द्रेणेव गोवृषाः ॥
प्रगृहीतायुधा योद्धुं क्रुद्धाः समुपतस्थिरे ।
तान्दृष्ट्वा समरे भद्रः क्षुद्रानिव हरिर्मृगान् ॥
साक्षाद् रुद्रतनुर्वीरो वरवीरगणावृतः ।
अट्टहासेन घोरेण व्यष्टम्भयदनिंदितः ॥
तथा शतमखस्यापि सवज्रो दक्षिणः करः ।
सिसृक्षोरेव उद्वज्रश्चित्रीकृत इवाभवत् ॥
अन्येषामपि सर्वेषां सरक्ता अपि बाहवः ।
अलसानामिवारंभास्तादृशाः प्रतियान्त्युत ॥
एवं भगवता तेन व्याहताशेषवैभवात् ।
अमराः समरे तस्य पुरतः स्थातुमक्षमाः ॥
स्तब्धैरवयवैरेव दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ।
स्थितिं न चक्रिरे युद्धे वीरतेजोऽभयाकुलाः ॥
विद्रुतांस्त्रिदशान्वीरान्वीरभद्रो महाभुजः ।
विव्याध निशितैर्बाणैर्मेघो वर्षैरिवाचलान् ॥
। । करनेकी इच्छा रखते हुए भी विष्णु अपने उस ॥ ३६ । अप्रतिम और कठोर चक्रको चलानेमें असमर्थ हो गये ॥ ३४–३६१ / २ ॥ ३७ उस समय एक हाथमें चक्र लिये विष्णु | वहींपर दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए आलस्ययुक्त । होकर पत्थरके समान निश्चल हो गये । विष्णु उसी ॥ ३८ तरह हो गये, जैसे शरीरसे रहित जीव, शृंगविहीन बैल तथा दाढ़से रहित सिंह [ किंकर्तव्यविमूढ़ ] हो जाता है । तब उन्हें दुर्गतिमें पड़ा देखकर इन्द्रादि देवगण वीरभद्रसे लड़नेके लिये इस तरह सन्नद्ध हो गये, ३ ९ मानो वृष क्रुद्ध होकर सिंहसे संग्राम करना चाहते हों । वे कुपित होकर शस्त्र लेकर युद्ध करनेके लिये उपस्थित हो गये॥३७-३९ १ / २ ॥ ४० तब महावीर गणोंसे घिरे हुए तथा साक्षात् रुद्रके सदृश शरीरवाले निष्कलंक वीरभद्रने उनकी तरफ उसी प्रकार देखा, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंको देखता ४१ है । [ तदुपरान्त वीरभद्रने ] अट्टहासके द्वारा अपना वज्र छोड़नेकी इच्छा रखनेवाले इन्द्रका वज्रयुक्त उठा ४२ हुआ दाहिना हाथ स्तम्भित कर दिया, जिससे वह चित्र - लिखित - जैसा हो गया । उसी तरह अन्य समस्त देवगणोंकी शस्त्रोंके सहित उठी हुई भुजाएँ ४३ भी आलसी पुरुषोंके कार्योंके समान स्तम्भित हो गयीं ॥ ४० - ४३ ॥ इस प्रकार भगवान्के द्वारा अपना सम्पूर्ण ऐश्वर्य ४४ नष्ट कर दिये जानेके कारण सभी देवता संग्राममें उनके सम्मुख स्थित रहनेमें असमर्थ हो गये और स्तम्भित अंगोंसहित भयसे व्याकुल हो भागने लगे । ४५ वीरभद्रके तेजके भयसे व्याकुल वे युद्धस्थलमें टिक उन सके ॥ ४४-४५ ॥ तब महान् भुजाओंवाले वीरभद्र भागते हुए वीर | देवगणोंको अपने तीखे बाणोंसे इस प्रकार बींधने लगे, ४६ । मानो पर्वतोंपर मेघ वर्षा कर रहा हो ॥४६ ॥
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अ ० २२ ] वायवीयसंहिता
बहवस्तस्य वीरस्य बाहवः परिघोपमाः ।
शस्त्रैश्चकाशिरे दीप्तैः साग्निज्वाला इवोरगाः ॥ ४७
अस्त्रशस्त्राण्यनेकानि स वीरो विसृजन्बभौ ।
विसृजन्सर्वभूतानि यथादौ विश्वसंभवः ॥ ४८
यथा रश्मिभिरादित्यः प्रच्छादयति मेदिनीम् ।
तथा वीरः क्षणादेव शरैः प्राच्छादयद्दिशः ॥ ४ ९
खमण्डले गणेन्द्रस्य शराः कनकभूषिताः ।
उत्पतन्तस्तडिद्रूपैरुपमानपदं ययुः ॥ ५०
महान्तस्ते सुरगणान् मंडूकानिव डुंडुभाः ।
प्राणैर्वियोजयामासुः पपुश्च रुधिरासवम् ॥ ५१
निकृत्तबाहवः केचित्केचिल्लूनवराननाः ।
पार्श्वे विदारिताः केचिन्निपेतुरमरा भुवि ॥ ५२
विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बहुभिश्छिन्नसन्धिभिः ।
विवृत्तनयनाः केचिन्निपेतुर्भूतले मृताः ।
गां प्रवेष्टुमिवेच्छन्तः खं गन्तुमिव लिप्सवः ॥ ५३
अलब्धात्मनिरोधानां व्यलीयन्तः परस्परम् ।
भूमौ केचित्प्रविविशुः पर्वतानां गुहाः परे ॥ ५४
अपरे जग्मुराकाशं परे च विविशुर्जलम् ।
तथा संछिन्नसर्वांगैः स वीरस्त्रिदशैर्बभौ ॥ ५५
परिग्रस्तः प्रजावर्गो भगवानिव भैरवः ।
दग्धत्रिपुरसंव्यूहस्त्रिपुरारिर्यथाऽभवत् ॥५६
एवं देवबलं सर्वं दीनं बीभत्सदर्शनम् ।
गणेश्वरसमुत्पन्नं कृपणं वपुराददे ॥ ५७
( पूर्वखण्ड ) ८० ९ उस समय उन वीरभद्रकी देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त, परिघके समान बहुत - सी भुजाएँ प्रकाशित हो उठीं, मानो वे अग्निज्वालासहित सर्प हों । अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंको छोड़ते हुए वे वीरभद्र उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे कल्पादिमें सभी प्राणियोंकी सृष्टि करते हुए ब्रह्माजी शोभित होते हैं ॥ ४७-४८ ॥ जैसे सूर्य अपनी रश्मियोंसे पृथ्वीको आच्छादित कर देता है, उसी तरह वीरभद्रने थोड़ी ही देरमें बाणोंसे दिशाओंको आच्छन्न कर दिया । गणेश्वर | वीरभद्रके सुवर्णमण्डित बाण आकाश - मण्डलमें उछलते हुए [ अपनी त्वरित गति तथा द्युतिके कारण ] स्वयं बिजलियोंके उपमान बन गये । जिस प्रकार डुण्डुभ मेढकका रुधिर पी जाता है तथा उसे प्राणविहीन कर देता है, उसी प्रकार वे बड़े - बड़े बाण देवताओंके रुधिररूपी आसवको पीने लगे और उन्हें प्राणहीन करने लगे ॥ ४ ९ –५१ ॥ [ उस समय ] किन्हींकी भुजाएँ कट गयीं, किन्हींके सुन्दर मुख छिन्न - भिन्न हो गये, किन्हींकी पसलियाँ टूट गयीं और कुछ देवता पृथ्वीपर गिर पड़े । बाणोंके द्वारा अंगोंके पीड़ित होनेसे तथा सन्धिभागके विच्छिन्न हो जानेसे कुछ देवता आँखें फाड़कर पृथ्वीपर गिरकर मर गये, कोई पृथ्वीमें प्रविष्ट होनेकी इच्छासे और कोई - कोई छिपनेके लिये स्थान न प्राप्तकर आपसमें एक - दूसरेके शरीरमें छिप गये, कोई पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गये और कोई पर्वतोंकी गुफाओंमें छिप गये, कोई आसमानमें चले गये तथा कोई देवता जलमें छिप गये॥५२-५४९ / २ ॥ छिन्न - भिन्न अंगोंवाले देवताओंके सहित वे वीरभद्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, किस प्रकार प्रजाका संहार करके भगवान् भैरव सुशोभित होते हैं अथवा जिस प्रकार त्रिपुरको दग्ध करके त्रिपुरारि शोभित हुए थे । इस प्रकार गणेश्वरके द्वारा उपद्रुत ( भगाये गये ) देवगणोंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो दीन, अशरण एवं बीभत्स दिखायी देने | लगी ॥ ५५–५७ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ ८१०
तदा त्रिदशवीराणामसृक्सलिलवाहिनी ।
प्रावर्तत नदी घोरा प्राणिनां भयशंसिनी ॥ ५८
रुधिरेण परिक्लिन्ना यज्ञभूमिस्तदा बभौ ।
रक्तार्द्रवसना श्यामा हतशुंभेव कौशिकी ॥ ५ ९
तस्मिन्महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे ।
भयेनेव परित्रस्ता प्रचचाल वसुन्धरा ॥ ६०
महोर्मिकलिलावर्तश्चुक्षुभे च महोदधिः ।
पेतुश्चोल्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः ॥ ६१
अप्रसन्ना दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ ।
अहो विधिविपर्यासस्त्वश्वमेधोऽयमध्वरः ।
यजमानः स्वयं दक्षो ब्रह्मपुत्रप्रजापतिः ॥६२
धर्मादयः सदस्याश्च रक्षको गरुडध्वजः ।
भागांश्च प्रतिगृह्णति साक्षादिन्द्रादयः सुराः ॥ ६३
तथापि यजमानस्य यज्ञस्य च सहर्त्विजः ।
सद्य एव शिरच्छेदः साधु संपद्यते फलम् ॥ ६४
तस्मान्नावेदनिर्दिष्टं न चेश्वरबहिष्कृतम् ।
नासत्परिगृहीतं च कर्म कुर्यात्कदाचन ॥ ६५
कृत्वापि सुमहत्पुण्यमिष्ट्वा यज्ञशतैरपि ।
न तत्फलमवाप्नोति भक्तिहीनो महेश्वरे ॥ ६६
कृत्वापि सुमहत्पापं भक्त्या यजति यः शिवम् ।
मुच्यते पातकैः सर्वैर्नात्र कार्या विचारणा ॥ ६७
बहुनात्र किमुक्तेन वृथा दानं वृथा तपः ।
वृथा यज्ञो वृथा होमः शिवनिन्दारतस्य तु ॥ ६८
ततः सनारायणकाः सरुद्राः सलोकपालाः समरे सुरौघाः । ।
गणेन्द्रचापच्युतबाणविद्धाः ।
प्रदुद्रुवुर्गाढरुजाभिभूताः ॥६ ९ ।
उस समय उन देवगणोंके रक्तकी घोर नदी प्रवाहित होने लगी, जो प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली थी ॥५८ ॥
उस समय रुधिरसे पूर्णतः सिक्त यज्ञभूमि ऐसी प्रतीत होने लगी, मानो शुम्भका वधकर रक्तसे गीले । वस्त्रोंवाली श्यामा कौशिकी देवी हों ॥ ५ ९ ॥ अत्यन्त भयानक उस महायुद्धके होनेपर पृथ्वी भयसन्त्रस्त होकर काँपने लगी, समुद्र भी व्याकुल हो उठा तथा उसमें महागम्भीर आवर्त एवं लहरें उठने लगीं, उत्पातसूचक उल्कापात होने लगे, वृक्षोंकी शाखाएँ टूटने लगीं, सभी दिशाएँ मलिन हो गयीं और अमंगलसूचक वायु बहने लगा । अहो! भाग्यकी कैसी विडम्बना है कि यह अश्वमेधयज्ञ है, जिसके यजमान स्वयं ब्रह्माके पुत्र प्रजापति दक्ष हैं, धर्म आदि सदस्य हैं, भगवान् विष्णु रक्षक हैं और साक्षात् इन्द्रादि देवता अपना - अपना भाग ग्रहण कर रहे हैं, फिर भी ऋत्विजोंके सहित यजमान तथा उस यज्ञपुरुषका सिर शीघ्र ही कट गया, यह तो बड़ा ही उत्तम फल प्राप्त हुआ! अतः वेदविरुद्ध होनेपर भी वेदसम्मत प्रतीत होनेवाला, ईश्वर [ की महत्तासे विरुद्ध होनेके कारण ] - बहिष्कृत तथा असज्जनोंके द्वारा परिगृहीत कर्म कभी नहीं करना चाहिये ॥ ६०–६५ ॥ महान् पुण्य करके तथा सैकड़ों यज्ञ करके भी महेश्वरके प्रति भक्तिसे रहित व्यक्ति उन [ अनुष्ठानों ] -का फल प्राप्त नहीं करता है । किंतु जो बहुत बड़ा पाप करके भी भक्तिपूर्वक शिवका यजन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । इस विषयमें बहुत कहना व्यर्थ है, शिवनिन्दा करनेवालेका दान, तप, यज्ञ तथा होम व्यर्थ है॥६६–६८ ॥ तदनन्तर उस युद्धमें वीरभद्रके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे पीड़ित हुए नारायण, रुद्र एवं लोकपालोंसहित सभी देवता अत्यन्त दुःखित होकर पलायन करने लगे ॥ ६ ९ ॥
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अ ० २३ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८११ चेलुः क्वचित्केचन शीर्णकेशाः सेदुः क्वचित्केचन दीर्घगात्राः । पेतुः क्वचित्केचन भिन्नवक्त्रा नेशुः क्वचित्केचन देववीराः ॥ केचिच्च तत्र त्रिदशा विपन्ना विस्त्रस्तवस्त्राभरणास्त्रशस्त्राः निपेतुरुद्भासितदीनमुद्रा मदं च दर्पं च बलं च हित्वा ॥ समुत्पथप्रस्थितमप्रधृष्यो विक्षिप्य दक्षाध्वरमक्षतास्त्रैः । बभौ गणेशः स गणेश्वराणां मध्ये स्थितः सिंह इवर्षभाणाम् ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे कुछ देवता बालोंके कट जानेसे युद्धसे भाग निकले, कोई शरीरके भारी होनेके कारण [ भागनेमें असमर्थ हो दुःखसे ] बैठ गये । कटे - फटे मुखोंवाले ७० कुछ देवता गिर पड़े तथा कुछ देववीरोंकी मृत्यु हो गयी । कितने देवता इतने व्याकुल हो गये कि उनके वस्त्र, आभरण, अस्त्र एवं शस्त्र शिथिल होकर खिसक गये और वे मद, दर्प तथा बलका त्याग करके दीनभाव प्रदर्शित करते हुए गिर पड़े । ७१ इस प्रकार अप्रतिहत वे गणेश्वर वीरभद्र अपने दुर्भेद्य अस्त्रोंसे विधिहीन दक्ष यज्ञको विनष्टकर अपने मुख्य गणोंके मध्य उसी प्रकार शोभायमान हुए, जिस प्रकार ऋषभों अर्थात् वन्य पशुओंके मध्य सिंह ७२ | शोभित होता है॥७०–७२ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे दक्षयज्ञविध्वंसवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें दक्षयज्ञविध्वंसवर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः पराजित देवोंके द्वारा की गयी स्तुतिसे प्रसन्न शिवका यज्ञकी सम्पूर्ति करना तथा देवताओंको सान्त्वना देकर अन्तर्धान होना वायुरुवाच
इति संछिन्नभिन्नाङ्गा देवा विष्णुपुरोगमाः ।
क्षणात्कष्टां दशामेत्य त्रेसुः स्तोकावशेषिताः ॥
त्रस्तांस्तान्समरे वीरान् देवानन्यांश्च वै गणाः ।
प्रमथाः परमक्रुद्धा वीरभद्रप्रणोदिताः ॥
प्रगृह्य च तथा दोषं निगडैरायसैर्दृढैः ।
बबन्धुः पाणिपादेषु कंधरेषूदरेषु च ॥
तस्मिन्नवसरे ब्रह्मा भद्रमद्रीन्द्रजानुतम् ।
सारथ्याल्लब्धवात्सल्यः प्रार्थयन् प्रणतोऽब्रवीत् ॥
अलं क्रोधेन भगवन्नष्टाश्चैते दिवौकसः । प्रसीद क्षम्यतां सर्वं रोमजैः सह सुव्रत वायुदेव बोले— [ हे विप्रवरो! ] इस प्रकार अस्त्रोंसे छिन्न - भिन्न अंगोंवाले विष्णु आदि देवता १ क्षणमात्रमें कष्टको प्राप्तकर युद्धमें शेष देवताओंके साथ व्याकुल हो गये ॥१ ॥
वीरभद्रके द्वारा प्रेरित क्रोधी प्रमथगणोंने २ देवताओंके अपराधके अनुसार युद्धमें बचे हुए उन अन्य भयभीत देववीरोंको पकड़कर अत्यन्त दृढ़ लोहेकी जंजीरोंसे उनके हाथ, पैर, कन्धा तथा पेट ३ बाँध दिये॥२-३ ॥ उस समय देवी पार्वतीके स्नेह - पात्र उन वीरभद्रके सारथी होनेके कारण अनुग्रहको प्राप्त हुए ब्रह्माजी ४ प्रार्थना करते हुए विनयपूर्वक कहने लगे - हे भगवन्! अब क्रोधका शमन कीजिये; ये देवता विनष्ट हो चुके हैं । हे सुव्रत! प्रसन्न होइये और अपने रोमसे उत्पन्न ॥ ५ गणोंके साथ आप इन सभीको क्षमा कीजिये ॥ ४-५ ॥
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८१२
एवं विज्ञापितस्तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
शमं जगाम संप्रीतो गणपस्तस्य गौरवात् ॥
देवाश्च लब्धावसरा देवदेवस्य मंत्रिणः ।
धारयन्तोऽञ्जलीन्मूर्ध्नि तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥
देवा ऊचुः
नमः शिवाय शान्ताय यज्ञहन्त्रे त्रिशूलिने ।
रुद्रभद्राय रुद्राणां पतये रुद्रभूतये ॥
कालाग्निरुद्ररूपाय कालकामाङ्गहारिणे ।
देवतानां शिरोहन्त्रे दक्षस्य च दुरात्मनः ॥
संसर्गादस्य पापस्य दक्षस्य क्लिष्टकर्मणः ।
शासिताः समरे वीर त्वया वयमनिन्दिताः ॥
दग्धाश्चामी वयं सर्वे त्वत्तो भीताश्च भो प्रभो ।
त्वमेव गतिरस्माकं त्राहि नः शरणागतान् ॥
वायुरुवाच
तुष्टस्त्वेवं स्तुतो देवान् विसृज्य निगडात्प्रभुः ।
आनयद्देवदेवस्य समीपममरानिह ॥
देवोऽपि तत्र भगवानन्तरिक्षे स्थितः प्रभुः ।
सगणः सर्वगः शर्वः सर्वलोकमहेश्वरः ॥
तं दृष्ट्वा परमेशानं देवा विष्णुपुरोगमाः ।
प्रीता अपि च भीताश्च नमश्चक्रुर्महेश्वरम् ॥
दृष्ट्वा तानमरान्भीतान्प्रणतार्तिहरो हरः ।
इदमाह महादेवः प्रहसन् प्रेक्ष्य पार्वतीम् ॥
महादेव उवाच
मा भैष्ट त्रिदशाः सर्वे यूयं वै मामकाः प्रजाः ।
अनुग्रहार्थमेवेह धृतो दंड: कृपालुना ॥
भवतां निर्जराणां हि क्षान्तोऽस्माभिर्व्यतिक्रमः ।
क्रुद्धेष्वस्मासु युष्माकं न स्थितिर्न च जीवितम् ॥
[ अ ० २३ उन परमेष्ठी ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना ६ करनेपर अति प्रसन्न हुए गणाधिप [ वीरभद्र ] उनके गौरवके कारण शान्त हो गये । देवता भी उचित | समय जानकर सिरपर अंजलि धारणकर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे देवदेव शिवके मन्त्री वीरभद्रकी ७ स्तुति करने लगे ॥६-७ ॥ देवगण बोले- शिव | त्रिशूलधारी, रुद्रभद्र, रुद्रपति ८ रुद्ररूप, काल तथा कामदेवके | देवताओं तथा दुरात्मा दक्षके ९ आपको नमस्कार है । हे वीर! , शान्तस्वरूप, यज्ञहन्ता, एवं रुद्रभूति, कालाग्नि-शरीरको विनष्ट करनेवाले सिरका छेदन करनेवाले यद्यपि हमलोग निरपराध हैं, फिर भी इस पापी दक्षके संसर्गके कारण आपने १० हमलोगोंको संग्राममें दण्ड दिया है ॥ ८ - १० ॥ हे प्रभो! आपने हमलोगोंको [ अपनी कोपाग्निसे ] ११ जला - सा दिया है, इसलिये हम आपसे डरे हुए हैं, अब आप ही हमारे रक्षक हैं, हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये ॥ ११ ॥
वायु बोले- इस प्रकार स्तुतिसे प्रसन्न हुए प्रभु वीरभद्र देवताओंको लोहेकी जंजीरसे मुक्त १२ करके उनको देवदेव [ शिव ] के समीप ले आये । उस समय सर्वसमर्थ, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वव्यापी भगवान् सदाशिव गणोंके साथ अन्तरिक्षमें विराजमान १३ थे ॥ १२-१३ ॥ उन परमेश्वरको देखकर विष्णु आदि देवताओंने १४ डरे होनेपर भी प्रसन्नतापूर्वक महेश्वरको प्रणाम
किया । ॥ १४ ॥
तब उन देवताओंको डरा हुआ देखकर दीनोंके १५ दुःखको दूर करनेवाले महादेव पार्वतीकी ओर देखकर देवताओंसे हँसते हुए यह कहने लगे- ॥ १५ ॥
महादेव बोले — हे देवताओ! डरिये मत, क्योंकि आप सभी लोग मेरी प्रजा हैं, कृपालु १६ वीरभद्रने अनुग्रहके लिये ही आपलोगोंको दण्डित । किया है । अब हमलोगोंने आप देवगणोंके अपराधको क्षमा कर दिया, हमलोगोंके क्रोधित हो जानेपर न आपलोगों की स्थिति रह सकती है और न जीवन रह १७ सकता है॥१६-१७ ॥
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अ ० २३ ] वायवीयसंहिता वायुरुवाच
इत्युक्तास्त्रिदशाः सर्वे शर्वेणामिततेजसा ।
सद्यो विगतसन्देहा ननृतुर्विबुधा मुदा ॥ १८
प्रसन्नमनसो भूत्वानन्दविह्वलमानसाः ।
स्तुतिमारेभिरे कर्तुं शंकरस्य दिवौकसः ॥ १ ९
देवा ऊचुः त्वमेव देवाखिललोककर्ता पाता च हर्ता परमेश्वरोऽसि । कविष्णुरुद्राख्यस्वरूपभेदै रजस्तमःसत्त्वधृतात्ममूर्त्ते ॥ २०
सर्वमूर्त्ते नमस्तेऽस्तु विश्वभावन पावन ।
अमूर्त्ते भक्तहेतोर्हि गृहीताकृतिसौख्यद ॥ २१
चंद्रोऽगदो हि देवेश कृपातस्तव शंकर ।
निमज्जनान्मृतः प्राप सुखं मिहिरजाजलिः ॥ २२
सीमन्तिनी हतधवा तव पूजनतः प्रभो ।
सौभाग्यमतुलं प्राप सोमवारव्रतात्सुतान् ॥ २३
श्रीकराय ददौ देवः स्वीयं पदमनुत्तमम् ।
सुदर्शनमरक्षस्त्वं नृपमंडलभीतितः ॥ २४
मेदुरं तारयामास सदारं च घृणानिधिः ।
शारदां विधवां चक्रे सधवां क्रियया ` भवान् ॥ २५
भद्रायुषो विपत्तिं च विच्छिद्य त्वमदाः सुखम् ।
सौमिनी भवबन्धाद्वै मुक्ताभूत्तव सेवनात् ॥ २६
विष्णुरुवाच
त्वं शंभो कहरीशाश्च रजस्सत्त्वतमोगुणैः ।
कर्ता पाता तथा हर्ता जनानुग्रहकांक्षया ॥ २७
सर्वगर्वापहारी च सर्वतेजोविलासकः ।
सर्वविद्यादिगूढश्च सर्वानुग्रहकारकः ॥ २८
( पूर्वखण्ड ) ८१३ वायु बोले- अमिततेजस्वी सदाशिवने सभी देवताओंसे ऐसा कहा, तब वे देवता शीघ्र ही सन्देहरहित होकर प्रसन्नतापूर्वक नाचने लगे ॥१८ ॥
वे देवता प्रसन्नचित्त तथा आनन्दविह्वल मनवाले होकर शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥ १ ९ ॥ देवगण बोले – हे देव! ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र नामक स्वरूपभेदोंसे रजोगुण, सत्त्वगुण तथा तमोगुणको धारण करनेवाले आत्ममूर्ते! आप कर्ता, पालक तथा संहारक परमेश्वर हैं । हे सर्वमूर्ते! हे विश्वभावन! हे पावन! हे अमूर्ते! हे भक्तोंको सुख देनेके लिये स्वरूप धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है ॥ २०-२१ ॥ हे देवेश! आपकी कृपासे ही चन्द्रमा [ यक्ष्माके ] रोगसे मुक्त हो गये । हे शंकर! मिहिरजाजलिने जलमें डूबकर मर जानेके बाद भी पुनः जीवित हो आपकी दयासे सुख प्राप्त किया ॥२२ ॥
हे प्रभो! सीमन्तिनीने सोमवारका व्रत करनेसे तथा आपके पूजनके प्रभावसे पतिके मर | जानेपर भी पुन: अतुल सौभाग्य तथा अनेक पुत्रोंको प्राप्त किया ॥२३ ॥
हे देव! आपने श्रीकरको अपना उत्तम पद प्रदान किया और राजाओंके भयसे सुदर्शनकी रक्षा की ॥ २४ ॥
आप कृपालुने स्त्रीसहित मेदुरका उद्धार किया और अपनी कृपासे विधवा शारदाको सधवा बना दिया ॥ २५ ॥
आपने भद्रायुकी विपत्ति दूर करके उसे सुख प्रदान किया और आपकी सेवाके प्रभावसे सौमिनी संसारबन्धनसे मुक्त हो गयी ॥ २६ ॥
विष्णु बोले- हे शिवजी! आप प्राणियोंपर अनुग्रह करनेकी कामनासे रज, सत्त्व और तमोगुणसे ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रमूर्ति धारणकर इस जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करते हैं ॥ २७ ॥
आप सभीका घमण्ड दूर करनेवाले हैं, सभीको तेज प्रदान करनेवाले, सभी विद्याओंमें गुप्त रूपसे निवास करनेवाले एवं सबपर अनुग्रह करनेवाले | हैं ॥ २८ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ ८१४
त्वत्तः सर्वं च त्वं सर्वं त्वयि सर्वं गिरीश्वर ।
त्राहि त्राहि पुनस्त्राहि कृपां कुरु ममोपरि ॥ २ ९
अथास्मिन्नन्तरे ब्रह्मा प्रणिपत्य कृतांजलिः ।
एवं त्ववसरं प्राप्य व्यज्ञापयत शूलिने ॥ ३०
ब्रह्मोवाच
जय देव महादेव प्रणतार्तिविभंजन ।
ईदृशेष्वपराधेषु कोऽन्यस्त्वत्तः प्रसीदति ॥३१
लब्धात्मानो भविष्यंति ये पुरा निहता मृधे ।
प्रत्यापत्तिर्न कस्य स्यात्प्रसन्ने परमेश्वरे ॥ ३२
यदिदं देवदेवानां कृतमन्तुषु दूषणम् ।
तदिदं भूषणं मन्ये त अंगीकारगौरवात् ॥ ३३
इति विज्ञाप्यमानस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
विलोक्य वदनं देव्या देवदेवः स्मयन्निव ॥ ३४
पुत्रभूतस्य वात्सल्याद् ब्रह्मणः पद्मजन्मनः ।
देवादीनां यथापूर्वमङ्गानि प्रददौ प्रभुः ॥ ३५
प्रमथाद्यैश्च या देव्यो दण्डिता देवमातरः ।
तासामपि यथापूर्वाण्यङ्गानि गिरिशो ददौ ॥ ३६
दक्षस्य भगवानेव स्वयं ब्रह्मा पितामहः ।
तत्पापानुगुणं चक्रे जरच्छागमुखं मुखम् ॥ ३७
सोऽपि संज्ञां ततो लब्ध्वा स दृष्ट्वा जीवितः सुधीः ।
भीतः कृताञ्जलिः शंभुं तुष्टाव प्रलपन्बहु ॥ ३८
दक्ष उवाच जय देव जगन्नाथ लोकानुग्रहकारक । | कृपां कुरु महेशानापराधं मे क्षमस्व ह ॥ ३ ९
कर्त्ता भर्त्ता च हर्ता च त्वमेव जगतां प्रभुः ।
मया ज्ञातं विशेषेण विष्ण्वादिसकलेश्वरः ॥ ४०
हे गिरीश्वर! आपसे सब कुछ है, आप ही हैं और सब कुछ आपमें ही स्थित है । मेरी सब | कुछ कीजिये, रक्षा कीजिये, पुनः रक्षा कीजिये और मुझपर रक्षा । दया कीजिये । इसके बाद उचित अवसर पाकर | ब्रह्माजी हाथ जोड़कर प्रणाम करके शिवजीसेइस प्रकार कहने लगे— ॥ २ ९ -३० ॥ ब्रह्माजी बोले- हे देव! भक्तोंका दुःख दूर करनेवाले! आपकी जय हो । इस प्रकारका अपराध करनेवालोंपर भी आपके अतिरिक्त और कौन प्रसन्न | हो सकता है! जो देवता इस संग्रामभूमिमें पहले मारे गये हैं, वे फिर जीवित हो उठें । [ आप ] परमेश्वरके प्रसन्न हो जानेपर किसकी अभ्युन्नति नहीं हो सकती है अर्थात् सभीका अभ्युदय ही होगा । हे देव! देवताओंके शरीरोंमें जो ये घाव हो गये हैं, आपके अंगीकार करनेके गौरवसे उन्हें मैं भूषण ही मानता हूँ॥३१–३३ ॥ परमेष्ठी ब्रह्माके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर पार्वतीके मुखकी ओर देखकर मुसकराते हुए देवदेव प्रभुने पुत्रस्वरूप कमलयोनि ब्रह्माके वात्सल्यके कारण देवताओंके अंगोंको पहलेकी भाँति कर दिया॥३४-३५ ॥ इसी प्रकार प्रमथोंके द्वारा जो देवियाँ तथा देवमाताएँ दण्डित की गयी थीं, सदाशिवने उनके भी अंगोंको पूर्वके समान कर दिया । स्वयं पितामह भगवान् ब्रह्माने दक्षके पापके अनुसार वृद्ध बकरेके मुखके समान उनका मुख बना दिया । इसके पश्चात् जीवित हुए वे बुद्धिमान् दक्ष भी चेतना प्राप्त करके शिवजीको देखकर भयभीत हो हाथ जोड़कर बहुत प्रलाप करते हुए शिवकी स्तुति र लगे- ॥ ३६-३८ ॥ दक्ष बोले- लोकपर अनुग्रह करनेवाले हे जगन्नाथ! हे देव! आपकी जय हो । हे महेशान! आप मुझपर कृपा कीजिये और मेरे अपराधको क्षमा । कीजिये । हे प्रभो! आप ही जगत्के कर्ता, भर्ता, हर्ता । तथा प्रभु हैं, मैं विशेषरूपसे जान गया कि आप विष्णु आदि सभीके ईश्वर हैं । आपने ही सारे जगत्का ।
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अ ० २३ ] वायवीयसंहिता
त्वयैव विततं सर्वं व्याप्तं सृष्टं च नाशितम् ।
न हि त्वदधिकाः केचिदीशास्तेऽच्युतकादयः ॥ ४१
वायुरुवाच
तं तथा व्याकुलं भीतं प्रलपन्तं कृतागसम् ।
स्मयन्निवावदत्प्रेक्ष्य मा भैरिति घृणानिधिः ॥ ४२
तथोक्त्वा ब्रह्मणस्तस्य पितुः प्रियचिकीर्षया ।
गाणपत्यं ददौ तस्मै दक्षायाक्षयमीश्वरः ॥ ४३
ततो ब्रह्मादयो देवा अभिवन्द्य कृतांजलिः ।
तुष्टुवुः प्रश्रया वाचा शंकरं गिरिजाधिपम् ॥ ४४
ब्रह्मादय ऊचुः
जय शंकर देवेश दीनानाथ महाप्रभो ।
कृपां कुरु महेशानापराधं नो क्षमस्व वै ॥ ४५
मखपाल मखाधीश मखविध्वंसकारक ।
कृपां कुरु महेशानापराधं नः क्षमस्व वै ॥ ४६
देवदेव परेशान भक्तप्राणप्रपोषक ।
दुष्टदण्डप्रदः स्वामिन्कृपां कुरु नमोऽस्तु ते ॥ ४७
त्वं प्रभो गर्वहर्ता वै दुष्टानां त्वामजानताम् ।
रक्षको हि विशेषेण सतां त्वत्सक्तचेतसाम् ॥ ४८
अद्भुतं चरितं ते हि निश्चितं कृपया तव ।
सर्वापराधः क्षन्तव्यो विभवो दीनवत्सलाः ॥ ४ ९
वायुरुवाच
इति स्तुतो महादेवो ब्रह्माद्यैरमरैः प्रभुः ।
स भक्तवत्सलः स्वामी तुतोष करुणोदधिः ॥ ५०
चकारानुग्रहं तेषां ब्रह्मादीनां दिवौकसाम् ।
ददौ वरांश्च सुप्रीत्या शंकरो दीनवत्सलः ॥५१
स च ततस्त्रिदशान् शरणागतान् परमकारुणिकः परमेश्वरः । अनुगतस्मितलक्षणया गिरा शमितसर्वभयः समभाषत ॥५२ ( पूर्वखण्ड ) ८१५ विस्तार किया है, आप सर्वत्र व्याप्त हैं, आप ही इसकी सृष्टि और विनाश करते हैं । विष्णु आदि कोई भी देवता आपसे बढ़कर नहीं हैं ॥ ३ ९ -४१ ॥ वायु बोले- तब अपराध किये हुए, व्याकुल, भयभीत तथा गिड़गिड़ाते हुए उन दक्षको देखकर करुणानिधि शिवजीने मुसकराते हुए कहा— ' [ हे दक्ष! ] भयभीत मत होइये । ' ऐसा कहकर शिवजीने उनके पिता ब्रह्माजीका प्रिय करनेकी इच्छासे दक्षको अक्षय गाणपत्यपद प्रदान किया । तदनन्तर ब्रह्मादि देवता हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनम्र वाणीमें गिरिजापति शंकरकी स्तुति करने लगे॥४२–४४ ॥ ब्रह्मा आदि [ देवता ] बोले- हे शंकर! हे देवेश! हे दीनानाथ! हे महाप्रभो! हे महेशान! कृपा कीजिये और हमारे अपराधको क्षमा कीजिये ॥ ४५ ॥
हे यज्ञपालक! हे यज्ञाधीश! हे दक्षयज्ञविध्वंस-कारक! हे महेशान! कृपा कीजिये और हमलोगोंके अपराधको क्षमा कीजिये । हे देवदेव! हे परेशान! हे भक्तप्राणपोषक! आप दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं । हे दुष्टदण्डप्रद स्वामिन्! कृपा करें, आपको नमस्कार है ॥ ४६-४७ ॥ हे प्रभो! जो आपको नहीं जानते - ऐसे दुष्टोंका आप गर्व दूर करते हैं और अपनेमें आसक्त चित्तवाले सत्पुरुषोंके आप रक्षक हैं ॥४८ ॥
हे प्रभो! आपकी दयासे ही अब हमलोगोंने निश्चय किया है कि आपका चरित्र अद्भुत है । हे दीनवत्सल प्रभो! हमारे द्वारा जो भी अपराध किये गये हैं, उन्हें क्षमा कर दीजिये ॥ ४ ९ ॥ वायु बोले- इस प्रकार ब्रह्मादि देवताओंद्वारा स्तुत वे करुणासागर, भक्तवत्सल प्रभु महादेव प्रसन्न हो गये । तब दीनवत्सल भगवान् शंकरने ब्रह्मा आदि देवगणोंपर अनुग्रह किया और अत्यन्त प्रेमपूर्वक उन्हें वर प्रदान किया । तत्पश्चात् सबके भयको दूर करनेवाले वे परम दयालु परमेश्वर शरणमें आये हुए देवताओंसे अनुगतोंके प्रति स्वाभाविक रूपसे । मन्दहास्ययुक्त वाणीमें कहने लगे- ॥ ५०–५२ ॥
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८१६ शिव उवाच यदिदमाग इहाचरितं सुरै-र्विधिनियोगवशादिव यन्त्रितैः शरणमेव गतानवलोक्य व-स्तदखिलं किल विस्मृतमेव नः तदिह यूयमपि प्रकृतं मन-स्यविगणय्य विमर्दमपत्रपाः हरिविरिञ्चिसुरेन्द्रमुखाः सुखं व्रजत देवपुरं प्रति संप्रति इति सुरानभिधाय सुरेश्वरो निकृतदक्षकृतक्रतुरक्रतुः स गिरिजानुचरः सपरिच्छदः स्थित इवाम्बरतोन्तरधाद्धरः ॥ अथ सुरा अपि ते विगतव्यथाः कथितभद्रसुभद्रपराक्रमाः सपदि खेन सुखेन यथासुखं श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ शिवजी बोले- देवताओंने यह जो अपराध । किया है, वह दैवकी परवशतासे ही किया है । अब । आपलोगोंको शरणागत देखकर हमने निश्चय ही वह ॥ ५३ समस्त अपराध भुला दिया ॥५३ ॥
हे विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्रादि देवगणो! अब । । आपलोग भी इस संग्रामभूमिमें अपनी दुर्दशाका मनमें ध्यान न करके लज्जाका परित्यागकर सुखपूर्वक ॥ ५४ । देवलोकको इस समय प्रस्थान करें । देवताओंसे ऐसा कहकर दक्ष - यज्ञका विनाशकर पार्वती एवं गणोंके साथ शिवजी आकाशमें विराजमान हो अन्तर्धान हो ५५ | गये ॥ ५४-५५ ॥ इसके पश्चात् व्यथारहित वे इन्द्रादि देवगण भी वीरभद्रके कल्याणकारी पराक्रमका वर्णन करते हुए सुखपूर्वक आकाशमार्गसे शीघ्र ही अपने - अपने
ययुरनेकमुखाः मघवन्मुखाः ॥ ५६ । स्थानोंको चले गये ॥५६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे गिरिशानुनयो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें गिरिशानुनय नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः शिवका तपस्याके लिये मन्दराचलपर गमन, मन्दराचलका वर्णन, शुम्भ - निशुम्भ दैत्यकी उत्पत्ति, ब्रह्माकी प्रार्थनासे उनके वधके लिये शिव और शिवाके विचित्र ऋषय ऊचुः
अन्तर्धानगतो देव्या सह सानुचरो हरः ।
क्व यातः कुत्र वा वासः किं कृत्वा विरराम ह ॥
वायुरुवाच
महीधरवरः श्रीमान् मंदरश्चित्रकंदरः ।
दयितो देवदेवस्य निवासस्तपसोऽभवत् ॥
तपो महत्कृतं तेन वोढुं स्वशिरसा शिवौ ।
चिरेण लब्धं तत्पादपंकजस्पर्शजं सुखम् ॥
लीला - प्रपंचका वर्णन तदनन्तर ऋषियोंने पूछा — प्रभो! अपने गणों तथा देवीके साथ अन्तर्धान होकर भगवान् शिव कहाँ १ गये, कहाँ रहे और क्या करके विरत हुए? ॥ १ ॥
वायुदेव बोले — महर्षियो! पर्वतोंमें श्रेष्ठ और विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित जो परम सुन्दर २ मन्दराचल है, वही अपनी तपस्याके प्रभावसे देवाधिदेव । महादेवजीका प्रिय निवास - स्थान हुआ । उसने पार्वती और शिवको अपने सिरपर ढोनेके लिये बड़ा भारी तप | किया था और दीर्घकालके बाद तब उसे उनके ३ । चरणारविन्दोंके स्पर्शका सुख प्राप्त हुआ ॥ २-३ ॥