शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 831–840
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
पृष्ठ 831
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८१७
तस्य शैलस्य सौन्दर्यं सहस्रवदनैरपि ।
न शक्यं विस्तराद्वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि ॥
शक्यमप्यस्य सौन्दर्यं न वर्णयितुमुत्सहे ।
पर्वतान्तरसौन्दर्य साधारणविधारणात् ॥
इदं तु शक्यते वक्तुमस्मिन्पर्वतसुन्दरे ।
ऋद्ध्या कयापि सौन्दर्यमीश्वरावासयोग्यता ॥
अत एव हि देवेन देव्याः प्रियचिकीर्षया ।
अतीव रमणीयोऽयं गिरिरन्तःपुरीकृतः ॥
मेखला भूमयस्तस्य विमलोपलपादपाः ।
शिवयोर्नित्यसान्निध्यान्यक्कुर्वन्त्यखिलं जगत् ॥
पितृभ्यां जगतो नित्यं स्नानपानोपयोगतः ।
अवाप्तपुण्यसंस्कारः प्रसरद्भिरितस्ततः ॥
लघुशीतलसंस्पर्शैरच्छाच्छैर्निर्झराम्बुभिः I ।
अधिराज्येन चाद्रीणामद्रीरेषोऽभिषिच्यते ॥
निशासु शिखरप्रान्तर्वर्तिना स शिलोच्चयः ।
चन्द्रेणाचलसाम्राज्यच्छत्रेणेव विराजते ॥
स शैलश्चंचलीभूतैर्बालैश्चामरयोषिताम् ।
सर्वपर्वतसाम्राज्यचामरैरिव वीज्यते ॥
प्रातरभ्युदिते भानौ भूधरो रत्नभूषितः ।
दर्पणे देहसौभाग्यं द्रष्टुकाम इव स्थितः ॥
उस पर्वतके सौन्दर्यका विस्तारपूर्वक वर्णन ४ सहस्रों मुखोंद्वारा सौ करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता । उसके सामने समस्त पर्वतोंका सौन्दर्य तुच्छ हो जाता है । उसका सौन्दर्यवर्णन सम्भव ही नहीं है, अतएव मुझमें उसके सौन्दर्यवर्णनके प्रति ५ उत्साह नहीं है॥४-५ ॥ इस सम्बन्धमें यही कहा जा सकता है कि इस ६ सुन्दर पर्वतपर किसी अपूर्व समृद्धिके कारण इसमें शिवजीके निवासकी योग्यता है । इसीलिये महादेवजीने देवीका प्रिय करनेकी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय ७ पर्वतको अपना अन्तःपुर बना लिया॥६-७ ॥ उस पर्वतकी मध्यवर्ती भूमियाँ, स्वच्छ ८ पाषाण तथा वृक्ष शिव तथा पार्वतीके नित्य सान्निध्यके कारण समस्त संसार [ के सौभाग्य ] -को तिरस्कृत करते हैं ॥८ ॥
संसारके माता - पिता देवी पार्वती तथा भगवान् ९ शंकरके स्नान, पान आदिके लिये इधर - उधर बहते हुए झरनोंका शीतल, निर्मल तथा सुपेय जल नित्यप्रति अर्पित करके [ यथेष्ट ] पुण्य संस्कारोंको प्राप्त किये हुए उस हिमालयका मानो पर्वतोंके अधिपति पदपर १० [ उन झरनोंके जलसे ] अभिषेक - सा किया जा रहा है॥९ -१० ॥ रात्रिके समय [ उदित हुआ ] चन्द्रमा हिमालयके शिखरपर स्थित है, [ जिससे प्रतीत ११ होता है कि ] मानो पर्वतोंके साम्राज्यपर अधिष्ठित उस गिरिराजके ऊपर चन्द्ररूपी राजछत्र शोभायमान हो रहा है ॥११ ॥
[ पर्वतीय भूमिपर विचरण करती हुई ] चमरी गायोंके हिलते हुए बालोंसे ऐसा प्रतीत हो रहा है १२ कि मानो समस्त पर्वतोंके साम्राज्यपर अधिष्ठित उस हिमालयके ऊपर चँवर डुलाये जा रहे हों । प्रभातकालमें उदित हुए सूर्यमें प्रतिबिम्बित - सा होता | हुआ हिमालय ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो रत्नभूषित वह पर्वतराज अपने देहसौन्दर्यको दर्पणमें देखनेको १३ | उद्यत - सा हो गया हो॥१२-१३ ॥
पृष्ठ 832
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८१८ कूजद्विहंगवाचालैर्वातोद्धूतलताभुजैः विमुक्तपुष्पैः सततं व्यालम्बिमृदुपल्लवैः लताप्रतानजटिलैस्तरुभिस्तापसैरिव जयाशिषा सहाभ्यर्च्य निषेव्यत इवाद्रिराट् ॥ अधोमुखैरूर्ध्वमुखैः शृंगैस्तिर्यङ्मुखैस्तथा श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ 1 लताजालरूपी जटाओंको धारण किये हुए वे ॥ १४ [ पर्वतीय ] वृक्ष वाचाल पक्षियोंके कलरव, लटकवे | हुए कोमल पल्लवों तथा वायुद्वारा कम्पित लताओंसे | झरते हुए पुष्पोंके द्वारा मानो तपस्वियोंकी भाँति गिरिराज हिमालयका समर्चन तथा आशीर्वाचनके १५ साथ विजया - भिनन्दन - सा करते हुए प्रतीत हो रहे हैं ॥ १४-१५ ॥ । ऊँचे, नीचे तथा तिरछे श्रृंगोंसे युक्त वह पर्वत प्रपतन्निव पाताले भूपृष्ठादुत्पतन्निव ॥१६ मानो पृथ्वीसे पातालमें गिर - सा रहा है अथवा
परीतः सर्वतो दिक्षु भ्रमन्निव विहायसि ।
पश्यन्निव जगत्सर्वं नृत्यन्निव निरन्तरम् ॥
गुहामुखैः प्रतिदिनं व्यात्तास्यो विपुलोदरैः ।
अजीर्णलावण्यतया जृंभमाण इवाचलः ॥
ग्रसन्निव जगत्सर्वं पिबन्निव पयोनिधिम् ।
वमन्निव तमोऽन्तस्थं माद्यन्निव खमम्बुदैः ॥
निवासभूमयस्तास्ता दर्पणप्रतिमोदराः ।
तिरस्कृतातपाः स्निग्धाश्रमच्छायामहीरुहाः ॥
सरित्सरस्तडागादिसंपर्कशिशिरानिलाः I तत्र तत्र निषण्णाभ्यां शिवाभ्यां सफलीकृताः ॥
तमिमं सर्वतः श्रेष्ठं स्मृत्वा साम्बस्त्रियम्बकः ।
रैभ्याश्रमसमीपस्थश्चान्तर्धानं गतो ययौ ॥
तत्रोद्यानमनुप्राप्य देव्या सह महेश्वरः ।
रराम रमणीयासु दिव्यान्तःपुरभूमिषु ॥
तथा गतेषु कालेषु प्रवृद्धासु प्रजासु च । भूपृष्ठसे ऊपरकी ओर उछल - सा रहा है या सभी दिशाओंमें व्याप्त होकर आकाशमें घूम - सा रहा है १७ अथवा सारे संसारको देखता हुआ सदा नृत्य - सा कर रहा है । वह पर्वत विस्तृत उदरवाली विशाल कन्दराओंके द्वारा मानो अपना मुख फैलाकर सौन्दर्यातिशयको अपनेमें न पचाकर जँभाई - सा ले १८ रहा हो या कि मानो सारे संसारको निगल - सा रहा हो, अथवा सागरको पी - सा रहा हो या अपने भीतर छिपे हुए अन्धकारका वमन - सा कर रहा हो अथवा १ ९ बादलोंसे आकाशको मदमत्त - सा करता हुआ प्रतीत हो रहा है॥१६–१९ ॥ दर्पणके समान [ उज्ज्वल ] अन्तर्देशवाली आवास-२० भूमियों तथा अपनी सघन तथा स्निग्ध छाया - से सूर्यके तापको दूर करनेवाले आश्रमके वृक्षों तथा नदियों, सरोवरों, तड़ागों आदिको छूकर बहनेवाली २१ शीतल हवाओंको उन शिवा - शिवने जहाँ - तहाँ विश्राम करके कृतकृत्य किया । इस सर्वश्रेष्ठ पर्वतका स्मरण करके रैभ्य - आश्रमके समीप स्थित हुए अम्बिकासहित २२ भगवान् त्रिलोचन वहाँसे अन्तर्धान होकर चले गये । मन्दराचलके उद्यानमें पहुँचकर देवी - सहित महेश्वर वहाँकी रमणीय तथा दिव्य अन्तःपुरकी भूमियों में २३ रमण करने लगे ॥ २०–२३ ॥ जब इस तरह कुछ समय बीत गया और दैत्यौ शुंभनिशुंभाख्यौ भ्रातरौ सम्बभूवतुः ॥ २४ [ ब्रह्माजीकी मैथुनी सृष्टिके द्वारा ] प्रजाएँ बढ़ गयीं, तब शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुए । ताभ्यां तपोबलाद्दत्तं ब्रह्मणा परमेष्ठिना | वे परस्पर भाई थे । उनके तपोबलसे प्रभावित हो अवध्यत्वं । । परमेष्ठी ब्रह्माने उन दोनों भाइयोंको यह वर दिया था जगत्यस्मिन्पुरुषैरखिलैरपि ॥ २५ । कि ' इस जगत्के किसी भी पुरुषसे तुम मारे नहीं जा
पृष्ठ 833
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८१ ९
अयोनिजा तु या कन्या ह्यम्बिकांशसमुद्भवा ।
अजातपुंस्पर्शरतिरविलंघ्यपराक्रमा ॥
तया तु नौ वधः संख्ये तस्यां कामाभिभूतयोः ।
इति चाभ्यर्थितो ब्रह्मा ताभ्यां प्राह तथास्त्विति ॥
ततः प्रभृति शक्रादीन्विजित्य समरे सुरान् ।
निःस्वाध्यायवषट्कारं जगच्चक्रतुरक्रमात् ॥
तयोर्वधाय देवेशं ब्रह्माभ्यर्थितवान्पुनः ।
विनिन्द्यापि रहस्यम्बां क्रोधयित्वा यथा तथा ॥
तद्वर्णकोशजां शक्तिमकामां कन्यकात्मिकाम् ।
निशुम्भशुम्भयोर्हन्त्री सुरेभ्यो दातुमर्हसि ॥
एवमभ्यर्थितो धात्रा भगवान्नीललोहितः ।
कालीत्याह रहस्यम्बां निन्दयन्निव सस्मितः ॥
ततः क्रुद्धा तदा देवी सुवर्णा वर्णकारणात् । स्मयन्ती चाह भर्तारमसमाधेयया गिरा देव्युवाच ईदृशे मम वर्णेऽस्मिन्न रतिर्भवतोऽस्ति चेत् । एवावन्तं चिरं कालं कथमेषा नियम्यते अरत्या वर्तमानोऽपि कथं च रमसे मया न ह्यशक्यं जगत्यस्मिन्नीश्वरस्य जगत्प्रभोः स्वात्मारामस्य भवतो रतिर्न सुखसाधनम् इति हेतोः स्मरो यस्मात्प्रसभं भस्मसात्कृतः या च नाभिरता भर्तुरपि सर्वांगसुन्दरी सा वृथैव हि जायेत सर्वैरपि गुणान्तरैः सकोगे । ' उन दोनोंने ब्रह्माजीसे यह प्रार्थना की थी २६ कि ' पार्वती देवीके अंशसे उत्पन्न जो अयोनिजा कन्या उत्पन्न हो, जिसे पुरुषका स्पर्श तथा रति नहीं प्राप्त हुई हो तथा जो अलंघ्य पराक्रमसे सम्पन्न हो, उसके प्रति कामभावसे पीड़ित होनेपर हम युद्धमें उसीके हाथों मारे जायँ । ' उनकी इस २७ प्रार्थनापर ब्रह्माजीने ' तथास्तु ' कहकर स्वीकृति दे दी ॥ २४–२७ ॥ तभीसे युद्धमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर २८ उन दोनोंने जगत्को अनीतिपूर्वक वेदोंके स्वाध्याय और वषट्कार आदिसे रहित कर दिया । तब ब्रह्माने उन दोनोंके वधके लिये देवेश्वर शिवसे प्रार्थना की-२ ९ ' प्रभो! आप एकान्तमें देवीकी निन्दा करके भी जैसे-तैसे उन्हें क्रोध दिलाइये और उनके रूप - रंगकी निन्दासे उत्पन्न हुई, कामभावसे रहित, कुमारीस्वरूपा ३० शक्तिको निशुम्भ और शुम्भके वधके लिये देवताओंको
अर्पित कीजिये । ' ॥ २८–३० ॥
ब्रह्माजीके इस तरह प्रार्थना करनेपर भगवान् ३१ नीललोहित रुद्र एकान्तमें पार्वतीकी निन्दा - सी करते हुए मुसकराकर बोले- ' तुम तो काली हो । ' तब सुन्दर वर्णवाली देवी पार्वती अपने श्यामवर्णके कारण ॥ ३२ आक्षेप सुनकर कुपित हो उठीं और पतिदेवसे मुसकराकर समाधानरहित वाणीद्वारा बोलीं- ॥ ३१-३२ ॥ देवीने कहा - – प्रभो! यदि मेरे इस काले रंगपर आपका प्रेम नहीं है तो इतने दीर्घकालसे अपनी ॥ ३३ इच्छाका आप दमन क्यों करते रहे हैं? ॥३३ ॥
जब आपको मेरे इस स्वरूपसे अरुचि थी, । ॥ ३४ तो आप मेरे साथ रमण क्यों करते रहे? हे जगत्के ईश्वर! आपके लिये अशक्य तो कुछ भी नहीं है । आप स्वात्मारामके लिये रति सुखका साधन नहीं है, । यही कारण है कि आपने बलपूर्वक कामदेवको भस्म ॥ ३५ कर दिया ॥ ३४-३५ ॥ कोई स्त्री कितनी ही सर्वांगसुन्दरी क्यों न । हो, यदि पतिका उसपर अनुराग नहीं हुआ तो अन्य ॥ ३६ समस्त गुणोंके साथ ही उसका जन्म लेना व्यर्थ हो योषिताम् । जाता है । स्त्रियोंकी यह सृष्टि ही पतिके अनुरागका भर्तुर्भोगैकशेषो हि सर्ग एवैष
पृष्ठ 834
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ ८२० ॥ ३७ / प्रधान अंग है । यदि वह उससे वंचित हो गयी तो तथासत्यन्यथा भूता नारी कुत्रोपयुज्यते
तस्माद्वर्णमिमं त्यक्त्वा त्वया रहसि निन्दितम् ।
वर्णान्तरं भजिष्ये वा न भजिष्यामि वा स्वयम् ॥ ३८
इत्युक्त्वोत्थाय शयनाद्देवी साचष्ट गद्गदम् ।
ययाचेऽनुमतिं भर्तुस्तपसे कृतनिश्चया ॥ ३ ९
तथा प्रणयभङ्गेन भीतो भूतपतिः स्वयम् ।
पादयोः प्रणमन्नेव भवानीं प्रत्यभाषत ॥ ४०
ईश्वर उवाच
अजानती च क्रीडोक्तिं प्रिये किं कुपितासि मे ।
रतिः कुतो वा जायेत त्वत्तश्चेदरतिर्मम ॥ ४१
माता त्वमस्य जगतः पिताहमधिपस्तथा ।
कथं तदुपपद्येत त्वत्तो नाभिरतिर्मम ॥ ४२
आवयोरभिकामोऽपि किमसौ कामकारितः ।
यतः कामसमुत्पत्तेः प्रागेव जगदुद्भवः ॥४३
पृथग्जनानां रतये कामात्मा कल्पितो मया ।
ततः कथमुपालब्धः कामदाहादहं त्वया ॥ ४४
मां वै त्रिदशसामान्यं मन्यमानो मनोभवः ।
मनाक्परिभवं कुर्वन्मया वै भस्मसात्कृतः ॥ ४५ ।
विहारोऽप्यावयोरस्य जगतस्त्राणकारणात् ।
ततस्तदर्थं त्वय्यद्य क्रीडोक्तिं कृतवानहम् ॥ ४६
स चायमचिरादर्थस्तवैवाविष्करिष्यते । ।
क्रोधस्य जनकं वाक्यं हृदि कृत्वेदमब्रवीत् ॥ ४७
देव्युवाच
श्रुतपूर्वं हि भगवंस्तव चाटुवचो मया ।
येनैवमतिधीराहमपि प्रागभिवञ्चिता ॥ ४८
| इसका और कहाँ उपयोग हो सकता है? इसलिये | आपने एकान्तमें जिसकी निन्दा की है, उस वर्णको त्यागकर अब में दूसरा वर्ण ग्रहण करूँगी अथवा स्वयं ही मिट जाऊँगी ॥ ३६–३८ ॥ ऐसा कहकर देवी पार्वती शय्यासे उठकर खड़ी हो गयीं और तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके । गद्गद कण्ठसे जानेकी आज्ञा माँगने लगीं । इस प्रकार प्रेम भंग होनेसे भयभीत हो भूतनाथ भगवान् शिव स्वयं भवानीके चरणोंमें मानो [ प्रणाम ] हुए - से बोले - ॥ ३ ९ -४० ॥ भगवान् शिवने कहा – प्रिये! मैंने क्रीडा या मनोविनोदके लिये यह बात कही है । मेरे इस अभिप्रायको न जानकर तुम कुपित क्यों हो गयीं? यदि तुमपर मेरा प्रेम नहीं होगा तो और किसपर हो सकता है? तुम इस जगत्की माता हो और मैं पिता तथा अधिपति हूँ । फिर तुमपर मेरा प्रेम न होना कैसे सम्भव हो सकता है! हम दोनोंका वह प्रेम भी क्या कामदेवकी प्रेरणासे हुआ है, कदापि नहीं; क्योंकि कामदेवकी उत्पत्तिसे पहले ही जगत्की उत्पत्ति हुई है । कामदेवकी सृष्टि तो मैंने साधारण लोगोंकी रतिके लिये की है । [ ऐसी दशामें ] तुम मुझे कामदाहका उलाहना क्यों दे रही हो? ॥ ४१-४४ ॥ कामदेव मुझे साधारण देवताके समान मानकर मेरा कुछ - कुछ तिरस्कार करने लगा था, अतः मैंने उसे भस्म कर दिया । हम दोनोंका यह लीलाविहार भी जगत्की रक्षाके लिये ही है, अतः उसीके लिये आज मैंने तुम्हारे प्रति यह परिहासयुक्त बात कही थी । मेरे इस कथनकी सत्यता तुमपर शीघ्र ही प्रकट हो जायगी । [ तब भगवान् शिवके उस ] क्रोधोत्पादक वचनको हृदयमें विचारकर देवीने कहना आरम्भ किया— ॥ ४५–४७ ॥ देवीने कहा – भगवन्! मैं पूर्वसे ही आपद्वारा कहे गये चाटुकारितापूर्ण वचनोंको सुनती आ रही हूँ, उन्हीं वचनोंके कारण धैर्यशालिनी [ या कि अतीव
पृष्ठ 835
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] वायवीयसंहिता
प्राणानप्यप्रिया भर्तुर्नारी या न परित्यजेत् ।
कुलांगना शुभा सद्भिः कुत्सितैव हि गम्यते ॥ ४ ९
भूयसी च तवाप्रीतिरगौरमिति मे वपुः ।
क्रीडोक्तिरपि कालीति घटते कथमन्यथा ॥ ५०
सद्भिर्विगर्हितं तस्मात्तव कार्यमसंमतम् ।
अनुत्सृज्य तपोयोगात्स्थातुमेवेह नोत्सहे ॥ ५१
शिव उवाच
यद्येवंविधतापस्ते तपसा किं प्रयोजनम् ।
ममेच्छया स्वेच्छया वा वर्णान्तरवती भव ॥ ५२
देव्युवाच
नेच्छामि भवतो वर्णं स्वयं वा कर्तुमन्यथा ।
ब्रह्माणं तपसाराध्य क्षिप्रं गौरी भवाम्यहम् ॥ ५३
ईश्वर उवाच
मत्प्रसादात्पुरा ब्रह्मा ब्रह्मत्वं प्राप्तवान्पुरा ।
तमाहूय महादेवि तपसा किं करिष्यसि ॥ ५४
देव्युवाच
त्वत्तो लब्धपदा एव सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ।
तथाप्याराध्य तपसा ब्रह्माणं त्वन्नियोगतः ॥ ५५
पुरा किल सती नाम्ना दक्षस्य दुहिताऽभवम् ।
जगतां पतिमेव त्वां पतिं प्राप्तवती तथा ॥ ५६
एवमद्यापि तपसा तोषयित्वा द्विजं विधिम् । ( पूर्वखण्ड ) ८२१ बुद्धिमती ] होकर भी मैं आपके द्वारा ठगी जाती रही । पतिके प्यारसे वंचित होनेपर जो नारी अपने प्राणोंका भी परित्याग नहीं कर देती, वह कुलांगना और शुभलक्षणा होनेपर भी सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित ही समझी जाती है । मेरा शरीर गौर वर्णका नहीं है, इस बातको लेकर आपको बहुत खेद होता है, अन्यथा क्रीडा या परिहासमें भी आपके द्वारा मुझे ' काली - कलूटी ' कहा जाना कैसे सम्भव हो सकता था । मेरा कालापन आपको प्रिय नहीं है, इसलिये वह सत्पुरुषोंद्वारा भी निन्दित है; अतः तपस्याद्वारा इसका त्याग किये बिना अब मैं यहाँ रह ही नहीं सकती ॥ ४८–५१ ॥ शिव बोले — यदि अपनी श्यामताको लेकर तुम्हें इस तरह संताप हो रहा है तो इसके लिये तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता है? तुम मेरी या अपनी इच्छामात्रसे ही दूसरे वर्णसे युक्त हो जाओ ॥५२ ॥
देवीने कहा- मैं आपसे अपने रंगका परिवर्तन नहीं चाहती । स्वयं भी इसे बदलनेका संकल्प नहीं कर सकती । अब तो तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना करके ही मैं शीघ्र गौरी हो जाऊँगी ॥ ५३ ॥
शिव बोले – - महादेवि! पूर्वकालमें मेरी ही । कृपासे ब्रह्माको ब्रह्मपदकी प्राप्ति हुई थी । अतः तपस्याद्वारा उन्हें बुलाकर तुम क्या करोगी? ॥५४ ॥
देवीने कहा- इसमें संदेह नहीं कि ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंको आपसे ही उत्तम पदोंकी प्राप्ति हुई है, तथापि आपकी आज्ञा पाकर मैं तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना करके ही अपना अभीष्ट सिद्ध करना चाहती हूँ । पूर्वकालमें जब मैं सतीके नामसे दक्षकी पुत्री हुई थी, तब तपस्याद्वारा ही मैंने आप जगदीश्वरको पतिके रूपमें प्राप्त किया था । इसी प्रकार आज भी तपस्याद्वारा ब्राह्मण ब्रह्माको संतुष्ट करके मैं गौरी होना चाहती हूँ । ऐसा करनेमें यहाँ क्या गौरी भवितुमिच्छामि को दोषः कथ्यतामिह ॥ ५७ दोष है? यह बताइये॥५५–५७ ॥
पृष्ठ 836
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८२२ एवमुक्तो महादेव्या न तां निर्बन्धयामास श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ स्मयन्निव । महादेवीके ऐसा कहनेपर वामदेव शिवजी वामदेवः । मुसकराते हुए - से चुप रह गये । देवताओंका कार्य | सिद्ध करनेकी इच्छासे उन्होंने देवीको रोकनेके
देवकार्यचिकीर्षया ॥ ५८ । लिये हठ नहीं किया ॥५८ ॥
सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे शिवमन्दरगिरिनिवास-इति श्रीशिवमहापुराणे क्रीडोक्तिवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें शिवमन्दरगिरिनिवास-क्रीडोक्तिवर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः पार्वतीकी तपस्या, व्याघ्रपर वार्तालाप, देवीके द्वारा उत्पन्न कौशिकीके वायुरुवाच
ततः प्रदक्षिणीकृत्य पतिमम्बा पतिव्रता ।
नियम्य च वियोगार्तिं जगाम हिमवगिरिम् ॥
तपः कृतवती पूर्वं देशे यस्मिन्सखीजनैः । तमेव देशमवृणोत्तपसे देशमवृणोत्तपसे प्रणयात्पुनः ॥
ततः स्वपितरं दृष्ट्वा मातरं च तयोर्गृहे ।
प्रणम्य वृत्तं विज्ञाप्य ताभ्यां चानुमता सती ॥
पुनस्तपोवनं गत्वा भूषणानि विसृज्य च ।
स्नात्वा तपस्विनो वेषं कृत्वा परमपावनम् ॥
संकल्प्य च महातीव्रं तपः परमदुश्चरम् ।
सदा मनसि सन्धाय भर्तुश्चरणपंकजम् ॥
तमेव क्षणिके लिङ्गे ध्यात्वा बाह्यविधानतः ।
त्रिसन्ध्यमभ्यर्चयन्ती वन्यैः पुष्पैः फलादिभिः ॥
स एव ब्रह्मणो मूर्तिमास्थाय तपसः फलम् ।
प्रदास्यति ममेत्येवं नित्यं कृत्वाऽकरोत्तपः ॥
तथा तपश्चरन्तीं तां काले बहुतिथे गते ।
दृष्टः कश्चिन्महाव्याघ्रो दुष्टभावादुपागमत् ॥
उनकी कृपा, ब्रह्माजीका देवीके साथ काली त्वचाका त्याग और उससे द्वारा शुम्भ - निशुम्भका वध वायुदेव कहते हैं— महर्षियो! तदनन्तर पतिव्रता माता पार्वती पतिकी परिक्रमा करके उनके वियोगसे १ होनेवाले दुःखको किसी तरह रोककर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥ १ ॥
उन्होंने पहले सखियोंके साथ जिस स्थानपर तप २ किया था, उस स्थानसे उनका प्रेम हो गया था । अत: फिर उसीको उन्होंने तपस्याके लिये चुना । तदनन्तर माता - पिताके घर जा उनका दर्शन और प्रणाम करके ३ उन्हें सब समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले उन्होंने सारे आभूषण उतार दिये और फिर तपोवनमें जा ४ स्नान पश्चात् तपस्वीका परमपावन वेष धारण | करके अत्यन्त तीव्र एवं परम दुष्कर तपस्या करनेका संकल्प किया । वे मन - ही - मन सदा पतिके चरणार-५ विन्दोंका चिन्तन करती हुई किसी क्षणिक लिंगमें उन्हींका ध्यान करके पूजनकी बाह्य विधिके अनुसार | जंगलके फल - फूल आदि उपकरणोंद्वारा तीनों समय ६ उनका पूजन करती थीं॥२–६ ॥ ' भगवान् शंकर ही ब्रह्माका रूप धारण करके ७ मेरी तपस्याका फल मुझे देंगे । ' ऐसा दृढ़ विश्वास । रखकर वे प्रतिदिन तपस्यामें लगी रहती थीं । इस तरह | तपस्या करते - करते जब बहुत समय बीत गया, तब ८ एक दिन उनके पास कोई बहुत बड़ा व्याघ्र देखा
पृष्ठ 837
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २५ वायवीयसंहिता
तथैवोपगतस्यापि तस्यातीव दुरात्मनः ।
गात्रं चित्रार्पितमिव स्तब्धं तस्याः सकाशतः ॥ ९
तं दृष्ट्वापि तथा व्याघ्रं दुष्टभावादुपागतम् ।
न पृथग्जनवद्देवी स्वभावेन विविच्यते ॥ १०
स तु विष्टब्धसर्वांगो बुभुक्षापरिपीडितः ।
ममामिषं ततो नान्यदिति मत्वा निरन्तरम् ॥ ११
निरीक्ष्यमाणः सततं देवीमेव तदाऽनिशम् ।
अतिष्ठदग्रतस्तस्या उपासनमिवाचरत् ॥ १२
देव्याश्च हृदये नित्यं ममैवायमुपासकः ।
त्राता च दुष्टसत्त्वेभ्य इति प्रववृते कृपा ॥ १३
तस्या एव कृपायोगात्सद्यो नष्टमलत्रयः ।
बभूव सहसा व्याघ्रो देवीं च बुबुधे तदा ॥ १४
न्यवर्तत बुभुक्षा च तस्याङ्गस्तम्भनं तथा । दौरात्म्यं जन्मसिद्धं च तृप्तिश्च समजायत । १५
तदा परमभावेन ज्ञात्वा कार्तार्थ्यमात्मनः ।
सद्योपासक एवैष सिषेवे परमेश्वरीम् ॥ १६
दुष्टानामपि सत्त्वानां तथान्येषां दुरात्मनाम् ।
स एव द्रावको भूत्वा विचचार तपोवने ॥ १७
तपश्च ववृधे देव्यास्तीव्रं तीव्रतरात्मकम् ।
देवाश्च दैत्यनिर्बन्धाद् ब्रह्माणं शरणं गताः ॥ १८
चक्रुर्निवेदनं देवाः स्वदुःखस्यारिपीडनात् ।
यथा च ददतुः शुम्भनिशुम्भौ वरसम्मदात् ॥ १ ९
सोऽपि श्रुत्वा विधिर्दुःखं सुराणां कृपयान्वितः । आसीद्दैत्यवधायैव यव स्मृत्वा हेत्वाश्रयां हेत्वाश्रयां कथाम् ॥ २०
सामरः प्रार्थितो ब्रह्मा ययौ देव्यास्तपोवनम् ।
संस्मरन्मनसा देवदुःखमोक्षं स्वयत्नतः ॥ २१
( पूर्वखण्ड ) ८२३ गया । वह दुष्टभावसे वहाँ आया था । पार्वतीजीके निकट आते ही उस दुरात्माका शरीर जडवत् हो गया । वह उनके समीप चित्रलिखित - सा दिखायी देने लगा ॥ ७ – ९ ॥ दुष्टभावसे पास आये हुए उस व्याघ्रको देखकर भी देवी पार्वती साधारण नारीकी भाँति स्वभावसे विचलित नहीं हुईं । उस व्याघ्रके सारे अंग अकड़ गये थे । वह भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था और यह सोचकर कि ' यही मेरा भोजन है ' निरन्तर देवीकी ओर ही देख रहा था । देवीके सामने खड़ा खड़ा वह रातों-दिन उनकी उपासना - सी करने लगा ॥ १०–१२ ॥ इधर देवीके हृदयमें सदा यही भाव आता था कि यह व्याघ्र मेरा ही उपासक है, दुष्ट वन - जन्तुओंसे मेरी रक्षा करनेवाला है । यह सोचकर वे उसपर कृपा करने लगीं । उन्हींकी कृपासे उसके तीनों प्रकारके मल तत्काल नष्ट हो गये । फिर तो उस व्याघ्रको सहसा देवीके स्वरूपका बोध हुआ, उसकी भूख मिट गयी और उसके अंगोंकी जडता भी दूर हो गयी । साथ ही उसकी जन्मसिद्ध दुष्टता नष्ट हो गयी और उसे निरन्तर तृप्ति बनी रहने लगी ॥ १३ – १५ ॥ उस समय उत्कृष्टरूपसे अपनी कृतार्थताका अनुभव करके वह तत्काल भक्त हो गया और उन परमेश्वरीकी सेवा करने लगा । अब वह अन्य दुष्ट जन्तुओंको खदेड़ता हुआ तपोवनमें विचरने लगा । इधर देवीकी तपस्या बढ़ी और तीव्रसे तीव्रतर होती गयी ॥ १६-१७१ / २ ॥ [ उसी समय ] देवता शुम्भ आदि दैत्योंके दुराग्रहसे दुखी हो ब्रह्माजीकी शरणमें गये । उन्होंने शत्रुपीडनजनित अपने दुःखको उनसे निवेदन किया । शुम्भ और निशुम्भ वरदान पानेके घमंडसे देवताओंको जैसे - जैसे दुःख देते थे, वह सब सुनकर ब्रह्माजीको उनपर बड़ी दया आयी । उन्होंने दैत्यवधके लिये भगवान् शंकरके साथ हुई बातचीतका स्मरण करके और अपने प्रयत्नसे देवताओंके दुःखनाशके विषयमें मन - ही - मन सोचते हुए देवताओंके प्रार्थना करनेपर उनके साथ देवीके तपोवनको प्रस्थान | किया ॥ १८-२१ ॥
पृष्ठ 838
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ ८२४
ददर्श च सुरश्रेष्ठः श्रेष्ठे तपसि निष्ठिताम् ।
प्रतिष्ठामिव विश्वस्य भवानीं परमेश्वरीम् ॥ २२
ननाम चास्य जगतो मातरं स्वस्य वै हरेः ।
रुद्रस्य च पितुर्भार्यामार्यामद्रीश्वरात्मजाम् ॥ २३
ब्रह्माणमागतं दृष्ट्वा देवी देवगणैः सहः ।
अर्घ्यं तदर्हं दत्त्वाऽस्मै स्वागताद्द्द्यैरुपाचरत् ॥ २४
तां च प्रत्युपचारोक्तिं पुरस्कृत्याभिनन्द्य च ।
पप्रच्छ तपसो हेतुमजानन्निव पद्मजः ॥२५
ब्रह्मोवाच
तीव्रेण तपसानेन देव्या किमिह साध्यते ।
तप: फलानां सर्वेषां त्वदधीना हि सिद्धयः ॥ २६
यश्चैव जगतां भर्ता तमेव परमेश्वरम् ।
भर्तारमात्मना प्राप्य प्राप्तं च तपसः फलम् ॥ २७
अथवा सर्वमेवैतत्क्रीडाविलसितं तव ।
इदं तु चित्रं देवस्य विरहं सहसे कथम् ॥ २८
देव्युवाच
सर्गादौ भवतो देवादुत्पत्तिः श्रूयते यदा ।
तदा प्रजानां प्रथमस्त्वं मे प्रथमजः सुतः ॥ २ ९
यदा पुनः प्रजावृद्ध्यै ललाटाद्भवतो भवः ।
उत्पन्नोऽभूत्तदा त्वं मे गुरुः श्वशुरभावतः ॥ ३०
यदाभवद्गिरीन्द्रस्ते पुत्रो मम पिता स्वयम् ।
तदा पितामहस्त्वं मे जातो लोकपितामह ॥ ३१
|
तदीदृशस्य भवतो लोकयात्राविधायिनः ।
वृत्तमन्तःपुरे भर्त्रा कथयिष्ये कथं पुनः ॥ ३२
|
किमत्र बहुना देहे यश्चायं मम कालिमा । ।
त्यक्त्वा सत्त्वविधानेन गौरी भवितुमुत्सहे ॥ ३३ ।
वहाँ सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने उत्तम तपमें परिनिष्ठित परमेश्वरी पार्वतीको देखा । वे सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा-सी जान पड़ती थीं । अपने, श्रीहरिके तथा रुद्रदेवके | भी जन्मदाता पिता महामहेश्वरकी भार्या आर्या जगन्माता गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजीको ब्रह्माजीने प्रणाम किया । | देवगणोंके साथ ब्रह्माजीको आया देख देवीने उनके योग्य अर्घ्य देकर स्वागत आदिके द्वारा उनका सत्कार । किया । बदलेमें उनका भी सत्कार और अभिनन्दन | करके ब्रह्माजी अनजानकी भाँति देवीकी तपस्याका कारण पूछने लगे॥२२–२५ ॥ ब्रह्माजी बोले – देवि! इस तीव्र तपस्याके | द्वारा आप यहाँ किस अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करना चाहती हैं? तपस्याके सम्पूर्ण फलोंकी सिद्धि तो आपके ही अधीन है । जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन्हीं परमेश्वरको पतिके रूपमें पाकर आपने तपस्याका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लिया है अथवा यह सारा ही क्रियाकलाप आपका लीलाविलास है । परंतु आश्चर्यकी बात तो यह है कि आप इतने दिनोंसे महादेवजीके विरहका कष्ट कैसे सह रही | हैं? ॥२६–२८ ॥ देवीने कहा – ब्रह्मन्! जब सृष्टिके आदिकालमें | महादेवजीसे आपकी उत्पत्ति सुनी जाती है, तब समस्त प्रजाओंमें प्रथम होनेके कारण आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र होते हैं । फिर जब प्रजाकी वृद्धिके लिये आपके ललाटसे भगवान् शिवका प्रादुर्भाव हुआ, तब आप मेरे पतिके पिता और मेरे श्वशुर होनेके कारण गुरुजनोंकी कोटिमें आ जाते हैं और जब मैं यह सोचती हूँ कि स्वयं मेरे पिता गिरिराज हिमालय आपके पुत्र हैं, तब आप मेरे साक्षात् पितामह लगते हैं । लोकपितामह! इस तरह आप लोकयात्राके विधाता हैं | अन्त: पुरमें पतिके साथ जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे मैं आपके सामने कैसे कह सकूँगी? अतः यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरे शरीरमें जो यह कालापन है, इसे सात्त्विक - विधिसे त्यागकर मैं गौरवर्णा होना चाहती हूँ ॥ २ ९ -३३ ॥
पृष्ठ 839
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २५ ] वायवीयसंहिता ब्रह्मोवाच
एतावता किमर्थेन तीव्रं देवि तपः कृतम् ।
स्वेच्छैव किमपर्याप्ता क्रीडेयं हि तवेदृशी ॥ ३४
क्रीडाऽपि च जगन्मातस्तव लोकहिताय वै ।
अतो ममेष्टमनया फलं किमपि साध्यताम् ॥ ३५
निशुंभशुंभनामानौ दैत्यौ दत्तवरौ मया ।
दृप्तौ देवान्प्रबाधेते त्वत्तो लब्धस्तयोर्वधः ॥ ३६
अलं विलम्बनेनात्र त्वं क्षणेन स्थिरा भव ।
शक्तिर्विसृज्यमानाद्य तयोर्मृत्युर्भविष्यति ॥ ३७
ब्रह्मणाऽभ्यर्थिता चैव देवी गिरिवरात्मजा । त्वक्कोशं सहसोत्सृज्य गौरी सा समजायत । ३८
सा त्वक्कोशात्मनोत्सृष्टा कौशिकी नाम नामतः ।
काली कालाम्बुदप्रख्या कन्यका समपद्यत ॥ ३ ९
सा तु मायात्मिका शक्तिर्योगनिद्रा च वैष्णवी ।
शंखचक्रत्रिशूलादिसायुधाष्टमहाभुजा ॥। ४०
सौम्या घोरा च मिश्रा च त्रिनेत्रा चन्द्रशेखरा ।
अजातपुंस्पर्शरतिरधृष्या चातिसुन्दरी ॥ ४१
दत्ता च ब्रह्मणे देव्या शक्तिरेषा सनातनी ।
निशुंभस्य च शुंभस्य निहन्त्री दैत्यसिंहयोः ॥ ४२
ब्रह्मणाऽपि प्रहृष्टेन तस्यै परमशक्तये ।
प्रबल: केसरी दत्तो वाहनत्वे समागतः ॥ ४३
( पूर्वखण्ड ) ८२५ ब्रह्माजी बोले - देवि! इतने ही प्रयोजनके लिये आपने ऐसा कठोर तप क्यों किया? क्या इसके लिये आपकी इच्छामात्र ही पर्याप्त नहीं थी? अथवा यह भी आपकी एक लीला ही है । जगन्मातः! आपकी लीला भी लोकहितके लिये ही होती है । अतः आप इसके द्वारा मेरे एक अभीष्ट फलकी सिद्धि कीजिये ॥ ३४-३५ ॥ निशुम्भ और शुम्भ नामक दो दैत्य हैं, उनको मैंने वर दे रखा है । इससे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है और वे देवताओंको सता रहे हैं । उन दोनोंको आपके ही हाथसे मारे जानेका वरदान प्राप्त हुआ है । अतः अब विलम्ब करनेसे कोई लाभ नहीं । आप क्षणभरके लिये सुस्थिर हो जाइये । आपके द्वारा जो शक्ति रची या छोड़ी जायगी, वही उन दोनोंके लिये मृत्युरूपा हो जायगी ॥ ३६-३७ ॥ ब्रह्माज़ीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर गिरिराज-कुमारी देवी पार्वती सहसा [ अपनी काली ] त्वचाके आवरणको उतारकर गौरवर्णा हो गयीं । त्वचाकोष ( काली त्वचामय आवरण ) - रूपसे त्यागी गयी जो उनकी शक्ति थी, उसका नाम ‘ कौशिकी ' हुआ । वह | काले मेघके समान कान्तिवाली कृष्णवर्णा कन्या हो गयी ॥ ३८-३९ ॥ देवीकी वह मायामयी शक्ति ही योगनिद्रा और वैष्णवी कहलाती है । उसके आठ बड़ी - बड़ी भुजाएँ थीं । उसने उन हाथोंमें शंख, चक्र और त्रिशूल आदि आयुध धारण कर रखे थे । उस देवीके तीन रूप हैं— सौम्य, घोर और मिश्र । वह तीन नेत्रोंसे युक्त थी । उसने मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण कर रखा था । उसे पुरुषका स्पर्श तथा रतिका योग नहीं प्राप्त था और वह [ दूसरोंसे ] अजेय थी एवं अत्यन्त सुन्दरी थी ॥ ४०-४१ ॥ देवीने अपनी इस सनातन शक्तिको ब्रह्माजीके हाथमें दे दिया । वही दैत्यप्रवर शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली हुई । उस समय प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने उस पराशक्तिको सवारीके लिये एक प्रबल सिंह प्रदान । किया, जो उनके साथ ही आया था॥४२-४३ ॥
पृष्ठ 840
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८२६ विन्ध्ये च वसतिं तस्याः पूजामासवपूर्वकैः मांसैर्मत्स्यैरपूपैश्च निर्वर्त्यासौ समादिशत् सा चैव संमता शक्तिर्ब्रह्मणो विश्वकर्मणः प्रणम्य मातरं गौरीं ब्रह्माणं चानुपूर्वशः शक्तिभिश्चापि तुल्याभिः स्वात्मजाभिरनेकशः परीता प्रययौ विन्ध्यं दैत्येन्द्रो हन्तुमुद्यता निहतौ च तया तत्र समरे दैत्यपुंगवौ तद्वाणैः कामबाणैश्च च्छिन्नभिन्नाङ्गमानसौ ॥ तद्युद्धविस्तरश्चात्र न कृतोऽन्यत्र वर्णनात् । ऊहनीयं परस्माच्च प्रस्तुतं वर्णयामि वः इति श्रीशिवमहापुराणे श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ उस देवीके रहनेके लिये ब्रह्माजीने विन्ध्य-। ॥ ४४ गिरिपर वासस्थान दिया और वहाँ नाना प्रकार । उपचारोंसे उसका पूजन किया । विश्वकर्मा ब्रह्माके । । द्वारा सम्मानित हुई वह शक्ति अपनी माता गौरीको ॥। ४५ और ब्रह्माजीको क्रमशः प्रणाम करके अपने हो | अंगोंसे उत्पन्न और अपने ही समान शक्तिशालिनी । | बहुसंख्यक शक्तियोंको साथ ले दैत्यराज शुम्भ-॥ ४६ निशुम्भको मारनेके लिये उद्यत होकर विन्ध्यपर्वतको चली गयी ॥ ४४-४६ ॥ । उसने समरांगणमें शुम्भ - निशुम्भके मन तथा ४७ शरीरको अपने हाव - भावरूप बाणों तथा [ वास्तविक ] बाणोंसे छिन्न - भिन्नकर उन दोनों दैत्यराजोंको मार गिराया । उस युद्धका अन्यत्र वर्णन हो चुका है, इसलिये उसकी विस्तृत कथा यहाँ नहीं कही गयी । दूसरे स्थलोंसे उसकी ऊहा कर लेनी चाहिये । अब ॥ ४८ । मैं प्रस्तुत प्रसंगका वर्णन करता हूँ ॥ ४७-४८ ॥ सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे देवीगौरत्वप्राप्तिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें देवीगौरत्व - प्राप्ति नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः ब्रह्माजीद्वारा दुष्कर्मी बतानेपर भी गौरीदेवीका शरणागत व्याघ्रको त्यागने से इनकार करना और माता -वायुरुवाच
उत्पाद्य कौशिकीं गौरी ब्रह्मणे प्रतिपाद्य ताम् ।
तस्य प्रत्युपकाराय पितामहमथाब्रवीत् ॥
देव्युवाच
दृष्टः किमेष भवता शार्दूलो मदुपाश्रयः ।
अनेन दुष्टसत्त्वेभ्यो रक्षितं मत्तपोवनम् ॥
मय्यर्पितमना एष भजते मामनन्यधीः ।
अस्य संरक्षणादन्यत्प्रियं मम न विद्यते ॥
भवितव्यमनेनातो ममान्तःपुरचारिणा ।
गणेश्वरपदं चास्मै प्रीत्या दास्यति शंकरः ॥
पितासे मिलकर मन्दराचलको जाना वायुदेवता कहते हैं — कौशिकीको उत्पन्न करके उसे ब्रह्माजीके हाथमें देनेके पश्चात् गौरी देवीने १ प्रत्युपकारके लिये पितामहसे कहा – ॥ १ ॥
देवी बोलीं- क्या आपने मेरे आश्रयमें | रहनेवाले इस व्याघ्रको देखा है? इसने दुष्ट जन्तुओंसे २ मेरे तपोवनकी रक्षा की है । यह मुझमें अपना मन । लगाकर अनन्यभावसे मेरा भजन करता रहा है । अतः ३ इसकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई मेरा प्रिय कार्य नहीं । है । यह मेरे अन्तः पुरमें विचरनेवाला होगा । भगवान् । ४ शंकर इसे + प्रसन्नतापूर्वक गणेश्वरका पद प्रदान ।