शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 841–850
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850
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अ ० २६ ] वायवीयसंहिता
एनमग्रेसरं कृत्वा सखीभिर्गन्तुमुत्सहे ।
प्रदीयतामनुज्ञा मे प्रजानां पतिना त्वया ॥ ५
इत्युक्तः प्रहसन्ब्रह्मा देवीं मुग्धामिव स्मयन् ।
तस्य तीव्रैः पुरावृत्तैदौरात्म्यं समवर्णयत् ॥ ६
ब्रह्मोवाच
पशौ देवि मृगाः क्रूराः क्व च तेऽनुग्रहः शुभः ।
आशीविषमुखे साक्षादमृतं किं निषिच्यते ॥ ७
व्याघ्रमात्रेण सन्नेष दुष्टः कोऽपि निशाचरः ।
अनेन भक्षिता गावो ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ॥ ८
तर्पयंस्तान् यथाकामं कामरूपी चरत्यसौ ।
अवश्यं खलु भोक्तव्यं फलं पापस्य कर्मणः ॥ ९
अतः किं कृपया कृत्यमीदृशेषु दुरात्मसु ।
अनेन देव्याः किं कृत्यं प्रकृत्या कलुषात्मना ॥ १०
देव्युवाच
यदुक्तं भवता सर्वं तथ्यमस्त्वयमीदृशः ।
तथापि मां प्रपन्नोऽभून्न त्याज्यो मामुपाश्रितः ॥ ११
ब्रह्मोवाच
अस्य भक्तिमविज्ञाय प्राग्वृत्तं ते निवेदितम् ।
भक्तिश्चेदस्य किं पापैर्न ते भक्तः प्रणश्यति ॥ १२
पुण्यकर्मापि किं कुर्य्यात्त्वदीयाज्ञानपेक्षया ।
अजा प्रज्ञा पुराणी च त्वमेव परमेश्वरी ॥ १३
त्वदधीना हि सर्वेषां बंधमोक्षव्यवस्थितिः ।
त्वदृते परमा शक्तिः संसिद्धिः कस्य कर्मणा ॥ १४
त्वमेव विविधा शक्तिः भवानामथ वा स्वयम् ।
अशक्तः कर्मकरणे कर्ता वा किं करिष्यति ॥ १५
विष्णोश्च मम चान्येषां देवदानवरक्षसाम् । ( पूर्वखण्ड ) ८२७ करेंगे । मैं इसे आगे करके सखियोंके साथ यहाँसे जाना चाहती हूँ । इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें; क्योंकि आप प्रजापति हैं ॥२-५ ॥ देवीके ऐसा कहनेपर उन्हें भोली - भाली जान हँसते और मुसकराते हुए ब्रह्माजी उस व्याघ्रकी पुरानी क्रूरतापूर्ण करतूतें बताते हुए उसकी दुष्टताका वर्णन करने लगे ॥६ ॥
ब्रह्माजीने कहा — देवि! कहाँ तो पशुओंमें क्रूर व्याघ्र और कहाँ यह आपकी मंगलमयी कृपा । आप विषधर सर्पके मुखमें साक्षात् अमृत क्यों सींच रही हैं? यह तो व्याघ्रके रूपमें रहनेवाला कोई दुष्ट निशाचर है । इसने बहुत - सी गौओं और तपस्वी ब्राह्मणोंको खा डाला है । यह उन सबको इच्छानुसार ताप देता हुआ मनमाना रूप धारण करके विचरता है । अतः इसे अपने पापकर्मका फल अवश्य भोगना चाहिये । ऐसे दुष्टोंपर आपको कृपा करनेकी क्या आवश्यकता है? स्वभावसे ही कलुषित चित्तवाले इस दुष्ट जीवसे देवीको क्या काम है? ॥ ७ – १० ॥ देवी बोलीं – आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है । यह ऐसा ही सही, तथापि मेरी शरणमें आ गया है । अतः मुझे इसका त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
ब्रह्माजीने कहा - देवि! इसकी आपके प्रति भक्ति है, इस बातको जाने बिना ही मैंने आपके समक्ष इसके पूर्वचरित्रका वर्णन किया है । यदि इसके भीतर भक्ति है तो पहलेके पापोंसे इसका क्या बिगड़नेवाला है; क्योंकि आपके भक्तका कभी नाश नहीं होता । जो | आपकी आज्ञाका पालन नहीं करता, वह पुण्यकर्मा होकर भी क्या करेगा? देवि! आप ही अजन्मा, बुद्धिमती, पुरातन शक्ति और परमेश्वरी हैं॥१२-१३ ॥ सबके बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था आपके ही अधीन है । आपके सिवा पराशक्ति कौन है? आपके बिना किसको कर्मजनित सिद्धि प्राप्त हो सकती है? आप ही स्वयमेव असंख्य रुद्रोंकी विविधरूपा शक्ति हैं । शक्तिरहित कर्ता काम करनेमें कौन - सी सफलता प्राप्त करेगा? भगवान् विष्णुको, मुझको तथा अन्य
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ ८२८ तत्तदैश्वर्यसम्प्राप्त्यै तवैवाज्ञा हि कारणम् ॥
अतीताः खल्वसंख्याता ब्रह्माणो हरयो भवाः ।
अनागतास्त्वसंख्यातास्त्वदाज्ञानुविधायिनः ॥
त्वामनाराध्य देवेशि पुरुषार्थचतुष्टयम् ।
लब्धुं न शक्यमस्माभिरपि सर्वैः सुरोत्तमैः ॥
व्यत्यासोऽपि भवेत्सद्यो ब्रह्मत्वस्थावरत्वयोः ।
सुकृतं दुष्कृतं चापि त्वयैव स्थापितं यतः ॥
त्वं हि सर्वजगद्भर्तुः शिवस्य परमात्मनः ।
अनादिमध्यनिधना शक्तिराद्या सनातनी ॥
समस्तलोकयात्रार्थं मूर्तिमाविश्य कामपि ।
क्रीडसे विविधैर्भावैः कस्त्वां जानाति तत्त्वतः ॥
अतो दुष्कृतकर्मापि व्याघ्रोऽयं त्वदनुग्रहात् ।
प्राप्नोतु परमां सिद्धिमत्र कः प्रतिबन्धकः ॥
इत्यात्मनः परं भावं स्मारयित्वानुरूपतः ।
ब्रह्मणाभ्यर्थिता गौरी तपसोऽपि न्यवर्तत ॥
ततो देवीमनुज्ञाप्य ब्रह्मण्यन्तर्हिते सति ।
देवीं च मातरं दृष्ट्वा मेनां हिमवता सह ॥
प्रणम्याश्वास्य बहुधा पितरौ विरहासहौ ।
तपः प्रणयिनो देवी तपोवनमहीरुहान् ॥
विप्रयोगशुचेवाग्रे पुष्पबाष्पं विमुञ्चतः ।
तत्तच्छाखासमारूढविहगोदीरितै रुतैः ॥
व्याकुलं बहुधा दीनं विलापमिव कुर्वतः । १६ देवता, दानव और राक्षसोंको उन - उन ऐश्वर्योंकी प्राप्ति करानेके लिये आपकी आज्ञा ही कारण | असंख्य ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र, जो आपकी आज्ञाका है । १७ | पालन करनेवाले हैं, बीत चुके हैं और भविष्य में भी । होंगे । देवेश्वरि! आपकी आराधना किये बिना हम सब श्रेष्ठ देवता भी धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी १८ प्राप्ति नहीं कर सकते ॥ १४–१८ ॥ आपके संकल्पसे ब्रह्मत्व और स्थावरत्वका १ ९ तत्काल व्यत्यास ( फेर - बदल ) भी हो जाता है अर्थात् ब्रह्मा स्थावर ( वृक्ष आदि ) हो जाता है और | स्थावर ब्रह्मा; क्योंकि पुण्य और पापके फलोंकी व्यवस्था आपने ही की है । आप ही जगत्के स्वामी २० परमात्मा शिवकी अनादि, अमध्य और अनन्त सनातन आदिशक्ति हैं ॥ १ ९ -२० ॥ आप सम्पूर्ण लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये २१ किसी अद्भुत मूर्तिमें आविष्ट हो नाना प्रकारके भावोंसे क्रीड़ा करती हैं । भला, आपको ठीक - ठीक कौन जानता है । अतः यह पापाचारी व्याघ्र भी आज २२ आपकी कृपासे परम सिद्धि प्राप्त करे, इसमें कौन बाधक हो सकता है॥२१-२२ ॥ इस प्रकार [ देवीको ] उनके परम तत्त्वका २३ स्मरण कराकर ब्रह्माजीने जब उचित प्रार्थना की, तब गौरीदेवी तपस्यासे निवृत्त हुईं । तदनन्तर देवीकी आज्ञा लेकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये । फिर देवीने २४ अपने वियोगको न सह सकनेवाले माता - पिता मेना और हिमवान्का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया तथा उन्हें नाना प्रकारसे आश्वासन दिया । इसके बाद २५ देवीने तपस्याके प्रेमी तपोवनके वृक्षोंको देखा । वे । उनके सामने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे । ऐसा जान पड़ता था, मानो उनसे होनेवाले वियोगके शोकसे २६ । पीड़ित हो वे आँसू बरसा रहे हों । अपनी शाखाओंपर | बैठे हुए विहंगमोंके कलरवोंके व्याजसे मानो वे | व्याकुलतापूर्वक नाना प्रकारसे दीनतापूर्ण विलाप कर रहे थे ॥ २३-२६१ / ३ ॥
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अ ० २७ ] वायवीयसंहिता सखीभ्यः कथयन्त्वेवं सत्त्वरा भर्तृदर्शने ॥ २७
पुरस्कृत्य च तं व्याघ्रं स्नेहात्पुत्रमिवौरसम् ।
देहस्य प्रभया चैव दीपयन्ती दिशो दश ॥ २८
प्रययौ मन्दरं गौरी यत्र भर्ता महेश्वरः ।
सर्वेषां जगतां धाता कर्ता पाता विनाशकृत् ॥ २ ९
( पूर्वखण्ड ) ८२ ९ तदनन्तर पतिके दर्शनके लिये उतावली हो उस व्याघ्रको औरस पुत्रकी भाँति स्नेहसे आगे करके सखियोंसे बातचीत करती और देहकी दिव्य प्रभासे दसों दिशाओंको उद्दीपित करती हुई गौरीदेवी मन्दराचलको चली गयीं, जहाँ सम्पूर्ण जगत्के आधार, स्रष्टा, पालक और संहारक पतिदेव महेश्वर विराजमान थे ॥ २७–२९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे व्याघ्रगतिवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ शिवाय
॥। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें व्याघ्रगतिवर्णन नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
15 अथ सप्तविंशोऽध्यायः मन्दराचलपर गौरीदेवीका स्वागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्धका प्रकाशन तथा देवीके साथ आये हुए व्याघ्रको उनका गणाध्यक्ष सोमनन्दी नामसे ऋषय ऊचुः
कृत्वा गौरं वपुर्दिव्यं देवी गिरिवरात्मजा ।
कथं ददर्श भर्तारं प्रविष्टा मन्दिरं सती ॥ १
प्रवेशसमये तस्या भवनद्वारगोचरैः ।
गणेशैः किं कृतं देवस्तां दृष्ट्वा किं तदाकरोत् ॥ २
वायुरुवाच
प्रवक्तुमञ्जसाशक्यः तादृशः परमो रसः ।
येन प्रणयगर्भेण भावो भाववतां हृतः ॥ ३
द्वाःस्थैः ससंभ्रमैरेव देवो देव्यागमोत्सुकः ।
शंकमाना प्रविष्टान्तस्तं च सा समपश्यत ॥ ४
तैस्तैः प्रणयभावैश्च भवनान्तरवर्तिभिः गणेन्द्रैर्वन्दिता वाचा प्रणनाम त्रियम्बकम् ॥ ५ बनाकर अन्तःपुरके द्वारपर प्रतिष्ठित करना ऋषियोंने पूछा- अपने शरीरको दिव्य गौरवर्णसे युक्त बनाकर गिरिराजकुमारी देवी पार्वतीने जब मन्दराचल प्रदेशमें प्रवेश किया, तब वे अपने पतिसे किस प्रकार मिलीं? प्रवेशकालमें उनके भवनद्वारपर रहनेवाले गणेश्वरोंने क्या किया तथा महादेवजीने भी उन्हें देखकर उस समय उनके साथ कैसा बर्ताव किया? ॥ १-२ ॥ वायुदेवताने कहा — जिस प्रेमगर्भित रसके द्वारा अनुरागी पुरुषोंके मनका हरण हो जाता है, उस परम रसका ठीक - ठीक वर्णन करना असम्भव है । द्वारपाल बड़ी उतावलीसे राह देखते थे । उनके साथ ही महादेवजी भी देवीके आगमनके लिये उत्सुक थे । जब वे भवनमें प्रवेश करने लगीं, तब शंकित हो उन - उन प्रेमजनित भावोंसे वे उनकी ओर देखने लगे । देवी भी उनकी ओर उन्हीं भावोंसे देख रही थीं । उस समय उस भवनमें रहनेवाले श्रेष्ठ पार्षदोंने देवीकी वन्दना की । फिर देवीने विनययुक्त वाणीद्वारा भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम किया ॥ ३५ ॥
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८३० प्रणम्य नोत्थिता यावत्तावत्तां परमेश्वरः दोर्भ्यामाश्लिष्य परितः परया मुदा प्रगृह्य स्वाङ्के धर्तुं प्रवृत्तोऽपि सा पर्यङ्के न्यषीदत पर्यङ्कृतो बलाद्देवीं सोऽङ्कमारोप्य सुस्मिताम् ॥
सस्मितो विवृतैर्नेत्रैस्तद्वक्त्रं प्रपिबन्निव ।
तया संभाषणायेश: पूर्वभाषितमब्रवीत् ॥
देवदेव उवाच
सा दशा च व्यतीता किं तव सर्वांगसुन्दरि ।
यस्यामनुनयोपायः कोऽपि कोपान्न लभ्यते ॥
स्वेच्छयापि न कालीति नान्यवर्णवतीति च ।
त्वत्स्वभावहृतं चित्तं सुभ्रु चिंतावहं मम ॥
विस्मृतः परमो भावः कथं स्वेच्छाङ्गयोगतः ।
न सम्भवन्ति ये तत्र चित्तकालुष्यहेतवः ॥
पृथग्जनवदन्योऽन्यं विप्रियस्यापि कारणम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ । वे प्रणाम करके अभी उठने भी नहीं पायी थीं कि परमेश्वरने उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर ॥ ६ आनन्दके साथ हृदयसे लगा लिया ॥६ ॥ बड़े
। उन्हें वे अपनी गोदमें ही बिठानेके लिये तत्पर ७ हुए, पर तबतक पार्वती पलंगपर बैठ गयीं । फिर | इसके बाद शिवजीने मधुर मुसकानसे समन्वित हुई | देवीको बलपूर्वक पलंगसे उठाकर अपनी गोदमें बैठा । लिया । फिर मुसकराते हुए वे एकटक नेत्रोंसे उनके । मुखचन्द्रकी सुधाका पान - सा करने लगे 1 । फिर उनसे ८ बातचीत करनेके लिये उन्होंने पहले अपनी औरसे वार्ता आरम्भ की ॥ ७-८ ॥ देवाधिदेव महादेवजी बोले – सर्वांगसुन्दरि प्रिये! क्या तुम्हारी वह मनोदशा दूर हो गयी, जिसके ९ रहते तुम्हारे क्रोधके कारण मुझे अनुनय - विनयका कोई भी उपाय नहीं सूझता था । मेरा मन स्वेच्छासे भी नहीं, तुम्हारे काले वर्णसे नहीं अथवा अन्य किसी वर्णसे अपहृत नहीं हुआ, जैसा कि तुम्हारे स्वभावसे १० अपहृत है । जिसके कारण हे सुभ्रु! मैं बहुत ही चिन्तित हो गया था॥९ -१० ॥ जो भाव स्वेच्छापूर्वक परस्पर अंगके संयोगसे ११ उत्पन्न नहीं होते, ऐसे परम [ भावरूप ] रसको तुमने कैसे भुला दिया? अंगसंयोगसे उत्पन्न भाव तो चित्तमें कालुष्यके हेतु बनते हैं । यदि साधारण लोगोंकी भाँति हम दोनोंमें भी एक - दूसरेके अप्रियका कारण विद्यमान आवयोरपि यद्यस्ति नास्त्येवैतच्चराचरम् ॥१२ है, तब तो इस चराचर जगत्का नाश हुआ ही
अहमग्निशिरोनिष्ठस्त्वं सोमशिरसि स्थिता ।
अग्नीषोमात्मकं विश्वमावाभ्यां समधिष्ठितम् ॥
जगद्धिताय चरतोः स्वेच्छाधृतशरीरयोः ।
आवयोर्विप्रयोगे हि स्यान्निरालम्बनं जगत् ॥
अस्ति हेत्वन्तरं चात्र शास्त्रयुक्तिविनिश्चितम् ।
वागर्थमिव चैवैतज्जगत्स्थावरजंगमम् ॥
त्वं हि वागमृतं साक्षादहमर्थामृतं परम् ।
द्वयमप्यमृतं कस्माद्वियुक्तमुपपद्यते ॥
समझना चाहिये ॥ ११-१२ ॥
मैं अग्निके मस्तकपर स्थित हूँ और तुम सोमके । हम दोनोंसे ही यह अग्नि - सोमात्मक जगत् १३ प्रतिष्ठित है । जगत्के हितके लिये स्वेच्छासे शरीर धारण करके विचरनेवाले हम दोनोंके वियोगमें यह १४ जगत् निराधार हो जायगा । इसमें शास्त्र और युक्तिसे | निश्चित किया हुआ दूसरा हेतु भी है । यह स्थावर-१५ जंगमरूप जगत् वाणी और अर्थमय ही है । तुम | साक्षात् वाणीमय अमृत हो और मैं अर्थमय परम । उत्तम अमृत हूँ । ये दोनों अमृत एक - दूसरे से विलग १६ | कैसे हो सकते हैं? ॥ १३–१६ ॥
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अ ० २७ ] वायवीयसंहिता
विद्याप्रत्यायिका त्वं मे वेद्योऽहं प्रत्ययात्तव ।
विद्यावेद्यात्मनोरेव विश्लेषः कथमावयोः ॥ १७
न कर्मणा सृजामीदं जगत्प्रतिसृजामि च ।
सर्वस्याज्ञैकलभ्यत्वादाज्ञात्वं हि गरीयसी ॥ १८
आज्ञैकसारमैश्वर्यं यस्मात्स्वातन्त्र्यलक्षणम् ।
आज्ञया विप्रयुक्तस्य चैश्वर्यं मम कीदृशम् ॥ १ ९
न कदाचिदवस्थानमावयोर्विप्रयुक्तयोः ।
देवानां कार्यमुद्दिश्य लीलोक्तिं कृतवानहम् ॥ २०
त्वयाप्यविदितं नास्ति कथं कुपितवत्यसि ।
ततस्त्रिलोकरक्षार्थे कोपो मय्यपि ते कृतः ॥ २१
यदनर्थाय भूतानां न तदस्ति खलु त्वयि ।
इति प्रियंवदे साक्षादीश्वरे परमेश्वरे ॥ २२
श्रृंगारभावसाराणां जन्मभूमिरकृत्रिमा ।
स्वभर्त्रा ललितं तथ्यमुक्तं मत्वा स्मितोत्तरम् ॥ २३
लज्जया न किमप्यूचे कौशिकी वर्णनात्परम् ।
तदेव वर्णयाम्यद्य शृणु देव्याश्च वर्णनम् ॥ २४
देव्युवाच
किं देवेन न सा दृष्टा या सृष्टा कौशिकी मया ।
तादृशी कन्यका लोके न भूता न भविष्यति ॥ २५
तस्या वीर्यं बलं विन्ध्यनिलयं विजयं तथा ।
शुंभस्य च निशुंभस्य मारणे च रणे तयोः ॥ २६
प्रत्यक्षफलदानं च लोकाय भजते सदा ।
लोकानां रक्षणं शश्वद् ब्रह्मा विज्ञापयिष्यति ॥ २७
( पूर्वखण्ड ) ८३१ तुम मेरे स्वरूपका बोध करानेवाली विद्या हो और मैं तुम्हारे दिये हुए विश्वासपूर्ण बोधसे जाननेयोग्य परमात्मा हूँ । हम दोनों क्रमश: विद्यात्मा और वेद्यात्मा हैं, फिर हममें वियोग होना कैसे सम्भव है? मैं अपने प्रयत्नसे जगत्की सृष्टि और संहार नहीं करता । एकमात्र
आज्ञासे ही सबकी सृष्टि और संहार उपलब्ध होते हैं ।
वह अत्यन्त गौरवपूर्ण आज्ञा तुम्हीं हो ॥ १७-१८ ॥
ऐश्वर्यका एकमात्र सार आज्ञा ( शासन ) है, क्योंकि वही स्वतन्त्रताका लक्षण है । आज्ञासे वियुक्त होनेपर मेरा ऐश्वर्य कैसा होगा । हमलोगोंका एक-दूसरेसे विलग होकर रहना कभी सम्भव नहीं है । देवताओंके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे ही मैंने [ उस दिन ] लीलापूर्वक व्यंग्य वचन कहा था ॥ १ ९ -२० ॥ तुम्हें भी तो यह बात अज्ञात नहीं थी । फिर तुम कुपित कैसे हो गयीं! अतः यही कहना पड़ता है कि तुमने भी मुझपर जो क्रोध किया था, वह त्रिलोकीकी रक्षाके लिये ही था; क्योंकि तुममें ऐसी कोई बात नहीं है, जो जगत्के प्राणियोंका अनर्थ करनेवाली हो ॥ २११/२ ॥ इस प्रकार प्रिय वचन बोलनेवाले साक्षात् परमेश्वर शिवके प्रति शृंगाररसके सारभूत भावोंकी प्राकृतिक जन्मभूमि देवी पार्वती अपने पतिकी कही हुई यह मनोहर बात सुनकर तथा इसे सत्य जान मुसकराकर रह गयीं, लज्जावश कोई उत्तर न दे सकीं । केवल | कौशिकी [ के यश ] -का वर्णन छोड़कर और कुछ उन्होंने नहीं कहा । देवीने कौशिकीके विषयमें जो कुछ कहा, उसका वर्णन करता हूँ॥२२–२४ ॥ देवी बोलीं- ' भगवन्! मैंने जिस कौशिकीकी सृष्टि की है, उसे क्या आपने नहीं देखा है? वैसी कन्या न तो इस लोकमें हुई है और न होगी । ' यों कहकर देवीने उसके विन्ध्यपर्वतपर निवास करने तथा समरांगणमें शुम्भ और निशुम्भका वध करके उनपर विजय पानेका प्रसंग सुनाकर उसके बल पराक्रमका वर्णन किया । साथ ही यह भी बताया कि वह उपासना करनेवाले लोगोंको सदा प्रत्यक्ष फल देती है तथा निरन्तर लोकोंकी रक्षा करती रहती है । इस विषयमें ब्रह्माजी आपको आवश्यक बातें बतायेंगे ॥ २५-२७ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ ८३२
इति संभाषमाणाया देव्या एवाज्ञया तदा ।
व्याघ्रः सख्या समानीय पुरोऽवस्थापितस्तदा ॥
तं प्रेक्ष्याह पुनर्देवी देवानीतमुपायनम् ।
व्याघ्रं पश्य न चानेन सदृशो मदुपासकः ॥
अनेन दुष्टसंघेभ्यो रक्षितं मत्तपोवनम् ।
अतीव मम भक्तश्च विश्रब्धश्च स्वरक्षणात् ॥
स्वदेशं च परित्यज्य प्रसादार्थं समागतः ।
यदि प्रीतिरभून्मत्तः परां प्रीतिं करोषि मे ॥
नित्यमन्तःपुरद्वारि नियोगान्नन्दिनः स्वयम् ।
रक्षिभिः सह तच्चिनैर्वर्ततामयमीश्वर ॥
वायुरुवाच
मधुरं प्रणयोदर्कं श्रुत्वा देव्याः शुभं वचः ।
प्रीतोऽस्मीत्याह तं देवः स चादृश्यत तत्क्षणात् ॥
बिभ्रत्रतां हैमीं रत्नचित्रं च कञ्चकम् ।
छुरिकामुरगप्रख्यां गणेशो रक्षवेषधृक् ॥
यस्मात्सोमो महादेवो नन्दी चानेन नन्दितः ।
सोमनन्दीति विख्यातस्तस्मादेष समाख्यया ॥
इत्थं देव्याः प्रियं कृत्वा देवश्चार्द्धेन्दुभूषणः ।
भूषयामास तं दिव्यैर्भूषणै रत्नभूषितैः ॥
ततः स गौरीं गिरिशो गिरीन्द्रजां
सगौरवां सर्वमनोहरां हरः ।
पर्यङ्कमारोप्य वराङ्गभूषणै-विभूषयामास शशाङ्कभूषणः ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां उस समय इस प्रकार बातचीत करती २८ देवीकी आज्ञासे ही एक सखीने उस व्याघ्रको लाकर हुई । उनके सामने खड़ा कर दिया । उसे देखकर देवी कहने | लगीं- ' देव! यह व्याघ्र मैं आपके लिये भेंट लायी
हूँ । आप इसे देखिये । इसके समान मेरा उपासक ।
२ ९ दूसरा कोई नहीं है ॥ २८-२९ ॥
इसने दुष्ट जन्तुओंके समूहसे मेरे तपोवनकी ३० रक्षा की थी । यह मेरा अत्यन्त भक्त है और अपने । । रक्षणात्मक कार्यसे मेरा विश्वासपात्र बन गया है । मेरी प्रसन्नताके लिये यह अपना देश छोड़कर यहाँ आ ३१ गया है । महेश्वर! यदि मेरे आनेसे आपको प्रसन्नता । हुई है और यदि आप मुझसे अत्यन्त प्रेम करते हैं तो मैं चाहती हूँ कि यह नन्दीकी आज्ञासे मेरे अन्तःपुरके ३२ द्वारपर अन्य रक्षकोंके साथ उन्हींके चिह्न धारण करके सदा स्थित रहे ॥ ३०-३२ ॥ वायुदेव कहते हैं— देवीके इस मधुर और अन्ततोगत्वा प्रेम बढ़ानेवाले शुभ वचनको सुनकर ३३ महादेवजीने कहा- ' मैं बहुत प्रसन्न हूँ । ' फिर तो वह व्याघ्र उसी क्षण लचकती हुई सुवर्णजटित बेंतकी छड़ी, रत्नोंसे जटित विचित्र कवच, सर्पकी - सी ३४ आकृतिवाली छुरी तथा रक्षकोचित वेष धारण किये गणाध्यक्ष पदपर प्रतिष्ठित दिखायी दिया ॥ ३३-३४ ॥ उसने उमासहित महादेव [ और नन्दी ] - को । ३५ आनन्दित किया था । इसलिये सोमनन्दी नामसे विख्यात हुआ । इस प्रकार देवीका प्रिय कार्य करके चन्द्रार्धभूषण महादेवजीने उन्हें रत्नभूषित दिव्य आभूषणोंसे भूषित ३६ किया ॥ ३५-३६ ॥ चन्द्रभूषण भगवान् शिवने सर्वमनोहारिणी गिरिराजकुमारी गौरी देवीको पलंगपर बिठाकर | उस समय सुन्दर अलंकारोंसे स्वयं ही उनका श्रृंगार ३७ | किया ॥ ३७ ॥
पूर्वखण्डे देवीशिवमिलनवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें देवीशिव-मिलनवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
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अ ० २८ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८३३ अथाष्टाविंशोऽध्यायः अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्नीषोमात्मकताका प्रतिपादन ऋषय ऊचुः
देवीं समादधानेन देवेनेदं किमीरितम् ।
अग्नीषोमात्मकं विश्वं वागर्थात्मकमित्यपि ॥ १
आज्ञैकसारमैश्वर्यमाज्ञात्वमिति चोदितम् ।
तदिदं श्रोतुमिच्छामो यथावदनुपूर्वशः ॥ २
वायुरुवाच अग्निरित्युच्यते रौद्री घोरा या तैजसी तनुः सोमः शाक्तोऽमृतमयः शक्तेः शान्तिकरी तनुः ॥ ३
अमृतं यत्प्रतिष्ठा सा तेजो विद्या कला स्वयम् ।
भूतसूक्ष्मेषु सर्वेषु त एव रसतेजसी ॥ ४
द्विविधा तेजसो वृत्ति: सूर्यात्मा चानलात्मिका ।
तथैव रसवृत्तिश्च सोमात्मा च जलात्मिका ॥ ५
विद्युदादिमयं तेजो मधुरादिमयो रसः ।
तेजोरसविभेदैस्तु धृतमेतच्चराचरम् ॥ ६
अग्नेरमृतनिष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते अत एव हि विक्रान्तमग्नीषोमं जगद्धितम् ॥ ७
हविषे सस्यसम्पत्तिर्वृष्टिः सस्याभिवृद्धये ।
वृष्टेरेव हविस्तस्मादग्नीषोमधृतं जगत् ॥ ८
अग्निरूर्ध्वं ज्वलत्येष यावत्सौम्यं परामृतम् ।
यावदग्न्यास्पदं सौम्यममृतं च स्त्रवत्यधः ॥ ९
अत एव हि कालाग्निरधस्ताच्छक्तिरूर्ध्वतः ।
यावदादहनं चोर्ध्वमधश्चाप्लावनं भवेत् ॥ १०
2224 Shivmahapuran IInd Part_Section_28_1_Front ऋषियोंने पूछा – प्रभो! पार्वती देवीका समाधान करते हुए महादेवजीने यह बात क्यों कही कि ' सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक एवं वागर्थात्मक है । ऐश्वर्यका सार एकमात्र आज्ञा ही है और वह आज्ञा तुम हो । ' अतः इस विषयमें हम क्रमशः यथार्थ बातें सुनना चाहते हैं॥१-२ ॥ वायुदेव बोले- महर्षियो! रुद्रदेवका जो घोर तेजोमय शरीर है, उसे अग्नि कहते हैं और अमृतमय सोम शक्तिका स्वरूप है; क्योंकि शक्तिका शरीर शान्तिकारक है ॥ ३ ॥
जो अमृत है, वह प्रतिष्ठा नामक कला है और जो तेज है, वह साक्षात् विद्या नामक कला है । सम्पूर्ण सूक्ष्म भूतोंमें वे ही दोनों रस और तेज हैं । तेजकी वृत्ति दो प्रकारकी है । एक सूर्यरूपा है और दूसरी अग्निरूपा । इसी तरह रसवृत्ति भी दो प्रकारकी है- एक सोमरूपिणी और दूसरी जलरूपिणी ॥ ४-५ ॥ तेज विद्युत् आदिके रूपमें उपलब्ध होता है तथा रस मधुर आदिके रूपमें । तेज और रसके भेदोंने ही इस चराचर जगत्को धारण कर रखा है ॥ ६ ॥
अग्निसे अमृतकी उत्पत्ति होती है और अमृत-स्वरूप घीसे अग्निकी वृद्धि होती है, अतएव अग्नि और सोमको दी हुई आहुति जगत्के लिये हितकारक होती है । शस्य - सम्पत्ति हविष्यका उत्पादन करती है । वर्षा शस्यको बढ़ाती है । इस प्रकार वर्षासे ही हविष्यका प्रादुर्भाव होता है, जिससे यह अग्नीषोमात्मक जगत् टिका हुआ है ॥ ७-८ ॥ अग्नि वहाँतक ऊपरको प्रज्वलित होता है, जहाँतक सोम - सम्बन्धी परम अमृत विद्यमान है और जहाँतक अग्निका स्थान है, वहाँतक सोमसम्बन्धी अमृत नीचेको झरता है । इसीलिये कालाग्नि नीचे है और शक्ति ऊपर । जहाँतक अग्नि है, उसकी गति ऊपरकी ओर है और जो जलका आप्लावन है, उसकी गति नीचेकी ओर है॥९ -१० ॥
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८३४ आधारशक्त्यैव धृतः कालाग्निरयमूर्ध्वगः तथैव निम्नगः सोमः शिवशक्तिपदास्पदः
शिवश्चोर्ध्वमधः शक्तिरूर्ध्वं शक्तिरधः शिवः ।
तदित्थं शिवशक्तिभ्यां नाव्याप्तमिह किञ्चन ॥
असकृच्चाग्निना दग्धं जगद्यद्भस्मसात्कृतम् ।
अग्नेर्वीर्यमिदं चाहुस्तद्वीर्यं भस्म यत्ततः ॥
यश्चेत्थं भस्मसद्भावं ज्ञात्वा स्नाति च भस्मना ।
अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्बद्धः पाशात्प्रमुच्यते ॥
अग्नेर्वीर्यं तु यद्भस्म सोमेनाप्लावितं पुनः ।
अयोगयुक्त्या प्रकृतेरधिकाराय कल्पते ॥
योगयुक्त्या तु तद्भस्म प्लाव्यमानं समन्ततः ।
शाक्तेनामृतवर्षेण चाधिकारान्निवर्तयेत् ॥
अतो मृत्युंजयायेत्थममृतप्लावनं सदा ।
शिवशक्त्यमृतस्पर्शे लब्धं येन कुतो मृतिः ॥
यो वेद दहनं गुह्यं प्लावनं च यथोदितम् ।
अग्नीषोमपदं हित्वा न स भूयोऽभिजायते ॥
शिवाग्निना तनुं दग्ध्वा शक्तिसौम्यामृतेन यः ।
प्लावयेद्योगमार्गेण सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
हृदि कृत्वेममर्थं वै देवेन समुदाहृतम् ।
अग्नीषोमात्मकं विश्वं जगदित्यनुरूपतः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ आधारशक्तिने ही इस ऊर्ध्वगामी कालाग्निको । ॥ ११ धारण कर रखा है तथा निम्नगामी सोम शिव - शक्तिके आधारपर प्रतिष्ठित है । शिव ऊपर हैं और शक्ति । नीचे तथा शक्ति ऊपर है और शिव नीचे । इस प्रकार १२ शिव और शक्तिने यहाँ सब कुछ व्याप्त कर रखा है ॥ ११-१२ ॥ बारंबार अग्निद्वारा जलाया हुआ यह जगत् १३ भस्मसात् हो जाता है । यह अग्निका वीर्य है । भस्मको । ही अग्निका वीर्य कहते हैं । जो इस प्रकार भस्मके श्रेष्ठ स्वरूपको जानकर ' अग्निः ' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा भस्मसे स्नान करता है, वह बँधा हुआ जीव पाशसे १४ मुक्त हो जाता है॥१३-१४ ॥ अग्निके वीर्यरूप भस्मको सोमने अयोगयुक्तिके १५ द्वारा फिर आप्लावित किया; इसलिये वह प्रकृतिके अधिकारमें चला गया । यदि योगयुक्तिसे शाक्त अमृतवर्षाके द्वारा उस भस्मका सब ओर आप्लावन हो तो वह प्रकृतिके अधिकारोंको निवृत्त कर १६ देता है॥१५-१६ ॥ अतः इस तरहका अमृतप्लावन सदा मृत्युपर विजय पानेके लिये ही होता है । शिवाग्निके साथ १७ शक्ति - सम्बन्धी अमृतका स्पर्श होनेपर जिसने अमृतका आप्लावन प्राप्त कर लिया, उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है? जो अग्निके इस गुह्य स्वरूपको तथा पूर्वोक्त अमृतप्लावनको ठीक - ठीक जानता है, वह अग्नीषोमात्मक जगत्को त्यागकर फिर यहाँ जन्म १८ १८ नहीं लेता ॥ १७-१८ ॥ जो शिवाग्निसे शरीरको दग्ध करके शक्तिस्वरूप १ ९ सोमामृतसे योगमार्गके द्वारा इसे आप्लावित करता है, वह अमृतस्वरूप हो जाता है । इसी अभिप्रायको हृदयमें धारण करके महादेवजीने इस सम्पूर्ण जगत्को अग्नीषोमात्मक कहा था । उनका वह कथन सर्वथा २० | उचित है ॥ १ ९ -२० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे भस्मतत्त्ववर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें भस्मतत्त्ववर्णन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥
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अ ० २ ९ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८३५ अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः जगत् ' वाणी और अर्थरूप ' है - इसका प्रतिपादन वायुरुवाच
निवेदयामि जगतो वागर्थात्म्यं कृतं यथा ।
षडध्ववेदनं सम्यक् समासान्न तु विस्तरात् ॥ १ ।
नास्ति कश्चिदशब्दार्थो नापि शब्दो निरर्थकः । ततो हि समये शब्दः सर्वः सर्वार्थबोधकः ॥ २
प्रकृतेः परिणामोऽयं द्विधा शब्दार्थभावना ।
तामाहुः प्राकृतीं मूर्तिं शिवयोः परमात्मनोः ॥ ३
शब्दात्मिका विभूतिर्या सा त्रिधा कथ्यते बुधैः ।
स्थूला सूक्ष्मा परा चेति स्थूला या श्रुतिगोचरा ॥ ४
सूक्ष्मा चिन्तामयी प्रोक्ता चिन्तया रहिता परा ।
या शक्तिः सा परा शक्तिः शिवतत्त्वसमाश्रया ॥ ५
ज्ञानशक्तिसमायोगादिच्छोपोद्बलिका तथा ।
सर्वशक्तिसमष्ट्यात्मा शक्तितत्त्वसमाख्यया ॥ ६
समस्तकार्यजातस्य मूलप्रकृतितां गता ।
सैव कुण्डलिनी माया शुद्धाध्वपरमा सती ॥ ७
सा विभागस्वरूपैव षडध्वात्मा विजृंभते ।
तत्र शब्दास्त्रयोऽध्वानस्त्रयश्चार्था समीरिताः ॥ ८
सर्वेषामपि वै पुंसां नैजशुद्धयनुरूपतः ।
लयभोगाधिकाराः स्युः सर्वतत्त्वविभागतः ॥ ९
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_28_2_Front वायुदेवता कहते हैं — महर्षियो! अब यह बता रहा हूँ कि जगत्की वागर्थात्मकताकी सिद्धि कैसे की गयी है । छ: अध्वाओं ( मार्गों ) -का सम्यक् ज्ञान मैं संक्षेपसे ही करा रहा हूँ, विस्तारसे नहीं । कोई भी ऐसा अर्थ नहीं है, जो बिना शब्दका हो और । कोई भी ऐसा शब्द नहीं है, जो बिना अर्थका हो । अतः समयानुसार सभी शब्द सम्पूर्ण अर्थोंके बोधक होते हैं ॥ १-२ ॥ प्रकृतिका यह परिणाम शब्दभावना और अर्थभावनाके भेदसे दो प्रकारका है । उसे परमात्मा शिव तथा पार्वतीकी प्राकृत मूर्ति कहते हैं ॥ ३ ॥
उनकी जो शब्दमयी विभूति है, उसे विद्वान् तीन प्रकारकी बताते हैं - स्थूला, सूक्ष्मा और परा । स्थूला वह है, जो कानोंको प्रत्यक्ष सुनायी देती है; जो केवल चिन्तनमें आती है, वह सूक्ष्मा कही गयी है और जो चिन्तनकी भी सीमासे परे है, उसे परा कहा गया है । वह शक्तिस्वरूपा है । वही शिवतत्त्वके आश्रित रहनेवाली पराशक्ति कही गयी है ॥ ४-५ ॥ ज्ञानशक्तिके संयोगसे वही इच्छाकी उपोद्बलिका ( उसे दृढ़ करनेवाली ) होती है । वह सम्पूर्ण शक्तियोंकी समष्टिरूपा है । वही शक्तितत्त्वके नामसे विख्यात हो समस्त कार्यसमूहकी मूल प्रकृति मानी गयी है । उसीको कुण्डलिनी कहा गया है । वही विशुद्धाध्वपरा सत्तामयी माया है ॥ ६-७ ॥ वह स्वरूपतः विभागरहित होती हुई भी छ: अध्वाओंके रूपमें विस्तारको प्राप्त होती है । उन छ: अध्वाओंमेंसे तीन तो शब्दरूप हैं और तीन अर्थरूप बताये गये हैं । सभी पुरुषोंको आत्मशुद्धिके अनुरूप सम्पूर्ण तत्त्वोंके विभागसे लय और भोगके अधिकार । प्राप्त होते हैं ॥ ८ - ९ ॥
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८३६ कलाभिस्तानि तत्त्वानि व्याप्तान्येव यथातथम् परस्याः प्रकृतेरादौ पञ्चधा परिणामतः कलाश्च ता निवृत्त्याद्याः पर्य्याप्ता इति निश्चयः मंत्राध्वा च पदाध्वा च वर्णाध्वा चेति शब्दतः भुवनाध्वा च तत्त्वाध्वा कलाध्वा चार्थतः क्रमात् । अत्रान्योऽन्यं च सर्वेषां व्याप्यव्यापकतोच्यते
मंत्राः सर्वे पदैर्व्याप्ता वाक्यभावात्पदानि च ।
वर्णैर्वर्णसमूहं हि पदमाहुर्विपश्चितः ॥
वर्णास्तु भुवनैर्व्याप्तास्तेषां तेषूपलम्भनात् ।
भुवनान्यपि तत्त्वौघैरुत्पत्त्यान्तर्बहिः क्रमात् ॥
व्याप्तानि कारणैस्तत्त्वैरारब्धत्वादनेकशः ।
अंतरादुत्थितानीह भुवनानि तु कानिचित् ॥
पौराणिकानि चान्यानि विज्ञेयानि शिवागमे ।
सांख्ययोगप्रसिद्धानि तत्त्वान्यपि च कानिचित् ॥
शिवशास्त्रप्रसिद्धानि ततोऽन्यान्यपि कृत्स्नशः ।
कलाभिस्तानि तत्त्वानि व्याप्तान्येव यथातथम् ॥
परस्याः प्रकृतेरादौ पञ्चधा परिणामतः ।
कलाश्च ता निवृत्त्याद्या व्याप्ताः पञ्च यथोत्तरम् ॥
व्यापिकातः पराशक्तिरविभक्ता षडध्वनाम् ।
परप्रकृतिभावस्य तत्सत्त्वाच्छिवतत्त्वतः ॥
शक्त्यादि च पृथिव्यन्तं शिवतत्त्वसमुद्भवम् ।
व्याप्तमेकेन तेनैव मृदा कुंभादिकं यथा ॥
411
शैवं तत्परमं धाम यत्प्राप्यं षड्भिरध्वभिः ।
व्यापिका व्यापिका शक्तिः पञ्चतत्त्वविशोधनात् ॥
निवृत्त्या रुद्रपर्यन्तं स्थितिरण्डस्य शोध्यते । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९ । वे सम्पूर्ण तत्त्व कलाओंद्वारा यथायोग्य व्याप्त ॥ १० हैं । परा प्रकृतिके जो आदिमें पाँच प्रकारके परिणात । होते हैं, वे ही निवृत्ति आदि कलाएँ हैं । मन्त्राध्वा, पदाध्वा । । और वर्णाध्वा - ये तीन अध्वा शब्दसे सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ तथा भुवनाध्वा, तत्त्वाध्वा और कलाध्वा — ये तीन अर्थसे । सम्बन्ध रखनेवाले हैं । इन सबमें भी परस्पर व्याप्य ॥ १२ व्यापक भाव बताया जाता है॥१०–१२ ॥ सम्पूर्ण मन्त्र पदोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि वे १३ वाक्यरूप हैं । सम्पूर्ण पद भी वर्णोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि विद्वान् पुरुष वर्णोंके समूहको ही पद कहते हैं । वे वर्ण भी भुवनोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि उन्हींमें उनकी उपलब्धि होती है । भुवन भी तत्त्वोंके समूहद्वारा १४ बाहर - भीतरसे व्याप्त हैं; क्योंकि उनकी उत्पत्ति ही तत्त्वोंसे हुई है॥१३-१४ ॥ उन कारणभूत तत्त्वोंसे ही उनका आरम्भ १५ हुआ है । अनेक भुवन उनके अन्दरसे ही प्रकट हुए हैं । उनमेंसे कुछ तो पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं । अन्य भुवनोंका ज्ञान शिव - सम्बन्धी आगमसे प्राप्त करना चाहिये । कुछ तत्त्व सांख्य और योगशास्त्रोंमें भी १६ | प्रसिद्ध हैं॥१५-१६ ॥ शिवशास्त्रोंमें प्रसिद्ध तथा दूसरे- दूसरे भी जो १७ तत्त्व हैं, वे सब - के - सब कलाओंद्वारा यथायोग्य व्याप्त हैं । परा प्रकृतिके जो आदिकालमें पाँच परिणाम हुए, वे ही निवृत्ति आदि कलाएँ हैं । वे पाँच १८ कलाएँ उत्तरोत्तर तत्त्वोंसे व्याप्त हैं ॥ १७-१८ ॥ अतः परा शक्ति सर्वत्र व्यापक है । वह १ ९ विभागरहित होकर भी छः अध्वाओंके रूपमें विभक्त है । परप्रकृतिका शिवतत्त्वसे सम्बन्ध होनेपर शक्तिसे लेकर पृथ्वीतत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रादुर्भाव शिवतत्त्वसे हुआ है । अतः जैसे घड़े आदि मिट्टीसे २० व्याप्त हैं, उसी प्रकार वे सारे तत्त्व एकमात्र शिवसे ही व्याप्त हैं ॥ १ ९ -२० ॥ जो छः अध्वाओंसे प्राप्त होनेवाला है, वही २१ शिवका परम धाम है । पाँच तत्त्वोंके शोधनसे व्यापिका और अव्यापिका शक्तिं जानी जाती है । । निवृत्तिकला । द्वारा रुद्रलोकपर्यन्त ब्रह्माण्डकी स्थितिका शोधन । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_28_2_Back