शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 891–900

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

पृष्ठ 891

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 891 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३५ ] वायवीयसंहिता त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १७ । भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा । मद्भक्तो ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम् ॥ १८ निर्गुणेनापि किं ते कार्यं भविष्यति । रुद्रेण यः पिशाचत्वमागतः ॥ १ ९ देवपङ्क्तिबहिर्भूतो वायुरुवाच प्राह स मुनिर्जपन्पञ्चाक्षरं मनुम् । तच्छ्रुत्वा मन्यमानो धर्मविघ्नं प्राह तं कर्तुमागतम् ॥ २० उपमन्युरुवाच

त्वयैवं कथितं सर्वं भवनिंदारतेन वै ।

प्रसंगादेव देवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः ॥ २१

त्वं न जानासि वै रुद्रं सर्वदेवेश्वरेश्वरम् ।

ब्रह्मविष्णुमहेशानां जनकं प्रकृतेः परम् ॥ २२

सदसद्व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः ।

नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणोम्यहम् ॥ २३

हेतुवादविनिर्मुक्तं सांख्ययोगार्थदं परम् ।

उपासते यं तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणोम्यहम् ॥ २४

नास्ति शंभोः परं तत्त्वं सर्वकारणकारणात् ।

ब्रह्मविष्ण्वादिदेवानां स्रष्टुर्गुणपराद्विभोः ॥ २५

बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत् । ( पूर्वखण्ड ) ८७७ जानते! मैं समस्त देवताओंका पालक और तीनों लोकोंका अधिपति इन्द्र हूँ । सब देवता मुझे नमस्कार करते हैं । ब्रह्मर्षे! मेरे भक्त हो जाओ । सदा मेरी ही पूजा करो, तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा । निर्गुण रुद्रको त्याग दो । उस निर्गुण रुद्रसे तुम्हारा कौन - सा कार्य सिद्ध होगा, जो देवताओंकी पंक्तिसे बाहर होकर पिशाचभावको प्राप्त हो गया है । ' ॥ १६-१९ ॥ वायुदेवता कहते हैं — यह सुनकर पंचाक्षर-मन्त्रका जप करते हुए वे मुनि उपमन्यु इन्द्रको अपने धर्ममें विघ्न डालनेके लिये आया हुआ जानकर बोले- ॥ २० ॥

उपमन्युने कहा - – यद्यपि तुम भगवान् शिवकी निन्दामें तत्पर हो, तथापि इसी प्रसंगमें परमात्मा महादेवजीकी निर्गुणता बताकर तुमने स्वयं ही उनका सम्पूर्ण महत्त्व स्पष्टरूपसे कह दिया ॥२१ ॥

तुम नहीं जानते कि भगवान् रुद्र सम्पूर्ण देवेश्वरोंके भी ईश्वर हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेशके भी जनक हैं तथा प्रकृतिसे परे हैं । ब्रह्मवादी लोग उन्हींको सत्-असत्, व्यक्त - अव्यक्त, नित्य, एक और अनेक कहते हैं । अतः मैं उन्हींसे वर माँगूँगा । जो युक्तिवादसे परे तथा सांख्य और योगके सारभूत अर्थका ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञानी पुरुष उत्कृष्ट जानकर जिनकी उपासना करते हैं, उन भगवान् शिवसे ही मैं वर माँगूँगा ॥२२–२४ ॥ समस्त कारणोंके भी कारण, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंकी सृष्टि करनेवाले, गुणोंसे परे तथा सर्वव्यापी शम्भुसे बढ़कर कोई तत्त्व नहीं है । अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन, आज मैं सोचता हूँ कि मैंने महान् पाप किया था, जो कि शिवकी भवान्तरे कृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य चेत् ॥ २६ पूर्वजन्ममें निन्दा सुनी है ॥ २५-२६ ॥ जो शिवकी निन्दा सुनते ही उसी क्षण उसे श्रुत्वा निंदां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत् । ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह स्वदेहं तन्निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति ॥ २७ मारकर शीघ्र जाता है । देवाधम! दूधके लिये जो मेरी शिवलोक इच्छा है, वह यों ही रह जाय; परंतु शिवास्त्रके द्वारा तुम्हारा वध करके मैं अपने इस शरीरको त्याग

आस्तां तावन्ममेच्छेयं क्षीरं प्रति सुराधम ।

निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतं कलेवरम् ॥ २८ । दूँगा ॥ २७-२८ ॥

पृष्ठ 892

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 892 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ वायुदेवता कहते हैं — ऐसा कहकर स्वयं मर वायुरुवाच | जानेका निश्चय करके उपमन्यु दूधकी भी इच्छा एवमुक्त्वोपमन्युस्तं मर्तुं व्यवसितः स्वयम् । वध करनेके लिये उद्यत हो गये क्षीरे वाञ्छामपि त्यक्त्वा निहन्तुं शक्रमुद्यतः ॥ २ ९ छोड़कर अघोर इन्द्रका अस्त्रसे अभिमन्त्रित घोर भस्मको | समय लेकर भस्मादाय तदा घोरमघोरास्त्राभिमंत्रितम् । | मुनिने इन्द्रके उद्देश्यसे छोड़ दिया और बड़े जोरसे विसृज्य शक्रमुद्दिश्य ननाद स मुनिस्तथा ॥ ३० सिंहनाद किया । फिर शम्भुके युगल चरणारविन्दोंका

स्मृत्वा शंभुपदद्वंद्वं स्वदेहं दग्धुमुद्यतः ।

आग्नेयीं धारणां बिभ्रदुपमन्युरवस्थितः ॥ ३१

एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा ।

वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः ॥ ३२

तद्विसृष्टमघोरास्त्रं नंदीश्वरनियोगतः ।

जगृहे मध्यतः क्षिप्तं नन्दी शंकरवल्लभः ॥ ३३

स्वं रूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः ।

दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम् ॥ ३४

क्षीरार्णवसहस्त्रं च पीयूषार्णवमेव वा ।

दध्यादेरर्णवांश्चैव घृतोदार्णवमेव च ॥ ३५

फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा ।

अपूपानां गिरिं चैव दर्शयामास स प्रभुः ॥ ३६

एवं स ददृशे देवो देव्या सार्द्धं वृषोपरि ।

गणेश्वरैस्त्रिशूलाद्यैर्दिव्यास्त्रैरपि संवृतः ॥ ३७

दिवि दुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात च ।

विष्णुब्रह्मेन्द्रप्रमुखैर्देवैश्छन्ना दिशो दश ॥ ३८

अथोपमन्युरानन्दसमुद्रोर्मिभिरावृतः पपात दण्डवद्भूमौ भक्तिनम्रेण चेतसा ॥ ३ ९

एतस्मिन्समये तत्र सस्मितो भगवान्भवः ।

एह्येहीति तमाहूय मूर्म्याघ्राय ददौ वरान् ॥ ४०

शिव उवाच

भक्ष्यभोज्यान्यथाकामं बान्धवैर्भुङ्क्ष्व सर्वदा । ।

सुखी भव सदा दुःखान्निर्मुक्तो भक्तिमान्मम ॥ ४१ ।

चिन्तन करते हुए वे अपनी देहको दग्ध करनेके लिये | उद्यत हो गये और आग्नेयी धारणा धारण करके स्थित हुए ॥ २ ९ –३१ ॥ ब्राह्मण उपमन्यु जब इस प्रकार स्थित हुए, तब भगदेवताके नेत्रका नाश करनेवाले भगवान् शिवने योगी उपमन्युकी उस धारणाको अपनी सौम्यदृष्टिसे रोक दिया । उनके छोड़े हुए उस अघोरास्त्रको नन्दीश्वर शिवजीकी आज्ञासे शिववल्लभ नन्दीने बीचमें ही पकड़ लिया ॥ ३२-३३ ॥ तत्पश्चात् परमेश्वर भगवान् शिवने अपने बालेन्दु-शेखररूपको धारण कर लिया और ब्राह्मण उपमन्युको उसे दिखाया । इतना ही नहीं, उन प्रभुने उस मुनिको सहस्रों क्षीरसागर, सुधासागर, दधि आदिके सागर, घृतके समुद्र, फलसम्बन्धी रसके समुद्र तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके समुद्रका दर्शन कराया और पूओंका पहाड़ खड़ा करके दिखा दिया ॥ ३४–३६ ॥ इसी तरह देवी पार्वतीके साथ महादेवजी वहाँ वृषभपर आरूढ़ दिखायी दिये । वे अपने गणाध्यक्षों तथा त्रिशूल आदि दिव्यास्त्रोंसे घिरे हुए थे । देवलोकमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी तथा विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंसे दसों दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ ३७-३८ ॥। उस समय उपमन्यु आनन्दसागरकी लहरोंसे घिरे हुए थे । वे भक्तिविनम्र चित्तसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ गये । इसी समय वहाँ मुसकराते हुए भगवान् शिवने ‘ यहाँ आओ, यहाँ आओ ' कहकर उन्हें बुलाया और उनका मस्तक सूँघकर अनेक वर दिये ॥ ३ ९ -४० ॥ शिव बोले — वत्स! तुम अपने भाई - बन्धुओंके साथ सदा इच्छानुसार भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंका उपभोग करो । दुःखसे छूटकर सर्वदा सुखी रहो, तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति भक्ति सदा बनी रहे ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 893

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 893 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३५ ] वायवीयसहिता

उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती ।

मया पुत्रीकृतो ह्यद्य दत्तः क्षीरोदकार्णवः ॥ ४२

मधुश्चार्णवश्चैव दध्यन्नार्णव एव च ।

आज्यौदनार्णवश्चैव फलाद्यर्णव एव च ॥ ४३

अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवस्तथा ।

एते दत्ता मया ते हि त्वं गृह्णीष्व महामुने ॥४४

पिता तव महादेवो माता वै जगदम्बिका ।

अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम् ॥ ४५

वरान्वरय सुप्रीत्या मनोऽभिलषितान्परान् ।

प्रसन्नोऽहं प्रदास्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥ ४६

वायुरुवाच

एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम् ।

मूर्ध्याघ्राय सुतस्तेऽयमिति देव्यै न्यवेदयत् ॥ ४७

देवी च गुहवत्प्रीत्या मूर्ध्नि तस्य कराम्बुजम् ।

विन्यस्य प्रददौ तस्मै कुमारपदमव्ययम् ॥ ४८

क्षीराब्धिरपि साकारः क्षीरं स्वादु करे दधत् ।

उपस्थाय ददौ पिण्डीभूतं क्षीरमनस्वरम् ॥ ४ ९

योगैश्वर्यं सदा तुष्टिं ब्रह्मविद्यामनश्वराम् ।

समृद्धिं परमां तस्मै ददौ संतुष्टमानसः ॥ ५०

अथ शंभुः प्रसन्नात्मा दृष्ट्वा तस्य तपो महः ।

पुनर्ददौ वरं दिव्यं मुनये ह्युपमन्यवे ॥ ५१

व्रतं पाशुपतं ज्ञानं व्रतयोगं च तत्त्वतः । ( पूर्वखण्ड ) ८७ ९ महाभाग उपमन्यो! ये पार्वतीदेवी तुम्हारी माता हैं । आज मैंने तुम्हें अपना पुत्र बना लिया और तुम्हारे लिये क्षीरसागर प्रदान किया । केवल दूधका ही नहीं, मधु, दही, अन्न, घी, भात तथा फल आदिके रसका भी समुद्र तुम्हें दे दिया । ये पूओंके पहाड़ तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके सागर मैंने तुम्हें समर्पित किये । महामुने! ये सब ग्रहण करो॥४२–४४ ॥ आजसे मैं महादेव तुम्हारा पिता हूँ और जगदम्बा उमा तुम्हारी माता हैं । मैंने तुम्हें अमरत्व तथा गणपतिका सनातन पद प्रदान किया । अब तुम्हारे मनमें जो दूसरी - दूसरी अभिलाषाएँ हों, उन सबको तुम बड़ी प्रसन्नताके साथ वरके रूपमें माँगो । मैं संतुष्ट हूँ । इसलिये वह सब दूँगा । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ वायुदेव कहते हैं — ऐसा कहकर महादेवजीने उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया और मस्तक सूँघकर यह कहते हुए देवीकी गोदमें दे दिया कि यह तुम्हारा पुत्र है ॥४७ ॥

देवीने कार्तिकेयकी भाँति प्रेमपूर्वक उनके मस्तकपर अपना करकमल रखा और उन्हें अविनाशी कुमारपद प्रदान किया । क्षीरसागरने भी साकाररूप धारण करके उनके हाथमें अनश्वर पिण्डीभूत स्वादिष्ठ दूध समर्पित किया॥४८-४९ ॥ तत्पश्चात् पार्वतीदेवीने संतुष्टचित्त हो उन्हें योगजनित ऐश्वर्य, सदा संतोष, अविनाशिनी ब्रह्मविद्या और उत्तम समृद्धि प्रदान की ॥५० ॥

तदनन्तर उनके तपोमय तेजको देखकर प्रसन्नचित्त हुए शम्भुने उपमन्यु मुनिको पुनः दिव्य वरदान दिया । पाशुपत - व्रत, पाशुपतज्ञान, तात्त्विक व्रतयोग तथा चिरकालतक उसके प्रवचनकी परम पटुता उन्हें प्रदान ददौ तस्मै प्रवक्तृत्वपाटवं सुचिरं परम् ॥५२ की ॥ ५१-५२ ॥ भगवान् शिव और शिवासे दिव्य वर तथा नित्य सोऽपि लब्ध्वा वरान्दिव्यान् कुमारत्वं च सर्वदा । वे प्रमुदित हो उठे । इसके बाद तस्माच्छिवाच्च तस्याश्च शिवाया मुदितोऽभवत् ॥ ५३ कुमारत्व पाकर प्रसन्नचित्त हो प्रणाम करके हाथ जोड़ उन ब्राह्मण

ततः प्रसन्नचेतस्कः सुप्रणम्य कृताञ्जलिः । देवदेव महेश्वरसे यह वर माँगा ॥ ५३-५४ ॥

ययाचे स वरं विप्रो देवदेवान्महेश्वरात् ॥ ५४ उपमन्युने

पृष्ठ 894

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 894 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८८० उपमन्युरुवाच प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर स्वभक्तिं देहि परमां दिव्यामव्यभिचारिणीम्

श्रद्धां देहि महादेव स्वसम्बन्धिषु मे सदा ।

स्वदास्यं परमं स्नेहं सान्निध्यं चैव सर्वदा ॥

एवमुक्त्वा प्रसन्नात्मा हर्षगद्गदया गिरा ।

स तुष्टाव महादेवमुपमन्युर्द्विजोत्तमः ॥

देवदेव महादेव शरणागतवत्सल ।

प्रसीद करुणासिंधो साम्ब शंकर सर्वदा ॥

वायुरुवाच एवमुक्तो महादेवः सर्वेषां च वरप्रदः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ उपमन्यु बोले- देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये । । परमेश्वर! प्रसन्न होइये और मुझे अपनी परम । दिव्य ॥ ५५ एवं अव्यभिचारिणी भक्ति दीजिये । महादेव! अपने सम्बन्धियोंमें मेरी सदा श्रद्धा बनी रहनेका | दीजिये! साथ ही, अपना दासत्व, उत्कृष्ट स्नेह और वर ५६ नित्य सामीप्य प्रदान कीजिये ॥ ५५-५६ ॥ ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ | उपमन्युने हर्षगद्गद वाणीद्वारा महादेवजीका स्तवन ५७ किया ॥ ५७ ॥

उपमन्यु बोले – ५८ वत्सल! करुणासिन्धो मुझपर प्रसन्न होइये ॥ वायुदेव कहते हैं वर देनेवाले प्रसन्नात्मा देवदेव! महादेव! शरणागत-! साम्बसदाशिव! आप सदा ५८ ॥ — उनके ऐसा कहनेपर सबको महादेवने मुनिवर प्रत्युवाच प्रसन्नात्मोपमन्युं मुनिसत्तमम् ॥५ ९ उपमन्युको शिव उवाच

वत्सोपमन्यो तुष्टोऽस्मि सर्वं दत्तं मया हि ते ।

दृढभक्तोऽसि विप्रर्षे मया जिज्ञासितो ह्यसि ॥

अजरश्चामरश्चैव भव त्वं दुःखवर्जितः ।

यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥

अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा ।

भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती ॥

सान्निध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ।

इस प्रकार उत्तर दिया ॥५ ९ ॥

शिव बोले — वत्स उपमन्यो! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ । इसलिये मैंने तुम्हें सब कुछ दे दिया । ब्रह्मर्षे! तुम ६० मेरे सुदृढ़ भक्त हो; क्योंकि इस विषयमें मैंने तुम्हारी परीक्षा ले ली है । तुम अजर - अमर, दुःखरहित, यशस्वी, ६१ तेजस्वी और दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न होओ ॥ ६०-६१ ॥ द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे बन्धु - बान्धव, कुल तथा ६२ गोत्र सदा अक्षय रहेंगे । मेरे प्रति तुम्हारी भक्ति सदा बनी रहेगी । विप्रवर! मैं तुम्हारे आश्रममें नित्य निवास उपकण्ठं मम त्वं वै सानन्दं विहरिष्यसि ॥ ६३ करूँगा । तुम मेरे पास सानन्द विचरोगे ॥ ६२-६३ ॥ एवमुक्त्वा स भगवान् सूर्यकोटिसमप्रभः । ऐसा कहकर उपमन्युको अभीष्ट वर दे करोड़ों ईशानः स वरान्दत्त्वा तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥ ६४ सूर्योंके समान तेजस्वी भगवान् महेश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये । उन श्रेष्ठ परमेश्वरसे उत्तम वर पाकर उपमन्युः प्रसन्नात्मा प्राप्य उपमन्युका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा । उन्हें बहुत जगाम जननीस्थानं तस्माद्वराद्वरान् । सुख मिला और वे अपनी जन्मदायिनी माताके

सुखं प्रापाधिकं च सः ॥ ६५ । स्थानपर चले गये ॥ ६४-६५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे वैयासिक्यां चतुर्विंशतिसाहस्त्र्यां संहितायां तदन्तर्गतायां सप्तम्यां वायवीयसंहितायां ॥ इस प्रकार व्यासविरचित पूर्वखण्डे उपमन्युचरितवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

चौबीस हजार श्लोकोंवाले श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें उपमन्युचरितवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

। समाप्तोऽयं सप्तम्याः वायवीयसंहितायाः पूर्वखण्डः ॥

पृष्ठ 895

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 895 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशायनमः ॥ श्रीशिवमहापुराण सप्तम्याः वायवीयसंहितायाःउत्तरखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः ऋषियोंके पूछनेपर वायुदेवका श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलनका प्रसंग सुनाना, श्रीकृष्णको उपमन्युसे ज्ञानका और भगवान् शंकरसे पुत्रका लाभ

ॐ नमः समस्तसंसारचक्रभ्रमणहेतवे ।

गौरीकुचतटद्वन्द्वकुंकुमा‌ङ्कितवक्षसे ॥ १

सूत उवाच

उक्त्वा भगवतो लब्धं प्रसादमुपमन्युना ।

नियमादुत्थितो वायुर्मध्ये प्राप्ते दिवाकरे ॥ २

ऋषयश्चापि ते सर्वे नैमिषारण्यवासिनः ।

अथायमर्थः प्रष्टव्य इति कृत्वा विनिश्चयम् ॥ ३

कृत्वा यथा स्वकं कृत्यं प्रत्यहं ते यथा पुरा ।

भगवन्तमुपायान्तं समीक्ष्य समुपाविशन् ॥ ४

अथासौ नियमस्यान्ते भगवानम्बरोद्भवः ।

मध्ये मुनिसभायास्तु भेजे क्लृप्तं वरासनम् ॥ ५

सुखासनोपविष्टश्च वायुर्लोकनमस्कृतः ।

श्रीमद्विभूतिमीशस्य हृदि कृत्वेदमब्रवीत् ॥ ६

तं प्रपद्ये महादेवं सर्वज्ञमपराजितम् ।

विभूतिः सकलं यस्य चराचरमिदं जगत् ॥ ७

इत्याकर्ण्य शुभां वाणीं ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।

विभूतिविस्तरं श्रोतुमूचुस्ते परमं वचः ॥ ८

ऋषय ऊचुः

उक्तं भगवता वृत्तमुपमन्योर्महात्मनः ।

क्षीरार्थेनापि तपसा यत्प्राप्तं परमेश्वरात् ॥ ९

जो समस्त संसार - चक्रके परिभ्रमणमें कारणरूप हैं तथा गौरीके युगल उरोजोंमें लगे हुए केसरसे जिनका वक्ष: स्थल अंकित है, उन भगवान् उमावल्लभ शिवको नमस्कार है ॥१ ॥

सूतजी बोले- उपमन्युको भगवान् शंकरके कृपाप्रसादके प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाकर मध्याह्नकालमें नित्यनियमके उद्देश्यसे वायुदेव कथा बन्द करके उठ गये । तब नैमिषारण्यनिवासी अन्य ऋषि भी ' अब अमुक बात पूछनी है ' ऐसा निश्चय करके उठे और प्रतिदिनकी भाँति अपना तात्कालिक नित्यकर्म पूरा करके भगवान् वायुदेवको आया देख फिर आकर उनके पास बैठ गये॥२-४ ॥ नियम समाप्त होनेपर जब आकाशजन्मा वायुदेव मुनियोंकी सभामें अपने लिये निश्चित उत्तम आसनपर विराजमान हो गये — सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे लोकवन्दित पवनदेव परमेश्वरकी श्रीसम्पन्न विभूतिका मन - ही - मन चिन्तन करके इस प्रकार बोले – ' मैं उन सर्वज्ञ और अपराजित महान् देव भगवान् शंकरकी शरण लेता हूँ, जिनकी विभूति इस समस्त चराचर जगत्के रूपमें फैली हुई है'॥५–७ ॥ उनकी शुभ वाणीको सुनकर वे निष्पाप ऋषि भगवान्की विभूतिका विस्तारपूर्वक वर्णन सुननेके लिये यह उत्तम वचन बोले- ॥ ८ ॥

ऋषियोंने कहा — भगवन्! आपने महात्मा उपमन्युका चरित्र सुनाया, जिससे यह ज्ञात हुआ कि उन्होंने केवल दूधके लिये तपस्या करके भी परमेश्वर शिवसे सब कुछ पा लिया । हमने पहलेसे ही सुन रखा

पृष्ठ 896

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 896 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८८२ दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा धौम्याग्रजस्ततस्तेन कृत्वा पाशुपतं व्रतम् प्राप्तं च परमं ज्ञानमिति प्रागेव शुश्रुम कथं स लब्धवान् कृष्णो ज्ञानं पाशुपतं परम् वायुरुवाच

स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।

निन्दयन्निव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥

पुत्रार्थं हि तपस्तप्तुं गतस्तस्य महामुनेः ।

आश्रमं मुनिभिर्दृष्टं दृष्टवांस्तत्र वै मुनिम् ॥

भस्मावदातं सर्वाङ्गं त्रिपुंड्राङ्कितमस्तकम् ।

रुद्राक्षमालाभरणं जटामण्डलमण्डितम् ॥

तच्छिष्यभूतैर्मुनिभिः शास्त्रैर्वेदमिवावृतम् ।

शिवध्यानरतं शांतमुपमन्युं महाद्युतिम् ॥

नमश्चकार तं दृष्ट्वा हृष्टसर्वतनूरुहः ।

बहुमानेन कृष्णोऽसौ त्रिःकृत्वा तु प्रदक्षिणाम् ।

स्तुतिं चकार सुप्रीत्या नतस्कन्धः कृताञ्जलिः ॥

तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । । है कि अनायास ही महान् कर्म करनेवाले वसुदेवनन्दन ॥ १० भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय धौम्यके बड़े भाई उपमन्युसे | मिले थे और उनकी प्रेरणासे पाशुपत व्रतका अनुष्ठान । । करके उन्होंने परम ज्ञान प्राप्त कर लिया था; अतः ॥ ११ आप यह बतायें कि भगवान् श्रीकृष्णने परम उत्तम पाशुपतज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया? ॥ ९ -११ ॥ वायुदेव बोले- अपनी इच्छासे अवतीर्ण होनेपर भी सनातन वासुदेवने मानव - शरीरकी निन्दा - सी करते १२ हुए लोकसंग्रहके लिये शरीरकी शुद्धि की थी । वे पुत्र - प्राप्तिके निमित्त तप करनेके लिये उन महामुनिके आश्रमपर गये थे, जहाँ बहुत - से मुनि उपमन्युजीका १३ दर्शन कर रहे थे । भगवान् श्रीकृष्णने भी वहाँ जाकर उनका दर्शन किया ॥ १२-१३ ॥ उनके सारे अंग भस्मसे उज्ज्वल दिखायी देते १४ थे । मस्तक त्रिपुण्ड्रसे अंकित था । रुद्राक्षकी माला ही उनका आभूषण थी । वे जटामण्डलसे मण्डित थे 1 शास्त्रोंसे वेदकी भाँति वे अपने शिष्यभूत महर्षियोंसे १५ घिरे हुए थे और शिवजीके ध्यानमें तत्पर हो शान्त-भावसे बैठे थे ॥ १४-१५ ॥ उन महातेजस्वी उपमन्युका दर्शन करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया । उस समय उनके १६ सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया । श्रीकृष्णने बड़े आदरके साथ मुनिकी तीन बार परिक्रमा की । फिर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मस्तक झुका हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया ॥१६ ॥

उन मुनिको देखनेमात्र से ही बुद्धिमान् नष्टमासीन्मलं सर्वं मायाजं कार्यमेव च ॥ १७ श्रीकृष्णका मायाजनित तथा कर्मजनित समस्त मल ( पाप ) नष्ट हो गया ॥ १७ ॥

ततः क्षीणमलं कृष्णमुपमन्युर्यथाविधि । तदनन्तर उपमन्युने विधिपूर्वक ‘ अग्निरिति भस्म ' भस्मनोद्भूल्य तं मन्त्रैरग्निरित्यादिभिः क्रमात् ॥ १८ इत्यादि मन्त्रोंसे श्रीकृष्णके शरीरमें भस्म लगाकर

उनसे बारह महीनेका साक्षात् पाशुपत व्रत करवाया ।

तत्पश्चात् मुनिने उन्हें उत्तम ज्ञान प्रदान किया ॥ १८ ॥

अथ पाशुपतं साक्षाद् व्रतं द्वादशमासिकम् । उसी समयसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सम्पूर्ण कारयित्वा मुनिस्तस्मै प्रददौ ज्ञानमुत्तमम् ॥ १ ९ दिव्य पाशुपत मुनि उन श्रीकृष्णको चारों ओरसे घेरकर तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः शंसितव्रताः । उनके पास बैठे रहने लगे । फिर गुरुकी आज्ञासे परम दिव्याः पाशुपताः सर्वे परिवृत्योपतस्थिरे शक्तिमान् श्रीकृष्णने पुत्रके लिये साम्ब शिवकी आराधनाका ॥ २० । उद्देश्य मनमें लेकर तपस्या की ॥ १ ९ -२० ॥

पृष्ठ 897

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 897 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड )

ततो गुरुनियोगाद् वै कृष्णः परमशक्तिमान् ।

पुत्रार्थं साम्बमुद्दिश्य शंकरम् ॥

तपश्चकार

तपसा तेन वर्षान्ते दृष्टोऽसौ परमेश्वरः ।

श्रिया परमया युक्तः साम्बश्च सगणः शिवः ॥

वर्थमाविर्भूतस्य हरस्य सुभगाकृतेः ।

स्तुतिं चकार नत्वाऽसौ कृष्णः सम्यक् कृताञ्जलिः ॥

साम्बेन सगणेनापि लब्धवान् पुत्रमात्मनः ।

तपसा तुष्टचित्तेन दत्तं विष्णोः शिवेन वै ॥

यस्मात्साम्बो महादेवः प्रददौ पुत्रमात्मनः ।

तस्माज्जाम्बवतीसूनुं साम्बं चक्रे स नामतः ॥

तदेतत्कथितं सर्वं कृष्णस्यामितकर्मणः ।

महर्षेर्ज्ञानलाभश्च पुत्रलाभश्च शंकरात् ॥

य इदं कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाच्छ्रावयेत्तथा ।

स विष्णोर्ज्ञानमासाद्य तेनैव सह मोदते ॥

८८३ उस तपस्यासे सन्तुष्ट हो एक वर्षके २१ पश्चात् पार्षदोंसहित, परम ऐश्वर्यशाली परमेश्वर साम्ब शिवने उन्हें दर्शन दिया । श्रीकृष्णने वर देनेके २२ लिये प्रकट हुए सुन्दर अंगवाले महादेवजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनकी स्तुति भी २३ की ॥ २१–२३ ॥ गणोंसहित साम्ब सदाशिवका स्तवन करके २४ श्रीकृष्णने अपने लिये एक पुत्र प्राप्त किया । वह पुत्र तपस्यासे संतुष्टचित्त हुए साक्षात् शिवने श्रीविष्णुको दिया था । चूँकि साम्ब शिवने उन्हें अपना पुत्र प्रदान २५ किया, इसलिये श्रीकृष्णने जाम्बवती - कुमारका नाम साम्ब ही रखा ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार अमितपराक्रमी श्रीकृष्णको महर्षि २६ उपमन्युसे ज्ञान - लाभ और भगवान् शंकरसे पुत्र - लाभ हुआ । इस प्रकार यह सब प्रसंग मैंने पूरा - पूरा कह सुनाया । जो प्रतिदिन इसे कहता - सुनता या सुनाता है, वह भगवान् विष्णुका ज्ञान पाकर उन्हींके साथ २७ | आनन्दित होता है ॥ २६-२७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे कृष्णपुत्रप्राप्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें कृष्णपुत्रप्राप्तिवर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको ऋषय ऊचुः

किं तत्पाशुपतं ज्ञानं कथं पशुपतिः शिवः ।

कथं धौम्याग्रजः पृष्टः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १

एतत्सर्वं समाचक्ष्व वायो शङ्करविग्रह ।

त्वत्समो न हि वक्तास्ति त्रैलोक्येष्वपरः प्रभुः ॥ २

सूत उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तेषां महर्षीणां प्रभञ्जनः ।

संस्मृत्य शिवमीशानं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ३

वायुरुवाच

पुरा साक्षात् महेशेन श्रीकण्ठाख्येन मन्दरे ।

देव्यै देवेन कथितं ज्ञानं पाशुपतं परम् ॥ ४

पाशुपत ज्ञानका उपदेश ऋषियोंने पूछा— पाशुपत ज्ञान क्या है? भगवान् शिव पशुपति कैसे हैं? और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने उपमन्युसे किस प्रकार प्रश्न किया था? वायुदेव! आप साक्षात् शंकरके स्वरूप हैं, इसलिये ये सब बातें बताइये । तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कोई वक्ता इन बातोंको बतानेमें समर्थ नहीं है॥१-२ ॥ सूतजी कहते हैं — उन महर्षियोंकी यह बात सुनकर वायुदेवने भगवान् शंकरका स्मरण करके इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥३ ॥

वायुदेव बोले — पूर्वकालमें साक्षात् श्रीकण्ठ भगवान् महेश्वरने देवी पार्वतीसे उत्तम पाशुपतज्ञान कहा था ।

पृष्ठ 898

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 898 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८८४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २

तदेव पृष्टं कृष्णेन विष्णुना विश्वयोनिना ।

पशुत्वं च सुरादीनां पतित्वं च शिवस्य च ॥

यथोपदिष्टं कृष्णाय मुनिना ह्युपमन्युना ।

तथा समासतो वक्ष्ये तच्छृणुध्वमतन्द्रिताः ॥

पुरोपमन्युमासीनं विष्णुः कृष्णवपुर्धरः ।

प्रणिपत्य यथान्यायमिदं वचनमब्रवीत् ॥

श्रीकृष्ण उवाच

भगवन् श्रोतुमिच्छामि देव्यै देवेन भाषितम् ।

दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं विभूतिं वास्य कृत्स्नशः ॥

कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ।

कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम् ॥

इति सञ्चोदितः श्रीमानुपमन्युर्महात्मना । | विश्वयोनि विष्णुरूप श्रीकृष्णने उसीको [ उपमन्युसे ५ । पूछा था । तब मुनि उपमन्युने श्रीकृष्णको देवता आदिके ] | पशुत्व तथा शिवजीका उनके पति होनेके विषयमें | जैसा उपदेश किया था, उसीको मैं संक्षेपमें बताऊँगा ६ आपलोग सावधान होकर सुनिये ॥४-६ ॥, [ वायुदेव बोले— ] महर्षियो! पूर्वकालमें श्रीकृष्ण-७ रूपधारी भगवान् विष्णुने अपने आसनपर बैठे हुए महर्षि उपमन्युसे उन्हें प्रणाम करके न्यायपूर्वक यों प्रश्न किया ॥७ ॥

श्रीकृष्णने कहा — भगवन्! महादेवजीने देवी पार्वतीको जिस दिव्य पाशुपत ज्ञान तथा अपनी ८ सम्पूर्ण विभूतिका उपदेश दिया था, मैं उसीको सुनना चाहता हूँ । महादेवजी पशुपति कैसे हुए? पशु कौन कहलाते हैं? वे पशु किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और ९ फिर किस प्रकार उनसे मुक्त होते हैं? ॥ ८ - ९ ॥ महात्मा श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर श्रीमान् प्रणम्य देवं देवीं च प्राह पृष्टो यथा तथा ॥ १० उपमन्युने महादेवजी तथा देवी पार्वतीको प्रणाम करके उनके प्रश्नके अनुसार उत्तर देना आरम्भ किया ॥१० ॥

उपमन्युरुवाच उपमन्यु बोले – देवकीनन्दन! ब्रह्माजीसे लेकर ब्रह्माद्या: स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य शूलिनः । स्थावरपर्यन्त जो भी संसारके वशवर्ती चराचर प्राणी हैं, पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः ॥ ११ वे सब - के - सब भगवान् शिवके पशु कहलाते हैं और तेषां पतित्वाद्देवेशः उनके पति होनेके कारण देवेश्वर शिवको पशुपति कहा शिवः पशुपतिः स्मृतः । गया है । वे पशुपति अपने पशुओंको मल और माया मलमायादिभिः पाशैः स बध्नाति पशून् पतिः ॥ १२ आदि पाशोंसे बाँधते हैं और भक्तिपूर्वक उनके द्वारा

स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः ।

चतुर्विंशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा अमी ॥ १३

विषया इति कथ्यन्ते पाशा जीवनिबन्धनाः ।

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तान् पशून् बद्ध्वा महेश्वरः ॥ १४

पाशैरेतैः पतिर्देवः कार्यं कारयति स्वकम् ।

तस्याज्ञया महेशस्य प्रकृतिः पुरुषोचिताम् ॥ १५

बुद्धिं प्रसूते सा बुद्धिरहङ्कारमहङ्कृतिः ।

इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रापञ्चकं तथा ॥ १६

शासनाद्देवदेवस्य शिवस्य शिवदायिनः ।

तन्मात्राण्यपि तस्यैव शासनेन महीयसा ॥ १७

आराधित होनेपर वे स्वयं ही उन्हें उन पाशोंसे मुक्त करते हैं ॥ ११-१२१ / २ ॥ जो चौबीस तत्त्व हैं, वे मायाके कार्य एवं गुण हैं । वे ही विषय कहलाते हैं, जीवों ( पशुओं ) -को बाँधनेवाले पाश वे ही हैं । इन पाशोंद्वारा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त समस्त पशुओंको बाँधकर महेश्वर पशुपतिदेव उनसे अपना कार्य कराते हैं ॥ १३-१४१ / २ ॥ उन महेश्वरकी ही आज्ञासे प्रकृति पुरुषोचित बुद्धिको जन्म देती है । बुद्धि अहंकारको प्रकट करती है तथा अहंकार कल्याणदायी देवाधिदेव शिवकी आज्ञासे ग्यारह इन्द्रियों और पाँच तन्मात्राओंको उत्पन्न करता है । तन्मात्राएँ भी उन्हीं महेश्वरके महान् शासनसे प्रेरित हो क्रमशः पाँच महाभूतोंको उत्पन्न

पृष्ठ 899

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 899 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २ ] वायवीयसंहिता

महाभूतान्यशेषाणि भावयन्त्यनुपूर्वशः ।

ब्रह्मादीनां तृणान्तानां देहिनां देहसङ्गतिम् ॥ १८

महाभूतान्यशेषाणि जनयन्ति शिवाज्ञया ।

अध्यवस्यति बुद्धिरहङ्कारोऽभिमन्यते ॥ १ ९

चित्तं चेतयते चापि मनः सङ्कल्पयत्यपि ।

श्रोत्रादीनि च गृह्णन्ति शब्दादीन् विषयान् पृथक् ॥ २०

स्वानेव नान्यान् देवस्य दिव्येनाज्ञाबलेन वै ।

वागादीन्यपि यान्यासंस्तानि कर्मेन्द्रियाणि च ॥ २१

यथास्वं कर्म कुर्वन्ति नान्यत्किंचिद् शिवाज्ञया ।

शब्दादयोऽपि गृह्यन्ते क्रियन्ते वचनादयः ॥ २२

अविलङ्घ्या हि सर्वेषामाज्ञा शंभोगरीयसी ।

अवकाशमशेषाणां भूतानां संप्रयच्छति ॥ २३

आकाशः परमेशस्य शासनादेव सर्वगः ।

प्राणाद्यैश्च तथा नामभेदैरंतर्बहिर्जगत् ॥ २४

बिभर्ति सर्वं शर्वस्य शासनेन प्रभञ्जनः ।

हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ॥ २५

पाकाद्यं च करोत्यग्निः परमेश्वरशासनात् ।

सञ्जीवनाद्यं सर्वस्य कुर्वन्त्यापस्तदाज्ञया ॥ २६

विश्वम्भरा जगन्नित्यं धत्ते विश्वेश्वराज्ञया ।

देवान् पात्यसुरान् हन्ति त्रिलोकमभिरक्षति ॥ २७

आज्ञया तस्य देवेन्द्रः सर्वैर्देवैरलङ्घ्यया ।

आधिपत्यमपां नित्यं कुरुते वरुणः सदा ॥ २८

पाशैर्बध्नाति च यथा दण्ड्यांस्तस्यैव शासनात् ।

ददाति नित्यं यक्षेन्द्रो द्रविणं द्रविणेश्वरः ॥ २ ९

पुण्यानुरूपं भूतेभ्यः पुरुषस्यानुशासनात् ।

करोति सम्पदः शश्वत् ज्ञानं चापि सुमेधसाम् ॥ ३०

निग्रहं चाप्यसाधूनामीशानः शिवशासनात् ।

धत्ते तु धरणीं मूर्ध्ना शेषः शिवनियोगतः ॥ ३१

यामाहुस्तामसीं रौद्रीं मूर्तिमन्तकरीं हरेः ।

सृजत्यशेषमीशस्य शासनाच्चतुराननः ॥ ३२

अन्याभिर्मूर्तिभिः स्वाभिः पाति चान्ते निहन्ति च । ( उत्तरखण्ड ) ८८५ करती हैं । वे सब महाभूत शिवकी आज्ञासे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके लिये देहकी सृष्टि करते हैं, बुद्धि कर्तव्यका निश्चय करती है और अहंकार अभिमान करता है । चित्त चेतता है और मन संकल्प - विकल्प करता है, श्रवण आदि ज्ञानेन्द्रियाँ पृथक् - पृथक् शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करती हैं ॥ १५–२० ॥ वे महादेवजीके आज्ञाबलसे केवल अपने ही विषयोंको ग्रहण करती हैं । वाक् आदि कर्मेन्द्रियाँ कहलाती | हैं और शिवकी इच्छासे अपने लिये नियत कर्म ही करती हैं, दूसरा कुछ नहीं । शब्द आदि जाने जाते हैं और बोलना आदि कर्म किये जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ इन सबके लिये भगवान् शंकरकी गुरुतर आज्ञाका उल्लंघन करना असम्भव है । परमेश्वर शिवके शासनसे ही आकाश सर्वव्यापी होकर समस्त प्राणियोंको अवकाश प्रदान करता है, वायुतत्त्व भगवान् शिवकी आज्ञासे प्राण आदि नामभेदोंद्वारा बाहर - भीतरके सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है । अग्नितत्त्व देवताओंके लिये हव्य और कव्यभोजी पितरोंके लिये कव्य पहुँचाता है । साथ ही मनुष्योंके लिये पाक आदिका भी कार्य करता है । जल सबको जीवन देता है और पृथ्वी सम्पूर्ण जगत्को सदा धारण किये रहती है ॥ २३–२६१ / २ ॥ शिवकी आज्ञा सम्पूर्ण देवताओंके लिये अलंघनीय है । उसीसे प्रेरित होकर देवराज इन्द्र देवताओंका पालन, दैत्योंका दमन और तीनों लोकोंका संरक्षण करते हैं । वरुणदेव सदा जलतत्त्वके पालन और संरक्षणका कार्य सँभालते हैं, साथ ही दण्डनीय प्राणियोंको अपने पाशोंद्वारा बाँध लेते हैं । धनके स्वामी यक्षराज कुबेर प्राणियोंको उनके पुण्यके अनुरूप सदा धन देते हैं और उत्तम बुद्धिवाले पुरुषोंको सम्पत्तिके साथ ज्ञान भी प्रदान करते हैं ॥ २७–३० ॥ ईश्वर असाधु पुरुषोंका निग्रह करते हैं तथा शेष शिवकी ही आज्ञासे अपने मस्तकपर पृथ्वीको धारण करते हैं । उन शेषको श्रीहरिकी तामसी रौद्रमूर्ति कहा गया है, जो जगत्का प्रलय करनेवाली है । ब्रह्माजी शिवकी ही आज्ञासे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं तथा अपनी अन्य मूर्तियोंद्वारा पालन और संहारका कार्य भी करते हैं ॥ ३१-३२१ / २ ॥

पृष्ठ 900

शिव महापुराण - २, पृष्ठ 900 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८८६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ भगवान् विष्णु कालके भी काल शिवजीकी विष्णुः पालयते विश्वं कालकालस्य शासनात् ॥ ३३ अपनी त्रिविध मूर्तियोंद्वारा विश्वका | आज्ञासे पालन सृजते ग्रसते चापि स्वकाभिस्तनुभिस्त्रिभिः । | सर्जन और संहार भी करते हैं । विश्वात्मा भगवान्, हरत्यन्ते जगत्सर्वं हरस्तस्यैव शासनात् । | भी तीन रूपोंमें विभक्त हो उन्हींकी आज्ञासे सम्पूर्ण हर सृजत्यपि च विश्वात्मा त्रिधा भिन्नस्तु रक्षति ॥ ३४ | जगत्का संहार, सृष्टि और रक्षा करते हैं । काल कालः करोति सकलं कालः संहरति प्रजाः । | सबको उत्पन्न करता है । वही प्रजाओंका संहार कालः पालयते विश्वं कालकालस्य शासनात् ॥ ३५ करता है तथा वही विश्वका पालन करता है । यह सब

त्रिभिरंशैर्जगद् बिभ्रत्तेजोभिर्वृष्टिमादिशन् ।

दिवि वर्षत्यसौ भानुर्देवदेवस्य शासनात् ॥३६

पुष्णात्योषधिजातानि भूतान्याह्लादयत्यपि ।

देवैश्च पीयते चन्द्रश्चन्द्रभूषणशासनात् ॥ ३७

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा ॥ ३८

खेचरा ऋषयः सिद्धा भोगिनो मनुजा मृगाः ।

पशवः पक्षिणश्चैव कीटाद्याः स्थावराणि च ॥ ३ ९

नद्यः समुद्रा गिरयः काननानि सरांसि च ।

वेदाः साङ्गाश्च शास्त्राणि मन्त्रस्तोममखादयः ॥ ४०

कालाग्न्यादिशिवान्तानि भुवनानि सहाधिपैः ।

ब्रह्माण्डान्यप्यसंख्यानि तेषामावरणानि च ॥ ४१

वर्तमानान्यतीतानि भविष्यन्त्यपि कृत्स्नशः ।

दिशश्च विदिशश्चैव कालभेदाः कलादयः ॥ ४२

यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।

तत्सर्वं शङ्करस्याज्ञाबलेन समधिष्ठितम् ॥ ४३

आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थि धराधरा वारिधराः समुद्राः । ज्योतिर्गणाः शक्रमुखाश्च देवाः स्थिरं चरं वा चिदचिद्यदस्ति ॥ ४४ उपमन्युरुवाच

अत्याश्चर्यमिदं कृष्ण शंभोरमितकर्मणः । ।

आज्ञाकृतं शृणुष्वैतत् श्रुतं श्रुतिमुखे मया ॥ ४५

| वह महाकालकी आज्ञासे प्रेरित होकर ही करता है ॥ ३३–३५१ / २ ॥ भगवान् सूर्य उन्हीं देवाधिदेवकी आज्ञासे अपने तीन अंशोंद्वारा जगत्का पालन करते, अपनी किरणोंद्वारा वृष्टिके लिये आदेश देते और स्वयं ही आकाशमें मेघ बनकर बरसते हैं । चन्द्रभूषण शिवका शासन मानकर ही चन्द्रमा ओषधियोंको पोषित और प्राणियोंको आह्लादित करते हैं । साथ ही देवताओंको अपनी अमृतमयी कलाओंका पान करने देते हैं ॥ ३६-३७ ॥ आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आकाशचारी ऋषि, सिद्ध, नागगण, मनुष्य, मृग, पशु, पक्षी, कीट आदि, स्थावर प्राणी, नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वन, सरोवर, अंगोंसहित वेद, शास्त्र, मन्त्र, वैदिकस्तोत्र और यज्ञ आदि, कालाग्निसे लेकर शिवपर्यन्त भुवन, उनके अधिपति, असंख्य ब्रह्माण्ड, उनके आवरण, वर्तमान, भूत और भविष्य, दिशा-विदिशाएँ, कला आदि कालके भिन्न - भिन्न भेद तथा जो कुछ भी इस जगत्में देखा और सुना जाता है, वह सब भगवान् शंकरकी आज्ञाके बलसे ही टिका हुआ है ॥ ३८–४३ ॥ उनकी आज्ञाके ही बलसे यहाँ पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, नक्षत्रगण, इन्द्रादि देवता, स्थावर, जंगम अथवा जड और चेतन - सबकी स्थिति है ॥४४ ॥

उपमन्यु बोले — हे कृष्ण! अगणित लीलाकृत्य करनेवाले भगवान् शिवकी आज्ञाशक्तिसे सम्पन्न हुए कृत्य अतीव अद्भुत हैं । वेद - शास्त्रादिमें [ वर्णित उन चरित्रोंको जैसा ] मैंने सुना है, उसे आपलोग श्रवण कीजिये ॥ ४५ ॥