शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 901–910

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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अ ० २ ] वायवीयसंहिता

किल सुराः सेन्द्रा विवदन्तः परस्परम् ।

पुरा समरे जित्वा जेताऽहमहमित्युत ॥ ४६

असुरान् महेश्वरस्तेषां मध्यतो वरवेषधृक् । तदा स्वलक्षणैर्विहीनाङ्गः स्वयं यक्ष इवाभवत् ॥ ४७

स तानाह सुरानेकं तृणमाधाय भूतले ।

य एतद्विकृतं कर्तुं क्षमते स तु दैत्यजित् ॥ ४८

यक्षस्य वचनं श्रुत्वा वज्रपाणिः शचीपतिः ।

किञ्चित् क्रुद्धो विहस्यैनं तृणमादातुमुद्यतः ॥ ४ ९

न तत्तृणमुपादातुं मनसापि च शक्यते ।

यथा तथापि तच्छेत्तुं वज्रं वज्रधरोऽसृजत् ॥ ५०

तद्वज्रं निजवज्रेण संसृष्टमिव सर्वतः ।

तृणेनाभिहतं तेन तिर्यगग्रं पपात ह ॥५१

ततश्चान्ये सुसंरब्धा लोकपाला महाबलाः ।

ससृजुस्तृणमुद्दिश्य स्वायुधानि सहस्रशः ॥ ५२

प्रजज्वाल महावह्निः प्रचण्डः पवनो ववौ ।

प्रवृद्धोऽपांपतिर्यद्वत्प्रलये समुपस्थिते ॥ ५३

एवं देवैः समारब्धं तृणमुद्दिश्य यत्नतः ।

व्यर्थमासीदहो कृष्ण यक्षस्यात्मबलेन वै ॥५४

तदाह यक्षं देवेन्द्रः को भवानित्यमर्षितः ।

ततः स पश्यतामेव तेषामन्तरधादथ ॥ ५५

तदन्तरे हैमवती देवी दिव्यविभूषणा ।

आविरासीन्नभोरङ्गे शोभमाना शुचिस्मिता ॥ ॥५६

तां दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः ।

प्रणम्य यक्षं पप्रच्छुः कोऽसौ यक्षो विलक्षणः ॥ ५७

साऽब्रवीत्सस्मितं देवी स युष्माकमगोचरः ।

येनेदं भ्राम्यते चक्रं संसाराख्यं चराचरम् ॥५८

तेनादौ क्रियते विश्वं तेन संह्रियते पुनः ।

न तन्नियन्ता कश्चित् स्यात्तेन सर्वं नियम्यते ॥ ५ ९

( उत्तरखण्ड ) ८८७ पूर्वकालमें इन्द्रसहित सभी देवता युद्धमें असुरोंको जीतकर जब आपसमें यह विवाद करने लगे कि जीतने-वाला मैं हूँ, तब उनके मध्य शिवजी [ अर्धचन्द्र, तृतीय नेत्र आदि ] अपने चिह्नोंसे रहित हो, उत्तम वेषधारण किये हुए [ किसी ] यक्षकी भाँति [ वहाँ उपस्थित ] हो गये । उन्होंने पृथ्वीतलपर एक तृण रखकर उन देवताओंसे कहा — जो इसे विकृत करनेमें समर्थ हो सके, वही दैत्योंको जीतनेवाला है ॥ ४६–४८ ॥ यक्षका वचन सुनकर हाथमें वज्र धारण करनेवाले शचीपति [ इन्द्र ] कुछ कुपित हो गये और हँस करके इस तृणको उठानेका उद्योग करने लगे ॥ ४ ९ ॥ परंतु वे उस तृणको उठा पानेमें मनसे भी सक्षम नहीं हो सके । तब उन्होंने उस तृणको काटनेके लिये अपने वज्रसे [ अन्य ] वज्रको उत्पन्न करके जैसे - तैसे छोड़ा, पर तृणसे टकराकर वह वज्र तिरछा होकर । उनके आगे गिर पड़ा॥५०-५१ ॥ तदनन्तर अन्य महाबली लोकपाल भी उस तृणको उद्देश्य करके अपने हजारों अस्त्र चलाने लगे । उस समय प्रलय उपस्थित होनेकी भाँति महान् अग्नि प्रज्वलित हो उठी, भयंकर हवा चलने लगी और समुद्र बढ़ने लगा॥५२-५३ ॥ हे कृष्ण! इस प्रकार देवताओंके द्वारा यत्नपूर्वक किये गये सभी उपाय यक्षके आत्मबलसे व्यर्थ हो गये । तदनन्तर देवेन्द्रने कुपित होकर यक्षसे कहा— आप कौन हैं? तब उन [ देवताओं ] -के देखते - देखते वह [ यक्ष ] अन्तर्धान हो गया॥५४-५५ ॥ इसके बाद दिव्य आभूषणोंको धारण की हुई पवित्र मुसकानवाली देवी हैमवती आकाशमण्डलमें प्रकट हुईं । उन्हें देखकर इन्द्र आदि देवता विस्मयमें पड़ गये और उन्हें प्रणाम करके पूछने लगे कि यह विलक्षण यक्ष कौन था? ॥५६-५७ ॥ तब उन देवीने मुसकराकर कहा — ‘ वे आप लोगोंके लिये अगोचर हैं [ अर्थात् आप लोगोंकी दृष्टिसे परे हैं ] उन्हींके द्वारा यह चराचर संसार - चक्र चलाया जा रहा है । उन्हींके द्वारा प्रारम्भमें विश्वका सृजन किया जाता है और उन्हींके द्वारा पुनः संहार कर लिया जाता है । उनका नियन्ता [ अन्य ] कोई नहीं है; उन्हींके द्वारा । सबपर नियन्त्रण किया जाता है ॥ ५८-५९ ॥

पृष्ठ 902

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ ८८८ । ऐसा कहकर वे महादेवी वहींपर अन्तर्धान इत्युक्त्वा सा महादेवी तत्रैवान्तरधीयत गयीं और विस्मित हुए सभी देवता उन्हें प्रणाम हो सर्वे तां प्रणम्य दिवं ययुः ॥ ६० । स्वर्गको चले गये ॥ ६० ॥ करके ।

देवाश्च विस्मिताः शिवमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे उत्तरखण्डमें ॥ २ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके शिवमाहात्म्यवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः भगवान् शिवकी ब्रह्मा आदि पंचमूर्तियों, ईशानादि ब्रह्ममूर्तियों तथा पृथ्वी एवं शर्व आदि अष्टमूर्तियोंका परिचय और उनकी सर्वव्यापकताका वर्णन उपमन्युरुवाच

शृणु कृष्ण महेशस्य शिवस्य परमात्मनः ।

मूर्त्यात्मभिस्ततं कृत्स्नं जगदेतच्चराचरम् ॥

स शिवः सर्वमेवेदं स्वकीयाभिश्च मूर्तिभिः ।

अधितिष्ठत्यमेयात्मा ह्येतत्सर्वमनुस्मृतम् ॥

ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो महेशानः सदाशिवः ।

मूर्त्तयस्तस्य विज्ञेया याभिर्विश्वमिदं ततम् ॥

अथान्याश्चापि तनवः पञ्च ब्रह्मसमाह्वयाः ।

तनूभिस्ताभिरव्याप्तमिह किञ्चिन्न विद्यते ॥

ईशानः पुरुषोऽघोरो वामः सद्यस्तथैव च ।

ब्रह्माण्येतानि देवस्य मूर्त्तयः पञ्च विश्रुताः ॥

ईशानाख्या तु या तस्य मूर्त्तिराद्या गरीयसी ।

भोक्तारं प्रकृतेः साक्षात् क्षेत्रज्ञमधितिष्ठति ॥

स्थाणोस्तत्पुरुषाख्या या मूर्तिर्मूर्तिमतः प्रभोः ।

गुणाश्रयात्मकं भोग्यमव्यक्तमधितिष्ठति ॥

धर्माद्यष्टाङ्गसंयुक्तं बुद्धितत्त्वं पिनाकिनः ।

अधितिष्ठत्यघोराख्या मूर्त्तिरत्यन्तपूजिता ॥

वामदेवाह्वयां मूर्त्तिं महादेवस्य वेधसः । अहंकृतेरधिष्ठात्रीमाहुरागमवेदिनः सद्योजाताह्वयां मूर्त्तिं शम्भोरमितवर्चसः ॥ । मानसः समधिष्ठात्रीं मतिमन्तः उपमन्यु कहते हैं— श्रीकृष्ण! महेश्वर परमात्मा शिवकी मूर्तियोंसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् [ किस १ प्रकार ] व्याप्त है, यह सुनो ॥ १ ॥

अप्रमेय स्वरूपवाले उन शिवने अपनी मूर्तियोंके द्वारा इस सम्पूर्ण संसारको अधिष्ठित कर रखा है, यह २ सब बातें तो [ तुमको ] स्मरण ही हैं ॥ २ ॥

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेशान तथा सदाशिव- ये ३ उन परमेश्वरकी पाँच मूर्तियाँ जाननी चाहिये, जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व विस्तारको प्राप्त हुआ है ॥ ३ ॥

इनके सिवा और भी उनके पाँच शरीर हैं, जिन्हें पंच-४ ब्रह्म ( सद्योजात आदि ) कहते हैं । इस जगत् में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन मूर्तियोंसे व्याप्त न हो ॥ ४ ॥

ईशान, पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात– ५ ये महादेवजीकी विख्यात पाँच ब्रह्ममूर्तियाँ हैं ॥५ ॥

इनमें जो ईशान नामक उनकी आदि श्रेष्ठतम ६ मूर्ति है, वह प्रकृतिके साक्षात् भोक्ता क्षेत्रज्ञको व्याप्त करके स्थित है । मूर्तिमान् प्रभु शिवकी जो तत्पुरुष नामक मूर्ति है, वह गुणोंके आश्रयरूप भोग्य अव्यक्त ७ ( प्रकृति ) -में अधिष्ठित है ॥ ६-७ ॥ पिनाकपाणि महेश्वरकी जो अत्यन्त पूजित ८ अघोर नामक मूर्ति है, वह धर्म आदि आठ अंगोंसे युक्त बुद्धितत्त्वको अपना अधिष्ठान बनाती है ॥ ८ ॥

विधाता महादेवकी वामदेव नामक मूर्तिको आगम-९ वेत्ता विद्वान् अहंकारकी अधिष्ठात्री बताते हैं ॥ ९ ॥

बुद्धिमान् पुरुष अमित तेजस्वी शिवकी सद्योजात प्रचक्षते ॥ १० नामक मूर्तिको मनकी अधिष्ठात्री कहते हैं ॥ १० ॥

पृष्ठ 903

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अ ० ३ ] वायवीयसंहिता

श्रोत्रस्य वाचः शब्दस्य विभोर्व्योम्नस्तथैव च ।

ईश्वरीमीश्वरस्येमामीशाख्यां हि विदुर्बुधाः ॥ ११

त्वक्पाणिस्पर्शवायूनामीश्वरीं मूर्तिमैश्वरीम् ।

पुरुषाख्यं विदुः सर्वे पुराणार्थविशारदाः ॥ १२

चक्षुषश्चरणस्यापि रूपस्याग्नेस्तथैव च ।

अघोराख्यामधिष्ठात्रीं मूर्तिमाहुर्मनीषिणः ॥ १३

रसनायाश्च पायोश्च रसस्यापां तथैव च ।

ईश्वरीं वामदेवाख्यां मूर्त्तिं तन्निरतां विदुः ॥ १४

घ्राणस्य चैवोपस्थस्य गन्धस्य च भुवस्तथा ।

सद्योजाताह्वयां मूर्तिमीश्वरीं सम्प्रचक्षते ॥ १५

मूर्तयः पञ्च देवस्य वंदनीयाः प्रयत्नतः ।

श्रेयोऽर्थिभिर्नरैर्नित्यं श्रेयसामेकहेतवः ॥ १६ ।

तस्य देवादिदेवस्य मूर्त्यष्टकमयं जगत् ।

तस्मिन् व्याप्य स्थितं विश्वं सूत्रे मणिगणा इव ॥ १७

शर्वो भवस्तथा रुद्र उग्रो भीमः पशोः पतिः ।

ईशानश्च महादेवो मूर्त्तयश्चाष्ट विश्रुताः ॥ १८

भूम्यम्भोऽग्निमरुद्व्योमक्षेत्रज्ञार्कनिशाकराः ।

अधिष्ठिता महेशस्य शर्वाद्यैरष्टमूर्त्तिभिः ॥ १ ९

चराचरात्मकं विश्वं धत्ते विश्वम्भरात्मिका ।

शार्वी शर्वाह्वया मूर्तिरिति शास्त्रस्य निश्चयः ॥ २०

सञ्जीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मिका ।

भावीति गीयते मूर्तिर्भवस्य परमात्मनः ॥ २१

बहिरन्तर्गता विश्वं व्याप्य तेजोमयी शुभा ।

रौद्री रुद्रस्य या मूर्तिरास्थिता घोररूपिणी ॥ २२

स्पन्दयत्यनिलात्मेदं बिभर्ति स्पन्दते स्वयम् ।

औग्रीति कथ्यते सद्धिमूर्तिरुग्रस्य वेधसः ॥ २३ ।

( उत्तरखण्ड ) ८८ ९ विद्वान् पुरुष भगवान् शिवकी ईशान नामक मूर्तिको श्रवणेन्द्रिय, वाणी, शब्द और व्यापक आकाशतत्त्वकी स्वामिनी मानते हैं । पुराणोंके अर्थज्ञानमें निपुण समस्त विद्वानोंने महेश्वरके तत्पुरुष नामक विग्रहको त्वचा, हाथ, स्पर्श और वायु - तत्त्वका स्वामी समझा है॥११-१२ ॥ मनीषी [ मुनि ] शिवकी अघोर नामक मूर्तिको नेत्र, पैर, रूप और अग्नि - तत्त्वकी अधिष्ठात्री बताते हैं ॥ १३ ॥

भगवान् शिवके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले महात्मा पुरुष उनकी वामदेव नामक मूर्तिको रसना, पायु, रस और जलतत्त्वकी स्वामिनी समझते हैं तथा सद्योजात नामक मूर्तिको वे घ्राणेन्द्रिय, उपस्थ, गन्ध और पृथ्वी - तत्त्वकी अधिष्ठात्री कहते हैं ॥ १४-१५ ॥ महादेवजीकी ये पाँचों मूर्तियाँ कल्याणकी एकमात्र हेतु हैं । कल्याणकामी पुरुषोंको इनकी सदा ही यत्नपूर्वक वन्दना करनी चाहिये । उन देवाधिदेव महादेवजीकी जो आठ मूर्तियाँ हैं, तत्स्वरूप ही यह जगत् है । उन आठ मूर्तियोंमें यह विश्व उसी प्रकार ओतप्रोतभावसे स्थित है, जैसे सूतमें मनके पिरोये होते हैं ॥ १६-१७ ॥ शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान तथा महादेव - ये शिवकी विख्यात आठ मूर्तियाँ हैं ॥ १८ ॥

महेश्वरकी इन शर्व आदि आठ मूर्तियोंसे क्रमशः भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा अधिष्ठित होते हैं । उनकी पृथ्वीमयी मूर्ति सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है । उसके अधिष्ठाताका नाम शर्व है । इसलिये वह शिवकी ' शार्वी ' मूर्ति कहलाती है । यही शास्त्रका निर्णय है ॥ १ ९ -२० ॥ उनकी जलमयी मूर्ति समस्त जगत्के लिये जीवनदायिनी है । जल परमात्मा भवकी मूर्ति है, इसलिये उसे ' भावी ' कहते हैं । शिवकी तेजोमयी शुभमूर्ति विश्वके बाहर - भीतर व्याप्त होकर स्थित है । उस घोररूपिणी मूर्तिका नाम रुद्र है, इसलिये वह ' रौद्री ' कहलाती है॥२१-२२ ॥ भगवान् शिव वायुरूपसे स्वयं गतिशील होते और इस जगत्को गतिशील बनाते हैं । साथ ही वे इसका भरण - पोषण भी करते हैं । वायु भगवान् उग्रकी मूर्ति है; इसलिये साधु पुरुष इसे ' औग्री ' कहते हैं ॥ २३ ॥

पृष्ठ 904

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८ ९ ० श्रीशिवमहापुराण अ ० ३ सर्वावकाशदा सर्वव्यापिका गगनात्मिका । भगवान् भीमकी आकाशरूपिणी मूर्ति सबको मूर्तिर्भीमस्य भीमाख्या भूतवृन्दस्य भेदिका ॥ २४ | अवकाश देनेवाली, सर्वव्यापिनी तथा भूतसमुदायकी । भेदिका है । वह भीमा नामसे प्रसिद्ध है ( अत: इसे ' भैमी ' मूर्ति भी कहते हैं ) । सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें निवास सर्वात्मनामधिष्ठात्री सर्वक्षेत्रनिवासिनी । | करनेवाली तथा सम्पूर्ण आत्माओंकी अधिष्ठात्री मूर्तिः पशुपतेर्ज्ञेया पशुपाशनिकृन्तनी ॥ २५ शिव - मूर्तिको ' पशुपति ' मूर्ति समझना चाहिये । वह

दीपयन्ती जगत्सर्वं दिवाकरसमाह्वया ।

ईशानाख्या महेशस्य मूर्तिर्दिवि विसर्पति ॥

आप्याययति यो विश्वममृतांशुर्निशाकरः महादेवस्य सा मूर्तिर्महादेवसमाह्वया ॥

आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिः शिवस्य परमात्मनः ।

व्यापिकेतरमूर्तीनां विश्वं तस्मात् शिवात्मकम् ॥

वृक्षस्य मूलसेकेन शाखाः पुष्यन्ति वै यथा ।

शिवस्य पूजया तद्वत्पुष्यत्यस्य वपुर्जगत् ॥

सर्वाभयप्रदानं च सर्वानुग्रहणं तथा ।

सर्वोपकारकरणं शिवस्याराधनं विदुः ॥

यथेह पुत्रपौत्रादेः प्रीत्या प्रीतो भवेत्पिता ।

तथा सर्वस्य संप्रीत्या प्रीतो भवति शङ्करः ॥

देहिनो यस्य कस्यापि क्रियते यदि निग्रहः ।

अनिष्टमष्टमूर्तेस्तत्कृतमेव न संशयः ॥

अष्टमूर्त्यात्मना विश्वमधिष्ठाय स्थितं शिवम् ।

भजस्व सर्वभावेन रुद्रं परमकारणम् ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां रुपदेशवर्णनं । पशुओंके पाशोंका उच्छेद करनेवाली है ॥ २४-२५ ॥ महेश्वरकी जो ‘ ईशान ' नामक मूर्ति है, वही २६ दिवाकर ( सूर्य ) नाम धारण करके सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करती हुई आकाशमें विचरती है ॥ २६ ॥

। जिनकी किरणोंमें अमृत भरा है और जो सम्पूर्ण २७ विश्वको उस अमृतसे आप्यायित करते हैं, वे चन्द्रदेव भगवान् शिवके महादेव नामक विग्रह हैं; अत: उन्हें ' महादेव ' मूर्ति कहते हैं । यह जो आठवीं मूर्ति है, वह २८ परमात्मा शिवका साक्षात् स्वरूप है तथा अन्य सब मूर्तियोंमें व्यापक है । इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व शिवरूप ही है ॥ २७-२८ ॥ जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ २ ९ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार भगवान् शिवकी पूजासे उनके स्वरूपभूत जगत्का पोषण होता है । इसलिये सबको अभय दान देना, सबपर अनुग्रह करना और सबका ३० उपकार करना - यह शिवका आराधन माना गया है । जैसे इस जगत्में अपने पुत्र - पौत्र आदिके प्रसन्न रहनेसे ३१ पिता- पितामह आदिको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्की प्रसन्नतासे भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं । यदि किसी भी देहधारीको दण्ड दिया जाता है तो ३२ उसके द्वारा अष्टमूर्तिधारी शिवका ही अनिष्ट किया जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ९ –३२ ॥ आठ मूर्तियोंके रूपमें सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए भगवान् शिवका तुम सब प्रकारसे भजन ३३ करो; क्योंकि रुद्रदेव सबके परम कारण हैं ॥ ३३ ॥

वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे कृष्णायोपमन्यो-नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें श्रीकृष्णको उपमन्युका उपदेशवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

पृष्ठ 905

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अ ० ४ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) ८ ९ १ अथ चतुर्थोऽध्यायः शिव और शिवाकी श्रीकृष्ण उवाच परमेशस्य शर्वस्यामिततेजसः । भगवन् मूर्तिभिर्विश्वमेवेदं यथा व्याप्तं तथा श्रुतम् ॥ १

अथैतत् ज्ञातुमिच्छामि याथात्म्यं परमेशयोः ।

स्त्रीपुम्भावात्मकं चेदं ताभ्यां कथमधिष्ठितम् ॥ २

उपमन्युरुवाच

श्रीमद्विभूतिं शिवयोर्याथात्म्यं च समासतः ।

वक्ष्ये तद्विस्तराद्वक्तुं भवेनापि न शक्यते ॥ ३

शक्ति साक्षान्महादेवी महादेवश्च शक्तिमान् ।

तयोर्विभूतिलेशो वै सर्वमेतच्चराचरम् ॥ ४

वस्तु किञ्चिदचिद्रूपं किञ्चिद्वस्तु चिदात्मकम् ।

द्वयं शुद्धमशुद्धं च परं चापरमेव च ॥ ५

यत्संसरति चिच्चक्रमचिच्चक्रसमन्वितम् ।

तदेवाशुद्धमपरमितरं तु परं शुभम् ॥ ६

अपरं च परं चैव द्वयं चिदचिदात्मकम् ।

शिवस्य च शिवायाश्च स्वाम्यं चैतत्स्वभावतः ॥ ७

शिवयोर्वै वशे विश्वं न विश्वस्य वशे शिवौ ।

ईशितव्यमिदं यस्मात्तस्माद्विश्वेश्वरौ शिवौ ॥ ८

यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः ।

नानयोरन्तरं विद्याच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ ९

चन्द्रो न खलु भात्येष यथा चंद्रिकया विना ।

न भाति विद्यमानोऽपि तथा शक्त्या विना शिवः ॥ १०

विभूतियोंका वर्णन श्रीकृष्णने पूछा — भगवन्! अमित तेजस्वी भगवान् शिवकी मूर्तियोंने इस सम्पूर्ण जगत्को जिस प्रकार व्याप्त कर रखा है, वह सब मैंने सुना । अब मुझे यह जाननेकी इच्छा है कि परमेश्वरी शिवा और परमेश्वर शिवका यथार्थ स्वरूप क्या है, उन दोनोंने स्त्री और पुरुषरूप इस जगत्को किस प्रकार व्याप्त कर रखा है? ॥१-२ ॥ उपमन्यु बोले – देवकीनन्दन! मैं शिवा और शिवके श्रीसम्पन्न ऐश्वर्यका और उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपका संक्षेपसे वर्णन करूँगा । विस्तारपूर्वक इस विषयका वर्णन तो भगवान् शिव भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

साक्षात् महादेवी पार्वती शक्ति हैं और महादेवजी शक्तिमान् । उन दोनोंकी विभूतिका लेशमात्र ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के रूपमें स्थित है । यहाँ कोई वस्तु जडरूप है और कोई वस्तु चेतनरूप । वे दोनों क्रमशः शुद्ध, अशुद्ध तथा पर और अपर कहे गये हैं ॥ ४-५ ॥ जो चिन्मण्डल जडमण्डलके साथ संयुक्त हो संसारमें भटक रहा है, वही अशुद्ध और अपर कहा गया है । उससे भिन्न जो जडके बन्धनसे मुक्त है, वह पर और शुद्ध कहा गया है । अपर और पर चिदचित्स्वरूप हैं, इनपर स्वभावतः शिव और शिवाका स्वामित्व है॥६-७ ॥ शिवा और शिवके ही वशमें यह विश्व है । विश्वके वशमें शिवा और शिव नहीं हैं । यह जगत् शिव और शिवाके शासनमें है, इसलिये वे दोनों इसके ईश्वर या विश्वेश्वर कहे गये हैं ॥८ ॥

जैसे शिव हैं वैसी शिवादेवी हैं, तथा जैसी शिवादेवी हैं, वैसे ही शिव हैं । जिस तरह चन्द्रमा और उनकी चाँदनीमें कोई अन्तर नहीं है, उसी प्रकार शिव और शिवामें कोई अन्तर न समझे । जैसे चन्द्रिकाके बिना ये चन्द्रमा सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार शिव विद्यमान होनेपर भी शक्तिके बिना सुशोभित नहीं होते॥९ -१० ॥

पृष्ठ 906

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८ ९ २ प्रभया हि विना यद्वद्भानुरेष न विद्यते प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या च विना शिवः शक्तो यया शिवो नित्यं भुक्तौ मुक्तौ च देहिनाम् आद्या सैका परा शक्तिश्चिन्मयी शिवसंश्रया यामाहुरखिलेशस्य तैस्तैरनुगुणैर्गुणैः समानधर्मिणीमेव शिवस्य परमात्मनः सैका परा च चिद्रूपा शक्तिः प्रसवधर्मिणी विभज्य बहुधा विश्वं विदधाति शिवेच्छया सा मूलप्रकृतिर्माया त्रिगुणा च त्रिधा स्मृता शिवया च विपर्यस्तं यया ततमिदं जगत् एकधा च द्विधा चैव तथा शतसहस्रधा शक्तयः खलु भिद्यन्ते बहुधा व्यवहारतः शिवेच्छया परा शक्तिः शिवतत्त्वैकतां गता ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे तैलं तिलादिव ततः क्रियाख्यया शक्त्या शक्तौ शक्तिमदुत्थया तस्यां विक्षोभ्यमाणायामादौ नादः समुद्बभौ ॥ नादाद्विनिःसृतो बिन्दुर्बिन्दोर्देवः सदाशिवः तस्मान् महेश्वरो जातः शुद्धविद्या महेश्वरात् ॥

सा वाचामीश्वरी शक्तिर्वागीशाख्या हि शूलिनः ।

या सा वर्णस्वरूपेण मातृकेति विजृंभिते ॥

अथानन्तसमावेशान् माया कालमवासृजत् ।

नियतिं च कलां विद्यां कलातो रागपूरुषौ ॥

मायातः पुनरेवाभूदव्यक्तं त्रिगुणात्मकम् ।

त्रिगुणाच्च ततोऽव्यक्ताद्विभक्ताः स्युस्त्रयो गुणाः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । जैसे ये सूर्यदेव कभी प्रभाके बिना नहीं ॥ ११ / और प्रभा भी उन सूर्यदेवके बिना नहीं रहती निरन्तर रहते । | उनके आश्रयमें ही रहती है, उसी प्रकार, ॥ | और शक्तिमान्को सदा एक - दूसरेकी अपेक्षा होती शक्ति ॥ १२ न तो शिवके बिना शक्ति रह सकती है और न शक्तिके है । । बिना शिव । जिसके द्वारा शिव सदा देहधारियोंको । । भोग और मोक्ष देनेमें समर्थ होते हैं, वह आद्या ॥१३। अद्वितीया चिन्मयी पराशक्ति शिवके ही आश्रित है ॥ ११–१३ ॥ । ज्ञानी पुरुष उसी शक्तिको सर्वेश्वर परमात्मा ॥ १४ शिवके अनुरूप उन - उन अलौकिक गुणोंके कारण उनकी समधर्मिणी कहते हैं । वह एकमात्र चिन्मयी । पराशक्ति सृष्टिधर्मिणी है । वही शिवकी इच्छासे ॥ १५ विभागपूर्वक नाना प्रकारके विश्वकी रचना करती है ॥ १४-१५ ॥ । वह शक्ति मूलप्रकृति, माया और त्रिगुणा - तीन ॥ १६ प्रकारकी बतायी गयी है, उस शक्तिरूपिणी शिवाने ही । इस जगत्का विस्तार किया है । व्यवहारभेदसे शक्तियोंके । एक - दो, सौ, हजार एवं बहुसंख्यक भेद हो जाते हैं । ॥ १७ शिवकी इच्छासे पराशक्ति शिवतत्त्वके साथ एकताको । प्राप्त होती है । तदुपरान्त कल्पके आदिमें उसी प्रकार ॥ १८ सृष्टिके प्रसंगमें शक्तिका प्रादुर्भाव होता है, जैसे तिलसे तेलका ॥ १६–१८ ॥ । तदनन्तर शक्तिमान्से शक्तिमें क्रियामयी शक्ति १ ९ प्रकट होती है । उसके विक्षुब्ध होनेपर आदिकालमें पहले नादकी उत्पत्ति हुई । फिर नादसे बिन्दुका । प्राकट्य हुआ और बिन्दुसे सदाशिव देवका । उन २० सदाशिवसे महेश्वर प्रकट हुए और महेश्वरसे शुद्ध विद्या ॥ १ ९ -२० ॥ वह वाणीकी ईश्वरी है । इस प्रकार त्रिशूलधारी २१ महेश्वरसे वागीश्वरी नामक शक्तिका प्रादुर्भाव हुआ, जो वर्णों ( अक्षरों ) -के रूपमें विस्तारको प्राप्त होती है । और मातृका कहलाती है । तदनन्तर अनन्तके समावेश २२ मायाने काल, नियति, कला और विद्याकी सृष्टि की । कलासे राग तथा पुरुष हुए । फिर मायासे ही त्रिगुणात्मिका अव्यक्त प्रकृति हुई । उस त्रिगुणात्मक अव्यक्तसे तीनों २३ । गुण पृथक् - पृथक् प्रकट हुए ॥ २१–२३ ॥

पृष्ठ 907

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अ ० ४ ] वायवीयसंहिता रजस्तमश्चेति यैर्व्याप्तमखिलं जगत् । सत्त्वं क्षोभ्यमाणेभ्यो गुणेशाख्यास्त्रिमूर्त्तयः ॥ २४ गुणेभ्यः महदादीनि तत्त्वानि च यथाक्रमम् । अभवन्

तेभ्यः स्युरण्डपिण्डानि त्वसंख्यानि शिवाज्ञया ।

अधिष्ठितान्यनन्ताद्यैर्विद्येशैश्चक्रवर्तिभिः ॥ २५

शरीरान्तरभेदेन शक्तेर्भेदाः प्रकीर्तिताः ।

नानारूपास्तु विज्ञेयाः स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ २६

रुद्रस्य रौद्री सा शक्तिर्विष्णोर्वै वैष्णवी मता ।

ब्रह्माणी ब्रह्मणः प्रोक्ता चेन्द्रस्यैन्द्रीति कथ्यते ॥ २७

किमत्र बहुनोक्तेन यद्विश्वमिति कीर्तितम् ।

शक्त्यात्मनैव तद्व्याप्तं यथा देहोऽन्तरात्मना ॥ २८

तस्मात् शक्तिमयं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।

कला या परमा शक्तिः कथिता परमात्मनः ॥ २ ९

एवमेषा परा शक्तिरीश्वरेच्छानुयायिनी ।

स्थिरं चरं च यद्विश्वं सृजतीति विनिश्चयः ॥ ३०

ज्ञानक्रिया चिकीर्षाभिस्तिसृभिः स्वात्मशक्तिभिः ।

शक्तिमानीश्वरः शश्वत् विश्वं व्याप्याधितिष्ठति ॥ ३१

इदमित्थमिदं नेत्थं भवेदित्येवमात्मिका ।

इच्छाशक्तिर्महेशस्य नित्या कार्यनियामिका ॥ ३२

ज्ञानशक्तिस्तु तत्कार्यं करणं कारणं तथा ।

प्रयोजनं च तत्त्वेन बुद्धिरूपाध्यवस्यति ॥३३

यथेप्सितं क्रियाशक्तिर्यथाध्यवसितं जगत् ।

कल्पयत्यखिलं कार्यं क्षणात् सङ्कल्परूपिणी ॥ ३४

यथाशक्ति त्रयोत्थानं शक्तिप्रसवधर्मिणी ।

शक्त्या परमया नुन्ना प्रसूते सकलं जगत् ॥ ३५

एवं शक्तिसमायोगात् शक्तिमानुच्यते शिवः ।

शक्तिशक्तिमदुत्थं तु शाक्तं शैवमिदं जगत् ॥ ३६

यथा न जायते पुत्रः पितरं मातरं विना ।

तथा भवं भवानीं च विना नैतच्चराचरम् ॥ ३७ ।

( उत्तरखण्ड ) ८ ९ ३ उनके नाम हैं - सत्त्व, रज और तम; इनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । गुणोंमें क्षोभ होनेपर उनसे गुणेश नामक तीन मूर्तियाँ प्रकट हुईं । साथ ही ' महत् ' आदि तत्त्वोंका क्रमशः प्रादुर्भाव हुआ । उन्हींसे शिवकी आज्ञाके अनुसार असंख्य अण्ड - पिण्ड प्रकट होते हैं, जो अनन्त आदि विद्येश्वर चक्रवर्तियोंसे अधिष्ठित हैं ॥ २४-२५ ॥ शरीरान्तरके भेदसे शक्तिके बहुत - से भेद कहे गये हैं । स्थूल और सूक्ष्मके भेदसे उनके अनेक रूप जानने चाहिये । रुद्रकी शक्ति रौद्री, विष्णुकी वैष्णवी, ब्रह्माकी ब्रह्माणी और इन्द्रकी इन्द्राणी कहलाती है ॥ २६-२७ ॥ यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ - — जिसे विश्व कहा गया है, वह उसी प्रकार शक्त्यात्मासे व्याप्त है, जैसे शरीर अन्तरात्मासे । अतः सम्पूर्ण स्थावर - जंगमरूप जगत् शक्तिमय है । यह पराशक्ति परमात्मा शिवकी कला कही गयी है । इस तरह यह पराशक्ति ईश्वरकी इच्छाके अनुसार चलकर चराचर जगत्की सृष्टि करती है, ऐसा विज्ञ पुरुषोंका निश्चय है ॥ २८–३० ॥ ज्ञान, क्रिया और इच्छा - अपनी इन तीन शक्तियोंद्वारा शक्तिमान् ईश्वर सदा सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित होते हैं । यह इस प्रकार हो और यह इस प्रकार न हो— इस तरह कार्योंका नियमन करनेवाली महेश्वरकी इच्छाशक्ति नित्य है ॥ ३१-३२ ॥ उनकी जो ज्ञानशक्ति है, वह बुद्धिरूप होकर कार्य, करण, कारण और प्रयोजनका ठीक - ठीक निश्चय करती है; तथा शिवकी जो क्रियाशक्ति है, वह संकल्परूपिणी होकर उनकी इच्छा और निश्चयके अनुसार कार्यरूप सम्पूर्ण जगत्की क्षणभरमें कल्पना कर देती है ॥ ३३-३४ ॥ इस प्रकार तीनों शक्तियोंसे जगत्का उत्थान होता है । प्रसव - धर्मवाली जो शक्ति है, वह पराशक्तिसे प्रेरित होकर ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करती है । इस तरह शक्तियोंके संयोगसे शिव शक्तिमान् कहलाते हैं । शक्ति और शक्तिमान्से प्रकट होनेके कारण यह जगत् शाक्त और शैव कहा गया है । जैसे माता - पिताके बिना पुत्रका जन्म नहीं होता, उसी प्रकार भव और भवानीके बिना इस चराचर जगत्‌की उत्पत्ति नहीं होती ॥ ३५–३७ ॥

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८ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ स्त्रीपुंसात्मकमेव च । स्त्री और पुरुषसे प्रकट हुआ जगत् स्त्री और स्त्रीपुंसप्रभवं विश्वं ॥ ३८ पुरुष - रूप ही है; यह स्त्री और पुरुषकी विभूति है स्त्रीपुंसयोर्विभूतिश्च स्त्रीपुंसाभ्यामधिष्ठितम् | अतः स्त्री और पुरुषसे अधिष्ठित है । इनमें शक्तिमान्, परमात्मा शिवः प्रोक्तः शिवा सा च प्रकीर्तिता । | पुरुषरूप शिव तो परमात्मा कहे गये हैं और स्त्रीरूपिणी । शिवः सदाशिवः प्रोक्तः शिवा सा च मनोन्मनी । | शिवा उनकी पराशक्ति । शिव सदाशिव कहे गये हैं शिवो महेश्वरो ज्ञेय: शिवा मायेति कथ्यते ॥ ३ ९ और शिवा मनोन्मनी । शिवको महेश्वर जानना चाहिये

पुरुषः परमेशान: प्रकृतिः परमेश्वरी ।

रुद्रो महेश्वरः साक्षाद् रुद्राणी रुद्रवल्लभा ॥ ४०

विष्णुर्विश्वेश्वरो देवो लक्ष्मीर्विश्वेश्वरप्रिया ।

ब्रह्मा शिवो यदा स्रष्टा ब्रह्माणी ब्रह्मणः प्रिया ॥ ४१

भास्करो भगवान् शम्भुः प्रभा भगवती शिवा ।

महेन्द्रो मन्मथारातिः शची शैलेन्द्रकन्यका ॥ ४२

जातवेदा महादेवः स्वाहा शर्वार्द्धदेहिनी ।

यमस्त्रियम्बको देवस्तत्प्रिया गिरिकन्यका ॥ ४३

निर्ऋतिर्भगवानीशो नैर्ऋती नगनन्दिनी ।

वरुणो भगवान् रुद्रो वारुणी भूधरात्मजा ॥ ४४

बालेन्दुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोहरा ।

यक्षो यज्ञशिरोहर्ता ऋद्धिर्हिमगिरीन्द्रजा ॥ ४५

चन्द्रार्धशेखरश्चन्द्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा ।

ईशानः परमेशानस्तदार्या परमेश्वरी ॥ ४६

अनन्तवलयोऽनन्तो ह्यनन्तानन्तवल्लभा ।

कालाग्निरुद्रः कालारिः काली कालान्तकप्रिया ॥ ४७

पुरुषाख्यो मनुः शंभुः शतरूपा शिवप्रिया ।

दक्षः साक्षान्महादेवः प्रसूतिः परमेश्वरी ॥ ४८

रुचिर्भवो भवानी च बुधैराकूतिरुच्यते ।

भृगुर्भगाक्षिहा देवः ख्यातिस्त्रिनयनप्रिया ॥ ४ ९

मरीचिर्भगवान् रुद्रः सम्भूतिः शर्ववल्लभा ।

गङ्गाधरोऽङ्गिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता ॥ ५०

पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कान्ता पिनाकिनः ।

पुलहस्त्रिपुरध्वंसी तत्प्रिया तु शिवप्रिया ॥ ५१

और शिवा माया कहलाती हैं ॥ ३८-३९ ॥

परमेश्वर शिव पुरुष हैं और परमेश्वरी शिवा प्रकृति । महेश्वर शिव रुद्र हैं और उनकी वल्लभा शिवादेवी रुद्राणी । विश्वेश्वर देव विष्णु हैं और उनकी प्रिया लक्ष्मी । जब सृष्टिकर्ता शिव ब्रह्मा कहलाते हैं, तब उनकी प्रियाको ब्रह्माणी कहते हैं । भगवान् शिव भास्कर हैं और भगवती शिवा प्रभा । कामनाशन शिव महेन्द्र हैं और गिरिराजनन्दिनी उमा शची । महादेवजी अग्नि हैं और उनकी अर्धांगिनी उमा स्वाहा । भगवान् त्रिलोचन यम हैं और गिरिराज-नन्दिनी उमा यमप्रिया । भगवान् शंकर निर्ऋति हैं और पार्वती नैर्ऋती । भगवान् रुद्र वरुण हैं और पार्वती

वारुणी । चन्द्रशेखर शिव वायु हैं और पार्वती वायुप्रिया ।

शिव यक्ष हैं और पार्वती ऋद्धि ॥ ४० - ४५ ॥

चन्द्रार्धशेखर शिव चन्द्रमा हैं और रुद्रवल्लभा उमा रोहिणी । परमेश्वर शिव ईशान हैं और परमेश्वरी शिवा उनकी पत्नी । नागराज अनन्तको वलयरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शंकर अनन्त हैं और उनकी वल्लभा शिवा अनन्ता । कालशत्रु शिव कालाग्निरुद्र हैं और [ उमा ] कालान्तकप्रिया काली हैं । जिनका दूसरा नाम पुरुष है, ऐसे स्वायम्भुव मनुके रूपमें साक्षात् शम्भु ही हैं और शिवप्रिया उमा शतरूपा हैं । साक्षात् महादेव दक्ष हैं और परमेश्वरी पार्वती प्रसूति । भगवान् भव रुचि आकूति कहते हैं ख्याति । भगवान् सम्भूति । भगवान् स्मृति । चन्द्रमौलि त्रिपुरनाशक शिव प्रिया [ पुलहपत्नी हैं और भवानीको ही विद्वान् पुरुष । महादेवजी भृगु हैं और पार्वती रुद्र मरीचि हैं और शिववल्लभा गंगाधर अंगिरा हैं और साक्षात् उमा पुलस्त्य हैं और पार्वती प्रीति । पुलह हैं और पार्वती ही उनकी ] हैं ॥ ४६-५१ ॥

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अ ० ४ ] वायवीयसंहिता क्रतुः प्रोक्तः सन्नतिर्दयिता विभोः । क्रतुध्वंसी त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनसूया स्मृता बुधैः ॥ ५२ कालहा देवो देवमाता महेश्वरी । कश्यपः वसिष्ठो मन्मथारातिर्देवी साक्षादरुन्धती ॥ ५३ । पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी । शङ्करः स्त्रीपुरुषास्तस्मात्तयोरेव विभूतयः ॥ ५४

विषयी भगवानीशो विषयः परमेश्वरी ।

श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता शूलवरायुधः ॥ ५५

प्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा । कर प्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रावतंसकः ॥ ५६

द्रष्टव्यं वस्तुरूपं तु बिभर्त्ति भववल्लभा ।

द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः ॥ ५७

रसजातं महादेवी देवो रसयिता शिवः ।

प्रेयजातं च गिरिजा प्रेयांश्चैव गराशनः ॥ ५८

मन्तव्यवस्तुतां धत्ते सदा देवी महेश्वरी ।

मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥ ५ ९

बोद्धव्यवस्तुरूपं तु बिभर्त्ति भववल्लभा ।

देव: स एव भगवान् बोद्धा मुग्धेन्दुशेखरः ॥ ६०

१.

प्राणः पिनाकी सर्वेषां प्राणिनां भगवान् प्रभुः ।

प्राणस्थितिस्तु सर्वेषामम्बिका चाम्बुरूपिणी ॥ ६१

बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा ।

क्षेत्रज्ञत्वं तदा दा धत्ते भगवानन्तकान्तकः ॥ ६२

अहः शूलायुधो देवः शूलपाणिप्रिया निशा ।

आकाशः शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया ॥ ६३

समुद्रो भगवानीशो वेला शैलेन्द्रकन्यका ।

वृक्षो वृषध्वजो देवो लता विश्वेश्वरप्रिया ॥ ६४ ।

( उत्तरखण्ड ) ८ ९ ५ यज्ञविध्वंसी शिव क्रतु कहे गये हैं और उनकी प्रिया पार्वती संनति । भगवान् शिव अत्रि हैं और साक्षात् उमा अनसूया । कालहन्ता शिव कश्यप हैं और महेश्वरी उमा देवमाता अदिति । कामनाशन शिव वसिष्ठ हैं और साक्षात् देवी पार्वती अरुन्धती । भगवान् शंकर ही संसारके सारे पुरुष हैं और महेश्वरी शिवा ही सम्पूर्ण स्त्रियाँ । अतः सभी स्त्री - पुरुष उन्हींकी विभूतियाँ हैं॥५२–५४ ॥ भगवान् शिव विषयी हैं और परमेश्वरी उमा विषय । जो कुछ सुननेमें आता है वह सब उमाका रूप है और श्रोता साक्षात् भगवान् शंकर हैं । जिसके विषयमें प्रश्न या जिज्ञासा होती है, उस समस्त वस्तु-समुदायका रूप शंकरवल्लभा शिवा स्वयं धारण करती हैं तथा पूछनेवाला जो पुरुष है, वह बालचन्द्रशेखर विश्वात्मा शिवरूप ही है॥५५-५६ ॥ भववल्लभा उमा ही द्रष्टव्य वस्तुओंका रूप धारण करती हैं और द्रष्टा पुरुषके रूपमें शशिखण्डमौलि भगवान् विश्वनाथ ही सब कुछ देखते हैं । सम्पूर्ण रसकी राशि महादेवी हैं और उस रसका आस्वादन करनेवाले मंगलमय महादेव हैं । प्रेमसमूह पार्वती हैं और प्रियतम विषभोजी शिव हैं । देवी महेश्वरी सदा मन्तव्य वस्तुओंका स्वरूप धारण करती हैं और विश्वात्मा महेश्वर महादेव उन वस्तुओंके मन्ता ( मनन करनेवाले ) हैं । भववल्लभा पार्वती बोद्धव्य ( जाननेयोग्य ) वस्तुओंका स्वरूप धारण करती हैं और शिशु - शशिशेखर भगवान् महादेव ही उन वस्तुओंके ज्ञाता हैं॥५७–६० ॥ सामर्थ्यशाली भगवान् पिनाकी सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राण हैं और सबके प्राणोंकी स्थिति जलरूपिणी माता पार्वती हैं । त्रिपुरान्तक पशुपतिकी प्राणवल्लभा पार्वती-देवी जब क्षेत्रका स्वरूप धारण करती हैं, तब कालके भी काल भगवान् महाकाल क्षेत्रज्ञरूपमें स्थित होते हैं । शूलधारी महादेवजी दिन हैं तो शूलपाणिप्रिया पार्वती रात्रि । कल्याणकारी महादेवजी आकाश हैं और शंकरप्रिया पार्वती पृथिवी । भगवान् महेश्वर समुद्र हैं तो गिरिराज - कन्या शिवा उसकी तटभूमि हैं । वृषभध्वज महादेव वृक्ष हैं, तो विश्वेश्वरप्रिया उमा उसपर फैलनेवाली लता हैं॥६१–६४ ॥

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८ ९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ भगवान् त्रिपुरनाशक महादेव सम्पूर्ण पुल्लिंगरूपको पुँल्लिङ्गमखिलं धत्ते भगवान् पुरशासनः । स्वयं धारण करते हैं और महादेवमनोरमा देवी स्त्रिलिङ्गं चाखिलं धत्ते देवी देवमनोरमा ॥ ६५ स्त्रीलिंगरूप धारण करती हैं । शिववल्लभा शिवा शब्दजालमशेषं तु धत्ते सर्वस्य वल्लभा अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदाहृता सा सा विश्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वरः ॥

यत्परं यत्पवित्रं च यत्पुण्यं यच्च मङ्गलम् ।

तत्तदाह महाभागास्तयोस्तेजोविजृम्भितम् ॥

यथा दीपस्य दीप्तस्य शिखा दीपयते गृहम् ।

तथा तेजस्तयोरेतद् व्याप्य दीपयते जगत् ॥

तृणादिशिवमूर्त्यन्तं विश्वस्यातिशयक्रमः ।

सन्निकर्षक्रमवशात्तयोरिति परा श्रुतिः ॥

सर्वाकारात्मकावेतौ सर्वश्रेयोविधायिनौ ।

पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा ॥

यथाप्रज्ञमिदं कृष्ण याथात्म्यं परमेशयोः ।

कथितं हि मया तेऽद्य न तु तावदियत्तया ॥

तत्कथं शक्यते वक्तुं याथात्म्यं परमेशयोः ।

महतामपि सर्वेषां मनसोऽपि बहिर्गतम् ॥

अन्तर्गतमनन्यानामीश्वरार्पितचेतसाम् | सारा । । शिवा समस्त शब्दजालका रूप धारण करती हैं और ॥ ६६ बालेन्दुशेखर शिव सम्पूर्ण अर्थका । जिस - जिस पदार्थकी | जो - जो शक्ति कही गयी है, वह वह शक्ति तो विश्वेश्वरी । । देवी शिवा हैं और वह वह सारा पदार्थ साक्षात् महेश्वर ' ६७ हैं । जो सबसे परे है, जो पवित्र है, जो पुण्यमय है तथा जो मंगलरूप है, उस - उस वस्तुको महाभाग । महात्माओंने उन्हीं दोनों शिव - पार्वतीके तेजसे विस्तारको ६८ प्राप्त हुई बताया है ॥ ६५–६८ ॥ जैसे जलते हुए दीपककी शिखा समूचे घरको ६ ९ प्रकाशित करती है, उसी प्रकार शिव - पार्वतीका ही यह तेज व्याप्त होकर सम्पूर्ण जगत्को प्रकाश दे रहा है । तृणसे लेकर शिवकी मूर्तिपर्यन्त इस विश्वका व्यवहार ७० उन्हीं दोनोंके सन्निकर्षके कारण चल रहा है - ऐसा परा श्रुति कहती है ॥ ६ ९ -७० ॥ ये दोनों शिवा और शिव सर्वरूप हैं, सबका ७१ कल्याण करनेवाले हैं; अतः सदा ही इन दोनोंका पूजन, नमन एवं चिन्तन करना चाहिये ॥ ७१ ॥

श्रीकृष्ण! आज मैंने तुम्हारे समक्ष अपनी ७२ बुद्धिके अनुसार परमेश्वर शिव और शिवाके यथार्थ स्वरूपका वर्णन किया है, परंतु इयत्तापूर्वक नहीं; अर्थात् इस वर्णनसे यह नहीं मान लेना चाहिये कि इन दोनोंके यथार्थरूपका पूर्णतः वर्णन हो गया; क्योंकि इनके स्वरूपकी इयत्ता ( सीमा ) नहीं है ॥ ७२ ॥

जो समस्त महापुरुषोंके भी मनकी सीमासे परे ७३ है, परमेश्वर शिव और शिवाके उस यथार्थ स्वरूपका वर्णन कैसे किया जा सकता है! ॥ ७३ ॥

जिन्होंने अपने चित्तको महेश्वरके चरणोंमें अर्पित अन्येषां बुद्ध्यनारूढमारूढं च यथैव तत् ॥ ७४ कर दिया है तथा जो उनके अनन्यभक्त हैं, उनके ही

मनमें वे आते हैं और उन्हींकी बुद्धिमें आरूढ़ होते हैं ।

दूसरोंकी बुद्धिमें वे आरूढ़ नहीं होते ॥७४ ॥

यहाँ मैंने जिस विभूतिका वर्णन किया है, वह येयमुक्ता विभूति प्राकृत है, इसलिये अपरा मानी गयी है । इससे भिन्न जो प्राकृती सा परा मता । अप्राकृतां परामन्यां अप्राकृत एवं परा विभूति है, वह गुह्य है । उनके गुह्य गुह्यां गुह्यविदो विदुः ॥ ७५ रहस्यको जाननेवाले पुरुष ही उन्हें जानते हैं ॥ ७५ ॥