शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 911–920
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920
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अ ० ४ ] यतो वाचो निवर्तन्ते परा चैषा अप्राकृती परमं धाम सैवेह सैवेह परमा काष्ठा वायवीयसंहिता
मनसा चेन्द्रियैः सह ।
विभूतिः पारमेश्वरी ॥ ७६
सैवेह परमा गतिः ।
विभूतिः परमेष्ठिनः ॥ ७७
तां प्राप्तुं प्रयतन्तेऽत्र जितश्वासा जितेन्द्रियाः ।
गर्भकारागृहद्वारं निश्छिद्रं घटितं यथा ॥ ७८
संसाराशीविषालीढमृतसञ्जीवनौषधम् 1 विभूतिं शिवयोर्विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ॥ ७ ९
यः परामपरां चैव विभूतिं वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽपरां भूतिमुल्लंघ्य परां भूतिं समश्नुते ॥ ८०
एतत्ते कथितं कृष्ण याथात्म्यं परमात्मनोः ।
रहस्यमपि योग्योऽसि भर्गभक्तो भवानिति ॥ ८१
नाशिष्येभ्यो ऽप्यशैवेभ्यो नाभक्तेभ्यः कदाचन ।
व्याहरेदीशयोर्भूतिमिति वेदानुशासनम् ॥ ८२
तस्मात्त्वमतिकल्याण परेभ्यः कथयेन्न हि ।
त्वादृशेभ्योऽनुरूपेभ्यः कथयैतन्न चान्यथा ॥ ८३
विभूतिमेतां शिवयोर्योग्येभ्यो यः प्रदापयेत् ।
संसारसागरान् मुक्तः शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ८४
कीर्तनादस्य नश्यन्ति महान्त्यः पापकोटयः ।
त्रिश्चतुर्धा समभ्यस्तैर्विनश्यन्ति ततोऽधिकाः ॥ ८५
नश्यन्त्यनिष्टरिपवो वर्द्धन्ते सुहृदस्तथा ।
विद्या च वर्द्धते शैवी मतिः सत्ये प्रवर्तते ॥ ८६
भक्तिः पराः शिवे साम्बे सानुगे सपरिच्छदे ।
यद्यदिष्टतमं चान्यत्तत्तदाप्नोत्यसंशयम् ॥ ८७
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_30_1_Front ( उत्तरखण्ड ) ८ ९ ७ परमेश्वरकी यह अप्राकृत परा विभूति वह है, जहाँसे मन और इन्द्रियोंसहित वाणी लौट आती है । परमेश्वरकी वही विभूति यहाँ परम धाम है, वही यहाँ परमगति है और वही यहाँ पराकाष्ठा है ॥ ७६-७७ ॥ जिस प्रकार गर्भाशयरूप निश्छिद्र कारागारमें शिशु श्वासको अवरुद्धकर स्थित होता है, वैसे ही जो अपने श्वास और इन्द्रियोंपर विजय पा चुके हैं, वे योगीजन ही उन्हें पानेका प्रयत्न करते हैं । शिवा और शिवकी यह विभूति संसाररूपी विषधर सर्पके डसनेसे मृत्युके अधीन हुए मानवोंके लिये संजीवनी ओषधि है । इसे जाननेवाला पुरुष किसीसे भी भयभीत नहीं होता ॥ ७८-७९ ॥ जो इस परा और अपरा विभूतिको ठीक - ठीक जान लेता है, वह अपरा विभूतिको लाँघकर परा विभूतिका अनुभव करने लगता है ॥८० ॥
श्रीकृष्ण! यह तुमसे परमात्मा शिव और पार्वतीके यथार्थ स्वरूपका गोपनीय होनेपर भी वर्णन किया गया है; क्योंकि तुम भगवान् शिवकी भक्तिके योग्य हो । जो शिष्य न हों, शिवके उपासक न हों और भक्त भी न हों, ऐसे लोगोंको कभी शिव - पार्वतीकी इस विभूतिका उपदेश नहीं देना चाहिये । यह वेदकी आज्ञा है ॥ ८१-८२ ॥ अतः अत्यन्त कल्याणमय श्रीकृष्ण! तुम दूसरोंको इसका उपदेश न देना । जो तुम्हारे जैसे योग्य पुरुष हों, उन्हींसे कहना; अन्यथा मौन ही रहना ॥ ८३ ॥
जो शिवा - शिवकी इस विभूतिको योग्य भक्तोंको प्रदान करता है, वह संसार - सागरसे मुक्त होकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है । इसके कीर्तनसे बड़े - बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं; तीन - चार बार इसका अभ्यास करनेसे उससे भी अधिक पाप नष्ट हो जाते हैं । इसके द्वारा विनाशकारी शत्रु नष्ट हो जाते हैं, सुहृदोंकी वृद्धि होती है, शैवी विद्या बढ़ती है, बुद्धि सत्यमें प्रवृत्त होती है और शिव - पार्वती - गणों तथा उनके अनुचरोंके प्रति श्रेष्ठ भक्ति उत्पन्न होती है । व्यक्तिका जो - जो अन्य परम अभीष्ट होता है, उसे वह निःसन्देह प्राप्त | कर लेता है ॥ ८४–८७ ॥
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८ ९ ८ अन्तःशुचिः शिवे भक्तो विस्रब्धः कीर्तयेद्यदि
प्रबलैः कर्मभिः पूर्वैः फलं चेत्प्रतिबध्यते ।
पुनः पुनः समभ्यस्येत्तस्य नास्तीह दुर्लभम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ । जो भीतरसे पवित्र, शिवका भक्त और विश्वासी हो, वह यदि इसका कीर्तन करे तो मनोवांछित । फलका भागी होता है । यदि पहलेके प्रबल प्रति-| बन्धक कर्मोंद्वारा प्रथम बार फलकी प्राप्तिमें बाधा | पड़ जाय, तो भी बारंबार साधनका अभ्यास । चाहिये । ऐसा करनेवाले पुरुषके लिये यहाँ करना ८८ । भी दुर्लभ नहीं है ॥८८ ॥ कुछ
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे गौरीशङ्करविभूतियोगो नाम चतुर्थोऽ ऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें गौरीशंकर-विभूतियोग नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः परमेश्वर शिवके यथार्थ स्वरूपका विवेचन तथा उनकी शरणमें जानेसे उपमन्युरुवाच
विग्रहं देवदेवस्य विश्वमेतत् चराचरम् ।
तदेवं न विजानन्ति पशवः पाशगौरवात् ॥
तमेकमेव बहुधा वदन्ति यदुनन्दन ।
अजानन्तः परं भावमविकल्पं महर्षयः ॥
अपरं ब्रह्मरूपं च परं ब्रह्मात्मकं तथा ।
केचिदाहुर्महादेवमनादिनिधनं परम् ॥
भूतेन्द्रियान्तःकरणप्रधानविषयात्मकम् अपरं ब्रह्म निर्दिष्टं परं ब्रह्म चिदात्मकम् ॥ बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाद्वा ब्रह्म चेत्यभिधीयते ।
उभे ते ब्रह्मणो रूपे ब्रह्मणोऽधिपतेः प्रभोः ।
विद्याविद्यास्वरूपीति कैश्चिदीशो निगद्यते ॥
विद्यां तु चेतनां प्राहुस्तथाविद्यामचेतनाम् विद्याविद्यात्मकं चैव विश्वं विश्वगुरोर्विभोः ।॥
रूपमेव न संदेहो विश्वं तस्य वशे यतः ।
भ्रांतिर्विद्या परा चेति शार्वं रूपं परं विदुः ॥
जीवके कल्याणका कथन उपमन्यु कहते हैं— यदुनन्दन! यह चराचर जगत् देवाधिदेव महादेवजीका स्वरूप है । परंतु पशु १ ( जीव ) भारी पाशसे बँधे होनेके कारण जगत्को इस रूपमें नहीं जानते ॥१ ॥
महर्षिगण उन परमेश्वर शिवके निर्विकल्प परम २ भावको न जाननेके कारण उन एकका ही अनेक रूपोंमें वर्णन करते हैं — कोई उस परमतत्त्वको अपर ब्रह्मरूप ३ कहते हैं, कोई परब्रह्मरूप बताते हैं और कोई आदि-अन्तसे रहित उत्कृष्ट महादेवस्वरूप कहते हैं ॥ २-३ ॥ पंच महाभूत, इन्द्रिय, अन्त: करण तथा प्राकृत ४ विषयरूप जड तत्त्वको अपरब्रह्म कहा गया है । इससे भिन्न समष्टि चैतन्यका नाम परब्रह्म है ॥४ ॥
बृहत् और व्यापक होनेके कारण उसे ब्रह्म कहते हैं । प्रभो! वेदों एवं ब्रह्माजीके अधिपति परब्रह्म ५ परमात्मा शिवके वे पर और अपर दो रूप हैं । कुछ लोग महेश्वर शिवको विद्याविद्यास्वरूपी कहते हैं ॥ ५ ॥
इनमें विद्या चेतना है और अविद्या अचेतना । यह ६ विद्याविद्यारूप विश्व जगद्गुरु भगवान् शिवकारूप ही है, इसमें संदेह नहीं है; क्योंकि विश्व उनके वशमें है । भ्रान्ति, विद्या तथा पराविद्या या परम तत्त्व - ये शिवके ७ तीन उत्कृष्ट रूप माने गये हैं ॥ ६-७ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_30_1_Back
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47 वायवीयसहिता 370 बहुधा भ्रान्तिरुच्यते । अयथाबुद्धिरर्थेषु यथार्थाकारसंवित्तिर्विद्येति परिकीर्त्यते ॥ ८
विकल्परहितं तत्त्वं परमित्यभिधीयते ।
वैपरीत्यादसत् शब्दः कथ्यते वेदवादिभिः ॥ ९
तयोः पतित्वात्तु शिवः सदसस्पतिरुच्यते ।
क्षराक्षरात्मकं प्राहुः क्षराक्षरपरं परे ॥ ॥१०
भरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।
उभे ते परमेशस्य रूपे तस्य वशे यतः ॥ ११
तयोः परः शिवः शान्तः क्षराक्षरपरः स्मृतः ।
समष्टिव्यष्टिरूपं च समष्टिव्यष्टिकारणम् ॥ १२
वदन्ति मुनयः केचित् शिवं परमकारणम् ।
समष्टिमाहुरव्यक्तं व्यष्टिं व्यक्तं तथैव च ॥ १३
ते रूपे परमेशस्य तदिच्छायाः प्रवर्तनात् ।
तयोः कारणभावेन शिवं परमकारणम् ॥ १४
कारणार्थविदः प्राहुः समष्टिव्यष्टिकारणम् ।
जातिव्यक्तिस्वरूपीति कथ्यते कैश्चिदीश्वरः ॥ १५
या पिण्डेऽप्यनुवर्तेत सा जातिरिति कथ्यते ।
व्यक्तिर्व्यावृत्तिरूपं तं पिण्डजातं समाश्रयम् ॥ १६
जातयो व्यक्तयश्चैव तदाज्ञापरिपालिताः ।
यतस्ततो महादेवो जातिव्यक्तिवपुः स्मृतः ॥ १७
प्रधानपुरुषव्यक्तकालात्मा कथ्यते शिवः ।
प्रधानं प्रकृतिं प्राहुः क्षेत्रज्ञं पुरुषं तथा ॥ १८
त्रयोविंशतितत्त्वानि व्यक्तमाहुर्मनीषिणः ॥
कालः कार्यप्रपञ्चस्य परिणामैककारणम् ॥ १ ९
2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_30_2_Front ( उत्तरखण्ड ) ८ ९९ पदार्थोंके विषयमें जो अनेक प्रकारकी असत्य धारणाएँ हैं, उन्हें भ्रान्ति कहते हैं । यथार्थ धारणा या ज्ञानका नाम विद्या है तथा जो विकल्परहित परम ज्ञान है, उसे परम तत्त्व कहते हैं । वेदवादियोंके द्वारा [ परम तत्त्व ही सत् तथा ] इससे विपरीत असत् कहा | गया है ॥ ८ - ९ ॥ सत् और असत् दोनोंका पति होनेके कारण शिव सदसत्पति कहलाते हैं । अन्य महर्षियोंने क्षर, अक्षर और उन दोनोंसे परे परम तत्त्वका प्रतिपादन किया है ॥१० ॥
सम्पूर्ण भूत क्षर हैं और जीवात्मा अक्षर कहलाता है । वे दोनों परमेश्वरके रूप हैं; क्योंकि उन्हींके अधीन हैं । शान्तस्वरूप शिव उन दोनोंसे परे हैं, इसलिये क्षराक्षरपर कहे गये हैं । कुछ महर्षि परम कारणरूप शिवको समष्टि - व्यष्टिस्वरूप तथा समष्टि और व्यष्टिका कारण कहते हैं । अव्यक्तको समष्टि कहते हैं और व्यक्तको व्यष्टि॥११–१३ ॥ वे दोनों परमेश्वर शिवके रूप हैं, क्योंकि उन्हींकी इच्छासे प्रवृत्त होते हैं । उन दोनोंके कारणरूपसे स्थित भगवान् शिव परम कारण हैं । अतः कारणार्थवेत्ता ज्ञानी पुरुष उन्हें समष्टि - व्यष्टिका कारण बताते हैं । कुछ लोग परमेश्वरको जाति - व्यक्ति - स्वरूप कहते हैं ॥ १४-१५ ॥ जिसका शरीरमें भी अनुवर्तन हो, वह जाति कही गयी है । शरीरकी जातिके आश्रित रहनेवाली जो व्यावृत्ति है, जिसके द्वारा जातिभावनाका आच्छादन और वैयक्तिक भावनाका प्रकाशन होता है, उसका नाम व्यक्ति है । जाति और व्यक्ति दोनों ही भगवान् शिवकी आज्ञासे परिपालित हैं, अतः उन महादेवजीको जाति - व्यक्तिस्वरूप कहा गया है॥१६-१७ ॥ कोई - कोई शिवको प्रधान, पुरुष, व्यक्त और कालरूप कहते हैं । प्रकृतिका ही नाम प्रधान है । जीवात्माको ही क्षेत्रज्ञ कहते हैं । तेईस तत्त्वोंको मनीषी पुरुषोंने व्यक्त कहा है और जो कार्य - प्रपंचके परिणामका एकमात्र कारण है, उसका नाम काल | है ॥ १८-१९ ॥
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९ ०० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ धाता प्रवर्तकनिवर्तकः । भगवान् शिव इन सबके ईश्वर, पालक, धारणकर्ता एषामीशोऽधिपो स्वराडजः ॥ २० प्रवर्तक, निवर्तक तथा आविर्भाव और तिरोभावके, आविर्भावतिरोभावहेतुरेकः । एकमात्र हेतु हैं । वे स्वयंप्रकाश एवं अजन्मा
। । इसीलिये उन महेश्वरको प्रधान, पुरुष, व्यक्त और हैं ।
तस्मात् प्रधानपुरुषव्यक्तकालस्वरूपवान् कालरूप कहा गया है ॥२०१ / २ ॥
हेतुताऽधिपस्तेषां धाता चोक्तो महेश्वरः ॥ २१ उन्हें ही कारण, नेता, अधिपति और धाता । बताया गया है । कुछ लोग महेश्वरको विराट् और विराड् हिरण्यगर्भात्मा कैश्चिदीशो निगद्यते । | हिरण्यगर्भरूप बताते हैं । जो सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टिके हिरण्यगर्भो लोकानां हेतुर्विश्वात्मको विराट् ॥ २२ हेतु हैं, उनका नाम हिरण्यगर्भ है और विश्वरूपको
अन्तर्यामी परश्चेति कथ्यते कविभिः शिवः ।
प्राज्ञस्तैजसविश्वात्मेत्यपरे सम्प्रचक्षते ॥ २३
तुरीयमपरे प्राहुः सौम्यमेव परे विदुः ।
माता मानं च मेयं च मतिं चाहुरथापरे ॥ २४
कर्ता क्रिया च कार्यं च करणं कारणं परे ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यात्मेत्यपरे सम्प्रचक्षते ॥ २५
तुरीयमपरे प्राहुस्तुर्यातीतमितीतरे ।
तमाहुर्विगुणं केचिद् गुणवन्तं परे विदुः ॥ २६
केचित्संसारिणं प्राहुस्तमसंसारिणं परे ।
स्वतन्त्रमपरे प्राहुरस्वतन्त्रं परे विदुः ॥ २७
घोरमित्यपरे प्राहुः सौम्यमेव परे विदुः ।
रागवन्तं परे प्राहुर्वीतरागं तथा परे ॥ २८
निष्क्रियं च परे प्राहुः सक्रियं चेतरे जनाः ।
निरिन्द्रियं परे प्राहुः सेन्द्रियं च तथा परे ॥ २ ९
ध्रुवमित्यपरे प्राहुस्तमध्रुवमितीतरे ।
अरूपं केचिदाहुर्वै रूपवन्तं परे विदुः ॥३०
अदृश्यमपरे प्राहुर्दृश्यमित्यपरे विदुः ।
वाच्यमित्यपरे प्राहुरवाच्यमिति चापरे ।
शब्दात्मकं परे प्राहुः शब्दातीतमथापरे ॥ ३१
केचित् चिन्तामयं प्राहुश्चिन्तया रहितं परे ।
ज्ञानात्मकं परे प्राहुर्विज्ञानमिति चापरे ॥ ३२
केचित् ज्ञेयमिति प्राहुरज्ञेयमिति केचन ।
परमेके तमेवाहुरपरं ।
च तथा परे ॥ ३३
विराट् कहते हैं ॥ २१-२२ ॥
ज्ञानी पुरुष भगवान् शिवको अन्तर्यामी और । परम पुरुष कहते हैं । दूसरे लोग उन्हें प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप बताते हैं । कोई उन्हें तुरीयरूप मानते हैं और कोई सौम्यरूप । कितने ही विद्वानोंका कथन है कि वे ही माता, मान, मेय और मितिरूप हैं । अन्य लोग कर्ता, क्रिया, कार्य, करण और कारणरूप कहते हैं । दूसरे ज्ञानी उन्हें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिरूप बताते हैं ॥ २३–२५ ॥ कोई भगवान् शिवको तुरीयरूप कहते हैं तो कोई तुरीयातीत । कोई निर्गुण बताते हैं, कोई सगुण । कोई संसारी कहते हैं, कोई उन्हें असंसारी । कोई स्वतन्त्र मानते हैं, कोई अस्वतन्त्र । कोई उन्हें घोर समझते हैं, कोई सौम्य । कोई रागवान् कहते हैं, कोई वीतराग; कोई निष्क्रिय बताते हैं, कोई सक्रिय । किन्हींके कथनानुसार वे निरिन्द्रिय हैं तो किन्हींके मतमें सेन्द्रिय हैं ॥ २६–२९ ॥ एक उन्हें ध्रुव कहता है तो दूसरा अध्रुव; कोई उन्हें साकार बताते हैं तो कोई निराकार । किन्हींके मतमें वे अदृश्य हैं तो किन्हींके मतमें दृश्य; कोई उन्हें वर्णनीय मानते हैं तो कोई अनिर्वचनीय । किन्हींके मतमें वे शब्दस्वरूप हैं तो किन्हींके मतमें शब्दातीत; कोई उन्हें चिन्तनका विषय मानते हैं तो कोई अचिन्त्य समझते हैं । दूसरे लोगोंका कहना है कि वे ज्ञानस्वरूप हैं, कोई उन्हें विज्ञानकी संज्ञा देते हैं ।
किन्हींके मतमें वे ज्ञेय हैं और किन्हींके मतमें अज्ञेय ।
कोई उन्हें पर बताता है तो कोई अपर ॥ ३० ÷ ३३ ॥
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अ ० ६ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) विकल्प्यमानं तु याथात्म्यं परमेष्ठिनः । एवं नाध्यवस्यन्ति मुनयो नानाप्रत्ययकारणात् ॥
येः पुनः सर्वभावेन प्रपन्नाः परमेश्वरम् ।
तेहि जानन्त्ययत्नेन शिवं परमकारणम् ॥
यावत्पशुनैव पश्यत्यनीशं कविं पुराणं भुवनस्येशितारम् । तावद्दुःखे वर्तते बद्धपाशः संसारेऽस्मिञ्चक्रनेमिक्रमेण ॥ यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परममुपैति साम्यम् ॥ ९ ०१ इस तरह उनके विषयमें नाना प्रकारकी कल्पनाएँ ३४ होती हैं । इन नाना प्रतीतियोंके कारण मुनिजन उन परमेश्वरके यथार्थ स्वरूपका निश्चय नहीं कर पाते जो सर्वभावसे उन परमेश्वरकी शरणमें आ गये हैं, वे ३५ ही उन परम कारण शिवको बिना यत्नके ही जान पाते हैं ॥ ३४-३५ ॥ जबतक पशु ( जीव ), जिनका दूसरा कोई ईश्वर नहीं है, उन सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, पुराणपुरुष तथा तीनों लोकोंके शासक शिवको नहीं देखता, तबतक ३६ वह पाशोंसे बद्ध हो इस दुःखमय संसार - चक्रमें । गाड़ीके पहियेकी नेमिके समान घूमता रहता है ॥ ३६ ॥
जब यह द्रष्टा जीवात्मा सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, सम्पूर्ण जगत्के रचयिता, सुवर्णोपम, दिव्य प्रकाशस्वरूप परम पुरुषका साक्षात्कार कर लेता है, तब पुण्य और पाप दोनोंको भलीभाँति हटाकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी महात्मा सर्वोत्तम ३७ । समताको प्राप्त कर लेता है ॥३७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे पशुपतित्वज्ञानयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें पशुपतित्वज्ञानयोग नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः शिवके शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूपका तथा उनकी प्रणवरूपताका प्रतिपादन उपमन्युरुवाच
न शिवस्याणवो बन्धः कार्यो मायेय एव वा ।
प्राकृतो वाथ बोद्धा वा ह्यहङ्कारात्मकस्तथा ॥
नैवास्य मानसो बन्धो न चैत्तो नेन्द्रियात्मकः ।
न च तन्मात्रबन्धोऽपि भूतबन्धो न कश्चन ॥
न च काल: कला चैव नाविद्या नियतिस्तथा ।
न रागो न च विद्वेषः शम्भोरमिततेजसः ॥
न चास्त्यभिनिवेशोऽस्य कुशलाकुशलान्यपि ।
न चास्त्यभिनिवेशोऽस्य कुशलाकुशलान्यपि ।
कर्माणि तद्विपाकश्च सुखदुःखे च तत्फले ॥
आशयैर्नापि सम्बन्धः संस्कारैः कर्मणामपि ।
भोगैश्च भोगसंस्कारैः कालत्रितयगोचरैः ॥
उपमन्यु कहते हैं — यदुनन्दन! शिवको न तो आणव मलका ही बन्धन प्राप्त है, न कर्मका और न १ मायाका ही । प्राकृत, बौद्ध, अहंकार, मन, चित्त, इन्द्रिय, तन्मात्रा और पंचभूतसम्बन्धी भी कोई बन्धन उन्हें नहीं २ छू सका है ॥ १-२ ॥ अमित तेजस्वी शम्भुको न काल, न कला, न ३ अविद्या, न नियति, न राग और न द्वेषरूप ही बन्धन प्राप्त है । उनमें न तो सदसत्कर्मोंका अभिनिवेश है, न उन कर्मोंका परिपाक है, न उनके फलस्वरूप सुख और ४ दुःख हैं, न उनका वासनाओंसे सम्बन्ध है, न कर्मोंके संस्कारोंसे । भूत, भविष्य और वर्तमान भोगों तथा उनके ५ । संस्कारोंसे भी उनका सम्पर्क नहीं है ॥ ३-५ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ ९ ०२ नादिरंतस्तथान्तरम् । न उनका कोई कारण है, न कर्ता । न आदि न तस्य कारणं कर्ता कार्यमेव च ॥ ६ है, न अन्त और न मध्य है; न कर्म और करण न कर्म करणं वापि नाकार्यं नास्य बन्धुरबन्धुर्वा नियन्ता प्रेरकोऽपि वा न पतिर्न गुरुस्त्राता नाधिको न समस्तथा न जन्ममरणे तस्य न कांक्षितमकांक्षितम् । । न अकर्तव्य है और न कर्तव्य ही है । उनका न कोई है; । । बन्धु है और न अबन्धु; न नियन्ता है, न प्रेरक ॥ ७ न पति है, न गुरु है और न त्राता ही है । उनसे; | अधिककी चर्चा कौन करे, उनके समान भी कोई नहीं है॥६-७ ॥ उनका न जन्म होता है, न मरण । उनके विधिर्न निषेधश्च न मुक्तिर्न च बन्धनम् ॥ ८ लिये कोई वस्तु न तो वांछित है और न अवांछित न नास्ति यद्यदकल्याणं तत्तदस्य कदाचन । कल्याणं सकलं चास्ति परमात्मा शिवो यतः
स शिवः सर्वमेवेदमधिष्ठाय स्वशक्तिभिः ।
अप्रच्युतः स्वतो भावः स्थितः स्थाणुरतः स्मृतः ॥
शिवेनाधिष्ठितं यस्मात् जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
सर्वरूपः स्मृतः शर्वस्तथा ज्ञात्वा न मुह्यति ॥
शर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषः सत्परो महान् ।
हिरण्यबाहुर्भगवान् हिरण्यपतिरीश्वरः ॥
अम्बिकापतिरीशानः पिनाकी वृषवाहनः ।
एको रुद्रः परं ब्रह्म पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥
बालाग्रमात्रो हृन्मध्ये विचिन्त्यो दहरान्तरे ।
हिरण्यकेशः पद्माक्षो ह्यरुणस्ताम्र एव च ॥
योऽवसर्पत्यसौ देवो नीलग्रीवो हिरण्मयः ।
सौम्योऽघोरस्तथा मिश्रश्चाक्षरश्चामृतोऽव्ययः ॥
स पुंविशेषः परमो भगवानन्तकान्तकः ।
चेतनाचेतनोन्मुक्तः प्रपञ्चाच्च परात्परः ॥
शिवेनातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्ये विलोकिते । । ही । उनके लिये न विधि है न निषेध । न बन्धन है न मुक्ति । जो - जो अकल्याणकारी दोष हैं, वे उनमें कभी नहीं रहते । परंतु सम्पूर्ण कल्याणकारी गुण उनमें ॥ ९ सदा ही रहते हैं; क्योंकि शिव साक्षात् परमात्मा हैं ॥ ८ - ९ ॥ वे शिव अपनी शक्तियोंद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्में १० व्याप्त होकर अपने स्वभावसे च्युत न होते हुए सदा ही स्थित रहते हैं; इसलिये उन्हें स्थाणु कहते हैं । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् शिवसे अधिष्ठित है; अतः ११ भगवान् शिव सर्वरूप माने गये हैं । जो ऐसा जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता । रुद्र सर्वरूप हैं । उन्हें १२ नमस्कार है । वे सत्स्वरूप, परम महान् पुरुष, हिरण्यबाहु भगवान्, हिरण्यपति, ईश्वर, अम्बिकापति, ईशान, पिनाकपाणि तथा वृषभवाहन हैं । एकमात्र रुद्र ही १३ परब्रह्म परमात्मा हैं । वे ही कृष्ण - पिंगलवर्णवाले पुरुष हैं ॥ १०–१३ ॥ वे हृदयके भीतर कमलके मध्यभागमें केशके १४ अग्रभागकी भाँति सूक्ष्मरूपसे चिन्तन करनेयोग्य हैं । उनके केश सुनहरे रंगके हैं । नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं । अंगकान्ति अरुण और ताम्रवर्णकी है । वे १५ सुवर्णमय नीलकण्ठ देव सदा विचरते रहते हैं । उन्हें सौम्य, घोर, मिश्र, अक्षर, अमृत और अव्यय कहा गया है । वे पुरुषविशेष परमेश्वर भगवान् शिव कालके १६ भी काल हैं । चेतन और अचेतनसे परे हैं । इस प्रपंचसे भी परात्पर हैं ॥ १४–१६ ॥ शिवमें ऐसे ज्ञान और ऐश्वर्य देखे गये हैं, जिनसे बढ़कर ज्ञान और ऐश्वर्य अन्यत्र नहीं हैं । लोकेशातिशयत्वेन स्थितं प्राहुर्मनीषिणः ॥ १७ मनीषी पुरुषोंने भगवान् शिवको लोकमें सबसे अधिक
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वायवीयसंहिता अ ० ६ ] ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम् । प्रतिसर्गप्रसूतानां स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम् ॥ १८ उपदेष्टा
कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः ।
सर्वेषामेव सर्वेश: कालावच्छेदवर्जितः ॥ १ ९
स्वाभाविकी तस्य शक्तिः सर्वातिशायिनी । शुद्धा ज्ञानमप्रतिमं नित्यं वपुरत्यन्तनिर्मलम् ॥ २०
ऐश्वर्यमप्रतिद्वन्द्वं सुखमात्यन्तिकं बलम् ।
तेजः प्रभावो वीर्यं च क्षमा कारुण्यमेव च ॥ २१
परिपूर्णस्य सर्गाद्यैर्नात्मनोऽस्ति प्रयोजनम् ।
परानुग्रह एवास्य फलं सर्वस्य कर्मणः ॥ २२
प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः ।
शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवो हि परः स्मृतः ॥ २३
शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावनात्तज्जपादपि ।
या सिद्धिः सा परा प्राप्या भवत्येव न संशयः ॥ २४
तस्मादेकाक्षरं देवमाहुरागमपारगाः ।
वाच्यवाचकयोरैक्यं मन्यमाना मनस्विनः ॥ २५
अस्य मात्राः समाख्याताश्चतस्त्रो वेदमूर्द्धनि ।
अकारश्चाप्युकारश्च मकारो नाद इत्यपि ॥ २६
अकारं बह्वृचं प्राहरुकारो यजुरुच्यते ।
मकारः सामनादोऽस्य श्रुतिराथर्वणी स्मृता ॥ २७
अकारश्च महाबीजं रजः स्रष्टा चतुर्मुखः ।
उकारः प्रकृतिर्योनिः सत्त्वं पालयिता हरिः ॥ २८
मकारः पुरुषो बीजं तमः संहारको हरः ।
नादः परः पुमानीशो निर्गुणो निष्क्रियः शिवः ॥ २ ९
सर्वं तिसृभिरेवेदं मात्राभिर्निखिलं त्रिधा ।
अभिधाय शिवात्मानं बोधयत्यर्धमात्रया ॥ ३०
( उत्तरखण्ड ) ९ ०३ ऐश्वर्यशाली पदपर प्रतिष्ठित बताया है । प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न होकर एक सीमित कालतक रहनेवाले ब्रह्माओंको आदिकालमें विस्तारपूर्वक शास्त्रका उपदेश देनेवाले भगवान् शिव ही हैं॥१७-१८ ॥ एक सीमित कालतक रहनेवाले गुरुओंके भी वे गुरु हैं । वे सर्वेश्वर सदा सभीके गुरु हैं । कालकी सीमा उन्हें छू नहीं सकती । उनकी शुद्ध स्वाभाविक शक्ति सबसे बढ़कर है । उन्हें अनुपम ज्ञान और नित्य अक्षय शरीर प्राप्त है ॥ १ ९ -२० ॥ उनके ऐश्वर्यकी कहीं तुलना नहीं है । उनका सुख अक्षय और बल अनन्त है । उनमें असीम तेज, प्रभाव, पराक्रम, क्षमा और करुणा भरी है । वे नित्य परिपूर्ण हैं । उन्हें सृष्टि आदिसे अपने लिये कोई प्रयोजन नहीं है । दूसरोंपर परम अनुग्रह समस्त कर्मोंका फल है ॥ २१-२२ ॥ प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक रुद्र आदि नामोंमें प्रणव ही सबसे उत्कृष्ट है । प्रणववाच्य शम्भुके चिन्तन और जपसे प्राप्त होती है, वही परा सिद्धि है, इसमें है ॥ २३-२४ ॥ ही उनके है । शिव, माना गया जो सिद्धि संशय नहीं इसीलिये शास्त्रोंके पारंगत मनस्वी विद्वान् वाच्य और वाचककी एकता स्वीकार करते हुए महादेवजीको एकाक्षरात्मक प्रणवरूप कहते हैं । माण्डूक्य - उपनिषद्में प्रणवकी चार मात्राएँ बतायी गयी हैं - अकार, उकार, मकार और नाद । अकारको ऋग्वेद कहते हैं । उकार यजुर्वेदरूप कहा गया है । मकार सामवेद है और नाद अथर्ववेदकी श्रुति है ॥ २५–२७ ॥ अकार महाबीज है, वह रजोगुण तथा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है । उकार प्रकृतिरूपा योनि है, वह सत्त्वगुण तथा पालनकर्ता श्रीहरि है । मकार जीवात्मा एवं बीज है, वह तमोगुण तथा संहारकर्ता रुद्र है । नाद परम पुरुष परमेश्वर है, वह निर्गुण एवं निष्क्रिय शिव है ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार प्रणव अपनी तीन मात्राओंके द्वारा ही तीन रूपोंमें इस जगत्का प्रतिपादन करके अपनी अर्धमात्रा ( नाद ) के द्वारा शिवस्वरूपका बोध | कराता है ॥३० ॥
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९ ०४ यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद्-यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक-स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है जिनसे | बढ़कर कोई न तो अधिक सूक्ष्म है और न, । । है तथा जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावस महान् ही । | प्रकाशमय आकाशमें स्थित हैं, उन परम ३१ परमेश्वर शिवसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है ॥३१ पुरुष शिवतत्त्ववर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शिवतत्त्ववर्णन नामक छठाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः परमेश्वरकी शक्तिका ऋषियोंद्वारा साक्षात्कार, शिवके प्रसादसे प्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी सेवा - भक्ति तथा पाँच प्रकारके शिवधर्मका वर्णन उपमन्युरुवाच शक्तिः स्वाभाविकी तस्य विद्या विश्वविलक्षणा एकानेकस्य रूपेण भाति भानोरिव प्रभा अनन्ताः शक्तयो यस्या इच्छाज्ञानक्रियादयः मायाद्याश्चाभवन्वह्नेर्विस्फुलिंगा यथा तथा सदाशिवेश्वराद्या हि विद्याविद्येश्वरादयः उपमन्यु कहते हैं— परमेश्वर शिवकी स्वाभाविक । शक्ति विद्या है, जो सबसे विलक्षण है । वह एक होकर ॥ १ भी अनेक रूपसे भासित होती है । जैसे सूर्यकी प्रभा एक होकर भी अनेक रूपमें प्रकाशित होती है ॥ १ ॥
। उस विद्याशक्तिसे इच्छा, ज्ञान, क्रिया और माया ॥ २ आदि अनेक शक्तियाँ उत्पन्न हुई हैं, ठीक उसी तरह जैसे अग्निसे बहुत - सी चिनगारियाँ प्रकट होती हैं ॥ उसीसे सदाशिव और ईश्वर आदि तथा विद्या और अभवन् पुरुषाश्चास्याः प्रकृतिश्च परात्परा ॥ ३ विद्येश्वर आदि पुरुष भी प्रकट हुए हैं । परात्पर प्रकृति भी उसीसे उत्पन्न हुई है ॥ २-३ ॥ महदादिविशेषान्तास्त्वजाद्याश्चापि मूर्त्तयः । महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सारे विकार तथा यच्चान्यदस्ति तत्सर्वं तस्याः कार्यं न संशयः ॥ ४ अज ( ब्रह्मा ) आदि मूर्तियाँ भी उसीसे प्रकट हुई हैं ।
सा शक्तिः सर्वगा सूक्ष्मा प्रबोधानन्दरूपिणी ।
शक्तिमानुच्यते देवः शिवः शीतांशुभूषणः ॥
वेद्यः शिवः शिवा विद्या प्रज्ञा चैव श्रुतिः स्मृतिः ।
धृतिरेषा स्थितिर्निष्ठा ज्ञानेच्छाकर्मशक्तयः ॥
आज्ञा चैव परं ब्रह्म द्वे विद्ये च परापरे ।
शुद्धविद्या शुद्धकला सर्वं शक्तिकृतं यतः ॥
माया च प्रकृतिर्जीवो विकारो विकृतिस्तथा ।
असच्च सच्च यत्किंचित्तया सर्वमिदं ततम् ॥
इनके सिवा जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब भी उसी शक्तिके कार्य हैं, इसमें संशय नहीं है । वह शक्ति सर्वव्यापिनी, ५ सूक्ष्मा तथा ज्ञानानन्दरूपिणी है । उसीसे शीतांशुभूषण भगवान् शिव शक्तिमान् कहलाते हैं ॥ ४-५ ॥ शक्तिमान् – शिव वेद्य हैं और शक्तिरूपिणी— ६ शिवा विद्या हैं । वे शक्तिरूपा शिवा ही प्रज्ञा, श्रुति, स्मृति, धृति, स्थिति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, कर्मशक्ति, आज्ञाशक्ति, परब्रह्म, परा और अपरा नामकी ७ दो विद्याएँ, शुद्ध विद्या और शुद्ध कला हैं; क्योंकि सब । कुछ शक्तिका ही कार्य है । माया, प्रकृति, जीव, विकार, | विकृति, असत् और सत् आदि जो कुछ भी उपलब्ध ८ होता है, वह सब उस शक्तिसे ही व्याप्त है ॥ ६–८ ॥
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वायवीयसंहिता अ ० ७ ]
मायया सर्वं ब्रह्माण्ड सचराचरम् ।
सा देवी मोचयत्यपि लीलया ॥ ९
मोहयत्यप्रयत्नेन सह सर्वेशः सप्तविंशप्रकारया । अनया विश्वं व्याप्य स्थितस्तस्मात् मुक्तिरत्र प्रवर्तते ॥ १० पुरा केचिन्मुनयो ब्रह्मवादिनः । मुमुक्षवः संशयाविष्टमनसो विमृशन्ति यथातथम् ॥ ११
किं कारणं कुतो जाता जीवामः केन वा वयम् ।
कुत्रास्माकं सम्प्रतिष्ठा केन वाधिष्ठिता वयम् ॥ १२
केन वर्तामहे शश्वत्सुखेष्वन्येषु चानिशम् ।
अविलङ्घ्या च विश्वस्य व्यवस्था केन वा कृता ॥ १३
कालस्य भावो नियतिर्यदृच्छा नात्र युज्यते ।
भूतानि योनिः पुरुषो योगी चैषां परोऽथवा ॥ १४
अचेतनत्वात्कालादेश्चेतनत्वेऽपि चात्मनः ।
सुखदुःखानि भूतत्वादनीशत्वाद्विचार्यते ॥ १५
तद्ध्यानयोगानुगताः प्रपश्यन् शक्तिमैश्वरीम् ।
पाशविच्छेदिकां साक्षान्निगूढां स्वगुणैर्भृशम् ॥ १६
तया विच्छिन्नपाशास्ते सर्वकारणकारणम् ।
शक्तिमन्तं महादेवमपश्यन्दिव्यचक्षुषा ॥ १७
यः कारणान्यशेषाणि कालात्मसहितानि च ।
अप्रमेयोऽनया शक्त्या सकलं योऽधितिष्ठति ॥ १८
( उत्तरखण्ड ) ९ ०५ वे शक्तिरूपिणी शिवादेवी मायाद्वारा समस्त चराचर ब्रह्माण्डको अनायास ही मोहमें डाल देती और लीलापूर्वक उसे मोहके बन्धनसे मुक्त भी कर देती हैं । इस शक्तिके सत्ताईस प्रकार हैं, सत्ताईस प्रकारवाली इस शक्तिके साथ सर्वेश्वर शिव सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हैं । इन्हींके चरणोंमें मुक्ति विराजती है ॥ ९ -१० ॥ पूर्वकालकी बात है, संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाले कुछ ब्रह्मवादी मुनियोंके मनमें यह संशय हुआ । वे परस्पर मिलकर यथार्थरूपसे विचार करने लगे — इस जगत्का कारण क्या है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं और किससे जीवन धारण करते हैं? हमारी प्रतिष्ठा कहाँ है? हमारा अधिष्ठाता कौन है? हम किसके सहयोगसे सदा सुखमें और दुःखमें रहते हैं? किसने इस विश्वकी अलंघनीय व्यस्था की है? यदि कहें काल, स्वभाव, नियति ( निश्चित फल देनेवाला कर्म ) और यदृच्छा ( आकस्मिक घटना ) इसमें कारण हों तो यह कथन युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता । पाँचों महाभूत तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हैं । इन सबका संयोग तथा अन्य कोई भी कारण नहीं है; क्योंकि ये काल आदि अचेतन हैं । जीवात्माके चेतन होनेपर भी वह सुख - दुःखसे अभिभूत तथा असमर्थ होनेसे इस । जगत्का कारण नहीं हो सकता । अतः कौन कारण है, इसका विचार करना चाहिये ॥ ११ - १५ ॥ [ इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब वे युक्तियोंद्वारा किसी निर्णयतक न पहुँच सके, ] तब उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे- सत्त्व, रज और तमसे ढकी है तथा उन तीनों गुणोंसे परे है । परमेश्वरकी वह साक्षात् शक्ति समस्त पाशोंका विच्छेद करनेवाली है । उसके द्वारा बन्धन काट दिये जानेपर जीव अपनी दिव्य दृष्टिसे उन सर्वकारण - कारण शक्तिमान् महादेवजीका दर्शन करने लगते हैं, जो कालसे लेकर जीवात्मातक पूर्वोक्त समस्त कारणोंपर तथा सम्पूर्ण विश्वपर अपनी इस शक्तिके द्वारा ही शासन करते हैं । वे परमात्मा अप्रमेय | हैं ॥ १६–१८ ॥
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९ ०६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ ततः प्रसादयोगेन योगेन परमेण च । तदनन्तर परमेश्वरके प्रसादयोग, परमयोग तथा दृष्टेन भक्तियोगेन दिव्यां गतिमवाप्नुयुः तस्मात् सहतथा शक्त्या हृदि पश्यन्ति ये शिवम् तेषां शाश्वतिकी शान्तिर्नेतरेषामिति श्रुतिः न हि शक्तिमतः शक्त्या विप्रयोगोऽस्ति जातुचित् तस्मात् शक्तेः शक्तिमतस्तादात्म्यान्निर्वृतिर्द्वयोः
क्रमो विवक्षितो नूनं विमुक्तौ ज्ञानकर्मणोः ।
प्रसादे सति सा मुक्तिर्यस्मात्करतले स्थिता ॥
देवो वा दानवो वापि पशुर्वा विहगोऽपि वा ।
कीरो वाथ कृमिर्वापि मुच्यते तत्प्रसादतः ॥
गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा ।
वृद्धो वा म्रियमाणो वा स्वर्गस्थो वाथ नारकी ॥
पतितो वापि धर्मात्मा पण्डितो मूढ एव वा ।
प्रसादे तत्क्षणादेव मुच्यते नात्र संशयः ॥
अयोग्यानां च कारुण्याद्भक्तानां परमेश्वरः ।
प्रसीदति न संदेहो विगृह्य विविधान् मलान् ॥
प्रसादादेव सा भक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः ।
अवस्थाभेदमुत्प्रेक्ष्य विद्वांस्तत्र न मुह्यति ॥
प्रसादपूर्विका येयं भुक्तिमुक्तिविधायिनी ।
नैव सा शक्यते प्राप्तुं नरैरैकेन जन्मना ॥
अनेकजन्मसिद्धानां श्रौतस्मार्तानुवर्तिनाम् । ॥ १ ९ सुदृढ़ भक्तियोगके द्वारा उन मुनियोंने दिव्य गति प्राप्त । कर ली । श्रीकृष्ण! जो अपने हृदयमें शक्तिसहित । । भगवान् शिवका दर्शन करते हैं, उन्हींको सनातन ॥ २० | शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं, यह श्रुतिका ॥ | कथन है । शक्तिमान्का शक्तिसे कभी वियोग नहीं ॥ २१ होता । अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनोंके तादात्म्यसे
।
परमानन्दकी प्राप्ति होती है ॥ १ ९ –२१ ॥
मुक्तिकी प्राप्तिमें निश्चय ही ज्ञान और कर्मका २२ कोई क्रम विवक्षित नहीं है, जब [ शिव और शक्तिकी ] कृपा हो जाती है, तब वह मुक्ति हाथमें आ जाती है । देवता, दानव, पशु, पक्षी तथा कीड़े - मकोड़े २३ भी उनकी कृपासे मुक्त हो जाते हैं ॥ २२-२३ ॥ गर्भका बच्चा, जन्मता हुआ बालक, शिशु, २४ तरुण, वृद्ध, मुमूर्षु, स्वर्गवासी, नारकी, पतित, धर्मात्मा, पण्डित अथवा मूर्ख साम्बशिवकी कृपा होनेपर तत्काल २५ मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २४-२५ ॥ परमेश्वर अपनी स्वाभाविक करुणासे अयोग्य २६ भक्तोंके भी विविध मलोंको दूर करके उनपर कृपा करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है । भगवान्की कृपासे ही भक्ति होती है और भक्तिसे ही उनकी कृपा होती है । २७ अवस्थाभेदका विचार करके विद्वान् पुरुष इस विषयमें मोहित नहीं होता है ॥ २६-२७ ॥ कृपाप्रसादपूर्वक जो यह भक्ति होती है, वह भोग २८ और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाली है । उसे मनुष्य एक जन्ममें नहीं प्राप्त कर सकता । अनेक जन्मोंतक श्रौत - स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके सिद्ध हुए विरक्त विरक्तानां प्रबुद्धानां प्रसीदति महेश्वरः ॥ २ ९ एवं ज्ञानसम्पन्न पुरुषोंपर महेश्वर प्रसन्न होते और कृपा करते हैं । देवेश्वर शिवके प्रसन्न होनेपर उस पशु प्रसन्ने सति देवेशे पशौ तस्मिन् प्रवर्तते ( जीव ) -में बुद्धिपूर्वक थोड़ी - सी भक्तिका उदय होता । अस्ति नाथो ममेत्यल्पा भक्तिर्बुद्धिपुरःसरा है । तब वह यह अनुभव करने लगता है कि भगवान् ॥ ३० शिव मेरे स्वामी हैं । फिर तपस्यापूर्वकवह नाना तपसा विविधैः शैवैर्धर्मैः प्रकारके शैवधर्मोके पालनमें संलग्न होता है । उन तत्प्रयोगे संयुज्यते नरः । । धर्मोंके पालनमें बारंबार लगे रहनेसे उसके हृदयमें
तदभ्यासस्ततो भक्तिः परा भवेत् ॥ ३१ । पराभक्तिका प्रादुर्भाव होताहै॥२८–३१ ॥