शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 931–940

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

पृष्ठ 931

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अ ० १० ] वायवीयसंहिता

मार्गेण मय्यवस्थितचेतसः ।

मदुक्तेनैव यो योग इत्यभिधीयते ॥ ३३

वृत्त्यन्तरनिरोधो श्रेष्ठं देवि चित्तप्रसाधनम् । अश्वमेधगणात् च तथा ह्येतद्दुष्प्राप्यं विषयैषिणाम् ॥ ३४ मुक्तिदं

विजितेन्द्रियवर्गस्य यमेन नियमेन च ।

पूर्वपापहरो योगो विरक्तस्यैव कथ्यते ॥ ३५

वैराग्याज्जायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते ॥ ३६

योगज्ञः पतितो वापि मुच्यते नात्र संशयः ।

दया कार्याथ सततमहिंसा ज्ञानसंग्रहः ॥ ३७

सत्यमस्तेयमास्तिक्यं श्रद्धा चेन्द्रियनिग्रहः ।

अध्यापनं चाध्ययनं यजनं याजनं तथा ॥ ३८

ध्यानमीश्वरभावश्च सततं ज्ञानशीलता ।

य एवं वर्त्तते विप्रो ज्ञानयोगस्य सिद्धये ॥ ३ ९

अचिरादेव विज्ञानं लब्ध्वा योगं च विन्दति ।

दग्ध्वा देहमिमं ज्ञानी क्षणात् ज्ञानाग्निना प्रिये ।

प्रसादान्मम योगज्ञः कर्मबन्धं प्रहास्यति ॥ ४०

पुण्यः पुण्यात्मकं कर्म मुक्तेस्तत्प्रतिबन्धकम् ।

तस्मान्नियोगतो योगी पुण्यापुण्यं विवर्जयेत् ॥ ४१

फलकामनया कर्मकरणात्प्रतिबध्यते ।

त्यजेत् ॥ ४२

न कर्ममात्रकरणात्तस्मात्कर्मफलं

प्रथमं कर्मयज्ञेन बहिः सम्पूज्य मां प्रिये ।

ज्ञानयोगरतो भूत्वा पश्चाद्योगं समभ्यसेत् ॥ ४३

देहिनः । ( उत्तरखण्ड ) ९ १७ मेरे बताये हुए मार्गसे ही मुझमें सुस्थिरभावसे चित्त लगानेवाले साधकके द्वारा जो अन्त: करणकी अन्य वृत्तियोंका निरोध किया जाता है, उसीको योग कहते हैं । देवि! चित्तको निर्मल एवं प्रसन्न बनाना अश्वमेध यज्ञोंके समूहसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि वह मुक्ति देनेवाला है । विषयभोगकी इच्छा रखनेवाले लोगोंके लिये यह ' मनः प्रसाद ' दुर्लभ है । जिसने यम और नियमके द्वारा इन्द्रियसमुदायपर विजय प्राप्त कर लिया है, उस विरक्त पुरुषके लिये ही योगको सुलभ बताया गया है । योग पूर्वपापोंको हर लेनेवाला है । वैराग्यसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे योग । योगज्ञ पुरुष पतित हो तो भी मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ - ३६१/२ ॥ सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये । सदा अहिंसाधर्मका पालन सबके लिये उचित है । ज्ञानका संग्रह भी आवश्यक है । सत्य बोलना, चोरीसे दूर रहना, ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना, मुझमें श्रद्धा करना, इन्द्रियोंको संयममें रखना, वेद - शास्त्रोंका पढ़ना - पढ़ाना, यज्ञ करना - कराना, मेरा चिन्तन करना, ईश्वरके प्रति अनुराग रखना और सदा ज्ञानशील होना ब्राह्मणके लिये नितान्त आवश्यक है । जो ब्राह्मण ज्ञानयोगकी सिद्धिके लिये सदा इस प्रकार उपर्युक्त धर्मोंका पालन करता है, वह शीघ्र ही विज्ञान पाकर योगको भी सिद्ध कर लेता है ॥ ३७-३९ १ / २ ॥ प्रिये! ज्ञानी पुरुष ज्ञानाग्निके द्वारा इस [ कर्ममय ] शरीरको क्षणभरमें दग्ध करके मेरे प्रसादसे योगका ज्ञाता होकर कर्म - बन्धनसे छुटकारा पा जाता है । पुण्य - पापमय जो कर्म है, उसे मोक्षका प्रतिबन्धक बताया गया है; इसलिये योगी पुरुष योगके द्वारा पुण्यापुण्यका परित्याग कर दे । फलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्म करनेसे ही मनुष्य बन्धनमें पड़ता है, केवल कर्म करनेमात्रसे नहीं; अतः कर्मके फलको त्याग देना चाहिये ॥ ४०–४२ ॥ प्रिये! पहले कर्ममय यज्ञद्वारा बाहर मेरी पूजा करके फिर ज्ञानयोगमें तत्पर हो साधक योगका अभ्यास करे । कर्मयज्ञसे मेरे यथार्थ स्वरूपका बोध प्राप्त हो जानेपर जीव योगयुक्त हो मेरे यजनसे विरत हो जाते हैं । उस समय वे मिट्टी, पत्थर और सुवर्णमें विदिते मम याथात्म्ये कर्मयज्ञेन ॥ ४४ भी समभाव रखते हैं ॥ ४३-४४ ॥ न यजन्ति हि मां युक्ताः समलोष्टाश्मकाञ्चनाः

पृष्ठ 932

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९ १८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० नित्ययुक्तो मुनिः श्रेष्ठो मद्भक्तश्च समाहितः । जो मेरा भक्त नित्ययुक्त एवं एकाग्रचित्त हो ज्ञानयोगरतो योगी मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥ ४५ ज्ञानयोगमें तत्पर रहता है, वह मुनियोंमें श्रेष्ठ एवं अथाविरक्तचित्ता ये वर्णिनो मदुपाश्रिताः ज्ञानचर्या क्रियास्वेव तेऽधिकुर्युस्तदर्हकाः द्विधा मत्पूजनं ज्ञेयं बाह्यमाभ्यन्तरं तथा वाङ्मनःकायभेदाच्च त्रिधा मद्भजनं विदुः तपः कर्म जपो ध्यानं ज्ञानं वेत्यनुपूर्वशः पञ्चधा कथ्यते सद्भिस्तदेव भजनं पुनः

अन्यात्मविदितं बाह्यमस्मदभ्यर्चनादिकम् ।

तदेव तु स्वसंवेद्यमाभ्यन्तरमुदाहृतम् ॥

मनो मत्प्रवणं चित्तं न मनोमात्रमुच्यते । । योगी होकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है । जो | वर्णाश्रमी पुरुष मनसे विरक्त नहीं हैं, वे मेरा आश्रय । । ले ज्ञान, चर्या और क्रिया - इन तीनमें ही प्रवृत्त होनेके

॥ ४६ अधिकारी हैं, वे केवल उन्हींके अनुष्ठानकी योग्यता ।

रखते हैं ॥ ४५-४६ ॥

। मेरा पूजन दो प्रकारका है- बाह्य और आभ्यन्तर ॥ ४७ इसी तरह मन, वाणी और शरीर - इन त्रिविध । साधनोंके भेदसे मेरा भजन तीन प्रकारका माना गया । है । तप, कम, जप, ध्यान और ज्ञान — ये मेरे भजनके ॥ ४८ पाँच स्वरूप हैं; अतः साधुपुरुष उसे पाँच प्रकारका भी कहते हैं ॥ ४७-४८ ॥ [ मूर्ति आदिमें ] जो मेरा पूजन आदि होता है, ४ ९ जिसे दूसरे लोग जान लेते हैं, वह ' बाह्य ' पूजन या भजन कहा गया है तथा वही भजन - पूजन जब मनके द्वारा होनेसे केवल अपने ही अनुभवका विषय होता है, तब ' आभ्यन्तर ' कहलाता है ॥४ ९ ॥ मुझमें लगा हुआ चित्त ही ' मन ' कहलाता मन्नामनिरता वाणी वाङ्मता खलु नेतरा ॥५० है । सामान्यतः मनमात्रको यहाँ मन नहीं कहा गया

लिङ्गैर्मच्छासनादिष्टैस्त्रिपुण्ड्रादिभिरङ्कितः ।

ममोपचारनिरतः कायः कायो न चेतरः ॥

मदर्चा कर्म विज्ञेयं बाह्ये यागादिनोच्यते ।

मदर्थे देहसंशोषस्तपः कृच्छ्रादि नो मतम् ॥

जपः पञ्चाक्षराभ्यासः प्रणवाभ्यास एव च । है । इसी तरह जो वाणी मेरे नामके जप और कीर्तनमें लगी हुई है, वही ' वाणी ' कहलानेयोग्य है, दूसरी नहीं तथा जो मेरे शास्त्रमें बताये हुए त्रिपुण्ड्र आदि चिह्नोंसे अंकित है और निरन्तर मेरी सेवा-५१ पूजामें लगा हुआ है, वही शरीर ' शरीर ' है, दूसरा नहीं ॥ ५०-५१ ॥ मेरी पूजाको ही ' कर्म ' जानना चाहिये । बाहर ५२ जो यज्ञ आदि किये जाते हैं, उन्हें ' कर्म ' नहीं कहा गया है । मेरे लिये शरीरको सुखाना ही ‘ तप ' है, कृच्छ्र - चान्द्रायण आदिका अनुष्ठान नहीं । पंचाक्षर-मन्त्रकी आवृत्ति, प्रणवका अभ्यास तथा रुद्राध्याय रुद्राध्यायादिकाभ्यासो न वेदाध्ययनादिकम् ॥ ५३ आदिका बारंबार पाठ ही यहाँ ' जप ' कहा गया है, वेदाध्ययन आदि नहीं ॥ ५२-५३ ॥ मेरे स्वरूपका चिन्तन - स्मरण ही ' ध्यान ' है । ध्यानं मद्रूपचिन्ताद्यं आत्मा आदिके लिये की हुई समाधि नहीं । मेरे ममागमार्थविज्ञानं नात्माद्यर्थसमाधयः । आगमोंके अर्थको भलीभाँति जानना ही ' ज्ञान ' है,

ज्ञानं नान्यार्थवेदनम् ॥ ५४ । दूसरी किसी वस्तुके अर्थको समझना नहीं ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 933

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अ ० १० ] वायवीयसंहिता वाभ्यन्तरे वाथ यत्र स्यान्मनसो रतिः । बाह्ये तत्त्वनिष्ठां समाचरेत् ॥ ५५ प्राग्वासनावशाद्देवि श्रेष्ठं भवेच्छतगुणाधिकम् । बाह्यादाभ्यन्तरं असङ्करत्वाद्दोषाणां दृष्टानामप्यसम्भवात् ॥ ५६ ।

शौचमाभ्यन्तरं विद्यान्न बाह्यं शौचमुच्यते ।

अन्तः शौचविमुक्तात्मा शुचिरप्यशुचिर्यतः ॥ ५७

बाह्यमाभ्यन्तरं चैव भजनं भावपूर्वकम् ।

न भावरहितं देवि विप्रलम्भैककारणम् ॥ ५८

कृतकृत्यस्य पूतस्य मम किं क्रियते नरैः ।

बहिर्वाभ्यन्तरं थ भावो हि गृह्यते ॥ ५ ९

भावैकात्मा क्रिया देवि मम धर्मः सनातनः ।

मनसा कर्मणा वाचा ह्यनपेक्ष्य फलं क्वचित् ॥ ६०

फलोद्देशेन देवेशि लघुर्मम समाश्रयः ।

फलार्थी तदभावे मां परित्यक्तुं क्षमो यतः ॥ ६१

फलार्थिनोऽपि यस्यैव मयि चित्तं प्रतिष्ठितम् ।

भावानुरूपफलदस्तस्याप्यहमनिन्दिते ॥ ६२

फलानपेक्षया येषां मनो मत्प्रवणं भवेत् ।

प्रार्थयेयुः फलं पश्चाद्भक्तास्तेऽपि मम प्रियाः ॥ ६३

प्राक् संस्कारवशादेव ये विचिन्त्य फलाफले ।

विवशा मां प्रपद्यन्ते मम प्रियतमा मताः ॥ ६४

मल्लाभान्न परो लाभस्तेषामस्ति यथातथम् ।

ममापि लाभस्तल्लाभान्नापरः परमेश्वरि ॥ ६५

मदनुग्रहतस्तेषां भावो मयि समर्पितः ।

फलं परमनिर्वाणं प्रयच्छति बलादिव ॥ ६६

( उत्तरखण्ड ) ९ १ ९ देवि! पूर्ववासनावश बाह्य अथवा आभ्यन्तर जिस पूजनमें मनका अनुराग हो, उसीमें दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिये । बाह्य पूजनसे आभ्यन्तर पूजन सौ गुना अधिक श्रेष्ठ है; क्योंकि उसमें दोषोंका मिश्रण नहीं होगा तथा प्रत्यक्ष दीखनेवाले दोषोंकी भी वहाँ सम्भावना नहीं रहती है॥५५-५६ ॥ भीतरकी शुद्धिको ही शुद्धि समझनी चाहिये । बाहरी शुद्धिको शुद्धि नहीं कहते हैं । जो आन्तरिक शुद्धिसे रहित है, वह बाहरसे शुद्ध होनेपर भी अशुद्ध ही है । देवि! बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही प्रकारका भजन भाव ( अनुराग ) -पूर्वक ही होना चाहिये, बिना भावके नहीं । भावरहित भजन तो एकमात्र विप्रलम्भ ( छलना ) -का ही कारण होता है ॥ ५७-५८ ॥ मैं तो सदा ही कृतकृत्य एवं पवित्र हूँ, मनुष्य मेरा क्या करेंगे? उनके द्वारा किये गये बाह्य अथवा आभ्यन्तर पूजनमें उनका जो भाव ( प्रेम ) है, उसीको मैं ग्रहण करता हूँ । देवि! क्रियाका एकमात्र आत्मा भाव ही है । वही मेरा सनातनधर्म है । मन, वाणी और कर्मद्वारा कहीं भी किंचिन्मात्र फलकी इच्छा न रखकर ही क्रिया करनी चाहिये । देवेश्वरि! फलका उद्देश्य रखनेसे मेरा आश्रय लघु हो जाता है; क्योंकि फलार्थीको यदि फल न मिला तो वह मुझे छोड़ सकता है ॥५ ९ –६१ ॥ सती साध्वी देवि! फलार्थी होनेपर भी जिस साधकका चित्त मुझमें ही प्रतिष्ठित है, उसे उसके भावके अनुसार फल मैं अवश्य देता हूँ । जिनका मन फलकी इच्छा न रखकर ही मुझमें लगा हो, परंतु पीछे वे फल चाहने लगे हों, वे भक्त भी मुझे प्रिय हैं ॥ ६२-६३ ॥ जो पूर्वसंस्कारवश ही फलाफलकी चिन्ता न करके विवश हो मेरी शरण लेते हैं, वे भक्त मुझे अधिक प्रिय हैं । परमेश्वरि! उन भक्तोंके लिये मेरी प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई वास्तविक लाभ नहीं है तथा मेरे लिये भी वैसे भक्तोंकी प्राप्तिसे बढ़कर और कोई लाभ नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ मुझमें समर्पित हुआ उनका भाव मेरे अनुग्रहसे ही उनको मानो बलपूर्वक परम निर्वाणरूप फल प्रदान करता है । जिन्होंने अपने चित्तको मुझे समर्पित कर

पृष्ठ 934

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९ २० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११

महात्मनामनन्यानां मयि संन्यस्तचेतसाम् ।

अष्टधा लक्षणं प्राहुर्मम धर्माधिकारिणाम् ॥ ६७

मद्भक्तजनवात्सल्यं पूजायां चानुमोदनम् ।

स्वयमभ्यर्चनं चैव मदर्थे चाङ्गचेष्टितम् ॥ ६८

मत्कथाश्रवणे भक्तिः स्वरनेत्राङ्गविक्रियाः ।

ममानुस्मरणं नित्यं यश्च मामुपजीवति ॥ ६ ९

एवमष्टविधं चिह्नं यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्तते ।

स विप्रेन्द्रो मुनिः श्रीमान् स यतिः स च पण्डितः ॥ ७०

न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भक्तो श्वपचोऽपि यः ।

तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥ ७१

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ७२

दिया है, अतएव जो मेरे अनन्य भक्त हैं, वे महात्मा पुरुष ही मेरे धर्मके अधिकारी हैं । उनके आठ । लक्षण बताये गये हैं॥६६-६७ ॥ मेरे भक्तजनोंके प्रति स्नेह, मेरी पूजाका अनुमोदन, स्वयंकी भी मेरे पूजनमें प्रवृत्ति, मेरे लिये | ही शारीरिक चेष्टाओंका होना, मेरी कथा सुननेमें । भक्तिभाव, कथा सुनते समय स्वर, नेत्र और अंगोंमें ॥ विकारका होना, बारंबार मेरी स्मृति और सदा मेरे आश्रित रहकर ही जीवन - निर्वाह करना - ये आठ प्रकारके चिह्न यदि किसी म्लेच्छमें भी हों तो वह विप्रशिरोमणि श्रीमान् मुनि है । वह संन्यासी है और वही पण्डित है॥६८–७० ॥ जो मेरा भक्त नहीं है, वह चारों वेदोंका विद्वान् हो तो भी मुझे प्रिय नहीं है । परंतु जो मेरा भक्त है, वह चाण्डाल हो तो भी प्रिय है । उसे उपहार देना चाहिये, उससे प्रसाद ग्रहण करना चाहिये तथा वह मेरे समान ही पूजनीय है । जो भक्ति - भावसे मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल समर्पित करता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरी भी दृष्टिसे । कभी ओझल नहीं होता है ॥ ७१-७२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शिवभक्तिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शिवभक्तिवर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः वर्णाश्रम धर्म तथा नारी - धर्मका वर्णन; शिवके भजन, चिन्तन एवं ज्ञानकी ईश्वर उवाच

अथ वक्ष्यामि देवेशि भक्तानामधिकारिणाम् ।

विदुषां द्विजमुख्यानां वर्णधर्मसमासतः ॥ १

त्रिःस्नानं चाग्निकार्यं च लिङ्गार्चनमनुक्रमम् ।

दानमीश्वरभावश्च दया सर्वत्र सर्वदा ॥ २

सत्यं सन्तोषमास्तिक्यमहिंसा सर्वजन्तुषु ।

ह्रीः श्रद्धाध्ययनं योगः सदाध्यापनमेव च ॥ ३

व्याख्यानं ब्रह्मचर्यं च श्रवणं च तपः क्षमा ।

शौचं शिखोपवीतं च उष्णीषं चोत्तरीयकम् ॥ ४।

महत्ताका प्रतिपादन महादेवजी कहते हैं — देवेश्वरि! अब मैं अधिकारी, विद्वान् एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण - भक्तोंके लिये संक्षेपसे वर्णधर्मका वर्णन करता हूँ ॥१ ॥

तीनों काल स्नान, अग्निहोत्र, विधिवत् शिवलिंग-पूजन, दान, ईश्वर - प्रेम, सदा और सर्वत्र दया, सत्य-भाषण, संतोष, आस्तिकता, किसी भी जीवकी हिंसा न करना, लज्जा, श्रद्धा, अध्ययन, योग, निरन्तर अध्यापन, व्याख्यान, ब्रह्मचर्य, उपदेश- श्रवण, तपस्या, क्षमा, शौच, शिखा धारण, यज्ञोपवीत - धारण, पगड़ी

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११ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ २१ अ ० चैव भस्मरुद्राक्षधारणम् । निषिद्धासेवनं पवण्यभ्यर्चनं देवि चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ ब्रह्मकूर्चस्य मासि मासि यथाविधि । पानं च विशेषेण तेनैव स्नाप्य मां प्रिये ॥ अभ्यर्चनं

सर्वक्रियान्नसन्त्यागः श्राद्धान्नस्य च वर्जनम् ।

तथा पर्युषितान्नस्य यावकस्य विशेषतः ॥

मद्यस्य मद्यगन्धस्य नैवेद्यस्य च वर्जनम् ।

सामान्यं सर्ववर्णानां ब्राह्मणानां विशेषतः ॥

क्षमा शान्तिश्च सन्तोषः सत्यमस्तेयमेव च ।

ब्रह्मचर्यं मम ज्ञानं वैराग्यं भस्मसेवनम् ॥

सर्वसङ्गनिवृत्तिश्च दशैतानि विशेषतः ।

लिङ्गानि योगिनां भूयो दिवा भिक्षाशनं तथा ॥

वानप्रस्थाश्रमस्थानां समानमिदमिष्यते ।

रात्रौ न भोजनं कार्यं सर्वेषां ब्रह्मचारिणाम् ॥

अध्यापनं याजनं च क्षत्रियस्याप्रतिग्रहः ।

वैश्यस्य च विशेषेण मया नात्र विधीयते ॥

रक्षणं सर्ववर्णानां युद्धे शत्रुवधस्तथा ।

दुष्टपक्षिमृगाणां च दुष्टानां शातनं नृणाम् ॥

अविश्वासश्च सर्वत्र विश्वासो मम योगिषु । धारण करना, दुपट्टा लगाना, निषिद्ध वस्तुका सेवन न ५ करना, भस्म धारण करना तथा रुद्राक्षकी माला पहनना, प्रत्येक पर्वमें विशेषतः चतुर्दशीको शिवकी पूजा करना, ६ ब्रह्मकूर्चका पान, प्रत्येक मासमें ब्रह्मकूर्चसे विधिपूर्वक मुझे नहलाकर मेरा विशेषरूपसे पूजन करना, सम्पूर्ण क्रियान्नका त्याग, श्राद्धान्नका परित्याग, बासी अन्न ७ तथा विशेषतः यावक ( कुल्थी या बोरो धान ) -का त्याग, मद्य और मद्यकी गन्धका त्याग, शिवको निवेदित ८ ( चण्डेश्वरके भाग ) नैवेद्यका त्याग - ये सभी वर्णोंके सामान्य धर्म हैं । ब्राह्मणोंके लिये विशेष धर्म ये हैं— ९ क्षमा, शान्ति, संतोष, सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना ), ब्रह्मचर्य, शिवज्ञान, वैराग्य, भस्म सेवन और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे निवृत्ति – इन दस धर्मोंको ब्राह्मणोंका विशेष धर्म कहा गया है ॥ २ – ९ १ / २ ॥ १० अब योगियों ( यतियों ) के लक्षण बताये जाते हैं । दिनमें भिक्षान्न भोजन उनका विशेष धर्म है । यह वानप्रस्थ आश्रमवालोंके लिये भी उनके समान ही ११ अभीष्ट है । इन सबको और ब्रह्मचारियोंको भी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये । पढ़ाना, यज्ञ कराना और १२ दान लेना – इनका विधान मैंने विशेषतः क्षत्रिय और वैश्यके लिये नहीं किया है॥१०–१२ ॥ मेरे आश्रयमें रहनेवाले राजाओं या क्षत्रियोंके १३ लिये थोड़ेमें धर्मका संग्रह इस प्रकार है । सब वर्णोंकी रक्षा, युद्धमें शत्रुओंका वध, दुष्ट पक्षियों, मृगों तथा दुराचारी मनुष्योंका दमन करना, सब लोगोंपर विश्वास स्त्रीसंसर्गश्च कालेषु चमूरक्षणमेव च ॥१४ न करना, केवल शिव - योगियोंपर ही विश्वास रखना, । ऋतुकालमें ही स्त्रीसंसर्ग करना, सेनाका संरक्षण, सदा सञ्चारितैश्चारैर्लोकवृत्तान्तवेदनम् ॥ १५ गुप्तचर भेजकर लोकमें घटित होनेवाले समाचारोंको सदास्त्रधारणं चैव भस्मकंचुकधारणम् जानना, सदा अस्त्र धारण करना तथा भस्ममय

राज्ञां ममाश्रमस्थानामेष धर्मस्य संग्रहः । कंचुक धारण करना ॥ १३-१५१ / २ ॥

गोरक्षा, वाणिज्य और कृषि - ये वैश्यके धर्म गोरक्षणं च वाणिज्यं कृषिवैश्यस्य कथ्यते ॥१६ बताये गये हैं । शूद्रेतर वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय और

धर्मः शूद्रस्य कथ्यते । वैश्योंकी सेवा शूद्रका धर्म कहा गया है ॥ १६१/२ ॥

शुश्रूषेतरवर्णानां बाग लगाना, मेरे तीर्थोंकी यात्रा करना तथा उद्यानकरणं चैव मम क्षेत्रसमाश्रयः ॥ १७ अपनी धर्मपत्नीके साथ ही समागम करना गृहस्थके विधीयते । लिये विहित धर्म है । वनवासियों,, यतियों और धर्मपत्न्यास्तु गमनं गृहस्थस्य लिये ब्रह्मचर्यका पालन मुख्य धर्म है । ब्रह्मचर्यं वनस्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ॥ १८ ब्रह्मचारियोंके

पृष्ठ 936

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९ २२ स्त्रीणां तु भर्तृशुश्रूषा धर्मो नान्यः सनातनः ममार्चनं च कल्याणि नियोगो भर्तुरस्ति चेत् या नारी भर्तृशुश्रूषां विहाय व्रततत्परा सा नारी नरकं याति नात्र कार्या विचारणा

अथ भर्तृविहीनाया वक्ष्ये धर्मं सनातनम् ।

व्रतं दानं तपः शौचं भूशय्यानक्तभोजनम् ॥

ब्रह्मचर्यं सदा स्नानं भस्मना सलिलेन वा ।

शान्तिमौनं क्षमा नित्यं संविभागो यथाविधि ॥

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पौर्णमास्यां विशेषतः ।

एकादश्यां च विधिवदुपवासो ममार्चनम् ॥

इति संक्षेपतः प्रोक्तो मयाश्रमनिषेविणाम् ।

ब्रह्मक्षत्रविशां देवि यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ॥

तथैव वानप्रस्थानां गृहस्थानां च सुन्दरि ।

शूद्राणामथ नारीणां धर्म एष सनातनः ॥

ध्येयस्त्वयाऽहं देवेशि सदा जाप्यः षडक्षरः ।

वेदोक्तमखिलं धर्ममिति धर्मार्थसंग्रहः ॥

अथ ये मानवा लोके स्वेच्छया धृतविग्रहाः ।

भावातिशयसंपन्नाः पूर्वसंस्कारसंयुताः ॥

विरक्ता वानुरक्ता वा स्त्र्यादीनां विषयेष्वपि ।

पापैर्न ते विलिम्पन्ते पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

तेषां ममात्मविज्ञानं विशुद्धानां विवेकिनाम् ।

मत्प्रसादाद्विशुद्धानां दुःखमाश्रमरक्षणम् ॥

नास्ति कृत्यमकृत्यं च समाधिर्वा परायणम् ।

न विधिर्न निषेधश्च तेषां मम यथा तथा ॥

तथेह परिपूर्णस्य साध्यं मम न विद्यते ।

तथैव कृतकृत्यानां तेषामपि न संशयः ॥

मद्भक्तानां हितार्थाय मानुषं भावमाश्रिताः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ | स्त्रियोंके लिये पतिकी सेवा ही सनातनधर्म है । / नहीं । कल्याणि! यदि पतिकी आज्ञा हो ॥ १ ९ भी कर सकती है । जो स्त्री पतिकी । | पूजन व्रतमें तत्पर होती है, वह नरकमें जाती है ॥ २० विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ अब मैं विधवा स्त्रियोंके सनातन २१ करूँगा । व्रत, दान, तप, शौच, भूमि - शयन, , दूसरा तो नारी मेरा सेवा छोड़कर । इस विषयम १७–२० ॥ धर्मका वर्णन केवल रातमें ही भोजन, सदा ब्रह्मचर्यका पालन, भस्म अथवा जलसे २२ स्नान, शान्ति, मौन, क्षमा, विधिपूर्वक सब जीवोंको अन्नका वितरण, अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा विशेषत: एकादशीको विधिवत् उपवास और मेरा पूजन [ −ये

२३ विधवा स्त्रियोंके धर्म हैं । ] ॥ २१–२३ ॥

देवि! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे अपने आश्रमका २४ सेवन करनेवाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों तथा वानप्रस्थों और गृहस्थोंके धर्मका वर्णन किया । साथ ही शूद्रों और नारियोंके लिये भी २५ इस सनातनधर्मका उपदेश दिया । देवेश्वरि! तुम्हें सदा मेरा ध्यान और मेरे षडक्षर मन्त्रका जप करना २६ चाहिये । यही सम्पूर्ण वेदोक्त धर्म है और यही धर्म तथा अर्थका संग्रह है॥२४–२६ ॥ लोकमें जो मनुष्य अपनी इच्छासे मेरे विग्रहकी २७ सेवाका व्रत धारण किये हुए हैं, पूर्वजन्मकी सेवाके संस्कारसे युक्त होनेके कारण भावातिरेकसे सम्पन्न हैं, वे स्त्री आदि विषयोंमें अनुरक्त हों या विरक्त, पापोंसे उसी प्रकार २८ लिप्त नहीं होते, जैसे जलसे कमलका पत्ता ॥ २७-२८ ॥ मेरे प्रसादसे विशुद्ध हुए उन विवेकी पुरुषोंको मेरे २ ९ स्वरूपका ज्ञान हो जाता है । फिर उनके लिये कर्तव्या-कर्तव्यका विधि - निषेध नहीं रह जाता, ऐसी दशामें आश्रमोचित धर्मोंका अनुपालन भी उनके लिये प्रपंचवत् दुःखरूप ही होता है । समाधि तथा शरणागति भी आवश्यक ३० नहीं रहती । जैसे मेरे लिये कोई विधि - निषेध नहीं है, वैसे ही उनके लिये भी नहीं है ॥ २ ९ -३० ॥ परिपूर्ण होनेके कारण जैसे मेरे लिये कुछ साध्य ३१ नहीं है, निश्चय ही उसी प्रकार उन कृतकृत्य ज्ञानयोगियोंके । लिये भी कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है । वे मेरे भक्तोंके । | हितके लिये मानवभावका आश्रय लेकर भूतलपर स्थित हैं । उन्हें रुद्रलोकसे परिभ्रष्ट अर्थात् अवतीर्ण रुद्र ही रुद्रलोकात्परिभ्रष्टास्ते रुद्रा नात्र संशयः ॥ ३२ समझना चाहिये; इसमें संशय नहीं है ॥ ३१-३२ ॥

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११ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ २३ अ ०

यद्वद् ब्रह्मादीनां प्रवर्तकम् ।

ममानुशासनं तन्नियोगः प्रवर्तकः ॥ ३३

तथा नराणामन्येषां सद्भावातिशयेन च । ममाज्ञाधारभावेन सर्वपापक्षयो भवेत् ॥ ३४ मदालोकनमात्रेण प्रवर्तन्ते प्रशस्तफलसूचकाः । प्रत्ययाश्च मयि भाववतां पुंसां प्रागदृष्टार्थगोचराः ॥ ३५ ।

कम्पस्वेदोऽ ऽश्रुपातश्च ' कण्ठे च स्वरविक्रिया ।

आनन्दाद्युपलब्धिश्च भवेदाकस्मिकी मुहुः ॥ ३६

स तैर्व्यस्तैः समस्तैर्वा लिङ्गैरव्यभिचारिभिः ।

मन्दमध्योत्तमैर्भावैर्विज्ञेयास्ते नरोत्तमाः ॥ ३७

यथायोऽग्निसमावेशान्नायो भवति केवलम् ।

तथैव मम सान्निध्यान्न ते केवलमानुषाः ॥ ३८

हस्तपादादिसाधर्म्याद् रुद्रान् मर्त्यवपुर्धरान् ।

प्राकृतानिव मन्वानो नावजानीत पण्डितः ॥ ३ ९

अवज्ञानं कृतं तेषु नरैर्व्यामूढचेतनैः ।

आयुः श्रियं कुलं शीलं हित्वा निरयमावहेत् ॥ ४०

ब्रह्मविष्णुसुरेशानामपि तूलायते पदम् ।

महात्मनाम् ॥ ४१

मत्तोऽन्यदनपेक्षाणामुद्धृतानां अशुद्धं बौद्धमैश्वर्यं प्राकृतं पौरुषं तथा । जैसे मेरी आज्ञा ब्रह्मा आदि देवताओंको कार्यमें प्रवृत्त करनेवाली है, उसी प्रकार उन शिवयोगियोंकी आज्ञा भी अन्य मनुष्योंको कर्तव्यकर्ममें लगानेवाली है । वे मेरी आज्ञाके आधार हैं । उनमें अतिशय सद्भाव भी है । इसलिये उनका दर्शन करनेमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है तथा प्रशस्त फलकी प्राप्तिको सूचित करनेवाले

विश्वासकी भी वृद्धि होती है । ३३-३४१ / २ ॥

जिन पुरुषोंका मुझमें अनुराग है, उन्हें उन बातोंका भी ज्ञान हो जाता है, जो पहले कभी उनके देखने, सुनने या अनुभवमें नहीं आयी होती हैं । उनमें अकस्मात् कम्प, स्वेद, अश्रुपात, कण्ठमें स्वरविकार तथा आनन्द आदि भावोंका बारंबार उदय होने लगता | है । ये सब लक्षण उनमें कभी एक - एक करके अलग-अलग प्रकट होते हैं और कभी सम्पूर्ण भावोंका एक साथ उदय होने लगता है । कभी विलग न होनेवाले इन मन्द, मध्यम और उत्तम भावोंद्वारा उन श्रेष्ठ सत्पुरुषोंकी पहचान करनी चाहिये ॥ ३५–३७ ॥ जैसे जब लोहा आगमें तपकर लाल हो जाता है, तब केवल लोहा नहीं रह जाता, उसी तरह मेरा सांनिध्य प्राप्त होनेसे वे केवल मनुष्य नहीं रह जाते-मेरा स्वरूप हो जाते हैं । हाथ, पैर आदिके साधर्म्यसे मानव - शरीर धारण करनेपर भी वे वास्तवमें रुद्र हैं । उन्हें प्राकृत मनुष्य समझकर विद्वान् पुरुष उनकी अवहेलना न करे ॥ ३८-३९ ॥ जो मूढ़चित्त मानव उनके प्रति अवहेलना करते हैं, वे अपनी आयु, लक्ष्मी, कुल और शीलको त्यागकर नरकमें गिरते हैं । मुझसे अतिरिक्त किसी अन्यकी चाह न रखनेवाले, जीवन्मुक्त महामना शिवयोगियोंके लिये ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रका पद भी तुच्छ होता है॥४०-४१ ॥ [ गुणोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले ] , प्राकृत तथा जीवात्मसम्बन्धी ऐश्वर्य गुणेशानामतस्त्याज्यं गुणातीतपदैषिणाम् ॥ ४२ बुद्धिलब्ध अशुद्ध हैं, अतएव गुणातीतपदकी प्राप्तिकी इच्छावाले गुणेश्वरोंको इनको त्याग देना चाहिये । अथवा बहुत कहनेसे क्या लाभ? जिस किसी भी उपायसे प्राप्त्यैकसाधनम् । मुझमें चित्त लगाना कल्याणकी प्राप्तिका एकमात्र

अथ किं बहुनोक्तेन श्रेयः ॥ ४३ । साधन है ॥ ४२-४३ ॥

मयि चित्तसमासङ्गो येन केनापि हेतुना

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९ २४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ उपमन्यु कहते हैं — इस प्रकार परमात्मा उपमन्युरुवाच शिवेन परमात्मना । श्रीकण्ठनाथ शिवने तीनों लोकोंके हितके लिये ज्ञानके इत्थं श्रीकण्ठनाथेन ज्ञानसारार्थसंग्रहः ॥ ४४ सारभूत अर्थका संग्रह प्रकट किया है ॥ ४४ ॥

हिताय जगतामुक्तो विज्ञानसंग्रहस्यास्य वेदशास्त्राणि कृत्स्नशः सेतिहासपुराणानि विद्या व्याख्यानविस्तरः ॥ ४५

ज्ञानं ज्ञेयमनुष्ठेयमधिकारोऽथ साधनम् ।

साध्यं चेति षडर्थानां संग्रहस्त्वेष संग्रहः ॥ ४६

गुरोरधिकृतं ज्ञानं ज्ञेयं पाशः पशुः पतिः ।

लिङ्गार्चनाद्यनुष्ठेयं भक्तस्त्वधिकृतोऽपि यः ॥ ४७

साधनं शिवमन्त्राद्यं साध्यं शिवसमानता ।

षडर्थसंग्रहस्यास्य ज्ञानात्सर्वज्ञतोच्यते ॥ ४८

प्रथमं कर्मयज्ञादेर्भक्त्या वित्तानुसारतः ।

बाह्येऽभ्यर्च्य शिवं पश्चादन्तर्यागरतो भवेत् ॥ ४ ९

रतिरभ्यन्तरे यस्य न बाह्ये पुण्यगौरवात् ।

न कर्म करणीयं हि बहिस्तस्य महात्मना ॥ ५०

ज्ञानामृतेन तृप्तस्य भक्त्या शैवशिवात्मनः ।

नान्तर्न च बहिः कृष्ण कृत्यमस्ति कदाचन ॥ ५१

तस्मात् क्रमेण संत्यज्य बाह्यमाभ्यन्तरं तथा ।

ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य ज्ञानं चापि परित्यजेत् ॥ ५२

नैकाग्रं चेच्छिवे चित्तं किं कृतेनापि कर्मणा ।

एकाग्रमेव चेच्चित्तं किं कृतेनापि कर्मणा ॥ ५३

तस्मात्कर्माण्यकृत्वा वा कृत्वा वान्तर्बहिः क्रमात् ।

येन केनाप्युपायेन शिवे चित्तं निवेशयेत् ॥ ५४

सम्पूर्ण वेद - शास्त्र, इतिहास, पुराण और विद्याएँ इस विज्ञान- संग्रहकी ही विस्तृत व्याख्याएँ हैं ॥ ४५ ज्ञान, ज्ञेय, अनुष्ठेय, अधिकार, साधन और ॥ | साध्य - इन छः अर्थोंका ही यह संक्षिप्त संग्रह । बताया गया है । गुरुके माध्यमसे प्राप्त हुआ ज्ञान ही [ वस्तुत: ] ज्ञान है, पाश, पशु तथा पति — ये जाननेयोग्य विषय हैं, लिंगार्चन आदि अनुष्ठेय कर्म हैं तथा जो शिवभक्त है, वही यहाँ अधिकारी कहा गया है॥४६-४७ ॥ [ इस शास्त्रमें ] शिवमन्त्र आदि साधन कहे गये हैं तथा शिवके साथ अभिन्नता साध्य है । ज्ञान, ज्ञेयादि इन छः विषयोंके ज्ञानसे सर्वज्ञताकी प्राप्ति हो जाती है, ऐसा [ शास्त्रोंमें ] कहा जाता है ॥ ४८ ॥

अपने वैभवके अनुसार भक्तिपूर्वक कर्मयज्ञ आदिके द्वारा भगवान् शिवकी बाह्यपूजा करनेके पश्चात् अन्तर्यागमें निरत होना चाहिये । [ पूर्वमें किये गये ] महान् पुण्योंके कारण जिस महात्माकी बहिर्यागमें विशेष अनुरक्ति हो चुकी है, उसके लिये [ कोई भी ] बाह्य कर्तव्य शेष नहीं रहता ॥ ४ ९ -५० ॥ श्रीकृष्ण! जो शिव और शिवासम्बन्धी ज्ञानामृतसे तृप्त है और उनकी भक्तिसे सम्पन्न है, उसके लिये बाहर - भीतर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं है । इसलिये क्रमशः बाह्य और आभ्यन्तर कर्मको त्यागकर ज्ञानसे ज्ञेयका साक्षात्कार करके फिर उस साधनभूत ज्ञानको भी त्याग दे॥५१-५२ ॥ यदि चित्त शिवमें एकाग्र नहीं है तो कर्म करनेसे भी क्या लाभ? और यदि चित्त एकाग्र ही है तो कर्म करनेकी भी क्या आवश्यकता है? अतः बाहर और भीतरके कर्म करके या न करके जिस - किसी भी उपायसे भगवान् शिवमें चित्त लगाये ॥ ५३-५४ ॥

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अ ० १२ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड )

निविष्टचित्तानां प्रतिष्ठितधियां सताम् ।

शिवेच सर्वत्र निर्वृतिः परमा भवेत् ॥ ५५

परत्रेह

नमः शिवायेति मन्त्रेणानेन सिद्धयः ।

स तस्मादधिगन्तव्यः परावरविभूतये ॥ ५६

९ २५ जिनका चित्त भगवान् शिवमें लगा है और जिनकी बुद्धि सुस्थिर है, ऐसे सत्पुरुषोंको इहलोक और परलोकमें भी सर्वत्र परमानन्दकी प्राप्ति होती है । | यहाँ ' ॐ नमः शिवाय ' इस मन्त्रसे सब सिद्धियाँ सुलभ होती हैं; अतः परावर विभूति ( उत्तम - मध्यम | ऐश्वर्य ) - की प्राप्तिके लिये इस मन्त्रका ज्ञान प्राप्त | करना चाहिये ॥ ५५-५६ | इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे शिवज्ञानवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें शिवज्ञानवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः पंचाक्षर - मन्त्रके श्रीकृष्ण उवाच

महर्षिवर सर्वज्ञ सर्वज्ञानमहोदधे ।

पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १

उपमन्युरुवाच

पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतैरपि ।

अशक्यं विस्तराद्वक्तुं तस्मात्संक्षेपतः शृणु ॥ २

वेदे शिवागमे चायमुभयत्र षडक्षरः ।

सर्वेषां शिवभक्तानामशेषार्थप्रसाधकः ॥ ३

तदल्पाक्षरमर्थाढ्यं वेदसारं विमुक्तिदम् ।

आज्ञासिद्धमसंदिग्धं वाक्यमेतत् शिवात्मकम् ॥ ४

नानासिद्धियुतं दिव्यं लोकचित्तानुरञ्जकम् ।

सुनिश्चितार्थं गम्भीरं वाक्यं तत्पारमेश्वरम् ॥ ५

। मन्त्रं सुखमुखोच्चार्यमशेषार्थप्रसिद्धये शिवायेति सर्वज्ञः सर्वदेहिनाम् ॥ ६ प्राहोन्नमः माहात्म्यका वर्णन श्रीकृष्ण बोले — सर्वज्ञ महर्षिप्रवर! आप सम्पूर्ण ज्ञानके महासागर हैं । अब मैं [ आपके मुखसे ] पंचाक्षर - मन्त्रके माहात्म्यका तत्त्वतः वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥१ ॥

उपमन्युने कहा — देवकीनन्दन! पंचाक्षर - मन्त्रके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन तो सौ करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता; अतः संक्षेपसे इसकी महिमा सुनो — वेदमें तथा शैवागममें दोनों जगह यह षडक्षर ( प्रणवसहित पंचाक्षर ) -मन्त्र समस्त शिवभक्तोंके सम्पूर्ण अर्थका साधक कहा गया है॥२-३ ॥ इस मन्त्रमें अक्षर तो थोड़े ही हैं, परंतु यह महान् अर्थसे सम्पन्न है । यह वेदका सारतत्त्व है । मोक्ष देनेवाला है, शिवकी आज्ञासे सिद्ध है, संदेहशून्य है तथा शिवस्वरूप वाक्य है । यह नाना प्रकारकी सिद्धियोंसे युक्त, दिव्य, लोगोंके मनको प्रसन्न एवं निर्मल करनेवाला, सुनिश्चित अर्थवाला ( अथवा निश्चय ही मनोरथको पूर्ण करनेवाला ) तथा परमेश्वरका गम्भीर वचन है॥४-५ ॥ इस मन्त्रका मुखसे सुखपूर्वक उच्चारण होता है । सर्वज्ञ शिवने सम्पूर्ण देहधारियोंके सारे मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इस ' ॐ नमः शिवाय ' मन्त्रका प्रतिपादन किया है ॥ ६ ॥

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९ २६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२

तद्बीजं सर्वविद्यानां मन्त्रमाद्यं षडक्षरम् ।

अतिसूक्ष्मं महार्थं च ज्ञेयं तद्वटबीजवत् ॥ ७

देवो गुणत्रयातीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्प्रभुः ।

ओमित्येकाक्षरे मन्त्रे स्थितः सर्वगतः शिवः ॥ ८

ईशानाद्यानि सूक्ष्माणि ब्रह्माण्येकाक्षराणि तु ।

मन्त्रे नमः शिवायेति संस्थितानि यथाक्रमम् ॥ ९

मन्त्रे षडक्षरे सूक्ष्मे पञ्चब्रह्मतनुः शिवः ।

वाच्यवाचकभावेन स्थितः साक्षात्स्वभावतः ॥ १०

वाच्यः शिवोऽप्रमेयत्वात् मन्त्रस्तद्वाचकः स्मृतः ।

वाच्यवाचकभावोऽयमनादिः संस्थितस्तयोः ॥ ११

यथानादिप्रवृत्तोऽयं घोरसंसारसागरः ।

शिवोऽपि हितथानादिः संसारान्मोचकः स्थितः ॥ १२

व्याधीनां भेषजं यद्वत्प्रतिपक्षः स्वभावतः ।

तद्वत्संसारदोषाणां प्रतिपक्षः शिवः स्मृतः ।

असत्यस्मिन् जगन्नाथे तमोभूतमिदं भवेत् ॥ १३

अचेतनत्वात्प्रकृतेरज्ञत्वात्पुरुषस्य च ।

प्रधानपरमाण्वादि यावत्किंचिदचेतनम् ॥ १४

न तत्कर्तृ स्वयं दृष्टं बुद्धिमत्कारणं विना ।

धर्माधर्मोपदेशश्च बन्धमोक्षौ विचारणात् ॥ १५

न सर्वज्ञं विना पुंसामादिसर्गः प्रसिद्ध्यति ।

वैद्यं विना निरानन्दाः क्लिश्यन्ते रोगिणो यथा ॥ १६

तस्मादनादिः सर्वज्ञः परिपूर्णः सदाशिवः ।

अस्ति नाथः परित्राता पुंसां संसारसागरात् ॥ १७

आदिमध्यान्तनिर्मुक्तः स्वभावविमलः प्रभुः । यह आदि षडक्षर - मन्त्र सम्पूर्ण विद्याओं ( मन्त्रों | का बीज ( मूल ) है । जैसे वटके बीजमें महान् ) -छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी वृक्ष । । मन्त्रको महान् अर्थसे परिपूर्ण समझना चाहिये । ' ॐ इस ' ' | इस एकाक्षर मन्त्रमें तीनों गुणोंसे अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता । द्युतिमान्, सर्वव्यापी प्रभु शिव प्रतिष्ठित हैं॥७-८, ईशान आदि जो सूक्ष्म एकाक्षररूप ब्रह्म हैं, वे ॥ । सब ' नमः शिवाय ' इस मन्त्रमें क्रमशः स्थित हैं । | सूक्ष्म षडक्षर मन्त्रमें पंचब्रह्मरूपधारी साक्षात् भगवान् शिव स्वभावतः वाच्यवाचक - भावसे विराजमान हैं । अप्रमेय होनेके कारण शिव वाच्य हैं और मन्त्र उनका वाचक माना गया है॥९ -१० ॥ शिव और मन्त्रका यह वाच्य - वाचकभाव अनादिकालसे चला आ रहा है । जैसे यह घोर संसारसागर अनादिकालसे प्रवृत्त है, उसी प्रकार संसारसे छुड़ानेवाले भगवान् शिव भी अनादिकालसे ही नित्य विराजमान हैं । जैसे औषध रोगोंका स्वभावतः शत्रु है, उसी प्रकार भगवान् शिव संसार - दोषोंके स्वाभाविक शत्रु माने गये हैं ॥ ११-१२१ / २ ॥ यदि ये भगवान् विश्वनाथ न होते तो यह जगत् | अन्धकारमय हो जाता; क्योंकि प्रकृति जड है और जीवात्मा अज्ञानी । [ अतः इन्हें प्रकाश देनेवाले परमात्मा ही हैं ] ॥ १३१/२ ॥ प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त जो कुछ भी जडरूप तत्त्व है, वह किसी बुद्धिमान् ( चेतन ) कारणके बिना स्वयं ' कर्ता ' नहीं देखा गया है । जीवोंके लिये धर्म करने और अधर्मसे बचनेका उपदेश दिया जाता है । उनके बन्धन और मोक्ष भी देखे जाते हैं । अत: विचार करनेसे सर्वज्ञ परमात्मा शिवके बिना प्राणियोंके आदिसर्गकी सिद्धि नहीं होती । जैसे रोगी वैद्यके बिना सुखसे रहित हो क्लेश उठाते हैं, [ उसी प्रकार सर्वज्ञ शिवका आश्रय न लेनेसे संसारी जीव नाना प्रकारके क्लेश भोगते हैं ] ॥ १४- १६ ॥ अतः यह सिद्ध हुआ कि जीवोंका संसारसागरसे उद्धार करनेवाले स्वामी अनादि सर्वज्ञ परिपूर्ण सदाशिव विद्यमान हैं । वे प्रभु आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं । स्वभावसे ही निर्मल हैं तथा सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण हैं ।