शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 941–950

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950

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१२ ] वायवीयसहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ २७ अ ० परिपूर्णश्च शिवो ज्ञेयः शिवागमे ॥ १८ उन्हें ' शिव ' नामसे जानना चाहिये । शिवागममें उनके सर्वज्ञः स स्मृतः । तस्याभिधानमन्त्रोऽयमभिधेयश्च अभिधानाभिधेयत्वात् मन्त्रः सिद्धः परः शिवः ॥

शिवज्ञानमेतावत्परमं पदम् ।

एतावत्तु शिवायेति शिववाक्यं षडक्षरम् ॥

यदोन्नमः

विधिवाक्यमिदं शैवं नार्थवादं शिवात्मकम् ।

सर्वज्ञः सुसंपूर्णः स्वभावविमलः शिवः ॥

यः

लोकानुग्रहकर्त्ता च स मृषार्थं कथं वदेत् ।

यद्यथावस्थितं वस्तु गुणदोषैः स्वभावतः ॥

यावत्फलं च तत्पूर्णं सर्वज्ञस्तु यथा वदेत् ।

रागाज्ञानादिभिर्दोषैर्ग्रस्तत्वादनृतं वदेत् ॥

ते चेश्वरे न विद्येते ब्रूयात्स कथमन्यथा ।

अज्ञाताशेषदोषेण सर्वज्ञेन शिवेन यत् ।

प्रणीतममलं वाक्यं तत्प्रमाणं न संशयः ॥

तस्मादीश्वरवाक्यानि श्रद्धेयानि विपश्चिता ।

यथार्थपुण्यपापेषु तदश्रद्धो व्रजत्यधः ॥

स्वर्गापवर्गसिद्ध्यर्थं भाषितं यत्सुशोभनम् वाक्यं मुनिवरैः शान्तैस्तद्विज्ञेयं सुभाषितम् ॥ रागद्वेषानृतक्रोधकामतृष्णानुसारि यत् वाक्यं निरयहेतुत्वात्तद्दुर्भाषितमुच्यते संस्कृतेनाऽपि किं तेन मृदुना ललितेन वा अविद्यारागवाक्येन संसारक्लेशहेतुना स्वरूपका विशदरूपसे वर्णन है । यह पंचाक्षर - मन्त्र उनका अभिधान ( वाचक ) है और वे शिव अभिधेय ( वाच्य ) हैं । अभिधान और अभिधेय ( वाचक और १ ९ वाच्य ) -रूप होनेके कारण परमशिव - स्वरूप यह मन्त्र । ' सिद्ध ' माना गया है॥१७–१९ ॥ ' ॐ नमः शिवाय ' यह जो षडक्षर शिववाक्य २० है, इतना ही शिवज्ञान है और इतना ही परमपद है । यह शिवका विधि - वाक्य है, अर्थवाद नहीं है । यह उन्हीं शिवका स्वरूप है, जो सर्वज्ञ, परिपूर्ण और २१ । स्वभावतः निर्मल हैं ॥ २०-२१ ॥ जो समस्त लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं, वे २२ भगवान् शिव झूठी बात कैसे कह सकते हैं? जो सर्वज्ञ हैं, वे तो मन्त्रसे जितना फल मिल सकता है, उतना पूरा - का - पूरा बतायेंगे । परंतु जो राग और अज्ञान आदि २३ दोषोंसे ग्रस्त हैं, वे झूठी ही बात कह सकते हैं । वे राग और अज्ञान आदि दोष ईश्वरमें नहीं हैं; अतः ईश्वर कैसे झूठ बोल सकते हैं? जिनका सम्पूर्ण दोषोंसे कभी परिचय ही नहीं हुआ, उन सर्वज्ञ शिवने जिस २४ निर्मल वाक्य - – पंचाक्षर मन्त्रका प्रणयन किया है, वह प्रमाणभूत ही है, इसमें संशय नहीं है । २२ - २४ ॥ इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह ईश्वरके वचनोंपर श्रद्धा करे । यथार्थ पुण्य - पापके विषयमें ईश्वरके २५ वचनोंपर श्रद्धा न करनेवाला पुरुष नरकमें जाता है ॥ २५ ॥

शान्त स्वभाववाले श्रेष्ठ मुनियोंने स्वर्ग और । मोक्षकी सिद्धिके लिये जो सुन्दर बात कही है, उसे २६ सुभाषित समझना चाहिये ॥ २६ ॥

जो वाक्य राग, द्वेष, असत्य, काम, क्रोध और । करनेवाला हो, वह नरकका हेतु ॥ २७ तृष्णाका होनेके कारण अनुसरण दुर्भाषित कहलाता है ॥२७ ॥

अविद्या एवं रागसे युक्त वाक्य जन्म - मरणरूप । प्राप्तिमें कारण होता है । अत: वह ॥ २८ संसार - क्लेशकी कोमल, ललित अथवा संस्कृत ( संस्कारयुक्त ) हो तो भी उससे क्या लाभ? जिसे सुनकर कल्याणकी प्राप्ति हो तथा राग आदि दोषोंका नाश हो जाय, वह वाक्य । सुन्दर शब्दावलीसे युक्त न हो तो भी शोभन तथा यच्छ्रुत्वा जायते श्रेयो रागादीनां च संक्षयः है॥२८-२९ ॥ तद्वाक्यं विज्ञेयमिति शोभनम् ॥ २ ९ समझनेयोग्य विरूपमपि

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९ २८ बहुत्वेऽपि हि मन्त्राणां सर्वज्ञेन शिवेन यः प्रणीतो विमलो मन्त्रो न तेन सदृशः क्वचित् साङ्गानि वेदशास्त्राणि संस्थितानि षडक्षरे न तेन सदृशस्तस्मान्मन्त्रोऽप्यस्त्यपरः क्वचित् सप्तकोटिमहामन्त्रैरुपमन्त्रैरनेकधा मन्त्रः षडक्षरो भिन्नः सूत्रं वृत्त्यात्मना यथा

शिवज्ञानानि यावन्ति विद्यास्थानानि यानि च ।

षडक्षरस्य सूत्रस्य तानि भाष्यं समासतः ॥

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैर्वा बहुविस्तरैः ।

यस्योन्नमः शिवायेति मन्त्रोऽयं हृदि संस्थितः ॥

तेनाधीतं श्रुतं तेन कृतं सर्वमनुष्ठितम् ।

येनोन्नमः शिवायेति मन्त्राभ्यासः स्थिरीकृतः ॥

नमस्कारादिसंयुक्तं शिवायेत्यक्षरत्रयम् ।

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य सफलं तस्य जीवितम् ॥

अंत्यजो वाधमो वापि मूर्खो वा पंडितोऽपि वा ।

पञ्चाक्षरजपे निष्ठो मुच्यते पापपञ्जरात् ॥

इत्युक्तं परमेशेन देव्या पृष्टेन शूलिना ।

हिताय सर्वमर्त्यानां द्विजानां तु विशेषतः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । मन्त्रोंकी संख्या बहुत होनेपर भी जिस विमल षडक्षर मन्त्रका निर्माण सर्वज्ञ शिवने किया है उसके ॥ ३० । समान कहीं कोई दूसरा मन्त्र नहीं है ॥३०, ॥ । षडक्षर - मन्त्रमें छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण और शास्त्र विद्यमान हैं; अतः उसके समान वेद ॥ ३१ । कोई मन्त्र कहीं नहीं है । सात करोड़ महामन्त्रों दूसरा और 1 अनेकानेक उपमन्त्रोंसे यह षडक्षर - मन्त्र उसी प्रकार भिन्न ॥ ३२ है, जैसे वृत्तिसे सूत्र ॥ ३१-३२ ॥ जितने शिवज्ञान हैं और जो - जो विद्यास्थान हैं वे ३३ सब षडक्षर - मन्त्ररूपी सूत्रके संक्षिप्त भाष्य हैं ॥ ३३, ॥ जिसके हृदयमें ' ॐ नमः शिवाय ' यह षडक्षर-३४ मन्त्र प्रतिष्ठित है, उसे दूसरे बहुसंख्यक मन्त्रों और अनेक विस्तृत शास्त्रोंसे क्या प्रयोजन है? जिसने ' ॐ नमः शिवाय ' इस मन्त्रका जप दृढ़तापूर्वक अपना ३५ लिया है, उसने सम्पूर्ण शास्त्र पढ़ लिया और समस्त शुभ कृत्योंका अनुष्ठान पूरा कर लिया । आदिमें ' नमः ' पदसे युक्त ' शिवाय ' - ये तीन अक्षर जिसकी ३६ जिह्वाके अग्रभागमें विद्यमान हैं, उसका जीवन सफल हो गया । पंचाक्षर - मन्त्र जपमें लगा हुआ पुरुष यदि ३७ पण्डित, मूर्ख, अन्त्यज अथवा अधम भी हो तो वह पापपंजरसे मुक्त हो जाता है॥३४–३७ ॥ देवी [ पार्वती ] -के द्वारा पूछे जानेपर शूलधारी परमेश [ शिव ] -ने सभी मनुष्यों और विशेष रूपसे ३८ । द्विजोंके हितके लिये इसे कहा था ॥३८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे पंचाक्षरमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें पंचाक्षरमाहात्म्यवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः पंचाक्षर - मन्त्रकी महिमा, उसमें समस्त वाङ्मयकी स्थिति, उसकी उपदेशपरम्परा, देवीरूपा पंचाक्षरीविद्याका ध्यान, उसके समस्त और व्यस्त अक्षरोंके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति तथा अंगन्यास आदिका विचार देव्युवाच देवी बोलीं – महेश्वर! दुर्जय, दुर्लङ्घ्य एवं कलौ कलुषिते काले दुर्जये दुरतिक्रमे । कलुषित कलिकालमें जब सारा संसार धर्मसे विमुख अपुण्यतमसाच्छन्ने लोके धर्मपराङ्मुखे ॥ १ हो पापमय अन्धकारसे आच्छादित हो जायगा, वर्ण क्षीणे वर्णाश्रमाचारे सङ्कटे समुपस्थिते । | और आश्रम - सम्बन्धी आचार नष्ट हो जायँगे, धर्मसंकट सर्वाधिकारे संदिग्धे निश्चिते वापि पर्यये ॥ २ | उपस्थित हो जायगा, सबका अधिकार संदिग्ध, अनिश्चित

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१३ ] ) ९ २ ९ अ ० विहते गुरुशिष्यक्रमे गते । और विपरीत हो जायगा, उस समय उपदेशकी तदोपदेशे मुच्यन्ते भक्तास्तव महेश्वर ॥ ३ प्रणाली नष्ट हो जायगी और गुरु - शिष्यकी परम्परा केनोपायेन भी जाती रहेगी, ऐसी परिस्थितिमें आपके भक्त किस ईश्वर उवाच उपायसे मुक्त हो सकते हैं? ॥१–३ ॥ परमां विद्यां हृद्यां पञ्चाक्षरीं मम । महादेवजीने कहा - देवि! कलिकालके मनुष्य आश्रित्य भावितात्मानो मुच्यन्ते कलिजा नराः ॥ ४ मेरी परम मनोरम पंचाक्षरी विद्याका आश्रय ले भक्तिसे भक्त्या च भावितचित्त होकर संसार - बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ४ ॥

मनोवाक्कायजैर्दोषैर्वक्तुं स्मर्तुमगोचरैः । जो अकथनीय और अचिन्तनीय हैं— उन मानसिक, कृतघ्नानां निन्दकानां छलात्मनाम् ॥५ वाचिक और शारीरिक दोषोंसे जो दूषित, कृतघ्न, दूषितानां वक्रमनसामपि मत्प्रवणात्मनाम् । लुब्धानां पञ्चाक्षरी विद्या संसारभयतारिणी ॥ प्रतिज्ञातं धरातले । मयैवमसकृद्देवि पतितोऽपि विमुच्येत मद्भक्तो विद्ययाऽनया ॥ देव्युवाच कर्मायोग्यो भवेन्मर्त्यः पतितो यदि सर्वथा ।

कर्मायोग्येन यत्कर्म कृतं च नरकाय हि ।

ततः कथं विमुच्येत पतितो विद्ययाऽनया ॥

ईश्वर उवाच

तथ्यमेतत्त्वया प्रोक्तं तथा हि शृणु सुन्दरि ।

रहस्यमिति मत्वैतद्गोपितं यन्मया पुरा ॥

समन्त्रकं मां पतितः पूजयेद्यदि मोहितः ।

नारकी स्यान्न सन्देहो मम पञ्चाक्षरं विना ॥

वायुभक्षाश्च ये चान्ये व्रतकर्शिताः । अब्भक्षा निर्दय, छली, लोभी और कुटिलचित्त हैं, वे मनुष्य भी यदि मुझमें मन लगाकर मेरी पंचाक्षरी विद्याका जप ६ करेंगे, उनके लिये वह विद्या ही संसारभयसे तारनेवाली होगी । देवि! मैंने बारंबार प्रतिज्ञापूर्वक यह बात कही है कि भूतलपर मेरा पतित हुआ भक्त भी इस पंचाक्षरी ७ विद्याके द्वारा बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ५–७ ॥ देवी बोलीं- यदि मनुष्य पतित होकर सर्वथा कर्म करनेके योग्य न रह जाय तो उसके द्वारा किया गया कर्म नरककी ही प्राप्ति करानेवाला होता है । ऐसी दशामें पतित ८ मानव इस विद्याद्वारा कैसे मुक्त हो सकता है? ॥ ८ ॥

महादेवजीने कहा – सुन्दरि! तुमने यह बहुत ठीक बात पूछी है । अब इसका उत्तर सुनो, पहले मैंने ९ इस विषयको गोपनीय समझकर अबतक प्रकट नहीं किया था॥९॥

यदि पतित मनुष्य मोहवश ( अन्य ) मन्त्रोंके १० उच्चारणपूर्वक मेरा पूजन करे तो वह नि: संदेह नरकगामी हो सकता है । किंतु पंचाक्षर मन्त्रके लिये ऐसा प्रतिबन्ध नहीं है । जो केवल जल पीकर और हवा खाकर तप करते हैं तथा दूसरे लोग जो नाना प्रकारके व्रतोंद्वारा तेषामेतैर्व्रतैर्नास्ति मम लोकसमागमः ॥११ अपने शरीरको सुखाते हैं, उन्हें इन व्रतोंद्वारा मेरे लोककी पञ्चाक्षरेणैव यो हि मां सकृदर्चयेत् । भक्त्या सोऽपि गच्छेन्मम स्थानं मन्त्रस्यास्यैव गौरवात् यज्ञाश्च व्रतानि नियमास्तथा तस्मात्तपांसि कोट्यंशेनापि नो समाः पञ्चाक्षरार्चनस्यैते यः बद्धो वाप्यथ मुक्तो वा पाशात्पञ्चाक्षरेण पूजयेन्मां स मुच्येत नात्र कार्या विचारणा प्राप्ति नहीं होती । परंतु जो भक्तिपूर्वक पंचाक्षर मन्त्रसे ही एक बार मेरा पूजन कर लेता है, वह भी इस मन्त्रके ॥ १२ ही प्रतापसे मेरे धाममें पहुँच जाता है ॥ १०–१२ ॥ । इसलिये तप, यज्ञ, व्रत और नियम पंचाक्षरद्वारा करोड़वीं कलाके समान भी नहीं हैं । कोई ॥ १३ मेरे पूजनकी बद्ध हो या मुक्त, जो पंचाक्षर मन्त्रके द्वारा मेरा पूजन । करता है, वह अवश्य ही संसारपाशसे छुटकारा पा ॥ १४ जाता है॥१३-१४ ॥ Part_Section_31_1_Front 2224 Shivmahapuran_IInd

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९ ३० अरुद्रो वा सरुद्रो वा सकृत्पञ्चाक्षरेण यः पूजयेत्पतितो वापि मूढो वा मुच्यते नरः षडक्षरेण वा देवि तथा पञ्चाक्षरेण वा स ब्रह्माङ्गेन मां भक्त्या पूजयेद्यदि मुच्यते पतितोऽपतितो वापि मन्त्रेणानेन पूजयेत् । मम भक्तो जितक्रोधो सलब्धोऽलब्ध एव वा

अलब्धाल्लब्ध एवेह कोटिकोटिगुणाधिकः ।

तस्मात् लब्ध्वैव मां देवि मन्त्रेणानेन पूजयेत् ॥

लब्ध्वा सम्पूजयेद्यस्तु मैत्र्यादिगुणसंयुतः ।

ब्रह्मचर्यरतो भक्त्या मत्सादृश्यमवाप्नुयात् ॥

किमत्र बहुनोक्तेन भक्ताः सर्वेऽधिकारिणः ।

मम पञ्चाक्षरे मन्त्रे तस्मात् श्रेष्ठतरो हि सः ॥

पञ्चाक्षरप्रभावेण लोकवेदमहर्षयः ।

तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवाः सर्वमिदं जगत् ॥

प्रलये समनुप्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

सर्वं प्रकृतिमापन्नं तत्र संलयमेष्यति ॥

एकोऽहं संस्थितो देवि न द्वितीयोऽस्ति कुत्रचित् ।

तदा वेदाश्च शास्त्राणि सर्वे पञ्चाक्षरे स्थिताः ॥

ते नाशं नैव सम्प्राप्ता मच्छक्त्या ह्यनुपालिताः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १३ रुद्रभक्तिसे रहित अथवा रुद्रभक्तिसे । मूर्ख मनुष्य भी पंचाक्षरसे एक बार युक्त जो जो ॥ १५ | पतित पूजन अथवा कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है ॥१५ । देवि! [ ईशान आदि पाँच ] ब्रह्म जिसके ॥ अंग ॥ १६ हैं, उस षडक्षर या पंचाक्षर - मन्त्रके द्वारा जो भक्तिभावग । मेरा पूजन करता है, वह मुक्त हो जाता है ॥१६ कोई पतित हो या अपतित, वह इस पंचाक्षर- ॥

। मन्त्रके द्वारा मेरा पूजन करे । मेरा भक्त पंचाक्षर-॥ १७

मन्त्रका उपदेश गुरुसे ले चुका हो या नहीं, वह । क्रोधको जीतकर इस मन्त्रके द्वारा मेरी पूजा किया । करे । जिसने मन्त्रकी दीक्षा नहीं ली है, उसकी अपेक्षा | दीक्षा लेनेवाला पुरुष कोटि - कोटि गुणा अधिक माना १८ गया है । अत: देवि! दीक्षा लेकर ही इस मन्त्रसे मेरा पूजन करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥ जो इस मन्त्रकी दीक्षा लेकर मैत्री, मुदिता १ ९ [ करुणा, उपेक्षा ] आदि गुणोंसे युक्त तथा ब्रह्मचर्यपरायण हो भक्तिभावसे मेरा पूजन करता है, वह मेरी समता प्राप्त कर लेता है । इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या २० लाभ? मेरे पंचाक्षर मन्त्रमें सभी भक्तोंका अधिकार है । इसलिये वह श्रेष्ठतर मन्त्र है । पंचाक्षरके प्रभावसे २१ ही लोक, वेद, महर्षि, सनातनधर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् टिके हुए हैं ॥१ ९ –२१ ॥ देवि! प्रलयकाल आनेपर जब चराचर जगत् २२ नष्ट हो जाता है और सारा प्रपंच प्रकृतिमें मिलकर वहीं लीन हो जाता है, तब मैं अकेला ही स्थित रहता हूँ, दूसरा कोई कहीं नहीं रहता । उस समय समस्त २३ देवता और शास्त्र पंचाक्षर - मन्त्रमें स्थित होते हैं । अत: मेरी शक्तिसे पालित होनेके कारण वे नष्ट नहीं होते ततः सृष्टिरभून्मत्तः प्रकृत्यात्मप्रभेदतः ॥२४ हैं । तदनन्तर मुझसे प्रकृति और पुरुषके भेदसे युक्त सृष्टि होती है॥२२–२४ ॥ गुणमूर्त्यात्मनां चैव ततोऽवान्तरसंहृतिः । तत्पश्चात् त्रिगुणात्मक मूर्तियोंका संहार करनेवाला तदा नारायणः शेते देवो मायामयीं तनुम् ॥ २५ अवान्तर प्रलय होता है । उस प्रलयकालमें भगवान् आस्थाय भोगिपर्यङ्कशयने तोयमध्यगः । नारायणदेव मायामय शरीरका आश्रय ले जलके भीतर तन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः ॥ २६ शेषशय्यापर शयन करते हैं । उनके नाभिकमलसे । पंचमुख ब्रह्माजीका जन्म होता है ॥ २५-२६ ॥ सिसृक्षमाणो लोकांस्त्रीन्न सक्तो ह्यसहायवान् ब्रह्माजी तीनों लोकोंकी सृष्टि करना चाहते थे; मुनीन्दश ससर्जादौ मानसानमितौजसः । किन्तु कोई सहायक न होनेसे उसे कर नहीं पाते थे । ॥ २७ । तब उन्होंने पहले अमित तेजस्वी दस महर्षियोंकी 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_31_1_Back

पृष्ठ 945

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अ ० १३ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) ९ ३१ मां प्रोवाच पितामहः । तेषां सिद्धिविवृद्ध्यर्थं सृष्टि की, जो उनके मानसपुत्र कहे गये हैं । उन महादेव शक्तिं देहि महेश्वर ॥ २८ पुत्रोंकी सिद्धि बढ़ानेके लिये पितामह ब्रह्माने मुझसे मत्पुत्राणां कहा — महादेव! महेश्वर! मेरे पुत्रोंको शक्ति प्रदान कीजिये ॥ २७-२८ ॥ इत्येवं प्रार्थितस्तेन पञ्चवक्त्रधरो ह्यहम् । उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर पाँच मुख पञ्चाक्षराणि क्रमशः प्रोक्तवान् पद्मयोनये ॥ २ ९ धारण करनेवाले मैंने ब्रह्माजीके प्रति प्रत्येक मुखसे एक - एक अक्षरके क्रमसे पाँच अक्षरोंका उपदेश किया ॥ २ ९ ॥ स पञ्चवदनैस्तानि गृहँल्लोकपितामहः । लोकपितामह ब्रह्माजीने भी अपने पाँच वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान्मां महेश्वरम् ॥ ३० मुखोद्वारा क्रमशः उन पाँचों अक्षरोंको ग्रहण किया और वाच्यवाचकभावसे मुझ महेश्वरको जाना । ज्ञात्वा प्रयोगं विधिवत् सिद्धमन्त्रः प्रजापतिः । मन्त्रके प्रयोगको जानकर प्रजापतिने विधिवत् उसे पुत्रेभ्यः प्रददौ मन्त्रं मन्त्रार्थं च यथातथम् ॥३१ सिद्ध किया । तत्पश्चात् उन्होंने अपने पुत्रोंको यथावत्

ते च लब्ध्वा मन्त्ररत्नं साक्षात् लोकपितामहात् ।

तदाज्ञप्तेन मार्गेण मदाराधनकांक्षिणः ॥

मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुञ्जवान्नाम पर्वतः ।

मत्प्रियः सततं श्रीमान्मद्भक्तै रक्षितः सदा ॥

तस्याभ्याशे तपस्तीव्रं लोकं स्रष्टुं समुत्सुकाः ।

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु वायुभक्षाः समाचरन् ॥

तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम् ।

ऋषिं छंदश्च कीलं च बीजशक्तिं च दैवतम् ॥

न्यासं षडङ्गं दिग्बन्धं विनियोगमशेषतः ।

प्रोक्तवानहमार्याणां जगत्सृष्टिविवृद्धये ॥

ततस्ते मन्त्रमाहात्म्याद् ऋषयस्तपसैधिताः ।

सृष्टिं वितन्वते सम्यक् सदेवासुरमानुषीम् ॥

अस्याः परमविद्यायाः स्वरूपमधुनोच्यते आदौ नमः प्रयोक्तव्यं शिवाय तु ततः परम् सैषा पञ्चाक्षरी विद्या सर्वश्रुतिशिरोगता रूपसे उस मन्त्रका और उसके अर्थका भी उपदेश दिया ॥ ३०-३१ ॥ साक्षात् लोकपितामह ब्रह्मासे उस मन्त्ररत्नको ३२ पाकर मेरी आराधनाकी इच्छा रखनेवाले उन मुनियोंने उनकी बतायी हुई पद्धतिसे उस मन्त्रका जप करते हुए मेरुके रमणीय शिखरपर मुंजवान् पर्वतके निकट एक ३३ सहस्र दिव्य वर्षोंतक तीव्र तपस्या की । वे लोकसृष्टिके लिये अत्यन्त उत्सुक थे । इसलिये वायु पीकर कठोर तपस्यामें लग गये । जहाँ उनकी तपस्या चल रही थी, ३४ वह श्रीमान् मुंजवान् पर्वत सदा ही मुझे प्रिय है और मेरे भक्तोंने निरन्तर उसकी रक्षा की है ॥ ३२-३४ ॥ उन ऋषियोंकी भक्ति देखकर मैंने तत्काल उन्हें ३५ प्रत्यक्ष दर्शन दिया और उन आर्य ऋषियोंको पंचाक्षर-मन्त्रके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, कीलक, षडंगन्यास, दिग्बन्ध और विनियोग- इन सब बातोंका ३६ पूर्णरूपसे ज्ञान कराया । संसारकी सृष्टि बढ़े- इसके लिये मैंने उन्हें मन्त्रकी सारी विधियाँ बतायीं । तब वे उस मन्त्रके माहात्म्यसे तपस्यामें बहुत बढ़ गये और ३७ देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंकी सृष्टिका भलीभाँति विस्तार करने लगे ॥ ३५–३७ ॥ अब इस उत्तम विद्या पंचाक्षरीके स्वरूपका वर्णन । किया जाता है । आदिमें ' नमः ' पदका प्रयोग करना ॥ ३८ चाहिये । उसके बाद ' शिवाय ' पदका । यही वह पंचाक्षरी विद्या है, जो समस्त श्रुतियोंकी सिरमौर है । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_31_2_Front

पृष्ठ 946

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९ ३२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ सर्वजातस्य सर्वस्य बीजभूता सनातनी ॥ ३ ९ तथा सम्पूर्ण शब्दसमुदायकी सनातन बीजरूपिणी । यह विद्या पहले - पहल मेरे मुखसे निकली; इसलिये है । प्रथमं मन्मुखोद्गीर्णा सा ममैवास्ति वाचिका । | ही स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली है । [ इसका मेरे । देवीके रूपमें ध्यान करना चाहिये ] ॥ ३८-३९ १ एक तप्तचामीकरप्रख्या पीनोन्नतपयोधरा ॥ ४० इस देवीकी अंग - कान्ति तपाये हुए / २ ॥ सुवर्णके । समान है । इसके पीन पयोधर ऊपरको उठे हुए हैं । यह चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे सुशोभित है । इसके । चतुर्भुजा त्रिनयना बालेन्दुकृतशेखरा । | मस्तकपर बालचन्द्रमाका मुकुट है । दो हाथोंमें पद्म पद्मोत्पलकरा सौम्या वरदाभयपाणिका ॥ ४१ / और उत्पल हैं । अन्य दो हाथोंमें वरद और अभयकी मुद्रा है । मुखाकृति सौम्य है ॥ ४०-४१ ॥ सर्वलक्षणसंपन्ना सर्वाभरणभूषिता । यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण सितपद्मासनासीना नीलकुञ्चितमूर्द्धजा ॥ ४२ आभूषणोंसे विभूषित है । श्वेत कमलके आसन पर विराजमान है । इसके काले - काले घुँघराले केश बड़ी अस्याः पञ्चविद्या वर्णाः प्रस्फुरद् रश्मिमंडलाः । शोभा पा रहे हैं । इसके अंगोंमें पाँच प्रकारके वर्ण हैं, पीतः कृष्णस्तथा धूम्रः स्वर्णाभो रक्त एव च ॥ ४३ जिनकी रश्मियाँ प्रकाशित हो रही हैं । वे वर्ण हैं—

पृथक् प्रयोज्या यद्येते बिंदुनादविभूषिताः ।

अर्द्धचन्द्रनिभो बिंदुर्नादो दीपशिखाकृतिः ॥ ४४

बीजं द्वितीयं बीजेषु मन्त्रस्यास्य वरानने ।

दीर्घपूर्वं तुरीयस्य पञ्चमं शक्तिमादिशेत् ॥ ४५

वामदेवो नाम ऋषिः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् ।

देवता शिव एवाहं मन्त्रस्यास्य वरानने ॥ ४६

गौतमोऽत्रिर्वरारोहे विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः ।

भरद्वाजश्च वर्णानां क्रमशश्चर्षयः स्मृताः ॥ ४७

गायत्र्यनुष्टुप् त्रिष्टुप् च छंदांसि बृहती विराट् ।

इन्द्रो रुद्रो हरिर्ब्रह्मा स्कंदस्तेषां च देवताः ॥ ४८

मम पञ्चमुखान्याहुः स्थानं तेषां वरानने । ।

पूर्वादेश्चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम् ॥ ४ ९

पीत, कृष्ण, धूम्र, स्वर्णिम तथा रक्त । इन वर्णोंका यदि पृथक् - पृथक् प्रयोग हो तो इन्हें विन्दु और नादसे विभूषित करना चाहिये । विन्दुकी आकृति अर्द्धचन्द्रके समान है और नादकी आकृति दीपशिखाके समान ॥ ४२–४४ ॥ सुमुखि! यों तो इस मन्त्रके सभी अक्षर बीजरूप हैं, तथापि उनमें दूसरे अक्षरको इस मन्त्रका बीज समझना चाहिये । दीर्घ - स्वरपूर्वक जो चौथा वर्ण है, उसे कीलक और पाँचवें वर्णको शक्ति समझना चाहिये । इस मन्त्रके वामदेव ऋषि हैं और पंक्ति छन्द है । वरानने! मैं शिव ही इस मन्त्रका देवता हूँ * ॥ ४५-४६ ॥ वरारोहे! गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, अंगिरा और भरद्वाज - ये नकारादि वर्णोंके क्रमशः ऋषि माने गये हैं । गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, बृहती और विराट्— ये क्रमशः पाँचों अक्षरोंके छन्द हैं । इन्द्र, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा और स्कन्द - ये क्रमशः उन अक्षरोंके देवता हैं । वरानने! मेरे पूर्व आदि चारों दिशाओंके तथा ऊपरके— पाँचों मुख इन नकारादि अक्षरोंके क्रमशः स्थान हैं ॥ ४७–४९ ॥ * ‘ ॐ अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरीमन्त्रस्य वामदेव ऋषिः, पंक्तिश्छन्दः, शिवो देवता, मं बीजम् महार्णव सदाशिवकृपाप्रसादोपलब्धिपूर्वकमखिलपुरुषार्थसिद्धये आदिमें जपे विनियोगः । ' शिवपुराणके इस वर्णनके, यं शक्तिः, वां कीलकं जो विनियोग दिया गया है, उसमें ' ॐ ' बीजम्, ' नमः ' शक्तिः, ' शिवाय अनुसार यही विनियोगवाक्य है । मन्त्र-' इति कीलकम् इतना अन्तर है । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_31_2_Back

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अ ० १३ ] वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड

उदात्तः प्रथमो वर्णश्चतुर्थश्च द्वितीयकः ।

पञ्चमः स्वरितश्चैव तृतीयो निहितः स्मृतः ॥ ५०

मूलविद्या शिवं शैवं सूत्रं पञ्चाक्षरं तथा ।

नामान्यस्य विजानीयाच्छैवं मे हृदयं महत् ॥ ५१

नकारः शिर उच्येत मकारस्तु शिखोच्यते ।

शिकारः कवचं तद्वद्वकारो नेत्रमुच्यते ॥ ५२

यकारोऽस्त्रं नमः स्वाहा वषट् हुं वौषडित्यपि ।

फडित्यपि च वर्णानामन्तेऽङ्गत्वंयदा तदा ॥ ५३

तत्रापि मूलमन्त्रोऽयं किञ्चिद्भेदसमन्वयात् ।

तत्रापि पञ्चमो वर्णो द्वादशस्वरभूषितः ॥ ५४

तस्मादनेन मन्त्रेण मनोवाक्कायभेदतः ।

आवयोरर्चनं कुर्य्याज्जपहोमादिकं तथा ॥ ५५

यथाप्रज्ञं यथाकालं यथाशास्त्रं यथामति ।

यथाशक्ति यथासंपद्यथायोगं यथारति ॥ ५६

यदा कदापि वा भक्त्या यत्र कुत्रापि वा कृता ।

येन केनापि वा देवि पूजा मुक्तिं नयिष्यति ॥ ५७

मय्यासक्तेन मनसा यत्कृतं मम सुन्दरि ।

मत्प्रियं च शिवं चैव क्रमेणाप्यक्रमेण वा ॥ ५८

तथापि मम भक्ता ये नात्यन्तविवशाः पुनः । * अंगन्यासवाक्यका प्रयोग यों समझना चाहिये - ॐ ॐ कवचाय हुम्, ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ यं अस्त्राय फट् इति ) ९ ३३ पंचाक्षर - मन्त्रका पहला अक्षर उदात्त है । दूसरा और चौथा भी उदात्त ही है । पाँचवाँ स्वरित है और तीसरा अक्षर अनुदात्त माना गया है । इस पंचाक्षर-मन्त्रके - मूल विद्या शिव, शैव, सूत्र तथा पंचाक्षर नाम जाने । शैव ( शिवसम्बन्धी ) बीज प्रणव मेरा विशाल हृदय है॥५०-५१ ॥ नकार सिर कहा गया है, मकार शिखा है, ' शि ' कवच है, ' वा ' नेत्र है और यकार अस्त्र है । इन वर्णोंके अन्तमें अंगोंके चतुर्थ्यन्तरूपके साथ क्रमशः नम:, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् और फट् जोड़नेसे अंगन्यास होता है * ॥५२-५३ ॥ देवि! थोड़ेसे भेदके साथ यह तुम्हारा भी मूलमन्त्र है । उस पंचाक्षर - मन्त्रमें जो पाँचवाँ वर्ण ‘ य ’ है, उसे बारहवें स्वरसे विभूषित किया जाता है, अर्थात् ' नमः शिवाय ' के स्थानमें ' नमः शिवायै ' कहनेसे यह देवीका मूलमन्त्र हो जाता है । अत: | साधकको चाहिये कि वह इस मन्त्रसे मन, वाणी और शरीरके भेदसे हम दोनोंका पूजन, जप और होम आदि करे । ( मन आदिके भेदसे यह पूजन तीन प्रकारका होता है— मानसिक, वाचिक और

शारीरिक । ) ॥ ५४-५५ ॥

देवि! जिसकी जैसी समझ हो, जिसे जितना समय मिल सके, जिसकी जैसी बुद्धि, शक्ति, सम्पत्ति, उत्साह एवं योग्यता और प्रीति हो, उसके अनुसार वह शास्त्रविधिसे जब कभी, जहाँ कहीं अथवा जिस किसी भी साधनद्वारा मेरी पूजा कर सकता है । उसकी की हुई वह पूजा उसे अवश्य मोक्षकी प्राप्ति करा देगी ॥ ५६-५७ ॥ सुन्दरि! मुझमें मन लगाकर जो कुछ क्रम या व्युत्क्रमसे किया गया हो, वह कल्याणकारी तथा मुझे प्रिय होता है । तथापि जो मेरे भक्त हैं और कर्म हृदयाय नमः, ॐ नं शिरसे स्वाहा, ॐ मं शिखायै वषट्, ॐ शिं हृदयादिषडङ्गन्यासः । इसी तरह करन्यासका प्रयोग है — यथा— ॐ ॐ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः, ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः, ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः, ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः, ॐ वां - कनिष्ठिकाभ्यां ॐ वामदेवर्षये नमः नमः, ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । विनियोगमें जो ऋषि आदि आये हैं, उनका न्यास इस प्रकार समझना चाहिये शिरसि, पंक्तिच्छन्दसे मुखे शिवदेवतायै नमः हृदये, मं बीजाय नमः गुह्ये, यं शक्तये नमः पादयोः, वां कीलकाय नमः नाभौ, विनियोगाय नमः, नमः सर्वाङ्गे ।

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९ ३४ तेषां सर्वेषु शास्त्रेषु तत्रादौ संप्रवक्ष्यामि मयैव नियमः कृतः मन्त्रसंग्रहणं शुभम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ॥ ५ ९ करनेमें अत्यन्त विवश ( असमर्थ ) नहीं हो गये | उनके लिये सब शास्त्रोंमें मैंने ही नियम बनाया है हैं, । नियमका उन्हें पालन करना चाहिये । अब मैं, उस पहले | मन्त्रकी दीक्षा लेनेका शुभ विधान बता रहा हूँ जिसके , | बिना मन्त्र जप निष्फल होता है और जिसके होनेसे यं विना निष्फलं जाप्यं येन वा सफलं भवेत् ॥ ६० | जप - कर्म अवश्य सफल होता है ॥ ५८- ६० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायामुत्तरखण्डे पंचाक्षरमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें पंचाक्षर-माहात्म्यवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा, मन्त्रगणनाके लिये विभिन्न प्रकारकी वर्णन, जपके लिये उपयोगी स्थान महत्त्व, आस्तिकताकी प्रशंसा ईश्वर उवाच

आज्ञाहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं वरानने ।

आज्ञार्थं दक्षिणाहीनं सदा जप्तं च निष्फलम् ॥

आज्ञासिद्धं क्रियासिद्धं श्रद्धासिद्धं ममात्मकम् ।

एवं चेद्दक्षिणायुक्तं मन्त्रसिद्धिर्महत्फलम् ॥

उपगम्य गुरुं विप्रमाचार्यं तत्त्ववेदिनम् ।

जापिनं सद्गुणोपेतं ध्यानयोगपरायणम् ॥

तोषयेत्तं प्रयत्नेन भावशुद्धिसमन्वितः ।

वाचा च मनसा चैव कायेन द्रविणेन च ॥

आचार्यं पूजयेद्विप्रः सर्वदातिप्रयत्नतः ।

हस्त्यश्वरथरत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥

भूषणानि च वासांसि धान्यानि च धनानि च ।

एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या च विभवे सति ॥

वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः

पश्चान्निवेद्य स्वात्मानं गुरवे सपरिच्छदम् ॥

मालाओंका महत्त्व तथा अंगुलियोंके उपयोगका तथा दिशा, जपमें वर्जनीय बातें, सदाचारका तथा पंचाक्षर मन्त्रकी विशेषताका वर्णन ईश्वर ( महादेवजी ) कहते हैं— वरानने! आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन तथा विधिके १ पालनार्थ आवश्यक दक्षिणासे हीन जो जप किया जाता है, वह सदा निष्फल होता है ॥ १ ॥

मेरा स्वरूपभूत मन्त्र यदि आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध २ और श्रद्धासिद्ध होनेके साथ ही दक्षिणासे भी युक्त हो तो उसकी सिद्धि होती है और उससे महान् फल प्राप्त होता है ॥२ ॥

शिष्यको चाहिये कि वह पहले तत्त्ववेत्ता ३ आचार्य, जपशील, सद्गुणसम्पन्न, ध्यान - योगपरायण एवं ब्राह्मण गुरुकी सेवामें उपस्थित हो, मनमें शुद्धभाव रखते हुए प्रयत्नपूर्वक उन्हें संतुष्ट करे ॥ ३१/२ ॥ ४ ब्राह्मण साधक अपने मन, वाणी, शरीर और धनसे आचार्यका पूजन करे । वह वैभव हो तो गुरुको ५ भक्तिभावसे हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, वस्त्राभूषण, धान्य, धन और गृह आदि अर्पित करे । जो अपने ६ लिये सिद्धि चाहता हो, वह धनके दानमें कृपणता न करे । तदनन्तर सब सामग्रियोंसहित अपने - आपको ७ । गुरुकी सेवामें अर्पित कर दे॥४–७ ॥

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अ ० १४ ] वायवीयसंहिता

एवं संपूज्य विधिवद्यथाशक्ति त्ववञ्चयन् ।

आददीत गुरोर्मन्त्रं ज्ञानं चैव क्रमेण तु ॥ ८

एवं तुष्टो गुरुः शिष्यं पूजकं वत्सरोषितम् ।

शुश्रूषुमनहङ्कारं स्नातं शुचिमुपोषितम् ॥ ९

स्नापयित्वा विशुद्धयर्थं पूर्णकुंभघृतेन वै ।

जलेन मन्त्रशुद्धेन पुण्यद्रव्ययुतेन च ॥ १०

अलंकृत्य सुवेषं च गन्धस्त्रग्वस्त्रभूषणैः ।

पुण्याहं वाचयित्वा च ब्राह्मणानभिपूज्य च ॥११

समुद्रतीरे नद्यां च गोष्ठे देवालयेऽपि वा ।

शुचौ देशे गृहे वापि काले सिद्धिकरे तिथौ ॥ १२

नक्षत्रे शुभयोगे च सर्वदोषविवर्जिते ।

अनुगृह्य ततो दद्याज्ज्ञानं मम यथाविधि ॥ १३

स्वरेणोच्चारयेत्सम्यगेकान्तेऽतिप्रसन्नधीः ।

उच्चार्योच्चारयित्वा तमावयोर्मन्त्रमुत्तमम् ॥ १४

शिवं चास्तु शुभं चास्तु शोभनोऽस्तु प्रियोऽस्त्विति ।

एवं दद्याद् गुरुर्मन्त्रमाज्ञां चैव ततः परम् ॥ १५

एवं लब्ध्वा गुरोर्मन्त्रमाज्ञां चैव समाहितः ।

सङ्कल्प्य च जपेन्नित्यं पुरश्चरणपूर्वकम् ॥ १६

यावज्जीवं जपेन्नित्यमष्टोत्तरसहस्त्रकम् ।

अनन्यस्तत्परो भूत्वा स याति परमां गतिम् ॥ १७

जपेदक्षरलक्षं वै चतुर्गुणितमादरात् ।

नक्ताशी संयमी यः स पौरश्चरणिकः स्मृतः ॥ १८

यः पुरश्चरणं कृत्वा नित्यजापी भवेत्पुनः । ( उत्तरखण्ड ) ९ ३५ इस प्रकार यथाशक्ति निश्छलभावसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके गुरुसे मन्त्र एवं ज्ञानका उपदेश क्रमशः ग्रहण करे । इस तरह संतुष्ट हुए गुरु अपने पूजक शिष्यको, जो एक वर्षतक उनकी सेवामें रह चुका हो, गुरुकी सेवामें उत्साह रखनेवाला हो, अहंकाररहित हो और उपवासपूर्वक स्नान करके शुद्ध हो गया हो, पुनः विशेष शुद्धिके लिये पूर्ण कलशमें रखे हुए घृतसे तथा पवित्र द्रव्ययुक्त मन्त्रशुद्ध | जलसे नहलाकर चन्दन, पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा अलंकृत करके उसे सुन्दर वेश - भूषासे विभूषित करे ॥ ८-१० १/२ ॥ तत्पश्चात् शिष्यसे ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन करवाकर और ब्राह्मणोंकी पूजा करके समुद्रतटपर, नदीके किनारे, गोशालामें, देवालयमें, किसी भी पवित्र स्थानमें अथवा घरमें सिद्धिदायक काल आनेपर शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र एवं सर्वदोषरहित शुभ योगमें गुरु अपने उस शिष्यको अनुग्रहपूर्वक विधिके अनुसार मेरा ज्ञान दे॥११–१३ ॥ एकान्त स्थानमें अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उच्चस्वरसे हम दोनोंके उस उत्तम मन्त्रका शिष्यसे भलीभाँति उच्चारण कराये । बारंबार उच्चारण कराकर शिष्यको इस प्रकार आशीर्वाद दे – ' तुम्हारा कल्याण हो, मंगल हो, शोभन हो, प्रिय हो ' इस तरह गुरु शिष्यको मन्त्र और तदुपरान्त आज्ञा प्रदान करे॥१४-१५ ॥ इस प्रकार गुरुसे मन्त्र और आज्ञा पाकर शिष्य एकाग्रचित्त हो संकल्प करके पुरश्चरणपूर्वक प्रतिदिन उस मन्त्रका जप करता रहे । वह जबतक जीये, तबतक अनन्यभावसे तत्परतापूर्वक नित्य एक हजार आठ मन्त्रोंका जप किया करे । जो ऐसा करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥ जो प्रतिदिन संयमसे रहकर केवल रातमें भोजन करता है और मन्त्रके जितने अक्षर हैं, उतने लाखका चौगुना जप आदरपूर्वक पूरा कर देता है, वह ‘ पौरश्चरणिक ' कहलाता है । जो पुरश्चरण करके प्रतिदिन जप करता रहता है, उसके समान इस लोकमें दूसरा कोई नहीं है । वह सिद्धिदायक सिद्ध हो जाता तस्य नास्ति समो लोके स सिद्धः सिद्धिदो भवेत् ॥ १ ९ है ॥ १८-१९ ॥

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९ ३६ स्नानं कृत्वा शुचौ देशे बद्ध्वा रुचिरमासनम् त्वया मां हृदि संचिन्त्य संचिन्त्य स्वगुरुं ततः उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा मौनी चैकाग्रमानसः विशोध्य पञ्चतत्त्वानि दहनप्लावनादिभिः

मन्त्रन्यासादिकं कृत्वा सकलीकृतविग्रहः ।

आवयोर्विग्रहौ ध्यायन्प्राणापानौ नियम्य च ॥

विद्यास्थानं स्वकं रूपं ऋषिं छन्दोऽधिदैवतम् ।

बीजं शक्तिं तथा वाक्यं स्मृत्वा पञ्चाक्षरीं जपेत् ॥

उत्तमं मानसं जाप्यमुपांशुं चैव मध्यमम् ।

अधमं वाचिकं प्राहुरागमार्थविशारदाः ॥

उत्तमं रुद्रदैवत्यं मध्यमं विष्णुदैवतम् ।

अधमं ब्रह्मदैवत्यमित्याहुरनुपूर्वशः ॥

यदुच्चनीचस्वरितैः स्पष्टास्पष्टपदाक्षरैः ।

मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा वाचिकोऽयं जपः स्मृतः ॥

जिह्वामात्रपरिस्पंदादीषदुच्चारितोऽपि वा । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । साधकको चाहिये कि वह शुद्ध देशमें ॥ २० करके सुन्दर आसन बाँधकर अपने हृदयमें स्नान | साथ मुझ शिवका और अपने गुरुका चिन्तन तुम्हार । । हुए उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह किये मौनभावसे करत ॥ २१ चित्तको एकाग्र करे तथा दहन - प्लावन आदिके बैठे, | पाँचों तत्त्वोंका शोधन करके मन्त्रका न्यास द्वारा आदि । करे । इसके बाद सकलीकरणकी क्रिया सम्पन्न करके २२ प्राण और अपानका नियमन करते हुए हम दोनोंक | स्वरूपका ध्यान करे और विद्यास्थान, अपने रूप ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति तथा मन्त्रके वाच्यार्थरूप, २३ | मुझ परमेश्वरका स्मरण करके पंचाक्षरीका करे ॥ २०–२३ ॥ जप । मानस जप उत्तम है, उपांशु जप मध्यम है २४ तथा वाचिक जप उससे निम्नकोटिका माना गया है — ऐसा आगमार्थविशारद विद्वानोंका कथन है ॥ २४ ॥

रुद्रसे अधिष्ठित [ मानस ] जप उत्तम कहा गया २५ है, विष्णुसे अधिष्ठित [ उपांशु ] जप मध्यम कहा जाता है तथा ब्रह्मासे अधिष्ठित [ वाचिक ] जप अधम कहलाता है - ऐसा क्रमशः समझना चाहिये ॥ २५ ॥

जो ऊँचे - नीचे स्वरसे युक्त तथा स्पष्ट और अस्पष्ट २६ पदों एवं अक्षरोंके साथ मन्त्रका वाणीद्वारा उच्चारण करता है, उसका यह जप ' वाचिक ' कहलाता है ॥ २६ ॥

जिस जपमें केवल जिह्वामात्र हिलती है अथवा अपरैरश्रुतः किञ्चिच्छुतो वोपांशुरुच्यते ॥ २७ बहुत धीमे स्वरसे अक्षरोंका उच्चारण होता है तथा जो दूसरोंके कानमें पड़नेपर भी उन्हें कुछ सुनायी नहीं धिया यदक्षरश्रेण्या देता, ऐसे जपको ‘ उपांशु ' कहते हैं ॥ २७ ॥

वर्णाद्वर्णं पदात्पदम् । जिस जपमें अक्षर - पङ्क्तिका एक वर्णसे दूसरे शब्दार्थचिन्तनं भूयः कथ्यते मानसो जपः ॥ २८ वर्णका, एक पदसे दूसरे पदका तथा शब्द और

वाचिकस्त्वेक एव स्यादुपांशुः शतमुच्यते ।

साहस्रं मानसः प्रोक्तः सगर्भस्तु शताधिकः ॥ २

प्राणायामसमायुक्तः सगर्भो जप उच्यते । आद्यन्तयोरगर्भोऽपि प्राणायामः अर्थका मनके द्वारा बारंबार चिन्तनमात्र होता है, वह । ' मानस ' जप कहलाता है ॥२८ ॥

वाचिक जप एकगुना ही फल देता है, उपांशु ९ जप सौगुना फल देनेवाला बताया जाता है, मानस जपका फल सहस्रगुना कहा गया है तथा सगर्भ जप उससे सौगुना अधिक फल देनेवाला है ॥२ ९ ॥ प्राणायामपूर्वक जो जप होता है, उसे ' सगर्भ ' । जप कहते हैं । अगर्भ जपमें भी आदि और अन्तमें प्रशस्यते ॥ ३० प्राणायाम कर लेना श्रेष्ठ बताया गया है ॥ ३० ॥