शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 1–10
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ 2223 श्रीशिवमहापुराण [ प्रथम - खण्ड - पूर्वार्ध ] ( सचित्र, मूल संस्कृत श्लोक - हिन्दी- व्याख्यासहित ) गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस, गोरखपुर | GITA PRESS, GORAKHPUR [ SINCE 1923 ]
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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि 1930 | श्रीमद्भागवत - सुधासागर — भाषानुवाद, सचित्र 1945 " " " " ( विशिष्ट संस्करण ) 25 श्रीशुकसुधासागर - बृहदाकार, बड़े टाइपमें 1951 ) श्रीमद्भागवतमहापुराण-1952 " " सटीक पत्राकारकी तरह, बेड़िआ दो खण्डों में सेट 26 " " " - ( हिन्दी - अनुवादसहित ) 220 27 33 33 दो खण्डोंमें सेट ( गुजराती भी ) 564,565 श्रीमद्भागवत - महापुराण- अंग्रेजी सेट 29 23 " मूल मोटा टाइप ( तेलुगु भी ) 124 श्रीमद्भागवत महापुराण - मूल मझला 1092 भागवतस्तुति - संग्रह 2009 भागवत - नवनीत 30 श्रीप्रेम - सुधासागर 31 श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध 728 महाभारत- हिन्दी टीका - सहित सचित्र [ छः खण्डोंमें ] सेट 38 महाभारत - खिलभाग हरिवंशपुराण - सटीक 1589 II " " —केवल भाषा 39 ) संक्षिप्त महाभारत - केवल भाषा, 511 ) " 77 सचित्र ( दो खण्डोंमें ) सेट 44 संक्षिप्त पद्मपुराण 1468 सं ० शिवपुराण ( विशिष्ट संस्करण ) 789 सं ० शिवपुराण - मोटा टाइप [ गुजराती भी ] 1133 सं ० देवीभागवत - मोटा टाइप [ गुजराती भी ] 48 श्रीविष्णुपुराण- ( हिन्दी - अनुवादसहित ) 1364 श्रीविष्णुपुराण ( केवल हिन्दी ) 1183 सं ० नारदपुराण 279 सं ० स्कन्दपुराण 539 सं ० मार्कण्डेयपुराण 1897 ) श्रीमद्देवीभागवत महापुराण- ( हिन्दी-1898 " 77 अनुवादसहित ) दो खण्डोंमें सेट 17931 22 19 ( केवल हिन्दी ) 1842 " 39 दो खण्डोंमें सेट
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ 2223 महर्षि वेदव्यासप्रणीत श्रीशिवमहापुराण [ प्रथम - खण्ड - पूर्वार्ध ] ( विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता - सृष्टिखण्ड, सतीखण्ड, पार्वतीखण्ड, कुमारखण्ड और युद्धखण्ड ) [ सचित्र, मूल संस्कृत श्लोक - हिन्दी व्याख्यासहित ] त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ गीताप्रेस, गोरखपुर blood 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_1_1_Front
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ESSS शिवर सं ० २०७६ प्रथम संस्करण 19,000 मूल्य - I ३०० ( तीन सौ रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक-गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५० , २३३१२५१ web: gitapress.org e - mail: booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें । 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_1_
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निवेदन TUTE पुराण वाङ्मयमें श्रीशिवमहापुराणका अत्यन्त महिमामय स्थान है । पुराणोंकी परिगणनामें वेदतुल्य, पवित्र और सभी लक्षणोंसे युक्त यह पुराण चौथा है । शिवके उपासक इस पुराणको शैवभागवत मानते हैं । इस ग्रन्थके आदि, मध्य तथा अन्तमें सर्वत्र भूतभावन भगवान् सदाशिवकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है । वेद - वेदान्तमें विलसित परमतत्त्व - परमात्माका इस पुराणमें शिव नामसे गान किया गया है । सन् १ ९ ६२ में कल्याणके विशेषांकके रूपमें संक्षिप्त शिवपुराणाङ्कका प्रकाशन हुआ था, जिसमें शिवपुराणकी कथाएँ साररूपमें हिन्दीमें प्रकाशित हुई थीं । भगवान् सदाशिवके प्रेमी पाठकोंका पिछले बहुत वर्षोंसे यह आग्रह था कि मूल शिवमहापुराणका सानुवाद प्रकाशन विशेषांकके रूपमें किया जाय । इस दृष्टिसे मूल शिवमहापुराणके प्रकाशनकी योजना बनायी गयी, परंतु विशेषांककी पृष्ठसंख्या सीमित होनेके कारण चौबीस हजार श्लोकोंके इस बृहत् पुराणका मूलसहित प्रकाशन एक वर्षमें सम्भव नहीं था, अतः यह निर्णय लिया गया कि शिवमहापुराणके मूल श्लोक पुस्तकरूपमें प्रकाशित कर दिये जायँ तथा प्रत्येक श्लोकका अनुवाद श्लोकसंख्यासहित दो वर्षोंमें सर्वसाधारणके लिये विशेषांकके रूपमें प्रकाशित किया जाय । तदनुसार सम्पूर्ण मूल शिवमहापुराण पुस्तकरूपमें प्रकाशित कर दिया गया तथा सन् २०१७ में श्रीशिवमहापुराण पूर्वार्ध ( विद्येश्वरसंहिता एवं रुद्रसंहिता ) - का तथा सन् २०१८ में इस पुराणके उत्तरार्ध ( शतरुद्रसंहितासे वायवीयसंहितातक ) का हिन्दी अनुवाद विशेषांकके रूपमें प्रकाशित किया गया । प्रतिपाद्य - विषयकी दृष्टिसे शिवमहापुराण अत्यन्त उपयोगी महापुराण है । इसमें भक्ति, ज्ञान, सदाचार, शौचाचार, उपासना, लोकव्यवहार तथा मानवजीवनके परम कल्याणकी अनेक उपयोगी बातें निरूपित हैं । शिवज्ञान, शैवीदीक्षा तथा शैवागमका यह अत्यन्त प्रौढ़ ग्रन्थ है । साधना एवं उपासना - सम्बन्धी अनेकानेक सरल विधियाँ इसमें निरूपित हैं । कथाओंका तो यह आकर ग्रन्थ है । इसकी कथाएँ अत्यन्त मनोरम, रोचक तथा बड़े ही कामकी हैं । मुख्य रूपसे इस पुराणमें देवोंके भी देव महादेव भगवान् साम्बसदाशिवके सकल, निष्कल स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, उनके लीलावतारोंकी कथाएँ, द्वादश ज्योतिर्लिंगोंके आख्यान, शिवरात्रि आदि व्रतोंकी कथाएँ, शिवभक्तोंकी कथाएँ, लिंगरहस्य, लिंगोपासना, पार्थिवलिंग, प्रणव, बिल्व, रुद्राक्ष और भस्म आदिके विषयमें विस्तारसे वर्णन है । यह पुराण उच्चकोटिके सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों तथा साधारण आस्तिकजनों - सभीके लिये परम मंगलमय एवं हितकारी है । वर्तमान परिप्रेक्ष्यमें तो इस पुराणके अध्ययन एवं मनन तथा इसके उपदेशोंके अनुसार चलनेकी विशेष आवश्यकता प्रतीत होती है । शिवपुराणका पठन - पाठन सच्ची सुख - शान्तिके विस्तारमें परम सहायक सिद्ध हो सकता है । शिवभक्तोंके उसी माँगको देखते हुए २ खण्डोंमें संस्कृत मूल हिन्दी व्याख्याके साथ इसका प्रकाशन किया जा रहा है । आस्तिकजन इस महापुराणको पढ़कर लाभ उठायें और लोक - परलोकमें सुख - शान्ति तथा मानव-जीवनके परम लक्ष्यको प्राप्त करें, भगवान् सदाशिवसे यही प्रार्थना है । - राधेश्याम खेमका 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_1_2_Front
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॥ श्रीहरिः ॥ श्रीशिवमहापुराण विषय - सूची अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ संख्या १. शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजीका उन्हें शिवमहापुराणकी महिमा सुनाना..... २. शिवपुराणके श्रवणसे देवराजको शिवलोककी प्राप्ति.. ३. चंचुलाका पापसे भय एवं संसारसे वैराग्य.... ४. चंचुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण सुनाना और समयानुसार शरीर छोड़कर शिवलोकमें माहात्म्य जा चंचुलाका पार्वतीजीकी सखी होना......... २५ १३ ५. चंचुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर १७ बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन २१ दोनों दम्पतीका शिवधाममें सुखी होना........ ३० ६. शिवपुराणके श्रवणकी विधि..... ३५ ७. श्रोताओंके पालन करनेयोग्य नियमोंका वर्णन. ४० विद्येश्वरसंहिता १. प्रयागमें सूतजीसे मुनियोंका शीघ्र पापनाश करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न २. शिवपुराणका माहात्म्य एवं परिचय. ३. साध्य - साधन आदिका विचार.. ४. श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन.. ५. भगवान् शिवके लिंग एवं साकार विग्रहकी पूजाके रहस्य तथा महत्त्वका वर्णन. ६. ब्रह्मा और विष्णुके भयंकर युद्धको देखकर देवताओंका कैलास शिखरपर गमन ७. भगवान् शंकरका ब्रह्मा और विष्णुके युद्धमें अग्निस्तम्भरूपमें प्राकट्य, स्तम्भके आदि और अन्तकी जानकारीके लिये दोनोंका प्रस्थान.... ८. भगवान् शंकरद्वारा ब्रह्मा और केतकी पुष्पको शाप देना और पुनः अनुग्रह प्रदान करना.... ९. महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका परिचय देते हुए लिंग - पूजनका महत्त्व बताना १०. सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्योंका प्रतिपादन, प्रणव एवं पंचाक्षर - मन्त्रकी महत्ता, ब्रह्मा - विष्णुद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तर्धान होना ११. शिवलिंगकी स्थापना, उसके लक्षण और पूजनकी विधिका वर्णन तथा शिवपदकी प्राप्ति करानेवाले सत्कर्मोंका विवेचन.. १२. मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रोंका वर्णन, कालविशेषमें विभिन्न नदियोंके जलमें स्नानके उत्तम फलका निर्देश तथा तीर्थोंमें पापसे बचे रहनेकी चेतावनी १३. सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, सन्ध्या-वन्दन, प्रणव - जप, गायत्री जप, दान, न्यायतः ४५ धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदिकी विधि एवं ४८ उनकी महिमाका वर्णन. ९ ० ५५ १४. अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन, भगवान् शिवके द्वारा सातों वारोंका निर्माण तथा ५७ उनमें देवाराधनसे विभिन्न प्रकारके फलोंकी प्राप्तिका कथन.. ९९ ५ ९ १५. देश, काल, पात्र और दान आदिका विचार. १०४ १६. मृत्तिका आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंके पूजनकी ६३ विधि, उनके लिये नैवेद्यका विचार, पूजनके विभिन्न उपचारोंका फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रोंके योगमें पूजनका विशेष फल तथा ६५ लिंगके वैज्ञानिक स्वरूपका विवेचन ११० १७. षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप ६८ ( ॐकार ) और स्थूल रूप ( पंचाक्षर मन्त्र ) -का विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके लोकों-७० तकका विवेचन करके कालातीत, पंचावरण-विशिष्ट शिवलोकके अनिर्वचनीय वैभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता... १२१ ७५ १८. बन्धन और मोक्षका विवेचन, शिवपूजाका उपदेश, लिंग आदिमें शिवपूजनका विधान, भस्मके स्वरूपका निरूपण और महत्त्व, शिवके भस्मधारणका रहस्य, ७ ९ शिव एवं गुरु शब्दकी व्युत्पत्ति तथा विघ्नशान्तिके उपाय और शिवधर्मका निरूपण १३६ १ ९. पार्थिव शिवलिंगके पूजनका माहात्म्य. १५० ८६ २०. पार्थिव शिवलिंगके निर्माणकी रीति तथा वेद-मन्त्रोंद्वारा उसके पूजनकी विस्तृत एवं संक्षिप्त 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_1_2_Back
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( ५ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या विधिका वर्णन १५३ २३. भस्म, रुद्राक्ष और शिवनामके माहात्म्यका वर्णन १६ ९ २१. कामनाभेदसे पार्थिवलिंगके पूजनका विधान.. १६१ २४. भस्म - माहात्म्यका निरूपण. १७३ २२. शिव - नैवेद्य - भक्षणका निर्णय एवं बिल्वपत्रका २५. रुद्राक्षधारणकी महिमा तथा उसके विविध माहात्म्य १६५ भेदोंका वर्णन.. १८४ रुद्रसंहिता १- सृष्टिखण्ड १. ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतजीद्वारा नारद-ब्रह्म - संवादकी अवतारणा... १ ९ ५ २. नारद मुनिकी तपस्या, इन्द्रद्वारा तपस्यामें विघ्न उपस्थित करना, नारदका कामपर विजय पाना और अहंकारसे युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रसे अपने तपका कथन १ ९ ८ ३. मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित हुए नारदजीका भगवान् विष्णुसे उनका रूप माँगना, भगवान्का अपने रूपके साथ वानरका - सा मुँह देना, कन्याका भगवान्को वरण करना और कुपित हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना २०३ ४. नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना, फिर मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्तापपूर्वक भगवान्के चरणोंमें गिरना और शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका उन्हें समझा - बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और शिवके भजनका उपदेश देना २०८ ५. नारदजीका शिवतीर्थोंमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमें प्रश्न करना... २१५ ६. महाप्रलयकालमें केवल सद्ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन, उस निर्गुण - निराकार ब्रह्मसे ईश्वरमूर्ति ( सदाशिव ) -का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूत शक्ति ( अम्बिका ) -का प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र ( काशी या आनन्दवन ) -का प्रादुर्भाव, शिवके वामांगसे परम पुरुष ( विष्णु ) का आविर्भाव तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन २१ ९ ७. भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, शिवेच्छासे ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमल-नालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा - विष्णुके बीचमें अग्निस्तम्भका प्रकट होना तथा उसके ओर - छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना २२४ ८. ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन.. २३१ ९. उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूपका विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंकी एकताका प्रतिपादन. २३५ १०. श्रीहरिको सृष्टिकी रक्षाका भार एवं भोग - मोक्ष-दानका अधिकार देकर भगवान् शिवका अन्तर्धान होना.. २४१ ११. शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल २४५ १२. भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन.. २५२ १३. शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन २६० १४. विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य... २६६ १५. सृष्टिका वर्णन. २७४ १६. ब्रह्माजीकी सन्तानोंका वर्णन तथा सती और शिवकी महत्ताका प्रतिपादन.. २८० १७. यज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिका चरित्र. २८४ १८. शिवमन्दिरमें दीपदानके प्रभावसे पापमुक्त होकर गुणनिधिका दूसरे जन्ममें कलिंगदेशका राजा बनना और फिर शिवभक्तिके कारण कुबेर पदकी प्राप्ति २८ ९ १ ९. कुबेरका काशीपुरीमें आकर तप करना, तपस्यासे प्रसन्न उमासहित भगवान् विश्वनाथका प्रकट हो उसे दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना, कुबेरद्वारा शिवमैत्री प्राप्त करना... २ ९ ६ २०. भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा सृष्टिखण्डका उपसंहार. २ ९९ २- सतीखण्ड १. सतीचरित्रवर्णन, दक्षयज्ञविध्वंसका संक्षिप्त वृत्तान्त तथा सतीका पार्वतीरूपमें हिमालयके यहाँ जन्म लेना ३०५ २. सदाशिवसे त्रिदेवोंकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीसे देवता आदिकी सृष्टिके पश्चात् देवी सन्ध्या तथा कामदेवका प्राकट्य.. ३० ९ ३. कामदेवको विविध नामों एवं वरोंकी प्राप्ति, कामके प्रभावसे ब्रह्मा तथा ऋषिगणोंका मुग्ध होना, धर्मद्वारा
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( ६ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या स्तुति करनेपर भगवान् शिवका प्राकट्य और ब्रह्मा तथा ऋषियोंको समझाना, ब्रह्मा तथा ऋषियोंसे अग्निष्वात्त आदि पितृगणोंकी उत्पत्ति, ब्रह्माद्वारा कामको शापकी प्राप्ति तथा निवारणका उपाय ३१३ ४. कामदेवके विवाहका वर्णन ३१ ९ ५. ब्रह्माकी मानसपुत्री कुमारी सन्ध्याका आख्यान ३२३ ६. सन्ध्याद्वारा तपस्या करना, प्रसन्न हो भगवान् शिवका उसे दर्शन देना, सन्ध्याद्वारा की गयी शिवस्तुति, सन्ध्याको अनेक वरोंकी प्राप्ति तथा महर्षि मेधातिथिके यज्ञमें जानेका आदेश प्राप्त होना ३२८ ७. महर्षि मेधातिथिकी यज्ञाग्निमें सन्ध्याद्वारा शरीर-त्याग, पुनः अरुन्धतीके रूपमें यज्ञाग्निसे उत्पत्ति एवं वसिष्ठमुनिके साथ उसका विवाह. ३३४ ८. कामदेवके सहचर वसन्तके आविर्भावका वर्णन ३३६ ९. कामदेवद्वारा भगवान् शिवको विचलित न कर पाना, ब्रह्माजीद्वारा कामदेवके सहायक मारगणोंकी उत्पत्ति; ब्रह्माजीका उन सबको शिवके पास भेजना, उनका वहाँ विफल होना, गणोंसहित कामदेवका वापस अपने आश्रमको लौटना..... ३४१ १०. ब्रह्मा और विष्णुके संवादमें शिवमाहात्म्यका वर्णन ३४६ ११. ब्रह्माद्वारा जगदम्बिका शिवाकी स्तुति तथा वरकी प्राप्ति.. ३५१ १२. दक्षप्रजापतिका तपस्याके प्रभावसे शक्तिका दर्शन और उनसे रुद्रमोहनकी प्रार्थना करना....... ३५६ १३. ब्रह्माकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों तथा सबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना.... ३५ ९ १४. दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्षके यहाँ देवी शिवा ( सती ) -का प्राकट्य, सतीकी बाललीलाका वर्णन. ३६३ १५. सतीद्वारा नन्दा - व्रतका अनुष्ठान तथा देवताओंद्वारा शिवस्तुति... ३६७ १६. ब्रह्मा और विष्णुद्वारा शिवसे विवाहके लिये प्रार्थना करना तथा उनकी इसके लिये स्वीकृति ३७४ १७. भगवान् शिवद्वारा सतीको वर - प्राप्ति और शिवका ब्रह्माजीको दक्ष प्रजापतिके पास भेजना. ३७ ९ १८. देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार एवं सती तथा शिवका विवाह ३८५ १ ९. शिवका सतीके साथ विवाह, विवाहके समय शम्भुकी मायासे ब्रह्माका मोहित होना और विष्णुद्वारा शिवतत्त्वका निरूपण ३८ ९ २०. ब्रह्माजीका ‘ रुद्रशिर ' नाम पड़नेका कारण, सती अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या एवं शिवका विवाहोत्सव, विवाहके अनन्तर शिव और सतीका वृषभारूढ़ हो कैलासके लिये प्रस्थान ३ ९ ५ २१. कैलास पर्वतपर भगवान् शिव एवं सतीकी मधुर लीलाएँ.. ४०१ २२. सती और शिवका विहार - वर्णन. ४०५ २३. सतीके पूछनेपर शिवद्वारा भक्तिकी महिमा तथा नवधा भक्तिका निरूपण. ४११ २४. दण्डकारण्यमें शिवको रामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा रामकी परीक्षा. ४१६ २५. श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक, श्रीरामद्वारा सतीके मनका सन्देह दूर करना, शिवद्वारा सतीका मानसिक रूपसे परित्याग ४२१ २६. सतीके उपाख्यानमें शिवके साथ दक्षका विरोध - वर्णन ४२७ २७. दक्षप्रजापतिद्वारा महान् यज्ञका प्रारम्भ, यज्ञमें दक्षद्वारा शिवके न बुलाये जानेपर दधीचिद्वारा दक्षकी भर्त्सना करना, दक्षके द्वारा शिव - निन्दा करनेपर दधीचिका वहाँसे प्रस्थान. ४३२ २८. दक्षयज्ञका समाचार पाकर एवं शिवकी आज्ञा प्राप्तकर देवी सतीका शिवगणोंके साथ पिताके यज्ञमण्डपके लिये प्रस्थान. ४३६ | २ ९. यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर तथा दक्षद्वारा शिवनिन्दा सुनकर क्रुद्ध हो सतीका दक्ष तथा देवताओंको फटकारना और प्राणत्यागका निश्चय ४४० ३०. दक्षयज्ञमें सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, भृगुद्वारा यज्ञकुण्डसे ऋभुओंको प्रकट करना, ऋभुओं और शंकरके गणोंका युद्ध, भयभीत गणोंका पलायित होना. ४४५ ३१. यज्ञमण्डपमें आकाशवाणीद्वारा दक्षको फटकारना तथा देवताओंको सावधान करना ४४८ ३२. सतीके दग्ध होनेका समाचार सुनकर कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ - विध्वंस करनेकी आज्ञा देना. ४५१ ३३. गणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान... ४५६ ३४. दक्ष तथा देवताओंका अनेक अपशकुनों एवं उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भयभीत होना. ४५ ९ ३५. दक्षद्वारा यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना