शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 11–20

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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( ७ ) | अध्याय विषय पृष्ठ संख्या तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन ४६१ ३६. युद्धमें शिवगणोंसे पराजित हो देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत ४६५ ३७. गणोंसहित वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षवध, वीरभद्रका वापस कैलास पर्वतपर जाना, प्रसन्न भगवान् शिवद्वारा उसे गणाध्यक्ष पद प्रदान करना ४७१ ३८. दधीचि मुनि और राजा क्षुवके विवादका इतिहास, शुक्राचार्यद्वारा दधीचिको महामृत्युंजय - मन्त्रका उपदेश, मृत्युंजयमन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिको अवध्यताकी प्राप्ति. ४७७ ३ ९. श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिद्वारा देवताओंको शाप देना तथा राजा क्षुवपर अनुग्रह करना ४८३ ४०. देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, उन सभीको लेकर विष्णुका कैलासगमन तथा भगवान् शिवसे मिलना.... ४८७ ४१. देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति.... ४ ९ १ ४२. भगवान् शिवका देवता आदिपर अनुग्रह, दक्षयज्ञ-मण्डपमें पधारकर दक्षको जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिद्वारा शिवकी स्तुति.. ४ ९ ६ ४३. भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवोंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, देवताओंका अपने - अपने लोकोंको प्रस्थान तथा सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य. ५०० ३- पार्वतीखण्ड ९. पितरोंकी कन्या मेनाके साथ हिमालयके विवाहका वर्णन. ५०५ २. पितरोंकी तीन मानसी कन्याओं - मेना, धन्या और कलावतीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा सनकादि-द्वारा प्राप्त शाप एवं वरदानका वर्णन. ५०८ ३. विष्णु आदि देवताओंका हिमालयके पास जाना, उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी देवी जगदम्बाकी स्तुति करना. ५११ ४. उमादेवीका दिव्यरूपमें देवताओंको दर्शन देना और अवतार ग्रहण करनेका आश्वासन देना........ ५१५ ५. मेनाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर देवीका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर वरदान देना, मेनासे मैनाकका जन्म. ५१ ९ ६. देवी उमाका हिमवान्के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओं द्वारा स्तवन, देवीका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे वार्तालाप तथा अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या पुनः नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना. ५२३ ७. पार्वतीका नामकरण तथा उनकी बाललीलाएँ एवं विद्याध्ययन.. ५२८ ८. नारद मुनिका हिमालयके समीप गमन, वहाँ पार्वतीका हाथ देखकर भावी लक्षणोंको बताना, चिन्तित हिमवान्‌को शिवमहिमा बताना तथा शिवसे विवाह करनेका परामर्श देना.. ५३० ९. पार्वतीके विवाहके सम्बन्धमें मेना और हिमालयका वार्तालाप, पार्वती और हिमालयद्वारा देखे गये अपने स्वप्नका वर्णन. ५३५ १०. शिवजीके ललाटसे भौमोत्पत्ति. ५३८ ११. भगवान् शिवका तपस्याके लिये हिमालयपर आगमन, वहाँ पर्वतराज हिमालयसे वार्तालाप ५४० १२. हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना, शिवद्वारा कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना ५४४ १३. पार्वती और परमेश्वरका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना, पार्वतीका महेश्वरकी सेवामें तत्पर रहना...... ५४७ १४. तारकासुरकी उत्पत्तिके प्रसंगमें दितिपुत्र वज्रांगकी कथा, उसकी तपस्या तथा वरप्राप्तिका वर्णन ५५२ १५. वरांगीके पुत्र तारकासुरकी उत्पत्ति, तारकासुर की तपस्या एवं ब्रह्माजीद्वारा उसे वरप्राप्ति, वरदानके प्रभावसे तीनों लोकोंपर उसका अत्याचार.... ५५६ १६. तारकासुरसे उत्पीड़ित देवताओंको ब्रह्माजीद्वारा सान्त्वना प्रदान करना ५६० १७. इन्द्रके स्मरण करनेपर कामदेवका उपस्थित होना, शिवको तपसे विचलित करनेके लिये इन्द्रद्वारा कामदेवको भेजना..... ५६४ १८. कामदेवद्वारा असमयमें वसन्त ऋतुका प्रभाव प्रकट करना, कुछ क्षणके लिये शिवका मोहित होना, पुनः वैराग्य - भाव धारण करना............ ५६७ १ ९. भगवान् शिवकी नेत्रज्वालासे कामदेवका भस्म होना और रतिका विलाप, देवताओंद्वारा रतिको सान्त्वना प्रदान करना और भगवान् शिवसे कामको जीवित करनेकी प्रार्थना करना..... ५७१ २०. शिवकी क्रोधाग्निका वडवारूपधारण और ब्रह्माद्वारा उसे समुद्रको समर्पित करना. ५७५ २१. कामदेवके भस्म हो जानेपर पार्वतीका अपने घर आगमन, हिमवान् तथा मेनाद्वारा उन्हें धैर्य प्रदान करना, नारदद्वारा पार्वतीको पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश ५७७ २२. पार्वतीकी तपस्या एवं उसके प्रभावका वर्णन ५८१ २३. हिमालय आदिका तपस्यानिरत पार्वतीके पास

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( ८ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या जाना, पार्वतीका पिता हिमालय आदिको अपने तपके विषयमें दृढ़ निश्चयकी बात बताना, पार्वतीके तपके प्रभावसे त्रैलोक्यका संतप्त होना, सभी देवताओंका भगवान् शंकरके पास जाना ५८७ २४. देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्‌का विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना ५ ९ १ २५. भगवान् शंकरकी आज्ञासे सप्तर्षियोंद्वारा पार्वतीके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना और वह वृत्तान्त भगवान् शिवको बताकर स्वर्गलोक जाना ५ ९ ८ २६. पार्वतीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शिवका जटाधारी ब्राह्मणका वेष धारणकर पार्वतीके समीप जाना, शिव - पार्वती - संवाद.. ६०४ २७. जटाधारी ब्राह्मणद्वारा पार्वतीके समक्ष शिवजीके स्वरूपकी निन्दा करना.. ६०८ २८. पार्वतीद्वारा परमेश्वर शिवकी महत्ता प्रतिपादित करना और रोषपूर्वक जटाधारी ब्राह्मणको फटकारना, शिवका पार्वतीके समक्ष प्रकट होना. ६११ २ ९. शिव और पार्वतीका संवाद, विवाहविषयक पार्वतीके अनुरोधको शिवद्वारा स्वीकार करना ६१५ ३०. पार्वतीके पिताके घरमें आनेपर महामहोत्सवका होना, महादेवजीका नटरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होना तथा अनेक लीलाएँ दिखाना, शिवद्वारा पार्वतीकी याचना, किंतु माता - पिताके द्वारा मना करनेपर अन्तर्धान हो जाना ६१ ९ ३१. देवताओंके कहनेपर शिवका ब्राह्मण - वेषमें हिमालयके यहाँ जाना और शिवकी निन्दा करना ६२३ ३२. ब्राह्मण - वेषधारी शिवद्वारा शिवस्वरूपकी निन्दा सुनकर मेनाका कोपभवनमें गमन, शिवद्वारा सप्तर्षियोंका स्मरण और उन्हें हिमालयके घर भेजना, हिमालयकी शोभाका वर्णन तथा हिमालयद्वारा सप्तर्षियोंका स्वागत.. ६२७ । ३३. वसिष्ठपत्नी अरुन्धतीद्वारा मेनाको समझाना तथा सप्तर्षियोंद्वारा हिमालयको शिवमाहात्म्य बताना ६३२ ३४. सप्तर्षियोंद्वारा हिमालयको राजा अनरण्यका आख्यान सुनाकर पार्वतीका विवाह शिवसे करनेकी प्रेरणा देना. ६३८ ३५. धर्मराजद्वारा मुनि पिप्पलादकी भार्या सती पद्माके पातिव्रत्यकी परीक्षा, पद्माद्वारा धर्मराजको शाप प्रदान करना तथा पुनः चारों युगोंमें शापकी व्यवस्था करना, पातिव्रत्यसे प्रसन्न हो धर्मराजद्वारा पद्माको अनेक वर प्रदान करना, महर्षि वसिष्ठद्वारा हिमवान्से पद्माके दृष्टान्तद्वारा अपनी पुत्री अध्याय विषय पृष्ठ संख्या शिवको सौंपनेके लिये कहना ६४१ ३६. सप्तर्षियोंके समझानेपर हिमवान्‌का शिवके साथ अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय करना, सप्तर्षियोंद्वारा शिवके पास जाकर उन्हें सम्पूर्ण वृत्तान्त बताकर अपने धामको जाना ६४६ ३७. हिमालयद्वारा विवाहके लिये लग्नपत्रिकाप्रेषण, विवाहकी सामग्रियोंकी तैयारी तथा अनेक पर्वतों एवं नदियोंका दिव्य रूपमें सपरिवार हिमालयके घर आगमन...... ६४ ९ ३८. हिमालयपुरीकी सजावट, विश्वकर्माद्वारा दिव्य-मण्डप एवं देवताओंके निवासके लिये दिव्य-लोकोंका निर्माण करना ६५३ ३ ९. भगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे बाहर निकलना ६५७ ४०. शिवबरातकी शोभा, भगवान् शिवका बरात लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान.. ६६२ ४१. नारदद्वारा हिमालयगृहमें जाकर विश्वकर्माद्वारा बनाये गये विवाहमण्डपका दर्शनकर मोहित होना और वापस आकर उस विचित्र रचनाका वर्णन करना ६६६ ४२. हिमालयद्वारा प्रेषित मूर्तिमान् पर्वतों और ब्राह्मणोंद्वारा बरातकी अगवानी, देवताओं और पर्वतोंके मिलापका वर्णन. ६७१ ४३. मेनाद्वारा शिवको देखनेके लिये महलकी छतपर जाना, नारदद्वारा सबका दर्शन कराना, शिवद्वारा अद्भुत लीलाका प्रदर्शन, शिवगणों तथा शिवके भयंकर वेषको देखकर मेनाका मूर्च्छित होना ६७३ ४४. शिवजीके रूपको देखकर मेनाका विलाप, पार्वती तथा नारद आदि सभीको फटकारना, शिवके साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, विष्णुद्वारा मेनाको समझाना. ६७८ ४५. भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता और क्षमा - प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियोंका शिवके रूपका दर्शन करके जन्म और जीवनको सफल मानना.... ६८७ ४६. नगरमें बरातियोंका प्रवेश, द्वाराचार तथा पार्वतीद्वारा कुलदेवताका पूजन. ६ ९ १ ४७. पाणिग्रहणके लिये हिमालयके घर शिवके गमनोत्सवका वर्णन.. ६ ९ ४ ४८. शिव - पार्वतीके विवाहका प्रारम्भ, हिमालयद्वारा शिवके गोत्रके विषयमें प्रश्न होनेपर नारदजीके द्वारा उत्तरके रूपमें शिवमाहात्म्य प्रतिपादित करना, हर्षयुक्त हिमालयद्वारा कन्यादानकर विविध

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( ९ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या उपहार प्रदान करना ६ ९ ८ ४ ९. अग्निपरिक्रमा करते समय पार्वतीके पदनखको देखकर ब्रह्माका मोहग्रस्त होना, बालखिल्योंकी उत्पत्ति, शिवका कुपित होना, देवताओंद्वारा शिवस्तुति. ७०३ ५०. शिवा - शिवके विवाहकृत्यसम्पादनके अनन्तर देवियोंका शिवसे मधुर वार्तालाप. ७०६ ५१. रतिके अनुरोधपर श्रीशंकरका कामदेवको जीवित करना, देवताओंद्वारा शिवस्तुति. ७१० ५२. हिमालयद्वारा सभी बरातियोंको भोजन कराना, शिवका विश्वकर्माद्वारा निर्मित वासगृहमें शयन करके प्रातःकाल जनवासेमें आगमन. ७१४ ५३. चतुर्थीकर्म, बरातका कई दिनोंतक ठहरना, सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका बरातको विदा करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी कन्या सौंपना तथा बरातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना ७१८ | ५४. मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मणपत्नीका पार्वतीको पातिव्रतधर्मका उपदेश देना. ७२१ ५५. शिव - पार्वती तथा बरातकी विदाई, भगवान् शिवका समस्त देवताओंको विदा करके कैलासपर रहना और शिव - विवाहोपाख्यानके श्रवणकी महिमा ७२८ ४ - कुमारखण्ड १. कैलासपर भगवान् शिव एवं पार्वतीका विहार ७३३ २. भगवान् शिवके तेजसे स्कन्दका प्रादुर्भाव और सर्वत्र महान् आनन्दोत्सवका होना.. ७३८ ३. महर्षि विश्वामित्रद्वारा बालक स्कन्दका संस्कार सम्पन्न करना, बालक स्कन्दद्वारा क्रौंचपर्वतका भेदन, इन्द्रद्वारा बालकपर वज्रप्रहार, शाख-विशाख आदिका उत्पन्न होना, कार्तिकेयका षण्मुख होकर छः कृत्तिकाओंका दुग्धपान करना.... ७४५ ४. पार्वतीके कहनेपर शिवद्वारा देवताओं तथा कर्मसाक्षी धर्मादिकोंसे कार्तिकेयके विषयमें जिज्ञासा करना और अपने गणोंको कृत्तिकाओंके पास भेजना, नन्दिकेश्वर तथा कार्तिकेयका वार्तालाप, कार्तिकेयका कैलासके लिये प्रस्थान.. ७४८ ५. पार्वतीके द्वारा प्रेषित रथपर आरूढ़ हो कार्तिकेयका कैलासगमन, कैलासपर महान् उत्सव होना, कार्तिकेयका महाभिषेक तथा देवताओंद्वारा विविध अस्त्र - शस्त्र तथा रत्नाभूषण प्रदान करना, कार्तिकेयका ब्रह्माण्डका अधिपतित्व प्राप्त करना. ७५४ ६. कुमार कार्तिकेयकी ऐश्वर्यमयी बाललीला.... ७६० ७. तारकासुरसे सम्बद्ध देवासुर संग्राम. ७६३ अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ८. देवराज इन्द्र, विष्णु तथा वीरक आदिके साथ तारकासुरका युद्ध ७६७ ९. ब्रह्माजीका कार्तिकेयको तारकके वधके लिये प्रेरित करना, तारकासुरद्वारा विष्णु तथा इन्द्रकी भर्त्सना, पुनः इन्द्रादिके साथ तारकासुरका युद्ध........... ७७१ १०. कुमार कार्तिकेय और तारकासुरका भीषण संग्राम, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध, देवताओंद्वारा दैत्य - सेनापर विजय प्राप्त करना, सर्वत्र विजयोल्लास, देवताओंद्वारा शिवा - शिव तथा कुमारकी स्तुति.. ७७६ ११. कार्तिकेयद्वारा बाण तथा प्रलम्ब आदि असुरोंका वध, कार्तिकेयचरितके श्रवणका माहात्म्य. ७८० १२. विष्णु आदि देवताओं तथा पर्वतोंद्वारा कार्तिकेयकी स्तुति और वरप्राप्ति, देवताओंके साथ कुमारका कैलासगमन, कुमारको देखकर शिव - पार्वतीका आनन्दित होना, देवोंद्वारा शिवस्तुति... ७८३ १३. गणेशोत्पत्तिका आख्यान, पार्वतीका अपने पुत्र गणेशको अपने द्वारपर नियुक्त करना, शिव और गणेशका वार्तालाप ७८७ १४. द्वाररक्षक गणेश तथा शिवगणोंका परस्पर विवाद ७ ९ ० १५. गणेश तथा शिवगणोंका भयंकर युद्ध, पार्वतीद्वारा दो शक्तियोंका प्राकट्य, शक्तियोंका अद्भुत पराक्रम और शिवका कुपित होना. ७ ९ ६ १६. विष्णु तथा गणेशका युद्ध, शिवद्वारा त्रिशूलसे गणेशका सिर काटा जाना ८०१ १७. पुत्रके वधसे कुपित जगदम्बाका अनेक शक्तियोंको उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको प्रसन्न करना, शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड़से जोड़कर उन्हें जीवित करना ८०४ १८. पार्वतीद्वारा गणेशको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्षपद प्रदान करना, गणेशचतुर्थीव्रतविधान तथा उसका माहात्म्य, देवताओंका स्वलोक - गमन. ८० ९ १ ९. स्वामिकार्तिकेय और गणेशकी बाल लीला, विवाहके विषयमें दोनोंका परस्पर विवाद, शिवजीद्वारा पृथ्वी - परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रस्थान, बुद्धिमान् गणेशजीका पृथ्वीरूप माता-पिताकी परिक्रमा और प्रसन्न शिवा- शिवद्वारा गणेशके प्रथम विवाहकी स्वीकृति... ८१५ २०. प्रजापति विश्वरूपकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंके साथ गणेशजीका विवाह तथा

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( १० ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या उनसे ' क्षेम ' तथा ' लाभ ' नामक दो पुत्रोंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका पृथ्वीकी परिक्रमाकर लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंचपर्वतपर चले जाना, कुमारखण्डके श्रवणकी महिमा ८१ ९ ५ - युद्धखण्ड १. तारकासुरके पुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली एवं कमलाक्षकी तपस्यासे प्रसन्न ब्रह्माद्वारा उन्हें वरकी प्राप्ति, तीनों पुरोंकी शोभाका वर्णन.. ८२३ २. तारकपुत्रोंसे पीड़ित देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और उनके परामर्शके अनुसार असुर वधके लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना ८२ ९ ३. त्रिपुरके विनाशके लिये देवताओंका विष्णुसे निवेदन करना, विष्णुद्वारा त्रिपुरविनाशके लिये यज्ञकुण्डसे भूतसमुदायको प्रकट करना, त्रिपुरके भयसे भूतोंका पलायित होना, पुनः विष्णुद्वारा देवकार्यकी सिद्धिके लिये उपाय सोचना..... ८३४ ४. त्रिपुरवासी दैत्योंको मोहित करनेके लिये भगवान् विष्णुद्वारा एक मुनिरूप पुरुषकी उत्पत्ति, उसकी सहायताके लिये नारदजीका त्रिपुरमें गमन, त्रिपुराधिपका दीक्षा ग्रहण करना. ८३८ ५. मायावी यतिद्वारा अपने धर्मका उपदेश, त्रिपुरवासियोंका उसे स्वीकार करना, वेदधर्मके नष्ट हो जानेसे त्रिपुरमें अधर्माचरणकी प्रवृत्ति ८४३ ६. त्रिपुरध्वंसके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ८४८ ७. भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये देवताओंद्वारा मन्त्र - जप, शिवका प्राकट्य तथा त्रिपुरविनाशके लिये दिव्य रथ आदिके निर्माणके लिये विष्णुजीसे कहना. ८५२ ८. विश्वकर्माद्वारा निर्मित सर्वदेवमय दिव्य रथका वर्णन. ८५६ ९. ब्रह्माजीको सारथी बनाकर भगवान् शंकरका दिव्य रथमें आरूढ़ होकर अपने गणों तथा देवसेनाके साथ त्रिपुर- वधके लिये प्रस्थान, शिवका पशुपति नाम पड़नेका कारण... ८५ ९ १०. भगवान् शिवका त्रिपुरपर सन्धान करना, गणेशजीका विघ्न उपस्थित करना, आकाशवाणीद्वारा बोधित होनेपर शिवद्वारा विघ्ननाशक गणेशका पूजन, अभिजित् मुहूर्तमें तीनों पुरोंका एकत्र होना और शिवद्वारा बाणाग्निसे सम्पूर्ण त्रिपुरको भस्म करना, मयदानवका बचा रहना. ८६२ ११. त्रिपुरदाहके अनन्तर भगवान् शिवके रौद्ररूपसे भयभीत देवताओंद्वारा उनकी स्तुति और उनसे अध्याय विषय पृष्ठ संख्या भक्तिका वरदान प्राप्त करना ८६६ १२. त्रिपुरदाहके अनन्तर शिवभक्त मयदानवका भगवान् शिवकी शरणमें आना, शिवद्वारा उसे अपनी भक्ति प्रदानकर वितललोकमें निवास करनेकी आज्ञा देना, देवकार्य सम्पन्नकर शिवजीका अपने लोकमें जाना ८६ ९ १३. बृहस्पति तथा इन्द्रका शिवदर्शनके लिये कैलासकी ओर प्रस्थान, सर्वज्ञ शिवका उनकी परीक्षा लेनेके लिये दिगम्बर जटाधारी रूप धारणकर मार्ग रोकना, क्रुद्ध इन्द्रद्वारा उनपर वज्रप्रहारकी चेष्टा, शंकरद्वारा उनकी भुजाको स्तम्भित कर देना, बृहस्पतिद्वारा उनकी स्तुति, शिवका प्रसन्न होना और अपनी नेत्राग्निको क्षार - समुद्रमें फेंकना.. ८७२ १४. क्षारसमुद्रमें प्रक्षिप्त भगवान् शंकरकी नेत्राग्निसे समुद्रके पुत्रके रूपमें जलन्धरका प्राकट्य, कालनेमिकी पुत्री वृन्दाके साथ उसका विवाह ८७७ १५. राहुके शिरश्छेद तथा समुद्रमन्थनके समयके देवताओंके छलको जानकर जलन्धरद्वारा क्रुद्ध होकर स्वर्गपर आक्रमण, इन्द्रादि देवोंकी पराजय, अमरावतीपर जलन्धरका आधिपत्य, भयभीत देवताओंका सुमेरुकी गुफामें छिपना ८८० १६. जलन्धरसे भयभीत देवताओंका विष्णुके समीप जाकर स्तुति करना, विष्णुसहित देवताओंका जलन्धरकी सेनाके साथ भयंकर युद्ध....... ८८६ १७. विष्णु और जलन्धरके युद्धमें जलन्धरके पराक्रमसे सन्तुष्ट विष्णुका देवों एवं लक्ष्मीसहित उसके नगरमें निवास करना ८८ ९ १८. जलन्धरके आधिपत्यमें रहनेवाले दुखी देवताओंद्वारा शंकरकी स्तुति, शंकरजीका देवर्षि नारदको जलन्धरके पास भेजना, वहाँ देवोंको आश्वस्त करके नारदजीका जलन्धरकी सभामें जाना, उसके ऐश्वर्यको देखना तथा पार्वतीके सौन्दर्यका वर्णनकर उसे प्राप्त करनेके लिये जलन्धरको परामर्श देना ८ ९ ३ १ ९. पार्वतीको प्राप्त करनेके लिये जलन्धरका शंकरके पास दूतप्रेषण, उसके वचनसे उत्पन्न क्रोधसे शम्भुके भ्रूमध्यसे एक भयंकर पुरुषकी उत्पत्ति, उससे भयभीत जलन्धरके दूतका पलायन, उस पुरुषका कीर्तिमुख नामसे शिवगणोंमें प्रतिष्ठित होना तथा शिवद्वारपर स्थित रहना.. ८ ९ ७ २०. दूतके द्वारा कैलासका वृत्तान्त जानकर जलन्धरका अपनी सेनाको युद्धका आदेश देना, भयभीत देवोंका शिवकी शरणमें जाना, शिवगणों तथा जलन्धरकी सेनाका युद्ध, शिवद्वारा कृत्याको उत्पन्न

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( ११ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या करना, कृत्याद्वारा शुक्राचार्यको छिपा लेना.... ९ ०२ २१. नन्दी, गणेश, कार्तिकेय आदि शिवगणोंका कालनेमि, शुम्भ तथा निशुम्भके साथ घोर संग्राम, वीरभद्र तथा जलन्धरका युद्ध, भयाकुल शिवगणोंका शिवजीको सारा वृत्तान्त बताना... ९ ०७ २२. श्रीशिव और जलन्धरका युद्ध, जलन्धरद्वारा गान्धर्वी मायासे शिवको मोहितकर शीघ्र ही पार्वती पास पहुँचना, उसकी मायाको जानकर पार्वतीका अदृश्य हो जाना और भगवान् विष्णुको जलन्धरपत्नी वृन्दाके पास जानेके लिये कहना ९ ११ २३. विष्णुद्वारा माया उत्पन्नकर वृन्दाको स्वप्नके माध्यमसे मोहित करना और स्वयं जलन्धरका रूप धारणकर वृन्दाके पातिव्रतका हरण करना, वृन्दाद्वारा विष्णुको शाप देना तथा वृन्दाके तेजका पार्वतीमें विलीन होना. ९ १५ २४. दैत्यराज जलन्धर तथा भगवान् शिवका घोर संग्राम, भगवान् शिवद्वारा चक्रसे जलन्धरका शिरश्छेदन, जलन्धरका तेज शिवमें प्रविष्ट होना, जलन्धर-वधसे जगत् में सर्वत्र शान्तिका विस्तार. ९ २० २५. जलन्धरवधसे प्रसन्न देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ९ २५ २६. विष्णुजीके मोहभंगके लिये शंकरजीकी प्रेरणासे देवोंद्वारा मूलप्रकृतिकी स्तुति, मूलप्रकृतिद्वारा आकाशवाणीके रूपमें देवोंको आश्वासन, देवताओंद्वारा त्रिगुणात्मिका देवियोंका स्तवन, विष्णुका मोहनाश, धात्री ( आँवला ), मालती तथा तुलसीकी उत्पत्तिका आख्यान ९ २८ । २७. शंखचूडकी उत्पत्तिकी कथा. ९ ३३ २८. शंखचूडकी पुष्कर क्षेत्रमें तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरकी प्राप्ति, ब्रह्माकी प्रेरणासे शंखचूडका तुलसीसे विवाह. ९ ३६ २ ९. शंखचूडका राज्यपदपर अभिषेक, उसके द्वारा देवोंपर विजय, दुखी देवोंका ब्रह्माजीके साथ वैकुण्ठगमन, विष्णुद्वारा शंखचूडके पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना और विष्णु तथा ब्रह्माका शिवलोक गमन..... ९ ४० ३०. ब्रह्मा तथा विष्णुका शिवलोक पहुँचना, शिवलोककी तथा शिवसभाकी शोभाका वर्णन, शिवसभाके मध्य उन्हें अम्बासहित भगवान् शिवके दिव्य-स्वरूपका दर्शन और शंखचूडसे प्राप्त कष्टोंसे मुक्तिके लिये प्रार्थना ९ ४५ ३१. शिवद्वारा ब्रह्मा - विष्णुको शंखचूडका पूर्ववृत्तान्त बताना और देवोंको शंखचूडवधका आश्वासन देना. ९ ४८ ३२. भगवान् शिवके द्वारा शंखचूडको समझानेके लिये गन्धर्वराज चित्ररथ ( पुष्पदन्त ) -को दूतके रूपमें भेजना, शंखचूडद्वारा सन्देशकी अवहेलना और अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या युद्ध करनेका अपना निश्चय बताना, पुष्पदन्तका वापस आकर सारा वृत्तान्त शिवसे निवेदित करना ९ ५२ ३३. शंखचूडसे युद्धके लिये अपने गणोंके साथ भगवान् शिवका प्रस्थान. ९ ५५ ३४. तुलसीसे विदा लेकर शंखचूडका युद्धके लिये ससैन्य पुष्पभद्रा नदीके तटपर पहुँचना ९ ५८ ३५. शंखचूडका अपने एक बुद्धिमान् दूतको शंकरके पास भेजना, दूत तथा शिवकी वार्ता, शंकरका सन्देश लेकर दूतका वापस शंखचूडके पास आना.. ९ ६० ३६. शंखचूडको उद्देश्यकर देवताओंका दानवोंके साथ महासंग्राम. ९ ६४ ३७. शंखचूडके साथ कार्तिकेय आदि महावीरोंका युद्ध ९ ६७ ३८. श्रीकालीका शंखचूडके साथ महान् युद्ध, आकाशवाणी सुनकर कालीका शिवके पास आकर युद्धका वृत्तान्त बताना ९ ७० ३ ९. शिव और शंखचूडके महाभयंकर युद्धमें शंखचूडके सैनिकोंके संहारका वर्णन ९ ७३ ४०. शिव और शंखचूडका युद्ध, आकाशवाणीद्वारा शंकरको युद्धसे विरत करना, विष्णुका ब्राह्मणरूप धारणकर शंखचूडका कवच माँगना, कवचहीन शंखचूडका भगवान् शिवद्वारा वध, सर्वत्र हर्षोल्लास ९ ७७ ४१. शंखचूडका रूप धारणकर भगवान् विष्णुद्वारा तुलसीके शीलका हरण, तुलसीद्वारा विष्णुको पाषाण होनेका शाप देना, शंकरजीद्वारा तुलसीको सान्त्वना, शंख, तुलसी, गण्डकी एवं शालग्रामकी उत्पत्ति तथा माहात्म्यकी कथा. ९ ८० ४२. अन्धकासुरकी उत्पत्तिकी कथा, शिवके वरदानसे हिरण्याक्षद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें प्राप्त करना, हिरण्याक्षद्वारा पृथ्वीको पाताललोकमें ले जाना, भगवान् विष्णुद्वारा वाराहरूप धारणकर हिरण्याक्षका वधकर पृथ्वीको यथास्थान स्थापित करना.... ९ ८६ ४३. हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्मासे वरदान पाकर उसका अत्याचार, भगवान् नृसिंहद्वारा उसका वध और प्रह्लादको राज्यप्राप्ति. ९९ १ ४४. अन्धकासुरकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे अनेक वरोंकी प्राप्ति, त्रिलोकीको जीतकर उसका स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, मन्त्रियोंद्वारा पार्वतीके सौन्दर्यको सुनकर मुग्ध हो शिवके पास सन्देश भेजना और शिवका उत्तर सुनकर क्रुद्ध हो युद्धके लिये उद्योग करना. ९९ ६ ४५. अन्धकासुरका शिवकी सेनाके साथ युद्ध....... .... १००४ ४६. भगवान् शिव और अन्धकासुरका युद्ध, अन्धककी मायासे उसके रक्तसे अनेक अन्धकगणोंकी उत्पत्ति, शिवकी प्रेरणासे विष्णुका कालीरूप धारणकर दानवोंके रक्तका पान करना, शिवद्वारा अन्धकको

पृष्ठ 16

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( १२ ) अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या अपने त्रिशूलमें लटका लेना, अन्धककी स्तुतिसे प्रसन्न हो शिवद्वारा उसे गाणपत्य पद प्रदान करना १०१० ४७. शुक्राचार्यद्वारा युद्धमें मरे हुए दैत्योंको संजीवनी-विद्यासे जीवित करना, दैत्योंका युद्धके लिये पुनः उद्योग, नन्दीश्वरद्वारा शिवको यह वृत्तान्त बतलाना, शिवकी आज्ञासे नन्दीद्वारा युद्धस्थलसे शुक्राचार्यको शिवके पास लाना, शिवद्वारा शुक्राचार्यको निगलना १०१६ ४८. शुक्राचार्यकी अनुपस्थितिसे अन्धकादि दैत्योंका दुखी होना, शिवके उदरमें शुक्राचार्यद्वारा सभी लोकों तथा अन्धकासुरके युद्धको देखना और फिर शिवके शुक्ररूपमें बाहर निकलना, शिव - पार्वतीका उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकारकर विदा करना........ १०२१ ४ ९. शुक्राचार्यद्वारा शिवके उदरमें जपे गये मन्त्रका वर्णन, अन्धकद्वारा भगवान् शिवकी नामरूपी स्तुति - प्रार्थना, भगवान् शिवद्वारा अन्धकासुरको जीवनदानपूर्वक गाणपत्य पद प्रदान करना.... १०२५ ५०. शुक्राचार्यद्वारा काशीमें शुक्रेश्वर लिंगकी स्थापनाकर उनकी आराधना करना, मूर्त्यष्टक स्तोत्रसे उनका स्तवन, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी-विद्या प्रदान करना और ग्रहोंके मध्य प्रतिष्ठित करना १०२ ९ ५१. प्रह्लदकी वंशपरम्परामें बलिपुत्र बाणासुरकी उत्पत्तिकी कथा, शिवभक्त बाणासुरद्वारा ताण्डव नृत्यके प्रदर्शनसे शंकरको प्रसन्न करना, वरदानके रूपमें शंकरका बाणासुरकी नगरीमें निवास करना, शिव - पार्वतीका विहार, पार्वतीद्वारा बाणपुत्री ऊषाको वरदान.. १०३४ ५२. अभिमानी बाणासुरद्वारा भगवान् शिवसे युद्धकी याचना, बाणपुत्री ऊषाका रात्रिके समय स्वप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा योगबल से अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, अन्तः पुरमें अनिरुद्ध और ऊषाका मिलन तथा द्वारपालोंद्वारा यह अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या समाचार बाणासुरको बताना. १०३ ९ ५३. क्रुद्ध बाणासुरका अपनी सेनाके साथ अनिरुद्धपर आक्रमण और उसे नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके स्तवनद्वारा अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना.... १०४४ ५४. नारदजीद्वारा अनिरुद्धके बन्धनका समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणासुरकी सेनाका संहार करना. १०४८ ५५. भगवान् कृष्ण तथा बाणासुरका संग्राम, श्रीकृष्णद्वारा बाणकी भुजाओंका काटा जाना, सिर काटनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको शिवका रोकना और उन्हें समझाना, बाणका गर्वापहरण, श्रीकृष्ण और बाणासुरकी मित्रता, ऊषा - अनिरुद्धको लेकर श्रीकृष्णका द्वारका आना. १०५३ ५६. बाणासुरका ताण्डवनृत्यद्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अनेक मनोऽभिलषित वरदानोंकी प्राप्ति, बाणासुरकृत शिवस्तुति..... १०५८ ५७. महिषासुरके पुत्र गजासुरकी तपस्या तथा ब्रह्माद्वारा वरप्राप्ति, उन्मत्त गजासुरद्वारा अत्याचार, उसका काशीमें आना, देवताओंद्वारा भगवान् शिवसे उसके वधकी प्रार्थना, शिवद्वारा उसका वध और उसकी प्रार्थनासे उसका चर्म धारणकर ' कृत्तिवासा ' नामसे विख्यात होना एवं कृत्तिवासेश्वर लिंगकी स्थापना करना.... १०६० ५८. काशीके व्याघ्रेश्वर लिंग - माहात्म्यके सन्दर्भमें दैत्य दुन्दुभिनिर्ह्रादके वधकी कथा. १०६५ ५ ९. काशीके कन्दुकेश्वर शिवलिंगके प्रादुर्भावमें पार्वतीद्वारा विदल एवं उत्पल दैत्योंके वधकी कथा, रुद्रसंहिताका उपसंहार तथा इसका माहात्म्य. १०६ ९ श्रीशिवमहापुराणनवाहपारायणक्रमः दिवसाः विश्रामस्थलानि | अध्याययोगसंख्या प्रथमेऽहनि रुद्रसंहितायाः सतीखण्डस्य सप्तमाध्यायपर्यन्तम् ५ ९ द्वितीयेऽहनि रुद्रसंहितायाः पार्वतीखण्डस्य पञ्चदशाध्यायपर्यन्तम् ५१ तृतीयेऽहनि रुद्रसंहितायाः कुमारखण्डस्य दशमाध्यायपर्यन्तम् ५० चतुर्थेऽहनि रुद्रसंहितायाः युद्धखण्डस्य एकचत्वारिंशदध्यायपर्यन्तम् ५१ पञ्चमेऽहनि शतरुद्रसंहितायाः त्रयस्त्रिंशदध्यायपर्यन्तम् ५१ षष्ठेऽहनि कोटिरुद्रसंहितायाः त्रिचत्वारिंशदध्यायपर्यन्तम् ५२. सप्तमेऽहनि सम्पूर्णा उमासंहिता ५१ अष्टमेऽहनि वायवीयसंहितायाः पूर्वखण्डस्य अष्टाविंशाध्यायपर्यन्तम् ५१ अवशिष्टा वायवीयसंहिता ४८ ४६४

पृष्ठ 17

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ॐ नमः शिवाय ॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण माहात्म्य अथ प्रथमोऽध्यायः शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर शौनक उवाच

हे हे सूत महाप्राज्ञ सर्वसिद्धान्तवित् प्रभो ।

आख्याहि मे कथासारं पुराणानां विशेषतः ॥

सदाचारश्च सद्भक्तिर्विवेको वर्धते कथम् ।

स्वविकारनिरासश्च सज्जनैः क्रियते कथम् ॥

जीवाश्चासुरतां प्राप्ताः प्रायो घोरे कलाविह ।

तस्य संशोधने किं हि विद्यते परमायनम् ॥

यदस्ति वस्तु परमं श्रेयसां श्रेय उत्तमम् ।

पावनं पावनानां च साधनं तद्वदाधुना ॥

येन तत्साधनेनाशु शुध्यत्यात्मा विशेषतः ।

शिवप्राप्तिर्भवेत्तात सदा निर्मलचेतसः ॥

सूत उवाच

धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल श्रवणप्रीतिलालसः ।

अतो विचार्य सुधिया वच्मि शास्त्रं महोत्तमम् ॥

सर्वसिद्धान्तनिष्पन्नं भक्त्यादिकविवर्धनम् ।

शिवतोषकरं दिव्यं शृणु वत्स रसायनम् ॥

कालव्यालमहात्रासविध्वंसकरमुत्तमम् शैवं पुराणं परमं शिवेनोक्तं पुरा मुने ॥ सूतजीका उन्हें शिवमहापुराणकी महिमा सुनाना श्रीशौनकजी बोले- हे महाज्ञानी सूतजी! सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता हे प्रभो! मुझसे पुराणोंकी १ कथाओंके सारतत्त्वका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये ॥१ ॥

सदाचार, भगवद्भक्ति और विवेककी वृद्धि कैसे होती है तथा साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम - क्रोध २ आदि मानसिक विकारोंका निवारण करते हैं? ॥ २ ॥

इस घोर कलियुगमें जीव प्रायः आसुर स्वभावके ३ हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध ( दैवी सम्पत्तिसे युक्त ) बनानेके लिये सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? ॥ ३ ॥

आप इस समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन ४ बताइये, जो कल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट एवं परम मंगलकारी हो तथा पवित्र करनेवाले उपायोंमें भी सर्वोत्तम पवित्रकारक उपाय हो ॥४ ॥

तात! वह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे ५ शीघ्र ही अन्त: करणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा उससे निर्मल चित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवकी प्राप्ति हो जाय ॥५ ॥

सूतजी बोले- मुनिश्रेष्ठ शौनक! आप धन्य हैं; आपके हृदयमें पुराण - कथा सुननेके प्रति विशेष ६ प्रेम एवं लालसा है, इसलिये मैं शुद्ध बुद्धिसे विचारकर परम उत्तम शास्त्रका वर्णन करता हूँ ॥ ६ ॥

वत्स! सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तसे सम्पन्न, ७ भक्ति आदिको बढ़ानेवाले, भगवान् शिवको सन्तुष्ट करनेवाले तथा कानोंके लिये रसायनस्वरूप दिव्य पुराणका श्रवण कीजिये ॥ ७ ॥

यह उत्तम शिवपुराण कालरूपी सर्पसे प्राप्त होनेवाले महान् त्रास का विनाश करनेवाला है । हे ८ मुने! पूर्वकालमें शिवजीने इसे कहा था । गुरुदेव

पृष्ठ 18

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१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ सनत्कुमारस्य मुनेरुपदेशात् परादरात् । व्यासजीने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर कलियुगके व्यासेनोक्तं तु संक्षेपात् कलिजानां हिताय च एतस्मादपरं किञ्चित्पुराणाच्छैवतो मुने न विद्यते मनःशुद्धयै कलिजानां विशेषतः जन्मान्तरे भवेत् पुण्यं महद्यस्य सुधीमतः तस्य प्रीतिर्भवेत्तत्र महाभाग्यवतो मुने

एतच्छिवपुराणं हि परमं शास्त्रमुत्तमम् ।

शिवरूपं क्षितौ ज्ञेयं सेवनीयं च सर्वथा ॥

पठनाच्छ्रवणादस्य भक्तिमान्नरसत्तमः ।

सद्यः शिवपदप्राप्तिं लभते सर्वसाधनात् ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन काङ्क्षितं पठनं नृभिः ।

तथास्य श्रवणं प्रेम्णा सर्वकामफलप्रदम् ॥

पुराणश्रवणाच्छम्भोर्निष्पापो जायते नरः ।

भुक्त्वा भोगान् सुविपुलान् शिवलोकमवाप्नुयात् ॥

राजसूयेन यत्पुण्यमग्निष्टोमशतेन च ।

तत् पुण्यं लभते शम्भोः कथाश्रवणमात्रतः ॥

ये शृण्वन्ति मुने शैवं पुराणं शास्त्रमुत्तमम् ।

ते मनुष्या न मन्तव्या रुद्रा एव न संशयः ॥

शृण्वतां तत् पुराणं हि तथा कीर्तयतां च तत् ।

पादाम्बुजरजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः ॥

गन्तुं निःश्रेयसं स्थानं येऽभिवाञ्छन्ति देहिनः ।

शैवं पुराणममलं भक्त्या शृण्वन्तु ते सदा ॥

सदा श्रोतुं यद्यशक्तो भवेत् स मुनिसत्तम ।

नियतात्मा प्रतिदिनं शृणुयाद्वा मुहूर्तकम् ॥

यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तो मानवो भवेत् ।

पुण्यमासादिषु मुने शृणुयाच्छिवपुराणकम् ॥

॥ ९ प्राणियोंके कल्याणके लिये बड़े आदरसे संक्षेपमें इस पुराणका प्रतिपादन किया है ॥८ - ९ ॥ । हे मुने! विशेष रूपसे कलियुगके प्राणियोंकी ॥ १० चित्तशुद्धिके लिये इस शिवपुराणके अतिरिक्त कोई अन्य साधन नहीं है ॥१० ॥

। हे मुने! जिस बुद्धिमान् मनुष्यके पूर्वजन्मके बड़े ॥ ११ पुण्य होते हैं, उसी महाभाग्यशाली व्यक्तिकी इस पुराणमें प्रीति होती है ॥ ११ ॥

यह शिवपुराण परम उत्तम शास्त्र है । इसे इस १२ भूतलपर भगवान् शिवका वाङ्मय स्वरूप समझना चाहिये और सब प्रकारसे इसका सेवन करना चाहिये ॥ १२ ॥

इसके पठन और श्रवणसे शिवभक्ति पाकर १३ श्रेष्ठतम स्थितिमें पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही शिवपदको प्राप्त कर लेता है । इसलिये सम्पूर्ण यत्न करके मनुष्योंने इस पुराणके अध्ययनको अभीष्ट १४ साधन माना है और इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी सम्पूर्ण वांछित फलोंको देनेवाला है ॥ १३-१४ ॥ भगवान् शिवके इस पुराणको सुननेसे मनुष्य १५ सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा बड़े - बड़े उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करके [ अन्तमें ] शिवलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥

राजसूययज्ञ और सैकड़ों अग्निष्टोमयज्ञोंसे जो १६ पुण्य प्राप्त होता है, वह भगवान् शिवकी कथाके सुननेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ॥१६ ॥

हे मुने! जो लोग इस श्रेष्ठ शास्त्र शिवपुराणका १७ श्रवण करते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं समझना चाहिये; वे रुद्रस्वरूप ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७ ॥

इस पुराणका श्रवण और कीर्तन करनेवालोंके चरण-१८ कमलकी धूलिको मुनिगण तीर्थ ही समझते हैं ॥ १८ ॥

जो प्राणी परमपदको प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सदा भक्तिपूर्वक इस निर्मल शिवपुराणका श्रवण १ ९ करना चाहिये ॥१ ९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! यदि मनुष्य सदा इसे सुननेमें समर्थ २० न हो, तो उसे प्रतिदिन स्थिर चित्तसे एक मुहूर्त भी इसको सुनना चाहिये । हे मुने! यदि मनुष्य प्रतिदिन सुननेमें भी अशक्त हो, तो उसे किसी पवित्र महीनेमें २१ इस शिवपुराणका श्रवण करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥

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अ ० १ ] माहात्म्य १५

मुहूर्तं वा तदर्थं वा तदर्थं वा क्षणं च वा ।

ये शृण्वन्ति पुराणं तन्न तेषां दुर्गतिर्भवेत् ॥

तत्पुराणं च शृण्वानः पुरुषो यो मुनीश्वर ।

स निस्तरति संसारं दग्ध्वा कर्ममहाटवीम् ॥

यत्पुण्यं सर्वदानेषु सर्वयज्ञेषु वा मुने ।

शम्भोः पुराणश्रवणात्तत्फलं निश्चलं भवेत् ॥

विशेषतः कलौ कलौ शैवपुराणश्रवणादृते ॥ परो धर्मो न पुंसां हि मुक्तिसाधनकृन्मुने ॥

पुराणश्रवणं शम्भोर्नामसङ्कीर्तनं तथा ।

कल्पद्रुमफलं सम्यङ् मनुष्याणां न संशयः ॥

कलौ दुर्मेधसां पुंसां धर्माचारोज्झितात्मनाम् ।

हिताय विदधे शम्भुः पुराणाख्यं सुधारसम् ॥

एकोऽजरामरः स्याद्वै पिबन्नेवामृतं पुमान् ।

शम्भोः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम् ॥

सदा सेव्या सदा सेव्या सदा सेव्या विशेषतः ।

एतच्छिवपुराणस्य कथा परमपावनी ॥

एतच्छिवपुराणस्य कथाश्रवणमात्रतः ।

किं ब्रवीमि फलं तस्य शिवश्चित्तं समाश्रयेत् ॥

चतुर्विंशतिसाहस्त्रो ग्रन्थोऽयं सप्तसंहितः ।

भक्तित्रिकसुसम्पूर्णः शृणुयात्तं परादरात् ॥

विद्येश्वरसंहिताद्या द्वितीया रुद्रसंहिता ।

तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका ॥

पञ्चम्युमासंहितोक्ता षष्ठी कैलाससंहिता । सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता इह जो लोग एक मुहूर्त, उसका आधा, उसका भी २२ आधा अथवा क्षणमात्र भी इस पुराणका श्रवण करते हैं, उनकी दुर्गति नहीं होती ॥२२ ॥

हे मुनीश्वर! जो पुरुष इस शिवपुराणकी कथाको २३ सुनता है, वह सुननेवाला पुरुष कर्मरूपी महावनको जलाकर संसारके पार हो जाता है ॥ २३ ॥

हे मुने! सभी दानों और सभी यज्ञोंसे जो पुण्य २४ मिलता है, वह फल भगवान् शिवके इस पुराणको सुननेसे निश्चल हो जाता है ॥२४ ॥

हे मुने! विशेषकर इस कलिकालमें तो शिवपुराणके २५ श्रवणके अतिरिक्त मनुष्योंके लिये मुक्तिदायक कोई अन्य श्रेष्ठ साधन नहीं है ॥ २५ ॥

शिवपुराणका श्रवण और भगवान् शंकरके २६ नामका संकीर्तन -दोनों ही मनुष्योंको कल्पवृक्षके समान सम्यक् फल देनेवाले हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥

कलियुगमें धर्माचरणसे शून्य चित्तवाले दुर्बुद्धि २७ मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् शिवने अमृतरसस्वरूप शिवपुराणकी उद्भावना की है ॥२७ ॥

अमृतपान करनेसे तो केवल अमृतपान करनेवाला २८ ही मनुष्य अजर - अमर होता है, किंतु भगवान् शिवका यह कथामृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर - अमर कर देता है ॥२८ ॥

इस शिवपुराणकी परम पवित्र कथाका विशेष २ ९ रूपसे सदा ही सेवन करना चाहिये, करना ही चाहिये, करना ही चाहिये । इस शिवपुराणकी कथाके श्रवणका क्या फल कहूँ? इसके श्रवणमात्रसे भगवान् ३० सदाशिव उस प्राणीके हृदयमें विराजमान हो जाते हैं ॥ २ ९ -३० ॥ यह [ शिवपुराण नामक ] ग्रन्थ चौबीस हजार ३१ श्लोकोंसे युक्त है । इसमें सात संहिताएँ हैं । मनुष्यको चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे भली - भाँति सम्पन्न हो बड़े आदरसे इसका श्रवण करे ॥ ३१ ॥

पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रुद्रसंहिता, ३२ तीसरी शतरुद्रसंहिता, चौथी कोटिरुद्रसंहिता और पाँचवीं उमासंहिता कही गयी है; छठी कैलाससंहिता और सातवीं वायवीय - संहिता - इस प्रकार इसमें सात ॥ ३३ | संहिताएँ हैं ॥ ३२-३३ ॥

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१६ ससप्तसंहितं दिव्यं पुराणं शिवसंज्ञकम् वरीवर्ति ब्रह्मतुल्यं सर्वोपरि गतिप्रदम् ॥ एतच्छिवपुराणं हि सप्तसंहितमादरात् । परिपूर्णं पठेद्यस्तु स जीवन्मुक्त उच्यते

पुमानज्ञानतस्तावद् भ्रमतेऽस्मिन्भवे मुने ।

यावत्कर्णगतं नास्ति पुराणं शैवमुत्तमम् ॥

किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैश्च भ्रमावहैः ।

शैवं पुराणमेकं हि मुक्तिदानेन गर्जति ॥

एतच्छिवपुराणस्य कथा भवति यद्गृहे ।

तीर्थभूतं हि तद् गेहं वसतां पापनाशनम् ॥

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।

कलां शिवपुराणस्य नार्हन्ति खलु षोडशीम् ॥

तावत् स प्रोच्यते पापी पापकृन्मुनिसत्तम ।

यावच्छिवपुराणं हि न शृणोति सुभक्तितः ॥

गङ्गाद्याः पुण्यनद्यश्च सप्तपुर्यो गया तथा ।

एतच्छिवपुराणस्य समतां यान्ति न क्वचित् ॥

नित्यं शिवपुराणस्य श्लोकं श्लोकार्धमेव च ।

स्वमुखेन पठेद्भक्त्या यदीच्छेत् परमां गतिम् ॥

एतच्छिवपुराणं यो वाचयेदर्थतोऽनिशम् ।

पठेद्वा प्रीतितो नित्यं स पुण्यात्मा न संशयः ॥

अन्तकाले हि यश्चैनं शृणुयाद्भक्तितः सुधीः ।

सुप्रसन्नो महेशानस्तस्मै यच्छति स्वं पदम् ॥

एतच्छिवपुराणं यः पूजयेन्नित्यमादरात् ।

स भुक्त्वेहाखिलान् कामानन्ते शिवपदं लभेत् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । सात संहिताओंसे युक्त यह दिव्य शिवपुराण ३४ परब्रह्म परमात्माके समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करनेवाला है ॥ ३४ ॥

जो मनुष्य सात संहिताओंवाले इस ॥ ३५ शिवपुराणको आदरपूर्वक पूरा पढ़ता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ ३५ ॥

हे मुने! जबतक इस उत्तम शिवपुराणको सुननेका ३६ सुअवसर नहीं प्राप्त होता, तबतक अज्ञानवश प्राणी इस संसार - चक्रमें भटकता रहता है ॥ ३६ ॥

भ्रमित कर देनेवाले अनेक शास्त्रों और पुराणोंके ३७ श्रवणसे क्या लाभ है, जबकि एक शिवपुराण ही मुक्ति प्रदान करनेके लिये गर्जन कर रहा है ॥ ३७ ॥

जिस घरमें इस शिवपुराणकी कथा होती है, वह ३८ घर तीर्थस्वरूप ही है और उसमें निवास करनेवालोंके पाप यह नष्ट कर देता है ॥ ३८ ॥

हजारों अश्वमेधयज्ञ और सैकड़ों वाजपेययज्ञ ३ ९ शिवपुराणकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते ॥ ३ ९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! कोई अधम प्राणी जबतक भक्तिपूर्वक ४० शिवपुराणका श्रवण नहीं करता, तभीतक उसे पापी कहा जा सकता है ॥ ४० ॥

गंगा आदि पवित्र नदियाँ, [ मुक्तिदायिनी ] सप्त ४१ पुरियाँ तथा गयादि तीर्थ इस शिवपुराणकी समता कभी नहीं कर सकते ॥ ४१ ॥

जिसे परमगतिकी कामना हो, उसे नित्य ४२ शिवपुराणके एक श्लोक अथवा आधे श्लोकका ही स्वयं भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये ॥४२ ॥

जो निरन्तर अर्थानुसन्धानपूर्वक इस शिवपुराणको ४३ बाँचता है अथवा नित्य प्रेमपूर्वक इसका पाठमात्र करता है, वह पुण्यात्मा है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३ ॥

जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष अन्तकालमें भक्तिपूर्वक ४४ इस पुराणको सुनता है, उसपर अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् महेश्वर उसे अपना पद ( धाम ) प्रदान करते हैं ॥ ४४ ॥

जो प्रतिदिन आदरपूर्वक इस शिवपुराणका पूजन करता है, वह इस संसारमें सम्पूर्ण भोगोंको भोगकर ४५ । अन्तमें भगवान् शिवके पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४५ ॥