शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 1001–1010
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता पादप्रहारैरशनिप्रकाशै-रुन्मथ्य सैन्यानि निशाचराणाम् । मार्तंडकोटिप्रतिमेन पश्चात् सुदर्शनेनाद्भुतचंडतेजाः ॥ ४५ हिरण्यनेत्रस्य शिरो ज्वलन्तं
चिच्छेद दैत्यांश्च ददाह दुष्टान् ।
ततः प्रहृष्टो दितिजेन्द्रराज-स्तमन्धकं तत्र स चाभ्यषिञ्चत् ॥ ४६
स्वस्थानमागत्य ततो धरित्रीं दंष्ट्राङ्कुरेणोद्धरतः प्रहृष्टः । भूमिं च पातालतलान्महात्मा पुपोष भागं त्वथ पूर्वकं तु ॥ ४७ देवैः समस्तैर्मुनिभिः प्रहृष्टै-रभिष्टुतः पद्मभुवा च तेन । ययौ स्वलोकं हरिरुग्रकायो वराहरूपस्तु सुकार्यकर्ता ॥ ४८ हिरण्यनेत्रेऽथ हतेऽसुरेशे वराहरूपेण सुरेण सद्यः । देवाः समस्ता मुनयश्च सर्वे परे च जीवाः सुखिनो बभूवुः ॥ ४ ९ । ( युद्धखण्ड ) ९९ १ निशाचरोंकी सेनाओंको मथकर करोड़ों समान जाज्वल्यमान सूर्योंके अपने सुदर्शनसे अद्भुत तथा प्रचण्ड तेजवाले विष्णुने हिरण्याक्षके तेजस्वी सिरको काट दिया और दैत्योंको जला भी दिया । हिरण्याक्षके मर जानेपर उन्होंने प्रसन्न होकर अन्धकको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ४४–४६ ॥ इस प्रकार महात्मा विष्णु पातालतलसे पृथ्वीका उद्धारकर अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे पृथ्वीको पुनः अपने स्थानपर प्रतिष्ठितकर परम प्रसन्न हो गये और पूर्वकी भाँति उसकी रक्षा करने लगे । प्रसन्न हुए समस्त देवता, मुनि तथा ब्रह्माजीने उनकी स्तुति की । उसके बाद उग्र शरीरवाले तथा उत्तम कार्य करनेवाले वराहरूपधारी विष्णु अपने लोकको चले गये ॥ ४७-४८ ॥ इस प्रकार वराहरूप विष्णुदेवके द्वारा दैत्यराज हिरण्याक्षके मारे जानेसे सभी देवता, मुनि तथा अन्य सभी जीव सुखी हो गये ॥४ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे हिरण्याक्षवधो नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें हिरण्याक्षवधवर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्मासे वरदान पाकर उसका अत्याचार, भगवान् नृसिंहद्वारा उसका व्यास उवाच सनत्कुमार सर्वज्ञ हते तस्मिन्सुरद्रुहि । | किमकार्षीत्ततस्तस्य ज्येष्ठ भ्राता महासुरः ॥ १ | कुतूहलमिति
श्रोतुं ममास्तीह मुनीश्वर ।
। तच्छ्रावय कृपा नमोऽस्तु ते ॥ २
कृत्वा ब्रह्मपुत्र ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य व्यासस्य स मुनीश्वरः । | सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ ३ वध और प्रह्लादको राज्यप्राप्ति व्यासजी बोले- हे सर्वज्ञ! हे सनत्कुमार! देवताओंसे द्रोह करनेवाले उस हिरण्याक्षके मार दिये जानेपर उसके ज्येष्ठ भ्राता महान् असुर [ हिरण्यकशिपु ] -ने क्या किया? हे मुनीश्वर! मुझे इस वृत्तान्तको सुननेके लिये महान् कौतूहल हो रहा है । हे ब्रह्मपुत्र! कृपा करके मुझे उसे सुनाइये, आपको । नमस्कार है॥१-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- व्यासजीके वचनको सुनकर शिवके चरणकमलोंका स्मरण करके कहने सनत्कुमार / लगे - ॥३ ॥
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९९ २ सनत्कुमार उवाच भ्रातर्येवं विनिहते हरिणा क्रोडमूर्तिना । हिरण्यकशिपुर्व्यास पर्यतप्यद्रुषा शुचा ततः प्रजानां कदनं विधातुं कदनप्रियान् । निर्दिदेशाऽसुरान्वीरान्हरिवैरप्रियो हि सः
अथ ते भर्तृसंदेशमादाय शिरसाऽसुराः ।
देवप्रजानां कदनं विदधुः कदनप्रियाः ॥
ततो विप्रकृते लोकेऽसुरैस्तैर्दुष्टमानसैः ।
दिवं देवाः परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिताः ॥
हिरण्यकशिपुर्भ्रातुः संपरेतस्य दुःखितः ।
कृत्वा करोदकादीनि तत्कलत्राद्यसान्त्वयत् ॥
ततः स दैत्यराजेन्द्रो ह्यजेयमजरामरम् ।
आत्मानमप्रतिद्वंद्वमेकराज्यं व्यधित्सत ॥
स तेपे मंदरद्रोण्यां तपः परमदारुणम् ।
ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादांगुष्ठाश्रितावनिः ॥
तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवाः सर्वे बलान्विताः ।
दैत्यान्सर्वान्विनिर्जित्य स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥
तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः ।
तिर्यगूर्ध्वमधोलोकानतपद्विष्वगीरितः ॥
तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रह्मलोकं ययुः सुराः ।
धात्रे विज्ञापयामासुस्तत्तपोविकृताननाः ॥
अथ विज्ञापितो देवैर्व्यास तैरात्मभूर्विधिः ।
परीतो भृगुदक्षाद्यैर्ययौ दैत्येश्वराश्रमम् ॥
प्रताप्य लोकानखिलांस्ततोऽसौ समागतं पद्मभवं ददर्श । वरं हि दातुं तमुवाच धाता
वरं वृणीष्वेति पितामहोऽपि ।
निशम्य वाचं मधुरां विधातु-र्वचोऽब्रवीदेवममूढबुद्धिः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ सनत्कुमार बोले— हे व्यास! वराहरूप | करनेवाले [ भगवान् ] विष्णुके द्वारा भाई हिरण्याक्षका धारण ॥ ४ वध कर दिये जानेपर हिरण्यकशिपु क्रोध एवं शोकसे सन्तप्त हो उठा । इसके बाद विष्णुसे वैरमें रुचि रखनेवाले उस हिरण्यकशिपुने प्रजाओंको कष्ट देनेके ॥ ५ लिये निर्दयी वीर असुरोंको आज्ञा दी ॥ ४-५ ॥ तब वे निर्दयी असुर अपने स्वामीकी आज्ञा ६ प्राप्तकर देवताओं तथा प्रजाओंको कष्ट देने लगे ॥६ ॥
इस प्रकार जब दुष्ट बुद्धिवाले उन असुरोंने ७ लोकका उत्पीड़न प्रारम्भ किया, तब देवतालोग स्वर्ग छोड़कर अलक्षित होकर पृथ्वीपर घूमने लगे ॥७ ॥
हिरण्यकशिपुने भी भाईके मर जानेसे दुःखित ८ होकर उसे तिलांजलि आदि प्रदानकर उसकी स्त्री आदिको सान्त्वना प्रदान की ॥ ८ ॥
इसके बाद वह दैत्यराज अपनेको अजर, ९ अमर, अजेय और प्रतिद्वन्द्वीरहित जानकर एकच्छत्र राज्य करने लगा ॥९ ॥
वह मन्दराचलकी गुफामें पैरके अँगूठेमात्रको पृथ्वीपर १० टेककर दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखते हुए अत्यन्त कठोर तप करने लगा ॥१० ॥
इस प्रकार जब वह असुर तप कर रहा था, तब ११ सभी बलवान् देवताओंने समस्त दैत्योंको जीतकर अपना - अपना पद पुनः प्राप्त कर लिया ॥ ११ ॥
[ तपस्या करते हुए ] उस हिरण्यकशिपुके सिरसे १२ धूमसहित तपोमय अग्नि प्रकट हुई । वह तिरछे, ऊपर, | नीचे तथा चारों ओरसे फैलकर सभी लोकोंको तपाने । लगी । उससे तप्त होकर देवगण स्वर्गलोक छोड़कर १३ ब्रह्मलोक चले गये । उसकी तपस्यासे विकृत मुखवा । उन देवताओंने ब्रह्माजीसे सारा वृत्तान्त कहा ॥ १२-१३ ॥ हे व्यास! उन देवताओंके द्वारा इस प्रकार १४ । कहे जानेपर स्वयम्भू ब्रह्माजी भृगु, दक्ष आदिको । गये | अपने साथ लेकर उस दैत्येन्द्रके आश्रमपर | उसके बाद अपनी तपस्यासे सारे लोकोंको सन्तप्तकर उस दैत्यराजने वर देनेके लिये आये हुए ब्रह्माजीको लो । । देखा । पितामह ब्रह्माने भी उससे कहा- वर माँग यह | तब विधाताका मधुर वचन सुनकर वह बुद्धिमान् १५ | वचन कहने लगा- ॥ १४-१५ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता ( हिरण्यकशिपुरुवाच मृत्योर्भयं मे भगवन्प्रजेश पितामहाभून्न कदापि देव । शस्त्रास्त्रपाशाशनिशुष्कवृक्ष-गिरीन्द्रतोयाग्निरिपुप्रहारैः ॥१६ देवैश्च दैत्यैर्मुनिभिश्च सिद्धैः त्वत्सृष्टजीवैर्बहुवाक्यतः किम् । स्वर्गे धरण्यां दिवसे निशायां वर्ध्व नाप्यधतः प्रजेश ॥ १७ सनत्कुमार उवाच तस्यैतदीदृग्वचनं निशम्य दैत्येन्द्र तुष्टोऽस्मि लभस्व सर्वम् । प्रणम्य विष्णुं मनसा तमाह दयान्वितोऽसाविति पद्मयोनिः ॥ १८ अलं तपस्ते परिपूर्णकामः समाः सहस्राणि च षण्णवत्यः । उत्तिष्ठ राज्यं कुरु दानवानां श्रुत्वा गिरं तत्सुमुखो बभूव ॥ १ ९ राज्याभिषिक्तः प्रपितामहेन त्रैलोक्यनाशाय मतिं चकार । उत्साद्य धर्मान् सकलान्प्रमत्तो जित्वाहवे सोऽपि सुरान्समस्तान् ॥ २० ततो भयाद् इन्द्रमुखाश्च देवाः पितामहाज्ञां समवाप्य सर्वे । उपद्रुता दैत्यवरेण जाताः क्षीरोदधिं यत्र हरिस्तु शेते ॥ २१ आराधयामासुरतीव विष्णुं स्तुत्वा वचोभिः सुखदं हि मत्वा । निवेदयामासुरथो प्रसन्नं दुःखं स्वकीयं सकलं हि ते ते ॥ २२ श्रुत्वा तदीयं सकलं हि दुःखं तुष्टो रमेशः प्रददौ वरांस्तु । उत्थाय तस्माच्छयनादुपेन्द्रो निजानुरूपैर्विविधैर्वचोभिः ॥२३ आश्वास्य देवानखिलान्मुनीन्वा उवाच वैश्वानरतुल्यतेजाः । दैत्यंहनिष्ये प्रसभं सुरेशाः प्रयात धामानि निजानि तुष्टाः ॥ २४ 2222 Front युद्धखण्ड ) ९९ ३ हिरण्यकशिपु बोला- हे भगवन्! हे प्रजेश! हे पितामह! हे देव! शस्त्र, अस्त्र, पाश, वज्र, सूखे | वृक्ष, पहाड़, जल, अग्नि तथा शत्रुओंके प्रहारसे और देव, दैत्य, मुनि, सिद्ध तथा आपके द्वारा रचित सृष्टिके किसी भी जीवसे मुझे मृत्युका भय न हो, हे प्रजेश! अधिक क्या कहूँ, स्वर्गमें, पृथ्वीपर, रात एवं दिनमें, ऊपर - नीचे कहीं भी मेरी मृत्यु न हो ॥ १६-१७ ॥ सनत्कुमार बोले — उस दैत्यके इस प्रकारके | वचनको सुनकर मनमें विष्णुको प्रणाम करके दयासे युक्त होकर ब्रह्माजी उससे बोले - हे दैत्येन्द्र! मैं । [ तुमपर ] प्रसन्न हूँ, तुम सब कुछ प्राप्त करो ॥ १८ ॥
[ हे दैत्येन्द्र! ] अब तुम तपस्या करना छोड़ो; क्योंकि तुम्हारा मनोरथ परिपूर्ण हो गया । उठो, छियानबे हजार वर्षतक दानवोंका राज्य करो । यह वाणी सुनकर वह हर्षित हो गया । उसके अनन्तर ब्रह्माजीके द्वारा अभिषिक्त वह दैत्य प्रमत्त होकर सभी धर्मोंको नष्ट करके और देवताओंको भी युद्धमें जीतकर तीनों लोकोंको नष्ट करनेका विचार करने लगा ॥ १ ९ -२० ॥ तब उस दैत्यराजसे पीड़ित हुए इन्द्रादि सभी देवता भयसे व्याकुल हो पितामहकी आज्ञा प्राप्त करके क्षीरसागरमें गये, जहाँ विष्णु शयन करते हैं ॥ २१ ॥
उन्होंने विष्णुको अपने लिये सुखदायक जानकर अनेक प्रकारके वचनोंसे उनकी स्तुति करके प्रसन्न हुए विष्णुसे अपना सारा दुःख निवेदित किया ॥२२ ॥
तब प्रसन्न विष्णुने उनका समस्त दुःख सुनकर उन्हें अनेक वरदान दिये और शय्यासे उठकर अग्निके समान तेजस्वी उन्होंने अपने अनुरूप नाना प्रकारकी वाणियोंसे आश्वासन देते हुए कहा कि हे देवताओ! आपलोग प्रसन्न होकर अपने - अपने स्थानको जायँ; मैं उस दैत्यका वध करूँगा ॥ २३-२४ ॥ अवश्य
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९९ ४ श्रुत्वा रमेशस्य वचः सुरेशाः शक्रादिकास्ते निखिलाः सुतुष्टाः ययुः स्वधामानि हिरण्यनेत्रा-नुजं च मत्वा निहतं मुनीश आश्रित्य रूपं जटिलं करालं दंष्ट्रायुधं तीक्ष्णनखं सुनासम् हं नारं सुविदारितास्यं मार्तंडकोटिप्रतिमं सुघोरम् युगांतकालाग्निसमप्रभावं जगन्मयं किं बहुभिर्वचोभिः अस्ते रवौ सोऽपि हि गच्छतीशो गतोऽसुराणां नगरीं महात्मा ॥ कृत्वा च युद्धं प्रबलैः स दैत्यै-र्हत्वाथ तान्दैत्यगणान्गृहीत्वा । बभ्राम तत्राद्भुतविक्रमश्च बभंज तांस्तानसुरान्नृसिंहः ॥ दृष्टः स दैत्यैरतुलप्रभाव-स्ते रेभिरे ते हि तथैव सर्वे । सिंहं च तं सर्वमयं निरीक्ष्य प्रह्लादनामा दितिजेन्द्रपुत्रः । उवाच राजानमयं मृगेन्द्रो जगन्मयः किं समुपागतश्च ॥ प्रह्लाद उवाच एष प्रविष्टो भगवाननन्तो नृसिंहमात्रो नगरं त्वदन्तः । निवृत्य युद्धाच्छरणं प्रयाहि पश्यामि सिंहस्य करालमूर्त्तिम् ॥ यस्मान्न योद्धा भुवनत्रयेऽपि कुरुष्व राज्यं विनमन्मृगेन्द्रम् । श्रुत्वा स्वपुत्रस्य वचो दुरात्मा तमाह भीतोऽसि किमत्र पुत्र ॥ उक्त्वेति पुत्रं दितिजाधिनाथो दैत्यर्षभान्वीरवरान्स राजा । गृह्णन्तु वै सिंहममुं भवन्तो वीरा विरूपभ्रुकुटीक्षणं श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ हे मुनीश! विष्णुका वचन । आदि सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हो सुनकर इन्द्र गये और | हिरण्याक्षके भाईको मरा हुआ मानकर अपने - अपने ॥ २५ लोकको चले गये ॥२५ ॥
तदनन्तर महाजटायुक्त, विकराल, तीखे । । दाँतस्वरूप आयुधवाले, तीक्ष्ण नखोंवाले नासिकावाले, पूर्णतः खुले हुए मुखवाले,, करोड़ों सुन्दर ॥ २६ । सूर्यके समान जाज्वल्यमान, अत्यन्त भयंकर, अधिक क्या कहें प्रलयकालीन अग्निके समान प्रभाववाले | वे महात्मा विष्णु जगन्मय नृसिंहका रूप धारण करके सूर्यके अस्त होते समय असुरोंकी नगरीमें २७ | गये ॥ २६-२७ ॥ अद्भुत पराक्रमवाले नृसिंह प्रबल दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए उन्हें मारकर शेष दैत्योंको पकड़कर घुमाने लगे और उन्होंने उन असुरोंको पटककर मार २८ डाला ॥ २८ ॥
दैत्योंने उन अतुल प्रभाववाले नृसिंहको देखा और उन्होंने पुनः युद्ध करना प्रारम्भ किया । हिरण्यकशिपुके प्रह्लाद नामक पुत्रने नृसिंहको देखकर राजासे कहा — यह मृगेन्द्र जगन्मय विष्णु तो नहीं हैं? ॥२ ९ ॥ २ ९ प्रह्लाद बोले — ये भगवान् अनन्त नृसिंहका रूप धारणकर आपके नगरमें प्रविष्ट हुए हैं, अतः आप युद्ध छोड़कर उनकी शरणमें जाइये, मैं इस सिंहकी विकराल मूर्तिको देख रहा हूँ ॥ ३० ॥
[ हे दैत्येन्द्र! ] इनसे बढ़कर इस जगत्में ३० और कोई योद्धा नहीं है, अतः इनकी प्रार्थनाकर आप राज्य करें । तब अपने पुत्रकी बात सुनकर | दुरात्मा उससे बोला- हे पुत्र! क्या तुम डर गये हो? ॥३१ ॥
३१ पुत्रसे इस प्रकार कहकर दैत्योंके स्वामी उस | राजाने महावीर श्रेष्ठ दैत्योंको आज्ञा दी कि | वीरो! इस विकृत भृकुटी तथा नेत्रवाले नृसिंहको पकड़ लो ॥३२ ॥
तस्याज्ञया दैत्यवरास्ततस्ते तु ॥ ३२ तब उसकी आज्ञासे पकड़नेकी इच्छावा वे | दैत्यश्रेष्ठ उस सिंहकी ओर जाने लगे, किंतु ग्रहीतुकामा विविशुर्मृगेन्द्रम् । । क्षणभरमें इस हो गये. जैसे रूपकी प्रकार दग्ध 2223 Shivmaha mer Section 33 1 Back
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता ( क्षणेन दग्धाः शलभा इवाग्निं रूपाभिलाषात्प्रविविक्षवो वै ॥३३ दैत्येषु दग्धेष्वपि दैत्यराज-श्चकार युद्धं स मृगाधिपेन । शस्त्रैः समग्रैरखिलैस्तथास्त्रैः शक्त्यष्र्ष्टिपाशांकुशपावकाद्यैः ॥३४ संयुध्यतोरेव तयोर्जगाम ब्राह्मं दिनं व्यास हि शस्त्रपाण्योः । प्रवीरयोर्वीररवेण गर्जतोः परस्परं क्रोधसुयुक्तचेतसोः ॥ ३५ ततः स दैत्यः सहसा बहूंश्च कृत्वा भुजान् शस्त्रयुतान्निरीक्ष्य । नृसिंहरूपं प्रययौ मृगेन्द्रं संयुध्यमानं सहसा समन्तात् ॥ ३६ ततः सुयुद्धं त्वतिदुःसहं तु शस्त्रैः समस्तैश्च तथाखिलास्त्रैः । कृत्वा महादैत्यवरो नृसिंहं क्षयं गतैः शूलधरोऽभ्युपायात् ॥ ३७ ततो गृहीतः स मृगाधिपेन भुजैरनेकैर्गिरिसारवद्भिः निधाय जानौ स स भुजान्तरेषु नखांकुरैर्दानवमर्मभिद्भिः ॥ ३८ नखास्त्रहृत्पद्ममसृग्विमिश्र-मुत्पाद्य जीवाद्विगतः क्षणेन । त्यक्तस्तदानीं स तु काष्ठभूतः पुनः पुनश्चूर्णितसर्वगात्रः ॥ ३ ९ तस्मिन्हते देवरिप प्रसन्नः
प्रह्लादमामंत्र्य कृतप्रणामम् ।
राज्येऽभिषिच्याद्भुतवीर्यविष्णु-स्ततः प्रयातो गतिमप्रतर्क्याम् ॥ ४०
ततोऽतिहृष्टाः सकलाः सुरेशाः प्रणम्य विष्णुं दिशि विप्र तस्याम् । ययुः स्वधामानि पितामहाद्याः कृतस्वकार्यं भगवन्तमीड्यम् ॥ ४१ प्रवर्णितंत्वन्धकजन्म रुद्राद् हिरण्यनेत्रस्य मृतिर्वराहात् । नृसिंहतस्तत्सहजस्य नाशः प्रह्लादराज्याप्तिरिति प्रसंगात् ॥ ४२ 2223 Shi tion 33 2 Front युद्धखण्ड ) ९९ ५ अभिलाषावाले पतिंगे अग्निके समीप जाते ही जल जाते हैं । उन दैत्योंके दग्ध हो जानेपर वह दैत्यराज स्वयं सभी अस्त्र, शस्त्र, शक्ति, पाश, अंकुश, अग्नि आदिके द्वारा नृसिंहसे संग्राम करने लगा ॥ ३३-३४ ॥ हे व्यास! इस प्रकार शस्त्र धारणकर गर्जनाकर क्रोधपूर्वक परस्पर युद्ध करते हुए उन दोनों महावीरोंका ब्रह्माके एक दिनके बराबर समय व्यतीत हो गया ॥३५ ॥
उसके बाद अनेक भुजाओंको धारणकर चारों ओरसे युद्ध करते हुए उन नृसिंहको देखकर वह दैत्य पुनः उनसे सहसा भिड़ गया ॥ ३६ ॥
तब वह महादैत्य नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे अत्यन्त दुःसह संग्राम करके उन शस्त्रास्त्रोंके क्षीण हो जानेपर शूल लेकर नृसिंहपर झपट पड़ा ॥ ३७ ॥
इसके बाद नृसिंहने पर्वतके समान अपनी अनेक कठोर भुजाओंसे उसे पकड़ लिया और भुजाओंके मध्य दोनों जानुओंपर उस दानवको रखकर मर्मभेदी नखांकुरोंसे उसके हृत्कमलको फाड़कर उसे लहूलुहान करके उसके सभी अंगोंको चूर्ण कर डाला । प्राणोंसे रहित हो जानेपर वह उस समय काष्ठके समान हो गया ॥ ३८-३९ ॥ उस देवशत्रुके मारे जानेपर अद्भुत पराक्रमवाले विष्णु प्रसन्न होकर प्रणाम किये हुए प्रह्लादको बुलाकर उसे राज्यपर अभिषिक्त करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो गये । हे विप्र! तब अत्यन्त हर्षित पितामहादि समस्त देवता अपना कार्य पूर्ण कर चुके स्तुत्य भगवान् विष्णुको एवं उस दिशाकी ओर प्रणामकर अपने - अपने धामको चले गये । [ हे व्यास! ] मैंने प्रसंगवश रुद्रसे अन्धकका जन्म, वराहसे हिरण्याक्षकी मृत्यु, नृसिंहसे उसके भाई हिरण्यकशिपुका वध एवं प्रह्लादकी राज्यप्राप्ति– । इन सबका वर्णन किया ॥ ४०-४२ ॥
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९९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ शृणु त्विदानीं द्विजवर्य मत्तोऽ- हे द्विजवर्य! अब आप शिवजीसे न्धकप्रभावं भवकृत् प्रलब्धम् । । अन्धकके पराक्रम, शिवसे उसके युद्ध तथा प्राप्त हरेण युद्धं खलु तस्य पश्चाद् | उसकी शिवजीसे गणाधिपत्यकी प्राप्तिको बादमें गणाधिपत्यं गिरिशस्य तस्य ॥ ४३ । सुनिये ॥ ४३ ॥ मुझसे
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे गणाधिपत्यप्राप्त्यंधक-जन्महिरण्यनेत्रहिरण्यकशिपुवधवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें गणाधिपत्यप्राप्ति-अन्धकजन्म - हिरण्यनेत्र - हिरण्यकशिपुवधवर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः अन्धकासुरकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे अनेक वरोंकी प्राप्ति, त्रिलोकीको जीतकर उसका स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, मन्त्रियोंद्वारा पार्वतीके सौन्दर्यको सुनकर मुग्ध हो शिवके पास सन्देश क्रुद्ध हो युद्धके सनत्कुमार उवाच ततो हिरण्याक्षसुतः कदाचि-त्संश्रावितो नर्मयुतैर्मदान्धैः । तैर्भ्रातृभिः संप्रयुतो विहारे किमंध राज्येन तवाद्य कार्यम् ॥ १ हिरण्यनेत्रस्तु बभूव मूढः कलिप्रियं नेत्रविहीनमेव । यो लब्धवांस्त्वां विकृतं विरूपं घोरैस्तपोभिर्गिरिशं स त्वं न भागी खलु राज्यकस्य किमन्यजातोऽपि लभेत विचार्यतां तद्भवतैव नूनं वयं तु तद्भागिन एव सनत्कुमार उवाच तेषां तु वाक्यानि निशम्य तानि विचार्य बुद्ध्या स्वयमेव तान् शान्तयित्वा विविधैर्वचोभिः प्रसाद्य ॥ २
राज्यम् ।
सत्यम् ॥ ३
दीनः ।
गतस्त्वरण्यं निशि निर्जनं तु ॥
वर्षायुतं तत्र तपश्चचार ४। जजाप जाप्यं विधृतैकपादः । । आहारहीनो नियमोर्ध्वबाहुः कर्त्तुं न शक्यं हि सुरासुरैर्यत् ॥ ५ । भेजना और शिवका उत्तर सुनकर लिये उद्योग करना सनत्कुमार बोले- किसी समय जब हिरण्याक्षपुत्र अन्धक भाइयोंके साथ खेल रहा था, तब क्रीड़ामें आसक्त तथा मदान्ध उसके भाइयोंने [ उपहास करते हुए ] उससे कहा- हे अन्धक! तुम्हें राज्यसे क्या प्रयोजन? ॥ १ ॥
[ तुम्हारा पिता ] हिरण्याक्ष निश्चय ही बड़ा मूर्ख था, जिसने घोर तपस्याके द्वारा शिवजीको प्रसन्नकर तुम्हारे जैसा कलहप्रिय, अन्धा, विकृत एवं कुरूप पुत्र प्राप्त किया । तुम निश्चय ही राज्यके भागी नहीं हो । क्या दूसरेसे उत्पन्न हुआ व्यक्ति | राज्यका अधिकारी बन सकता है? तुम्हीं विचार करो, उसके अधिकारी तो सचमुच हमलोग ही हैं ॥ २-३ ॥ सनत्कुमार बोले — उनके उन वचनोंको वह | बुद्धिसे स्वयं विचार करके दीन हो गया और उन्हें नाना प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना देकर रात में ही अकेले निर्जन वनको चला गया । वहाँ निराहार रहकर वह एक पैरपर खड़ा हो दोनों भुजाओंको उठाकर दस हजार वर्षपर्यन्त घोर तप एवं मन्त्रका जप करने लगा, जो देवता एवं राक्षसोंसे भी सम्भव नहीं था । 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_33_2_Back
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( प्रज्वाल्य वह्निं स्म जुहोति गात्र-मांसं सरक्तं खलु वर्षमात्रम् । तीक्ष्णेन शस्त्रेण निकृत्य देहात् समन्त्रकं प्रत्यहमेव स्नाय्वस्थिशेषं कुणपं तदासौ हुत्वा ॥ ६ क्षयं गतं शोणितमेव सर्वम् । यदास्य मांसानि न सन्ति देहं प्रक्षेप्तुकामस्तु हुताशनाय ॥ ७ ततः स दृष्टस्त्रिदशालयैर्जनैः सुविस्मितैर्भीतियुतैः समस्तैः । अथामरैः शीघ्रतरं प्रसादितो बभूव धाता नुतिभिर्नुतो हि ॥ ८ निवारयित्वाथ पितामहस्तं ह्युवाच त्वं चाद्य वरं वृणीष्व । यस्याप्तिकामस्तव सर्वलोके सुदुर्लभं दानव तं गृहाण ॥ ९ स पद्मयोनेस्तु वचो निशम्य प्रोवाच दीनः प्रणतस्तु दैत्यः । यैर्निष्ठुरैमें प्रहृतं तु राज्यं प्रह्लादमुख्या मम सन्तु भृत्याः ॥ १०
अंधस्य दिव्यं हि तथास्तु चक्षु-रिन्द्रादयो मे करदा भवन्तु ।
मृत्युस्तु माभून्मम देवदैत्य-गंधर्वयक्षोरगमानुषेभ्यः ॥ ११ ।
नारायणाद्वा दितिजेन्द्रशत्रोः सर्वाज्जनात्सर्वमयाच्च शर्वात् । श्रुत्वा वचस्तस्य सुदारुणं तत् सुशंकितः पद्मभवस्तमाह ॥ १२ ब्रह्मोवाच दैत्येन्द्र सर्वं भविता तदेतद् विनाशहेतुं च गृहाण किंचित् । यस्मान्न जातो न जनिष्यते वा यो न प्रविष्टो मुखमन्तकस्य ॥ १३ अत्यन्तदीर्घ जीवितं तु खलु भवादृशाः सत्पुरुषाः त्यजन्तु । एतद्वचः सानुनयं निशम्य पुनः स दैत्यः ॥ १४ | पितामहात्प्राह युद्धखण्ड ) ९९ ७ वह अग्नि जलाकर तीक्ष्ण शस्त्रसे अपने शरीरसे मांस काटकर वर्षपर्यन्त प्रतिदिन मन्त्रपूर्वक रक्तयुक्त मांसका होम करने लगा ॥४-६ ॥ जब उसके शरीरमें मांस नहीं रह गया, केवल स्नायु एवं अस्थिमात्र शेष रह गया, समस्त रक्त नष्ट हो गया, तब उसने अपने शरीरको ही अग्निमें डाल देनेका विचार किया । उसके अनन्तर सभी देवता अत्यन्त विस्मित एवं भयभीत होकर उसकी ओर देखने लगे, तब उन देवताओंने ब्रह्माजीको नमस्कारकर अनेक स्तुतियोंसे शीघ्र ही उन्हें प्रसन्न किया । ब्रह्माने उसे तपस्यासे विरत करके कहा - हे दानव! आज तुम वर माँगो, समस्त लोकमें जो दुर्लभ है एवं जिसकी प्राप्तिके लिये तुम इच्छुक हो, उस वरको मुझसे प्राप्त कर लो ॥ ७ – ९ ॥ ब्रह्माके इस वचनको सुनकर दीन एवं विनम्र होकर उस दैत्यने कहा- हे ब्रह्मन्! प्रह्लाद आदि मेरे जिन निष्ठुर भाइयोंने मेरा राज्य छीन लिया है, वे मेरे सेवक हों ॥ १० ॥
मुझ अन्धेको दिव्य नेत्रकी प्राप्ति हो जाय एवं इन्द्रादि देवता मुझे कर प्रदान करें । मेरी मृत्यु देव, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प, राक्षस, मनुष्य, दैत्योंके शत्रु श्रीनारायण, आदि किसी प्राणी तथा सर्वमय शंकरसे भी न हो । उसके उस कठिन वचनको सुनकर ब्रह्माजी शंकित हो उससे कहने लगे- ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे दैत्येन्द्र! यह सब पूर्ण होगा, किंतु अपनी मृत्युका कोई कारण अवश्य वरण करो; क्योंकि न तो ऐसा हुआ है और न होगा, जो कालके मुखमें प्रविष्ट न हुआ हो ॥१३ ॥
अतः आप - जैसे सत्पुरुष अत्यन्त दीर्घ जीवनकी इच्छाका त्याग कर दें । ब्रह्माके इस अनुनयपूर्ण वचनको सुनकर वह दैत्य पुनः कहने लगा— ॥ १४ ॥
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९९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ अंधक उवाच अन्धक बोला- [ हे ब्रह्मदेव! ] तीनों कालोंमें कालत्रये याश्च भवन्ति नार्यः जितनी भी श्रेष्ठ, मध्यम तथा कनिष्ठ स्त्रियाँ श्रेष्ठाश्च मध्याश्च तथा कनिष्ठाः । उन सभीमें जो रत्नस्वरूप सर्वश्रेष्ठ हैं, तासां च मध्ये खलु रत्नभूता । मेरी माताके समान हो । हे भगवन्! हो, वही ममापि नित्यं जननीव काचित् ॥ १५ हे स्वयम्भू! कायेन वाचा मनसाप्यगम्या नारी नृलोकस्य च दुर्लभा या । तां कामयानस्य ममास्तु नाशो दैत्येन्द्रभावाद्भगवान्स्वयंभूः ॥ १६ वाक्यं तदाकर्ण्य स पद्मयोनिः सुविस्मितः शंकरपादपद्मम् 1 सस्मार संप्राप्य निदेशमाशु शंभोस्तु तं प्राह ततोऽन्धकं वै ॥१७ ब्रह्मोवाच यत्कांक्षसे दैत्य वरांस्तु ते वै सर्वं भवत्येव वचः सकामम् । उत्तिष्ठ दैत्येन्द्र लभस्व कामं सदैव वीरैस्तु कुरुष्व युद्धम् ॥ १८ श्रुत्वा तदेतद्वचनं मुनीश विधातुराशु प्रणिपत्य भक्त्या । लोकेश्वरं हाटकनेत्रपुत्रः स्नाय्वस्थिशेषस्तु तमाह देवम् ॥ १ ९ अंधक उवाच कथं विभो वैरिबलं प्रविश्य ह्यनेन देहेन करोमि युद्धम् । स्नाय्वस्थिशेषं कुरु मांसपुष्टं करेण पुण्येन च मां स्पृशाद्य ॥ २० सनत्कुमार उवाच श्रुत्वा वचस्तस्य स पद्मयोनिः करेण संस्पृश्य च तच्छरीरम् । ।
गतः सुरेन्द्रैः सहितः स्वधाम ।
संपूज्यमानो मुनिसिद्धसंघैः ॥ २१
संस्पृष्टमात्रः स च दैत्यराजः सम्पूर्णदेहो बलवान् बभूव ।
संजातनेत्रः सुभगो बभूव ।
हृष्टः स्वमेवं नगरं विवेश ॥ २२ ।
| जो मनुष्यलोकके लिये दुर्लभ तथा मन वाणी और शरीरसे सर्वथा अगम्य हो, जब मैं, दैत्येन्द्र-भावसे उसकी कामना करूँ, तब मेरा नाश हो | जाय ॥ १५-१६ ॥ उसका वचन सुनकर ब्रह्माजीने आश्चर्य-चकित हो शिवके चरणकमलोंका स्मरण किया और शम्भुकी आज्ञा प्राप्त करके उस अन्धकसे शीघ्र कहा— ॥ १७ ॥
ब्रह्माजी बोले – हे दैत्य! तुम जो भी अभिलाषा करते हो, तुम्हारी वे सभी कामनाएँ पूर्ण होंगी । हे दैत्येन्द्र! अपना अभीष्ट प्राप्त करो और वीरोंके साथ सदा युद्ध करो ॥१८ ॥
हे मुनीश्वर! ब्रह्माजीके ऐसे वचन सुनकर स्नायु तथा अस्थिमात्रशेष वह हिरण्याक्षपुत्र अन्धक ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन प्रभुसे कहने लगा – ॥१ ९ ॥ अन्धक बोला — हे विभो! मैं इस विकृत शरीरसे शत्रुओंकी सेनामें प्रविष्ट होकर किस प्रकार युद्ध कर सकता हूँ? अतः अपने पवित्र हाथसे मुझे स्पर्श कीजिये और स्नायु तथा अस्थिशेष इस शरीरको शीघ्र ही मांससे पुष्ट कर दीजिये ॥ २० ॥
सनत्कुमार बोले- उसका वचन सुनकर वे ब्रह्मा उसके शरीरका स्पर्श करके मुनियों तथा सिद्धोंसे पूजित होते हुए देवेश्वरोंके साथ अपने धामको चले गये ॥२१ ॥
ब्रह्माके स्पर्शमात्रसे ही वह दैत्यराज सम्पूर्ण शरीरवाला तथा बलसम्पन्न हो गया । वह नेत्रयुक्त तथा सुन्दर हो गया और प्रसन्न होकर अपने नगरमें प्रविष्ट हुआ ॥ २२ ॥
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( राज्यं सकलं च तस्मै उत्सृज्यप्रह्लादमुख्यास्त्वथ दानवेन्द्राः । तमागतं लब्धवरं च मत्वा भृत्या बभूवुर्वशगास्तु तस्य ॥ २३ ततोऽन्धकः स्वर्गमगाद्विजेतुं सेनाभियुक्तः सहभृत्यवर्गः 1 विजित्य देवान् प्रधने समस्तान् करप्रद वज्रधरं चकार ॥ २४ नागान्सुपर्णान्वरराक्षसांश्च
गंधर्वयक्षानपि मानुषांस्तु ।
गिरीन्द्रवृक्षान्समरेषु सर्वां-श्चतुष्पदः सिंहमुखान्विजिग्ये ॥ २५
त्रैलोक्यमेतद्धि चराचरं वै वशं चकारात्मनि संनियोज्य । ततोऽनुकूलानि सुदर्शनानि नारीसहस्त्राणि बहूनि गत्वा ॥२६ रसातले चैव तथा धरायां त्रिविष्टपे याः प्रमदाः सुरूपाः । ताभिर्युतोऽन्येषु स पर्वतेषु रराम रम्येषु नदीतटेषु ॥ २७ क्रीडायमानः स तु मध्यवर्ती तासां प्रहर्षादथ दानवेन्द्रः । तत्पीतशिष्टानि पिबन्प्रवृत्त्यै दिव्यानि पेयानि सुमानुषाणि ॥ २८ अन्यानि दिव्यानि तु यद्रसानि फलानि पुष्पाणि सुगंधवंति । संप्राप्य यानानि सुवाहनानि मयेन सृष्टानि गृहोत्तमानि ॥ २ ९ पुष्पार्धधूपान्नविलेपनैश्च सुशोभितान्यद्भुतदर्शनैश्च संक्रीडमानस्य गतानि तस्य वर्षायुतानीह तथान्धकस्य ॥ ३० | जानातिकिंचित्र शुभं परत्र यदात्मनः सौख्यकरं भवेद्धि । | सदान्धको दैत्यवरः मदांधबुद्धिः कृतदुष्टसंग: ॥ ३१ युद्धखण्ड ) ९९९ तदनन्तर प्रह्लाद आदि सभी दैत्येन्द्र उसे वर प्राप्तकर आया हुआ समझकर सम्पूर्ण राज्य उसके लिये छोड़कर उसके अधीन होकर उसके सेवक | हो गये ॥ २३ ॥
तदनन्तर अन्धकने अपने भृत्यों एवं सेनाओंके साथ विजयकी इच्छासे स्वर्गकी ओर प्रस्थान किया और वहाँ युद्धमें समस्त देवताओंको जीतकर वज्रको धारण करनेवाले इन्द्रको भी करदाता बना दिया । उसने नागों, पक्षियों, बड़े - बड़े राक्षसों, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, पर्वतों, वृक्षों एवं सिंहादि समस्त पशुओंको भी युद्धमें जीत लिया ॥ २४-२५ ॥ उसने इस चराचर त्रैलोक्यपर अधिकार करके उसे अपने वशमें कर लिया । इसके बाद अपने | अनुकूल सुन्दर हजारों स्त्रियोंके साथ विहार करता हुआ पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गमें जितनी रूपवती स्त्रियाँ थीं, उनके साथ पर्वतों तथा मनोहर नदीतटों पर
वह रमण करने लगा ॥। २६-२७ ॥
उनके मध्यमें क्रीड़ा करता हुआ वह दैत्येन्द्र काम - प्रवृत्तिके लिये स्त्रियोंके पीनेसे बचे हुए दिव्य एवं मानुष पेयोंको प्रसन्नताके साथ पीता था ॥ २८ ॥
वह नाना प्रकारके दिव्य रस, फल, सुगन्धित पुष्प प्राप्त करके मय [ दानव ] -द्वारा निर्मित उत्तम गृहों तथा यानों एवं सुन्दर वाहनोंका सेवन करता | था ॥ २ ९ ॥ अद्भुत दर्शनवाले पुष्प, अर्घ्य, धूप, मिष्टान्न, अंगराग आदिसे युक्त हो क्रीड़ा करते हुए उस अन्धक दैत्यके उत्तम दस हजार वर्ष बीत गये ॥३० ॥
इस प्रकार भोग करते हुए उसे परलोकमें अपने कल्याण करनेवाले पुण्यका ज्ञान न रहा और वह मूर्ख दैत्यराज मदान्धबुद्धि होकर दुष्टोंके साथ निवास | करने लगा ॥३१ ॥
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१००० श्रीशिवमहापुराण अ ० ४४ ततः प्रमत्तस्तु सुतान्प्रधानान् इसके बाद वह महात्मा प्रमत्त होकर कुतर्कयुक्त कुतर्कवादैरभिभूय सर्वान् । । बातचीतसे अपने प्रधान पुत्रोंको तिरस्कृतकर चचार दैत्यैः सहितो महात्मा | वैदिक धर्मोंका विनाश करता हुआ दैत्योंके सभी विनाशयन्वैदिकसर्वधर्मान् ॥ ३२ विचरण करने लगा ॥ ३२ ॥ साथ
वेदान्द्विजान् वित्तमदाभिभूतो धनके अहंकारसे मदान्ध वह वेदों न मन्यते स्माप्यमरान्गुरूंश्च । देवताओं, ब्राह्मणों, रेमे तथा दैवगतो हतायुः स्वैरैरहोभिर्गमयन्वयश्च ततः कदाचिदगतवान्ससैन्यो बहुप्रयाता पृथिवीतलेऽस्मिन् अनेकसंख्या अपि वर्षकोट्यः हर्षित मंदरपर्वतं तु स्वर्णोपमां तत्र निरीक्ष्य शोभां बभ्राम सैन्यैः सह मानमत्तः क्रीडार्थमासाद्य च तं गिरीन्द्रं मतिं स वासाय चकार मोहात् ॥ शुभं दृढं तत्र पुरं स कृत्वा मुदा स्थितो दैत्यपतिः प्रभावात् । निवेशयामास पुनः क्रमेण अत्यद्भुतं मन्दरशैलसानौ ॥ दुर्योधनो वैधसहस्तिसंज्ञौ तन्मंत्रिणौ दानवसत्तमस्य । ते वै कदाचिगिरिसुस्थले ह नारीं सुरूपां ददृशुस्त्रयोऽपि ॥ ते शीघ्रगा दैत्यवरास्तु हर्षाद् द्रुतं महादैत्यपतिं समेत्य । ऊचुर्यथादृष्टमतीव प्रीत्या तथान्धकं वीरवरं हि सर्वे ॥ मंत्रिण ऊचुः गुहान्तरे ध्याननिमीलिताक्षो दैत्येन्द्र कश्चिन्मुनिरत्र दृष्टः । रूपान्वितश्चन्द्रकलार्द्धचूडः कटिस्थले बद्धगजेन्द्रकृत्तिः ॥ नागेन्द्रभोगावृतसर्वगात्रः कपालमालाभरणो जटालः । स शूलहस्तः शरतूणधारी तथा गुरुओंका अपमान करने लगा और | दैववश हतायु हो अपनी आयुको स्वेच्छाचारपूर्वक ॥ ३३ क्षीण करता हुआ रमण करने लगा ॥३३ ॥
। इस प्रकार इस पृथ्वीतलपर करोड़ों वर्ष निवास करते हुए वह [ अन्धक ] किसी समय हर्षित ॥ ३४ होकर अपनी सेनाके साथ मन्दराचलपर गया और वहाँकी स्वर्णिम शोभा देखकर मानमत्त हो सैनिकोंके । साथ घूमने लगा । वह क्रीडाके लिये उस पर्वतपर आकर मोहवश वहाँ निवास करनेका विचार करने ३५ लगा ॥ ३४-३५ ॥ उसने अपने पराक्रमसे प्रसन्नतापूर्वक मनोहर एवं दृढ़ नगरका निर्माणकर स्वयं उसके शिखरपर ३६ अपने निवासहेतु महासुन्दर भवन बनवाया ॥ ३६ ॥
उस दैत्येन्द्रके दुर्योधन, वैधस तथा हस्ती नामक मन्त्री थे । किसी समय उन तीनों मन्त्रियोंने उस पर्वतशिखरपर एक रूपवती सुन्दर स्त्रीको ३७ देखा ॥ ३७ ॥
शीघ्रगामी उन सभी दैत्योंने हर्षित होकर उस वीरवर दैत्येन्द्र अन्धकके समीप आकर जैसा देखा था, वैसा प्रेमपूर्वक कहा —॥३८ ॥
३८ मन्त्री बोले — हे दैत्येन्द्र! मन्दराचलकी | गुफामें ध्यानमें नेत्र बन्द किये हुए, रूपवान्, | चन्द्रकी आधी कलाको मस्तकपर धारण किये | तथा कटिप्रदेशमें व्याघ्रचर्म लपेटे हुए कोई मुनि ३ ९ दिखायी पड़े हैं ॥३ ९ ॥ उनके सारे शरीरमें भुजंग लिपटे हुए हैं, वे | सिरपर जटा तथा गलेमें कपालकी माला धारण किये | हुए हैं, हाथमें त्रिशूल लिये हुए, बाण तथा तरकस महाधनुष्मान्विधृताक्षसूत्र: ॥ ४० धारण किये हुए हैं महान् धनुष धारण किये हुए और ,