श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 991–1000

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( सनत्कुमार उवाच

नारायणो हि देवानां कार्यकर्ता सतां गतिः ।

शंखचूडस्य रूपेण रेमे तद्रामया सह ॥ २

तदेव शृणु विष्णोश्च चरितं प्रमुदावहम् ।

शिवशासनकर्तुश्च मातुश्च जगतां हरेः ॥ ३

रणमध्ये व्योमवचः श्रुत्वा देवेन शंभुना ।

प्रेरितः शंखचूडस्य गृहीत्वा कवचं परम् ॥ ४

विप्ररूपेण त्वरितं मायया निजया हरिः ।

जगाम शंखचूडस्य रूपेण तुलसीगृहम् ॥ ५

दुन्दुभिं वादयामास तुलसीद्वारसन्निधौ ।

जयशब्दं च तत्रैव बोधयामास सुन्दरीम् ॥ ६

तच्छ्रुत्वा चैव सा साध्वी परमानन्दसंयुता ।

राजमार्गं गवाक्षेण ददर्श परमादरात् ॥ ७

ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा कारयामास मंगलम् ।

द्रुतं चकार शृंगारं ज्ञात्वाऽऽयातं निजं पतिम् ॥ ८

अवरुह्य रथाद्विष्णुस्तद्देव्या भवनं ययौ ।

शंखचूडस्वरूपः स मायावी देवकार्यकृत् ॥ ९

दृष्ट्वा तं च पुरः प्राप्तं स्वकान्तं सा मुदान्विता ।

तत्पादौ क्षालयामास ननाम च रुरोद च ॥ १०

रत्नसिंहासने रम्ये वासयामास मंगलम् ।

ताम्बूलं च ददौ तस्मै कर्पूरादिसुवासितम् ॥ ११

अद्य मे सफलं जन्म जीवनं संबभूव ह ।

रणे गतं च प्राणेशं पश्यन्त्याश्च पुनर्गृहे ॥ १२

इत्युक्त्वा सकटाक्षं सा निरीक्ष्य सस्मितं मुदा ।

पप्रच्छ रणवृत्तांतं कान्तं मधुरया गिरा ॥ १३

तुलस्युवाच असंख्यविश्वसंहर्ता स देवप्रवरः प्रभुः ।१४

। त्रिदेवजनकः सोऽत्र त्रिगुणात्मा च निर्गुणः ।

भक्तेच्छया च हरिब्रह्माप्रवर्तकः ॥ १५

सगुणो युद्धखण्ड ) ९ ८१ सनत्कुमार बोले— [ हे व्यासजी! ] सज्जनोंकी रक्षा करनेवाले तथा देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेवाले भगवान् विष्णुने शंखचूडका रूप धारणकर उसकी स्त्रीके साथ रमण किया । जगन्माता पार्वती एवं शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले श्रीहरि विष्णुके आनन्ददायी उस चरित्रको सुनिये ॥ २-३ ॥ युद्धके मध्यमें आकाशवाणीको सुनकर भगवान् शिवजीसे प्रेरित हुए विष्णु शीघ्र अपनी मायासे ब्राह्मणका रूप धारणकर शंखचूडका कवच ग्रहण करके पुनः उस शंखचूडका रूप धारणकर तुलसीके घर गये । उन्होंने तुलसीके द्वारके पास दुन्दुभि बजायी और जयशब्दका उच्चारणकर उस सुन्दरीको जगाया ॥ ४–६ ॥ यह सुनकर वह साध्वी बहुत प्रसन्न हुई और अत्यन्त आदरपूर्वक खिड़कीसे राजमार्गकी ओर देखने लगी ॥७ ॥

उसने ब्राह्मणोंको बहुत - सा धन देकर मंगल कराया, तदनन्तर अपने पतिको आया जानकर शीघ्र श्रृंगार भी किया ॥८ ॥

शंखचूडके स्वरूपवाले तथा देवकार्य करनेवाले वे मायावी विष्णु रथसे उतरकर उस देवीके भवनमें गये॥९॥

तब अपने स्वामीको सामने आया देखकर प्रसन्नतासे युक्त होकर उसने उनका चरणप्रक्षालन किया, प्रणाम किया और वह रोने लगी ॥ १० ॥

उसने उन्हें रत्नके सिंहासनपर बैठाया और कपूरसुवासित ताम्बूल प्रदान किया ॥ ११ ॥

' आज मेरा जन्म एवं जीवन सफल हो गया, जो कि युद्धमें गये हुए अपने स्वामीको पुनः घरमें देख रही हूँ ' – ऐसा कहकर वह मुसकराती हुई प्रसन्नतापूर्वक तिरछी नजरोंसे स्वामीकी ओर देखकर मधुर • वाणीमें युद्धका समाचार पूछने लगी ॥ १२-१३ ॥ तुलसी बोली- हे प्रभो! असंख्य विश्वका संहार करनेवाले वे देवाधिदेव शंकर ही हैं, जिनकी आज्ञाका पालन ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता सबका करते हैं ॥ १४ ॥

वे तीनों देवताओंको उत्पन्न करनेवाले, त्रिगुणात्मक होते हुए निर्गुण तथा भक्तोंकी इच्छासे सगुण रूप धारण एवं विष्णुके भी प्रेरक हैं ॥ १५ ॥

करनेवाले ब्रह्मा

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९ ८२ कुबेरस्य प्रार्थनया गुणरूपधरो हरः कैलासवासी गणपः परब्रह्म सतां गतिः यस्यैकपलमात्रेण कोटिब्रह्मांडसंक्षयः विष्णुब्रह्मादयोऽतीता बहवः क्षणमात्रतः ॥

कर्तुं सार्द्धं च तेनैव समरं त्वं गतः प्रभो ।

कथं बभूव संग्रामस्तेन देवसहायिना ॥

कुशली त्वमहायातस्तं जित्वा परमेश्वरम् ।

कथं बभूव विजयस्तव ब्रूहि तदेव मे ॥

श्रुत्वेत्थं तुलसीवाक्यं स विहस्य रमापतिः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । कैलासवासी, गणोंके स्वामी, परब्रह्म ॥ १६ । सज्जनोंके रक्षक शिवजीने कुबेरकी प्रार्थनासे तथा रूप धारण किया था ॥ १६ ॥ सगुण

। जिनके एक पलमात्रमें करोड़ों ब्रह्माण्डोंका क्षय १७ हो जाता है तथा जिनके एक क्षणभरमें विष्णु एवं ब्रह्मा व्यतीत हो जाते हैं । हे प्रभो! उन्हींके साथ आप युद्ध करने गये थे । आपने उन देवसहायक सदाशिवके १८ साथ किस प्रकार संग्राम किया? ॥ १७-१८ ॥ आप उन परमेश्वरको जीतकर यहाँ सकुशल १ ९ लौट आये । हे प्रभो! आपकी विजय किस प्रकार हुई, उसे मुझे बताइये । तुलसीके इस प्रकारके वचनको सुनकर शंखचूडका रूप धारण किये हुए वे रमापति शंखचूडरूपधरस्तामुवाचामृतं वचः ॥२० हँसकर अमृतमय वचन कहने लगे —॥१ ९ -२० ॥ श्रीभगवानुवाच

यदाहं रणभूमौ च जगाम समरप्रियः ।

कोलाहलो महान् जातः प्रवृत्तोऽभून्महारणः ॥

देवदानवयोर्युद्धं संबभूव जयैषिणोः ।

दैत्याः पराजितास्तत्र निर्जरैर्बलगर्वितैः ॥

तदाहं समरं तत्राकार्षं देवैर्बलोत्कटैः ।

पराजिताश्च ते देवाः शंकरं शरणं ययुः ॥

रुद्रोऽपि तत्सहायार्थमाजगाम रणं प्रति ।

तेनाहं वै चिरं कालमयौत्सं बलदर्पितः ॥

आवयोः समरः कान्ते पूर्णमब्दं बभूव ह ।

नाशो बभूव सर्वेषामसुराणां च कामिनि ॥

प्रीतिं च कारयामास ब्रह्मा च स्वयमावयोः ।

देवानामधिकाराश्च प्रदत्ता ब्रह्मशासनात् ॥

मयागतं स्वभवनं शिवलोकं शिवो गतः ।

सर्वस्वास्थ्यमतीवाप दूरीभूतो ह्युपद्रवः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा जगतां नाथः शयनं च चकार ह ।

रेमे रमापतिस्तत्र रमया स तया मुदा ॥

सा साध्वी सुखसंभावाकर्षणस्य व्यतिक्रमात् ।

सर्वं वितर्कयामास कस्त्वमेवेत्युवाचसा ॥

श्रीभगवान् बोले- जब युद्धप्रिय मैं समरभूमिमें गया, उस समय महान् कोलाहल होने लगा और महाभयंकर २१ युद्ध प्रारम्भ हो गया । विजयकी कामनावाले देवता तथा दानव दोनोंका युद्ध होने लगा, उसमें बलसे दर्पित २२ देवताओंने दैत्योंको पराजित कर दिया ॥ २१-२२ ॥ उसके बाद मैंने बलवान् देवताओंके साथ २३ युद्ध किया और वे देवता पराजित होकर शंकरकी शरणमें पहुँचे ॥२३ ॥

रुद्र भी उनकी सहायताके लिये युद्धभूमिमें आये, २४ तब मैंने भी अपने बलके घमण्डसे उनके साथ बहुत कालतक युद्ध किया । हे प्रिये! इस प्रकार हम दोनोंका २५ युद्ध वर्षपर्यन्त होता रहा, जिसमें हे कामिनि! सभी । असुरोंका विनाश हो गया । तब स्वयं ब्रह्माजीने हम | दोनोंमें प्रीति करा दी और मैंने उनके कहनेसे देवताओंका २६ सारा अधिकार उन्हें सौंप दिया ॥ २४–२६ ॥ इसके बाद मैं अपने घर लौट आया और शिवजी २७ शिवलोकको चले गये । इस प्रकार सारा उपद्रव शान्त । हो गया और सब लोग सुखी हो गये ॥ २७ ॥

सनत्कुमार बोले- ऐसा कहकर जगत्पति | रमानाथने शयन किया और रमासे रमापतिके समान २८ प्रसन्नतासे उस स्त्रीके साथ रमण किया । उस साध्वी | रतिकालमें सुख भाव और आकर्षणमें भेद देखकर | सारी बातें जान, लीं और उसने कहा- तुम कौन २ ९ हो? ॥ २८-२९ ॥

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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( तुलस्युवाच

को वा त्वं वद मामाशु भुक्ताहं मायया त्वया ।

दूरीकृतं मत्सतीत्वमथ त्वां वै शपाम्यहम् ॥ ३०

सनत्कुमार उवाच तुलसीवचनं श्रुत्वा हरिः शापभयेन च । दधार लीलया ब्रह्मन्स्वमूर्तिं सुमनोहराम् ॥ ३१

तद् दृष्ट्वा तुलसी रूपं ज्ञात्वा विष्णुं तु चिह्नतः ।

पातिव्रत्यपरित्यागात् क्रुद्धा सा तमुवाच ह ॥ ३२

तुलस्युवाच

हे विष्णो ते दया नास्ति पाषाणसदृशं मनः ।

पतिधर्मस्य भंगेन मम स्वामी हतः खलु ॥ ३३

पाषाणसदृशस्त्वं च दयाहीनो यतः खलः ।

तस्मात्पाषाणरूपस्त्वं मच्छापेन भवाधुना ॥ ३४

ये वदन्ति दयासिन्धुं त्वां भ्रान्तास्ते न संशयः ।

भक्तो विनापराधेन परार्थे च कथं हतः ॥ ३५

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा तुलसी सा वै शंखचूडप्रिया सती ।

भृशं रुरोद शोकार्ता विललाप भृशं मुहुः ॥ ३६

ततस्तां रुदतीं दृष्ट्वा स विष्णुः परमेश्वरः ।

सस्मार शंकरं देवं येन संमोहितं जगत् ॥ ३७

ततः प्रादुर्बभूवाथ शंकरो भक्तवत्सलः ।

हरिणा प्रणतश्चासीत्संनुतो विनयेन सः ॥ ३८

| शोकाकुलं हरिं दृष्ट्वा विलपन्तीं च तत्प्रियाम् ॥ नयेन बोधयामास तं तां कृपणवत्सलाम् ॥ ३ ९ शंकर उवाच

मा रोदीस्तुलसि त्वं हि भुंक्ते कर्मफलं जनः ।

। सुखदुःखदो न कोऽप्यस्ति संसारे कर्मसागरे ॥ ४० ।

प्रस्तुतं शृणु निर्दुःखं शृणोतु सुमना हरिः ।

द्वयोः सुखकरं यत्तद् ब्रवीमि सुखहेतवे ॥ ४१ ।

युद्धखण्ड ) ९ ८३ तुलसी बोली- तुम मुझे शीघ्र बताओ कि तुम हो कौन? तुमने मेरे साथ कपट किया और मेरे सतीत्वको नष्ट किया है, अतः मैं तुमको शाप देती हूँ ॥ ३० ॥

सनत्कुमार बोले— [ हे व्यासजी! ] तुलसीका वचन सुनकर विष्णुने शापके भयसे लीलापूर्वक अपनी अत्यन्त मनोहर मूर्ति धारण कर ली ॥ ३१ ॥

उस रूपको देखकर और चिह्नसे उन्हें विष्णु | जानकर तथा उनसे पातिव्रतभंग होनेके कारण कुपित होकर वह तुलसी उनसे कहने लगी -॥३२ ॥

तुलसी बोली- हे विष्णो! आपमें थोड़ी - सी भी दया नहीं है, आपका मन पाषाणके समान है, | मेरे पातिव्रतको भंगकर आपने मेरे स्वामीका वध कर दिया ॥ ३३ ॥

आप पाषाणके समान अत्यन्त निर्दय एवं खल हैं, अतः मेरे शापसे आप इस समय पाषाण हो जाइये ॥ ३४ ॥

जो लोग आपको दयासागर कहते हैं, वे भ्रममें पड़े हैं, इसमें सन्देह नहीं है । आपने बिना अपराधके दूसरेके निमित्त अपने ही भक्तका वध क्यों करवाया? ॥ ३५ ॥

सनत्कुमार बोले – [ हे व्यासजी! ] ऐसा कहकर शंखचूडकी प्रिय पत्नी तुलसी शोकसे विकल हो रोने लगी और बार - बार बहुत विलाप करने लगी ॥ ३६ ॥

तब उसे रोती हुई देखकर परमेश्वर विष्णुने शिवका स्मरण किया, जिनसे संसार मोहित है ॥ ३७ ॥

तब भक्तवत्सल शंकर वहाँ प्रकट हो गये । श्रीविष्णुने उन्हें प्रणाम किया और बड़े विनयके साथ उनकी स्तुति की । विष्णुको शोकाकुल तथा शंखचूडकी पत्नीको विलाप करती हुई देखकर शंकरने नीतिसे विष्णुको तथा उस दुखियाको समझाया॥३८-३९ ॥ शिवजी बोले- हे तुलसी! मत रोओ, व्यक्तिको अपने कर्मका फल भोगना ही पड़ता है । इस कर्मसागर संसारमें कोई किसीको सुख अथवा दुःख देनेवाला नहीं है । अब तुम उपस्थित इस दुःखको दूर करनेका उपाय सुनो एवं विष्णु भी इसे सुनें । जो तुमदोनोंके लिये सुखकर है, उसे मैं तुमलोगोंके सुखके लिये बतलाता हूँ ॥ ४०-४१ ॥

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९ ८४ तपस्त्वया कृतं भद्रे तस्यैव तपसः फलम् तदन्यथा कथं स्याद्वै जातं त्वयि तथा च तत्

इदं शरीरं त्यक्त्वा च दिव्यदेहं विधाय च ।

रमस्व हरिणा नित्यं रमया सदृशी भव ॥

तवेयं तनुरुत्सृष्टा नदीरूपा भवेदिह ।

भारते पुण्यरूपा सा गण्डकीति च विश्रुता ॥

कियत्कालं महादेवि देवपूजनसाधने ।

प्रधानरूपा तुलसी भविष्यति वरेण मे ॥

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले तिष्ठ त्वं हरिसन्निधौ ।

भव त्वं तुलसीवृक्षो वरा पुष्पेषु सुन्दरि ॥

वृक्षाधिष्ठातृदेवी त्वं वैकुंठे दिव्यरूपिणी ।

सार्धं रहसि हरिणा नित्यं क्रीडां करिष्यसि ॥

नद्यधिष्ठातृदेवी या भारते बहुपुण्यदा ।

लवणोदस्य पत्नी सा हर्यंशस्य भविष्यसि ॥

हरिवै शैलरूपी च गंडकी तीरसंनिधौ । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । हे भद्रे! तुमने [ पूर्व समयमें ] तपस्या की थी, ॥ ४२ उसी तपस्याका यह फल प्राप्त हुआ है, तुम्हें विष्ण प्राप्त हुए हैं, वह अन्यथा कैसे हो सकता है? ॥ ४२ अब तुम इस शरीरको त्यागकर दिव्य शरीर ॥ ४३ धारणकर महालक्ष्मीके समान हो जाओ और विष्णुके साथ नित्य रमण करो । तुम्हारी यह छोड़ी हुई काया एक नदीके रूपमें परिवर्तित होगी और वह भारतमें ४४ पुण्यस्वरूपिणी गण्डकी नामसे विख्यात होगी । हे महादेवि! तुम मेरे वरदानसे बहुत समयतक देवपूजनके साधनके लिये प्रधानभूत तुलसी वृक्षरूपमें उत्पन्न ४५ होगी॥४३–४५ ॥ तुम स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल – तीनों लोकोंमें ४६ विष्णुके साथ निवास करो । हे सुन्दरि! तुम पुष्पवृक्षोंमें उत्तम तुलसी वृक्ष बन जाओ । तुम सभी वृक्षोंकी अधिष्ठात्री दिव्यरूपधारिणी देवीके रूपमें वैकुण्ठमें ४७ विष्णुके साथ एकान्तमें नित्यक्रीड़ा करोगी और भारतमें तुम गण्डकीके रूपमें रहोगी, वहाँपर भी नदियोंकी अधिष्ठात्री देवी होकर सभीको अत्यन्त ४८ पुण्य प्रदान करोगी तथा विष्णुके अंशभूत लवणसमुद्रकी पत्नी बनोगी॥४६–४८ ॥ भारतमें उसी गण्डकीके किनारे ये विष्णु भी संकरिष्यत्यधिष्ठानं भारते तव शापतः ॥ ४ ९ तुम्हारे शापसे पाषाणरूपमें स्थित रहेंगे । वहाँपर तीखे

तत्र कोट्यश्च कीटाश्च तीक्ष्णदंष्ट्रा भयंकराः ।

तच्छित्त्वा कुहरे चक्रं करिष्यंति तदीयकम् ॥

शालग्रामशिला सा हि तद्भेदादतिपुण्यदा ।

लक्ष्मीनारायणाख्यादिश्चक्रभेदाद्भविष्यति ॥

शालग्रामशिला विष्णोस्तुलस्यास्तव संगमः ।

सदा सादृश्यरूपा या बहुपुण्यविवर्द्धिनी ॥

तुलसीपत्रविच्छेदं शालग्रामे करोति यः ।

तस्य जन्मान्तरे भद्रे स्त्रीविच्छेदो भविष्यति ॥

तुलसीपत्रविच्छेदं शंखं हित्वा करोति यः ।

भार्याहीनो भवेत्सोऽपि रोगी स्यात्सप्तजन्मसु ॥

| दाँतवाले तथा भयंकर करोड़ों कीड़े उन शिलाओंको काटकर उसके छिद्रमें विष्णुके चक्रका निर्माण ५० करेंगे ॥ ४ ९ -५० ॥ उन कीटोंके द्वारा छिद्र की गयी शालग्राम-५१ | शिला अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाली होगी । चक्रोंके | भेदसे उन शिलाओंके लक्ष्मीनारायण आदि नाम होंगे ॥ ५१ ॥

उस शालग्रामशिलासे जो लोग तुझ तुलसीका ५२ संयोग करायेंगे, उन्हें अत्यन्त पुण्य प्राप्त होगा || परी हे भद्रे! जो शालग्रामशिलासे तुलसीपत्रको ५३ अलग करेगा, दूसरे जन्ममें उसका स्त्रीसे वियोग होगा ॥ ५३ ॥

जो शंखसे तुलसीपत्रका विच्छेद करेगा, वह सात ॥ ५४ जन्मपर्यन्त भार्याहीन रहेगा तथा रोगी होगा ॥ ५४

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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता शालग्रामश्च तुलसी शंखं चैकत्र एव हि । यो रक्षति महाज्ञानी स भवेच्छ्रीहरिप्रियः ॥ ५५

त्वं प्रियाः शंखचूडस्य चैकमन्वन्तरावधि ।

शंखेन सार्धं त्वद्भेदः केवलं दुःखदस्तव ॥ ५६

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा शंकरस्तत्र माहात्म्यमूचिवांस्तदा ।

शालग्रामशिलायाश्च तुलस्या बहुपुण्यदम् ॥ ५७

ततश्चान्तर्हितो भूत्वा मोदयित्वा हरिं च ताम् ।

जगाम स्वालयं शंभुः शर्मदो हि सदा सताम् ॥ ५८

इति श्रुत्वा वचः शंभोः प्रसन्ना तु तुलस्यभूत् ।

तद्देहं च परित्यज्य दिव्यरूपा बभूव ह ॥ ५ ९

प्रजगाम तया सार्द्धं वैकुंठं कमलापतिः ।

सद्यस्तद्देहजाता च बभूव गंडकी नदी ॥ ६०

शैलोऽभूदच्युतः सोऽपि तत्तीरे पुण्यदो नृणाम् ।

कुर्वति तत्र कीटाश्च छिद्रं बहुविधं मुने ॥ ६१

जले पतंति यास्तत्र शिलास्तास्त्वतिपुण्यदाः ।

स्थलस्था पिंगला ज्ञेयाश्चोपतापाय चैव हि ॥ ६२

इत्येवं कथितं सर्वं तव प्रश्नानुसारतः ।

चरितं पुण्यदं शंभोः सर्वकामप्रदं नृणाम् ॥ ६३

आख्यानमिदमाख्यातं विष्णुमाहात्म्यमिश्रितम् ।

भुक्तिमुक्तिप्रदं पुण्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६४ ।

( युद्धखण्ड ) ९ ८५ इस प्रकार जो महाज्ञानी शालग्रामशिला, तुलसी तथा शंखको एक स्थानपर रखेगा वह श्रीहरिका प्रिय होगा । तुम एक मन्वन्तरपर्यन्त, शंखचूडकी पत्नी रही, शंखचूडके साथ यह तुम्हारा वियोग केवल इसी समय तुम्हें दुःख देनेके लिये हुआ है ॥ ५५-५६ ॥ सनत्कुमार बोले- [ हे व्यास! ] ऐसा कहकर शंकरजीने शालग्रामशिला तथा तुलसीके महान् पुण्य देनेवाले माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ५७ ॥

इस प्रकार उस तुलसी तथा श्रीविष्णुको प्रसन्न करके सज्जनोंका सदा कल्याण करनेवाले शंकरजी अन्तर्धान होकर अपने लोक चले गये । शिवजीकी यह बात सुनकर तुलसी प्रसन्न हो गयी और [ उसी समय ] उस शरीरको छोड़कर दिव्य देहको प्राप्त हो गयी ॥ ५८-५९ ॥ कमलापति विष्णु भी उसीके साथ वैकुण्ठ चले गये और उसी क्षण तुलसीके द्वारा परित्यक्त उस शरीरसे गण्डकी नदीकी उत्पत्ति हुई ॥६० ॥

भगवान् विष्णु भी उसके तटपर मनुष्योंका कल्याण करनेवाले शालग्रामशिलारूप हो गये । हे मुने! उसमें कीट अनेक प्रकारके छिद्र करते हैं ॥ ६१ ॥

जो शिलाएँ जलमें पड़ी रहती हैं, वे अत्यन्त पुण्यदायक होती हैं एवं जो स्थलमें रहती हैं, उन्हें पिंगला नामवाली जानना चाहिये, वे मनुष्योंको सन्ताप ही प्रदान करती हैं ॥ ६२ ॥

[ हे मुने! ] मैंने आपके प्रश्नोंके अनुसार मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले तथा पुण्य प्रदान करनेवाले सम्पूर्ण शिवचरित्रको कह दिया । विष्णुके माहात्म्यसे मिश्रित आख्यान, जिसे मैंने कहा है, वह भुक्ति - मुक्ति तथा पुण्य देनेवाला है, आगे [ हे व्यास! ] अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ॥ ६३-६४ ॥ द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शंखचूडवधोपाख्याने इति श्रीशिवमहापुराणे ॥ ४१ ॥

तुलसीशापवर्णनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः पंचम युद्धखण्डमें शंखचूडवधोपाख्यानके ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

तुलसीशापवर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय अन्तर्गत

पृष्ठ 996

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९ ८६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः अन्धकासुरकी उत्पत्तिकी कथा, शिवके वरदानसे हिरण्याक्षद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें प्राप्त करना, हिरण्याक्षद्वारा पृथ्वीको पाताललोकमें ले जाना, भगवान् विष्णुद्वारा वाराहरूप धारणकर हिरण्याक्षका वधकर पृथ्वीको यथास्थान स्थापित करना नारद उवाच

शंखचूडवधं श्रुत्वा चरितं शशिमौलिनः ।

अहं तृप्तोऽस्मि नो त्वत्तोऽमृतं पीत्वा यथा जनः ॥

ब्रह्मन्यच्चरितं तस्य महेशस्य महात्मनः ।

मायामाश्रित्य सल्लीलां कुर्वतो भक्तमोददाम् ॥

ब्रह्मोवाच

शंखचूडवधं श्रुत्वा व्यासः सत्यवतीसुतः ।

अप्राक्षीदिममेवार्थं ब्रह्मपुत्रं मुनीश्वरम् ॥

सनत्कुमारः प्रोवाच व्यासं सत्यवतीसुतम् ।

सुप्रशंस्य महेशस्य चरितं मंगलायनम् ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास महेशस्य चरितं मंगलायनम् ।

यथान्धको गाणपत्यं प्राप शंभो: परात्मनः ॥

कृत्वा परमसंग्रामं तेन पूर्वं मुनीश्वर ।

प्रसाद्य तं महेशानं सत्त्वभावात्पुनः पुनः ॥

माहात्म्यमद्भुतं शंभो: शरणागतरक्षिणः ।

सुभक्तवत्सलस्यैव नानालीलाविहारिणः ॥

माहात्म्यमेतद् वृषभध्वजस्य श्रुत्वा मुनिर्गंधवतीसुतो हि । वचो महार्थं प्रणिपत्य भक्त्या ह्युवाच तं ब्रह्मसुतं मुनीन्द्रम् ॥ व्यास उवाच को ह्यंधको वै भगवन्मुनीश कस्यान्वये वीर्यवतः पृथिव्याम् । जातो महात्मा बलवान् प्रधान: किमात्मकः कस्य सुतोऽन्धकश्च ॥ एतत्समस्तं सरहस्यमद्य प्रब्रूहि ब्रह्मसुत प्रसादात् । स्कंदान्मया वै विदितं हि सम्यक् महेशपुत्रादमितावबोधात् ॥ नारदजी बोले – शंखचूडके वधसे सम्बद्ध | महादेवजीके चरित्रको सुनकर मैं उसी प्रकार तृप्त १ नहीं हो रहा हूँ, जिस प्रकार कोई व्यक्ति अमृतका पानकर तृप्त नहीं होता । इसलिये हे ब्रह्मन्! मायाका आश्रय लेकर भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाली उत्तम २ लीला करनेवाले उन महात्मा महेशका जो चरित है, उसे आप मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले – शंखचूडका वध सुननेके पश्चात् सत्यवतीसुत व्यासजीने ब्रह्मपुत्र मुनीश्वर ३ सनत्कुमारसे भी यही बात पूछी थी । व्यासकी प्रशंसा करके सनत्कुमारने मंगलदायक महेश्वरचरित्रको कहा ४ था ॥ ३-४ ॥ सनत्कुमार बोले— [ हे व्यास! ] आप शंकरजीके मंगलदायक उस चरित्रको सुनिये, जिसमें अन्धकने ५ परमात्मा शंकरके गाणपत्यपदको प्राप्त किया ॥५ ॥

हे मुनीश्वर! पहले तो उसने शंकरजीसे घोर युद्ध ६ किया । उसके बाद अपने सात्त्विक भावसे बारंबार उन्हें प्रसन्न किया । शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, परम ७ भक्तवत्सल तथा नाना प्रकारकी लीला करनेवाले शंकरका । माहात्म्य अद्भुत है । शंकरके इस प्रकारके माहात्म्यको सुनकर सत्यवतीसुत व्यासजीने मुनीश्वर सनत्कुमारजीको | प्रणाम किया, फिर भक्तिभावसे विनम्र हो ब्रह्मपुत्र मुनीश्वरसे ८ महान् अर्थपूर्ण वाणीमें कहा - ॥६–८ ॥ व्यासजी बोले- हे भगवन्! हे मुनीश्वर! यह अन्धक कौन था? इस पृथ्वीपर उसने किसके वंशमें जन्म लिया? वह किस कारणसे इतना बलवान् तथा | तथा महात्मा हुआ तथा वह किस नामवाला ९ किसका पुत्र था? ॥९ ॥

हे भगवन्! ब्रह्मपुत्र! अब आप इन सारे | रहस्योंका वर्णन कीजिये । वैसे तो अनन्तज्ञान-सम्पन्न महेशपुत्र स्कन्दके द्वारा मैं इन बातोंको जानता १० | हूँ ॥१० ॥

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अ ० ४२ ] रुद्रसंहिता गाणपत्यं कथं प्राप शंभो: परमतेजसः

।

सोऽन्धको धन्य एवाति यो बभूव गणेश्वरः ॥ ११

ब्रह्मोवाच व्यासस्य चैतद्वचनं निशम्य प्रोवाच स ब्रह्मसुतस्तदानीम् । महेश्वरोती: परमाप्तलक्ष्मीः संश्रोतुकामं जनकं शुकस्य ॥ १२ सनत्कुमार उवाच पुरागतो भक्तकृपाकरोऽसौ कैलासतः शैलसुतागणाढ्यः । विहर्तुकामः किल काशिकां वै स्वशैलतो निर्जरचक्रवर्ती ॥ १३ स राजधानीं च विधाय तस्यां चक्रे परोती: सुखदा जनानाम् । तद्रक्षकं भैरवनामवीरं कृत्वा समं शैलजया हि बह्वीः ॥ १४ स एकदा मंदरनामधेयं गतो नगं तद्वरसुप्रभावात् । तत्रापि नानागणवीरमुख्यैः शिवासमेतो विजहार भूरि ॥ १५ पूर्वे दिशो मन्दरशैलसंस्था कपर्द्दिनश्चंडपराक्रमस्य चक्रे ततो नेत्रनिमीलनं तु सा पार्वती नर्मयुतं सलीलम् ॥ १६ प्रवालहेमाब्जधृतप्रभाभ्यां कराम्बुजाभ्यां निमिमील नेत्रे । हरस्य नेत्रेषु निमीलितेषु क्षणेन जातः सुमहांधकारः ॥ १७ तत्स्पर्शयोगाच्च महेश्वरस्य करौ च तस्याः स्खलितं मदांभः । शंभोर्ललाटे क्षणवह्निततो विनिर्गतो भूरि जलस्य बिन्दुः ॥ १८ गर्भो बभूवाथ करालवक्त्रो भयंकरः क्रोधपरः कृतघ्नः । | अन्धो विरूपी जटिलश्च कृष्णो नरेतरो वैकृतिकः सुरोमा ॥ १ ९ ( युद्धखण्ड ) ९ ८७ महातेजस्वी शंकरकी कृपासे उसने गाणपत्य पदको किस प्रकार प्राप्त किया । वस्तुतः वह अन्धक महाधन्य है, जो उसे गाणपत्यकी प्राप्ति हुई ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! व्यासजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारने महामंगलदायक शिवजीके चरित्रको सुननेकी इच्छावाले शुकदेवजीके पिता [ व्यास ] -से कहा ॥१२ ॥

सनत्कुमार बोले- किसी समय देवसम्राट् भक्तवत्सल भगवान् शंकर अपने गणों तथा पार्वतीको साथ लेकर कैलाससे विहार करनेके लिये काशी | आये ॥ १३ ॥

उन्होंने काशीको अपनी राजधानी बनाया, भैरवको उसका रक्षक नियुक्त किया तथा पार्वतीके साथ मनुष्योंको आनन्द देनेवाली नाना प्रकारकी लीलाएँ करने लगे ॥१४ ॥

किसी समय वरदानके कारण वे अपने गणोंके साथ मन्दराचलपर गये और वहाँपर पार्वतीके साथ विहार करनेमें प्रवृत्त हो गये । उसके बाद पार्वतीने नर्मक्रीडा [ प्रेम - परिहास ] करते हुए मन्दराचलपर पूर्व दिशाकी ओर मुखकर बैठे हुए चण्ड पराक्रमवाले सदाशिवके नेत्र लीलापूर्वक बन्द कर दिये ॥ १५-१६ ॥ मूँगे तथा स्वर्णकमलकी कान्तिसे युक्त अपनी दोनों भुजाओंसे जब पार्वतीने उनके नेत्र बन्द कर दिये, तब शिवजीके नेत्रोंके बन्द हो जानेपर क्षणभरमें घोर अन्धकार छा गया । तब सदाशिवके ललाटका स्पर्श करते ही उनके ललाटपर स्थित अग्निकी उष्णतासे पार्वतीके दोनों हाथोंसे स्वेदबिन्दु टपकने लगे ॥ १७-१८ ॥ तब उससे एक बालक उत्पन्न हुआ, जो भयंकर, विकराल मुखवाला, महाक्रोधी, कृतघ्न, अन्धा, जटाधारी, कृष्णवर्णवाला, कुरूप, मनुष्यसे भिन्न स्वरूपवाला, विकृत तथा बहुत रोमों युक्त | था ॥ १ ९ ॥

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९ ८८ गायन्हसन्प्ररुदन्नृत्यमानो विलेलिहानो घनघोरघोषः जातेन तेनाद्भुतदर्शनेन गौरीं भवोऽसौ स्मितपूर्वमाह ॥ श्रीमहेश उवाच निमील्य नेत्राणि कृतं च कर्म विभेषि साऽस्माद्दयिते कथं त्वम् । गौरी हरात्तद्वचनं निशम्य विहस्यमाना प्रमुमोच नेत्रे जाते प्रकाशे सति घोररूपो जातोऽन्धकारादपि नेत्रहीनः । तादृग्विधं तं च निरीक्ष्य भूतं पप्रच्छ गौरी पुरुषं महेशम् ॥ गौर्य्यवाच कोऽयं विरूपो भगवन्हि जातो नावग्रतो घोरभयंकरश्च । वदस्व सत्यं मम किं निमित्तं सृष्टोऽथ वा केन च कस्य पुत्रः ॥ सनत्कुमार उवाच श्रुत्वा हरस्तद्वचनं प्रियाया लीलाकरः सृष्टिकृतोऽन्धरूपम् । लीलाकरायास्त्रिजगज्जनन्या श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ उत्पन्न होते ही उसने गाना, हँसना, नाचना , रोना ॥ तथा जीभ चाटना प्रारम्भ किया और वह महाघोर शब्द । करने लगा । विचित्र दर्शनवाले उस बालकके उत्पन्न २० होते ही शंकरजीने गौरीसे हँसते हुए कहा - ॥२० श्रीमहेश बोले — हे प्रिये! तुमने मेरे नेत्रोंको ॥ बन्दकर जो कर्म किया है, अब उससे भयभीत क्यों हो रही हो? महादेवजीके इस वचनको सुनकर हँसती ॥ २१ । हुई गौरीने उनके नेत्रोंको छोड़ दिया । तब प्रकाश हो जानेपर वह अन्धा पुरुष अन्धकारसे भी अधिक घोर रूपवाला हो गया । तब इस प्रकारके रूपवाले उस २२ पुरुषको देखकर गौरीने महेश्वरसे पूछा— ॥ २१-२२ ॥ गौरी बोलीं- हे भगवन्! हम दोनोंके सामने यह घोर, भयंकर तथा विकृताकार कौन उत्पन्न हो गया है? आप मुझसे सत्य कहिये, किस कारणसे तथा किसने इसकी सृष्टि की है, यह किसका पुत्र २३ है? ॥ २३ ॥

सनत्कुमार बोले – लीला करनेवाले एवं अन्धकको उत्पन्न करनेवाले भगवान् शंकरने लीला करनेवाली त्रिजगज्जननी प्रिया पार्वतीकी बात सुनकर

विहस्य किंचिद्भगवानुवाच ॥२४ । हँसते हुए कहा – ॥२४ ॥

महेश उवाच शृण्वम्बिके ह्यद्भुतवृत्तकारे उत्पन्न एषोऽद्भुतचण्डवीर्यः । निमीलिते चक्षुषि मे भवत्या स स्वेदजो मेऽन्धकनामधेयः ॥ त्वं चास्य कर्तास्य यथानुरूपं त्वया स सख्या दयया गणेभ्यः । स रक्षितव्यस्त्वयि तं हि वैकं विचार्य बुद्ध्या करणीयमार्ये ॥ सनत्कुमार उवाच गौरी ततो भर्तृवचो निशम्य

कारुण्यभावात्सहिता सखीभिः ।

नानाप्रकारैर्बहुभिर्द्युपायै-श्चकार रक्षां स्वसुतस्य यद्वत् ॥

महेश बोले— अद्भुत चरित्र करनेवाली | हे अम्बिके! तुम्हारे द्वारा मेरे नेत्रोंके बन्द कर दिये | जानेपर तुम्हारे हाथोंके स्वेदकणसे उत्पन्न यह अद्भुत २५ | महापराक्रमशाली अन्धक नामवाला असुर प्रकट हुआ है ॥२५ ॥

हे आर्ये! तुम्हीं इसकी जन्मदात्री हो, अतः | तुम्हीं दयापूर्वक अपनी सखियोंके साथ गणोंसे इसकी | रक्षा करो और बुद्धिसे विचारकर इसके विषयमें जो २६ करना चाहती हो, उसे करो ॥ २६ ॥

अपने पतिके इस सनत्कुमार बोले — तदनन्तर साथ | वचनको सुनकर गौरी [ अपनी ] सखियोंके पुत्रकी रक्षा | दयाभावसे अनेक प्रकारके उपायोंसे अपने २७ | करने लगीं ॥२७ ॥

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अ ० ४२ ] रुद्रसंहिता ( कालेऽथ तस्मिन् शिशिरे प्रयातो हिरण्यनेत्रस्त्वथ पुत्रकामः । स्वज्येष्ठबंधोस्तनयप्रतानं संवीक्ष्य चासीत्प्रियया नियुक्तः ॥ २८ अरण्यमाश्रित्य तपश्चकारा-सुरस्तदा कश्यपजः सुतार्थम् । जितरोषदोषः संदर्शनार्थं तु महेश्वरस्य ॥ २ ९ तुष्टः पिनाकी तपसास्य सम्यग् वरप्रदानाय ययौ द्विजेन्द्र । तत्स्थानमासाद्य वृषध्वजोऽसौ जगाद दैत्यप्रवरं महेशः ॥ ३० महेश उवाच हे दैत्यनाथ कुरु नेन्द्रियसंघपातं किमर्थमेतद् व्रतमाश्रितं ते । प्रब्रूहि कामं वरदो भवोऽहं यदिच्छसि त्वं सकलं ददामि ॥ ३१ सनत्कुमार उवाच सरस्यमाकर्ण्य महेशवाक्यं ह्यतिप्रसन्नः कनकाक्षदैत्यः । कृतांजलिर्नम्रशिरा उवाच स्तुत्या च नत्वा विविधं गिरीशम् ॥ ३२ हिरण्याक्ष उवाच पुत्रस्तु मे चन्द्रललाट नास्ति सुवीर्यवान्दैत्यकुलानुरूपी तदर्थमेतद् व्रतमास्थितोऽहं तं देहि देवेश सुवीर्यवन्तम् ॥ ३३ यस्माच्च मद् भ्रातुरनंतवीर्याः प्रह्लादपूर्वा अपि पञ्चपुत्राः । ममेह नास्तीति गतान्वयो ऽहं को मामकं राज्यमिदं बुभूषेत् ॥ ३४ राज्यं परस्य स्वबलेन हृत्वा भुङ्क्तेऽथवा स्वं पितुरेव दृष्टम् । स प्रोच्यते पुत्र इह त्वमुत्र पुत्री स तेनापि भवेत्पितासौ ॥ ३५ युद्धखण्ड ) ९ ८ ९ एक बार शिशिरकाल उपस्थित होनेपर अपने बड़े भाईकी सन्ततिवृद्धिको देखकर अपनी स्त्रीसे प्रेरित होकर पुत्रकी कामनावाला हिरण्याक्ष [ तपस्या करनेके लिये ] वहाँ पहुँचा ॥२८ ॥

वह कश्यपपुत्र असुर वनका आश्रय लेकर क्रोधादि दोषोंको जीतकर पुत्रप्राप्तिके निमित्त काष्ठके समान स्थिर होकर शंकरजीके दर्शनहेतु तप करने लगा ॥ २ ९ ॥ हे द्विजेन्द्र! तब उसकी तपस्यासे पूर्ण रूपसे प्रसन्न होकर शंकरजी वर देनेके लिये गये । उस स्थानपर आकर वे वृषध्वज महेश उस दैत्य श्रेष्ठसे बोले— ॥३० ॥

महेश बोले- हे दैत्यराज! तुम अपनी इन्द्रियोंको कष्ट मत दो, तुम किस निमित्त यह व्रत कर रहे हो । तुम अपना मनोरथ कहो, मैं शंकर तुम्हें वर दूँगा । तुम जो चाहते हो, वह सब मैं दूँगा ॥ ३१ ॥

सनत्कुमार बोले- शिवजीका यह सरस वचन सुनकर वह दैत्य हिरण्याक्ष अत्यन्त प्रसन्न हो गया और हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर एवं नमस्कार करके विविध स्तुतिपूर्वक शंकरजीसे कहने लगा —॥३२ ॥

हिरण्याक्ष बोला — हे चन्द्रमौले! मुझे दैत्यवंशके योग्य एवं अति पराक्रमी कोई पुत्र नहीं है, उसीके लिये मैं इस तपस्यामें प्रवृत्त हुआ हूँ । अतः हे देवेश! आप मुझे महाबलवान् पुत्र प्रदान कीजिये; क्योंकि मेरे भाईको प्रह्लाद आदि पाँच महाबलवान् पुत्र हैं, मुझे पुत्र नहीं है, मैं वंशहीन हो गया हूँ, अतः मेरे इस राज्यका भोग कौन करेगा? जो अपने बाहुबलसे दूसरेके राज्यको अपने अधिकारमें करके उसका भोग करता है अथवा पिताके राज्यका उपभोग करता है, वही इस लोकमें तथा परलोकमें पुत्र कहा जाता है और उसी पुत्रसे पिता भी पुत्रवान् होता है ॥ ३३–३५ ॥

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९९ ० ऊर्ध्वं गतिः पुत्रवतां निरुक्ता मनीषिभिर्धर्मभृतां वरिष्ठैः सर्वाणि भूतानि तदर्थमेव-मतः प्रवर्तेत पशून् स्वतेजः निरन्वयस्याथ न संति लोकाः तदर्थमिच्छन्ति जनाः सुरेभ्यः । सदा समाराध्य सुराङ्घ्रिपंकजं याचन्त इत्थं सुतमेकमेव ॥ सनत्कुमार उवाच एतद्भवस्तद्वचनं निशम्य कृपाकरो दैत्यनृपस्य तुष्टः । तमाह दैत्याधिप नास्ति पुत्रः त्वद्वीर्यजः किंतु ददामि पुत्रम् ॥ ममात्मजं त्वन्धकनामधेयं त्वत्तुल्यवीर्यं त्वपराजितं च । वृणीष्व पुत्रं सकलं विहाय दुःखं प्रतीच्छस्व सुतं त्वमेव ॥ इत्येवमुक्त्वा प्रददौ स तस्मै हिरण्यनेत्राय सुतं प्रसन्नः । हरस्तु गौर्य्या सहितो महात्मा भूतादिनाथस्त्रिपुरारिरुग्रः ॥ ततो हरात्प्राप्य सुतं स दैत्यः प्रदक्षिणीकृत्य यथाक्रमेण । स्तोत्रैरनेकैरभिपूज्य रुद्रं तुष्टः स्वराज्यं गतवान्महात्मा ॥ ततस्तु पुत्रं गिरिशादवाप्य रसातलं चंडपराक्रमस्तु । इमां धरित्रीमनयत्स्वदेशं दैत्यो विजित्वा त्रिदशानशेषान् ॥ ततस्तु देवैर्मुनिभिश्च देवैर्मुनिभिश्च सिद्धैः

सर्वात्मकं यज्ञमयं करालम् ।

वाराहमाश्रित्य वपुः प्रधान-माराधितो विष्णुरनन्तवीर्यः ॥

घोणाप्रहारैर्विविधैर्धरित्रीं विदार्य पातालतलं प्रविश्य । तुंडेन दैत्यान् शतशो विचूर्ण्य दंष्ट्राभिरग्रयाभिरखंडिताभिः ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ वरिष्ठ धर्मज्ञ ऋषियोंने पुत्रवानोंकी ही ऊर्ध्वगति । । कही है, इसीलिये सभी प्राणी उसीके लिये कामना | करते हैं, अन्यथा मरनेके पश्चात् वह तेज पशुओंमें ॥ ३६ चला जाता है अर्थात् व्यर्थ हो जाता है । पुत्रहीनको | उत्तम लोक नहीं प्राप्त होता है, इसलिये लोग उसके लिये इच्छा रखते हैं और देवताओंके चरण - कमलकी | आराधनाकर उनसे एक पुत्रकी भी याचना करते ३७ हैं ॥ ३६-३७ ॥ सनत्कुमार बोले- तब कृपालु शंकर दैत्यराजके उस वचनको सुनकर प्रसन्न हो गये और उससे बोले — हे दैत्यराज! यद्यपि तुम्हारे वीर्यसे पुत्र उत्पन्न नहीं होगा, फिर भी मैं तुम्हें पुत्र प्रदान ३८ करता हूँ ॥३८ ॥

तुम अन्धक नामक मेरे पुत्रका वरण कर लो, जो तुम्हारे ही समान बलवान् और अजेय है । तुम सब दुःखोंको त्यागकर उसीको अपना पुत्र मान ३ ९लो ॥३ । ९ ॥ इस प्रकार कहकर प्रसन्न होकर पार्वतीसहित त्रिपुरारि उग्ररूप महात्मा शंकरने उस हिरण्याक्षको ४० पुत्र प्रदान कर दिया ॥ ४० ॥

इसके बाद वह महात्मा दैत्य शंकरसे पुत्र प्राप्तकर यथाक्रम उनकी प्रदक्षिणाकर तथा अनेक स्तोत्रोंसे रुद्रकी स्तुतिकर प्रसन्न होकर अपने राज्यको ४१ चला गया ॥ ४१ ॥

तदनन्तर प्रचण्ड पराक्रमी वह दैत्य | सदाशिवसे पुत्र प्राप्तकर सम्पूर्ण देवताओंको | जीतकर इस पृथ्वीको अपने देश पातालमें लेकर ४२ चला गया ॥४२ ॥

उसके अनन्तर देवताओं, मुनियों एवं | सिद्धोंने सर्वात्मक, यज्ञमय तथा महाविकराल प्रधान | वाराहरूपका आश्रय लेकर अनन्त पराक्रमवाले विष्णुका ४३ आराधन किया ॥ ४३ ॥

तब अपनी नासिकाके विविध प्रहारोंसे हो ड | पृथ्वीको विदीर्णकर पातालमें प्रविष्ट सैकड़ों | द्वारा तथा अखण्डित दाढ़ोंके अग्रभागसे ४४ दैत्योंको चूर्ण करके वज्रके समान कठोर पादप्रहारोंसे