शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 131–140
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
पृष्ठ 131
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ]
सा देवी जगतां माता स शिवो जगतः पिता ।
पित्रोः शुश्रूषके नित्यं कृपाधिक्यं हि वर्धते ॥
कृपयान्तर्गतैश्वर्यं पूजकस्य ददाति हि ।
तस्मादन्तर्गतानन्दलाभार्थं मुनिपुङ्गवाः ॥
पितृमातृस्वरूपेण शिवलिङ्गं प्रपूजयेत् ।
भर्गः पुरुषरूपो हि भर्गा प्रकृतिरुच्यते ॥
अव्यक्तान्तरधिष्ठानं गर्भः पुरुष उच्यते ।
सुव्यक्तान्तरधिष्ठानं गर्भः प्रकृतिरुच्यते ॥
पुरुषस्त्वादिगर्भो हि गर्भवाञ्जनको यतः ।
पुरुषात्प्रकृतौ युक्तं प्रथमं जन्म कथ्यते ॥
प्रकृतेर्व्यक्ततां यातं द्वितीयं जन्म कथ्यते ।
जन्म जन्तुर्मृत्युजन्म पुरुषात्प्रतिपद्यते ॥
अन्यतो भाव्यतेऽवश्यं मायया जन्म कथ्यते ।
जीर्यते जन्मकालाद्यत्तस्माज्जीव इति स्मृतः ॥
जन्यते तन्यते पाशैर्जीवशब्दार्थ एव हि ।
जन्मपाशनिवृत्त्यर्थं जन्मलिङ्गं प्रपूजयेत् ॥
भं वृद्धिं गच्छतीत्यर्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते ।
प्राकृतैः शब्दमात्राद्यैः प्राकृतेन्द्रियभोजनात् ॥
भगस्येदं भोगमिति शब्दार्थो मुख्यतः श्रुतः । मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवाञ्छिव उच्यते भगवान्भोगदाता हि नान्यो भोगप्रदायकः भगस्वामी च भगवान्भर्ग इत्युच्यते बुधैः भगेन सहितं लिङ्गं भगं लिङ्गेन संयुतम् इहामुत्र च भोगार्थं नित्यभोगार्थमेव च भगवन्तं महादेवं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत् विद्येश्वरसंहिता ११ ९ वे देवी उमा जगत्की माता हैं और भगवान् शिव ९ ३ जगत्के पिता । जो इनकी सेवा करता है, उस पुत्रपर इन दोनों माता - पिताकी कृपा नित्य अधिकाधिक बढ़ती रहती है । वे पूजकपर कृपा करके उसे अपना आन्तरिक ऐश्वर्य प्रदान करते हैं । अत: हे मुनीश्वरो! आन्तरिक आनन्दकी ९ ४ प्राप्तिके लिये शिवलिंगको माता - पिताका स्वरूप मानकर उसकी पूजा करनी चाहिये । भर्ग ( शिव ) पुरुषरूप है ९ ५ और भर्गा ( शिवा अथवा शक्ति ) प्रकृति कहलाती है । अव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानरूप गर्भको पुरुष कहते हैं और सुव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानभूत गर्भको प्रकृति । पुरुष आदिगर्भ है, वह प्रकृतिरूप गर्भसे युक्त होनेके ९ ६ कारण गर्भवान् है; क्योंकि वही प्रकृतिका जनक है । प्रकृतिमें जो पुरुषका संयोग होता है, यही पुरुषसे उसका प्रथम जन्म कहलाता है । अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्वादिके ९ ७ क्रमसे जो जगत्का व्यक्त होना है, यही उस प्रकृतिका द्वितीय जन्म कहलाता है । जीव पुरुषसे ही बार - बार जन्म और मृत्युको प्राप्त होता है । मायाद्वारा अन्यरूपसे ९ ८ प्रकट किया जाना ही उसका जन्म कहलाता है । जीवका शरीर जन्मकालसे ही जीर्ण ( छः भावविकारोंसे युक्त ) होने लगता है, इसीलिये उसे ' जीव ' यह संज्ञा दी गयी ९९ है । जो जन्म लेता और विविध पाशोंद्वारा बन्धनमें पड़ता है, उसका नाम जीव है, जन्म और बन्धन जीव- शब्दका ही अर्थ है । अत: जन्ममृत्युरूपी बन्धनकी निवृत्तिके लिये १०० जन्मके अधिष्ठानभूत माता - पितृस्वरूप शिवलिंगका भली - भाँति पूजन करना चाहिये ॥ ९३–१०० ॥ शब्दादि पंचतन्मात्राओं तथा पंचेन्द्रियोंसे विषय १०१ ग्रहण करनेसे ' भ ' अर्थात् वृद्धिको ‘ गच्छति ' अर्थात् प्राप्त होती है, इसलिये ' भग ' शब्दका अर्थ प्रकृति है । भोग ही भगका मुख्य शब्दार्थ है । मुख्य ' भग ' प्रकृति ॥ १०२ है और ' भगवान् ' शिव कहे जाते हैं ॥ १०१-१०२ ॥ । भगवान् ही भोग प्रदान करते हैं, दूसरा कोई नहीं दे ॥ १०३ सकता । भग ( प्रकृति ) - का स्वामी भगवान् ही विद्वानोंद्वारा भर्ग कहा जाता है । भग - प्रकृतिसे संयुक्त परमात्मलिंग । और लिंगसंयुक्त भग - प्रकृति ही इस लोक और परलोकमें ॥ १०४ नित्य भोग प्रदान करते हैं, अतः भगवान् महादेवके । शिवलिंगकी पूजा करनी चाहिये॥१०३-१०४१ / २ ॥
पृष्ठ 132
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२० लोकप्रसविता सूर्यस्तच्चिह्नं प्रसवाद्भवेत् ॥
लिङ्गे प्रसूतिकर्तारं लिङ्गिनं पुरुषो यजेत् ।
लिङ्गार्थगमकं चिह्नं लिङ्गमित्यभिधीयते ॥
लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः ।
शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते ॥
स्वचिह्नपूजनात्प्रीतश्चिह्नकार्यं न वीयते ।
चिह्नकार्यं तु जन्मादि जन्माद्यं विनिवर्तते ॥
प्राकृतैः पुरुषैश्चापि बाह्याभ्यन्तरसम्भवैः ।
षोडशैरुपचारैश्च शिवलिङ्गं प्रपूजयेत् ॥
एवमादित्यवारे हि पूजा जन्मनिवर्तिका ।
आदिवारे महालिङ्गं प्रणवेनैव पूजयेत् ॥
आदिवारे पञ्चगव्यैरभिषेको विशिष्यते ।
गोमयं गोजलं क्षीरं दध्याज्यं पञ्चगव्यकम् ॥
क्षीराद्यं च पृथक्चैव मधुना चेक्षुसारकैः ।
गव्यक्षीरान्ननैवेद्यं प्रणवेनैव कारयेत् ॥
प्रणवं ध्वनिलिङ्गं तु नादलिङ्गं स्वयम्भुवः ।
बिन्दुलिङ्गं तु यन्त्रं स्यान्मकारं तु प्रतिष्ठितम् ॥
उकारं चरलिङ्गं स्यादकारं गुरुविग्रहम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ १०५ संसारको उत्पन्न करनेवाले सूर्य हैं और उत्पन्न करनेके कारण जगत् ही उनका ( प्रत्यक्ष ) चिह्न है । [ इसलिये उनका एक नाम भग भी है । ] पुरुषको १०६ लिंगमें जगत्को उत्पन्न करनेवाले लिंगीकी ही पूजा करनी चाहिये । सृष्टिके अर्थको बतानेवाले चिह्नके रूपमें ही उसे लिंग कहा जाता है ॥ १०५-१०६ ॥ लिंग परमपुरुष शिवका बोध कराता है । इस प्रकार १०७ शिव और शक्तिके मिलनके प्रतीकको ही शिवलिंग कहा गया है । अपने चिह्नके पूजनसे प्रसन्न होकर महादेव १०८ उस चिह्नके कार्यरूप जन्मादिको समाप्त कर देते हैं तथा पूजकको पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती । अतः सभी लोगोंको यथाप्राप्त बाह्य और मानसिक षोडशोपचारोंसे १० ९ शिवलिंगका पूजन करना चाहिये॥१०७–१०९ ॥ रविवारको की गयी पूजा पुनर्जन्मका निवारण ११० कर देती है । रविवारको महालिंगकी प्रणव ( ( ॐ ) -से ही पूजा करनी चाहिये । उस दिन पंचगव्यसे किया गया अभिषेक विशेष महत्त्वका होता है । गोबर, १११ गोमूत्र, गोदुग्ध, उसका दही और गोघृत — ये पंचगव्य कहे जाते हैं॥११०-१११ ॥ गायका दूध, गायका दही और गायका घी-११२ इन तीनोंको पूजनके लिये शहद और शक्करके साथ पृथक - पृथक् भी रखे और इन सबको मिलाकर सम्मिलितरूपसे पंचामृत भी तैयार कर ले । ( इनके द्वारा शिवलिंगका अभिषेक एवं स्नान कराये ), फिर गायके दूध और अन्नके मेलसे नैवेद्य तैयार करके प्रणव मन्त्रके उच्चारणपूर्वक उसे भगवान् शिवको अर्पित करे । सम्पूर्ण प्रणवको ध्वनिलिंग कहते हैं । स्वयम्भूलिंग नादस्वरूप होनेके कारण नादलिंग कहा गया है । यन्त्र या अर्घा बिन्दुस्वरूप होनेके कारण बिन्दुलिंगके रूपमें विख्यात है । उसमें अचलरूपसे प्रतिष्ठित जो शिवलिंग है, वह मकार - स्वरूप है, ११३ । इसलिये मकारलिंग कहलाता है । सवारी निकालने | आदिके लिये जो चरलिंग होता है, वह उकारस्वरूप | होनेसे उकारलिंग कहा गया है तथा पूजाकी दीक्षा | देनेवाले जो गुरु या आचार्य हैं, उनका विग्रह अकारका प्रतीक होनेसे अकारलिंग माना गया है ।
पृष्ठ 133
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] षड्लिङ्गपूजया नित्यं जीवन्मुक्तो न संशयः ॥
शिवस्य भक्त्या पूजा हि जन्ममुक्तिकरी नृणाम् ।
रुद्राक्षधारणात्पादमर्थं वै भूतिधारणात् ॥
त्रिपादं मन्त्रजाप्याच्च पूजया पूर्णभक्तिमान् ।
शिवलिङ्गं च भक्तं च पूज्य मोक्षं लभेन्नरः ॥
य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः ।
तस्यैव शिवभक्तिश्च वर्धते सुदृढा द्विजाः ॥
विद्येश्वरसंहिता १२१ ११४ | इस प्रकार प्रणवमें प्रतिष्ठित अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद और ध्वनिके रूपमें लिंगके छः भेद हैं । इन छहों लिंगोंकी नित्य पूजा करनेसे साधक जीवन्मुक्त
। हो जाता है; इसमें संशय नहीं है । ११२ – ११४ ॥
भक्तिपूर्वक की गयी शिवपूजा मनुष्योंको पुनर्जन्मसे ११५ छुटकारा दिलाती है । रुद्राक्षधारणसे एक चौथाई, विभूति ( भस्म ) -धारणसे आधा, मन्त्रजपसे तीन चौथाई और पूजासे पूर्ण फल प्राप्त होता है । शिवलिंग और शिवभक्तकी ११६ पूजा करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है । हे द्विजो! जो इस अध्यायको ध्यानपूर्वक पढ़ता - सुनता है, उसकी ११७ । शिवभक्ति सुदृढ़ होकर बढ़ती रहती है ॥ ११५-११७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां पार्थिवपूजाप्रकारादिवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें पार्थिव पूजा आदिका प्रकार वर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप ( ॐकार ) और स्थूल रूप ( पंचाक्षर मन्त्र ) - का विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके लोकोंतकका विवेचन करके कालातीत, पंचावरणविशिष्ट शिवलोकके अनिर्वचनीय वैभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता ऋषय ऊचुः
प्रणवस्य च माहात्म्यं षड्लिङ्गस्य महामुने ।
शिवभक्तस्य पूजां च क्रमशो ब्रूहि नः प्रभो ॥ १
सूत उवाच
तपोधनैर्भवद्भिश्च सम्यक् प्रश्नस्त्वयं कृतः ।
अस्योत्तरं महादेवो जानाति स्म न चापरः ॥ २
तथापि वक्ष्ये तमहं शिवस्य कृपयैव हि ।
शिवोऽस्माकं च युष्माकं रक्षां गृह्णातु भूरिशः ॥ ३
प्रो हि प्रकृतिजातस्य संसारस्य महोदधेः ।
नवं नावांतरमिति प्रणवं वै विदुर्बुधाः ॥ ४
ऋषिगण बोले- हे महामुने! हे प्रभो! आप हमारे लिये क्रमशः षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य तथा शिवभक्तके पूजनकी विधि बताइये ॥१ ॥
सूतजीने कहा — महर्षियो! आपलोग तपस्याके धनी हैं, आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया है । किंतु इसका ठीक - ठीक उत्तर महादेवजी ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं । तथापि भगवान् शिवकी कृपासे ही मैं इस विषयका वर्णन करूँगा । वे भगवान् शिव हमारी और आपलोगोंकी रक्षाका महान् भार बारम्बार स्वयं ही ग्रहण करें ॥ २-३ ॥ ' प्र ' नाम है प्रकृतिसे उत्पन्न संसाररूपी महासागरका । ‘ प्रणव ' इसे पार करनेके लिये दूसरी ( नव ) नाव है । इसलिये विद्वान् इस ओंकारको ' प्रणव ' की संज्ञा देते हैं । [ ॐकार अपने जप करनेवाले
पृष्ठ 134
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२२ प्रः प्रपञ्चो न नास्ति वो युष्माकं प्रणवं विदुः प्रकर्षेण नयेद्यस्मान्मोक्षं वः प्रणवं विदुः स्वमन्त्रजापकानां च पूजकानां च योगिनाम् सर्वकर्मक्षयं कृत्वा दिव्यज्ञानं तु नूतनम् ॥ तमेव मायारहितं मायारहितं नूतनं परिचक्षते । प्रकर्षेण महात्मानं नवं शुद्धस्वरूपकम् नूतनं वै करोतीति प्रणवं तं विदुर्बुधाः प्रणवं द्विविधं प्रोक्तं सूक्ष्मस्थूलविभेदतः सूक्ष्ममेकाक्षरं विद्यात्स्थूलं पञ्चाक्षरं विदुः सूक्ष्ममव्यक्तपञ्चार्णं सुव्यक्तार्णं तथेतरत् ॥ जीवन्मुक्तस्य सूक्ष्मं हि सर्वसारं हितस्य हि मन्त्रेणार्थानुसन्धानं स्वदेहविलयावधि स्वदेहे गलिते पूर्णं शिवं प्राप्नोति निश्चयः केवलं मन्त्रजापी तु योगं प्राप्नोति निश्चयः षट्त्रिंशत्कोटिजापी तु निश्चयं योगमाप्नुयात् सूक्ष्मं च द्विविधं ज्ञेयं ह्रस्वदीर्घविभेदतः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ । साधकोंसे कहता है— ] ‘ प्र - प्रपंच, न — नहीं है, व: -॥ ५ तुमलोगोंके लिये । ' अतः इस भावको लेकर भी ज्ञानी । पुरुष ' ओम् ' को ' प्रणव ' नामसे जानते हैं । इसका दूसरा भाव यह है — ' प्र - प्रकर्षेण, न - नयेत्, वः: -- - युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकोंको बलपूर्वक मोक्षतक पहुँचा देगा । ' इस अभिप्रायसे भी इसे ऋषि - मुनि ' प्रणव ' कहते हैं ॥ ४-५ ॥ । अपना जप करनेवाले योगियोंके तथा अपने मन्त्रकी ६ पूजा करनेवाले उपासकके समस्त कर्मोंका नाश करके यह दिव्य नूतन ज्ञान देता है; इसलिये भी इसका नाम प्रणव है । उन मायारहित महेश्वरको ही नव अर्थात् ॥ ७ नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रकृष्टरूपसे नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये ' प्रणव ' कहलाते हैं । प्रणव । साधकको नव अर्थात नवीन ( शिवस्वरूप ) कर देता है । इसलिये भी विद्वान् पुरुष उसे ' प्रणव ' कहते हैं । अथवा प्रकृष्टरूपसे नव – दिव्य परमात्मज्ञान प्रकट करता है, इसलिये वह प्रणव कहा गया है ॥ ६-७१ / २ ॥ ॥ ८ प्रणवके दो भेद बताये गये हैं— स्थूल और सूक्ष्म । एक अक्षररूप जो ‘ ओम् ' है, उसे सूक्ष्म प्रणव जानना । चाहिये और‘नमः शिवाय ' इस पाँच अक्षरवाले मन्त्रको ९ स्थूल प्रणव समझना चाहिये । जिसमें पाँच अक्षर व्यक्त नहीं हैं, वह सूक्ष्म है और जिसमें पाँचों अक्षर सुस्पष्टरूपसे । व्यक्त हैं, वह स्थूल है । जीवन्मुक्त पुरुषके लिये सूक्ष्म ॥ १० प्रणवके जपका विधान है । वही उसके लिये समस्त साधनोंका सार है । ( यद्यपि जीवन्मुक्तके लिये किसी । साधनकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरोंकी दृष्टिमें जबतक उसका शरीर रहता है, तबतक उसके द्वारा प्रणव - जपकी सहज साधना स्वत: होती रहती है । ) वह अपनी देहका विलय होनेतक सूक्ष्म प्रणव मन्त्रका जप और उसके अर्थभूत परमात्म तत्त्वका अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिवको प्राप्त कर लेता है — यह सुनिश्चित है ॥ ८–१०१ / २ ॥ ॥ ११ जो केवल मन्त्रका जप करता है, उसे निश्चय ही । योगकी प्राप्ति होती है । जिसने छत्तीस करोड़ मन्त्रका । ) । जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता ॥ १२ है । सूक्ष्म प्रणवके भी ह्रस्व और दीर्घके भेदसे दो रूप
पृष्ठ 135
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] विद्येश्वरसंहिता १२३
अकारश्च उकारश्च मकारश्च ततः परम् ।
बिन्दुनादयुतं तद्धि शब्दकालकलान्वितम् ॥
दीर्घप्रणवमेवं हि योगिनामेव हृद्गतम् ।
मकारं तन्त्रितत्त्वं हि ह्रस्वप्रणव उच्यते ॥
शिवः शक्तिस्तयोरैक्यं मकारं तु त्रिकात्मकम् ।
ह्रस्वमेवं हि जाप्यं स्यात्सर्वपापक्षयैषिणाम् ॥
भूवायुकनकार्णोद्यौः शब्दाद्याश्च तथा दश ।
आशान्वये दश पुनः प्रवृत्ता इति कथ्यते ॥
ह्रस्वमेव प्रवृत्तानां निवृत्तानां तु दीर्घकम् ।
व्याहृत्यादौ च मन्त्रादौ कामं शब्दकलायुतम् ॥
वेदादौ च प्रयोज्यं स्याद्वन्दने सन्ध्ययोरपि ।
नवकोटिजपाञ्जप्त्वा संशुद्धः पुरुषो भवेत् ॥
पुनश्च नवकोट्या तु पृथिवीजयमाप्नुयात् । पुनश्च नवकोट्या तु ह्यपां जयमवाप्नुयात् पुनश्च नवकोट्या तु तेजसां जयमाप्नुयात् पुनश्च नवकोट्या तु वायोर्जयमवाप्नुयात् । आकाशजयमाप्नोति नवकोटिजपेन वै गन्धादीनां क्रमेणैव नवकोटिजपेन वै अहङ्कारस्य च पुनर्नवकोटिजपेन वै जानने चाहिये । अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद, शब्द, १३ काल और कला - इनसे युक्त जो प्रणव है, उसे ‘ दीर्घ प्रणव ' कहते हैं । वह योगियोंके ही हृदयमें स्थित होता है । मकारपर्यन्त जो ओम् है, वह अ उ म् – इन तीन १४ तत्त्वोंसे युक्त है । इसीको ' ह्रस्व प्रणव ' कहते हैं । ‘ अ ’ शिव है, ‘ उ ' शक्ति है और मकार इन दोनोंकी एकता है; वह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ह्रस्व प्रणवका १५ जप करना चाहिये । जो अपने समस्त पापोंका क्षय करना चाहते हैं, उनके लिये इस ह्रस्व प्रणवका जप अत्यन्त आवश्यक है ॥ ११–१५ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये पाँच १६ भूत तथा शब्द, स्पर्श आदि इनके पाँच विषय — ये सब मिलकर दस वस्तुएँ मनुष्योंकी कामनाके विषय हैं 1 इनकी आशा मनमें लेकर जो कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न होते हैं, वे दस प्रकारके पुरुष प्रवृत्त अथवा प्रवृत्तिमार्गी कहलाते हैं तथा जो निष्कामभावसे शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे निवृत्त अथवा निवृत्तिमार्गी कहे १७ गये हैं । प्रवृत्त पुरुषोंको ह्रस्व प्रणवका ही जप करना चाहिये और निवृत्त पुरुषोंको दीर्घ प्रणवका । व्याहृतियों तथा अन्य मन्त्रोंके आदिमें इच्छानुसार शब्द और कलासे युक्त प्रणवका उच्चारण करना चाहिये । वेदके आदिमें और दोनों संध्याओंकी उपासनाके समय भी ओंकारका उच्चारण करना चाहिये ॥ १६-१७१ / २ ॥ १८ प्रणवका नौ करोड़ जप करनेसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है । पुन: नौ करोड़का जप करनेसे वह पृथ्वीतत्त्वपर विजय पा लेता है । तत्पश्चात् पुनः नौ करोड़का जप ॥ १ ९ करके वह जल - तत्त्वको जीत लेता है । पुनः नौ करोड़ जपसे वह अग्नितत्त्वपर विजय पाता है । तदनन्तर फिर । नौ करोड़का जप करके वह वायु - तत्त्वपर विजयी होता है और फिर नौ करोड़के जपसे आकाशको अपने अधिकारमें ॥ २० कर लेता है । इसी प्रकार नौ - नौ करोड़का जप करके वह क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दपर विजय । पाता है, इसके बाद फिर नौ करोड़का जप करके अहंकारको ॥ २१ भी जीत लेता है ॥ १८–२१ ॥ हे द्विजो! मनुष्य एक हजार मन्त्रोंके जप सहस्त्रमन्त्रजप्तेन नित्यशुद्धो भवेत्पुमान् । करनेसे नित्य शुद्ध होता है, इसके अनन्तर अपनी ततः परं स्वसिद्ध्यर्थं जपो भवति हि द्विजाः ॥ २२ | सिद्धिके लिये जप किया जाता है ॥२२ ॥
पृष्ठ 136
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
एवमष्टोत्तरशतकोटिजप्सेन वै पुनः ।
प्रणवेन प्रबुद्धस्तु शुद्धयोगमवाप्नुयात् ॥
शुद्धयोगेन संयुक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।
सदा जपन्सदा ध्यायञ्छिवं प्रणवरूपिणम् ॥
समाधिस्थो महायोगी शिव एव न संशयः ।
ऋषिच्छन्दो देवतादि न्यस्य देहे पुनर्जपेत् ॥
प्रणवं मातृकायुक्तं देहे न्यस्य ऋषिर्भवेत् ।
दशमातृषडध्वादि सर्वं न्यासफलं लभेत् ॥
प्रवृत्तानां च मिश्राणां स्थूलप्रणवमिष्यते । १७ इस तरह एक सौ आठ करोड़ प्रणवका जप २३ करके उत्कृष्ट बोधको प्राप्त हुआ पुरुष शुद्ध योग प्राप्त कर लेता है । शुद्ध योगसे युक्त होनेपर वह जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है । सदा २४ प्रणवका जप और प्रणवरूपी शिवका ध्यान करते. | करते समाधिमें स्थित हुआ महायोगी पुरुष साक्षात् शिव ही है; इसमें संशय नहीं है । पहले अपने शरीरमें प्रणवके ऋषि, छन्द और देवता आदिका न्यास करके २५ फिर जप आरम्भ करना चाहिये । अकारादि मातृकावर्णोंसे युक्त प्रणवका अपने अंगोंमें न्यास करके मनुष्य ऋषि हो जाता है । मन्त्रोंके दशविध संस्कार, मातृकान्यास २६ तथा षडध्वशोधन ' आदिके साथ सम्पूर्ण न्यासका फल उसे प्राप्त हो जाता है । प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति - निवृत्तिसे मिश्रित भाववाले पुरुषोंके लिये स्थूल प्रणवका जप
ही अभीष्टका साधक होता है । २३ - २६१/२ ॥
* मन्त्रोंके दस संस्कार ये हैं - जनन, दीपन, बोधन, ताड़न, अभिषेचन, विमलीकरण, जीवन, तर्पण, गोपन और आप्यायन । इनकी विधि इस प्रकार है— भोजपत्रपर गोरोचन, कुंकुम, चन्दनादिसे आत्माभिमुख त्रिकोण लिखे, फिर तीनों कोणोंमें छः - छः समान रेखाएँ खींचे । ऐसा करनेपर ४ ९ त्रिकोण कोष्ठ बनेंगे । उनमें ईशानकोणसे मातृकावर्ण लिखकर देवताका आवाहन - पूजन करके मन्त्रका एक - एक वर्ण उच्चारण करके अलग पत्रपर लिखे । ऐसा करनेपर ' जनन ' नामका प्रथम संस्कार होगा । हंसमन्त्रका सम्पुट करनेसे एक हजार जपद्वारा मन्त्रका दूसरा ' दीपन ' संस्कार होता है । यथा — हंसः रामाय नमः सोऽहम् । हूँ - बीज - सम्पुटित मन्त्रका पाँच हजार जप करनेसे ' बोधन ' नामक तीसरा संस्कार होता है । यथा— हूँ रामाय नमः हूँ । फट् - सम्पुटित मन्त्रका एक हजार जप करनेसे ' ताड़न ' नामक चतुर्थ संस्कार होता है । यथा - फट् रामाय नमः फट् । भूर्जपत्रपर मन्त्र लिखकर ‘ रों हंसः ओं ' इस मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करे और उस अभिमन्त्रित जलसे अश्वत्थपत्रादिद्वारा मन्त्रका अभिषेक करे । ऐसा करनेपर ' अभिषेक ' नामक पाँचवाँ संस्कार होता है । ‘ ओं त्रों वषट् ' इन वर्णोंसे सम्पुटित मन्त्रका एक हजार जप करनेसे ' विमलीकरण ' नामक छठा संस्कार होता है यथा - ओं त्रों वषट् रामाय नमः वषट् त्रों ओं । स्वधा - वषट् - सम्पुटित मूलमन्त्रका एक हजार जप करनेसे ' जीवन ' नामक सातवाँ संस्कार होता है । यथा - स्वधा वषट् रामाय नमः वषट् स्वधा । दुग्ध, जल एवं घृतके द्वारा मूलमन्त्रसे सौ बार तर्पण करना ही ' तर्पण ' संस्कार है । ह्रीं - बीज - सम्पुटित एक हजार जप करनेसे ' गोपन ' नामक नवम संस्कार होता है । यथा - ह्रीं रामाय नमः ह्रीं । ह्रौं - बीज - सम्पुटित एक हजार जप करनेसे ' आप्यायन ' नामक दसवाँ संस्कार होता है । यथा - ह्रौं रामाय नमः ह्रौं । इस प्रकार संस्कृत किया हुआ मन्त्र शीघ्र सिद्धिप्रद होता है । १. षडध्व - शोधनका कार्य हौत्री दीक्षाके अन्तर्गत है । उसमें पहले कुण्डमें या वेदीपर अग्निस्थापन होता है । वहाँ षडध्वाका शोधन करके होमसे ही दीक्षा सम्पन्न होती है । विस्तार - भयसे अधिक विवरण नहीं दिया जा रहा है ।
पृष्ठ 137
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] विद्येश्वरसंहिता १२५ क्रियातपोजपैर्युक्तास्त्रिविधाः शिवयोगिनः ॥ २७
धनादिविभवैश्चैव कराद्यङ्गैर्नमादिभिः ।
क्रियया पूजया युक्तः क्रियायोगीति कथ्यते ॥ २८
पूजायुक्तश्च मितभुग्बाह्येन्द्रियजयान्वितः ॥
परद्रोहादिरहितस्तपोयोगीति कथ्यते ॥ २ ९
एतैर्युक्तः सदा शुद्धः सर्वकामादिवर्जितः ।
सदा जपपरः शान्तो जपयोगीति तं विदुः ॥ ३०
उपचारैः षोडशभिः पूजया शिवयोगिनाम् ।
सालोक्यादिक्रमेणैव शुद्धो मुक्तिं लभेन्नरः ॥ ३१
जपयोगमथो वक्ष्ये गदतः शृणुत द्विजाः ।
तपः कर्तुर्जपः प्रोक्तो यज्जपन्परिमार्जते ॥ ३२
शिवनाम नमः पूर्वं चतुर्थ्यां पञ्चतत्त्वकम् ।
स्थूलप्रणवरूपं हि शिवपञ्चाक्षरं द्विजाः ॥ ३३
पञ्चाक्षरजपेनैव सर्वसिद्धिं लभेन्नरः ।
प्रणवेनादिसंयुक्तं सदा पञ्चाक्षरं जपेत् ॥ ३४
गुरूपदेशं सङ्गम्य सुखवासे सुभूतले ।
पूर्वपक्षे समारभ्य कृष्णभूतावधि द्विजाः ॥ ३५
माघं भाद्रं विशिष्टं तु सर्वकालोत्तमोत्तमम् । क्रिया, तप और जपके योगसे शिवयोगी तीन प्रकारके होते हैं— [ वे क्रमशः क्रियायोगी, तपोयोगी और जपयोगी कहलाते हैं । ] जो धन आदि वैभवोंसे पूजा - सामग्रीका संचय करके हाथ आदि अंगोंसे नमस्कारादि क्रिया करते हुए इष्टदेवकी पूजामें लगा रहता है, वह ‘ क्रियायोगी ' कहलाता है । पूजामें | संलग्न रहकर जो परिमित भोजन करता हुआ बाह्य इन्द्रियोंको जीतकर वशमें किये रहता है और मनको भी वशमें करके परद्रोह आदिसे दूर रहता है, वह ‘ तपोयोगी ' कहलाता है । इन सभी सद्गुणोंसे युक्त होकर जो सदा शुद्धभावसे रहता तथा समस्त काम आदि दोषोंसे रहित हो शान्तचित्तसे निरन्तर जप किया करता है, उसे महात्मा पुरुष ' जपयोगी ' मानते हैं । जो मनुष्य सोलह प्रकारके उपचारोंसे शिवयोगी महात्माओंकी पूजा करता है, वह शुद्ध होकर सालोक्य आदिके क्रमसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट मुक्तिको प्राप्त कर लेता है ॥ २७–३१ ॥ हे द्विजो! अब मैं जपयोगका वर्णन करता हूँ, आप सब लोग ध्यान देकर सुनें । तपस्या करनेवालेके लिये जपका उपदेश किया गया है; क्योंकि वह जप करते - करते अपने आपको सर्वथा शुद्ध ( निष्पाप ) कर लेता है । हे ब्राह्मणो! पहले ' नमः ' पद हो, उसके बाद चतुर्थी विभक्तिमें ' शिव ' शब्द हो, तो पंचतत्त्वात्मक ' नमः शिवाय ' मन्त्र होता है । इसे ' शिव - पंचाक्षर ' कहते हैं । यह स्थूल प्रणवरूप है । इस पंचाक्षरके जपसे ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है । पंचाक्षरमन्त्रके आदिमें ओंकार लगाकर ही सदा उसका जप करना चाहिये । हे द्विजो! गुरुके मुखसे पंचाक्षरमन्त्रका उपदेश पाकर जहाँ सुखपूर्वक निवास किया जा सके, ऐसी उत्तम भूमिपर महीनेके पूर्वपक्ष ( शुक्ल ) -में प्रतिपदासे आरम्भ करके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक निरन्तर जप करता रहे । माघ और भादोंके महीने अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं । यह समय सब समयोंसे उत्तमोत्तम माना गया है ॥ ३२-३५१ / २ ॥
पृष्ठ 138
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२६ एकवारं मिताशी तु वाग्यतो नियतेन्द्रियः स्वस्य राजपितॄणां च नित्यं शुश्रूषणं चरेत् सहस्रजपमात्रेण भवेच्छुद्धोऽन्यथा ऋणी पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षं जपेच्छिवमनुस्मरन् पद्मासनस्थं शिवदं गङ्गाचन्द्रकलान्वितम् वामोरुस्थितशक्त्या च विराजन्तं महागणैः मृगटङ्कधरं देवं वरदाभयपाणिकम् सदानुग्रहकर्तारं सदाशिवमनुस्मरन् सम्पूज्य मनसा पूर्वं हृदि वा सूर्यमण्डले जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां प्राङ्मुखः शुद्धकर्मकृत् प्रातः कृष्णचतुर्दश्यां नित्यकर्म समाप्य च मनोरमे शुचौ देशे नियतः शुद्धमानसः पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य सहस्त्रं द्वादशं जपेत् वरयेच्च सपत्नीकान् शैवान्वै ब्राह्मणोत्तमान् एकं गुरुवरं शिष्टं वरयेत्साम्बमूर्तिकम् ॥ ईशानं चाथ पुरुषमघोरं वाममेव च । सद्योजातं च पञ्चैव शिवभक्तान्द्विजोत्तमान्
पूजाद्रव्याणि सम्पाद्य शिवपूजां समारभेत् ।
शिवपूजां च विधिवत्कृत्वा होमं समारभेत् ॥
मुखान्तं च स्वसूत्रेण कृत्वा होमं समाचरेत् ।
दशैकं वा शतैकं वा सहस्त्रैकमथापि वा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ ॥ ३६ साधकको चाहिये कि वह प्रतिदिन एक | परिमित भोजन करे, मौन रहे, इन्द्रियोंको वशमें रखे बार । अपने स्वामी एवं माता - पिताकी नित्य सेवा करे ।, । । नियमसे रहकर जप करनेवाला पुरुष एक इस ॥ ३७ जपसे ही शुद्ध हो जाता है, अन्यथा वह ऋणी हजार होता | है | भगवान् शिवका निरन्तर चिन्तन करते हुए पंचाक्षर-। मन्त्रका पाँच लाख जप करे । [ जपकालमें इस प्रकार ॥ ३८ ध्यान करे ] कल्याणदाता भगवान् शिव कमलके आसनपर विराजमान हैं, उनका मस्तक श्रीगंगाजी तथा चन्द्रमाकी कलासे सुशोभित है, उनकी बायीं । जाँघपर आदिशक्ति भगवती उमा बैठी हैं, वहाँ खड़े ॥ ३ ९ हुए बड़े - बड़े गण भगवान् शिवकी शोभा बढ़ा रहे हैं, महादेवजी अपने चार हाथोंमें मृगमुद्रा, टंक तथा वर । एवं अभयकी मुद्राएँ धारण किये हुए हैं । इस प्रकार ॥ ४० सदा सबपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् सदाशिवका बार - बार स्मरण करते हुए हृदय अथवा सूर्यमण्डलमें पहले उनकी मानसिक पूजा करके फिर पूर्वाभिमुख ।....... हो पूर्वोक्त पंचाक्षरी विद्याका जप करे । उन दिनों ॥ ४१ साधक सदा शुद्ध कर्म ही करे । जपकी समाप्तिके दिन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको प्रातःकाल नित्यकर्म । सम्पन्न करके शुद्ध एवं सुन्दर स्थानमें [ शौच-॥ ४२ संतोषादि ] नियमोंसे युक्त होकर शुद्ध हृदयसे पंचाक्षर-मन्त्रका बारह हजार जप करे ॥ ३६-४२ ॥ । तत्पश्चात् सपत्नीक पाँच ब्राह्मणोंका, जो श्रेष्ठ ४३ एवं शिवभक्त हों, वरण करे । इनके अतिरिक्त एक श्रेष्ठ आचार्यका भी वरण करे और उसे साम्बसदाशिवका स्वरूप समझे । ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात — इन पाँचोंके प्रतीकस्वरूप श्रेष्ठ और शिवभक्त ॥ ४४ ब्राह्मणोंका वरण करनेके पश्चात् पूजन - सामग्रीको । एकत्र करके भगवान् शिवका पूजन आरम्भ करे । | विधिपूर्वक शिवकी पूजा सम्पन्न करके होम आरम्भ । करे । अपने गृह्यसूत्रके अनुसार मुखान्त कर्म करने ४५ [ अर्थात् परिसमूहन, उपलेपन, उल्लेखन, मृद् - उद्धरण | और अभ्युक्षण - इन पंच भू - संस्कारोंके पश्चात् वेदीपर स्वाभिमुख अग्निको स्थापित करके कुशकण्डिका | करनेके अनन्तर प्रज्वलित अग्निमें आज्यभागान्त ४६ आहुति देकर ] पश्चात् होमका कार्य आरम्भ करे ।
पृष्ठ 139
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] विद्येश्वरसंहिता १२७
कापिलेन घृतेनैव जुहुयात्स्वयमेव हि ।
कारयेच्छिवभक्तैर्वाप्यष्टोत्तरशतं बुधः ॥
होमान्ते दक्षिणा देया गुरोर्गोमिथुनं तथा ।
ईशानादिस्वरूपांस्तान्गुरुं साम्बं विभाव्य च ॥
तेषां पत्सिक्ततोयेन स्वशिरः स्नानमाचरेत् ।
षट्त्रिंशत्कोटितीर्थेषु सद्यः स्नानफलं लभेत् ॥
दशाङ्गमन्नं तेषां वै दद्याद्वै भक्तिपूर्वकम् ।
पराबुद्ध्या गुरोः पत्नीमीशानादिक्रमेण तु ॥
परमान्नेन सम्पूज्य यथाविभवविस्तरम् ।
रुद्राक्षवस्त्रपूर्वं च वटकापूपकैर्युतम् ॥
बलिदानं ततः कृत्वा भूरि भोजनमाचरेत् ।
ततः सम्प्रार्थ्य देवेशं जपं तावत्समापयेत् ॥
पुरश्चरणमेवं तु कृत्वा मन्त्री भवेन्नरः ।
पुनश्च पञ्चलक्षेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥
अतलादि समारभ्य सत्यलोकावधि क्रमात् । कपिला गायके घीसे ग्यारह, एक सौ एक अथवा ४७ | एक हजार एक आहुतियाँ स्वयं ही दे अथवा विद्वान् पुरुष शिवभक्त ब्राह्मणोंसे एक सौ आठ आहुतियाँ दिलाये ॥ ४३-४७ ॥ होमकर्म समाप्त होनेपर गुरुको दक्षिणा ४८ रूपमें एक गाय और बैल देने चाहिये । ईशान आदिके प्रतीकरूप जिन पाँच ब्राह्मणोंका वरण किया गया हो, उनको ईशान आदिका ही स्वरूप समझे तथा आचार्यको ४ ९ साम्बसदाशिवका स्वरूप माने । इसी भावनाके साथ उन सबके चरण धोये और उनके चरणोदकसे अपने मस्तकको सींचे । ऐसा करनेसे वह साधक छत्तीस करोड़ ५० तीर्थोंमें स्नान करनेका फल तत्काल प्राप्त कर लेता है । उन ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक दशांग अन्न देना चाहिये । ५१ गुरुपत्नीको पराशक्ति मानकर उनका भी पूजन करे । ईशानादि - क्रमसे उन सभी ब्राह्मणोंका उत्तम अन्नसे पूजन करके अपने वैभव- विस्तारके अनुसार रुद्राक्ष, ५२ वस्त्र, बड़ा और पूआ आदि अर्पित करे । तदनन्तर दिक्पालादिको बलि देकर ब्राह्मणोंको भरपूर भोजन कराये । इसके बाद देवेश्वर शिवसे प्रार्थना करके ५३ अपना जप समाप्त करे । इस प्रकार पुरश्चरण करके मनुष्य उस मन्त्रको सिद्ध कर लेता है । फिर पाँच लाख पञ्चलक्षजपात्तत्तल्लोकैश्वर्यमवाप्नुयात् ॥ ५४ जप करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है ।
मध्ये मृतश्चेद्भोगान्ते भूमौ तज्जापको भवेत् ।
पुनश्च पञ्चलक्षेण ब्रह्मसामीप्यमाप्नुयात् ॥
पुनश्च पञ्चलक्षेण सारूप्यैश्वर्यमाप्नुयात् ।
आहत्य शतलक्षेण साक्षाद् ब्रह्मसमो भवेत् ॥
कार्यब्रह्मण एवं हि सायुज्यं प्रतिपद्य वै यथेष्टं भोगमाप्नोति तद् ब्रह्म प्रलयावधि तदनन्तर पुनः पाँच लाख जप करनेपर मनुष्य अतल से लेकर सत्यलोकतकके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है ॥ ४८-५४ ॥ यदि अनुष्ठान पूर्ण होनेके पहले बीचमें ही ५५ साधककी मृत्यु हो जाय तो वह परलोकमें उत्तम भोग भोगनेके पश्चात् पुनः पृथ्वीपर जन्म लेकर पंचाक्षर-मन्त्रके जपका अनुष्ठान करता है । [ समस्त लोकोंका ऐश्वर्य पानेके पश्चात् मन्त्रको सिद्ध करनेवाला ] वह ५६ पुरुष यदि पुनः पाँच लाख जप करे तो उसे ब्रह्माजीका सामीप्य प्राप्त होता है । पुनः पाँच लाख जप करनेसे उसे सारूप्य नामक ऐश्वर्य प्राप्त होता । है । सौ लाख जप करनेसे वह साक्षात् ब्रह्माके समान ॥ ५७ हो जाता है । इस तरह कार्य - ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) -का
पृष्ठ 140
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२८ पुनः कल्पान्तरे वृत्ते ब्रह्मपुत्रः स जायते पुनश्च तपसा दीप्तः क्रमान्मुक्तो भविष्यति पृथ्व्यादिकार्यभूतेभ्यो लोका वै निर्मिताः क्रमात् पातालादि च सत्यान्तं ब्रह्मलोकाश्चतुर्दश सत्यादूर्ध्वं क्षमान्तं वै विष्णुलोकाश्चतुर्दश क्षमालोके कार्यविष्णुवैकुण्ठे वरपत्तने ॥ कार्यलक्ष्म्या महाभोगी रक्षां कृत्वाधितिष्ठति तदूर्ध्वगाश्च शुच्यन्ता लोकाष्टाविंशतिः स्थिताः शुचौ लोके तु कैलासे रुद्रो वै भूतहृत्स्थितः । षडुत्तराश्च पञ्चाशदहिंसान्तास्तदूर्ध्वगाः
अहिंसालोकमास्थाय ज्ञानकैलासके पुरे ।
कार्येश्वरस्तिरोभावं सर्वान्कृत्वाधितिष्ठति ॥
तदन्ते कालचक्रं हि कालातीतस्ततः परम् ।
शिवेनाधिष्ठितस्तत्र कालश्चक्रेश्वराह्वयः ॥
माहिषं धर्ममास्थाय सर्वान्कालेन युञ्जति ।
असत्यश्चाशुचिश्चैव हिंसा चैवाथ निर्घृणा ॥
असत्यादिचतुष्पादः सर्वांशः कामरूपधृक् ।
नास्तिक्यलक्ष्मीर्दुःसङ्गो वेदबाह्यध्वनिः सदा ॥
क्रोधसङ्गः कृष्णवर्णो महामहिषवेषवान् । तावान्महेश्वरः प्रोक्तस्तिरोधास्तावदेव श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ । सायुज्य प्राप्त करके वह उस ब्रह्माका प्रलय होनेतक ॥५८ उस लोकमें यथेष्ट भोग भोगता है । फिर दूसरे | कल्पका आरम्भ होनेपर वह ब्रह्माजीका पुत्र होता है । उस समय फिर तपस्या करके दिव्य तेजसे प्रकाशित ॥ । होकर वह क्रमशः मुक्त हो जाता है ॥५५-५८ । पृथ्वी आदि कार्यस्वरूप भूतोंद्वारा पातालसे ॥ ॥ ५ ९ लेकर सत्यलोकपर्यन्त ब्रह्माजीके चौदह लोक क्रमशः निर्मित हुए हैं । सत्यलोकसे ऊपर क्षमालोकतक जो । चौदह भुवन हैं, वे भगवान् विष्णुके लोक हैं । उस ६० क्षमालोक वाले श्रेष्ठ वैकुण्ठमें महाभोगी कार्यविष्णु । कार्यलक्ष्मीसहित सबकी रक्षा करते हुए विराजमान ॥ ६१ रहते हैं । क्षमालोकसे ऊपर शुचिलोकपर्यन्त अट्ठाईस भुवन स्थित हैं । शुचिलोकके अन्तर्गत कैलासमें
प्राणियोंका संहार करनेवाले रुद्रदेव विराजमान हैं ।
॥ ६२
शुचिलोकसे ऊपर अहिंसालोकपर्यन्त छप्पन भुवनोंकी स्थिति है । अहिंसालोकका आश्रय लेकर जो ज्ञान-६३ कैलास नामक नगर शोभा पाता है, उसमें कार्यभूत महेश्वर सबको अदृश्य करके रहते हैं । अहिंसालोकके ६४ अन्तमें कालचक्रकी स्थिति है । तदनन्तर कालातीत स्थित है; जहाँ कालचक्रेश्वर नामक शिव माहिष धर्मका आश्रय लेकर सबको कालसे संयुक्त किये रहते हैं ॥५ ९ –६४१ / २ ॥ ६५ असत्य, अशुचि, हिंसा, निर्दयता – ये असत्य आदि चार पाद कामरूप धारण करनेवाले शिवके ६६ अंश हैं । नास्तिकतायुक्त लक्ष्मी, दुःसंग, वेदबाह्य शब्द, क्रोधका संग, कृष्ण वर्ण — ये महामहिषके रूपवाले हैं । यहाँतक महेश्वरके विराट् - स्वरूपका हि ॥ ६७ वर्णन किया गया । वहींतक लोकोंका तिरोधान अथवा
तदर्वाक्कर्मभोगो हि तदूर्ध्वं ज्ञानभोगकम् ।
तदर्वाक्कर्ममाया हि ज्ञानमाया तदूर्ध्वकम् ॥
मा लक्ष्मीः कर्मभोगो वै याति मायेति कथ्यते ।
मा लक्ष्मीर्ज्ञानभोगो वै याति मायेति कथ्यते ॥
। लय होता है । उससे नीचे कर्मोंका भोग है और उससे ६८ ऊपर ज्ञानका भोग, उसके नीचे कर्ममाया है और उसके ऊपर ज्ञानमाया ॥ ६५–६८ ॥ [ अब मैं कर्ममाया और ज्ञानमायाका तात्पर्य । बता रहा हूँ– ] ' मा ' का अर्थ है लक्ष्मी; उससे | कर्मभोग यात - प्राप्त होता है, इसलिये वह माया । अथवा कर्ममाया कहलाती है । इसी तरह मा अर्थात् ६ ९ लक्ष्मीसे ज्ञानभोग यात अर्थात् प्राप्त होता है, इसलिये ।