शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 181–190
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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अ ० २३ ] विद्येश्वरसंहिता १६ ९ करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत् । देना चाहिये । निवृत्तिमार्गी उपासकोंके लिये हाथपर निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते ॥ ३५ ही शिवपूजाका विधान है । उन्हें [ भिक्षा आदिसे प्राप्त ] अपने भोजनको ही नैवेद्यरूपमें अर्पित करना चाहिये । निवृत्तिमार्गियोंके लिये परात्पर सूक्ष्म लिंग ही श्रेष्ठ बताया गया है । उन्हें चाहिये कि विभूतिसे ही पूजा करें और विभूतिका ही नैवेद्य शिवको प्रदान विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत् । करें । पूजा करनेके पश्चात् उस विभूतिस्वरूप लिंगको पूजां कृत्वा तथा लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा ॥ ३६ | सिरपर सदा धारण करना चाहिये ॥ ३४-३६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे शिवनैवेद्यवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें शिवनैवेद्यवर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः भस्म, रुद्राक्ष और शिवनामके माहात्म्यका वर्णन ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते ।
तदेव व्यासतो ब्रूहि भस्ममाहात्म्यमुत्तमम् ॥
तथा रुद्राक्षमाहात्म्यं नाममाहात्म्यमुत्तमम् ।
त्रितयं ब्रूहि सुप्रीत्या ममानन्दय मानसम् ॥
सूत उवाच
साधु पृष्टं भवद्भिश्च लोकानां हितकारकम् ।
भवन्तो वै महाधन्याः पवित्राः कुलभूषणाः ॥
येषां चैव शिवः साक्षाद् दैवतं परमं शुभम् ।
सदाशिवकथा लोके वल्लभा भवतां सदा ॥
ते धन्याश्च कृतार्थाश्च सफलं देहधारणम् ।
उद्धृतं च कुलं तेषां ये शिवं समुपासते ॥
शिवनाम मुखे यस्य सदा शिवशिवेति च ।
पापानि न स्पृशन्त्येव खदिराङ्गारकं यथा ॥
ऋषिगण बोले – हे महाभाग व्यासशिष्य सूतजी! आपको नमस्कार है । अब आप परम उत्तम १ भस्म - माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥१ ॥
भस्ममाहात्म्य, रुद्राक्षमाहात्म्य तथा उत्तम नाममाहात्म्य – इन तीनोंका परम प्रसन्नतापूर्वक २ प्रतिपादन कीजिये और हमारे हृदयको आनन्दित कीजिये ॥२ ॥
सूतजी बोले- हे महर्षियो! आप लोगोंने बहुत उत्तम बात पूछी है; यह समस्त लोकोंके लिये हितकारक विषय है । आप लोग महाधन्य, पवित्र ३ तथा अपने कुलके भूषणस्वरूप हैं ॥३ ॥
इस संसारमें कल्याणकारी परमदेवस्वरूप भगवान् ४ शिव जिनके देवता हैं, ऐसे आप सबके लिये यह शिवकी कथा अत्यन्त प्रिय है ॥४ ॥
वे ही धन्य और कृतार्थ हैं, उन्हींका शरीर धारण ५ करना भी सफल है और उन्होंने ही अपने कुलका उद्धार कर लिया है, जो शिवकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥
जिनके मुखमें भगवान् शिवका नाम है, जो अपने मुखसे सदा शिव - शिव इस नामका उच्चारण करते रहते हैं, पाप उनका उसी तरह स्पर्श नहीं करते, | जैसे खदिर वृक्षके अंगारको छूनेका साहस कोई भी ६ । प्राणी नहीं कर सकता ॥ ६ ॥
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१७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं मुखं व्याहरते यदा । हे शिव! आपको नमस्कार है ( श्रीशिवाय तन्मुखं पावनं तीर्थं सर्वपापविनाशनम् ॥ ७ नमस्तुभ्यम् ) - जिस मुखसे ऐसा उच्चारण होता है,
तन्मुखं च तथा यो वै पश्यति प्रीतिमान्नरः ।
तीर्थजन्यं फलं तस्य भवतीति सुनिश्चितम् ॥
यत्र त्रयं सदा तिष्ठेदेतच्छुभतरं द्विजाः । तस्य दर्शनमात्रेण वेणीस्नानफलं लभेत्
शिवनाम विभूतिश्च तथा रुद्राक्ष एव च ।
एतत्त्रयं महापुण्यं त्रिवेणीसदृशं स्मृतम् ॥
एतत्त्रयं शरीरे च यस्य तिष्ठति नित्यशः ।
तस्यैव दर्शनं लोके दुर्लभं पापहारकम् ॥
तद्दर्शनं यथा वेणी नोभयोरन्तरं मनाक् ।
एवं यो न विजानाति स पापिष्ठो न संशयः ॥
विभूतिर्यस्य नो भाले नाङ्गे रुद्राक्षधारणम् ।
नास्ये शिवमयी वाणी तं त्यजेदधमं यथा ॥
शैवं नाम यथा गङ्गा विभूतिर्यमुना मता ।
रुद्राक्षं विधिजा प्रोक्ता सर्वपापविनाशिनी ॥
शरीरे च त्रयं यस्य तत्फलं चैकतः स्थितम् । वह मुख समस्त पापोंका विनाश करनेवाला पावन तीर्थ बन जाता है । जो मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक उस ८ मुखका दर्शन करता है, उसे निश्चय ही तीर्थसेवनजनित फल प्राप्त होता है ॥ ७-८ ॥ हे ब्राह्मणो! शिवका नाम, विभूति ( भस्म ) तथा ॥ ९ रुद्राक्ष – ये तीनों त्रिवेणीके समान परम पुण्यवाले माने गये हैं । जहाँ ये तीनों शुभतर वस्तुएँ सर्वदा रहती हैं, १० उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य त्रिवेणीस्नानका फल पा लेता है॥९ -१० ॥ जिसके शरीरपर भस्म, रुद्राक्ष और मुखमें ११ शिवनाम - ये तीनों नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका पापविनाशक दर्शन संसारमें दुर्लभ है ॥ ११ ॥
उस पुण्यात्माका दर्शन त्रिवेणीके समान ही है, १२ भस्म, रुद्राक्ष तथा शिवनामका जप करनेवाले और त्रिवेणी- इन दोनोंमें रंचमात्र भी अन्तर नहीं है - ऐसा जो नहीं जानता, वह निश्चित ही पापी है; इसमें सन्देह नहीं है ॥१२ ॥
जिसके मस्तकपर विभूति नहीं है, अंगमें रुद्राक्ष १३ नहीं है और मुखमें शिवमयी वाणी नहीं है, उसे अधम व्यक्तिके समान त्याग देना चाहिये ॥ १३ ॥
भगवान् शिवका नाम गंगा है । विभूति यमुना १४ मानी गयी है तथा रुद्राक्षको सरस्वती कहा गया है । इन तीनोंकी संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापोंका नाश करनेवाली है ॥१४ ॥
बहुत पहलेकी बात है, हितकारी ब्रह्माने जिसके एकतो वेणिकायाश्च स्नानजं तु फलं बुधैः ॥ १५ शरीरमें उक्त ये तीनों - त्रिपुण्ड्र, रुद्राक्ष और शिवनाम तदेवं तुलितं पूर्वं ब्रह्मणा हितकारिणा संयुक्त रूपसे विद्यमान थे, उनके फलको तुलाके पलड़े में समानं चैव तज्जातं तस्माद् धार्यं । एक ओर रखकर, त्रिवेणीमें स्नान करनेसे उत्पन्न फलको सदा बुधैः ॥ १६ दूसरी ओरके पलड़े में रखा और तुलनाकी, तो दोनों बराबर ही उतरे । अतएव विद्वानोंको चाहिये कि इन तीनोंको सदा अपने शरीरपर धारण करें ॥ १५-१६ ॥ तद्दिनं हि समारभ्य ब्रह्मविष्ण्वादिभिः उसी दिनसे ब्रह्मा, विष्णु आदि देव भी दर्शनमात्रसे धार्यते सुरैः । पापोंको नष्ट कर देनेवाले इन तीनों ( रुद्राक्ष, विभूति त्रितयं तच्च दर्शनात्पापहारकम् ॥ १७ और शिवनाम ) - को धारण करने लगे ॥१७ ॥
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अ ० २३ ] विद्येश्वरसंहिता १७१ ऋषय ऊचुः
ईदृशं हि फलं प्रोक्तं नामादित्रितयोद्भवम् ।
तन्माहात्म्यं विशेषेण वक्तुमर्हसि सुव्रत ॥
सूत उवाच
ऋषयो हि महाप्राज्ञाः सच्छैवा ज्ञानिनां वराः ।
तन्माहात्म्यं हि सद्भक्त्या शृणुतादरतो द्विजाः ॥
सुगूढमपि शास्त्रेषु पुराणेषु श्रुतिष्वपि ।
भवत्स्नेहान्मया विप्राः प्रकाशः क्रियतेऽधुना ॥
कस्तत्त्रितयमाहात्म्यं सञ्जानाति द्विजोत्तमाः ।
महेश्वरं विना सर्वं ब्रह्माण्डे सदसत्परम् ॥
वच्स्म्यहं नाममाहात्म्यं यथाभक्ति समासतः ।
शृणुत प्रीतितो विप्राः सर्वपापहरं परम् ॥
शिवेति नामदावाग्नेर्महापातकपर्वताः ।
भस्मीभवन्त्यनायासात्सत्यं सत्यं न संशयः ॥
पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपि शौनक । शिवनामैकनश्यानि नान्यनश्यानि सर्वथा स वैदिकः स पुण्यात्मा स धन्यः स बुधो मतः शिवनामजपासक्तो यो नित्यं भुवि मानवः भवन्ति विविधा धर्मास्तेषां सद्यः फलोन्मुखाः येषां भवति विश्वासः शिवनामजपे मुने ऋषिगण बोले — हे सुव्रत! [ भस्म, रुद्राक्ष और शिवनाम ] इन तीनोंको धारण करनेसे इस प्रकार १८ उत्पन्न होनेवाले फलका वर्णन तो आपने कह दिया है, किंतु अब आप विशेष रूपसे उनके माहात्म्यका वर्णन करें ॥ १८ ॥
सूतजी बोले- ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ! हे शिवभक्त ऋषियो और विप्रो! आप सब सद्भक्ति तथा १ ९ आदरपूर्वक उक्त भस्म, रुद्राक्ष और शिवनाम – इन तीनोंका माहात्म्य सुनें ॥ १ ९ ॥ शास्त्रों, पुराणों और श्रुतियोंमें भी इनका माहात्म्य २० अत्यन्त गूढ़ कहा गया है । हे विप्रो! आप सबके स्नेहवश इस समय मैं [ उस रहस्यको खोलकर ] प्रकाशित करने जा रहा हूँ ॥ २० ॥
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इन तीनोंकी महिमाको २१ सदसद्विलक्षण भगवान् महेश्वरके बिना दूसरा कौन भलीभाँति जान सकता है । इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ है, वह सब तो केवल महेश्वर ही जानते हैं ॥ २१ ॥
हे विप्रगण! मैं अपनी श्रद्धा - भक्तिके अनुसार २२ संक्षेपसे भगवन्नामकी महिमाका कुछ वर्णन करता हूँ । आप सबलोग प्रेमपूर्वक उसे सुनें । यह नाम-माहात्म्य समस्त पापोंको हर लेनेवाला सर्वोत्तम साधन है ॥२२ ॥
‘ शिव ’ - इस नामरूपी दावानलसे महान् पातकरूपी २३ पर्वत अनायास ही भस्म हो जाता है — यह सत्य है, सत्य है; इसमें संशय नहीं है ॥२३ ॥
हे शौनक! पापमूलक जो नाना प्रकारके दुःख ॥ २४ हैं, वे एकमात्र शिवनाम ( भगवन्नाम ) -से ही नष्ट होनेवाले हैं; दूसरे साधनोंसे सम्पूर्ण यत्न करनेपर भी पूर्णतया नष्ट नहीं होते हैं ॥२४ ॥
। जो मनुष्य इस भूतलपर सदा भगवान् शिवके ॥ २५ नामोंके जपमें ही लगा हुआ है, वह वेदोंका ज्ञाता है, वह पुण्यात्मा है, वह धन्यवादका पात्र है तथा वह विद्वान् माना गया है ॥ २५ ॥
हे मुने! जिनका शिवनामजपमें विश्वास है, । उनके द्वारा आचरित नाना प्रकारके धर्म तत्काल फल ॥ २६ । देनेके लिये उत्सुक हो जाते हैं ॥ २६ ॥
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१७२ पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवनामतः भुवि तावन्ति पापानि क्रियन्ते न नरैर्मुने ब्रह्महत्यादिपापानां राशीनप्रमितान्मुने शिवनाम द्रुतं प्रोक्तं नाशयत्यखिलान्नरैः शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ये । संसारमूलपापानि तानि नश्यन्त्यसंशयम्
संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने ।
शिवनामकुठारेण विनाशो जायते ध्रुवम् ॥
शिवनामामृतं पेयं पापदावानलार्दितैः ।
पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि ॥
शिवेति नामपीयूषवर्षधारापरिप्लुताः ।
संसारदवमध्येऽपि न शोचन्ति कदाचन ॥
शिवनाम्नि महद्भक्तिर्जाता येषां महात्मनाम् ।
तद्विधानां तु सहसा मुक्तिर्भवति सर्वथा ॥
अनेकजन्मभिर्येन तपस्तप्तं मुनीश्वर ।
शिवनाम्नि भवेद्भक्तिः सर्वपापापहारिणी ॥
यस्यासाधारणी शम्भुनाम्नि भक्तिरखण्डिता ।
तस्यैव मोक्षः सुलभो नान्यस्येति मतिर्मम ॥
कृत्वाप्यनेकपापानि शिवनामजपादरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवत्येव न संशयः ॥
भवन्ति भस्मसाद् वृक्षा दवदग्धा यथा वने ।
तथा तावन्ति दग्धानि पापानि शिवनामतः ॥
यो नित्यं भस्मपूताङ्गः शिवनामजपादरः ।
स तरत्येव संसारमघोरमपि शौनक ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ । हे महर्षे! भगवान् शिवके नामसे जितने पाप ॥ २७ नष्ट होते हैं, उतने पाप मनुष्य इस भूतलपर कर ही नहीं सकता ॥२७ ॥
। हे मुने! ब्रह्महत्या - जैसे पापोंकी समस्त अपरिमित ॥ २८ राशियाँ शिवनाम लेनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं ॥ २८ ॥
जो शिवनामरूपी नौकापर आरूढ़ होकर संसार-॥ २ ९ समुद्रको पार करते हैं, उनके जन्म - मरणरूप संसारके मूलभूत वे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ९ ॥ हे महामुने! संसारके मूलभूत पातकरूपी ३० वृक्षका शिवनामरूपी कुठारसे निश्चय ही नाश हो जाता है ॥ ३० ॥
जो पापरूपी दावानलसे पीड़ित हैं, उन्हें ३१ शिवनामरूपी अमृतका पान करना चाहिये । पापोंके दावानलसे दग्ध होनेवाले लोगोंको उस शिवनामामृतके बिना शान्ति नहीं मिल सकती ॥३१ ॥
जो शिवनामरूपी सुधाकी वृष्टिजनित धारामें ३२ गोते लगा रहे हैं, वे संसाररूपी दावानलके बीचमें खड़े होनेपर भी कदापि शोकके भागी नहीं होते ॥ ३२ ॥
जिन महात्माओंके मनमें शिवनामके प्रति बड़ी ३३ भारी भक्ति है, ऐसे लोगोंकी सहसा और सर्वथा मुक्ति होती है ॥३३ ॥
हे मुनीश्वर! जिसने अनेक जन्मोंतक तपस्या ३४ की है, उसीकी शिवनामके प्रति भक्ति होती है, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली है ॥ ३४ ॥
जिसके मनमें भगवान् शिवके नामके प्रति कभी ३५ खण्डित न होनेवाली असाधारण भक्ति प्रकट हुई है, उसीके लिये मोक्ष सुलभ है - यह मेरा मत है ॥ ३५ ॥
जो अनेक पाप करके भी भगवान् शिवके नाम-३६ जपमें आदरपूर्वक लग गया है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो ही जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ३६ ॥
जैसे वनमें दावानलसे दग्ध हुए वृक्ष भस्म हो ३७ जाते हैं, उसी प्रकार शिवनामरूपी दावानलसे दग्ध होकर उस समयतकके सारे पाप भस्म हो जाते हैं ॥ ३७ ॥
हे शौनक! जिसके अंग नित्य भस्म लगानेसे पवित्र | हो गये हैं तथा जो शिवनामजपका आदर करने लगा है, ३८ वह घोर संसारसागरको भी पार कर ही लेता है ॥ ३८ ॥
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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १७३
ब्रह्मस्वहरणं कृत्वा हत्वापि ब्राह्मणान्बहून् ।
न लिप्यते नरः पापैः शिवनामजपादरः ॥ ३ ९
विलोक्य वेदानखिलान् शिवनामजपः परः ।
संसारतरणोपाय इति पूर्वैर्विनिश्चितम् ॥ ४०
किं बहूक्त्या मुनिश्रेष्ठाः श्लोकेनैकेन वच्म्यहम् ।
शिवाभिधानमाहात्म्यं सर्वपापापहारणम् ॥ ४१
पापानां हरणे शम्भोर्नाम्नः शक्तिर्हि यावती ।
शक्नोति पातकं तावत्कर्तुं नापि नरः क्वचित् ॥ ४२
शिवनामप्रभावेण लेभे सद्गतिमुत्तमाम् ।
इन्द्रद्युम्ननृपः पूर्वं महापापयुतो मुने ॥ ४३
तथा काचिद् द्विजा योषाऽसौ मुने बहुपापिनी ।
शिवनामप्रभावेण लेभे सद्गतिमुत्तमाम् ॥ ४४
इत्युक्तं वो द्विजश्रेष्ठा नाममाहात्म्यमुत्तमम् ।
शृणुध्वं भस्ममाहात्म्यं सर्वपावनपावनम् ॥ ४५
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां ब्राह्मणोंका धनहरण और अनेक ब्राह्मणोंकी हत्या करके भी जो आदरपूर्वक शिवके नामका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता है [ अर्थात् उसे किसी भी प्रकारका पाप नहीं लगता है ] ॥ ३ ९ ॥ सम्पूर्ण वेदोंका अवलोकन करके पूर्ववर्ती महर्षियोंने यही निश्चित किया है कि भगवान् शिवके नामका जप संसारसागरको पार करनेके लिये सर्वोत्तम उपाय है ॥४० ॥
हे मुनिवरो! अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं शिव - नामके सर्वपापहारी माहात्म्यका वर्णन एक ही
श्लोकमें करता हूँ ॥ ४१ ॥
भगवान् शंकरके एक नाममें भी पापहरणकी जितनी शक्ति है, उतना पातक मनुष्य कभी कर ही नहीं सकता ॥४२ ॥
हे मुने! पूर्वकालमें महापापी राजा इन्द्रद्युम्नने शिवनामके प्रभावसे ही उत्तम सद्गति प्राप्त की थी ॥ ४३ ॥
इसी तरह कोई ब्राह्मणी युवती भी जो बहुत पाप कर चुकी थी, शिवनामके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त हुई ॥४४ ॥
हे द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे भगवन्नामके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया है । अब आप लोग भस्मका माहात्म्य सुनें, जो समस्त पावन । वस्तुओंको भी पवित्र करनेवाला है ॥४५ ॥
विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे शिवनाममाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणमें प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें शिवनाममाहात्म्यवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः भस्म - माहात्म्यका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले- हे महर्षियो! भस्म सम्पूर्ण मंगलोंको देनेवाला तथा उत्तम है, उसके दो भेद द्विविधं भस्म सम्प्रोक्तं सर्वमङ्गलदं परम् । बताये गये हैं । मैं उन भेदोंका वर्णन करता हूँ, आप तत्प्रकारमहं वक्ष्ये सावधानतया शृणु ॥ १ लोग सावधान होकर सुनिये ॥१ ॥
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१७४ एकं ज्ञेयं महाभस्म द्वितीयं स्वल्पसंज्ञकम् महाभस्म इति प्रोक्तं भस्म नानाविधं परम् तद्भस्म त्रिविधं प्रोक्तं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम् भस्मैव स्वल्पसंज्ञं हि बहुधा परिकीर्तितम् श्रौतं भस्म तथा स्मार्तं द्विजानामेव कीर्तितम् । अन्येषामपि सर्वेषामपरं भस्म लौकिकम्
धारणं मन्त्रतः प्रोक्तं द्विजानां मुनिपुङ्गवैः ।
केवलं धारणं ज्ञेयमन्येषां मन्त्रवर्जितम् ॥
आग्नेयमुच्यते भस्म दग्धगोमयसम्भवम् ।
तदपि द्रव्यमित्युक्तं त्रिपुण्ड्रस्य महामुने ॥
अग्निहोत्रोत्थितं भस्म सङ्ग्राह्यं वा मनीषिभिः ।
अन्ययज्ञोत्थितं वापि त्रिपुण्ड्रस्य च धारणे ॥
अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्जाबालोपनिषद्गतैः ।
सप्तभिर्धूलनं कार्यं भस्मना सजलेन च ॥
वर्णानामाश्रमाणां च मन्त्रतोऽमन्त्रतोऽपि च ।
त्रिपुण्ड्रोद्धूलनं प्रोक्तं जाबालैरादरेण च ॥
भस्मनोद्धूलनं चैव धृतं तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ।
प्रमादादपि मोक्षार्थी न त्यजेदिति वै श्रुतिः ॥
शिवेन विष्णुना चैव धृतं तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ।
उमादेव्या च लक्ष्म्या च स्तुतमन्यैश्च नित्यशः ॥
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैरपि च सङ्करैः ।
अपभ्रंशैर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । एकको ' महाभस्म ' जानना चाहिये और दूसरेको ॥ २ ' स्वल्पभस्म ' । महाभस्मके भी अनेक भेद हैं । वह तीन । प्रकारका कहा गया है— श्रौत, स्मार्त और लौकिक ॥ स्वल्पभस्मके भी बहुत - से भेदोंका वर्णन किया गया ॥ ३ है । श्रौत और स्मार्त भस्मको केवल द्विजोंके ही उपयोगमें आनेके योग्य कहा गया है । तीसरा जो ॥ ४ लौकिक भस्म है, वह अन्य लोगोंके भी उपयोगमें आ सकता है॥२-४ ॥ श्रेष्ठ महर्षियोंने यह बताया है कि द्विजोंको ५ वैदिक मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भस्म धारण करना चाहिये । दूसरे लोगोंके लिये बिना मन्त्रके ही केवल धारण करनेका विधान है ॥ ५ ॥
जले हुए गोबरसे उत्पन्न होनेवाला भस्म आग्नेय ६ कहलाता है । हे महामुने! वह भी त्रिपुण्ड्रका द्रव्य है - ऐसा कहा गया है ॥६ ॥
अग्निहोत्रसे उत्पन्न हुए भस्मका भी मनीषी ७ पुरुषोंको संग्रह करना चाहिये । अन्य यज्ञसे प्रकट हुआ भस्म भी त्रिपुण्ड्रधारणके काममें आ सकता है ॥ ७ ॥
जाबालोपनिषमें आये हुए ‘ अग्नि: ' इत्यादि ८ सात मन्त्रोंद्वारा जलमिश्रित भस्मसे धूलन ( विभिन्न अंगोंमें मर्दन या लेपन ) करना चाहिये ॥ ८ ॥
महर्षि जाबालिने सभी वर्गों और आश्रमोंके ९ लिये मन्त्रसे या बिना मन्त्रके भी आदरपूर्वक भस्मसे त्रिपुण्ड्र लगानेकी आवश्यकता बतायी है ॥ ९ ॥
समस्त अंगोंमें सजल भस्मको मलना १० अथवा विभिन्न अंगोंमें तिरछा त्रिपुण्ड्र लगाना —इन कार्योंको मोक्षार्थी पुरुष प्रमादसे भी न छोड़े — ऐसा श्रुतिका आदेश है ॥ १० ॥
भगवान् शिव और विष्णुने भी तिर्यक् त्रिपुण्ड्र ११ धारण किया है । अन्य देवियोंसहित भगवती उमा और लक्ष्मीदेवीने भी वाणीद्वारा इसकी प्रशंसा की है ॥ ११ ॥
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों, वर्णसंकरों तथा १२ जातिभ्रष्ट पुरुषोंने भी उद्भूलन एवं त्रिपुण्ड्रके रूपमें भस्मको धारण किया है ॥ १२ ॥
• जो लोग श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मका उद्भूलन ( लेप ) तथा त्रिपुण्ड्र धारण करनेका नहीं करते तेषां नास्ति समाचारो वर्णाश्रमसमन्वितः ॥ १३ हैं, उनमें वर्णाश्रम - समन्वित सदाचारकी आचरण कमीहै ॥ १३ ॥
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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १७५
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये ।
तेषां नास्ति विनिर्मुक्तिः संसाराज्जन्मकोटिभिः ॥
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये ।
तेषां नास्ति शिवज्ञानं कल्पकोटिशतैरपि ॥
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये ।
ते महापातकैर्युक्ता इति शास्त्रीयनिर्णयः ॥
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये ।
तेषामाचरितं सर्वं विपरीतफलाय हि ॥
महापातकयुक्तानां जन्तूनां शर्वविद्विषाम् ।
त्रिपुण्ड्रोद्धूलनद्वेषो जायते सुदृढं मुने ॥
शिवाग्निकार्यं यः कृत्वा कुर्यात्त्रियायुषात्मवित् ।
मुच्यते सर्वपापैस्तु स्पृष्टेन भस्मना नरः ॥
सितेन भस्मना कुर्यात्त्रिसन्ध्यं यस्त्रिपुण्ड्रकम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवेन सह मोदते ॥
सितेन भस्मना कुर्याल्ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम् । जिनके द्वारा श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मलेप और १४ त्रिपुण्ड्रधारणका आचरण नहीं किया जाता है, उनकी विनिर्मुक्ति करोड़ों जन्मोंमें भी संसारसे सम्भव नहीं है ॥ १४ ॥
जो श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मलेप और त्रिपुण्ड्र १५ धारणका आचारपालन नहीं करते हैं, उन्हें सौ करोड़ कल्पोंमें भी शिवका ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥
जो श्रद्धापूर्वक भस्मलेप तथा त्रिपुण्ड्रधारण नहीं १६ करते हैं, वे महापातकोंसे युक्त हो जाते हैं, ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है ॥१६ ॥
जो श्रद्धापूर्वक भस्मोद्धूलन और त्रिपुण्ड्रधारण १७ नहीं करते हैं, उन लोगोंका सम्पूर्ण आचरण विपरीत फल प्रदान करनेवाला हो जाता है ॥ १७ ॥
हे मुनियो! जो महापातकोंसे युक्त और समस्त १८ प्राणियोंसे द्वेष करनेवाले हैं, वे ही त्रिपुण्ड्रधारण तथा ॥ भस्मोद्धूलनसे अत्यधिक द्वेष करते हैं ॥१८ ॥
जो आत्मज्ञानी मनुष्य शिवाग्नि ( अग्निहोत्र ) -१ ९ का कार्य करके ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' - इस मन्त्रसे भस्मका मात्र स्पर्श ही कर लेता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १ ९ ॥ जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकालोंमें श्वेत भस्मके २० द्वारा त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवसान्निध्यका आनन्द भोगता है ॥२० ॥
जो व्यक्ति श्वेत भस्मसे अपने मस्तकपर त्रिपुण्ड्र योऽसावनादिभूतान्हि लोकानाप्तोऽमृतो भवेत् ॥ २१ धारण करता है, वह अनादिभूत लोकोंको प्राप्तकर अकृत्वा भस्मना स्नानं न जपेद्वै षडक्षरम् । त्रिपुण्ड्रं च रचित्वा तु विधिना भस्मना जपेत् अदयो वाधमो वापि सर्वपापान्वितोऽपि वा उपपापान्वितो वापि मूर्खो वा पतितोऽपि वा यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं भूतिशासनसंयुतः सर्वतीर्थैश्च क्रतुभिः सान्निध्यं क्रियते सदा त्रिपुण्ड्रसहितो जीवः पूज्यः सर्वैः सुरासुरैः पापान्वितोऽपि शुद्धात्मा किं पुनः श्रद्धया युतः अमर हो जाता है ॥ २१ ॥
बिना भस्मस्नान किये षडक्षर [ ' ॐ नमः ॥ २२ शिवाय ' ] मन्त्रका जप नहीं करना चाहिये । विधिपूर्वक भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करके ही इसका जप करना चाहिये ॥२२ ॥
। दयाहीन, अधम, महापापोंसे युक्त, उपपापोंसे ॥ २३ युक्त, मूर्ख अथवा पतित व्यक्ति भी जिस देशमें नित्य । भस्म धारण करते रहते हैं, वह देश सदैव सम्पूर्ण ॥ २४ तीर्थों और यज्ञोंसे परिपूर्ण ही रहता है ॥ २३-२४ ॥ त्रिपुण्ड्रधारण करनेवाला पापी जीव भी समस्त । देवों और असुरोंके द्वारा पूज्य है । यदि पुण्यात्मा त्रिपुण्ड्रसे ॥ २५ युक्त है, तो उसके लिये कहना ही क्या ॥ २५ ॥
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१७६ यस्मिन्देशे शिवज्ञानी भूतिशासनसंयुतः गतो यदृच्छयाद्यापि तस्मिंस्तीर्थाः समागताः बहुनात्र किमुक्तेन धार्यं भस्म सदा बुधैः लिङ्गार्चनं सदा कार्यं जप्यो मन्त्रः षडक्षरः ब्रह्मणा विष्णुना वापि रुद्रेण मुनिभिः सुरैः भस्मधारणमाहात्म्यं न शक्यं परिभाषितुम्
इति वर्णाश्रमाचारो लुप्तवर्णक्रियोऽपि च ।
पापात्सकृत्त्रिपुण्ड्रस्य धारणात्सोऽपि मुच्यते ॥
ये भस्मधारिणं त्यक्त्वा कर्म कुर्वन्ति मानवाः ।
तेषां नास्ति विनिर्मोक्षः संसाराज्जन्मकोटिभिः ॥
तेनाधीतं गुरोः सर्वं तेन सर्वमनुष्ठितम् ।
येन विप्रेण शिरसि त्रिपुण्ड्रं भस्मना कृतम् ॥
ये भस्मधारिणं दृष्ट्वा नराः कुर्वन्ति ताडनम् ।
तेषां चण्डालतो जन्म ब्रह्मन्नूह्यं विपश्चिता ॥
मानस्तोकेन मन्त्रेण मन्त्रितं भस्म धारयेत् ।
ब्राह्मणः क्षत्रियश्चैव प्रोक्तेष्वङ्गेषु भक्तिमान् ॥
वैश्यस्त्रियम्बकेनैव शूद्रः पञ्चाक्षरेण तु ।
अन्यासां विधवास्त्रीणां विधिः प्रोक्तश्च शूद्रवत् ॥
पञ्चब्रह्मादिमनुभिर्गृहस्थस्य विधीयते ।
त्रियम्बकेन मनुना विधिर्वै ब्रह्मचारिणः ॥
अघोरेणाथ मनुना विपिनस्थविधिः स्मृतः ।
यतिस्तु प्रणवेनैव त्रिपुण्ड्रादीनि कारयेत् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । भस्म धारण करनेवाला शिवज्ञानी जिस देशमें ॥ २६ स्वेच्छया चला जाता है, उस देशमें समस्त तीर्थ आ जाते हैं ॥ २६ ॥
। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय! ॥ २७ विद्वानोंको सदैव भस्म धारण करना चाहिये एवं लिंगार्चन करके षडक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २७ ॥
। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, मुनिगण और देवताओंके ॥ २८ द्वारा भी भस्म - धारण करनेके महत्त्वका वर्णन किया जाना सम्भव नहीं है ॥ २८ ॥
जिसने अपने वर्ण तथा आश्रमधर्मसे सम्बन्धित २ ९ आचार तथा क्रियाएँ लुप्त कर दी हैं, यदि वह भी त्रिपुण्ड्र धारण करता है, तो समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ९ ॥ जो भस्मधारण करनेवालेको त्यागकर धार्मिक ३० कृत्य करते हैं, उनको करोड़ों जन्म लेनेपर भी संसारसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो पाती है ॥ ३० ॥
जिस ब्राह्मणने भस्मसे अपने सिरपर त्रिपुण्ड्र धारण ३१ कर लिया है, उसने मानो गुरुसे सब कुछ पढ़ लिया है और सभी धार्मिक अनुष्ठान कर लिये हैं ॥ ३१ ॥
जो मनुष्य भस्म धारण करनेवालेको देखकर ३२ उसे कष्ट देते हैं, वे निश्चित ही चाण्डालसे उत्पन्न हुए हैं – ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये ॥ ३२ ॥
भक्तिपरायण ब्राह्मण और क्षत्रियको ' मा नस्तोके ३३ तनये ० ' – इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मको शास्त्रसम्मत कहे गये अंगोंपर धारण करना चाहिये ॥ ३३ ॥
वैश्य ‘ त्र्यम्बकं यजामहे ' – इस मन्त्रसे और ३४ शूद्र ' शिवाय नमः ' – इस पंचाक्षरमन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रितकर धारण करे; विधवा स्त्रियोंके लिये [ भस्म-धारणकी ] विधि शूद्रोंके समान कही गयी है ॥ ३४ ॥
पाँच ब्रह्मादि मन्त्रों * से [ अभिमन्त्रित भस्मके ३५ द्वारा ] गृहस्थ त्रिपुण्ड्र धारण करे । ब्रह्मचारी ‘ त्र्यम्बकं यजामहे ' –— इस मन्त्रसे [ भस्मको अभिमन्त्रित करके ] और वानप्रस्थी ‘ अघोरेभ्योऽथ ० ' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करके त्रिपुण्ड्र धारण करे, किंतु यति [ संन्यासी ] प्रणवके मन्त्रसे [ भस्मको अभिमन्त्रित ३६ । करके ] त्रिपुण्ड्र धारण करे ॥ ३५-३६ ॥ ' अघोर, ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेवके मन्त्र ही पंचब्रह्मके ध्यान हैं ॥ ये मन्त्र पृ ० सं ० ८० पर दिये गये हैं ।
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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १७७
अतिवर्णाश्रमी नित्यं शिवोऽहं भावनात्परात् ।
शिवयोगी च नियतमीशानेनापि धारयेत् ॥ ३७
न त्याज्यं सर्ववर्णैश्च भस्मधारणमुत्तमम् ।
अन्यैरपि यथा जीवैः सदेति शिवशासनम् ॥ ३८
भस्मस्नानेन यावन्तः कणाः स्वाङ्गे प्रतिष्ठिताः ।
तावन्ति शिवलिङ्गानि तनौ धत्ते हि धारकः ॥ ३ ९
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चापि च सङ्कराः ।
स्त्रियोऽथ विधवा बालाः प्राप्ता पाखण्डिकास्तथा ॥ ४०
ब्रह्मचारी गृही वन्यः संन्यासी वा व्रती तथा ।
नार्यो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का मुक्ता एव न संशयः ॥ ४१
ज्ञानाज्ञानधृतो वापि वह्निदाहसमो यथा ।
ज्ञानाज्ञानधृतं भस्म पावयेत्सकलं नरम् ॥ ४२
नाश्नीयाज्जलमन्नमल्पमपि वा भस्माक्षधृत्या विना भुक्त्वा वाथ गृही वनीपतियतिर्वर्णी तथा सङ्करः 1 एनोभुङ् नरकं प्रयाति स तदा गायत्रिजापेन तद् वर्णानां तु यतेस्तु मुख्यप्रणवाजापेन मुक्तिर्भवेत् ॥ ४३
त्रिपुण्ड्रं ये विनिन्दन्ति निन्दन्ति शिवमेव ते ।
धारयन्ति च ये भक्त्या धारयन्ति तमेव ते ॥ ४४
धिग्भस्मरहितं भालं धिग्ग्राममशिवालयम् ।
धिगनीशार्चनं जन्म धिग्विद्यामशिवाश्रयाम् ॥ ४५
जो वर्णाश्रम धर्मसे परे है, वह ' शिवोऽहं'-इस भावनासे नित्य त्रिपुण्ड्र धारण करे और जो शिवयोगी है, वह ' ईशानः सर्वविद्यानाम् ' –इस भावनाको करता हुआ त्रिपुण्ड्र धारण करे ॥ ३७ ॥
सभी वर्णोंके द्वारा भस्म धारण करनेके इस उत्तम कार्यको नहीं छोड़ना चाहिये; अन्य जीवोंको भी सदा भस्म धारण करना चाहिये - ऐसा भगवान् शिवका आदेश है ॥ ३८ ॥
भस्म - स्नान करनेसे जितने कण शरीरमें प्रवेश करते हैं, उतने ही शिवलिंगोंको वह धारक अपने शरीरमें धारण करता है ॥ ३ ९ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री ( सधवा ), विधवा, बालक, पाखण्डी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी, संन्यासी, व्रती और संन्यासिनी स्त्रियाँ– ये सभी भस्मके त्रिपुण्ड धारणके प्रभावके द्वारा मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४०-४१ ॥ जैसे ज्ञानवश या अज्ञानवश धारण की गयी अग्नि सबको समान रूपसे जलाती है, वैसे ही ज्ञान या अज्ञानवश धारण किया गया भस्म भी समानरूपसे सभी मनुष्योंको पवित्र करता है ॥४२ ॥
भस्म तथा रुद्राक्ष - धारणके बिना जल अथवा अन्नको अंशमात्र भी नहीं खाना चाहिये । गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और वर्णसंकर जातिका व्यक्ति यदि भस्म एवं रुद्राक्षको धारण किये बिना भोजन करता है, तो वह मात्र पाप ही खाता है और नरककी ओर प्रस्थान करता है । ऐसे समयमें उक्त वर्णधर्मोका वह व्यक्ति गायत्री मन्त्रके जपसे तथा यति ( संन्यासी ) मुख्य प्रणवमन्त्र जपसे प्रायश्चित्त करके मुक्ति प्राप्त कर सकता है ॥४३ ॥
जो त्रिपुण्ड्रकी निन्दा करते हैं, वे साक्षात् शिवकी ही निन्दा करते हैं और जो त्रिपुण्ड्रको धारण करते हैं, वे साक्षात् उन्हीं शिवको ही धारण करते हैं ॥ ४४ ॥
भस्मरहित भालको धिक्कार है, शिवालय ( शिवमन्दिर ) -रहित ग्रामको धिक्कार है, शिवार्चनसे रहित जन्मको धिक्कार है और शिवज्ञानरहित विद्याको | धिक्कार है ॥ ४५ ॥
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१७८ ये निन्दन्ति महेश्वरं त्रिजगतामाधारभूतं हरं ये निन्दन्ति त्रिपुण्ड्रधारणकरं दोषस्तु तद्दर्शने ते वै सङ्करसूकरासुरखरश्वक्रोष्टुकीटोपमा जाता एव भवन्ति पापपरमास्ते नारकाः केवलम् ते दृष्ट्वा शशिभास्करौ निशि दिने स्वप्नेऽपि नो केवलं पश्यन्तु श्रुतिरुद्रसूक्तजपतो मुच्येत तेनादृताः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ जो लोग तीनों लोकोंके आधारस्वरूप महेश्वर भगवान् शिवकी निन्दा करते हैं और त्रिपुण्ड्र धारण । करनेवालेकी निन्दा करते हैं, उनको तो देखनेसे ही पाप लगता है । वे वर्णसंकर, सुअर, असुर, खर ( गधा ), ॥ ४६ श्वान ( कुत्ता ), क्रोष्टु ( सियार ) तथा कीड़े - मकोड़े के समान ही उत्पन्न होते हैं और उन नरकगामी व्यक्तियोंका [ यह ] जन्म मात्र पाप करनेके लिये ही होता है ॥ ४६ ॥
भगवान् शिवकी तथा त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले उनके भक्तोंकी जो निन्दा करते हैं, उन्हें रातमें देखनेपर चन्द्रमाके दर्शनसे और दिनमें देखनेपर सूर्यके तत्सम्भाषणतो भवेद्धि नरकं निस्तारवानास्थितं दर्शनसे शुद्धि प्राप्त होती है । [ मात्र, इतना ही नहीं ये भस्मादिविधारणं हि पुरुषं निन्दन्ति मन्दा हि ते ॥
न तान्त्रिकस्त्वधिकृतो नोर्ध्वपुण्ड्रधरो मुने ।
सन्तप्तचक्रचिह्नोऽत्र शिवयज्ञे बहिष्कृतः ॥
तत्रैते बहवो लोका बृहज्जाबालचोदिताः ।
ते विचार्याः प्रयत्नेन ततो भस्मरतो भवेत् ॥
यच्चन्दनैश्चन्दनकेऽपि मिश्रं धार्यं हि भस्मैव त्रिपुण्ड्रभस्मना । विभूतिभालोपरि किञ्चनापि धार्यं सदा नो यदि सन्ति बुद्धयः ॥ स्त्रीभिस्त्रिपुण्ड्रमलकावधि धारणीयं
भस्म द्विजादिभिरथो विधवाभिरेवम् ।
तद्वत्सदाश्रमवतां विशदा विभूति-र्धार्यापवर्गफलदा सकलाघहन्त्री ॥
स्वप्नमें भी उन्हें देखनेसे पाप लगता है, अतः ] स्वप्नमें ४७ जो उन्हें देखे, उसको अपनी शुद्धिके लिये श्रुतिमें कहे गये रुद्रसूक्तका आदरपूर्वक पाठ करना चाहिये, तभी उससे छुटकारा मिल सकता है । उनसे बात करनेसे नरक होता है । उस नरकसे मुक्ति प्राप्त करना असम्भव है । जो भस्म - -1 त्रिपुण्ड्र आदि धारण करनेवाले पुरुषकी निन्दा करते हैं, वे निश्चित ही मूर्ख हैं ॥ ४७ ॥
हे मुने! तान्त्रिक, ऊर्ध्वत्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले ४८ तथा तपाये हुए चक्र आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले इस शिवयज्ञके अधिकारी नहीं हैं, वे इस यज्ञसे बहिष्कृत हैं ॥४८ ॥
बृहज्जाबालोपनिषद् में कहे गये वे लोग ही उस ४ ९ यज्ञमें अधिकारी हैं । प्रयत्नपूर्वक उन्हें शिवयज्ञके कार्यमें सम्मिलित करना चाहिये । उन्हें भस्म लगाना चाहिये ॥ ४ ९ ॥ विभूतिका चन्दनसे या चन्दनमें विभूतिका मिश्रणकर बनाये गये मिश्रित भस्मसे [ मस्तकपर ] त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । कुछ भी हो मस्तकपर विभूति धारण ५० करना आवश्यक है । यदि बुद्धि नहीं है, तो भी यह करना सदा लोगोंके लिये आवश्यक ही है ॥ ५० ॥
ब्रह्मचारिणी, सधवा तथा विधवा स्त्रियों और । ब्राह्मणादि द्विजोंको केशपर्यन्त भस्म धारण करना चाहिये । इसी प्रकार ब्रह्मचर्यादि आश्रमवालोंको भी स्वच्छ विभूति | धारण करना उचित है; क्योंकि विभूति मोक्ष देनेवाली ५१ और समस्त पापोंका नाश करनेवाली है ॥ ५१ ॥