शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 191–200

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १७ ९

त्रिपुण्ड्रं कुरुते यस्तु भस्मना विधिपूर्वकम् ।

महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः ॥५२

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः ।

ब्रह्मक्षत्राश्च विट्शूद्रास्तथान्ये पतिताधमाः ॥ ५३

उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च धृत्वा शुद्धा भवन्ति च ।

भस्मनो विधिना सम्यक् पापराशिं विहाय च ॥ ५४

भस्मधारी विशेषेण स्त्रीगोहत्यादिपातकैः ।

वीरहत्याश्वहत्याभ्यां मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५५

परद्रव्यापहरणं परदाराभिमर्शनम् ।

परनिन्दां परक्षेत्रहरणं परपीडनम् ॥ ५६

सस्यारामादिहरणं गृहदाहादिकर्म च ।

गोहिरण्यमहिष्यादितिलकम्बलवाससाम् ॥५७

अन्नधान्यजलादीनां नीचेभ्यश्च परिग्रहः ।

दाशवेश्यामतङ्गीषु वृषलीषु नटीषु च ॥ ५८

रजस्वलासु कन्यासु विधवासु च मैथुनम् ।

मांसचर्मरसादीनां लवणस्य च विक्रयः ॥ ५ ९

पैशुन्यं कूटवादश्च साक्षिमिथ्याभिलाषिणाम् ।

एवमादीन्यसङ्ख्यानि पापानि विविधानि च ।

सद्य एव विनश्यन्ति त्रिपुण्ड्रस्य च धारणात् ॥ ६०

शिवद्रव्यापहरणं शिवनिन्दा च कुत्रचित् ।

निन्दा च शिवभक्तानां प्रायश्चित्तैर्न शुध्यति ॥ ६१

रुद्राक्षं यस्य गात्रेषु ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम् ।

स चाण्डालोऽपि सम्पूज्यः सर्ववर्णोत्तमोत्तमः ॥ ६२

यानि तीर्थानि लोकेऽस्मिन् गङ्गाद्याः सरितश्च याः ।

स्नातो भवति सर्वत्र ललाटे यस्त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ६३

जो भस्मद्वारा विधिपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह [ ब्रह्महत्यादि ] महापातकसमूहों और [ उच्छिष्ट अन्नादिभक्षण ] उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५२ ॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी [ ये चारों आश्रम ]; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य वर्णसंकर [ ये चारों वर्ण और उपवर्णके लोग ]; | पतित अथवा नीच मनुष्य भी विधिपूर्वक शरीरपर भस्म - उद्धूलन और त्रिपुण्ड्र धारण करके शुद्ध हो जाते हैं; [ क्योंकि ] सम्यक् रूपसे [ धारण की गयी ] भस्मसे [ तत्काल ही ] पापराशिसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥५३-५४ ॥ भस्म धारण करनेवाला व्यक्ति विशेष रूपसे स्त्रीहत्या, गोहत्या, वीरहत्या और अश्वहत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥

दूसरेके द्रव्यका अपहरण, परायी स्त्रीका अभिमर्शन, दूसरेकी निन्दा, पराये खेतका अपहरण, दूसरेको कष्ट देना, फसल और बाग आदिका अपहरण, घर फूँकना ( जलाना ) आदि कर्म, नीचोंसे गाय, सोना, भैंस, तिल - कम्बल, वस्त्र, अन्न, धान्य तथा जल आदिका परिग्रह, दाश ( मछुवारा ), वेश्या, मतंगी, ( चाण्डाली ), शूद्रा, नटी, रजस्वला, कन्या और विधवा [ स्त्रियों ] -से मैथुन, मांस, चर्म, रस तथा नमकका विक्रय, पैशुन्य ( चुगली ) और अस्पष्ट बात, असत्य गवाही आदि देना - इस प्रकारसे अन्य असंख्य विभिन्न प्रकारके पाप त्रिपुण्ड्र धारण करनेके प्रभावसे तत्काल ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ५६–६० ॥ भगवान् शिवके द्रव्यका अपहरण और जहाँ-कहीं शिवकी निन्दा करनेवाला तथा शिवके भक्तोंकी निन्दा करनेवाला व्यक्ति प्रायश्चित्त करनेपर भी शुद्ध नहीं होता है ॥ ६१ ॥

जिसने शरीरपर रुद्राक्ष और मस्तकपर त्रिपुण्ड्र धारण किया है, ऐसा मनुष्य यदि चाण्डाल भी है, तो भी वह सभी वर्णोंमें श्रेष्ठतम और सम्पूज्य है ॥ ६२ ॥

जो मस्तकपर त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह इस संसारमें जितने भी तीर्थ हैं और गंगा आदि जितनी नदियाँ हैं, उन सबमें स्नान किये हुएके समान । [ पुण्यफल प्राप्त करनेवाला ] होता है ॥६३ ॥

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१८० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ सप्तकोटिमहामन्त्राः पञ्चाक्षरपुरस्सराः । पंचाक्षरमन्त्रसे लेकर सात करोड़ महामन्त्र और तथान्ये कोटिशो मन्त्राः शैवकैवल्यहेतवः ॥ ६४ अन्य करोड़ों मन्त्र शिवकैवल्यको प्रदान करनेवाले होते हैं ॥६४ ॥

अन्ये मन्त्राश्च देवानां सर्वसौख्यकरा मुने । हे मुने! [ विष्णु आदि ] देवताओंके [ लिये ते सर्वे तस्य वश्याः स्युर्यो बिभर्ति त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ६५ प्रतिपादित ] अन्य जो मन्त्र हैं, वे सभी सुखोंको सहस्त्रं पूर्वजातानां सहस्त्रं जनयिष्यताम् स्ववंशजानां ज्ञातीनामुद्धरेद्यस्त्रिपुण्ड्रकृत् इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्दीर्घायुर्व्याधिवर्जितः जीवितान्ते च मरणं सुखेनैव प्रपद्यते अष्टैश्वर्यगुणोपेतं प्राप्य दिव्यवपुः शिवम् दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यत्रिदशसेवितम्

विद्याधराणां सर्वेषां गन्धर्वाणां महौजसाम् ।

इन्द्रादिलोकपालानां लोकेषु च यथाक्रमम् ॥

भुक्त्वा भोगान्सुविपुलान्प्रजेशानां पदेषु च ।

ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्र कन्याशतं रमेत् ॥

तत्र ब्रह्मायुषो मानं भुक्त्वा भोगाननेकशः ।

विष्णोर्लोके लभेद्भोगं यावद् ब्रह्मशतात्ययः ॥

शिवलोकं ततः प्राप्य लब्ध्वेष्टं काममक्षयम् ।

शिवसायुज्यमाप्नोति संशयो नात्र जायते ॥

सर्वोपनिषदां सारं समालोक्य मुहुर्मुहुः ।

इदमेव हि निर्णीतं परं श्रेयस्त्रिपुण्ड्रकम् ॥

विभूतिं निन्दते यो वै ब्राह्मणः सोऽन्यजातकः ।

प्रयाति नरके घोरे यावद् ब्रह्मा चतुर्मुखः ॥

देनेवाले हैं, जो त्रिपुण्ड्र धारण करता है, उसके वशमें वे सब मन्त्र स्वतः ही हो जाते हैं ॥ ६५ ॥

। त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाला मनुष्य अपने वंश और ॥ ६६ गोत्रमें उत्पन्न हजारों पूर्वजोंका और भविष्यमें उत्पन्न होनेवाली हजारों सन्तानोंका उद्धार करता है ॥ ६६ ॥

। जो त्रिपुण्ड्र धारण करता है, उसे इस लोकमें ॥ ६७ रोगरहित दीर्घ आयु प्राप्त होती है और वह सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके जीवनके अन्तिम समयमें । सुखपूर्वक ही मृत्युको प्राप्त करता है । वह मृत्युके ॥ ६८ पश्चात् अणिमा, महिमा आदि आठों ऐश्वर्यों और सद्गुणोंसे युक्त दिव्य शरीरवाले शिवको प्राप्त करता है और दिव्यलोकके देवोंसे सेवित दिव्य विमानपर चढ़कर शिवलोकको जाता है॥६७-६८ ॥ वहाँपर वह सभी विद्याधरों और महापराक्रमी गन्धर्वों, ६ ९ इन्द्रादि लोकपालोंके लोकोंमें क्रमशः जाकर बहुत - से भोगोंका उपभोग करता हुआ प्रजापतियोंके पदों तथा ब्रह्माके पदपर आसीन होकर वहाँ [ दिव्यलोककी ] ७० सैकड़ों कन्याओंके साथ आनन्दित होता है । ६ ९ -७० ॥ वह उस लोकमें ब्रह्माकी आयुके बराबर आयुको ७१ प्राप्तकर अनेक सुखोंका भोग करके विष्णुलोकको जाता है और ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सुखोंका भोग प्राप्त करता है । तदनन्तर वह शिवलोकको जाकर इच्छानुकूल ७२ अक्षय कामनाओंको प्राप्तकर शिवका सान्निध्य प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७१-७२ ॥ सभी उपनिषदोंके सारको बार - बार सम्यक् ७३ रूपसे देखकर यही निर्णय लिया गया है कि त्रिपुण्ड्र धारण करना ही परम श्रेष्ठ है ॥ ७३ ॥

जो ब्राह्मण विभूतिकी निन्दा करता है, वह | ब्राह्मण नहीं है, अपितु अन्य जातिका है और विभूति | निन्दाके कारण उसे चतुर्मुख ब्रह्माकी आयुसीमात ७४ । नरक भोगना पड़ता है ॥ ७४ ॥

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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १८१

श्राद्धे यज्ञे जपे होमे वैश्वदेवे सुरार्चने ।

धृतत्रिपुण्डूः पूतात्मा मृत्युं जयति मानवः ॥

जलस्नानं मलत्यागे भस्मस्नानं सदा शुचिः ।

मन्त्रस्नानं हरेत्पापं ज्ञानस्नाने परं पदम् ॥

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ।

तत्फलं समवाप्नोति भस्मस्नानकरो नरः ॥

भस्मस्नानं परं तीर्थं गङ्गास्नानं दिने दिने ।

भस्मरूपी शिवः साक्षाद्भस्म त्रैलोक्यपावनम् ॥

न तत्स्नानं न तद्ध्यानं न तद्दानं जपो न सः ।

त्रिपुण्ड्रेण विना येन विप्रेण यदनुष्ठितम् ॥

वानप्रस्थस्य कन्यानां दीक्षाहीननृणां तथा ।

मध्याह्नात्प्राग्जलैर्युक्तं परतो जलवर्जितम् ॥

एवं त्रिपुण्ड्रं यः कुर्यान्नित्यं नियतमानसः ।

शिवभक्तः स विज्ञेयो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥

यस्याने नैव रुद्राक्ष एकोऽपि बहुपुण्यदः ।

तस्य जन्म निरर्थं स्यात्त्रिपुण्ड्ररहितो यदि ॥

एवं त्रिपुण्ड्रमाहात्म्यं समासात् कथितं मया ।

रहस्यं सर्वजन्तूनां गोपनीयमिदं त्वया ॥

तिस्त्रो रेखा भवन्त्येव स्थानेषु मुनिपुङ्गवाः ।

ललाटादिषु सर्वेषु यथोक्तेषु बुधैर्मुने ॥

श्राद्ध, यज्ञ, जप, होम, बलिवैश्वदेव और ७५ देवपूजनके समय जो पूतात्मा मनुष्य त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह मृत्युको भी जीत लेता है ॥ ७५ ॥

मलत्याग करनेपर [ शुद्धिके लिये ] जलस्नान किया ७६ जाता है, भस्मस्नान करनेपर सदा पवित्रता आती है, मन्त्रस्नान पापका हरण करता है और ज्ञानरूपी जलमें अवगाहन करनेपर परमपदकी प्राप्ति होती है ॥ ७६ ॥

समस्त तीर्थोंमें [ स्नान करनेसे ] जो पुण्य और ७७ फल प्राप्त होता है, वह फल, भस्मस्नान करनेवालेको प्राप्त हो जाता है ॥ ७७ ॥

भस्मस्नान ही परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो प्रतिदिन ७८ गंगा ( तीर्थ ) - स्नानके समान है । भस्म तो भस्मरूपी साक्षात् शिव है, जो त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाला है ॥ ७८ ॥

बिना त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए जो ब्राह्मण ७ ९ स्नान, ध्यान, दान और जप आदि अनुष्ठान कर्म करता है, वह न तो स्नान है, न ध्यान है, न दान है और न जप आदि अन्य अनुष्ठित कर्म ही है ॥ ७ ९ ॥ वानप्रस्थ, कन्या और दीक्षारहित मनुष्योंको ८० मध्याह्नके पूर्व ही जलसे युक्त त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये, किंतु मध्याह्नके पश्चात् जलरहित भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करना उचित है । इस प्रकार श्रद्धापूर्वक ८१ दृढ़ निश्चयवाला जो व्यक्ति नित्य त्रिपुण्ड्र धारण करता है, उसे ही शिवभक्त जानना चाहिये । उसीको भुक्ति तथा मुक्ति भी प्राप्त होती है॥८०-८१ ॥ जिसके अंगपर प्रचुर पुण्य देनेवाला एक भी ८२ रुद्राक्ष नहीं है और वह त्रिपुण्ड्रसे भी रहित है, उसका जन्म लेना व्यर्थ है ॥ ८२ ॥

[ इसके पश्चात् भस्मधारण तथा त्रिपुण्ड्रकी महिमा ८३ एवं विधि बताकर सूतजीने फिर कहा — हे महर्षियो! ] इस प्रकार मैंने संक्षेपसे त्रिपुण्ड्रका माहात्म्य बताया है । यह समस्त प्राणियोंके लिये गोपनीय रहस्य है । अतः आपको भी इसे गुप्त ही रखना चाहिये ॥ ८३ ॥

मुनिवरो! ललाट आदि सभी निर्दिष्ट स्थानोंमें जो भस्मसे तीन तिरछी रेखाएँ बनायी जाती हैं, ८४ उन्हींको विद्वानोंने त्रिपुण्ड्र कहा है ॥८४ ॥

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१८२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४

भ्रुवोर्मध्यं समारभ्य यावदन्तो भवेद् भ्रुवोः ।

तावत्प्रमाणं सन्धार्यं ललाटे च त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ८५

मध्यमानामिकाङ्गुल्या मध्ये तु प्रतिलोमतः ।

अङ्गुष्ठेन कृता रेखा त्रिपुण्ड्राख्याभिधीयते ॥ ८६

मध्येऽङ्गलिभिरादाय तिसृभिर्भस्म यत्नतः ।

त्रिपुण्ड्रं धारयेद्भक्त्या भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥ ८७

त्रिसृणामपि रेखानां प्रत्येकं नवदेवताः ।

सर्वत्राङ्गेषु ता वक्ष्ये सावधानतया शृणु ॥ ८८

अकारो गार्हपत्याग्निर्भूर्धर्मश्च रजोगुणः ।

ऋग्वेदश्च क्रियाशक्तिः प्रातः सवनमेव च ॥ ८ ९

महादेवश्च रेखायाः प्रथमायाश्च देवता ।

विज्ञेया मुनिशार्दूलाः शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९ ०

उकारो दक्षिणाग्निश्च नभस्तत्त्वं यजुस्तथा ।

मध्यन्दिनं च सवनमिच्छाशक्त्यन्तरात्मकौ ॥ ९ १

महेश्वरश्च रेखाया द्वितीयायाश्च देवता ।

विज्ञेया मुनिशार्दूल शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९ २

मकाराहवनीयौ च परमात्मा तमो दिवौ ।

ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयं सवनं तथा ॥ ९ ३

शिवश्चैव च रेखायास्तृतीयायाश्च देवता ।

विज्ञेया मुनिशार्दूल शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९ ४

एवं नित्यं नमस्कृत्य सद्भक्त्या स्थानदेवताः ।

त्रिपुण्ड्रं धारयेच्छुद्धो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ ९ ५

|

इत्युक्ताः स्थानदेवाश्च सर्वाङ्गेषु मुनीश्वराः । ।

तेषां सम्बन्धिनो भक्त्या स्थानानि शृणु साम्प्रतम् ॥ ९ ६ ।

भौहोंके मध्य भागसे लेकर जहाँतक भौहोंका अन्त है, उतना बड़ा त्रिपुण्ड्र ललाटमें धारण करना चाहिये ॥ ८५ ॥

मध्यमा और अनामिका अँगुलीसे दो रेखाएँ करके बीचमें अंगुष्ठद्वारा प्रतिलोमभावसे की गयी रेखा त्रिपुण्ड्र कहलाती है अथवा बीचकी तीन अँगुलियोंसे भस्म लेकर यत्नपूर्वक भक्तिभावसे ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करे । त्रिपुण्ड्र अत्यन्त उत्तम तथा भोग और मोक्षको देनेवाला है ॥ ८६-८७ ॥ त्रिपुण्ड्रकी तीनों रेखाओंमेंसे प्रत्येकके नौ - नौ देवता हैं, जो सभी अंगोंमें स्थित हैं, मैं उनका परिचय देता हूँ, सावधान होकर सुनें ॥ ८८ ॥

हे मुनिवरो! प्रणवका प्रथम अक्षर अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रियाशक्ति, प्रातःसवन तथा महादेव - ये त्रिपुण्ड्रकी प्रथम रेखाके नौ देवता हैं, यह बात शिवदीक्षापरायण पुरुषोंको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये ॥ ८ ९ - ९ ० ॥ हे मुनिश्रेष्ठो! प्रणवका दूसरा अक्षर उकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्त्वगुण, यजुर्वेद, माध्यन्दिनसवन, इच्छाशक्ति, अन्तरात्मा तथा महेश्वर- ये दूसरी रेखाके नौ देवता हैं - ऐसा शिवदीक्षित लोगोंको जानना चाहिये ॥ ९ १ - ९ २ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो! प्रणवका तीसरा अक्षर मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीय सवन तथा शिव - ये तीसरी रेखाके नौ देवता हैं- ऐसा शिवदीक्षित भक्तोंको जानना चाहिये ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ इस प्रकार स्थानदेवताओंको उत्तम भक्तिभाव से नित्य नमस्कार करके स्नान आदिसे शुद्ध हुआ पुरुष यदि त्रिपुण्ड्र धारण करे, तो भोग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ५ ॥ हे मुनीश्वरो! ये सम्पूर्ण अंगोंमें स्थान- देवता बताये गये हैं, अब उनसे सम्बन्धित स्थान बताता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनिये ॥ ९ ६ ॥

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अ ० २४ ] विद्येश्वरसंहिता १८३ द्वात्रिंशत्स्थानके वार्धषोडशस्थानकेऽपि च । बत्तीस, सोलह, आठ अथवा पाँच स्थानोंमें मनुष्य अष्टस्थाने तथा चैव पञ्चस्थानेऽपि नान्यसेत् ॥ ९ ७ त्रिपुण्ड्रका न्यास करे । मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों उत्तमाङ्गे ललाटे च कर्णयोर्नेत्रयोस्तथा नासावक्त्रगलेष्वेवं हस्तयोरुभयोस्ततः कूर्परे मणिबन्धे च हृदये पार्श्वयोर्द्वयोः नाभौ मुष्कद्वये चैवमूर्वोर्गुल्फे च जानुनि जङ्गाद्वये पदद्वन्द्वे द्वात्रिंशत्स्थानमुत्तमम् । अग्न्यब्भूवायुदिग्देशदिक्पालान् वसुभिः सह धरा ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानिलोऽनलः प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्ट प्रकीर्तिताः एतेषां नाममात्रेण त्रिपुण्ड्रं धारयेद् बुधः कुर्याद्वा षोडशस्थाने त्रिपुण्ड्रं तु समाहितः शीर्षके च ललाटे च कण्ठे चांसद्वये भुजे कूर्परे मणिबन्धे च हृदये नाभिपार्श्वके पृष्ठे चैवं प्रतिष्ठाप्य यजेत्तत्राश्विदैवते शिवं शक्तिं तथा रुद्रमीशं नारदमेव च वामादिनवशक्तीश्च एता षोडश देवताः नासत्यौ दस्रकश्चैव अश्विनौ द्वौ प्रकीर्तितौ अथवा मूर्ध्नि केशे च कर्णयोर्वदने तथा बाहुद्वये च हृदये नाभ्यामूरुयुगे तथा जानुद्वये च पदयोः पृष्ठभागे च षोडश शिवश्चन्द्रश्च रुद्रः को विघ्नेशो विष्णुरेव वा श्रीश्चैव हृदये शम्भुस्तथा नाभौ प्रजापतिः नागश्च नागकन्याश्च उभयोर्ऋषिकन्यकाः पादयोश्च समुद्राश्च तीर्थाः पृष्ठे विशालतः इत्येवं षोडशस्थानमष्टस्थानमथोच्यते गुह्यस्थानं ललाटश्च कर्णद्वयमनुत्तमम् अंसयुग्मं च हृदयं नाभिरित्येवमष्टकम् ब्रह्मा च ऋषयः सप्त देवताश्च प्रकीर्तिताः इत्येवं तु समुद्दिष्टं भस्मविद्भिर्मुनीश्वराः । नेत्र, दोनों नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों हाथ, दोनों कोहनी, ॥ ९ ८ दोनों कलाई, हृदय, दोनों पार्श्वभाग, नाभि, दोनों अण्डकोष, । दोनों ऊरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिण्डली और ॥ ९९ दोनों पैर — ये बत्तीस उत्तम स्थान हैं; इनमें क्रमशः अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल तथा ॥ १०० आठ वसुओंका निवास है ॥ ९७–१०० ॥ । धरा ( धर ), ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, ॥ १०१ प्रत्यूष और प्रभास - ये आठ वसु कहे गये हैं । इन । सबका नाममात्र लेकर इनके स्थानोंमें विद्वान् पुरुष ॥ १०२ त्रिपुण्ड्र धारण करे । अथवा एकाग्रचित्त होकर सोलह स्थानोंमें ही त्रिपुण्ड्र धारण करे ॥ १०१-१०२ ॥ । मस्तक, ललाट, कण्ठ, दोनों कन्धों, दोनों भुजाओं, ॥ १०३ दोनों कोहनियों तथा दोनों कलाइयोंमें, हृदयमें, नाभिमें, । दोनों पसलियोंमें तथा पृष्ठभागमें त्रिपुण्ड्र लगाकर वहाँ दोनों अश्विनीकुमारों, शिव, शक्ति, रुद्र, ईश तथा नारदका ॥१०४ और वामा आदि नौ शक्तियोंका पूजन करे । ये सब । मिलकर सोलह देवता हैं । अश्विनीकुमार युगल कहे ॥ १०५ गये हैं- नासत्य और दस्र ॥ १०३–१०५ ॥ । अथवा मस्तक, केश, दोनों कान, मुख, दोनों ॥ १०६ भुजा, हृदय, नाभि, दोनों ऊरु, दोनों जानु, दोनों पैर और पृष्ठभाग — इन सोलह स्थानोंमें सोलह त्रिपुण्ड्रका । न्यास करे । मस्तकमें शिव, केशोंमें चन्द्रमा, दोनों ॥ १०७ कानोंमें रुद्र और ब्रह्मा, मुखमें विघ्नराज गणेश, दोनों । भुजाओंमें विष्णु और लक्ष्मी, हृदयमें शम्भु, नाभिमें ॥ १०८ प्रजापति, दोनों ऊरुओंमें नाग और नागकन्याएँ, दोनों । घुटनोंमें ऋषिकन्याएँ, दोनों पैरोंमें समुद्र तथा विशाल

पृष्ठभागमें सम्पूर्ण तीर्थ देवतारूपसे विराजमान हैं ।

॥ १० ९

इस प्रकार सोलह स्थानोंका परिचय दिया गया । अब आठ स्थान बताये जा रहे हैं ॥ १०६ - १० ९ ॥ । गुह्य स्थान, ललाट, परम उत्तम कर्णयुगल, दोनों ॥ ११० कन्धे, हृदय और नाभि - ये आठ स्थान हैं । इनमें ब्रह्मा तथा सप्तर्षि — ये आठ देवता बताये गये हैं । हे । मुनीश्वरो! भस्मके स्थानको जाननेवाले विद्वानोंने इस ॥ १११ तरह आठ स्थानोंका परिचय दिया है । अथवा

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अथवा मस्तकं बाहू हृदयं नाभिरेव च ।

पञ्चस्थानान्यमून्याहुर्धारणे भस्मविज्जनाः ॥

यथासम्भवनं कुर्याद्देशकालाद्यपेक्षया ।

उद्धूलनेऽप्यशक्तश्चेत्त्रिपुण्ड्रादीनि कारयेत् ॥

त्रिनेत्रं त्रिगुणाधारं त्रिदेवजनकं शिवम् ।

स्मरन्नमः शिवायेति ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम् ॥

ईशाभ्यां नम इत्युक्त्वा पार्श्वयोश्च त्रिपुण्ड्रकम् ।

बीजाभ्यां नम इत्युक्त्वा धारयेत्तु प्रकोष्ठयोः ॥

कुर्यादधः पितृभ्यां च उमेशाभ्यां तथोपरि । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ | मस्तक, दोनों भुजाएँ, हृदय और नाभि - इन पाँच ११२ स्थानोंको भस्मवेत्ता पुरुषोंने भस्म धारणके योग्य बताया है । यथासम्भव देश, काल आदिकी अपेक्षा रखते हुए उद्धूलन ( भस्म ) -को अभिमन्त्रित ११३ करना और जलमें मिलाना आदि कार्य करे । यदि | उद्धूलनमें भी असमर्थ हो, तो त्रिपुण्ड्र आदि | लगाये ॥ ११० - ११३ ॥ त्रिनेत्रधारी, तीनों गुणोंके आधार तथा तीनों देवताओंके जनक भगवान् शिवका स्मरण करते हुए ११४' नमः शिवाय ' कहकर ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाये । ' ईशाभ्यां नमः ' - ऐसा कहकर दोनों पार्श्वभागोंमें त्रिपुण्ड्र धारण करे । ' बीजाभ्यां नमः ' - यह बोलकर ११५ दोनों प्रकोष्ठोंमें भस्म लगाये । ' पितृभ्यां नमः ' कहकर नीचेके अंगमें, ' उमेशाभ्यां नमः ' कहकर ऊपरके अंगमें तथा ' भीमाय नमः ' कहकर पीठमें और सिरके पिछले भागमें त्रिपुण्ड्र लगाना

भीमायेति ततः पृष्ठे शिरसः पश्चिमे तथा ॥ ११६ । चाहिये । ११४–११६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां भस्मधारणवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

॥ इस प्रकार शिवमहापुराणके प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें भस्मधारणवर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः रुद्राक्षधारणकी महिमा तथा उसके विविध भेदोंका वर्णन सूत उवाच

शौनकर्षे महाप्राज्ञ शिवरूप महामते ।

शृणु रुद्राक्षमाहात्म्यं समासात् कथयाम्यहम् ॥

शिवप्रियतमो ज्ञेयो रुद्राक्षः परपावनः ।

दर्शनात् स्पर्शनाज्जाप्यात् सर्वपापहरः स्मृतः ॥

पुरा रुद्राक्षमहिमा देव्यग्रे कथितो मुने ।

लोकोपकरणार्थाय शिवेन परमात्मना ॥

शिव उवाच

श्रूयतां तु महेशानि रुद्राक्षमहिमा शिवे ।

कथयामि तव प्रीत्या भक्तानां हितकाम्यया ॥

सूतजी बोले- हे महाप्राज्ञ! हे महामते! शिवरूप हे शौनक ऋषे! अब मैं संक्षेपसे रुद्राक्षका माहात्म्य १ बता रहा हूँ, सुनिये ॥ १ ॥

रुद्राक्ष शिवको बहुत ही प्रिय है । इसे परम २ पावन समझना चाहिये । रुद्राक्षके दर्शनसे, स्पर्शसे | तथा उसपर जप करनेसे वह समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला माना गया है ॥२ ॥

हे मुने! पूर्वकालमें परमात्मा शिवने समस्त ३ लोकोंका उपकार करनेके लिये देवी पार्वतीके सामने रुद्राक्षकी महिमाका वर्णन किया था ॥ ३ ॥

शिवजी बोले- हे महेश्वरि! हे शिवे! मैं | आपके प्रेमवश भक्तोंके हितकी कामनासे रुद्राक्षकी ४ महिमाका वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ४ ॥

पृष्ठ 197

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अ ० २५ ] विद्येश्वरसंहिता १८५

दिव्यवर्षसहस्त्राणि महेशानि पुनः पुरा ।

तपः प्रकुर्वतस्त्रस्तं मनः संयम्य वै मम ॥ ५

स्वतन्त्रेण परेशेन लोकोपकृतिकारिणा ।

लीलया परमेशानि चक्षुरुन्मीलितं मया ॥ ६

पुटाभ्यां चारुचक्षुर्भ्यां पतिता जलबिन्दवः ।

तत्राश्रुबिन्दुतो जाता वृक्षा रुद्राक्षसंज्ञकाः ॥ ७

स्थावरत्वमनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात् ।

ते दत्ता विष्णुभक्तेभ्यश्चतुर्वर्णेभ्य एव च ॥ ८

भूमौ गौडोद्भवांश्चक्रे रुद्राक्षाञ्छिववल्लभान् ।

मथुरायामयोध्यायां लङ्कायां मलये तथा ॥ ९

सह्याद्रौ च तथा काश्यां देशेष्वन्येषु वा तथा ।

परानसह्यपापौघभेदनाञ्छुतिनोदनान् ॥१०

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा जाता ममाज्ञया ।

रुद्राक्षास्ते पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥ ११

श्वेतरक्ताः पीतकृष्णा वर्णा ज्ञेयाः क्रमाद् बुधैः ।

स्वजातीयं नृभिर्धार्यं रुद्राक्षं वर्णतः क्रमात् ॥ १२

वर्णैस्तु तत्फलं धार्यं भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।

शिवभक्तैर्विशेषेण शिवयोः प्रीतये सदा ॥ १३

धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ।

बदरीफलमात्रं तु मध्यमं सम्प्रकीर्तितम् ॥ १४

अधमं चणमात्रं स्यात् प्रक्रियैषा परोच्यते ।

शृणु पार्वति सुप्रीत्या भक्तानां हितकाम्यया ॥ १५

हे महेशानि! पूर्वकालकी बात है, मैं मनको संयममें रखकर हजारों दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्यामें लगा रहा ॥ ५ ॥

हे परमेश्वरि! मैं सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाला स्वतन्त्र परमेश्वर हूँ । [ एक दिन सहसा मेरा मन क्षुब्ध हो उठा । ] अतः उस समय मैंने लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले ॥ ६ ॥

नेत्र खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटोंसे कुछ जलकी बूँदें गिरीं । आँसूकी उन बूँदोंसे वहाँ रुद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गये ॥७ ॥

भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे अश्रुबिन्दु स्थावरभावको प्राप्त हो गये । वे रुद्राक्ष मैंने विष्णुभक्तोंको तथा चारों वर्णोंके लोगोंको बाँट दिये ॥ ८ ॥

भूतलपर अपने प्रिय रुद्राक्षोंको मैंने गौड़ देशमें उत्पन्न किया । मथुरा, अयोध्या, लंका, मलयाचल, सह्यगिरि, काशी तथा अन्य देशोंमें भी उनके अंकुर उगाये । वे उत्तम रुद्राक्ष असह्य पापसमूहोंका भेदन करनेवाले तथा श्रुतियोंके भी प्रेरक हैं ॥ ९ -१० ॥ मेरी आज्ञासे वे रुद्राक्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य

तथा शूद्र जातिके भेदसे इस भूतलपर प्रकट हुए ।

रुद्राक्षोंकी ही जातिके शुभाक्ष भी हैं ॥ ११ ॥

उन ब्राह्मणादि जातिवाले रुद्राक्षोंके वर्ण श्वेत, रक्त, पीत तथा कृष्ण जानने चाहिये । मनुष्योंको चाहिये कि वे क्रमशः वर्णके अनुसार अपनी जातिका ही रुद्राक्ष धारण करें ॥ १२ ॥

भोग और मोक्षकी इच्छा रखनेवाले चारों वर्णोंके लोगों और विशेषतः शिवभक्तोंको शिव-पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये रुद्राक्षके फलोंको अवश्य धारण करना चाहिये ॥ १३ ॥

आँवलेके फलके बराबर जो रुद्राक्ष हो, वह श्रेष्ठ बताया गया है । जो बेरके फलके बराबर हो, उसे मध्यम श्रेणीका कहा गया है । जो चनेके बराबर हो, उसकी गणना निम्न कोटिमें की गयी है । हे पार्वति! अब इसकी उत्तमताको परखनेकी यह दूसरी प्रक्रिया भक्तोंकी हितकामनासे बतायी जाती है । अतः आप भलीभाँति प्रेमपूर्वक इस विषयको सुनिये ॥ १४-१५ ॥

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१८६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ बदरीफलमात्रं च यत् स्यात् किल महेश्वरि । हे महेश्वरि! जो रुद्राक्ष बेरके फलके बराबर तथापि फलदं लोके सुखसौभाग्यवर्धनम् ॥ १६ होता है, वह उतना छोटा होनेपर भी लोकमें उत्तम | फल देनेवाला तथा सुख - सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है ॥१६ ॥

धात्रीफलसमं यत् स्यात् सर्वारिष्टविनाशनम् । जो रुद्राक्ष आँवलेके फलके बराबर होता है, वह गुञ्जया सदृशं यत् स्यात् सर्वार्थफलसाधनम् ॥ १७ समस्त अरिष्टोंका विनाश करनेवाला होता है तथा जो

यथा यथा लघुः स्याद्वै तथाधिकफलप्रदः ।

एकैकतः फलं प्रोक्तं दशांशैरधिकं बुधैः ॥

रुद्राक्षधारणं प्रोक्तं पापनाशनहेतवे ।

तस्माच्च धारणीयो वै सर्वार्थसाधनो ध्रुवम् ॥

यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्षः फलदः शुभः ।

न तथा दृश्यतेऽन्या च मालिका परमेश्वरि ॥

समाः स्निग्धा दृढाः स्थूलाः कण्टकैः संयुताः शुभाः ।

रुद्राक्षाः कामदा देवि भुक्तिमुक्तिप्रदाः सदा ॥

कृमिदुष्टं छिन्नभिन्नं कण्टकैर्हीनमेव च ।

व्रणयुक्तमवृत्तं च रुद्राक्षान् षड् विवर्जयेत् ॥

स्वयमेव कृतद्वारं रुद्राक्षं स्यादिहोत्तमम् ।

यत्तु पौरुषयत्नेन कृतं तन्मध्यमं भवेत् ॥

रुद्राक्षधारणं प्रोक्तं महापातकनाशनम् ।

रुद्रसङ्ख्याशतं धृत्वा रुद्ररूपो भवेन्नरः ॥

एकादशशतानीह धृत्वा यत्फलमाप्यते ।

तत्फलं शक्यते नैव वक्तुं वर्षशतैरपि ॥

गुंजाफलके समान बहुत छोटा होता है, वह सम्पूर्ण मनोरथों और फलोंकी सिद्धि करनेवाला होता है ॥ १७ ॥

रुद्राक्ष जैसे - जैसे छोटा होता है, वैसे - वैसे अधिक १८ फल देनेवाला होता है । एक छोटे रुद्राक्षको विद्वानोंने एक बड़े रुद्राक्षसे दस गुना अधिक फल देनेवाला बताया है ॥१८ ॥

पापोंका नाश करनेके लिये रुद्राक्षधारण आवश्यक १ ९ बताया गया है । वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंका साधक है, अतः उसे अवश्य ही धारण करना चाहिये ॥१ ९ ॥ हे परमेश्वरि! लोकमें मंगलमय रुद्राक्ष जैसा २० फल देनेवाला देखा जाता है, वैसी फलदायिनी दूसरी कोई माला नहीं दिखायी देती ॥ २० ॥

हे देवि! समान आकार - प्रकारवाले, चिकने, २१ सुदृढ़, स्थूल, कण्टकयुक्त ( उभरे हुए छोटे - छोटे दानोंवाले ) और सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थोंके दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं ॥२१ ॥

जिसे कीड़ोंने दूषित कर दिया हो, जो खण्डित २२ हो, फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्त हो तथा जो पूरा - पूरा गोल न हो, इन छः प्रकारके रुद्राक्षोंको त्याग देना चाहिये ॥ २२ ॥

जिस रुद्राक्षमें अपने आप ही डोरा पिरोनेके २३ योग्य छिद्र हो गया हो, वही यहाँ उत्तम माना गया है । जिसमें मनुष्यके प्रयत्नसे छेद किया गया हो, वह मध्यम श्रेणीका होता है ॥ २३ ॥

रुद्राक्षधारण बड़े - बड़े पातकोंका नाश करनेवाला २४ बताया गया है । ग्यारह सौ रुद्राक्षोंको धारण करनेवाला मनुष्य रुद्रस्वरूप ही हो जाता है ॥ २४ ॥

इस जगत्में ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके | मनुष्य जिस फलको पाता है, उसका वर्णन सैकड़ों २५ । वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ २५ ॥

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अ ० २५ ] विद्येश्वरसंहिता १८७

शतार्धेन युतैः पञ्चशतैर्वै मुकुटं मतम् ।

रुद्राक्षैर्विरचेत्सम्यग्भक्तिमान्पुरुषो वरः ॥

त्रिभिः शतैः षष्टियुक्तैस्त्रिरावृत्त्या तथा पुनः ।

रुद्राक्षैरुपवीतं च निर्मीयाद्भक्तितत्परः ॥

शिखायां च त्रयं प्रोक्तं रुद्राक्षाणां महेश्वरि ।

कर्णयोः षट् च षट् चैव वामदक्षिणयोस्तथा ॥

शतमेकोत्तरं कण्ठे बाह्वोर्वै रुद्रसङ्ख्यया ।

कूर्परद्वारयोस्तत्र मणिबन्धे तथा पुनः ॥

उपवीते त्रयं धार्यं शिवभक्तिरतैर्नरैः ।

शेषानुर्वरितान्पञ्च सम्मितान्धारयेत्कटौ ॥

एतत्सङ्ख्या धृता येन रुद्राक्षाः परमेश्वरि ।

तद्रूपं तु प्रणम्यं हि स्तुत्यं सर्वैर्महेशवत् ॥

एवंभूतं स्थितं ध्याने यदा कृत्वासने जनम् ।

शिवेति व्याहरंश्चैव दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते ॥

शताधिकसहस्त्रस्य विधिरेष प्रकीर्तितः ।

तदभावे प्रकारोऽन्यः शुभः सम्प्रोच्यते मया ॥

शिखायामेकरुद्राक्षं शिरसा त्रिंशतं वहेत् ।

पञ्चाशच्च गले दध्याद् बाह्वोः षोडश षोडश ॥

मणिबन्धे द्वादश द्विस्कन्धे पञ्चशतं वहेत् ।

अष्टोत्तरशतैर्माल्यमुपवीतं प्रकल्पयेत् ॥

एवं सहस्ररुद्राक्षान्धारयेद्यो दृढव्रतः ।

तं नमन्ति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः ॥

एकं शिखायां रुद्राक्षं चत्वारिंशत्तु मस्तके ।

द्वात्रिंशत्कण्ठदेशे तु वक्षस्यष्टोत्तरं शतम् ॥

एकैकं कर्णयोः षट् षट् बाह्वोः षोडश षोडश ।

करयो रविमानेन द्विगुणेन मुनीश्वर ॥

भक्तिमान् पुरुष भलीभाँति साढ़े पाँच सौ रुद्राक्षके २६ । दानोंका सुन्दर मुकुट बनाये । तीन सौ साठ दानोंको । लम्बे सूत्रमें पिरोकर एक हार बना ले । वैसे - वैसे तीन २७ हार बनाकर भक्तिपरायण पुरुष उनका यज्ञोपवीत | तैयार करे ॥ २६-२७ ॥ हे महेश्वरि! शिवभक्त मनुष्योंको शिखामें तीन, २८ दाहिने और बाँयें दोनों कानोंमें क्रमशः छः - छः, कण्ठमें एक सौ एक, भुजाओंमें ग्यारह - ग्यारह, दोनों २ ९ कुहनियों और दोनों मणिबन्धोंमें पुनः ग्यारह - ग्यारह, यज्ञोपवीतमें तीन तथा कटिप्रदेशमें गुप्त रूपसे पाँच रुद्राक्ष धारण करना चाहिये । हे परमेश्वरि! [ उपर्युक्त ३० कही गयी ] इस संख्याके अनुसार जो व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है, उसका स्वरूप भगवान् शंकरके समान सभी लोगोंके लिये प्रणम्य और स्तुत्य हो जाता ३१ है॥२८–३१ ॥ इस प्रकार रुद्राक्षसे युक्त होकर मनुष्य जब ३२ आसन लगाकर ध्यानपूर्वक शिवका नाम जपने लगता है, तो उसको देखकर पाप स्वतः छोड़कर भाग जाते हैं ॥३२ ॥

इस तरह मैंने एक हजार एक सौ रुद्राक्षोंको ३३ धारण करनेकी विधि कह दी है । इतने रुद्राक्षोंके न प्राप्त होनेपर मैं दूसरे प्रकारकी कल्याणकारी विधि कह रहा हूँ ॥३३ ॥

शिखामें एक, सिरपर तीस, गलेमें पचास और ३४ दोनों भुजाओंमें सोलह - सोलह रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ ३४ ॥

दोनों मणिबन्धोंपर बारह, दोनों स्कन्धोंमें पाँच ३५ सौ और एक सौ आठ रुद्राक्षोंकी माला बनाकर यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥

इस प्रकार दृढ़ निश्चय करनेवाला जो मनुष्य ३६ एक हजार रुद्राक्षोंको धारण करता है, वह रुद्र-स्वरूप है; समस्त देवगण जैसे शिवको नमस्कार करते हैं, वैसे ही उसको भी नमन करते हैं ॥ ३६ ॥

शिखामें एक, मस्तकपर चालीस, कण्ठप्रदेशमें ३७ बत्तीस, वक्षःस्थलपर एक सौ आठ, प्रत्येक कानमें एक - एक, भुजबन्धोंमें छः - छः या सोलह - सोलह, ३८ दोनों हाथोंमें उनका दुगुना अथवा हे मुनीश्वर!

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१८८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५

सङ्ख्या प्रीतिधृता येन सोऽपि शैवजनः परः ।

शिववत्पूजनीयो हि वन्द्यः सर्वैरभीक्ष्णशः ॥ ३ ९

शिरसीशानमन्त्रेण कर्णे तत्पुरुषेण च ।

अघोरेण गले धार्यं तेनैव हृदयेऽपि च ॥ ४०

अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत्सुधीः ।

पञ्चदशाक्षग्रथितां वामदेवेन चोदरे ॥ ४१

पञ्चब्रह्मभिरङ्गैश्च त्रिमालां पञ्च सप्त च ।

अथ वा मूलमन्त्रेण सर्वानक्षांस्तु धारयेत् ॥ ४२

मद्यं मांसं तु लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च ।

श्लेष्मान्तकं विड्वराहं भक्षणे वर्जयेत्ततः ॥ ४३

वलक्षं रुद्राक्षं द्विजतनुभिरेवेह विहितं सुरक्तं क्षत्राणां प्रमुदितमुमे पीतमसकृत् । ततो वैश्यैर्धार्यं प्रतिदिवसमावश्यकमहो तथा कृष्णं शूद्रैः श्रुतिगदितमार्गोऽयमगजे ॥ ४४ वर्णी वनी गृहयतिर्नियमेन दध्या-देतद्रहस्यपरमो न हि जातु तिष्ठेत् । रुद्राक्षधारणमिदं सुकृतैश्च लभ्यं त्यक्त्वेदमेतदखिलान्नरकान् प्रयान्ति ॥ ४५ आदावामलकास्ततो लघुतरा रुग्णास्ततः कण्टकैः सन्दष्टाः कृमिभिस्तनूपकरण-च्छिद्रेण हीनास्तथा । धार्या नैव शुभेप्सुभिश्चणकवद् रुद्राक्षमप्यन्ततो । रुद्राक्षो मम लिङ्गमङ्गलमुमे सूक्ष्मं प्रशस्तं सदा ॥ ४६ |

सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां शिवाज्ञया ।

धार्याः सदैव रुद्राक्षा यतीनां प्रणवेन हि ॥ ४७

| प्रीतिपूर्वक जितनी इच्छा हो, उतने रुद्राक्षोंको धारण करना चाहिये । ऐसा जो करता है, वह शिवभक्त सभी लोगोंके लिये शिवके समान पूजनीय, वन्दनीय और बार - बार दर्शनके योग्य हो जाता है ॥ ३७-३९ ॥ सिरपर ईशानमन्त्रसे, कानमें तत्पुरुषमन्त्रसे तथा गले और हृदयमें अघोरमन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ ४० ॥

विद्वान् पुरुष दोनों हाथोंमें अघोर बीजमन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करे और उदरपर वामदेवमन्त्रसे पन्द्रह रुद्राक्षोंद्वारा गूँथी हुई माला धारण करे ॥ ४१ ॥

सद्योजात आदि पाँच ब्रह्ममन्त्रों तथा अंगमन्त्रोंके द्वारा रुद्राक्षकी तीन, पाँच या सात मालाएँ धारण करे अथवा मूलमन्त्र [ नमः शिवाय ] से ही समस्त रुद्राक्षोंको धारण करे ॥ ४२ ॥

रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान - पानमें मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा, विड्वराह आदिको त्याग दे ॥४३ ॥

हे गिरिराजनन्दिनी उमे! श्वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणोंको ही धारण करना चाहिये । गहरे लाल रंगका रुद्राक्ष क्षत्रियोंके लिये हितकर बताया गया है । वैश्योंके लिये प्रतिदिन बार - बार पीले रुद्राक्षको धारण करना आवश्यक है और शूद्रोंको काले रंगका रुद्राक्ष धारण करना चाहिये - यह वेदोक्त मार्ग है ॥४४ ॥

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और संन्यासी– सबको नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है । इसे धारण किये बिना न रहे, यह परम रहस्य है । इसे

धारण करनेका सौभाग्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है ।

इसको त्यागनेवाला व्यक्ति नरकको जाता है ॥ ४५ ॥

हे उमे! पहले आँवलेके बराबर और फिर उससे भी छोटे रुद्राक्ष धारण करे । जो रोगयुक्त हों, जिनमें दाने न हों, जिन्हें कीड़ोंने खा लिया हो, जिनमें पिरोनेयोग्य छेद न हो, ऐसे रुद्राक्ष मंगलाकांक्षी पुरुषोंको नहीं धारण करना चाहिये । रुद्राक्ष मेरा मंगलमय लिंगविग्रह है । वह अन्ततः चनेके बराबर लघुतर होता है । सक्ष्म रुद्राक्षको ही सदा प्रशस्त माना गया है ॥ ४६ ॥

सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों और शूद्रोंको भी भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिये । यतियोंके लिये प्रणवके उच्चारणपूर्वक रुद्राक्ष धारण करनेका विधान है ॥ ४७ ॥