शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 61–70

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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अ ० २ ]

वेदान्तसारसर्वस्वं पुराणं चैवमुत्तमम् ।

सर्वाघौघोद्धारकरं परत्र परमार्थदम् ॥

कलिकल्मषविध्वंसि यस्मिञ्छिवयशः परम् ।

विजृम्भते सदा विप्राश्चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥

तस्याध्ययनमात्रेण पुराणस्य द्विजोत्तमाः सर्वोत्तमस्य शैवस्य ते यास्यन्ति सुसद्गतिम् ॥ तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरस्सरम् यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावत्कलिमहोत्पाताः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम् यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावत्स्वरूपं दुर्बोधं शिवस्य महतामपि यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावद्यमभटाः क्रूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावत्सर्वपुराणानि प्रगर्जन्ति महीतले यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो विद्येश्वरसंहिता ४ ९ सबसे उत्तम जो शिवपुराण है, वह वेदान्तका सार-२ सर्वस्व है तथा वक्ता और श्रोताका समस्त पापराशियोंसे उद्धार करनेवाला है; [ इतना ही नहीं ] वह परलोकमें परमार्थ वस्तुको देनेवाला है । कलिकी कल्मषराशिका ३ वह विनाशक है । उसमें भगवान् शिवके उत्तम यशका वर्णन है । हे ब्राह्मणो! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला वह पुराण सदा ही अपने प्रभावसे विस्तारको प्राप्त हो रहा है ॥ २-३ ॥ । हे विप्रवरो! उस सर्वोत्तम शिवपुराणके ४ अध्ययनमात्रसे वे कलियुगके पापासक्त जीव श्रेष्ठतम गतिको प्राप्त हो जायँगे ॥४ ॥

। अहो! ब्रह्महत्या आदि महान् पाप तभीतक रहेंगे ॥ ५ अर्थात् अपने फलको देनेमें समर्थ होंगे, जबतक जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा । [ आशय यह है कि शिवपुराण सुननेके बाद अन्तःकरण शिवभक्तिपरायण होकर अतिशय स्वच्छ हो जायगा । अतः किसी भी पापकर्ममें मानवकी प्रवृत्ति ही नहीं होगी, तब ब्रह्महत्या आदि भयंकर पाप न होनेके कारण उस पापके फल-भोगकी सम्भावना ही नहीं है ] ॥ ५ ॥

। कलियुगके महान् उत्पात तभीतक निर्भय होकर ॥ ६ विचरेंगे, जबतक यहाँ जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥६ ॥

। सभी शास्त्र परस्पर तभीतक विवाद करेंगे, ॥ ७ जबतक जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा [ अर्थात् शिवपुराणके आ जानेपर किसी प्रकारका विवाद ही नहीं रह जायगा । सभी प्रकारसे भुक्ति - मुक्तिप्रदाता यही रहेगा ] ॥७ ॥

। अहो! महान् व्यक्तियोंके लिये भी तभीतक ॥ ८ शिवका स्वरूप दुर्बोध्य रहेगा, जबतक इस जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥८ ॥

। अहो! क्रूर यमदूत तभीतक निर्भय होकर ॥ ९ पृथ्वीपर घूमेंगे, जबतक जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥ ९ ॥

। सभी पुराण पृथिवीपर गर्जन तभीतक करेंगे, ॥ १० जबतक शिवपुराणका जगत्‌में उदय नहीं होगा ॥ १० ॥

पृष्ठ 62

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५० तावत्सर्वाणि तीर्थानि विवदन्ते महीतले यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो तावत्सर्वे मुदा मन्त्रा विवदन्ते महीतले यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले

तावत्सर्वाणि क्षेत्राणि विवदन्ते महीतले ।

यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले ॥

तावत्सर्वाणि पीठानि विवदन्ते महीतले ।

यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले ॥

तावत्सर्वाणि दानानि विवदन्ते महीतले ।

यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले ॥

तावत्सर्वे च ते देवा विवदन्ते महीतले ।

यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले ॥

तावत्सर्वे च सिद्धान्ता विवदन्ते महीतले ।

यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले ॥

अस्य शैवपुराणस्य कीर्तनश्रवणाद् द्विजाः ।

फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्न्येन मुनिसत्तमाः ॥

तथापि तस्य माहात्म्यं वक्ष्ये किञ्चित्तु वोऽनघाः ।

चित्तमाधाय शृणुत व्यासेनोक्तं पुरा मम ॥

एतच्छिवपुराणं हि श्लोकं श्लोकार्धमेव च ।

यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापान्मुच्यते क्षणात् ॥

एतच्छिवपुराणं हि यः प्रत्यहमतन्द्रितः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । इस पृथिवीपर तीर्थोंका विवाद तभीतक रहेगा, ॥ ११ जबतक इस जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा । [ आशय यह है कि मुक्ति - प्राप्त्यर्थ एवं पापके नाशके । लिये मानव विभिन्न तीर्थोंका सेवन करेंगे, किंतु ॥ १२ शिवपुराणके आनेके बाद सभी लोग सभी पापोंके नाशके लिये शिवपुराणका ही सेवन करेंगे ] । सभी मन्त्र पृथ्वीपर तभीतक आनन्दपूर्वक विवाद करेंगे, जबतक पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥ ११-१२ ॥ सभी क्षेत्र तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे, १३ । जबतक पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥ १३ ॥

सभी पीठ तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे, १४ जबतक पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा ॥ १४ ॥

सभी दान पृथ्वीपर तभीतक विवाद करेंगे, १५ जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा ॥ १५ ॥

सभी देवगण तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे, १६ जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा ॥ १६ ॥

सभी सिद्धान्त तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे, १७ जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा ॥ १७ ॥

हे विप्रो! हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस शिवपुराणके कीर्तन १८ करने और सुननेसे जो - जो फल होते हैं, उन फलोंको मैं सम्पूर्ण रूपसे नहीं कह सकता हूँ, [ अर्थात् शब्दोंके द्वारा इसके सभी फलोंको नहीं कहा जा सकता है ] ॥ १८ ॥

हे निष्पाप मुनिगण! तथापि शिवपुराणका कुछ १ ९ माहात्म्य आप लोगोंसे कहता हूँ, जो व्यासजीने पहले मुझसे कहा था, आपलोग चित्त लगाकर ध्यानपूर्वक सुनें ॥ १ ९ ॥ जो भक्तिपूर्वक इस शिवपुराणका एक श्लोक २० या आधा श्लोक भी पढ़ता है, वह उसी क्षण पापसे छुटकारा पा जाता है ॥२० ॥

जो आलस्यरहित होकर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक यथाशक्ति पठेद् भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ २१ इस शिवपुराणका यथाशक्ति पाठ करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥२१ ॥

जो इस शिवपुराणकी सदा पूजा करता है, एतच्छिवपुराणं हि यो भक्त्यार्चयते सदा । वह निःसन्देह प्रतिदिन अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त दिने दिनेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ २२ । करता है ॥ २२ ॥

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अ ० २ ] विद्येश्वरसंहिता ५१

एतच्छिवपुराणं यः साधारणपदेच्छया ।

अन्यतः शृणुयात् सोऽपि मत्तो मुच्येत पातकात् ॥

एतच्छिवपुराणं यो नमस्कुर्याददूरतः ।

सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥

एतच्छिवपुराणं वै लिखित्वा पुस्तकं स्वयम् ।

यो दद्याच्छिवभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

अधीतेषु च शास्त्रेषु वेदेषु व्याकृतेषु च ।

यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत् ॥

एतच्छिवपुराणं हि चतुर्दश्यामुपोषितः ।

शिवभक्तसभायां यो व्याकरोति स उत्तमः ॥

प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं लभेत् ।

इह भुक्त्वाखिलान् कामानन्ते निर्वाणतां व्रजेत् ॥

उपोषितश्चतुर्दश्यां रात्री जागरणान्वितः ।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥

कुरुक्षेत्रादिनिखिल पुण्यतीर्थेष्वनेकशः आत्मतुल्यधनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥

विप्रेभ्यो व्यासमुख्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।

तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥

एतच्छिवपुराणं हि गायते योऽप्यहर्निशम् । आज्ञां तस्य प्रतीक्षेरन् देवा इन्द्रपुरोगमाः ।

एतच्छिवपुराणं यः पठञ्छृण्वन् हि नित्यशः ।

यद्यत् करोति सत्कर्म तत्कोटिगुणितं भवेत् ॥

समाहितः पठेद्यस्तु तत्र श्रीरुद्रसंहिताम् ।

स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥

तां रुद्रसंहितां यस्तु भैरवप्रतिमान्तिके ।

त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स कामानखिलाँल्लभेत् ॥

जो व्यक्ति साधारण पदकी प्राप्तिकी इच्छासे २३ इस शिवपुराणको मुझसे अथवा अन्य किसीसे सुनता है, वह भी पातकोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३ ॥

जो इस शिवपुराणको समीपसे प्रणाम करता है, २४ वह सभी देवोंकी पूजाका फल प्राप्त करता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥

जो इस शिवपुराणको स्वयं लिखकर शिवभक्तोंको २५ दान करता है, उसके पुण्यफलको सुनें ॥ २५ ॥

शास्त्रोंका अध्ययन करने और वेदोंका पाठ २६ करनेसे जो दुर्लभ फल प्राप्त होता है, वह फल उसको प्राप्त होता है ॥२६ ॥

जो चतुर्दशी तिथिके दिन उपवास करके इस २७ शिवपुराणका शिवभक्तोंके समाजमें पाठ करता है— वह श्रेष्ठ पुरुष है । वह व्यक्ति शिवपुराणके प्रत्येक अक्षरकी संख्याके अनुरूप गायत्रीके पुरश्चरणका फल २८ प्राप्त करता है और इस लोकमें सभी अभीष्ट सुखोंको भोगकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है ॥ २७-२८ ॥ जो चतुर्दशीकी रातमें उपवासपूर्वक जागरण २ ९ करके शिवपुराणका पाठ करता है या इसे सुनता है, उसका पुण्य - फल मैं कहता हूँ ॥२ ९ ॥ कुरुक्षेत्र आदि सभी तीर्थोंमें, पूर्ण सूर्यग्रहणमें ३० अपनी शक्तिके अनुसार विप्रोंको और मुख्य कथावाचकोंको धन देनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल उस व्यक्तिको प्राप्त होता है, यह सत्य है, ३१ सत्य है; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ३०-३१ ॥ जो व्यक्ति इस शिवपुराणका दिन - रात गान ३२ करता है, इन्द्र आदि देवगण उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥३२ ॥

इस शिवपुराणका पाठ करनेवाला और सुननेवाला ३३ व्यक्ति जो - जो श्रेष्ठ कर्म करता है, वह कोटिगुना हो जाता है [ अर्थात् कोटिगुना फल देता है ] ॥३३ ॥

जो भलीभाँति ध्यानपूर्वक उसमें भी श्रीरुद्रसंहिताका ३४ पाठ करता है, वह यदि ब्रह्मघाती भी हो तो तीन दिनोंमें पवित्रात्मा हो जाता है ॥३४ ॥

जो भैरवकी मूर्तिके पास मौन धारणकर श्रीरुद्रसंहिताका प्रतिदिन तीन बार पाठ करता है, वह ३५ । सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 64

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५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २

तां रुद्रसंहितां यस्तु सम्पठेद् वटबिल्वयोः ।

प्रदक्षिणां प्रकुर्वाणो ब्रह्महत्या निवर्तते ॥ ३६

कैलाससंहिता तत्र ततोऽपि परमा स्मृता ।

ब्रह्मस्वरूपिणी साक्षात् प्रणवार्थप्रकाशिका ॥ ३७

कैलाससंहितायास्तु माहात्म्यं वेत्ति शङ्करः ।

कृत्स्नं तदर्धं व्यासश्च तदर्थं वेद्म्यहं द्विजाः ॥ ३८

तत्र किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।

यज्ज्ञात्वा तत्क्षणाल्लोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ ३ ९

न नाशयति यत्पापं सा रौद्री संहिता द्विजाः ।

तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥ ४०

शिवेनोपनिषत्सिन्धुमन्थनोत्पादितां मुदा ।

कुमारायार्पितां तां वै सुधां पीत्वामरो भवेत् ॥ ४१

ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं कर्तुमुद्यतः ।

मासमात्रं संहितां तां पठित्वा मुच्यते ततः ॥ ४२

दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् पापं सकृत् कीर्तनेन संहिता सा विनाशयेत् ॥ ४३

शिवालये बिल्ववने संहितां तां पठेत् तु यः ।

स यत्फलमवाप्नोति तद्वाचोऽपि न गोचरे ॥ ४४

संहितां तां पठन् भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद् द्विजान् ।

तस्य ये पितरः सर्वे यान्ति शम्भोः परं पदम् ॥ ४५

चतुर्दश्यां निराहारो यः पठेत्संहितां च ताम् ।

बिल्वमूले शिवः साक्षात् स देवैश्च प्रपूज्यते ॥ ४६

अप्यन्याः संहितास्तत्र सर्वकामफलप्रदाः ।

उभे विशिष्टे विज्ञेये लीलाविज्ञानपूरिते ॥ ४७

जो व्यक्ति वट और बिल्ववृक्षकी प्रदक्षिणा करते हुए उस रुद्रसंहिताका पाठ करता है, वह ब्रह्महत्याके दोषसे भी छुटकारा पा जाता है ॥ ३६ ॥

प्रणवके अर्थको प्रकाशित करनेवाली ब्रह्मरूपिणी साक्षात् कैलाससंहिता रुद्रसंहितासे भी श्रेष्ठ कही गयी है ॥३७ ॥

हे द्विजो! कैलाससंहिताका सम्पूर्ण माहात्म्य तो शंकरजी ही जानते हैं, उससे आधा माहात्म्य व्यासजी जानते हैं और उसका भी आधा मैं जानता हूँ ॥ ३८ ॥

उसके सम्पूर्ण माहात्म्यका वर्णन तो मैं नहीं कर सकता, कुछ ही अंश कहूँगा, जिसको जानकर उसी क्षण चित्तकी शुद्धि प्राप्त हो जायगी ॥ ३ ९ ॥ हे द्विजो! लोकमें ढूँढ़नेपर भी मैंने ऐसे किसी पापको नहीं देखा, जिसे वह रुद्रसंहिता नष्ट न कर सके ॥ ४० ॥

उपनिषद्रूपी सागरका मन्थन करके शिवने आनन्दपूर्वक इस रुद्रसंहितारूपी अमृतको उत्पन्न किया और कुमार कार्तिकेयको समर्पित किया; जिसे पीकर मानव अमर हो जाता है ॥ ४१ ॥

ब्रह्महत्या आदि पापोंकी निष्कृति करनेके लिये तत्पर मनुष्य महीनेभर रुद्रसंहिताका पाठ करके उन पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४२ ॥

दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य, दुरालापसे जो पाप होता है; वह इस रौद्रीसंहिताका एक बार कीर्तन करनेसे नष्ट हो जाता है ॥४३ ॥

जो व्यक्ति शिवालयमें अथवा बेलके वनमें इस संहिताका पाठ करता है, वह उससे जो फल प्राप्त करता है, उसका वर्णन वाणीसे नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥

जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस संहिताका पाठ करते हुए श्राद्धके समय ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसके सभी पितर शम्भुके परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ४५ ॥

चतुर्दशीके दिन निराहार रहकर जो बेलके वृक्षके नीचे इस संहिताका पाठ करता है, वह साक्षात् शिव होकर सभी देवोंसे पूजित होता है ॥ ४६ ॥

उसमें अन्य संहिताएँ सभी कामनाओंके फलको पूर्ण करनेवाली हैं, किंतु लीला और विज्ञानसे परिपूर्ण इन दोनों संहिताओंको विशिष्ट समझना चाहिये ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 65

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अ ० २ ] विद्येश्वरसंहिता ५३

तदिदं शैवमाख्यातं पुराणं वेदसम्मितम् ।

निर्मितं तच्छिवेनैव प्रथमं ब्रह्मसम्मितम् ॥

विद्येशं च तथा रौद्रं वैनायकमथौमिकम् ।

मात्रं रुद्रैकादशकं कैलासं शतरुद्रकम् ॥

कोटिरुद्रसहस्त्राद्यं कोटिरुद्रं तथैव च ।

वायवीयं धर्मसंज्ञं पुराणमिति भेदतः ॥

संहिता द्वादशमिता महापुण्यतरा मताः ।

तासां सङ्ख्यां ब्रुवे विप्राः शृणुतादरतोऽखिलम् ॥

विद्येशं दशसाहस्त्रं रुद्रं वैनायकं तथा ।

औमं मातृपुराणाख्यं प्रत्येकाष्टसहस्त्रकम् ॥

त्रयोदशसहस्त्रं हि रुद्रैकादशकं द्विजाः ।

षट्सहस्त्रं च कैलासं शतरुद्रं तदर्धकम् ॥

कोटिरुद्रं त्रिगुणितमेकादशसहस्रकम् ।

सहस्रकोटिरुद्राख्यमुदितं ग्रन्थसङ्ख्यया ॥

वायवीयं खाब्धिशतं धर्मं रविसहस्त्रकम् ।

तदेवं लक्षसङ्ख्याकं शैवं सङ्ख्याविभेदतः ॥

व्यासेन तत्तु सङ्क्षिप्तं चतुर्विंशत्सहस्त्रकम् ।

शैवं तत्र चतुर्थं वै पुराणं सप्तसंहितम् ॥

शिवेन कल्पितं पूर्वं पुराणं ग्रन्थसङ्ख्यया ।

शतकोटिप्रमाणं हि पुरा सृष्टौ सुविस्तृतम् ॥

व्यस्तेऽष्टादशधा चैव पुराणे द्वापरादिषु । चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते कृते द्वैपायनादिभिः प्रोक्तं शिवपुराणं हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ।

श्लोकानां सङ्ख्यया सप्तसंहितं ब्रह्मसम्मितम्

इस शिवपुराणको वेदके तुल्य माना गया है । ४८ इस वेदकल्प पुराणका सबसे पहले भगवान् शिवने ही प्रणयन किया था ॥ ४८ ॥

विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता, ४ ९ उमासंहिता, मातृसंहिता, एकादशरुद्रसंहिता, कैलाससंहिता, शतरुद्रसंहिता, कोटिरुद्रसंहिता, ५० सहस्रकोटिरुद्रसंहिता, वायवीयसंहिता तथा धर्मसंहिता– इस प्रकार इस पुराणके बारह भेद हैं ॥ ४ ९ -५० ॥ ये बारहों संहिताएँ अत्यन्त पुण्यमयी मानी गयी ५१ हैं । ब्राह्मणो! अब मैं उनके श्लोकोंकी संख्या बता रहा हूँ । आपलोग वह सब आदरपूर्वक सुनें । ५२ विद्येश्वरसंहितामें दस हजार श्लोक हैं । रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता, उमासंहिता और मातृसंहिता – इनमेंसे प्रत्येकमें आठ - आठ हजार श्लोक हैं ॥ ५१-५२ ॥ हे ब्राह्मणो! एकादशरुद्रसंहितामें तेरह हजार, ५३ कैलाससंहितामें छः हजार, शतरुद्रसंहितामें तीन हजार, कोटिरुद्रसंहितामें नौ हजार, सहस्रकोटिरुद्रसंहितामें ग्यारह ५४ हजार, वायवीयसंहितामें चार हजार तथा धर्मसंहितामें बारह हजार श्लोक हैं । इस प्रकार संख्याके अनुसार मूल ५५ शिवपुराणकी श्लोकसंख्या एक लाख है ॥ ५३–५५ ॥ परंतु व्यासजीने उसे चौबीस हजार श्लोकोंमें ५६ संक्षिप्त कर दिया है । पुराणोंकी क्रमसंख्याके विचारसे इस शिवपुराणका स्थान चौथा है; इसमें सात संहिताएँ हैं ॥ ५६ ॥

पूर्वकालमें भगवान् शिवने श्लोकसंख्याकी दृष्टिसे ५७ सौ करोड़ श्लोकोंका एक ही पुराणग्रन्थ बनाया था । सृष्टिके आदिमें निर्मित हुआ वह पुराणसाहित्य अत्यन्त विस्तृत था ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् द्वापर आदि युगोंमें द्वैपायन व्यास आदि ॥ ५८ महर्षियोंने जब पुराणका अठारह भागोंमें विभाजन कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणोंका संक्षिप्त स्वरूप केवल चार लाख श्लोकोंका रह गया ॥ ५८ ॥

श्लोकसंख्याके अनुसार यह शिवपुराण चौबीस

हजार श्लोकोंवाला कहा गया है । यह वेदतुल्य पुराण

॥ ५ ९ । सात संहिताओंमें विभाजित है ॥५ ९ ॥

पृष्ठ 66

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५४ विद्येश्वराख्या तत्राद्या रौद्री ज्ञेया द्वितीयिका तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका पञ्चमी चैवमौम्याख्या षष्ठी कैलाससंज्ञिका सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता मताः

ससप्तसंहितं दिव्यं पुराणं शिवसंज्ञकम् ।

वरीवर्ति ब्रह्मतुल्यं सर्वोपरिगतिप्रदम् ॥

एतच्छिवपुराणं हि सप्तसंहितमादरात् ।

परिपूर्णं पठेद्यस्तु स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।

एतच्छिवपुराणस्य नार्हन्त्यल्पां कलामपि ॥

शैवं पुराणममलं शिवकीर्तितं तद् व्यासेन शैवप्रवणेन च सङ्गृहीतम् । सङ्क्षेपतः सकलजीवगुणोपकारं तापत्रयघ्नमतुलं शिवदं सतां हि ॥ विकैतवो धर्म इह प्रगीतो वेदान्तविज्ञानमयः प्रधानः । अमत्सरान्तर्बुधवेद्यवस्तु सत्क्लृप्तमंत्रौघत्रिवर्गयुक्तम् ॥ शैवं पुराणतिलकं खलु सत्पुराणं वेदान्तवेदविलसत्परवस्तुगीतम् यो वै पठेच्च शृणुयात् परमादरेण शम्भुप्रियः स हि लभेत् परमां गतिं वै ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । " इसकी पहली संहिताका नाम विद्येश्वरसंहिता ॥ ६० है, दूसरी रुद्रसंहिता समझनी चाहिये, तीसरीका नाम शतरुद्रसंहिता, चौथीका कोटिरुद्रसंहिता, पाँचवींका । नाम उमासंहिता, छठीका कैलाससंहिता और सातवींका ॥ ६१ नाम वायवीयसंहिता है । इस प्रकार ये सात संहिताएँ मानी गयी हैं ॥ ६०-६१ ॥ इन सात संहिताओंसे युक्त दिव्य शिवपुराण ६२ वेदके तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करनेवाला है ॥६२ ॥

सात संहिताओंसे समन्वित इस सम्पूर्ण ६३ शिवपुराणको जो आद्योपान्त आदरपूर्वक पढ़ता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥६३ ॥

वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास तथा सैकड़ों आगम ६४ इस शिवपुराणकी अल्प कलाके समान भी नहीं हैं ॥ ६४ ॥

यह निर्मल शिवपुराण भगवान् शिवके द्वारा ही प्रतिपादित है । शैवशिरोमणि भगवान् व्यासने इसे संक्षेपकर संकलित किया है । यह समस्त ६५ जीवसमुदायके लिये उपकारक, त्रिविध तापोंका नाशक, तुलनारहित एवं सत्पुरुषोंको कल्याण प्रदान करनेवाला है ॥६५ ॥

इसमें वेदान्त - विज्ञानमय, प्रधान तथा निष्कपट धर्मका प्रतिपादन किया गया है । यह पुराण ईर्ष्यारहित अन्तःकरणवाले विद्वानोंके लिये जाननेकी वस्तु है, इसमें श्रेष्ठ मन्त्रसमूहोंका संकलन है और यह धर्म, ६६ | अर्थ तथा कामसे समन्वित है अर्थात् – इस त्रिवर्गकी प्राप्तिके साधनका भी इसमें वर्णन है ॥ ६६ ॥

यह उत्तम शिवपुराण समस्त पुराणोंमें श्रेष्ठ है । वेद - वेदान्तमें वेद्यरूपसे विलसित परम वस्तु - परमात्माका इसमें गान किया गया है । जो बड़े आदरसे इसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान् शिवका प्रिय होकर परम ६७ । गति प्राप्त कर लेता है ॥६७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां मुनिप्रश्नोत्तरवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें मुनिप्रश्नोत्तर - वर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

पृष्ठ 67

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अ ० ३ ] विद्येश्वरसंहिता ५५ अथ तृतीयोऽध्यायः साध्य - साधन आदिका विचार व्यास उवाच

इत्याकर्ण्य वचः सौतं प्रोचुस्ते परमर्षयः ।

वेदान्तसारसर्वस्वं पुराणं श्रावयाद्भुतम् ॥

इति श्रुत्वा मुनीनां स वचनं सुप्रहर्षितः ।

संस्मरञ्छङ्करं सूतः प्रोवाच मुनिसत्तमान् ॥

सूत उवाच

शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे स्मृत्वा शिवमनामयम् ।

पुराणप्रवणं शैवं पुराणं वेदसारजम् ॥

यत्र गीतं त्रिकं प्रीत्या भक्तिज्ञानविरागकम् ॥

वेदान्तवेद्यं सद्वस्तु विशेषेण प्रवर्णितम् ॥

शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे पुराणं वेदसारजम् ।

पुरा कालेन महता कल्पेऽतीते पुनः पुनः ॥

अस्मिन्नुपस्थिते कल्पे प्रवृत्ते सृष्टिकर्मणि ।

मुनीनां षट्कुलीनानां ब्रुवतामितरेतरम् ॥

इदं परमिदं नेति विवादः सुमहानभूत् ।

तेऽभिजग्मुर्विधातारं ब्रह्माणं प्रष्टुमव्ययम् ॥

वाग्भिर्विनयगर्भाभिः सर्वे प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ।

त्वं हि सर्वजगद्धाता सर्वकारणकारणम् ॥

कः पुमान् सर्वतत्त्वेभ्यः पुराणः परतः परः । ब्रह्मोवाच यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥

यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम् ।

सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं सम्प्रसूयते ॥

एष देवो महादेवः सर्वज्ञो जगदीश्वरः ।

अयं तु परया भक्त्या दृश्यते नान्यथा क्वचित् ॥

रुद्रो हरिर्हरश्चैव तथान्ये च सुरेश्वराः ।

भक्त्या परमया तस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥

व्यासजी बोले- सूतजीका यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले- अब आप हमें वेदान्तके सार-१ सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराणको सुनाइये ॥ १ ॥

मुनियोंका यह वचन सुनकर अतिशय प्रसन्न हो २ वे सूतजी शंकरजीका स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहने लगे ॥२ ॥

सूतजी बोले- आप सब महर्षिगण रोग-| शोकसे रहित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण ३ करके वेदके सारतत्त्वसे प्रकट पुराणप्रवर शिवपुराणको सुनिये । जिसमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य- इन तीनोंका ४ प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्य ५ सद्वस्तुका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है ॥ ३–५ ॥ हे ऋषिगण! अब आपलोग वेदके सारभूत ६ पुराणको सुनें । बहुत कालमें पुनः - पुनः पूर्वकल्प व्यतीत होनेपर इस वर्तमान कल्पमें जब सृष्टिकर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छः कुलोंके महर्षि परस्पर वाद - विवाद ७ करते हुए कहने लगे – ' अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है और अमुक नहीं है । ' उनके इस विवादने अत्यन्त महान् ८ रूप धारण कर लिया । तब वे सब - के - सब अपनी शंकाके समाधानके लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजीके पास ९ गये और हाथ जोड़कर विनयभरी वाणीमें बोले— [ हे प्रभो! ] आप सम्पूर्ण जगत्का धारण - पोषण करनेवाले हैं तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं; हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्त्वोंसे परे परात्पर पुराणपुरुष कौन हैं? ॥ ६ - ९ १ / २ ॥ ब्रह्माजी बोले- जहाँसे मनसहित वाणी उन्हें न १० पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् समस्त भूतों एवं इन्द्रियोंके साथ पहले प्रकट हुआ है, वे ही ये देव, महादेव ११ सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी हैं । ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं । उत्तम भक्तिसे ही इनका साक्षात्कार होता १२ है, दूसरे किसी उपायसे कहीं इनका दर्शन नहीं होता । रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्तिभावसे १३ । उनका नित्य दर्शन करना चाहते हैं ॥ १० - १३ ॥

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५६ बहुनात्र किमुक्तेन शिवे भक्त्या विमुच्यते प्रसादाद्देवताभक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः यथेहाङ्कुरतो बीजं बीजतो वा यथाङ्कुरः तस्मादीशप्रसादार्थं यूयं गत्वा भुवं द्विजाः दीर्घसत्रं समाकृध्वं यूयं वर्षसहस्रकम् अमुष्यैवाध्वरेशस्य शिवस्यैव प्रसादतः वेदोक्तविद्यासारं तु ज्ञायते साध्यसाधनम् मुनय ऊचुः अथ किं परमं साध्यं किं वा तत्साधनं परम् साधकः कीदृशस्तत्र तदिदं ब्रूहि तत्त्वतः ब्रह्मोवाच साध्यं शिवपदप्राप्तिः साधनं तस्य सेवनम् साधकस्तत्प्रसादाद्यो नित्यादिफलनिस्पृहः कर्म कृत्वा तु वेदोक्तं तदर्पितमहाफलम् परमेशपदप्राप्तिः सालोक्यादिक्रमात्ततः

तत्तद्भक्त्यनुसारेण सर्वेषां परमं फलम् ।

तत्साधनं बहुविधं साक्षादीशेन बोधितम् ॥

सङ्क्षिप्य तत्र वः सारं साधनं प्रब्रवीम्यहम् ।

श्रोत्रेण श्रवणं तस्य वचसा कीर्तनं तथा ॥

मनसा मननं तस्य महासाधनमुच्यते ।

श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च मन्तव्यश्च महेश्वरः ॥

इति श्रुतिः प्रमाणं नः साधनेनामुना परम् ।

साध्यं व्रजत सर्वार्थसाधनैकपरायणाः ॥

प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्ट्वा तत्र लोकः प्रवर्तते ।

अप्रत्यक्षं हि सर्वत्र ज्ञात्वा श्रोत्रेण चेष्टते ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ । अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, भगवान् । शिवमें भक्ति होनेसे मनुष्य संसार - बन्धनसे मुक्त हो जाता है । देवताओंके कृपाप्रसादसे ही उनमें भक्ति ॥ १४ होती है और भक्तिसे देवताका कृपाप्रसाद प्राप्त होता है — ठीक उसी तरह, जैसे यहाँ अंकुरसे बीज और । बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है । इसलिये हे द्विजो! ॥ १५ आप लोग भगवान् शंकरका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिये भूतलपर जाकर वहाँ सहस्र वर्षोंतक चलनेवाले एक विशाल यज्ञका आयोजन करें ॥ १४-१५ ॥ । इन यज्ञपति भगवान् शिवकी ही कृपासे वेदोक्त ॥ १६ विद्याके सारभूत साध्य - साधनका ज्ञान होता है ॥ १६ ॥

मुनिगण बोले- हे भगवन्! परम साध्य क्या । है और उसका परम साधन क्या है? उसका साधक ॥ १७ कैसा होता है? ये सभी बातें यथार्थ रूपसे कहें ॥ १७ ॥

ब्रह्माजी बोले- शिवपदकी प्राप्ति ही साध्य । है, उनकी सेवा ही साधन है तथा उनके प्रसादसे जो नित्य - नैमित्तिक आदि फलोंकी ओरसे नि: स्पृह होता ॥ १८ है, वही साधक है ॥ १८ ॥

। वेदोक्त कर्मका अनुष्ठान करके उसके महान् ॥ १ ९ फलको भगवान् शिवके चरणोंमें समर्पित कर देना ही परमेश्वरपदकी प्राप्ति है । वही सालोक्य आदिके क्रमसे प्राप्त होनेवाली मुक्ति है ॥ १ ९ ॥ उन - उन पुरुषोंकी भक्तिके अनुसार उन सबको २० उत्कृष्ट फलकी प्राप्ति होती है । उस भक्तिके साधन अनेक प्रकारके हैं, जिनका प्रतिपादन साक्षात् महेश्वरने ही किया है ॥२० ॥

उसे संक्षिप्त करके मैं सारभूत साधनको बता रहा २१ हूँ । कानसे भगवान्‌के नाम - गुण और लीलाओंका श्रवण, वाणीद्वारा उनका कीर्तन तथा मनके द्वारा उनका मनन-इन तीनोंको महान् साधन कहा गया है । [ तात्पर्य यह २२ कि ] महेश्वरका श्रवण, कीर्तन और मनन करना चाहिये-यह श्रुतिका वाक्य हम सबके लिये प्रमाणभूत है । सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिमें लगे हुए आपलोग इसी साधनसे परम २३ साध्यको प्राप्त हों । लोग प्रत्यक्ष वस्तुको नेत्रसे देखकर | उसमें प्रवृत्त होते हैं; परंतु जिस वस्तुका कहीं भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता, उसे श्रवणेन्द्रियद्वारा जान - सुनकर मनुष्य २४ उसकी प्राप्तिके लिये चेष्टा करता है ॥ २१-२४ ॥

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अ ० ४ ] तस्माच्छ्रवणमेवादौ श्रुत्वा गुरुमुखाद् बुधः । ततः संसाधयेदन्यत् कीर्तनं मननं सुधीः क्रमान्मननपर्यन्ते साधनेऽस्मिन् सुसाधिते शिवयोगो भवेत्तेन सालोक्यादिक्रमाच्छनैः सर्वाङ्गव्याधयः पश्चात् सर्वानन्दश्च लीयते अभ्यासात् क्लेशमेतद् वै पश्चादाद्यन्तमङ्गलम् ॥ विद्येश्वरसंहिता ५७ अत: पहला साधन श्रवण ही है । उसके द्वारा ॥ २५ गुरुके मुखसे तत्त्वको सुनकर बुद्धिशाली विद्वान् पुरुष अन्य साधन - कीर्तन एवं मननकी सिद्धि करे ॥ २५ ॥

। क्रमशः मननपर्यन्त इस साधनकी अच्छी तरह ॥ २६ साधना कर लेनेपर उसके द्वारा सालोक्य आदिके क्रमसे धीरे - धीरे भगवान् शिवका संयोग प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

पहले सारे अंगोंके रोग नष्ट हो जाते हैं तत्पश्चात् सब प्रकारका लौकिक आनन्द भी विलीन । हो जाता है । अभ्यासके ही समय यह साधन कष्टप्रद २७ है, किंतु बादमें निरन्तर मंगल देनेवाला है ॥२७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनविचारं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें साध्यसाधनविचार नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः श्रवण, कीर्तन और मनन - इन मुनय ऊचुः

मननं कीदृशं ब्रह्मञ्छ्रवणं चापि कीदृशम् ।

कीर्तनं वा कथं तस्य कीर्तयैतद्यथायथम् ॥

ब्रह्मोवाच पूजाजपेशगुणरूपविलासनाम्नां युक्तिप्रियेण मनसा परिशोधनं यत् । तत्सन्ततं मननमीश्वरदृष्टिलभ्यं सर्वेषु साधनवरेष्वपि मुख्यमुख्यम् ॥ गीतात्मना श्रुतिपदेन च भाषया वा शम्भुप्रतापगुणरूपविलासनाम्नाम् । वाचा स्फुटं तु रसवत् स्तवनं यदस्य तत्कीर्तनं भवति साधनमत्र मध्यम् ॥ येनापि केन करणेन च शब्दपुञ्जं यत्र क्वचिच्छिवपरं श्रवणेन्द्रियेण । स्त्रीकेलिवद् दृढतरं प्रणिधीयते यत् तद्वै बुधाः श्रवणमत्र जगत्प्रसिद्धम् ॥ सत्सङ्गमेन भवति श्रवणं पुरस्तात् सङ्कीर्तनं पशुपतेरथ तद् दृढं स्यात् । सर्वोत्तमं भवति तन्मननं तदन्ते सर्वं हि सम्भवति शङ्करदृष्टिपाते ॥ तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन मुनिगण बोले- हे ब्रह्मन्! मनन कैसा होता है, श्रवणका स्वरूप कैसा है और उनका कीर्तन कैसे १ किया जाता है, यथार्थ रूपमें आप वर्णन करें ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे मुनियो! ] भगवान् शंकरकी पूजा, उनके नामोंका जप तथा उनके गुण, रूप, विलास और नामोंका युक्तिपरायण चित्तके द्वारा जो निरन्तर परिशोधन या चिन्तन होता है, उसीको मनन कहा गया है, वह महेश्वरकी कृपादृष्टिसे उपलब्ध होता है । वह २ समस्त श्रेष्ठ साधनोंमें प्रमुखतम है ॥ २ ॥

शम्भुके प्रताप, गुण, रूप, विलास और नामको प्रकट करनेवाले संगीत, वेदवाक्य या भाषाके द्वारा अनुरागपूर्वक उनकी स्तुति ही मध्यम साधन है, ३ जिसको कीर्तन शब्दसे कहा जाता है ॥ ३ ॥

हे ज्ञानियो! स्त्रीक्रीड़ामें जैसे मनकी आसक्ति होती है, वैसे ही किसी कारणसे किसी स्थानमें शिवविषयक वाणियोंमें श्रवणेन्द्रियकी दृढ़तर आसक्ति ४ ही जगत्‌में श्रवणके नामसे प्रसिद्ध है ॥४ ॥

सर्वप्रथम सज्जनोंकी संगतिसे श्रवण सिद्ध होता है, बादमें शिवजीका कीर्तन दृढ़ होता है और अन्तमें सभी साधनोंसे श्रेष्ठ शंकरविषयक मनन उत्पन्न होता है, ५ किंतु यह सब उनकी कृपादृष्टिसे ही सम्भव होता है ॥ ५ ॥

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५८ सूत उवाच अस्मिन् साधनमाहात्म्ये पुरा वृत्तं मुनीश्वराः युष्मदर्थं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमवधानतः पुरा मम गुरुर्व्यासः पराशरमुनेः सुतः तपश्चचार सम्भ्रान्तः सरस्वत्यास्तटे शुभे गच्छन् यदृच्छया तत्र विमानेनार्करोचिषा सनत्कुमारो भगवान् ददर्श मम देशिकम् ध्यानारूढः प्रबुद्धोऽसौ ददर्श तमजात्मजम् प्रणिपत्याह सम्भ्रान्तः परं कौतूहलं मुनिः ॥

दत्त्वार्घ्यमस्मै प्रददौ देवयोग्यं च विष्टरम् ।

प्रसन्नः प्राह तं प्रह्णं प्रभुर्गम्भीरया गिरा ॥

सनत्कुमार उवाच सत्यं वस्तु मुने दध्याः साक्षात्करणगोचरः । स शिवोऽथ सहायोऽत्र तपश्चरसि किंकृते एवमुक्तः कुमारेण प्रोवाच स्वाशयं मुनिः । धर्मार्थकाममोक्षाश्च वेदमार्गे कृतादराः बहुधा स्थापिता लोके मया त्वत्कृपया तथा । एवंभूतस्य मेऽप्येवं गुरुभूतस्य सर्वतः मुक्तिसाधनकं ज्ञानं नोदेति परमाद्भुतम् । तपश्चरामि मुक्त्यर्थं न जाने तत्र कारणम्

इत्थं कुमारो भगवान् व्यासेन मुनिनार्थितः ।

समर्थः प्राह विप्रेन्द्रा निश्चयं मुक्तिकारणम् ॥

श्रवणं कीर्तनं शम्भोर्मननं च महत्तरम् ।

त्रयं साधनमुक्तं च विद्यते वेदसम्मतम् ॥

पुराहमथ सम्भ्रान्तो ह्यन्यसाधनसम्भ्रमः ।

अचले मन्दरे शैले तपश्चरणमाचरम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ सूतजी बोले- मुनीश्वरो! इस साधनका माहात्म्य । बतानेके प्रसंगमें मैं आपलोगोंके लिये एक ॥ ६ प्राचीन वृत्तान्तका वर्णन करूँगा, उसे ध्यान देकर आपलोग सुनें ॥६ ॥

। पूर्व कालमें पराशर मुनिके पुत्र मेरे गुरु व्यासदेवजी ॥ ७ सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर तपस्या कर रहे थे ॥ ७ ॥

। एक दिन सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानसे यात्रा करते

॥ ८ हुए भगवान् सनत्कुमार अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे ।

उन्होंने मेरे गुरुदेवको वहाँ देखा ॥ ८ ॥

। वे ध्यानमें मग्न थे । उससे जगनेपर उन्होंने ९ ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारजीको अपने सामने उपस्थित देखा । वे बड़े वेगसे उठे और उनके चरणोंमें प्रणाम करके मुनिने उन्हें अर्घ्य प्रदान करके देवताओंके १० बैठनेयोग्य आसन भी अर्पित किया । तब प्रसन्न हुए भगवान् सनत्कुमार विनीत भावसे खड़े हुए व्यासजीसे गम्भीर वाणीमें कहने लगे ॥ ९ -१० ॥ सनत्कुमार बोले - हे मुने! आप सत्य सनातन भगवान् शंकरका हृदयसे ध्यान कीजिये, तब वे शिव ॥ ११ प्रत्यक्ष होकर आपकी सहायता करेंगे; आप यहाँ तप किसलिये कर रहे हैं? ॥ ११ ॥

इस प्रकार सनत्कुमारके कहनेपर मुनि व्यासने ॥ १२ अपना आशय कहा- मैंने आपकी कृपासे वेदसम्मत धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी कथाको मानवसमाजमें अनेक प्रकारसे प्रदर्शित किया है ॥ १२१ / २ ॥ ॥ १३ इस प्रकार सर्वथा गुरुस्वरूप होनेपर भी मुझमें मुक्तिके साधन ज्ञानका उदय नहीं हुआ है- यह ॥ १४ आश्चर्य ही है । मुक्तिका साधन न जाननेके कारण उसके लिये मैं तपस्या कर रहा हूँ ॥ १३-१४ ॥ हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार जब व्यासमुनिने भगवान् १५ सनत्कुमारसे प्रार्थना की, तब वे समर्थ सनत्कुमारजी मुक्तिका निश्चित कारण बताने लगे ॥ १५ ॥

भगवान् शंकरका श्रवण, कीर्तन, मनन - ये १६ तीनों महत्तर साधन कहे गये हैं । ये तीनों ही वेदसम्मत हैं ॥ १६ ॥

पूर्वकालमें मैं दूसरे दूसरे साधनोंके सम्भ्रम | पड़कर घूमता - घामता मन्दराचलपर जा पहुँचा और १७ । वहाँ तपस्या करने लगा ॥ १७ ॥