शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 651–660

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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अ ० ३४ ] रुद्रसंहिता (

एकदा पिप्पलादर्षिर्गन्तुं स्वाश्रममुत्सुकः ।

तपःस्थाने निर्जने च गन्धर्वं स ददर्श ह ॥ ८

स्त्रीयुतं मग्नचित्तं च शृङ्गारे रससागरे ।

विहरन्तं महाप्रेम्णा कामशास्त्रविशारदम् ॥ ९

दृष्ट्वा तं मुनिशार्दूलः सकामः संबभूव सः ।

तपःस्वदत्तचित्तश्चाचिंतयद्दारसङ्ग्रहम् ॥ १०

एवंवृत्तस्य तस्यैव पिप्पलादस्य सन्मुनेः ।

कियत्कालो गतस्तत्र कामोन्मथितचेतसः ॥ ११

एकदा पुष्पभद्रायां स्नातुं गच्छन्मुनीश्वरः ।

ददर्श पद्मां युवतीं पद्मामिव मनोरमाम् ॥ १२

केयं कन्येति पप्रच्छ समीपस्थाञ्जनान्मुनिः ।

जना निवेदयाञ्चक्रुर्नत्वा शापनियन्त्रिताः ॥ १३

जना ऊचुः

अनरण्यसुतेयं वै पद्मा नाम रमापरा ।

वरारोहा प्रार्थ्यमाना नृपश्रेष्ठैर्गुणालया ॥ १४

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा स मुनिर्वाक्यं जनानां तथ्यवादिनाम् ।

चुक्षोभातीव मनसि तल्लिप्सुरभवच्च सः ॥ १५

मुनिः स्नात्वाभीष्टदेवं सम्पूज्य विधिवच्छिवम् ।

जगाम कामी भिक्षार्थमनरण्यसभां गिरे ॥ १६

राजा शीघ्रं मुनिं दृष्ट्वा प्रणनाम भयाकुलः ।

मधुपर्कादिकं दत्त्वा पूजयामास भक्तितः ॥ १७

कामात्सर्वं गृहीत्वा च ययाचे कन्यकां मुनिः ।

मौनी बभूव नृपतिः किञ्चिन्निर्वक्तुमक्षमः ॥ १८

मुनिर्ययाचे कन्यां स तां देहीति नृपेश्वर ।

अन्यथा भस्मसात्सर्वं करिष्यामि क्षणेन च ॥ १ ९

पार्वतीखण्ड ) ६३ ९ एक समय ऋषि पिप्पलाद जब अपने आश्रम जानेके लिये तत्पर थे, तभी तपस्याके योग्य एक निर्जन स्थानमें उन्होंने कामकलामें निपुण तथा स्त्रीके साथ शृंगाररसके सागरमें निमग्न हो बड़े प्रेमसे विहार करते हुए एक गन्धर्वको देखा ॥८ - ९ ॥ वे मुनिश्रेष्ठ उसे देखकर कामके वशीभूत हो गये और तपसे चित्त हटाकर दारसंग्रहकी चिन्तामें पड़ गये ॥१० ॥

इस प्रकार कामसे व्याकुलचित्त हुए उन श्रेष्ठ मुनि पिप्पलादका कुछ समय बीत गया ॥११ ॥

एक समय जब वे मुनिश्रेष्ठ पुष्पभद्रा नदीमें स्नान करनेके लिये जा रहे थे, तब उन्होंने लक्ष्मीके समान मनोरम युवती पद्माको देखा ॥१२ ॥

उसके बाद मुनिने आस - पासके लोगोंसे पूछा कि यह किसकी कन्या है, तब शापके भयसे व्याकुल उन लोगोंने नमस्कार करके बताया ॥ १३ ॥

लोग बोले- यह [ राजा ] अनरण्यकी पद्मा नामक कन्या है, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान है, श्रेष्ठ राजागण गुणोंकी निधिस्वरूपा इस सुन्दरीको पानेकी इच्छा कर रहे हैं ॥१४ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार वे मुनि उन सत्यवादी मनुष्योंकी बात सुनकर अत्यन्त व्याकुल हो उठे और मनमें उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे ॥ १५ ॥

हे गिरे! उसके बाद मुनि स्नानकर विधिपूर्वक अपने इष्टदेव शंकरका विधिवत् पूजन करके कामके वशीभूत हो भिक्षाके लिये अनरण्यकी सभामें गये ॥१६ ॥

राजाने मुनिको देखते ही भयभीत होकर प्रणाम किया और मधुपर्कादि देकर भक्तिपूर्वक उनकी | पूजा की ॥ १७ ॥

पूजा - ग्रहण करनेके अनन्तर मुनिने कन्याकी याचना की, तब राजा [ इस बातको सुनकर ] अवाक् हो गया और कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हुआ ॥ १८ ॥

उन मुनिने कन्याको माँगा और कहा — हे नृपेश्वर! तुम अपनी कन्या हमें दे दो, अन्यथा मैं क्षणभरमें सब कुछ भस्म कर दूँगा ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 652

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६४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४

सर्वे बभूवुराच्छन्ना गणास्तत्तेजसा मुने ।

रुदोद राजा सगणो दृष्ट्वा विप्रं जरातुरम् ॥ २०

महिष्यो रुरुदुस्सर्वा इतिकर्तव्यताक्षमाः ।

मूर्च्छामाप महाराज्ञी कन्यामाता शुचाकुला ॥ २१

बभूवुस्तनयाः सर्वे शोकाकुलितमानसाः ।

सर्वं शोकाकुलं जातं नृपसम्बन्धि शैलप ॥ २२

एतस्मिन्नन्तरे प्राज्ञो द्विजो गुरुरनुत्तमः ।

पुरोहितश्च मतिमान् आगतो नृपसन्निधिम् ॥ २३

राजा प्रणम्य सम्पूज्य रुदोद च तयोः पुरः ।

सर्वं निवेदयाञ्चक्रे पप्रच्छोचितमाशु तत् ॥२४

अथ राज्ञो गुरुर्विप्रः पण्डितश्च पुरोहितः ।

अपि द्वौ शास्त्रनीतिज्ञौ बोधयामासतुर्नृपम् ॥ २५

शोकाकुलांश्च महिषीर्नृपबालांश्च कन्यकाम् ।

उत्तमां नीतिमादृत्य सर्वेषां हितकारिणीम् ॥ २६

गुरुपुरोधसावूचतुः

शृणु राजन्महाप्राज्ञ वचो नौ सद्धितावहम् ।

मा शुचः सपरीवारः शास्त्रे कुरु मतिं सतीम् ॥ २७

अद्य वाब्ददिनान्ते वा दातव्या कन्यका नृप ।

पात्राय विप्रायान्यस्मै कस्मैचिद्वा विशेषतः ॥ २८

सत्पात्रं ब्राह्मणादन्यं न पश्यावो जगत्त्रये ।

सुतां दत्त्वा च मुनये रक्ष स्वां सर्वसम्पदम् ॥ २ ९

राजन्नेकनिमित्तेन सर्वसंपद्विनश्यति ।

सर्वं रक्षति तं त्यक्त्वा विना तं शरणागतम् ॥ ३०

वसिष्ठ उवाच

राजा प्राज्ञवचः श्रुत्वा विलप्य च मुहुर्मुहुः ।

कन्यां सालंकृतां कृत्वा मुनीन्द्राय ददौ किल ॥ ३१

[ उस समय ] हे मुने! मुनिके तेजसे [ राजाके सब सेवक हक्के - बक्के हो गये और वृद्धावस्थासे जजो ] । उस विप्रको देखकर परिकरोंसहित राजा रोने लगे ॥ २० सभी रानियोंको भी कुछ सूझ नहीं रहा था, वे रोने ॥ लगीं । कन्याकी माता महारानी शोकसे व्यथित होकर | मूर्च्छित हो गयीं, राजाके सभी पुत्र भी शोकसे आकुल-चित्तवाले हो गये । हे शैलपति! इस प्रकार राजाके सभी सगे - सम्बन्धी शोकसे व्याकुल हो गये ॥ २१-२२ ॥ इसी समय महापण्डित, बुद्धिमान् तथा सर्वोत्तम गुरु एवं पुरोहित ब्राह्मण- दोनों राजाके समीप आये ॥ २३ ॥

राजाने प्रणामकर उनका पूजन करके उन दोनोंके आगे रुदन किया और अपना सारा वृत्तान्त निवेदन किया एवं पूछा कि [ इस समय ] जो उचित हो, उसको जल्दीसे बताइये ॥ २४ ॥

तब राजाके नीतिशास्त्रज्ञ पण्डित गुरु तथा ब्राह्मण पुरोहित दोनोंने राजाको तथा शोकसे व्याकुल रानियों, राजपुत्रों तथा उस कन्याको सभीके हितकारक तथा नीतियुक्त वाक्योंसे आदरपूर्वक समझाया ॥ २५-२६ ॥ गुरु तथा पुरोहित बोले —– हे राजन्! हे महाप्राज्ञ! आप हमारी हितकारी बात सुनिये, आप परिवारके सहित शोक मत कीजिये और शास्त्रमें अपनी बुद्धि लगाइये ॥ २७ ॥

हे राजन्! आज ही अथवा एक वर्षके बाद आपको अपनी कन्या किसी - न - किसी पात्रको देनी ही है, वह पात्र चाहे ब्राह्मण हो अथवा अन्य कोई हो ॥ २८ ॥

किंतु हम इस ब्राह्मणसे बढ़कर सुन्दर पात्र इस त्रिलोकीमें अन्यको नहीं देख रहे हैं, अतः आप अपनी कन्या इन मुनिको देकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिकी रक्षा कीजिये ॥ २ ९ ॥ हे राजन्! [ यदि ऐसा नहीं करेंगे तो ] एकके. कारण तुम्हारी सारी सम्पत्ति नष्ट हो जायगी । उस एकका, त्यागकर सबकी रक्षा करो । शरणागतका त्याग नहीं करना चाहिये, चाहे उसके लिये सब कुछ नष्ट हो जाय ॥ ३० ॥

वसिष्ठजी बोले - राजाने उन दोनों बुद्धिमानोंकी बात सुनकर बार - बार विलाप करके उस कन्याको [ वस्त्र तथा आभूषणसे ] अलंकृतकर मुनीन्द्रको दे दिया ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 653

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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६४१

कान्तां गृहीत्वा स मुनिर्विवाह्य विधिवगिरे ।

पद्मां पद्मोपमां तां वै मुदितः स्वालयं ययौ ॥

राजा सर्वान्परित्यज्य दत्त्वा वृद्धाय चात्मजाम् ।

ग्लानिं चित्ते समाधाय जगाम तपसे वनम् ॥

तद्भार्यापि वनं याते प्राणनाथे तदा गिरे ।

भर्तुश्च दुहितुः शोकात्प्राणांस्तत्याज सुन्दरी ॥

पूज्याः पुत्राश्च भृत्याश्च मूर्च्छामापुर्नृपं विना ।

शुशुचुः श्वाससंयुक्ता ज्ञात्वा सर्वेऽपरे जनाः ॥

अनरण्यो वनं गत्वा तपस्तप्त्वाति शंकरम् ।

समाराध्य ययौ भक्त्या शिवलोकमनामयम् ॥

नृपस्य कीर्तिमान्नाम्ना ज्येष्ठपुत्रोऽथ धार्मिकः ।

पुत्रवत्पालयामास प्रजा राज्यं चकार ह ॥

इति ते कथितं शैलानरण्यचरितं शुभम् ।

कन्यां दत्त्वा यथारक्षद्वंशं चाप्यखिलं धनम् ॥

शैलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च ।

रक्ष सर्वकुलं सर्वान् वशान् कुरु सुरानपि ॥

हे गिरे! इस प्रकार उस कन्यासे विधानपूर्वक ३२ विवाहकर महर्षि पिप्पलाद महालक्ष्मीके समान उस । पद्माको लेकर प्रसन्नतासे युक्त अपने घर चले गये ॥ ३२ ॥

इधर, राजा उस वृद्धको अपनी कन्या प्रदान ३३ करके सभी लोगोंको छोड़कर मनमें ग्लानि रखकर तपस्याके लिये वनमें चले गये ॥३३ ॥

हे गिरे! अपने प्राणनाथके वन चले जानेपर ३४ उनकी भार्याने भी पति तथा कन्याके शोकसे प्राण त्याग दिये ॥ ३४ ॥

राजाके पूज्य लोग, पुत्र, सेवक राजाके बिना मूर्च्छित ३५ हो गये तथा अन्य सभी पुरवासी एवं दूसरे लोग यह सब जानकर उच्छ्वास लेकर शोक करने लगे ॥ ३५ ॥

[ राजा ] अनरण्य वनमें जाकर कठोर तप करके ३६ भक्तिपूर्वक शंकरकी आराधनाकर शाश्वत शिवलोकको चला गया । तदनन्तर राजाका कीर्तिमान् नामक धार्मिक ज्येष्ठ पुत्र राज्य करने लगा और पुत्रके समान ३७ प्रजाका पालन करने लगा ॥ ३६-३७ ॥ हे शैल! मैंने अनरण्यका यह शुभ चरित्र आपसे ३८ कहा, जिस प्रकार अपनी कन्या प्रदानकर उन्होंने अपने वंशकी तथा सम्पूर्ण धनकी रक्षा की ॥ ३८ ॥

इसी प्रकार हे शैलराज! आप भी अपनी कन्या शंकरजीको देकर अपने समस्त कुलकी रक्षा कीजिये ३ ९ । और सभी देवताओंको भी वशमें कीजिये ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डेऽनरण्यचरितवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें अनरण्यचरितवर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः धर्मराजद्वारा मुनि भार्या सती पद्माके पातिव्रत्यकी परीक्षा, पद्माद्वारा धर्मराज करना पिप्पलादकी तथा पुनः चारों युगों में शापकी व्यवस्था करना, पातिव्रत्यसे प्रसन्न हो शाप प्रदान अनेक वर प्रदान करना, महर्षि वसिष्ठद्वारा हिमवान्से पद्माके धर्मराजद्वारा पद्माको लिये कहना अपनी पुत्री शिवको सौंपनेके दृष्टान्तद्वारा नारदजी बोले - हे तात! अनरण्यके कन्यादान-नारद उवाच सम्बन्धी चरित्रको सुनकर गिरिश्रेष्ठने क्या किया,

अनरण्यस्य चरितं सुतादानसमन्वितम् ।

श्रुत्वा गिरिवरस्तात च तद्वद ॥ १ उसे कहिये ॥ १ ॥

किं चकार 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_22_1_Front

पृष्ठ 654

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६४२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- हे तात! अनरण्यका अनरण्यस्य चरितं कन्यादानसमन्वितम् । | सम्बन्धी चरित्र सुनकर गिरिराजने हाथ कन्यादान-श्रुत्वा पप्रच्छ शैलेशो वसिष्ठं साञ्जलिः पुनः ॥ २ वसिष्ठजीसे पुन: पूछा- ॥२ ॥ जोड़कर |

शैलेश उवाच शैलेश बोले- हे वसिष्ठ! हे मुनिशार्दूल वसिष्ठ मुनिशार्दूल ब्रह्मपुत्र कृपानिधे । ब्रह्मपुत्र! हे कृपानिधे! आपने अनरण्यका परम अद्भुत! है |

अनरण्यचरित्रं ते कथितं परमाद्भुतम् ॥ ३ । चरित्र कहा ॥३ ॥

अनरण्यसुता यस्मात् पिप्पलादं मुनिं पतिम् सम्प्राप्य किमकार्षीत्सा तच्चरित्रं मुदावहम् वसिष्ठ उवाच पिप्पलादो मुनिवरो वयसा जर्जरोऽधिकः गत्वा निजाश्रमं नार्यानरण्यसुतया तया

उवास तत्र सुप्रीत्या तपस्वी नातिलम्पटः ।

तत्रारण्ये गिरिवरे स नित्यं निजधर्मकृत् ॥

अथानरण्यकन्या सा सिषेवे भक्तितो मुनिम् ।

कर्मणा मनसा वाचा लक्ष्मीर्नारायणं यथा ॥

एकदा स्वर्णदीं स्नातुं गच्छन्तीं सुस्मितां च ताम् ।

ददर्श पथि धर्मश्च मायया नृपरूपधृक् ॥

चारुरत्नरथस्थश्च नानालङ्कारभूषितः । नवीनयौवनश्श्रीमान्कामदेवसमप्रभः ॥

दृष्ट्वा तां सुन्दरीं पद्मामुवाच स वृषो विभुः ।

विज्ञातुं भावमन्तःस्थं तस्याश्च मुनियोषितः ॥

धर्म उवाच

अयि सुन्दरि लक्ष्मीर्वै राजयोग्ये मनोहरे ।

अतीव यौवनस्थे च कामिनि स्थिरयौवने ॥

जरातुरस्य वृद्धस्य पिप्पलादस्य वै मुनेः ।

सत्यं वदामि तन्वङ्गि समीपे नैव राजसे ॥

विप्रं तपस्सु निरतं निर्घृणं मरणोन्मुखम् ।

त्यक्त्वा मां पश्य राजेन्द्रं रतिशूरंस्मरातुरम् ॥

प्राप्नोति सुन्दरी पुण्यात्सौन्दर्यं पूर्वजन्मनः सफलं तद्भवेत्सर्वं रसिकालिङ्गनेन ॥ तदनन्तर अनरण्यकी कन्याने पिप्पलाद मुनिको ॥ ४ पतिरूपमें प्राप्त करनेके अनन्तर क्या किया? वह सुखदायक चरित्र आप कहिये ॥४ ॥

वसिष्ठजी बोले — अवस्थासे जर्जर मुनिश्रेष्ठ । पिप्पलाद अनरण्यकी उस कन्याके साथ अपने आश्रममें जाकर बड़े प्रेमसे निवास करने लगे । हे गिरिराज! वे ॥ ५ वहाँ वनमें श्रेष्ठ पर्वतपर इन्द्रियोंको वशमें करके तपस्यापरायण हो नित्य अपने धर्मका पालन करने ६ लगे ॥ ५-६ ॥ वह अनरण्यकन्या भी मन, वचन तथा कर्मसे ७ भक्तिपूर्वक मुनिकी सेवा करने लगी, जिस प्रकार लक्ष्मी नारायणकी सेवा करती है । किसी समय जब वह सुस्मित - भाषिणी गंगास्नान करने जा रही थी, तब ८ मायासे मनुष्यरूप धारण किये धर्मराजने उसे रास्तेमें देखा ॥ ७-८ ॥ वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे भूषित, मनोहर रत्नोंसे ९ जटित रथपर विराजमान थे । वे नवयौवनसे सम्पन्न एवं कामदेवके समान अत्यन्त कमनीय थे । प्रभु धर्म उस सुन्दरी पद्माको देखकर उस मुनिपत्नीके अन्तःकरणका १० भाव जाननेके लिये उससे कहने लगे- ॥ ९ -१० ५ धर्म बोले - हे सुन्दरि! हे राजयोग्ये! हे मनोहरे! ।

। हे नवीन यौवनवाली! हे कामिनि! हे नित्य युवावस्थामें ।

११ रहनेवाली! तुम तो साक्षात् लक्ष्मी हो ॥ ११ ॥

हे तन्वंगि! मैं सत्य कहता हूँ कि तुम जराग्रस्त १२ पिप्पलाद मुनिके समीप शोभित नहीं हो रही हो ॥ १२ ॥

तुम तपस्यामें लगे हुए, क्रोधी तथा मरणोन्मुख १३ ब्राह्मणको त्यागकर मुझ राजेन्द्र, कामकलामें निपुण एवं कामातुरकी ओर देखो ॥१३ ॥

सुन्दरी स्त्री अपने पूर्वजन्ममें किये गये पुण्यके । प्रभावसे ही सौन्दर्यको प्राप्त करती है । किंतु वह सब च ॥ १४ होता है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 655

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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६४३

सहस्रसुन्दरीकान्तं कामशास्त्रविशारदम् ।

किंकरं कुरु मां कान्ते सम्परित्यज्य तं पतिम् ॥ १५

निर्जने कानने रम्ये शैले शैले नदीतटे ।

विहरस्व मया सार्धं जन्मेदं सफलं कुरु ॥१६

वसिष्ठ उवाच

इत्येवमुक्तवन्तं सा स्वरथादवरुह्य च ।

गृहीतुमुत्सुकं हस्ते तमुवाच पतिव्रता ॥ १७

पद्मोवाच

गच्छ दूरं गच्छ दूरं पापिष्ठस्त्वं नराधिप ।

मां चेत्पश्यसि कामेन सद्यो नष्टो भविष्यसि ॥ १८

पिप्पलादं मुनिश्रेष्ठं तपसा पूतविग्रहम् ।

त्यक्त्वा कथं भजेयं त्वां स्त्रीजितं रतिलम्पटम् ॥ १ ९

स्त्रीजितस्पर्शमात्रेण सर्वं पुण्यं प्रणश्यति ।

स्त्रीजितः परपापी च तद्दर्शनमघावहम् ॥ २०

सत्क्रियो ह्यशुचिर्नित्यं स पुमान् यः स्त्रिया जितः ।

निन्दन्ति पितरो देवा मानवाः सकलाश्च तम् ॥ २१

तस्य किं ज्ञानसुतपोजपहोमप्रपूजनैः ।

विद्यया दानतः किं वा स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम् ॥ २२

मातरं मां स्त्रियो भावं कृत्वा येन ब्रवीषि ह ।

भविष्यति क्षयस्तेन कालेन मम शापतः ॥ २३

वसिष्ठ उवाच

श्रुत्वा धर्मः सतीशापं नृपमूर्तिं विहाय च ।

धृत्वा स्वमूर्तिं देवेशः कम्पमान उवाच सः ॥ २४

धर्म उवाच

मातर्जानीहि मां धर्मं ज्ञानिनां च गुरोर्गुरुम् ।

परस्त्रीमातृबुद्धिं च कुर्वन्तं सततं सति ॥ २५

अहं तवान्तरं ज्ञातुमागतस्तव सन्निधिम् ।

तवाहं च मनो जाने तथापि विधिनोदितः ॥ २६

कृतं मे दमनं साध्वि न विरुद्धं यथोचितम् । हे कान्ते! तुम इस जरा - जर्जर पतिको छोड़कर हजारों स्त्रियोंके कान्त तथा कामशास्त्रके विशारद मुझे अपना किंकर बनाओ और निर्जन मनोहर वनमें, पर्वतपर तथा नदीके तटपर मेरे साथ विहार करो तथा इस जन्मको सफल करो ॥ १५-१६ ॥ वसिष्ठजी बोले- इस प्रकार कहकर वे ज्यों ही रथसे उतरकर उसका हाथ पकड़ना ही चाहते थे कि वह पतिव्रता कहने लगी —॥१७ ॥

पद्मा बोली- हे राजन्! तुम तो बड़े पापी हो, दूर हट जाओ, दूर हट जाओ, यदि तुमने मुझे और सकाम भावसे देखा, तो शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ १८ ॥

मैं तपस्यासे पवित्र शरीरवाले उन मुनिश्रेष्ठ पिप्पलादको छोड़कर परस्त्रीगामी एवं स्त्रीके वशमें रहनेवाले तुमको कैसे स्वीकार कर सकती हूँ? ॥ १ ९ ॥ स्त्रीके वशमें रहनेवालेके स्पर्शमात्रसे सारा पुण्य नष्ट हो जाता है । जो स्त्रीजित् तथा दूसरेकी हत्या करनेवाला पापी है, उसका दर्शन भी पाप उत्पन्न करनेवाला होता है । जो पुरुष स्त्रीके वशमें रहनेवाला है, वह सत्कर्ममें लगे रहनेपर भी सदा अपवित्र है । पितर, देवता तथा सभी मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं ॥ २०-२१ ॥ जिसका मन स्त्रियोंके द्वारा हर लिया गया है, उसके ज्ञान, उत्तम तप, जप, होम, पूजन, विद्या तथा दानसे क्या लाभ है! तुमने माताके समान मुझमें स्त्रीकी भावनासे जो इस प्रकारकी बात कही है, इसलिये समय आनेपर मेरे शापसे तुम्हारा नाश हो जायगा ॥ २२-२३ ॥ वसिष्ठजी बोले- सतीके शापको सुनकर वे देवेश धर्मराज राजाका रूप त्यागकर अपना स्वरूप धारणकर काँपते हुए कहने लगे —॥२४ ॥

धर्म बोले- हे मातः! हे सति! आप मुझे ज्ञानियोंके गुरुओंका भी गुरु तथा परायी स्त्रीमें सर्वदा मातृबुद्धि रखनेवाला समझें ॥ २५ ॥

मैं आपके मनोभावकी परीक्षा लेनेके लिये आपके | पास आया था और आपका अभिप्राय जान लिया, किंतु हे साध्वि! विधिसे प्रेरित होकर आपने [ शाप देकर ] मेरा गर्व नष्ट किया । यह तो आपने उचित ही किया, कोई विरुद्ध कार्य नहीं किया । इस प्रकारका शासन लिये ईश्वरद्वारा निर्मित है ॥ २६-२७ ॥ शास्तिः विनिर्मिता ॥ २७ । उन्मार्गगामियोंके समुत्पथस्थानामीश्वरेण 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_22_2_Front

पृष्ठ 656

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६४४ स्वयं प्रदाता सर्वेभ्यः सुखदुःखवरान्क्षमः सम्पदं विपदं यो हि नमस्तस्मै शिवाय हि शत्रुं मित्रं संविधातुं प्रीतिं च कलहं क्षमः स्रष्टुं नष्टुं च यस्सृष्टिं नमस्तस्मै शिवाय हि येन शुक्लीकृतं क्षीरं जले शैत्यं कृतं पुरा दाहीकृतो हुताशश्च नमस्तस्मै शिवाय हि ॥ प्रकृतिर्निर्मिता येन तत्त्वानि महदादितः । ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या नमस्तस्मै शिवाय हि ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा पुरतस्तस्यास्तस्थौ धर्मो जगद्गुरुः ।

किञ्चिन्नोवाच चकितस्तत्पातिव्रत्यतोषितः ॥

पद्मापि नृपकन्या सा पिप्पलादप्रिया तदा ।

साध्वी तं धर्ममाज्ञाय विस्मितोवाच पर्वत ॥

पद्मोवाच

त्वमेव धर्म सर्वेषां साक्षी निखिलकर्मणाम् ।

कथं मनो मे विज्ञातुं विडम्बयसि मां विभो ॥

यत्तत्सर्वं कृतं ब्रह्मन् नापराधो बभूव मे ।

त्वं च शप्तो मयाज्ञानात्स्त्रीस्वभावाद् वृथा वृष ॥

का व्यवस्था भवेत्तस्य चिन्तयामीति साम्प्रतम् ।

चित्ते स्फुरतु सा बुद्धिर्यया शं संल्लभामि वै ॥

आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्तु वायवः ।

तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन ॥

सत्ये पूर्णश्चतुष्पादः पौर्णमास्यां यथा शशी ।

विराजसे देवराज सर्वकालं दिवानिशम् ॥

त्वं च नष्टो भवसि चेत्सृष्टिनाशो भवेत्तदा ।

इतिकर्तव्यतामूढा वृथापि च वदाम्यहम्॥

पादक्षयश्च भविता त्रेतायां च सुरोत्तम ।

पादोऽपरे द्वापरे च तृतीयोऽपि कलौ विभो ॥

कलिशेषेऽखिलाश्छिन्ना भविष्यन्ति तवाङ्घ्रयः ।

पुनः सत्ये समायाते परिपूर्णो भविष्यसि ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ । जो स्वयं सबको महान् सुख - दुःख देनेवाले हैं ॥ २८ । और सम्पत्ति तथा विपत्ति देनेमें समर्थ हैं, उन शिवके | प्रति नमस्कार है । जो शत्रु, मित्र, प्रीति तथा कलहका ॥ विधान करनेमें और सृष्टिका सृजन एवं संहार करनेमें ॥ २ ९ समर्थ हैं, उन शिवको नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥ । जिन्होंने पूर्वकालमें दूधको शुक्लवर्णका बनाया. ३० जलमें शैत्य उत्पन्न किया और अग्निको दाहकताशक्ति प्रदान की, उन शिवको नमस्कार है । जिन्होंने प्रकृतिका, महत् आदि तत्त्वोंका एवं ब्रह्मा, विष्णु - महेश आदिका ॥ ३१ निर्माण किया है, उन शिवको नमस्कार है ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर जगद्गुरु धर्मराज उस पतिव्रताके आगे खड़े हो गये । वे उसके ३२ पातिव्रत्यसे सन्तुष्ट होकर आश्चर्यसे चकित रह गये और कुछ भी नहीं बोल सके । हे पर्वत! तब अनरण्यकी कन्या तथा पिप्पलादकी पत्नी वह साध्वी पद्मा उन्हें धर्मराज ३३ जानकर चकित होकर कहने लगी- ॥ ३२-३३ ॥ पद्मा बोली- हे धर्म! आप ही सबके समस्त कर्मोंके साक्षी हैं, हे विभो! आपने मेरे मनका भाव ३४ । जाननेके लिये कपटरूप क्यों धारण किया? ॥ ३४ ॥

हे ब्रह्मन्! यह जो कुछ मैंने किया, उसमें मेरा ३५ अपराध नहीं है । हे धर्म! मैंने अज्ञानसे स्त्रीस्वभावके कारण आपको व्यर्थ ही शाप दे दिया ॥ ३५ ॥

मैं इस समय यही सोच रही हूँ कि उस शापकी ३६ क्या व्यवस्था होनी चाहिये, मेरे चित्तमें अब वह बुद्धि स्फुरित हो, जिससे मैं शान्ति प्राप्त करूँ ॥ ३६ ॥

यह आकाश, सभी दिशाएँ तथा वायु भले ही ३७ नष्ट हो जायँ, किंतु पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं होता ॥ ३७ ॥

हे देवराज! आप सत्ययुगमें अपने चारों पैरोंसे ३८ सभी समय पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान दिन - रात शोभित रहते हैं । यदि आप नष्ट हो जायँगे, तब त सृष्टिका ही नाश हो जायगा । किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ३ ९ मैंने यह झूठा शाप दे दिया ॥ ३८-३९ ॥ हे सुरोत्तम! हे विभो! [ अब आप मेरे शापकी ४० व्यवस्था सुनियेम ॥ त्रै तविममें आपका एक पाद, द्वापर में | दो पाद और कलियुगमें तीन पाद नष्ट होगा और कलि । अन्तमें आपके सभी पाद नष्ट हो जायँगे । तदनन्तर ४१ । सत्ययुग आनेपर आपः पुनः पूर्ण हो जायँगे ॥ ४०-४१ ॥

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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६४५

सत्ये सर्वव्यापकत्वं तदन्येषु च कुत्रचित् ।

युगव्यवस्थया स त्वं भविष्यसि यथा तथा ॥ ४२

इत्येवं वचनं सत्यं ममास्तु सुखदं तव ।

याम्यहं पतिसेवायै गच्छ त्वं स्वगृहं विभो ॥ ४३

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः सन्तुष्टोऽभूद् वृषः स वै ।

तदेवंवादिनीं साध्वीमुवाच विधिनन्दन ॥ ४४

धर्म उवाच

धन्यासि पतिभक्तासि स्वस्ति तेऽस्तु पतिव्रते ।

वरं गृहाण त्वत्स्वामी त्वत्परित्राणकारणात् ॥ ४५

युवा भवतु ते भर्ता रतिशूरश्च धार्मिकः ।

रूपवान् गुणवान्वाग्मी संततस्थिरयौवनः ॥ ४६

चिरञ्जीवी स भवतु मार्कण्डेयात्परश्शुभे ।

कुबेराद्धनवांश्चैव शक्रादैश्वर्यवानपि ॥ ४७

शिवभक्तो हरिसमस्सिद्धस्तु कपिलात्परः ।

बुद्ध्या बृहस्पतिसमः समत्वेन विधेः समः ॥ ४८

स्वामिसौभाग्यसंयुक्ता भव त्वं जीवनावधि ।

तथा च सुभगे देवि त्वं भव स्थिरयौवना ॥ ४ ९

माता त्वं दशपुत्राणां गुणिनां चिरजीविनाम् ।

स्वभर्तुरधिकानां च भविष्यसि न संशयः ॥ ५०

गृहा भवन्तु ते साध्वि सर्वसम्पत्समन्विताः ।

प्रकाशवन्तः सततं कुबेरभवनाधिकाः ॥ ५१

वसिष्ठ उवाच

इत्येवमुक्त्वा सन्तस्थौ धर्मः स गिरिसत्तम ।

सा तं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य स्वगृहं ययौ ॥ ५२

धर्मस्तथाशिषो दत्त्वा जगाम निजमन्दिरम् ।

प्रशशंस च तां प्रीत्या पद्मां संसदि संसदि ॥ ५३

सा रेमे स्वामिना सार्धं यूना रहसि सन्ततम् ।

पश्चाद् बभूवुः सत्पुत्रास्तद्भर्तुरधिका गुणैः ॥ ५४

सत्ययुगमें आप सर्वव्यापक रहेंगे और अन्य युगोंमें युग - व्यवस्थानुसार आप कहीं - कहीं जैसे - तैसे घटते-बढ़ते रहेंगे । मेरा यह सत्य वचन आपके लिये सुखदायक हो । हे विभो! अब मैं अपने पतिकी सेवाके लिये जा रही हूँ और आप अपने घर जायँ ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मपुत्र नारद! पद्माके इस वचनको सुनकर धर्मराज प्रसन्न हो गये और इस प्रकार कहनेवाली उस साध्वीसे कहने लगे— ॥ ४४ ॥

धर्म बोले- हे पतिव्रते! तुम धन्य हो, तुम पतिभक्त हो, तुम्हारा कल्याण हो । तुम वर स्वीकार करो । तुम्हारा स्वामी तुम्हारी रक्षा करनेके कारण युवा हो जाय । तुम्हारा पति रतिमें शूर, धार्मिक, रूपवान्, गुणवान्, वक्ता और सदा स्थिर यौवनवाला हो ॥ ४५-४६ ॥ हे शुभे! वह मार्कण्डेयसे भी बढ़कर चिरंजीवी हो, कुबेरसे भी अधिक धनवान् तथा इन्द्रसे भी अधिक ऐश्वर्यशाली रहे । वह विष्णुके समान शिवभक्त, कपिलके समान सिद्ध, बुद्धिमें बृहस्पतिके समान तथा समदर्शितामें ब्रह्मदेवके समान हो । ४७-४८ ॥ तुम जीवनपर्यन्त स्वामीके सौभाग्यसे संयुक्त रहो और हे सुभगे! हे देवि! तुम्हारा भी यौवन स्थिर रहे ॥ ४ ९ ॥ तुम अपने पतिसे भी अधिक चिरंजीवी एवं गुणवान् दस पुत्रोंकी माता होओगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥५० ॥

हे साध्वि! तुम्हारे घर नाना प्रकारकी सम्पत्तिसे पूर्ण, निरन्तर प्रकाशयुक्त तथा कुबेरके भवनसे भी श्रेष्ठ हों ॥५१ ॥

वसिष्ठ बोले — हे गिरिश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर धर्मराज चुप होकर खड़े हो गये और वह भी उनकी प्रदक्षिणाकर उन्हें प्रणाम करके अपने घर चली गयी ॥ ५२ ॥

धर्मराज भी [ पद्माको ] आशीर्वाद देकर अपने घर चले गये और वे प्रत्येक सभामें प्रसन्न मनसे पद्माकी प्रशंसा करने लगे । तदनन्तर वह [ पद्मा ] अपने युवा स्वामीके साथ नित्य एकान्तमें रमण करने लगी । बादमें उसके पतिसे भी अधिक गुणवान् उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५३-५४ ॥

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६४६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६

बभूव सकला सम्पद्दम्पत्योः सुखवर्धिनी ।

सर्वानन्दवृद्धिकरी परत्रेह च शर्मणे ॥ ५५

शैलेन्द्र कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम् ।

दम्पत्योश्च तयोः प्रीत्या श्रुतं ते परमादरात् ॥ ५६

बुद्ध्वा तत्त्वं सुतां देहि पार्वतीमीश्वराय च ।

कुरुषं त्यज शैलेन्द्र मेनया स्वस्त्रिया सह ॥ ५७

सप्ताहे समतीते तु दुर्लभेऽतिशुभे क्षणे ।

लग्नाधिपे च लग्नस्थे चन्द्रे स्वतनयान्विते ॥ ५८

मुदिते रोहिणीयुक्ते विशुद्धे चन्द्रतारके ।

मार्गमासे चन्द्रवारे सर्वदोषविवर्जिते ॥ ५ ९

सर्वसद्ग्रहसंसृष्टेऽसद्ग्रहदृष्टिवर्जिते सदपत्यप्रदे जीवे पतिसौभाग्यदायिनि ॥ ६०

जगदम्बां जगत्पित्रे मूलप्रकृतिमीश्वरीम् ।

कन्यां प्रदाय गिरिजां कृती त्वं भव पर्वत ॥ ६१

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो वसिष्ठो ज्ञानिसत्तमः ।

विरराम शिवं स्मृत्वा नानालीलाकरं प्रभुम् ॥ ६२

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्त्री एवं पुरुषोंको सुख देनेवाली सारी सम्पत्ति उनके पास हो गयी, जो सब प्रकारके आनन्दको

बढ़ानेवाली और इस लोक तथा परलोकमें कल्याण- ।

कारिणी हुई ॥५५ ॥

हे शैलेन्द्र! उन दोनों स्त्री - पुरुषोंका यह सारा पुरातन इतिहास मैंने आपसे वर्णन किया और आपने इसे अत्यन्त आदरपूर्वक सुना ॥५६ ॥

अतः आप इस चरित्रको जानकर अपनी कन्या पार्वतीको शिवजीको प्रदान कीजिये और हे शैलेन्द्र! अपनी स्त्री मेनाके सहित अपना हठ छोड़ दीजिये ॥ ५७ ॥

एक सप्ताह बीतनेपर एक दुर्लभ उत्तम शुभयोग आ रहा है । उस लग्नमें लग्नका स्वामी स्वयं अपने घरमें स्थित है और चन्द्रमा भी अपने पुत्र बुधके साथ स्थित रहेगा । चन्द्रमा रोहिणीयुक्त होगा, इसलिये चन्द्र तथा तारागणोंका योग भी उत्तम है । मार्गशीर्षका महीना है, उसमें भी सर्वदोषविवर्जित चन्द्रवारका दिन है, वह लग्न सभी उत्तम ग्रहोंसे युक्त तथा नीच ग्रहों की दृष्टिसे रहित है । उस शुभ लग्नमें बृहस्पति उत्तम सन्तान तथा पतिका सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५८-६० ॥ हे पर्वत! [ ऐसे शुभ लग्नमें ] अपनी कन्या मूल प्रकृतिरूपा ईश्वरी जगदम्बाको जगत्पिता शिवजीके लिये प्रदान करके आप कृतार्थ हो जायँगे ॥ ६१ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] यह कहकर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मुनिशार्दूल वसिष्ठजी अनेक लीला करनेवाले प्रभु शिवका स्मरण करके चुप हो गये ॥ ६२ ॥

रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पद्मापिप्पलादचरितवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पद्मापिप्पलादचरितवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः सप्तर्षियोंके समझानेपर हिमवान्‌का शिवके साथ अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय करना, सप्तर्षियोंद्वारा शिवके पास जाकर उन्हें सम्पूर्ण वृत्तान्त बताकर अपने धामको जाना ब्रह्मोवाच सुनकर वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा सगणोऽपि हिमालयः ब्रह्माजी बोले- वसिष्ठजीकी बात । । अपने गणों एवं भार्यासहित विस्मित होकर गिरिराज

विस्मितो भार्यया शैलानुवाच स गिरीश्वरः ॥ १ । हिमालय पर्वतोंसे कहनेलगे -॥१ ॥

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अ ० ३६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६४७ हिमालय उवाच

हे मेरो गिरिराट् सह्य गन्धमादन मन्दर ।

मैनाक विन्ध्य शैलेन्द्राः सर्वे शृणुत मद्वचः ॥

वसिष्ठो हि वदत्येवं किं मे कार्यं विचार्यते ।

यथा तथा च शंसध्वं निर्णीय मनसाखिलम् ॥

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सुमेरुप्रमुखाश्च ते ।

प्रोचुर्हिमालयं प्रीत्या सुनिर्णीय महीधराः ॥

शैला ऊचुः

अधुना किं विमर्शेन कृतं कार्यं तथैव हि ।

उत्पन्नेयं महाभाग देवकार्यार्थमेव हि ॥

प्रदातव्या शिवायेति शिवस्यार्थेऽवतारिणी ।

अनयाराधितो रुद्रो रुद्रेण यदि भाषिता ॥

ब्रह्मोवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां मेर्वादीनां हिमाचलः ।

सुप्रसन्नतरोऽभूद् वै जहास गिरिजा हृदि ॥

अरुन्धती च तां मेनां बोधयामास कारणात् ।

नानावाक्यसमूहेनेतिहासैर्विविधैरपि ॥

अथ सा मेनका शैलपत्नी बुद्ध्वा प्रसन्नधीः ।

मुनीनरुन्धतीं शैलं भोजयित्वा बुभोज च ॥

अथ शैलवरो ज्ञानी सुसंसेव्य मुनींश्च तान् ।

उवाच साञ्जलिः प्रीत्या प्रसन्नात्मा गतभ्रमः ॥

हिमाचल उवाच

सप्तर्षयो महाभागा वचः शृणुत मामकम् ।

विस्मयो मे गतः सर्वः शिवयोश्चरितं श्रुतम् ॥

मदीयं च शरीरं वै पत्नी मेना सुता सुताः ।

ऋद्धिः सिद्धिश्च चान्यद्वै शिवस्यैव न चान्यथा ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा स तदा पुत्रीं दृष्ट्वा तत्सादरं च ताम् ।

भूषयित्वा तदङ्गानि ऋष्युत्सङ्गे न्यवेशयत् ॥

हिमालय बोले- हे गिरिराज मेरो! हे सह्य! हे गन्धमादन! हे मन्दर! हे मैनाक! हे विन्ध्य! हे २ पर्वतेश्वरो! आप सब लोग मेरी बात सुनें । वसिष्ठजी ऐसा कह रहे हैं । अब मुझको क्या करना चाहिये इस सम्बन्धमें आपलोग विचार करें और मनसे ३ सब बातोंका निर्णय करके जैसा ठीक हो, वैसा बताइये ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- उनकी बात सुनकर सुमेरु आदि वे पर्वत भलीभाँति निर्णय करके प्रेमपूर्वक ४ हिमालयसे कहने लगे —॥४ ॥

पर्वत बोले- इस समय बहुत विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है, कार्य तो हो ही गया है । हे ५ महाभाग! यह [ कन्या ] देवताओंके कार्यके लिये ही उत्पन्न हुई है । इसका अवतार ही जब शिवके लिये हुआ है, तो इसे शिवजीको ही देना चाहिये । इसने ६ रुद्रकी आराधना की है और रुद्रने इसे स्वीकृति भी दी है॥५-६ ॥ ब्रह्माजी बोले- मेरु आदि पर्वतोंकी यह बात ७ सुनकर हिमालयको बड़ी प्रसन्नता हुई और गिरिजा भी मन - ही - मन हँसने लगीं । अरुन्धतीने [ शिव-पार्वतीके विवाहके लिये ] अनेक प्रकारके वचनों तथा ८ विविध इतिहासोंसे उन मेनाको समझाया ॥ ७-८ ॥ तब शैलपत्नी मेना सब कुछ समझ गयीं और ९ प्रसन्नचित्त हो गयीं । उन्होंने मुनियों, अरुन्धती तथा हिमालयको भोजन कराकर स्वयं भोजन किया॥९॥

तदनन्तर ज्ञानी गिरिश्रेष्ठ उन मुनियोंकी सेवा १० करके प्रसन्नचित्त और भ्रमरहित होकर हाथ जोड़कर प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे— ॥ १० ॥

हिमालय बोले- हे महाभाग्यवान् सप्तर्षिगण! आपलोग मेरी बात सुनिये, मैंने शिवा और शिवजीका सारा चरित्र सुन लिया, जिससे मेरा सारा सन्देह दूर ११ हो गया है । मेरा यह शरीर, पत्नी मेना, पुत्री, पुत्र, ऋद्धि, सिद्धि तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, वह १२ सब शिवका ही है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले — उन्होंने इस प्रकार कहकर उस पुत्रीकी ओर आदरपूर्वक देखकर उसके अंगोंको १३ | [ अलंकारोंसे ] सुसज्जितकर उसे ऋषियोंकी गोदमें

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६४८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ उवाच च पुनः प्रीत्या शैलराज ऋषींस्तदा । | बैठा दिया । तदनन्तर शैलराजने पुनः प्रेमसे ऋषियोंसे अयं भागो मया तस्मै दातव्य इति निश्चितम् ॥ १४ कहा- मुझे शंकरका यह भाग उन्हें अवश्य देना है ऋषय ऊचुः

शंकरो भिक्षुकस्तेऽथ स्वयं दाता भवान् गिरे ।

भैक्ष्यञ्च पार्वती देवी किमतः परमुत्तमम् ॥

हिमवन् शिखराणान्ते यद्धेतोः सदृशी गतिः ।

धन्यस्त्वं सर्वशैलानामधिपः सर्वतो वरः ॥

ब्रह्मोवाच

एवमुक्त्वा तु कन्यायै मुनयो विमलाशयाः ।

आशिषं दत्तवन्तस्ते शिवाय सुखदा भव ॥

स्पृष्ट्वा करेण तां तत्र कल्याणं ते भविष्यति ।

शुक्लपक्षे यथा चन्द्रो वर्धन्तां त्वद्गुणास्तथा ॥

इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे दत्त्वा ते गिरये मुदा ।

पुष्पाणि फलयुक्तानि प्रत्ययं चक्रिरे तदा ॥

अरुन्धती तदा तत्र मेनां सा सुमुखी मुदा ।

गुणैश्च लोभयामास शिवस्य परमा सती ॥

हरिद्राकुंकुमैः शैलश्मश्रूणि प्रत्यमार्जयत् ।

लौकिकाचारमाधाय मङ्गलायनमुत्तमम् ॥

ततश्च ते चतुर्थेऽह्नि संधार्य लग्नमुत्तमम् ।

परस्परं च सन्तुष्य संजग्मुः शिवसन्निधिम् ॥

तत्र गत्वा शिवं नत्वा स्तुत्वा विविधसूक्तिभिः ।

ऊचुः सर्वे वसिष्ठाद्या मुनयः परमेश्वरम् ॥

ऋषय ऊचुः

देवदेव महादेव परमेश महाप्रभो ।

शृण्वस्मद्वचनं प्रीत्या यत्कृतं सेवकैस्तव ॥

बोधितो गिरिराजश्च मेना विविधसूक्तिभिः ।

सेतिहासं महेशान प्रबुद्धोऽसौ न संशयः ॥

वाक्यदत्ता गिरीन्द्रेण पार्वती ते हि नान्यथा । ऐसा मैंने निश्चय किया है॥१३-१४ ॥, ऋषि बोले- हे गिरे! भगवान् शंकर ग्रहीता होनेके कारण भिक्षुक हैं, आप कन्यादान देनेक कारण दाता हैं और देवी पार्वती भिक्षा हैं, अब इससे १५ । उत्तम और क्या बात हो सकती है । हे हिमालय! | जिस प्रकार सभी शिखरोंसे ऊँचे होनेके कारण आपके शिखरोंकी श्रेष्ठता है, उसी प्रकार आप भी १६ सम्पूर्ण पर्वतोंके अधिपति होनेके कारण सबसे उत्तम हैं तथा धन्य हैं ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर निर्मल मनवाले मुनियोंने हाथसे स्पर्श करके कन्याको आशीर्वाद १७ दिया कि शिवको सुख देनेवाली बनो, तुम्हारा कल्याण हो । जिस प्रकार शुक्लपक्षका चन्द्रमा बढ़ता १८ है, उसी प्रकार तुम्हारे गुणोंकी वृद्धि हो ॥ १७-१८ ॥ इस प्रकार कहकर उन सभी मुनियोंने १ ९ प्रसन्नतापूर्वक हिमालयको [ आशीर्वाद रूपमें ] फूल तथा फल अर्पित करके विश्वास उत्पन्न कराया ॥१ ९ ॥ परम पतिव्रता सुमुखी अरुन्धतीने शिवजीके २० गुणोंसे मेनाको प्रलोभित किया ॥२० ॥

तदनन्तर हिमालयने दाढ़ीमें हरिद्रा तथा कुंकुमसे २१ मार्जन किया और लौकिकाचारपूर्वक सारा मंगल किया ॥ २१ ॥

तदनन्तर चौथे दिन शुभ लग्नका निश्चयकर २२ परस्पर सन्तुष्ट हो वे [ मुनिगण ] शिवजीके पास गये ॥ २२ ॥

वहाँ जाकर शिवजीको प्रणामकर अनेक २३ सूक्तोंसे उनकी स्तुतिकर वे वसिष्ठ आदि सभी मुनि कहने लगे ॥२३ ॥

ऋषि बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे परमेश्वर! | हे महाप्रभो! आपके सेवक हम लोगोंने जो किया है, २४ उस बातको प्रेमसे सुनिये ॥२४ ॥

हे महेशान! हमलोगोंने इतिहासपूर्वक अनेक २५ प्रकारके उत्तम वचनोंसे पर्वतराज [ हिमालय ] तथा | मेनाको बहुत समझाया जिससे वे समझ गये, अब । उन्हें सन्देह नहीं रहा । गिरीन्द्रने , वाग्दान देकर प्रतिज्ञा