शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 641–650
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२ ९
अद्यप्रभृति लोकेषु मान्याः पूज्या मुनीश्वराः ।
जातास्ते दर्शनादेव स्वमुच्चैः पदमाश्रिताः ॥
अत्र किं बहुनोक्तेन सर्वथा मान्यतां गताः ।
दर्शनात्तव देवेश सर्वदेवेश्वरस्य हि ॥
पूर्णानां किञ्च कर्तव्यमस्ति चेत्परमा कृपा ।
सदृशं सेवकानां तु देयं कार्यं त्वया शुभम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा तेषां शम्भुर्महेश्वरः ।
लौकिकाचारमाश्रित्य रम्यं वाक्यमुपाददे ॥
शिव उवाच
ऋषयश्च सदा पूज्या भवन्तश्च विशेषतः ।
युष्माकं कारणाद्विप्राः स्मरणं च मया कृतम् ॥
ममावस्था भवद्भिश्च ज्ञायते ह्युपकारिका ।
साधनीया विशेषेण लोकानां सिद्धिहेतवे ॥
देवानां दुःखमुत्पन्नं तारकात्सुदुरात्मनः ।
ब्रह्मणा च वरो दत्तः किं करोमि दुरासदः ॥
मूर्तयोऽष्टौ च याः प्रोक्ता मदीयाः परमर्षयः ।
ताः सर्वा उपकाराय न तु स्वार्थाय तत्स्फुटम् ॥
तथा च कर्तुकामोऽहं विवाहं शिवया सह ।
तया वै सुतपस्तप्तं दुष्करं परमर्षिभिः ॥
तस्यै परं फलं देयमभीष्टं तद्धितावहम् ।
एतादृशः पणो मे हि भक्तानन्दप्रदः स्फुटम् ॥
पार्वतीवचनाद्भिक्षुरूपो यातो गिरेर्गृहम् । अहं पावितवान्कालीं यतो लीलाविशारदः आजसे अब हम मुनीश्वर आपके दर्शनसे २० लोकोंमें मान्य एवं पूज्य हो गये तथा ऊँची पदवीको प्राप्त हो गये ॥ २० ॥
हे देवेश! बहुत कहनेसे क्या? आप २१ सर्वदेवेश्वरके दर्शनसे हम सर्वथा मान्यताको प्राप्त हो गये ॥ २१ ॥
आप - जैसे पूर्ण परमात्माको किसीसे प्रयोजन २२ ही क्या है? किंतु यदि हम सेवकोंपर कृपा करना ही है, तो हम सबके योग्य कार्यके लिये आज्ञा प्रदान कीजिये ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब उनकी इस बातको सुनकर लोकाचारका आश्रय लेकर महेश्वर शम्भु मनोहर २३ वचन कहने लगे - ॥२३ ॥
शिवजी बोले - हे महर्षियो! ऋषिजन हर तरहसे पूज्य हैं, आपलोग तो विशेष रूपसे पूज्य हैं । २४ हे विप्रो! कुछ कारणवश मैंने आपलोगोंका स्मरण किया है ॥२४ ॥
आप सब जानते हैं कि मेरी स्थिति सदैव ही २५ परोपकार करनेवाली है और विशेषकर लोकोपकारके लिये तो मुझे यह सब करना ही पड़ता है ॥ २५ ॥
इस समय दुरात्मा तारकासुरसे देवताओंके समक्ष २६ दुःख उत्पन्न हो गया है, क्या करूँ, ब्रह्माजीने उसे बड़ा विकट वरदान दे रखा है ॥ २६ ॥
हे महर्षियो! मेरी जो आठ प्रकारकी मूर्तियाँ २७ ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र तथा यजमान ) कही गयी हैं, वे सब भी परोपकारके निमित्त ही हैं, स्वार्थके लिये नहीं हैं, यह बात तो स्पष्ट है ॥ २७ ॥
[ इस परोपकारके लिये ही ] मैं पार्वतीके २८ साथ विवाह करना चाहता हूँ; उसने भी महर्षियोंके कहनेसे दुष्कर कठोर तप किया है ॥२८ ॥
उसके इच्छानुसार उसका हितकारक फल २ ९ मुझे अवश्य देना चाहिये; क्योंकि भक्तोंको आनन्द देनेवाली मेरी यह स्पष्ट प्रतिज्ञा है ॥ २ ९ ॥ मैं पार्वतीके वचनानुसार भिक्षुकका रूप धारणकर हिमालयके घर गया था और मुझ लीलाप्रवीणने ॥ ३० कालीको पवित्र किया था ॥३० ॥
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६३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२
मां ज्ञात्वा तौ परं ब्रह्म दम्पती परभक्तितः ।
दातुकामावभूतां च स्वसुतां वेदरीतितः ॥ ३१
देवप्रेरणयाहं वै कृतवानस्मि निन्दनम् ।
तदा स्वस्य च तद्भक्तिं विहन्तुं वैष्णवात्मना ॥ ३२
तच्छ्रुत्वा तौ सुनिर्विण्णौ तद्धीनी संबभूवतुः ।
स्वकन्यां नेच्छतो दातुं मह्यं हि मुनयोऽधुना ॥ ३३
तस्माद्भवन्तो गच्छन्तु हिमाचलगृहं ध्रुवम् ।
तत्र गत्वा गिरिवरं तत्पत्नीं च प्रबोधय ॥ ३४
कथनीयं प्रयत्नेन वचनं वेदसम्मितम् ।
सर्वथा करणीयं तद्यथा स्यात्कार्यमुत्तमम् ॥ ३५
उद्वाहं कर्तुमिच्छामि तत्पुत्र्या सह सत्तमाः ।
स्वीकृतस्तद्विवाहो मे वरो दत्तश्च तादृशः ॥ ३६
अत्र किं बहुनोक्तेन बोधनीयो हिमालयः ।
तथा मेना च बोद्धव्या देवानां स्याद्धितं यथा ॥ ३७
भवद्भिः कल्पितो यो वै विधिः स्यादधिकस्ततः ।
भवतां चैव कार्यं तु भवन्तः कार्यभागिनः ॥ ३८
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा मुनयस्तेऽमलाशयाः ।
आनन्दं लेभिरे सर्वे प्रभुणानुग्रहीकृताः ॥ ३ ९
वयं धन्या अभूवंश्च कृतकृत्याश्च सर्वथा ।
वंद्या जाताश्च सर्वेषां पूजनीया विशेषतः ॥ ४०
ब्रह्मणा विष्णुना यो वै वन्द्यः सर्वार्थसाधकः ।
सोऽस्मान्प्रेषयते प्रेष्यान्कार्ये लोकसुखावहे ॥ ४१
अयं वै जगतां स्वामी पिता सा जननी मता ।
अयं युक्तश्च सम्बन्धो वर्धतां चन्द्रवत्सदा ॥ ४२
वे स्त्री - पुरुष मुझे परब्रह्म जानकर वेदरीतिसे सद्भक्तिसे अपनी कन्या मुझे देनेके लिये तत्पर हो गये ॥ ३१ ॥
उसके बाद देवताओंकी प्रेरणासे वैष्णव भिक्षुका रूप धारणकर मैं उन दोनोंसे अपनी निन्दा करने लगा । उससे मेरे प्रति उनकी भक्ति नष्ट हो गयी ॥ ३२ ॥
उसे सुनकर वे बड़े दुखी हो गये और मेरी भक्तिसे विमुख हो गये । हे मुनिगणो! अब वे मुझे अपनी कन्या नहीं देना चाहते हैं ॥ ३३ ॥
इसलिये! आपलोग निश्चित रूपसे हिमालयके घर जायँ और वहाँ जाकर गिरिश्रेष्ठ हिमालय और । उनकी पत्नीको समझायें ॥ ३४ ॥
आपलोग प्रयत्नपूर्वक वेदसम्मत वचन उनसे | कहें और सर्वथा वही करें, जिससे यह उत्तम कार्य सिद्ध हो जाय ॥३५ ॥
हे मुनिसत्तमो! मैं उनकी पुत्रीके साथ विवाह करना चाहता हूँ । मैंने [ देवताओं एवं विष्णुके कहनेसे ] विवाह करना स्वीकार कर लिया है और [ पार्वतीको ] वैसा वर भी दे दिया है ॥ ३६ ॥
अब मैं अधिक क्या कहूँ, आपलोग हिमालय तथा मेनाको समझाइये, जिससे देवताओंका हित हो ॥ ३७ ॥
आपलोगोंने जिस प्रकारकी विधिकी कल्पना की है, उससे भी अधिक होनी चाहिये, यह आपलोगोंका ही । कार्य है और इस कार्यके भागी आपलोग ही हैं ॥ ३८ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारके वचनको सुनकर | स्वच्छ अन्तःकरणवाले वे सभी महर्षि प्रभुसे अनुगृहीत हो आनन्दको प्राप्त हुए ॥३ ९ ॥ [ वे ऋषि परस्पर कहने लगे ] हमलोग सर्वथा | धन्य तथा कृतकृत्य हो गये और विशेष रूपसे सबके वन्दनीय एवं पूजनीय हो गये ॥४० ॥
जो ब्रह्मा तथा विष्णुके भी वन्दनीय हैं और सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले हैं, वे हमलोगोंको | अपना दूत बनाकर लोकको सुख प्रदान करनेवाले कार्यके लिये भेज रहे हैं ॥ ४१ ॥
ये शिवजी लोकोंके स्वामी एवं पिता हैं और वे [ पार्वती ] जगत्की माता कही गयी हैं । [ इन दोनोंका ] यह उचित सम्बन्ध सर्वदा चन्द्रमाके समान बढ़ता रहे ॥ ४२ ॥
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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६३१ ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा ऋषयो दिव्या नमस्कृत्य शिवं तदा ।
गता आकाशमार्गेण यत्रास्ति हिमवत्पुरम् ॥
दृष्ट्वा तां च पुरीं दिव्यां ऋषयस्तेऽतिविस्मिताः ।
वर्णयन्तश्च स्वं पुण्यमब्रुवन्वै परस्परम् ॥
ऋषय ऊचुः
पुण्यवन्तो वयं धन्या दृष्ट्वैतद्धिमवत्पुरम् ।
यस्मादेवंविधे कार्ये शिवेनैव नियोजिताः ॥
अलकायाश्च स्वर्गाच्च भोगवत्यास्तथा पुनः ।
विशेषेणामरावत्या दृश्यते पुरमुत्तमम् ॥
सुगृहाणि सुरम्याणि स्फटिकैर्विविधैर्वरैः ।
मणिभिर्वा विचित्राणि रचितान्यङ्गणानि च ॥
सूर्यकान्ताश्च मणयश्चन्द्रकान्तास्तथैव च ।
गृहे गृहे विचित्राश्च वृक्षाः स्वर्गसमुद्भवाः ॥
तोरणानां तथा लक्ष्मीर्दृश्यते च गृहे गृहे ।
विविधानि विचित्राणि शुकहंसैर्विमानकैः ॥
वितानानि विचित्राणि चैलवत्तोरणैः सह ।
जलाशयान्यनेकानि दीर्घिका विविधाः स्थिताः ॥
उद्यानानि विचित्राणि प्रसन्नैः पूजितान्यथ ।
नराश्च देवताः सर्वे स्त्रियश्चाप्सरसस्तथा ॥
कर्मभूमौ याज्ञिकाश्च पौराणाः स्वर्गकाम्यया ।
कुर्वन्ति ते वृथा सर्वे विहाय हिमवत्पुरम् ॥
यावन्न दृष्टमेतच्च तावत्स्वर्गपरा नराः ।
दृष्टमेतद्यदा विप्राः किं स्वर्गेण प्रयोजनम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येवमृषिवर्यास्ते वर्णयन्तः पुरं च तत् ।
गता हैमालयं सर्वे गृहं सर्वसमृद्धिमत् ॥
तान्दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान् हिमवान्विस्मितोऽब्रवीत् ।
दूरादाकाशमार्गस्थान्मुनीन्सप्त सुतेजसः ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे दिव्य ऋषि शिवजीको प्रणामकर आकाशमार्गसे वहाँ गये, जहाँ ४३ हिमालयका नगर है । उस दिव्य पुरीको देखते ही ऋषिगण आश्चर्यसे चकित हो गये और अपने पुण्यका वर्णन ४४ करते हुए परस्पर कहने लगे— ॥ ४३-४४ ॥ ऋषि बोले- हिमालयके इस नगरको देखकर हम सभी पुण्यवान् एवं धन्य हो गये; क्योंकि ४५ स्वयं शिवजीने इस प्रकारके कार्यमें हमलोगोंको नियुक्त किया है ॥ ४५ ॥
यह [ हिमालयकी ] पुरी तो अलका, स्वर्ग, ४६ भोगवती तथा विशेषकर अमरावतीसे भी उत्तम दिखायी पड़ती है ॥४६ ॥
इस पुरीके अत्यन्त मनोहर एवं विचित्र घर और ४७ आँगन स्फटिक तथा नाना प्रकारकी उत्तम मणियोंसे बनाये गये हैं । इस पुरीके प्रत्येक घरमें सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियाँ विद्यमान हैं तथा अद्भुत स्वर्गीय ४८ वृक्ष लगे हुए हैं ॥ ४७-४८ ॥
तोरणोंकी शोभा घर - घरमें दिखायी दे रही है ।
४ ९ इस पुरके विमानोंमें तोते तथा हंस बोल रहे हैं ॥ ४ ९ ॥
विचित्र प्रकारके वितान चित्र - विचित्र कपड़ोंके बने हैं, जिनमें बन्दनवार बँधे हैं । वहाँ अनेक ५० जलाशय तथा विविध बावलियाँ हैं ॥ ५० ॥
वहाँ विचित्र उद्यान हैं, जिनका लोग प्रसन्नचित्त ५१ होकर सेवन करते हैं । यहाँके सभी पुरुष देवताके सदृश तथा स्त्रियाँ अप्सराओंके सदृश हैं ॥५१ ॥
हिमालयके पुरको छोड़कर स्वर्गकी कामनासे ५२ कर्मभूमिमें याज्ञिक एवं पौराणिक लोग व्यर्थ ही अनुष्ठान करते रहते हैं ॥५२ ॥
हे विप्रो! मनुष्योंको स्वर्गकी तभीतक कामना ५३ रहती है, जबतक उन्होंने इस पुरीको नहीं देखा, जब इसे देख लिया, तो स्वर्गसे क्या प्रयोजन? ॥ ५३ ॥
ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] इस प्रकार उस पुरीका वर्णन करते हुए वे सभी ऋषि सब प्रकारकी ५४ समृद्धिसे युक्त हिमालयके घर पहुँचे ॥५४ ॥
आकाशमार्गसे आते हुए सूर्यके समान अत्यन्त तेजस्वी उन सात ऋषियोंको दूरसे ही देखकर ५५ । हिमवान् विस्मित हो [ मनमें ] कहने लगे ॥५५ ॥
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६३२ हिमवानुवाच सप्तैते सूर्यसंकाशाः समायान्ति मदन्तिके पूजा कार्या प्रयत्नेन मुनीनां च मयाधुना वयं धन्या गृहस्थाश्च सर्वेषां सुखदायिनः येषां गृहे समायान्ति महात्मानो यदीदृशाः ब्रह्मोवाच एतस्मिन्नन्तरे चैवाकाशादेत्य भुवि स्थितान् सम्मुखे हिमवान्दृष्ट्वा ययौ मानपुरस्सरम् कृतांजलिर्नतस्कन्धः सप्तर्षीन्सुप्रणम्य सः पूजां चकार तेषां वै बहुमानपुरस्सरम् ॥
हिताः सप्तर्षयस्ते च हिमवन्तं नगेश्वरम् ।
गृहीत्वोचुः प्रसन्नास्या वचनं मङ्गलालयम् ॥
यथाग्रतश्च तान्कृत्वा धन्यो मम गृहाश्रमः ।
इत्युक्त्वासनमानीय ददौ भक्तिपुरस्सरम् ॥
आसनेषूपविष्टेषु तदाज्ञप्तः स्वयं स्थितः ।
उवाच हिमवांस्तत्र मुनीन् ज्योतिर्मयांस्तदा ॥
हिमालय उवाच धन्यो हि कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं मम । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ हिमवान् बोले- ये सूर्यके समान तेजस्वी । । सप्तर्षिगण मेरे पास आ रहे हैं, मुझे इस समय ॥ ५६ प्रयत्नपूर्वक इन मुनियोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५६ ॥
हम गृहस्थलोग धन्य हैं, जिनके घर सभीको । सुख प्रदान करनेवाले इस प्रकारके महात्मा [ स्वयं ] ॥ ५७ आते हैं ॥५७ ॥
ब्रह्माजी बोले- इसी बीच आकाशसे उतरकर । पृथिवीपर स्थित हुए उन सबको अपने सम्मुख देखकर ॥ ५८ हिमालय सम्मानपूर्वक उनके पास गये ॥५८ ॥
। उन्होंने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर उन ५ ९ सप्तर्षियोंको प्रणाम करके पुनः बड़े सम्मानके साथ उनकी पूजा की ॥५ ९ ॥। उस पूजाको स्वीकार करके हित करनेवाले ६० प्रसन्नमुख सप्तर्षियोंने गिरिराज हिमालयसे कुशल-मंगल पूछा ॥६० ॥
मेरा गृहस्थाश्रम धन्य हो गया – हिमालयने ऐसा ६१ कहकर उन्हें आगे करके आसन लाकर भक्तिपूर्वक समर्पित किया । आसनोंपर उनके बैठ जानेपर पुन: उनसे आज्ञा लेकर वे हिमालय स्वयं भी बैठ गये और इसके ६२ बाद तेजस्वी ऋषियोंसे कहने लगे - ॥ ६१-६२ ॥ हिमालय बोले- मैं धन्य तथा कृतकृत्य हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया, मैं लोकोंमें दर्शनीय लोकेषु दर्शनीयोऽहं बहुतीर्थसमो मतः ॥ ६३ तथा अनेक तीर्थोंके समान हो गया हूँ; क्योंकि यस्माद्भवन्तो मद्गेहमागता विष्णुरूपिणः । विष्णुस्वरूप आपलोग मेरे घर पधारे हैं । कृपणोंके पूर्णानां भवतां कार्यं कृपणानां गृहेषु किम् ॥ ६४ घरोंमें [ हर प्रकारसे ] परिपूर्ण आपलोगोंको कौन - सा कार्य हो सकता है? तो भी मुझ सेवकके योग्य जो तथापि किञ्चित्कार्यं च सदृशं सेवकस्य मे । | कुछ कार्य हो उसे दयापूर्वक कहिये जिससे मेरा कथनीयं सुदयया सफलं स्याज्जनुर्मम ॥ ६५ । जन्म सफल हो, जाय ॥ ६३–६५, ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे सप्तर्ष्यागमनवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥ ॥। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें सप्तर्षियोंका
आगमनवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥
अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः वसिष्ठपत्नी अरुन्धतीद्वारा मेनाको समझाना तथा सप्तर्षियोंद्वारा हिमालयको बताना । शिवमाहात्म्य जगत्पिता ऋषय ऊचुः ऋषि बोले- [ हे हिमालय! ] शिवजी जगत्के । तस्माद्देया शिवः त्वया प्रोक्तो जगन्माता शिवा मता । पिता कहे गये हैं और पार्वती जगत्की माता मानी कन्या शंकराय महात्मने । १ गयी है । इसलिये आप अपनी कन्या महात्मा शंकरका
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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६३३
एवं कृत्वा हिमगिरे सार्थकं ते भवेज्जनुः ।
जगद्गुरोर्गुरुस्त्वं हि भविष्यसि न संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
एवं वचनमाकर्ण्य सप्तर्षीणां मुनीश्वर ।
प्रणम्य तान्करौ बद्ध्वा गिरिराजोऽब्रवीदिदम् ॥
हिमालय उवाच
सप्तर्षयो महाभागा भवद्भिर्यदुदीरितम् ।
तत्प्रमाणीकृतं मे हि पुरैव गिरिशेच्छया ॥
इदानीमेक आगत्य विप्रो वैष्णवधर्मवान् ।
शिवमुद्दिश्य सुप्रीत्या विपरीतं वचोऽब्रवीत् ॥
तदारभ्य शिवामाता ज्ञानभ्रष्टा बभूव ह ।
सुताविवाहं रुद्रेण योगिना तेन नेच्छति ॥
कोपागारमगात्सा हि सुतप्ता मलिनाम्बरा ।
कृत्वा महाहठं विप्रा बोध्यमानापि नाबुधत् ॥
अहं च ज्ञानविभ्रष्टो जातोऽहं सत्यमीर्यते ।
दातुं सुतां महेशाय नेच्छामि भिक्षुरूपिणे ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा शैलराजस्तु शिवमायाविमोहितः ।
तूष्णीं बभूव तत्रस्थो मुनीनां मध्यतो मुने ॥
सर्वे सप्तर्षयस्ते हि शिवमायां प्रशस्य वै ।
प्रेषयामासुरथ तां मेनकां प्रत्यरुन्धतीम् ॥
अथ पत्युः समादाय निदेशं ज्ञानदा हि सा ।
जगामारुन्धती तूर्णं यत्र मेना च पार्वती ॥
गत्वा ददर्श मेनां तां शयानां शोकमूर्च्छिताम् ।
उवाच मधुरं साध्वी सावधाना हितं वचः ॥
अरुन्धत्युवाच
उत्तिष्ठ मेनके साध्वि त्वद्गृहेऽहमरुन्धती ।
आगता मुनयश्चापि सप्तायाताः कृपालवः ॥
ब्रह्मोवाच
अरुन्धतीस्वरं श्रुत्वा शीघ्रमुत्थाय मेनका ।
उवाच शिरसा नत्वा तां पद्मामिव तेजसा ॥
मेनोवाच
अहोऽद्य किमिदं पुण्यमस्माकं पुण्यजन्मनाम् ।
वधूर्जगद्विधेः पत्नी वसिष्ठस्यागतेह वै ॥
प्रदान कर दीजिये । हे हिमालय! ऐसा करनेसे आपका २ जन्म सफल हो जायगा और आप जगद्गुरुके भी गुरु हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है॥१-२ ॥ ब्रह्माजी बोले – हे मुनीश्वर! ऋषियोंके इस प्रकारके वचनको सुनकर उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर ३ गिरिराज यह कहने लगे —॥३ ॥
हिमालय बोले — हे महाभाग्यवान् सप्तर्षिगण! आपलोगोंने जैसा कहा है, उसे मैंने शिवजीकी ४ इच्छासे पहले ही स्वीकार कर लिया था । [ किंतु हे प्रभो! ] इसी समय एक वैष्णवधर्मी ब्राह्मणने यहाँ आकर शिवजीको लक्ष्य करके प्रेमपूर्वक उनके ५ विपरीत वचन कहा है॥४-५ ॥ तभी से शिवाकी माता ज्ञानसे भ्रष्ट हो गयी हैं ६ और अपनी पुत्रीका विवाह उन योगी रुद्रसे नहीं करना चाहती हैं । हे विप्रो! वे अत्यन्त दुखी होकर मैले वस्त्र धारणकर बड़ा हठ करके कोपभवनमें चली गयी हैं और ७ समझानेपर भी नहीं समझ रही हैं । मैं सत्य कह रहा हूँ कि मैं भी ज्ञानभ्रष्ट हो गया हूँ और अब मैं भिक्षुकरूपधारी ८ महेश्वरको कन्या नहीं देना चाहता हूँ ॥ ६–८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! शिवकी मायासे मोहित शैलराज इस प्रकार कहकर चुप हो गये और ९ मुनियोंके बीच बैठ गये॥९॥
उसके बाद उन सभी सप्तर्षियोंने शिवमायाकी १० प्रशंसा करके उन मेनाके पास अरुन्धतीको भेजा ॥१० ॥
पतिकी आज्ञा पाकर ज्ञानदात्री अरुन्धती शीघ्र ११ ही वहाँ गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं ॥ ११ ॥
वहाँ जाकर अरुन्धतीने शोकसे मूर्च्छित होकर १२ [ पृथिवीपर ] सोयी हुई मेनाको देखा । तब उन पतिव्रताने सावधानीपूर्वक हितकर वचन कहा— ॥ १२ ॥
अरुन्धती बोली- हे साध्वि मेनके! उठिये, मैं अरुन्धती आपके घर आयी हूँ तथा कृपालु सप्तर्षिगण १३ भी आये हुए हैं ॥ १३ ॥
ब्रह्माजी बोले- अरुन्धतीका स्वर सुनकर शीघ्रतासे उठकर महालक्ष्मीके समान तेजयुक्त अरुन्धतीको सिर १४ झुकाकर प्रणाम करके मेनका कहने लगीं - ॥१४ ॥
मेना बोलीं – अहो! आज हम पुण्यवानोंका यह कितना बड़ा पुण्य है, जो जगत्के विधाताकी पुत्रवधू १५ एवं वसिष्ठकी पत्नी मेरे घर स्वयं आयी हैं ॥ १५ ॥
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६३४ किमर्थमागता देवि तन्मे ब्रूहि विशेषतः अहं दासीसमा ते हि ससुता करुणां कुरु ब्रह्मोवाच इत्युक्ता मेनका साध्वी बोधयित्वा च तां बहु तत्रागता च सुप्रीत्या यत्र सप्तर्षयोऽपि ते अथ शैलेश्वरं ते च बोधयामासुरादरात् स्मृत्वा शिवपदद्वन्द्वं सर्वे वाक्यविशारदाः ऋषय ऊचुः शैलेन्द्र श्रूयतां वाक्यमस्माकं शुभकारणम् शिवाय पार्वतीं देहि संहर्तुः श्वशुरो भव अयाचितारं सर्वेशं प्रार्थयामास यत्नतः तारकस्य विनाशाय ब्रह्मा सम्बन्धकर्मणि नोत्सुको दारसंयोगे शंकरो योगिनां वरः विधेः प्रार्थनया देवस्तव कन्यां ग्रहीष्यति दुहितुस्ते तपस्तप्तं प्रतिज्ञानं चकार सः हेतुद्वयेन योगीन्द्रो विवाहं च करिष्यति ब्रह्मोवाच ऋषीणां वचनं श्रुत्वा प्रहस्य स हिमालयः उवाच किञ्चिद्भीतस्तु परं विनयपूर्वकम् हिमालय उवाच शिवस्य राजसामग्रीं न हि पश्यामि काञ्चन कञ्चिदाश्रयमैश्वर्यं कं वा स्वजनबान्धवम् ॥
नेच्छाम्यतिविनिर्लिप्तयोगिने स्वां सुतामहम् ।
यूयं वेदविधातुश्च पुत्रा वदत निश्चितम् ॥
वरायाननुरूपाय पिता कन्यां ददाति चेत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ । हे देवि! आप किसलिये आयी हैं, उसे मुझसे ॥ १६ विशेष रूपसे कहिये । पुत्री पार्वतीसहित मैं आपकी दासीके समान हूँ, आप कृपा कीजिये ॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले- जब मेनाने इस प्रकार | तब साध्वी अरुन्धती उन्हें बहुत समझाकर प्रेमपूर्वक कहा, ॥ ॥ १७ । वहाँ गयीं, जहाँ सप्तर्षिगण विराजमान थे । इधर वाक्यविशारद सभी महर्षिगण भी शिवके चरणयुगलका, । स्मरण करके आदरके साथ गिरिराजको समझाने ॥ १८ लगे ॥ १७-१८ ॥ ऋषि बोले- हे शैलराज! आप हमलोगोंका । शुभकारक वचन सुनें, आप पार्वतीका विवाह शिवके ॥ १ ९ साथ कर दीजिये और संहारकर्ता शिवजीके श्वशुर बन जाइये । तारकासुरके वधके निमित्त ब्रह्माजीने इस । विवाहको करनेके लिये उन अयाचक सर्वेश्वरसे प्रयत्न-॥ २० पूर्वक प्रार्थना की है । यद्यपि योगियोंमें श्रेष्ठ होनेके । कारण सदाशिव इस दारसंग्रह - कार्यके लिये उत्सुक ॥ २१ नहीं हैं, किंतु ब्रह्माजीके द्वारा बहुत प्रार्थना करनेपर वे आपकी इस कन्याको ग्रहण करेंगे ॥ १ ९ –२१ ॥ । आपकी कन्याने भी [ शिवजीको वररूपमें प्राप्त ॥ २२ करनेहेतु ] बड़ा तप किया है, इसीलिये उन्होंने उसे वर दिया है, इन्हीं दो कारणोंसे वे योगीन्द्र विवाह करेंगे ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले - – ऋषियोंकी यह बात सुनकर । हिमालय हँस करके फिर कुछ भयभीत होकर ॥ २३ विनयपूर्वक इस प्रकार कहने लगे —॥२३ ॥
हिमालय बोले- मैं शिवके पास कोई राजोि । सामग्री नहीं देख रहा हूँ, न उनका कोई आश्रय और २४ | ऐश्वर्य ही दिखायी पड़ रहा है और न तो कोई उनका सगा-| सम्बन्धी ही दिखायी पड़ता है । मैं अत्यन्त निर्लिप्त योगीको । । अपनी पुत्री नहीं देना चाहता हूँ । आपलोग तो ब्रह्मदेवके, २५ पुत्र हैं, आपलोग ही निश्चित बात बतायें ॥ २४-२५ ॥ । यदि पिता काम, मोह, भय तथा लोभवश अपनी । कामान्मोहाद्भयाल्लोभात्स नष्टो नरकं व्रजेत् ॥ २६ कन्या प्रतिकूल वरको प्रदान करता है, तो वह नष्ट । होकर नरकमें जाता है ॥ २६ ॥ ।
न हि दास्याम्यहं कन्यामिच्छया शूलपाणये । मैं स्वेच्छासे इस कन्याको शंकरको नहीं उसे यद्विधानं भवेद्योग्यमृषयस्तद् | दूँगा, हे ऋषियो! अब जो उचित विधान हो, विधीयताम् ॥ २७ आपलोग करें ॥ २७ ॥
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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६३५ ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य हिमागस्य मुनीश्वर ।
वसिष्ठस्तं तेषां वाक्यविशारदः ॥
प्रत्युवाच वसिष्ठ उवाच
शृणु शैलेश मद्वाक्यं सर्वथा ते हितावहम् ।
धर्माविरुद्धं सत्यं च परत्रेह मुदावहम् ॥
वचनं त्रिविधं शैल लौकिके वैदिकेऽपि च ।
सर्वं जानाति शास्त्रज्ञो निर्मलज्ञानचक्षुषा ॥
असत्यमहितं पश्चात्सांप्रतं श्रुतिसुन्दरम् । सुबुद्धिर्वक्ति शत्रुर्हि हितं नैव कदाचन आदावप्रीतिजनकं परिणामे सुखावहम् । दयालुर्धर्मशीलो हि बोधयत्येव बांधवः श्रुतिमात्रात्सुधातुल्यं सर्वकालसुखावहम् सत्यसारं हितकरं वचनं श्रेष्ठमीप्सितम् ॥ एवं च त्रिविधं शैल नीतिशास्त्रोदितं वचः कथ्यतां त्रिषु मध्ये किं ब्रुवे वाक्यं त्वदीप्सितम् ब्राह्मसम्पद्विहीनश्च शंकरस्त्रिदशेश्वरः तत्त्वज्ञानसमुद्रेषु सन्निमग्नैकमानसः ज्ञानानन्दस्येश्वरस्य ब्राह्मवस्तुषु का स्पृहा गृही ददाति स्वसुतां राज्यसम्पत्तिशालिने कन्यकां दुःखिने दत्त्वा कन्याघाती भवेत्पिता को वेद शंकरो दुःखी कुबेरो यस्य किंकरः भ्रूभङ्गलीलया सृष्टिं स्रष्टुं हर्तुं क्षमो हि सः निर्गुणः परमात्मा च परेशः प्रकृतेः परः यस्य च त्रिविधा मूर्तिर्विधातुः सृष्टिकर्मणि सृष्टिस्थित्यन्तजननी ब्रह्मविष्णुहराभिधा ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! हिमालयके इस प्रकारके वचनको सुनकर उन ऋषियोंमें वाक्यविशारद २८ वसिष्ठजी उनसे कहने लगे— ॥ २८ ॥
वसिष्ठजी बोले- हे शैलेन्द्र! आप मेरी बात सुनिये, जो आपके लिये सर्वथा हितकर, धर्मके २ ९ अनुकूल, सत्य और इस लोक तथा परलोकमें आनन्द प्रदान करनेवाली है । हे शैल! लोक एवं वेदमें तीन प्रकारके वचन होते हैं, शास्त्रका ज्ञाता अपने निर्मल ३० ज्ञानरूपी नेत्रसे उन सबको जानता है ॥ २ ९ -३० ॥ जो वचन सुननेमें सुन्दर लगे, पर असत्य एवं
॥ ३१ अहितकारी हो, ऐसा वचन बुद्धिमान् शत्रु बोलते हैं ।
ऐसा वचन किसी प्रकार हितकारी नहीं होता ॥ ३१ ॥
जो वचन आरम्भमें अप्रिय लगनेवाला हो, किंतु ॥ ३२ परिणाममें सुखकारी हो, ऐसा वचन दयालु तथा धर्मशील बन्धु ही कहता है । सुननेमें अमृतके समान, । सभी कालमें सुखदायक, सत्यका सारस्वरूप तथा ३३ हितकारक वचन श्रेष्ठ होता है॥३२-३३ ॥ । हे शैल! इस प्रकार तीन तरहके वचन नीतिशास्त्रमें ॥ ३४ कहे गये हैं । अब आप ही बताइये कि इन तीन प्रकारके वचनोंमें हमलोग किस प्रकारका वचन बोलें, जो आपके । अनुकूल हो । देवताओंके स्वामी शंकरजी ब्रह्मज्ञानसे ॥ ३५ सम्पन्न हैं । रजोगुणी सम्पत्तिसे विहीन हैं, उनका मन तत्त्वज्ञानके समुद्रमें सदा निमग्न रहता है ॥ ३४-३५ ॥ ऐसे ज्ञान तथा आनन्दके ईश्वर सदाशिवको ॥ । ३६ रजोगुणी वस्तुओंकी इच्छा किस प्रकार हो सकती है, गृहस्थ अपनी कन्या राजसम्पत्तिशालीको देता है ॥ ३६ ॥
। पिता यदि अपनी कन्या किसी दीन - दुखीको देता ॥ ३७ है, तो वह कन्याघाती होता है अर्थात् उसे कन्याके वधका पाप लगता है । हे हिमालय! कौन कहता है कि शंकर दुखी हैं, कुबेर जिनके दास हैं ॥ ३७ ॥
। वे शिवजी तो अपनी भंगिमाकी लीलामात्रसे ॥ ३८ संसारका सृजन और संहार करनेमें समर्थ हैं । वे निर्गुण, परमात्मा, परमेश्वर और प्रकृतिसे [ सर्वथा ] परे हैं ॥ ३८ ॥
सृष्टिकार्य करनेके लिये जिनकी तीन मूर्तियाँ 1 । ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वररूपसे जगत्की उत्पत्ति, ॥ ३ ९ पालन तथा संहार करती हैं ॥ ३ ९ ॥
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६३६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३
ब्रह्मा च ब्रह्मलोकस्थो विष्णुः क्षीरोदवासकृत् ।
हरः कैलासनिलयः सर्वाः शिवविभूतयः ॥ ४०
धत्ते च त्रिविधा मूर्ती: प्रकृतिः शिवसम्भवा ।
अंशेन लीलया सृष्टौ कलया बहुधा अपि ॥ ४१
मुखोद्भवा स्वयं वाणी वागधिष्ठातृदेवता ।
वक्षःस्थलोद्भवा लक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥ ४२
शिवा तेजस्सु देवानामाविर्भावं चकार सा ।
निहत्य दानवान्सर्वान्देवेभ्यश्च श्रियं ददौ ॥ ४३
प्राप कल्पान्तरे जन्म जठरे दक्षयोषितः ।
नाम्ना सती हरं प्राप दक्षस्तस्मै ददौ च ताम् ॥ ४४
देहं तत्याज योगेन श्रुत्वा सा भर्तृनिन्दनम् ।
साद्य त्वत्तस्तु मेनायां जज्ञे जठरतश्शिवा ॥ ४५
शिवा शिवस्य पत्नीयं शैल जन्मनि जन्मनि ।
कल्पे कल्पे बुद्धिरूपा ज्ञानिनां जननी परा ॥ ४६
जायते स्म सदा सिद्धा सिद्धिदा सिद्धिरूपिणी ।
सत्या अस्थि चिताभस्म भक्त्या धत्ते हरः स्वयम् ॥ ४७
अतस्त्वं स्वेच्छया कन्यां देहि भद्रां हराय च ।
अथवा सा स्वयं कान्तस्थाने यास्यत्यदास्यसि ॥ ४८
कृत्वा प्रतिज्ञां देवेशो दृष्ट्वा क्लेशमसंख्यकम् ।
दुहितुस्ते तपःस्थानमाजगाम द्विजात्मकः ॥ ४ ९
तामाश्वास्य वरं दत्त्वा जगाम निजमन्दिरम् ।
तत्प्रार्थनावशाच्छम्भुर्ययाचे त्वां शिवां गिरे ॥५० ।
ब्रह्मा ब्रह्मलोकमें रहते हैं, विष्णु क्षीरसागर में वास करते हैं और हर कैलासमें निवास करते हैं, ये सभी शिवजीकी विभूतियाँ हैं ॥ ४० ॥
यह सारी प्रकृति शिवजीसे ही उत्पन्नहुई है, जो तीन प्रकारकी होकर इस जगत्को धारण करती है । वह प्रकृति इस जगत्में अपनी लीलासे अंशावतारों तथा कलावतारोंके रूपोंमें अनेक प्रकारकी प्रतीत होती है ॥ ४१ ॥
उनकी वाणीरूप प्रकृति मुखसे उत्पन्न हुई हैं, । जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं । उनकी लक्ष्मीरूप प्रकृति वक्षःस्थलसे आविर्भूत हुई हैं, जो सम्पूर्ण सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री हैं ॥ ४२ ॥
उनकी शिवा नामकी प्रकृति देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत हुई हैं, जो सभी दानवोंका वधकर देवताओंके लिये महालक्ष्मी प्रदान करती हैं ॥४३ ॥
ये ही शिवा इसके पूर्वकल्पमें दक्षकी पत्नीके उदरसे जन्म लेकर सती नामसे विख्यात हुईं । दक्षने शंकरजीको ही दिया था, किंतु उस जन्ममें पिताके द्वारा शिवजीकी निन्दा सुनकर उन्होंने अपने शरीरको योगके द्वारा त्याग दिया । वही शिवा अब इस समय आपके द्वारा मेनाके गर्भ से उत्पन्न हुई हैं । ४४-४५ ॥ हे शैलराज! इस प्रकार वे शिवा प्रत्येक जन्ममें शिवजीकी पत्नी रही हैं, वे प्रतिकल्पमें बुद्धिस्वरूपा तथा ज्ञानियोंकी माता हैं ॥ ४६ ॥
वही सिद्धा, सिद्धिदात्री एवं सिद्धिरूपिणी-रूपसे सदा प्रादुर्भूत होती हैं । शिवजी सतीकी अस्थि | तथा उनकी चिताकी भस्म उनके प्रेमके कारण स्वयं धारण करते हैं ॥ ४७ ॥
• इसलिये आप अपनी इच्छासे इस कल्याणी कन्याको शंकरके निमित्त प्रदान कीजिये, अन्यथा आप नहीं देंगे तो भी वह स्वयं अपने पतिके पास चली जायगी ॥ ४८ ॥
वे देवेश प्रतिज्ञा करके और यह देखकर कि. आपकी कन्याने असंख्य क्लेश प्राप्त किये, तब | ब्राह्मणका रूप धारणकर उसके तपःस्थानपर गये थे | और उसे आश्वस्त करके वर देकर अपने स्थानपर वे । लौट आये । हे पर्वत! उसके प्रार्थना करनेपर ही शिवजी आपसे शिवाको माँग रहे हैं ॥ ४ ९ -५० ॥
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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६३७
अङ्गीकृतं युवाभ्यां तच्छिवभक्तिरतात्मना ।
विपरीतमतिजता वद कस्माद्गिरीश्वर ॥
तद्गत्वा प्रभुणा देवप्रार्थितेन त्वदन्तिकम् ।
प्रस्थापिता वयं शीघ्रं ऋषयः साप्यरुन्धती ॥
शिक्षयामो वयं त्वां हि देहि रुद्राय पार्वतीम् ।
एवंकृते महानन्दो भविष्यति गिरे तव ॥
शिवां शिवाय शैलेन्द्र स्वेच्छया चेन्न दास्यसि ।
भविता तद्विवाहोऽत्र भवितव्यबलेन हि ॥
वरं ददौ शिवायै स तपन्त्यै तात शंकरः ।
न हीश्वरप्रतिज्ञातं विपरीताय कल्पते ॥
अहो प्रतिज्ञा दुर्लङ्घ्या साधूनामीशवर्तिनाम् ।
सर्वेषां जगतां मध्ये किमीशस्य पुनगिरे ॥
एको महेन्द्रः शैलानां पक्षांश्चिच्छेद लीलया ।
पार्वती लीलया मेरोः शृङ्गभङ्गं चकार च ॥
एकार्थे नहि शैलेश नश्याः सर्वा हि सम्पदः ।
एकं त्यजेत्कुलस्यार्थे श्रुतिरेषा सनातनी ॥
दत्त्वा विप्राय स्वसुतामनरण्यो नृपेश्वरः ।
ब्राह्मणाद्भयमापन्नो ररक्ष निजसम्पदम् ॥
तमाशु बोधयामासुर्नीतिशास्त्रविदो जनाः ।
ब्रह्मशापाद्विभीतञ्च गुरवो ज्ञातिसत्तमाः ॥
शैलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च ।
रक्ष सर्वान् बंधुवर्गान् वशं कुरु सुरानपि ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वसिष्ठस्य वचनं स प्रहस्य च ।
पप्रच्छ नृपवार्ताञ्च हृदयेन विदूयता ॥
उस समय आप दोनोंने शिवभक्तिमें निरत रहनेके ५१ कारण उन्हें पार्वतीको देना स्वीकार भी कर लिया, किंतु हे गिरीश्वर! अब आप दोनोंकी ऐसी विपरीत बुद्धि क्यों हो गयी, इसे बताइये । जब सदाशिव पार्वतीकी ५२ प्रार्थनाहेतु तुम्हारे पास आये थे और तुमने उसे अस्वीकार कर दिया, तब यहाँसे लौटकर उन्होंने हम ऋषियोंको तथा अरुन्धतीको शीघ्र ही भेजा है ॥ ५१-५२ ॥ इसलिये हमलोग आपको उपदेश देते हैं कि आप ५३ इस पार्वतीको शीघ्रतासे रुद्रको प्रदान कीजिये । हे शैल! ऐसा करनेसे आपको महान् आनन्दकी प्राप्ति होगी ॥ ५३ ॥
हे शैलेन्द्र! यदि आप इस शिवाको शिवके लिये ५४ अपनी इच्छासे नहीं देंगे, तो भी भवितव्यताके बलसे यह विवाह अवश्य ही होगा ॥५४ ॥
हे तात! इन शंकरने तप करती हुई इस ५५ शिवाको वरदान दिया है, ईश्वरकी प्रतिज्ञा कभी निष्फल नहीं होती ॥ ५५ ॥
जब ईश्वरके उपासक महात्माओंकी प्रतिज्ञा ५६ कभी विफल नहीं होती, तो फिर सारे संसारके अधिपति इन ईश्वरकी प्रतिज्ञाकी बात ही क्या!॥ ५६ ॥
जब अकेले महेन्द्रने लीलासे ही पर्वतोंके पंख ५७ काट डाले और पार्वतीने अकेले ही मेरुका शिखर ढहा दिया, तो उन सर्वेश्वरकी प्रतिज्ञा कैसे निष्फल हो सकती है? ॥५७ ॥
हे शैलेन्द्र! एकके कारण सारी सम्पत्तिका नाश ५८ नहीं करना चाहिये, यह सनातनी श्रुति है कि कुलकी रक्षा के लिये एकका त्याग कर देना चाहिये ॥ ५८ ॥
[ हे शैलेश्वर! ] [ पूर्व कालमें ] अनरण्य नामक ५ ९ राजेश्वरने अपनी कन्या ब्राह्मणको देकर उसके शापके भयसे अपनी सम्पत्तिकी रक्षा की थी ॥ ५ ९ ॥ ब्राह्मणके शापसे भयभीत हुए उस राजाको नीतिशास्त्रके ज्ञाता गुरुजनोंने एवं श्रेष्ठ बन्धुओंने समझाया ६० था । हे शैलराज! इसी प्रकार आप भी अपनी इस कन्याको शिवके निमित्त देकर समस्त बन्धुवर्गोंकी रक्षा कीजिये ६१ तथा देवताओंको अपने वशमें कीजिये ॥ ६०-६१ ॥ ब्रह्माजी बोले- वसिष्ठके इस वचनको सुनकर कुछ हँस करके व्यथित हृदयसे उन्होंने राजा अनरण्यका ६२ वृत्तान्त पूछा ॥ ६२ ॥
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६३८ हिमालय उवाच कस्य वंशोद्भवो ब्रह्मन् अनरण्यो नृपश्च सः सुतां दत्त्वा स च कथं ररक्षाखिलसम्पदः ब्रह्मोवाच इति श्रुत्वा वसिष्ठस्तु शैलवाक्यं प्रसन्नधीः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४ हिमालय बोले – हे ब्रह्मन्! वह अनरण्य । । राजा किसके वंशमें उत्पन्न हुआ था और उसने ॥ ६३ अपनी कन्याको देकर किस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्तिकी रक्षा की थी? ॥ ६३ ॥
ब्रह्माजी बोले- हिमालयके इस प्रकारके वचनको । । सुनकर वसिष्ठजी प्रसन्नचित्त होकर राजा अनरण्यका प्रोवाच गिरये तस्मै नृपवार्त्ता सुखावहाम् ॥ ६४ | सुखदायक वृत्तान्त उनसे कहने लगे —॥६४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे गिरिसांत्वनो नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें गिरिसान्त्वन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः सप्तर्षियोंद्वारा हिमालयको पार्वतीका विवाह वसिष्ठ उवाच
मनोर्वंशोद्भवो राजा सोऽनरण्यो नृपेश्वरः ।
इन्द्रसावर्णिसंज्ञस्य चतुर्दशमितस्य हि ॥
अनरण्यो नृपश्रेष्ठः सप्तद्वीपमहीपतिः ।
शम्भुभक्तो विशेषेण मङ्गलारण्यजो बली ॥
भृगुं पुरोधसं कृत्वा शतं यज्ञांश्चकार सः ।
न स्वीचकार शक्रत्वं दीयमानं सुरैरपि ॥
बभूवुः शतपुत्राश्च राज्ञस्तस्य हिमालय ।
कन्यैका सुन्दरी नाम्ना पद्मा पद्मालया समा ॥
यः स्नेहः पुत्रशतके कन्यायाञ्च ततोऽधिकः ।
नृपस्य तस्य तस्यां हि बभूव नगसत्तम ॥
प्राणाधिका प्रियतमा महिष्यः सर्वयोषितः ।
नृपस्य पल्यः पञ्चासन् सर्वाः सौभाग्यसंयुताः ॥
सा कन्या यौवनस्था च बभूव स्वपितुर्गृहे ।
पत्रं प्रस्थापयामास सुवरानयनाय सः ॥
राजा अनरण्यका आख्यान सुनाकर शिवसे करनेकी प्रेरणा देना वसिष्ठजी बोले – [ हे गिरिश्रेष्ठ! ] इन्द्रसावर्णि नामक चौदहवें मनुके वंशमें वह अनरण्य नामक राजा १ उत्पन्न हुआ था ॥१ ॥
वह राजराजेश्वर तथा सातों द्वीपोंका सम्राट् २ था । वह मंगलारण्यका पुत्र अनरण्य महाबलवान् एवं विशेषरूपसे शिवजीका भक्त था । उसने महर्षि भृगुको अपना पुरोहित बनाकर एक सौ यज्ञ किये और ३ देवताओंके द्वारा इन्द्रपद दिये जानेपर भी उसने उसे स्वीकार नहीं किया ॥ २-३ ॥ हे हिमालय! उस राजाके सौ पुत्र उत्पन्न हुए ४ थे और लक्ष्मीसदृश सुन्दर एक पद्मा नामकी कन्या उत्पन्न हुई ॥४ ॥
हे नगश्रेष्ठ! उस राजाका जो प्रेम अपने सौ ५ पुत्रोंके प्रति था, उससे भी अधिक उस कन्यापर रहा करता था ॥५ ॥
उस अनरण्य राजाकी सर्वसौभाग्यशालिनी ६ पाँच रानियाँ थीं, जो राजाको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थीं ॥ ६ ॥
जिस समय वह कन्या पिताके घरमें युवावस्थाको प्राप्त हुई, तब राजाने उसके लिये उत्तम वर प्राप्त ७ । करनेहेतु [ अपने दूतोंसे ] पत्र भेजा ॥७ ॥