शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 491–500

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 491–500

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पचमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५ निर्देश -- जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १६ वर्ष हिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक बिना वेतन ET कार्य करे, और जो इससे भिन्न हो वे अपनी आर्थिक स्थिति के तक स्वामी का ने समय तक विना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें । अनुसार जितना निर्धनैरन्नवत्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥

यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तदुःखैर्दुःखितो न चेत् ।

विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥

ा और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न - वस्त्र मात्र ग्रहण करें । इससे होने पर न ग्रहण करें । जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति अन्यथा उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे सुख का की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं । कृतघ्न भृत्य

सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।

भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥

स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् । प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन - जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रचार्थं समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे । वहीं भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर मृत्य के रक्षार्थं अपना जीवन भी स्याग कर

देता है ।

न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥

सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता । योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण - इस पृथिभी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों

ने भी भलीभांति से मृत्यता स्वीकार कर ली थी ।

अपि राष्ट्रविनाशायं चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥

शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपसृत्ययोः । एकचित्तता के भाव का वर्णन -जब - चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र - विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है,

अपितु अवश्य हो सकता है ।

न कूटनीतिरभवच्छोकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥

अर्जुनाद् प्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 492

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४०६ शुक्रनीति: श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन - श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी ( ब्याह दी ) नीतिमतान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥

नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति ( उपाय ) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो ।

आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।

कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥

हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश - मध्यस्थ ( उदासीन ) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह - प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे ।

परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।

इष्टानधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥

परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे । और अभीष्ट अन्न - वस्त्र का लोभ दिलावे । यह कार्य सिद्धि करने वाला होता है ।

दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्यवर्धनम् ।

इमे उपाया मध्यस्थ - कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥

मध्यस्थ ( उदासीन ), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य ( शपथ ) का अवलम्बन, झूठमूठ ( मनगढन्त ) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं । इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं ।

नात्मसङ्गोपने युक्ति चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।

जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥

अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश-जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है । और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती है ।

युक्तिश्छला त्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।

यच्छद्मचारी भवति तेन च्छद्म समाचरेत् ॥ ६५ ॥

अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते । कार्यसिद्धयर्थं दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश - कार्यसिद्धि के लिये युक्ति ( उपाय ) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है । जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये । अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है । अि देश कल और बुद्धि होता है अतः पर देश, काल करते ह कल्पना मन छ छलका औषध, नाना लेकर छ - प्रयो ल व लोक में दी गई ) तथा खरीदने वाले ) चाहिये, जो ब स ज चोरों की पावे, इसके अर्थात् लिखा यदि राजा के को दे । तीन प्रक ( वेश्या आ वैसे भृत्य भ होता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 493

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पचमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७ अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥

देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।

कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥

और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं । मन्त्रौषधिपृथग्वेष - कालवागर्थ संश्रयात् 1 छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥

छल का वर्णन - इस संसार में माया ( छल ) करने में निपुण लोग मन्त्र,. औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आक्षय. लेकर कुल प्रयोग करते हैं ।

लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।

वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६६ ॥

लोक में बेंची हुई ( वस्त्र - पात्र आदि ), दी हुई ( किसी को दान में दे दी गई ) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी ( वेंचने, देने तथा खरीदनेवाले ) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।

स्तेनकूट निवृत्त्यर्थं राजज्ञातं समाचरेत् ।

जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥

चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये 1 । और जद, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सर्वो को दे ।

स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।

त्रिविधो भृतस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥

तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश - जैसे स्त्री स्वीया ( अपनी ), सामान्या 5 ( वेश्या आदि ) और परकीया ( दूसरे की ) भेद से ३ प्रकार की होती है । वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का. होता है ।

क स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।

पुष्टभृतिदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥

सेवते CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 494

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४०८ शुक्रनीति: पुष्टोऽपि स्वामिनाऽव्यक्तं भजतेऽन्यं स चाधमः । उत्तमादि भृत्यों के लक्षण - जो स्वामी में अनुरक्त रहे, वह भृत्य ' उत्तम ' और जो पर्याप्त वेतन देनेवाले स्वामी की सेवा अधिक वेतन पाने के लोभ से करता है, वह ' मध्यम ' एवं जो स्वामी से भलीभांति पालित होने पर भी छिपे

रूप से दूसरे की भी सेवा करता है, वह ' अधम ' भृत्य कहलाता है ।

उपकरोत्यपकृतो ह्युत्तमोऽप्यन्यथाऽधमः ॥ ७३ ॥

मध्यमः साम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः । प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण - जो अपकार करने पर भी स्वामी का उपकार करता है वही ' उत्तम ' है इससे अन्यथा अर्थात् उपकार करने पर जो अपकार करता है, वह ' अघम ' कहलाता है । और मध्यम ' मृत्य ' तुल्य व्यवहार को पसन्द करता है अर्थात् उपकार करनेवाले के प्रति उपकार तथा अपकार करनेवाले के प्रति अपकार करना चाहता है, और इसके बाद का दूसरा जो अधम है वह केवल अपना स्वार्थ साधने में तत्पर

रहता है ।

नोपदेशं विना सम्यक् प्रमाणैज्ञार्यतेऽखिलम् ॥ ७४ ॥

बाल्यं वाऽप्यथ तारुण्यं प्रारम्भितसमाप्तिदम् । उपदेश के बिना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में ' प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश - उपदेश के बिना केवल प्रमाणों से सभी बातें भलीभांति नहीं जानी जा सकती हैं । और बाक्ष्य तथा युवा ये दो अवस्थायें प्रारम्भ किये हुये की समाप्ति देनेवाली अर्थात् इनमें जो

आरम्भ किया जाता है उसकी समाप्ति भी हो जाती है ।

प्रायो बुद्धिमतो ज्ञेयं न वार्धक्यं कदाचन ॥ ७५ ॥

आरम्भं तस्य कुर्याद्धि यत्समाप्तिं सुखं व्रजेत् । आरम्भ किये हुवे की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश - किन्तु वार्द्धक्य ( वृद्धावस्था ) को प्रायः बुद्धिमान उक्त भांति का कदापि नहीं मानते हैं । इसमें प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसी कार्य का आरम्भ करना चाहिये । जिसकी समाप्ति

विना क्लेश के हो जाय ।

नारम्भो बहुकार्याणामेकदैव सुखावहः ॥ ७६ ॥

नारम्भितसमाप्तिं तु विना चान्यं समाचरेत् । बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध - बहुत कार्यों का -एक साथ ही आरम्भ करना सुखावह नहीं होता है और आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति हुये किसी दूसरे कार्य को नहीं करना चाहिये । सम्प कृती समाप्त होन किये हुये कार्य कार्य तो संपन्न को चाहिये कि -हो जाय । यदि अन प्रयोजन की कलह के करने स होता है अन्यथ केवल हरनेवाला कार्य में प्रीति, क्रोध, भ पण्डितों द्वारा क यथ अ निर्दोष तथ निर्दोष हो, उसी जाने पर भी प दश अश दशग्रामाध का स्वामी और सवार होकर वि विचरण करें | सा दश १००० ह वे शस्त्र धारण अथवा केवल घ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 495

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पचमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४० ९ सम्पाद्यते न पूर्व हि नापरं लभ्यते यतः ॥ ७७ ॥

कृती तत् कुरुते नित्यं यत् समाप्तिं व्रजेत् सुखम् । समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश – क्योंकि आरम्भ किये हुये कार्य की चिना समाप्ति किये दूसरा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व का कार्य तो संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा भी नहीं हो पाता । अतः बुद्धिमान को चाहिये कि वह सदा उसी कार्य का प्रारम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त

हो जाय ।

यदि सिद्धयति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ७८ ॥

अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद् - यशोधर्महरः सदा 1 प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश - जिस कलह के करने से यदि अपना कोई प्रयोजन सिद्ध होता हो तो वह अच्छा होता है अन्यथा वह ( कलह ) आयु, धन, मित्र, यश और धर्म का सदा

केवल हरनेवाला होता है ।

ईर्ष्या लोभो मदः प्रीतिः क्रोधो भीतिश्च साहसम् ॥ ७६ ॥

प्रवृतिच्छिद्र हेतूनि कार्ये सप्त बुधा जगुः । कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र ( दोष ) के कारणों का निर्देश - ईर्ष्या, लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भय तथा साहस ये ७ कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र ( दोष ) के हेतु

पण्डितों द्वारा कहे हुये हैं ।

यथाच्छिद्रं भवेत् कार्यं तथैव हि समाचरेत् ॥ ६० ॥

अविसंवादि विद्वद्भिः कालेऽतीतेऽपि चापदि । निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश - जिस प्रकार से कार्य निर्दोष हो, उसी प्रकार से करना चाहिये । आपत्ति न रहने पर समय बीत

जाने पर भी पण्डितों को जो अभिमत हो उसी कार्य को करना चाहिये ।

दशग्रामी शनानीकः कपरिचारकसंयुतौ ॥ ८१ ॥

अश्वस्थौ विचरेयातां ग्रामपो ह्यपि चाश्वगः । दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश- - दश ग्रामों का स्वामी और १०० सैनिकों का नायक अपने २ भृत्यों के साथ घोड़े पर सवार होकर विचरण करें । और एक ग्राम के स्वामी भी घोड़े पर सवार होकर विचरण करें | साहस्रिकः शतग्रामी एकाश्वरथवाहनौ ॥ ८२ ॥

दशशस्त्रास्त्रिभिर्युक्तौ गच्छेतां वाऽश्वसङ्गतौ । १००० हजार सैनिकों के अधिपति और १०० ग्रामों के जो अधिपति हों, चे शस्त्र धारण किये हुये १० सैनिकों से युक्त होकर एक घोड़े जुते हुये रथ पर -अथवा केवल घोड़े पर सवार हुये विचरण करें । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 496

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४१० शुक्रनीति: सहस्रप्रामपो नित्यं नराश्वद्वचश्वयानगः ॥ ८३ ॥

आतिको विंशतिभिः सेत्रकैर्हस्तिना व्रजेत् । १००० ग्रामों का या १०००० सैनिकों का अधिपति निश्य २० सैनिकों के साथ पालकी, घोड़ा या दो घोड़े जुते हुये रथ या हाथी विचरण करें | अयुतप्रामपः सानैश्व चतुरश्वगः ॥ पचायुती सेनपोऽपि सञ्चरेद् बहुसेवकः । १०००० ग्रामों का और ५०००० हजार सैनिकों का बहुत से मृत्यों ( सैनिकों ) से युक्त होकर सभी प्रकार की

चार घोड़े लुते हुये रथ पर सवार होकर विचरण करें ।

यथाधिकाधिपत्यं तु वीदयाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥

कल्पयेच्च यथाधिक्यं धनिकेषु गुणिष्वपि । पर सवार होकर ८४ ॥ अधिपति ये दोनों सवारियों से या ८५ ॥ जैसी अधिक संख्या वाले ग्रामों या सैनिकों के ऊपर आधिपत्य हो उसी के अनुसार संमान की अधिकता की कल्पना करनी चाहिये । इसी प्रकार से धनिकों तथा गुणियों में भी उनकी जैसी धन तथा गुण की अधिकता हो उसी

के अनुसार उनके सम्मान की कल्पना करनी चाहिये ।

श्रेष्ठो न मानहीनः स्यान्न्यूनो मानाधिकोऽपि न ॥ ८६ ॥

राष्ट्रे नित्यं प्रकुर्वीत श्रेयोऽर्थी नृपतिस्तथा । श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध - कल्याण के चाहने वाले राजा को अपने राज्य में इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिये कि जिसमें श्रेष्ठ पुरुष - उचित सम्मान से हीन, न्यून पुरुष – उचित सम्मान से अधिक सम्मान न प्राप्त करे, अर्थात् सबका यथोचित सम्मान हो, उसमें

न्यूनाधिक्य न होने पावे ।

होन मध्योत्तमानां तु ग्रामभूमिं प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥

कुटुम्बिनां गृहाऽर्थं तु पत्तनेऽपि नृपः सदा । उत्तमादि गृह - भूमि के प्रमाणों का निर्देश- -राजा ग्राम में हीन, मध्यम तथा उत्तम लोगों के किये तथा कुटुम्बियों के लिये नगर में घर बनाने के योग्य.

सदा उचित भूमि की व्यवस्था करे ।

द्वात्रिंशत्प्रमितैहस्तैर्दीर्घार्द्धा विस्तृताधमे ॥ ८८ ॥

उत्तमा द्विगुणा मध्या सार्धमाना यथार्हतः ।

कुटुम्ब संस्थितिसमा न न्यूना वाऽधिकाऽपि न ॥ ८६ ॥

३२ हाथ लम्बी तथा १६ हाथ चौड़ी अवमा, ६४ हाथ लम्बी तथा ३२ हाथं चौड़ी उत्तमा और ४८ हाथ लम्बी तथा २४ हाथ चौड़ी मध्या-प -संज्ञक भूमि वास अधिक हो उसी न अधिक होनी ग्राम नृप अधिकारी के ग्राम प्रवेश के गये हों उन सब किसी राज- कार्य तथ सैनि सैनिकों को के साथ व्यवहार कभी पीड़ा न प प्रकार का व्यवह श्राव सुवा सैनिकों के शूरता को बढ़ान गीत आदि का तायुक्त न हों । युद्ध युद्धकार्य से अन्य कार्यों को सत्य राज व्यवहार में सत्य ( ईमानदा व्यवहार ( लेन - द तो राजा उसकी पार धनी सैनिक धनी सैनिक हो CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 497

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पञ्चमाध्याये खिलनीति निरूपण प्रकरणम् ४११ संज्ञक भूमि वासार्थ देनी चाहिये । और जैसी कुटुम्ब की स्थिति या अधिक हो उसी के समान भूमि व्यवस्था करनी चाहिये । उससे न न्यून न्यून और न अधिक होनी चाहिये ।

प्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते ये ये त्वधिकृता नृपैः ।

नृप कार्यं विना कश्चिन्न प्रामं सैनिको विशेत् ॥ १० ॥

अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम - प्रवेश के निषेध का निर्देश - राजा द्वारा जो २ अधिकारी नियुक्त किये गये हों उन सब को ग्राम से बाहर की भूमि में निवास करना चाहिये । बिना किसी राज - कार्यं के किसी सैनिक को ग्राम के अन्दर नहीं प्रवेश करना चाहिये ।

तथा न पीडयेत् कुत्र कदापि ग्रामवासिनः ।

सैनिकैर्न व्यवहरेन्नित्यं ग्राम्यजंनोऽपि च ॥ ६१ ॥

सैनिकों को ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश – और सैनिक कहीं किसी ग्रामवासी को कभी पीड़ा न पहुँचावे और ग्रामवासी भी कभी किसी सैनिक के साथ किसी प्रकार का व्यवहार न रक्खे ।

श्रावयेत् सैनिकान्नित्यं धर्म शौर्यविवधनम् ।

सुवाद्यनृत्यगीतानि शौर्यवृद्धिकराण्यपि ॥ ९ २ ॥

सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश - राजा सैनिकों को निस्य शूरता को बढ़ानेवाले युद्ध - धर्मं सुनवाचे और उनके लिये सुन्दर बाजा, नृत्य-गीत आदि का भी प्रबन्ध रखे जो कि शूरता को बढ़ाने वाले हों अर्थात् अश्ली-हता युक्त न हों । युद्धक्रियां विना सैन्यं योजयेन्नान्यकर्मणि । युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध - युद्धकार्य के अतिरिक्त

अन्य कार्यों को करने के लिये सेना की नियुक्ति न करे ।

सत्याचारास्तु धनिका व्यवहारे हता यदि ॥ ९ ३ ॥

राजा समुद्धरेत्तांस्तु तथाऽन्यांश्च कृषीवलान् । व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करनेका निर्देश-सत्य ( ईमानदारी ) आचरण रखनेवाला कोई धनिक या किसान यदि व्यवहार ( लेन - देन ) के नाते बिगड़ गया हो ( हीन अवस्था में पड़ गया हो )

तो राजा उसकी सहायता कर उद्धार करे ।

ये सैन्यधनिकास्तेभ्यो यथार्हो भृतिमावहेत् ॥ ९ ४ ॥।

पारदेश्यं च त्रिंशांशमधिकं तद्धनव्ययात् 1 धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार -- जो सेना के अन्दर धनी सैनिक हो उनको योग्यता के अनुसार उचित बेतन दे । और राजधानी CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 498

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४१२ शुक्रनीति: से बाहर परदेश में जाने पर उनका जो धन व्यय हो उससे तीसवां भाग

अधिक मिलाकर राजा उनको द्रव्य दे ।

धनं संरक्षयेत्तेषां यत्नतः स्वात्मकोशवत् ॥ ६५ ॥

संहरेद्धनिकात् सर्व मिथ्याचाराद्धनं नृपः । सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का ध हरण करने का निर्देश — और सैनिकों के धन को अपने खजाने की भांति यन-पूर्वक रक्षा करे । यदि कोई धनिक जालसाजी का व्यवहार कर धन पैदा करें

तो उसका संपूर्ण धन छीन ले ।

यदा चतुर्गुणा वृद्धिर्गृहीता धनिकेन च ॥ ६६ ॥

अधमर्णान्न दातव्यं धनिने तु धनं तदा । इति शुक्रनीतौ खिलनीतिनिरूपणं नाम पचमोऽध्यायः । इति शुक्रनीतिः समाप्ता । मूल से चौगुना सूद ले चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश – और जब मूल धन से चौगुनी वृद्धि ( सूद ) धनिक ने ऋण लेनेवाले से ले ली हो तक उससे अधिक धन लेने के लिये धनिक को रोक दे । अर्थात् ॠण पट गया इससे ऋण लेनेवाला धनी को कुछ न दे । इति शुक्रनीतिभाषाटीकायां खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः । टीकाकार परिचयः—

श्रीभार्गवीभत्तुरनुग्रहेण श्रीभार्गवीये ननु नीतिशास्त्रे ।

भप्रियायामधिकाश टीका समापि राष्ट्रस्य गिराऽभ्युपेता ॥

वेदेन्दु शून्या क्षिमितेऽब्दमध्ये श्रीविक्रमादित्यप्रवर्त्तितेऽन्न ।

पौधे शितावाच्चतिथाविनेऽह्नि श्रीब्रह्मयुक् - शंकर नामकेन ॥

गोस्वामिदामोदर पादपद्मा - सवप्रमत्तेन I गौतमेन ।

रासेश्वरीतातत्तया ब्रजेश्व - यस्मेश्वरस्वेन च विश्रुतेन ॥

' बस्ती ' पुरीमध्यगत - प्रसिद्ध ' मिश्रौलिया ' ग्रामसमुद्भवेन

विद्याविलासाश्रयिणा ।-बुधेन द्राक्पद्यनिर्माणकृतश्रमेण ॥

टीकादिसम्पादनतः सदायुर्वेदागमग्रन्थविचारणायाम् । कृतश्रमेण प्रणयेन शश्वपलब्धद्युन द्यब्ववगाहनेन ॥ समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थः CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri अ अंगानि वेदाश्चत्वार अंगान क्रमशो व red द्धितमपि अकल्य वालस्थविर अकल्यादोनपि शनै अकातरत्वं शस्त्रास्त्र अकीर्ति लभते सोऽत्र कुष्टपच्यं कति च अकोपोऽपि सकोपाभ अगाध सलिले मनो अप्नदो गरदश्चैव अग्निदो गरदो वेश्या अङ्गारस्यैव गन्धस्य. अङ्गीकर्तुं योग्यमिति अङ्गीकृतं यथार्थं यद् अङ्गीकृतमिति लिखेन अङ्गीकृतापराधेन अचिरात्तं दुरात्मानं अजायाश्च गवार्द्ध स्या अजालगर्भ सद्वर्ण अजाविगोमहिष्यश्व अनाविगोमहिष्येण अतः सदानीतिशास्त्र अतत्परनरस्यैव अतिकामको घलो भै अतिदण्डाच गुणिभि अतिदानतपःसत्य अतिदानेन दारिद्रय अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता अतिभोरुमतिदीर्घ अतिमद्यं हि पिबतो • अतो नृपः सूचितोऽपि २७ ०

पृष्ठ 499

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शुक्रनीति - श्लोकानुक्रमणिका अ अंगानि वेदाश्चत्वारो २४ अंगानां क्रमशो वक्ष्ये १० कर्तुं यद्धितमपि ७० अकल्य वाल स्थविर २८५ अकल्यादोनपि शनैः २८६ अकातरत्वं शस्त्रास्त्र ४८ अकीर्ति लभते सोऽत्र ३७ ९ अकृष्टपच्यं कति च ७२ अकोपोऽपि सको पाभः ९ २ गासलिले मग्नो १७ अनिदो गरदश्चैव १३२ अग्निदो गरदो वेश्या १ ९ ७ अङ्गारस्यैव गन्धस्य ३५ ९ अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ११३ । अङ्गीकृतं यथार्थ यद् २ ९ २ अङ्गीकृतमिति लिखेन् ११३ अङ्गीकृतापराधेन ३८४ । अचिरात्तं दुरात्मानं २७० । अजायाश्च गवार्द्ध स्थान् २१६ अनालग सद्वर्णं २० ९ । अजाविगोमहिष्यश्व २१ ९ । अजाविगोमहिष्येण ७८ अतः सदानीतिशास्त्र २ अतत्परनरस्यैव १८ अतिकामको घलो भै ३१३ । अतिदण्डाच्च गुणिमि १८ ९ अतिदानतपःसस्य ४०२ । अतिदानेन दारिद्रर्थं १६२ अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता ३४१ अतिभोरुमतिदीर्घ २२ अतिमद्यं हि पिबतो १८ • अतो नृपः सूचितोऽपि १ ९ २ । पृष्ठ अतिमृदु स्तुतिनति ४०० अतोऽन्यथा विनाशाय ६१ अतो यतेत तत्प्राप्स्यै १३८ अतो यतेत तत्प्राप्त्य: १५५ अतो विभागं दवेषां ४०३ अत्यटनं चानशनं १७६ । अत्यन्त विशदं वज्रं २०८ । अत्यन्तविषयासक्तं ३६६ । अत्यायासो हि विद्यासु १७६ अत्यावश्यं तूत्सवेऽपि ११ ९ । अत्युग्रदण्डकल्पः स्यात् १ ९ १ अथ कोशप्रकरगं २०१ अथ मिश्रप्रकरणं १८१ । अथ मिश्र तृतीयं तु २२१ अथर्वणां चोपवेदः २२७ अथ साधारणं नीति १२५ अदन्तं यश्च गृह्णाति ३२१ । अदानेनापमानेन २२ अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये ६५ अदुष्टचत्विजं याज्यो ३२० अदेयं यस्य वै वास्ति ४७ अद्रोहसमयं कृत्वा * ३६५ अधमर्णस्थितं चापि १५ ९ अघमर्णान्न दातव्यं ४१२ अधमा धनमिच्छन्ति १२१ अधरोष्ठोऽनुचिबुकं - ३३७ अधर्मतः प्रवृत्तं तं ३१३ । अधर्मशीलनृपतेःः २०२ । अधर्मशीलो नृपतिः १ ९९ अधिकान् कृषिकृत्ये वा २४३ अधिकारमदं पीत्वा ७३ अधिकारिगणैः काश्य ५४ । अधिकारिणमेकं बा ७४ । २७ शु C - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection पृष्ठ अधिकृतो दशग्रामे २ ९ अधोते सुस्वरं गाति २ ९ ० अधोगमा सटा कार्या ३३५ अनन्य स्वस्वकामत्व १८१ अनन्याः स्वामिभक्ताश्च ८४ अनर्थमप्यभिप्रेतं १४० अनागमं तु यो मुक्के ३०४ अनागमाऽपि या मुक्तिः 39 अनाचाराद्धर्महानि १६२ अनियुक्तो न वै ' ब्रूयात् १७ ९ अनियुक्तो नियुक्तो वा २७३ अनिश्चितोपायकार्यः ३७२ अनिष्टवाक् परुषवाग् १ ९ ७ अनीतिरेव सच्छिद्रं ३ अनोतिस्ते तु तु मनसि ९ ० अनुक्रमेण संयोज्यो ७३ अनुच्छेद्यमनाद्दाये २०३ अनुनीय यथाशक्ति १६४ अनुभूतस्मारकं तु २ ९ ६ अनुयायात्प्रतिपदं.. १२५ अनुरागं सुस्वरं च ८५ अनूपे तु वृषावांना ३५३ अनेकतन्तुसंयोगैः २३५ अनेकासनसन्धाने २३२ अनेन कर्मणा वैते २७७ अन्तःपुरं वासगृहं २८० अन्तर्धूमविपक्कार्क ३५८ अन्त्यजङ्घादिपरिधि ३३५ अन्स्यौ द्वौ पचमाब्दे तु ३५१ अन्नंन निन्द्यात् सुस्वस्थ १४४ अन्नं भुक्त्वा जलं ३४८ अन्नसंस्कारदोषेषु ३७७ अन्य गृहद्वारविद्धं ३५ . Digitized by eGangotri

पृष्ठ 500

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 500 का मूल पृष्ठ
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४१४ शुक्रनीतिः अन्यथा दुःखमाप्नोति ३६१ । अमावे क्षत्रिया योज्या १२३ अन्यथा दुःखमाप्नोति १७८ अभावे वीजिनो माता ३१५ अन्यथा भृतिगृवन्तं २८७ अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद् ४० ९ अन्यथाऽयुर्धनसुहृद् १४५ अन्यथाऽयुर्धनहरा २४८ अन्यथा योजितास्ते तु ३ ९ ० अन्यथा शङ्कितान्सभ्यान् ३०३ अन्यथा शीलनाशाय ४०६ अन्यथा स्वप्रजातापो २०५ अन्यथा मियोक्तारं ३१४ अन्यद्रजोधिकं तेज १७१ अन्यव्यावर्तक स्वात्म १०५ अन्यान् सुचक्षुषा तस्यै १२१ अन्यायकारी कलह १ ९ ७ अन्यायगामिनि पत्यौ ६५ अन्यायवर्तिनां राज्यं ५४ अन्यायेनार्जितो यस्माद् २०२ अन्यार्थमर्थहीनं च २८ ९ अन्यैषामन्त्यहीनाश्च २३७ अन्योदयासहिष्णुश्च १६७ अन्योदयासहिष्णुश्च १ ९ ७ अन्योऽन्ययोः समक्षं तु २ ९ ३ अपराधं मातृस्नुषा - १५३ अपशब्दाश्च नो वाच्या १७८ अपसृत्यास्त्रसिद्धयर्थ ३७० अपाणयः पाणिमता ३७६ अपि श्रेयस्करं नृणां २४ ९ अपि स्थाणुवदासीत ९ १ अपृष्टो नैव कथयेद् १३५ अप्रगल्मेन च स्त्रिया २ ९ ८ अप्रत्यक्षं तयोनैव २ ९ ५ अप्रधानः प्रधानः स्यात् ९ ४ अप्रवासी गृही नित्यं १८० अप्रसिद्ध निराबाधं २ ९ ० अप्रेरितहितकरं ४ अवाका मध्यवयसः ७७ क्षणे चैव २८८ व्यं च वरं दद्यात् २५८ । अभिमानाश्च लोभाच्च २ ९९ अभियुक्तनिरुद्धैर्वा ३ ९ अभियुक्तस्तथाऽन्येन २८५ अभियुक्ताय दातव्यं ३० ९ / अभियोगानुरूपेण २८८ अभेद्यं व्यूहविद्वीर ३२४ अमात्यः प्राड्विवाकश्च ६७ अमात्यः प्राड्विवाको ३१४ अमात्यमपि संवीक्ष्य ५४ अमात्यो दूत इत्येता ६७ अमितस्य प्रदातारं २४२ अयं सहस्रापराधी १३१ युक्तं यत्कृतं चोकं १३१ अयोग्यः पुरुषो नास्ति ७५ अरक्षितारं नृपतिं १ ९ अरिमेदश्च पीतद्रुः २४६ अरेश्चित्तगुणात्र शास्वा ३७८ अर्जने तु महद्दुःखं २०६ अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य ४०५ अर्थचापह्नुते वादी ३०५ | अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं २२५ अर्थस्य पुरुषो दासो ४०२ अर्थात् धर्मश्च कामश्च ४०२ अर्थानर्थों तु वार्तायां २४ | अर्थिना लिखितो ह्यर्थः २ ९ २ अर्थितः पूरयेद्धीनं २८३ अर्थिप्रत्यर्थिसान्निध्ये ३०० अर्थो वा यदि वा धर्मे ४०२ अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा ३२ अर्धशेनात्मभोगश्च ४६ अर्थाङ्गुलाधिका वापि ३३६ अल्पं शतधनुः प्रोक्त ३४७ अल्पायुर्भूमृदाद्यर्थं १ अल्पीकृतं विभागेन ५० अवश्यंभाविभावानां ९ अवश्यपोष्यमरणा -११८ । अवश्यमेव मोक्तव्यं १४ । | अवाहितो भवेन्मन्दः ३४५ अविचिन्त्य नृपस्तथ्यं ३१३ अविभवेऽपि विभवे १४६ अविवेकी यत्र राजा १३३ अविसंवादि विद्वद्भिः ४० ९ अव्यक्तमेव क्रीणाति ३२० अव्याख्यागम्यमित्येतत् २ ९ १ अव्याहताज्ञः संतुष्ये ५० अव्याहताज्ञस्तेजस्वी २७ अशङ्किनक्षमो येन ४७ अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैः २७१ अशिक्षितमसारं वा ३६२ अशीतिवत्सरं यावद् ३५० अशीत्यश्वान् रथं चैकं ३३१ अशुभं चातिसंलग्न ३४२ अशोकनृपान्नैष ४ ९ अशोधयित्वा पक्षं ये २८३ अशौचं निर्दया दर्पः १५३ अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैः ३४६ अश्वस्थौ विचरेयातां ४० ९ अश्वस्य षट् सिता दन्ता ३५१ अश्वानां च गजानां च ३६ ९ अश्वे जवो वृषे धैर्य १६५ अष्टतालप्रमाणस्य २६६ अष्टतालवृषस्यैव २१६ अष्टताला द्वापरे तु २५१ अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो ६७ अष्टमांशं पारितोष्यं १२० अष्टमे पतितोत्पन्नौ -३५२ अष्टाङ्गुलं ललाटं स्याद २५३ अष्टादशाब्दतस्तौ हि ३५१ असंमतं विरुद्धं वा ६३ असंबलितपद्द्भ्यां तु ३४ ९ असत्यं कार्यघातित्वं १६६ असाहाय्यं च तत्कार्ये १५ ९ असिद्धस्तं परासेध २८६ असूयकः शत्रुसेवी १ ९ ७ अस्तीति न च मिथ्यै २८ ९ अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं ३५६ अखाद्यैः स्वार्थसिद्ध अस्मिन्नर्थे ममानेन अस्य क्षिप्यते यत्तु अस्वतन्त्राः प्रजाः . अस्वामिकं कति प्र अहिं सेवासाधु हिंसा आ • मकुचिताया - आचार प्रेरको राज आचार्यः सर्वचेष्टा आज्ञापयामतश्चाहं आशा मुलंघयन्ति आज्ञा भङ्गस्तु महत -आशायुक्तांश्च भृन आशोल्लङ्घनकारि आततायित्व मापन आत्मनो विपरीत आत्मपितृभ्रातरश्च आत्मपितृमातृगुणै - आत्मवत् सततं प आत्मशुद्धिपरा आत्मस्त्रीधन गुह्या - आत्मस्त्रीधनगुह्यान आत्मस्त्री पुत्र मित्रा आत्मानं गोपयेत - आत्मानं प्रथमं र आत्मैव ह्यात्मनः -आदान माशुकारि आदौ तद्धितकृत्स्न - आदौ वरं निर्धन आद्यः पुनस्त्वन्ति माधर्षकेभ्यश्वोरेभ्य • आधर्षणं न कुर्वन्त आधराधेयरूपौ व आधिः सोमा बाद आनृशंस्यं परो धर आन्वीक्षिकी त्रयो - आन्वीक्षिक्यां तक CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri