श्रीगणेशाय नमः।
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा
Shukra Niti Of Maharshi Shukracharya Edited With The Vidyodini Hindi Commentary By Brahma Shankar Mishra · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · 526 पृष्ठ · 53 खण्ड
In English
Shukra Niti with Vidyotini Hindi Commentary
This book contains the Shukra Niti, a collection of verses attributed to Maharshi Shukracharya. It includes the Vidyotini Hindi commentary edited by Brahma Shankar Mishra and was published by Chowkhamba Sanskrit Series Office in 1968.
This book answers
- What is the content of shukra niti?
- Who wrote the vidyotini commentary on shukra niti?
- What are the main themes of the teachings of shukracharya?
विषय सूची
- श्री काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १८५ 117: 11 शुक्रनीतिः ' विद्योतिनो - हिन्दीव्याख्योपेता अकादमी oplaraya एवं भाज W ( Q2 ), 1: 1. 152128. चौरखम्भा संस्कृत… 1–10
- सार-हुक " नादि डर " ध्य णा-T: 1 ( & ) एतद्व्याख्या - " एषा वा इति । ज्वलन्ती लोहमयी स्थूणा सुर्मी, सा च कर्णकावती छिद्रवती । अन्तरपि ज्वलन्तीत्यर्थः… 11–20
- ( १ ) दण्ड का अत्यधिक माहास्य बतलाया गया है । अतः सभी उपायों में दण्ड ' ' श्रेष्ठ है । होने के उपर्युक्त दण्ड - प्राधान्य की दृष्टि से ही इस ' नीति ' को '… 21–30
- ( २६ ) जोड़ा ' कृत्य के का संरक्षण करना पड़ता है । राज - नीति के प्रसङ्ग में वर्णित राज - धर्म में केवल जीविका बाहुबल आदि का विनिर्णय है… 31–40
- हम -व्याधि कहना ऊपर दन्तको ( ३६ ) ( अध्याय - ५ ), उद्योग - पर्व ( अध्याय ३३-३४ ), शान्ति पर्व ( अध्याय – १- १३० ), आश्रम चासिक - पर्व ( अध्याय - ५-७ ) तथा… 41–50
- व्यवस्थापन - शाला में ग्रन्थ में - गया है. अंश में. का एक न हुआ । रा मद्रास प्राध्यापक अनुवाद ग्रन्थ चार षतः भाज पाठकों के रचन्द्र जी तथापि स है कि -… 51–60
- I १६६. गयों का " " दि के : " तों ल्य १६७. 39 गत् का प्र 19 के " १६८ नी " " श 37 I क १६ ९. 13 T 33 स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय व्यवसाय ' साधन, व्यय, लाभ… 61–70
- २७३ के " " } ST SP के २७४ " " " r २७५ R " " श " T २७६ T " " " २७७ 11 T " राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश अर्थी के लिए राजा के कार्यों… 71–80
- द्ध होने ३७३ ताका 4. -ता का ने का ३७४ युद्ध न " क्षत्रिय निका अत्रिय ३७५ को " य को सक युद्ध में न से व्यता 11 तथा प्रशंसा " 11 युद्ध फल ३७६ हुए के. निषेध… 81–90
- प्रथमोऽध्यायः ला संपूर्ण अपनाना रमन्त्री । प्रजा की से ही ति रूप.. क. भेद: का राजा: चरण में: चरण र होते? तेजस्वी धर्म की प्रशंसा – स्वधर्म - पालन करने के… 91–100
- करनेवाला, इन्द्रियों का नाशक, क, नीचगुण ला, सुन्दर - के अंश से के अंश से जसे अंश ) भी उसी कार्यों का होता है । सन्तुष्ट नहीं ता है यदि लिये उपाय य न करने… 101–110
- सकर्म है में निपुण । वाले राजा जाती है 1 । चित तर्क-व्यवहार को इनका ३ । ४ । - में धर्म, य का एवं ङ्ग, ऋग् धर्मशास्त्र, 1 गोपालन, न रखने-… 111–120
- प्रथमोऽध्यायः ३४ धान्य तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन । -मूत्रादि वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्यादृक् सुखावहम् । २३२… 121–130
- प्रथमोऽध्यायः ४५ चाहिये मनसापि न कुर्वन्तु स्वामिद्रोहं तथैव च । हिये । अपने धर्म की हानि, झूठ बोलना, परस्त्री - सम्भोग, झूठी गवाही, झूठा लेख, नया राजा से… 131–140
- प्रथमोऽध्यायः 44 जा कुरा जीते हुये राजाओं के देश में सदा अपना न्यायालय स्थापित करे अर्थात् न्य समझा अपना शासन रखे… 141–150
- द्वितीयोऽध्यायः ६ व्याज से कर्मशीलगुणाः पूग्यास्तथा जातिकुलेन हि । जो कुछ न जात्या न कुलेनैव श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते । ५६… 151–160
- ७५ प्रधान तान् सर्वान् पोषयेद् भृत्या दानैर्मानैः सुपूजितान् । १२५ । हीयते चान्यथा राजा हाकीतिं चापि विन्दति… 161–170
- द्वितीयोऽध्यायः I I I धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल -… 171–180
- द्वितीयोऽध्यायः ६५ दोष न जिस के ऊपर राजा प्रसन्न हो उसके अनिष्ट की चिन्ता कदापि नहीं करनी लेना चाहिये । न दर्शयेत्स्वाधिकारगौरवं तु कदाचन… 181–190
- द्वितीयोऽध्यायः १०५ नौर परि किया है वे यदि वादी को मान्य हों तो उसके विषय में लिखे हुये पत्र को से ' क्रय- । स्थावर लिखता कहते हैं… 191–200
- द्वितीयोऽध्यायः ११५ । विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् । स्थान- टिप्पणादि के भेद - यह स्थान - संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु--ले सम्पूर्ण… 201–210
- होता है । त उस पर वेधी वाक्य तृतीयोऽध्यायः अथ साधारणं नीतिशास्त्रं सर्वेषु चोच्यते । । सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । १… 211–220
- तृतीयोऽध्यायः १३५ - अहंकार- अधिक सोना ), २. तन्द्रा ( अर्द्धनिद्रित अवस्था ), ३. भय, ४. क्रोध, पाता है ५. आलस्य, ६. दीर्घं सूत्रता ( थोड़े समय में पूर्ण… 221–230
- शूर पुरुषों सर्वो के. ! तृतीयोऽध्यायः १४५ नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् द्राक्स्वकार्य प्रसाधयेत् । उद्योगेन बलेनैव बुद्धया धैर्येण साहसात् । ११६… 231–240
- अधिकता पर नहीं u नील, रूप, ये सब सब उत्तम दे कुलादि । क ) यदि न उत्तमः अवस्था । उसके बाद सके साथ. ता उत्तम ती लोग चरादि के और गोत्र न. अथवा तृतीयोऽध्यायः… 241–250
- सवचन से चित्त हो हा भी नहीं ० । का निर्देश-या निरर्थक करे क्योंकि. । निर्देश - जो ति समझा करते हैं उन्हें = में फर्क आ मनमुटाव मानते हैं ३४… 251–260
- मूर्ख बना और अत्यन्त & 11 मैथुन करना, करना और दुःखदायी G । मन्त्रियों से न से कुछ, या बिगड़ती ३ । देश- हाथी, होते हैं उसके जाते हैं । २… 261–270
- । १८ । लिये सज्जन लिये उपदेश और सर्पों होता है 1 । राजा के पुनः उनके उसके बाद शत्रु भी सीन तथा दिशाओं में शत्रु, मित्र अमास्य हैं । -हीनबल T ता करे… 271–280
- उसके बाद करनेवालो । से, अपराधी । दण्ड ( तुम्हें साहस दण्ड ना चाहिये । के बार । बाद प्रथम ७५० ) उसके अपराध के… 281–290
- हुआ है का अभाव, 11 - क्षमाशील होती है अतः हिये । । । कर अर्थात् उसी भांति वाला बना-जो वैश्य-से तथा है वह… 291–300
- ४ है तो ४. १२ हुआ पुनः लब्धि ८ हुई, होता है, कम होता ८ । ८२ । ८३ । झनी चाहिये । ब्धि हो उसे मोतीका निश्चित करना ३ । गोल मोती - वह अधम ८५… 301–310
- चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपण प्रकरणम् २२५.. जिस द्विज ने संपूर्ण विद्याओं तथा कलाओं का अध्ययन-१७… 311–320
- चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २३५ तार मध्यम तथा उत्तम रूप से मिलाये हुये रङ्ग आदि के द्वारा ने पर बाहुमहार १४. हीन भी, कला है… 321–330
- के किसी कार्यों मे रहते हैं हैं अतः उनकी मदिरा चिकने का खना चाहिये । ४५ । किसी को दिन में । ४६ । । ४७ । त्रों को ग्राम में - उनमें परस्पर को १० हाथ, -… 331–340
- २११ । छिद्र भी दो अथवा सांधी नासा बनाई २२ । सुन्दर बनाना चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् द्वात्रिंशदंगुलः प्रोक्तः परिधिर्मस्तकस्य च… 341–350
- २७३ । माण का होना होनी चाहिये । १७४ १७५ । के तुल्य होनी गुल प्रमाण की अंगुल प्रमाण को उसकी परिधि । १७६ । ताल प्रमाण १७७ । की परिधि भी छः अंगुल का १७८… 351–360
- - कृतः । ३१ । निर्णय माननीय ननीय होता है । राजा की मान्यता ३२ । सभी विवाशे की बुद्धि साधारण । ३३ । शास्त्र का जानने-, अतः बहुत से युक्त करे… 361–370
- नेवाले, मनोहर बाबों, के धारण ६३ । ६४ । न का निर्देश-थवा उसके वचन के साथ ही ९ ५ । है । १. स्थान आसिद्ध ( रोका ९ ६… 371–380
- क्रम को स्थाय न् । १५६ । रकर ब्राह्मणादि र्णय करे । से उत्तर लेकर । १५७ । लिये जिस वादो समस्त प्रतिज्ञात । १५८ । देश- एक ही करना उचित हये । म् । १५६… 381–390
- । २१७ । -जो केवल अपना । वह छलपूर्वक -हिये अर्थात् बद्द । २१८ । जहाँ पर थोड़ा भी होता है । २१६ । सरे के द्वारा भोग से यदि १० वर्ष नहीं होता है । २२०… 391–400
- हुई है वह अधर्म र पुनः उस मुकदमे । : । २७६ । के द्वारा जिनकी पर पुनः मुकदमे रने में यदि राजा विचार करना उचित था । त् । २७७… 401–410
- -: । म् । १ । छठे दुर्ग प्रकरण को जिसके मार्ग दुर्गम - । न् । २ । तरफ बहुत बड़ी ईंट, पत्थर तथा मिट्टी घ ' दुर्ग कहते हैं । म् । म् । ३… 411–420
- । ४५ । ना - और जिसका है । और घोड़ों नना की जाती है । ४६ । । ४७ । से तिगुनी ऊंचाई मूल भाग तक की उदर का विस्तार । ४८… 421–430
- किन्तु वह है । श्वेत दे । ११२ । दूर्यमणि केसमान है । कोई भी घोड़ा सुन्दर हो तो वह । । ११३ । हो किंवा जो रूप तः । नः । ११४ । सर्वत्र कृष्ण वर्ण है । 1… 431–440
- एवं साधारण म मिलता देश है । - राष्ट्र के अन्दर ना रखनी एक चाहिये । ५१७६ । । ः । बैल तथा घोड़े युद्ध-छोड़कर शेष समय है । - । १७७… 441–450
- योः । त होकर को ' आश्रय दुर्बल भी सेना ' कहते हैं । को रखने को चः । २३७ । पनम् । वान द्वारा आक्रमण में पढ़ा हुआ राजा ] -: । २३८… 451–460
- । नयाः । २६८ । परस्पर किंवा अनबन हो सेनापति और अनवन हो जायउस सर्वदा । || २६६ । के तथा अपने बीच गुणों में जो उचित व का हरण उपस्थित । ३००… 461–470
- ३६१ । - बालक श्री या चाहिये बल्कि तीन करता चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५ मवासीनः शतानीकः सेनाकार्य विचिन्तयन् । ३६७… 471–480
- चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५ २१६ । धार्मिक होने या न होने से प्रजा भी धार्मिक या अधार्मिक होती है… 481–490
- पचमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५ निर्देश -- जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १६ वर्ष हिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक बिना वेतन… 491–500
- अस्त्राद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं मस्मिन्नर्थे ममानेन अस्य क्षिप्यते यत्तु अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः अस्वामिकं कति प्रा अहिंसैवासाधु हिंसा आ आकुचिता गदाभ्या… 501–510
- लोकानुक्रमणिका ७ ३ ८ २ ५ २ ५ ९ ० ३ ८ ४ १ ७ ६ ८ ० ९ ४ .८ १ . २ ७ -५ प्राप्ती प्रत्युत्पन्नमतिः प्रथमं साहसं कुर्वन् प्रथमं साहसं चादौ प्रथमा यत्र भिद्यन्ते… 511–520
- स्वात्यन्तसन्निकर्षेण ६० । १२ ९ स्वात्यन्तसन्निकर्षेण स्वाधिकारिगणस्यापि ३८८ । स्वाधीनं सञ्चितं द्वेषा १०७ स्वानुत्पादितसंप्राप्त ७१… 521–526