लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 181–190

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास " पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७ ९ AYA YA

नृपशून्या वसुमती न च धान्यधनावृता ।

मण्डलानि भविष्यन्ति देशेषु नगरेषु च ॥

अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुन्धरा ।

गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः सम्भविष्यन्त्यशासनाः ॥

हर्तारः परवित्तानां परदारप्रधर्षकाः ।

कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसप्रियाः ॥

प्रनष्टचेष्टनाः पुंसो मुक्तकेशाश्च शूलिनः ।

जनाः षोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये ॥

शुक्लदन्ताजिनाक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः ।

शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥

सस्यचौरा भविष्यन्ति दृढचैलाभिलाषिणः ।

चौराश्चोरस्वहर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः ॥

योग्यकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते ।

कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥

सुभिक्षं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तदा ।

कौशिकीं प्रतिपत्स्यन्ते देशान् क्षुद्भयपीडिताः ॥

दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा ।

दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः ॥

उत्सीदन्ति तदा यज्ञा केवलाधर्मपीडिताः ।

काषायिणोऽप्यनिर्ग्रन्थाः कापालीबहुलात्विह ॥

वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे ।

वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाषण्डाः परिपन्थिनः ॥

उत्पद्यन्ते तदा ते वै सम्प्राप्ते तु कलौ युगे ।

अधीयन्ते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः ॥

यजन्ते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः ।

स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम् ॥

*** पृथ्वी राजाओंसे शून्य हो जायगी तथा धन-३० धान्यसे परिपूर्ण नहीं रहेगी । देशों और नगरोंमें बहुत-से स्थान जनशून्य हो जायँगे ॥ ३० ॥

पृथ्वी अल्प जलवाली तथा कम फल देनेवाली ३१ होगी । रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी KKKKKKKKK हो जायँगे ॥३१ ॥

युगान्त कलियुगमें सभी लोग दूसरोंके धनका ३२ हरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योगरहित, लज्जारहित, रोगी तथा ३३ सोलह वर्षकी परम आयुवाले होंगे ॥ ३२-३३ ॥ कलियुगके उपस्थित होनेपर शूद्रगण [ निर्लज्जता-पूर्वक ] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष ३४ धारणकर एवं मुण्डित सिरवाले होकर यतियोंके धर्मका आचरण करेंगे ॥ ३४ ॥

कलियुगमें लोग धान्यका हरण करनेवाले तथा ३५ अत्यन्त दुष्ट लोगोंके संगकी अभिलाषा करनेवाले होंगे । चोर चोरोंका धन चुरायेंगे और उनके भी धनको कोई दूसरा हरण कर ले जायगा । मनुष्यके विधिसम्मत कर्मसे ३६ विरत होकर निष्क्रिय होनेपर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्योंको पीड़ित करेंगे ॥ ३५-३६ ॥ ३७ उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे । लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देशसे आकर कौशिकी नदीके तटपर बसेंगे । लोग दुःखित ३८ । होकर सौ वर्षकी पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे ॥३७१ / २ ॥ कलियुगमें सभी वेदोंका प्रचार - प्रसार कहीं दिखायी । देगा और कहीं नहीं । समस्त यज्ञ अधर्मसे पीड़ित होकर ३ ९ विनष्ट हो जायँगे ॥ ३८ ९ / २ ॥ संन्यासी शास्त्रज्ञानसे रहित होंगे तथा कापालिक बहुत - से होंगे । कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग ४० तीर्थोंका विक्रय करेंगे । अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण करेंगे । कलियुगके उपस्थित होनेपर ४१ । इस प्रकारके लोग उत्पन्न होंगे ॥ ३ ९ -४० ९ / २ ॥ धर्म तथा अर्थके पण्डित बनकर शूद्रलोग वेदोंका अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जातिके राजा अश्वमेध यज्ञका ४२ । अनुष्ठान करेंगे । उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों

पृष्ठ 182

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१८० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

उपद्रवांस्तथान्योन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः ।

दुःखप्रभूतमल्पायुर्देहोत्सादः सरोगता ॥ ४३

अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम् ।

प्रजासु ब्रह्महत्यादि तदा वै सम्प्रवर्तते ॥ ४४

तस्मादायुर्बलं रूपं कलिं प्राप्य प्रहीयते ।

तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः ॥ ४५

धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः ।

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरन्त्यनसूयकाः ॥४६

त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः ।

यथाक्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुते कलौ ॥ ४७

एषा कलियुगावस्था सन्ध्यांशं तु निबोध मे ।

युगे युगे च हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांस्तु सिद्धयः ॥ ४८

युगस्वभावाः सन्ध्यास्तु तिष्ठन्तीह तु पादशः ।

सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशस्ते प्रतिष्ठिताः ॥ ४ ९

एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके ।

तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भूतानां निधनोत्थितः ॥ ५०

गोत्रेऽस्मिन् वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते ।

मानवस्य तु सोंऽशेन पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ ५१

समाः सविंशतिः पूर्णा पर्यटन् वै वसुन्धराम् ।

अनुकर्षन् स वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम् ॥५२

प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्त्रशः ।

स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् हन्ति सहस्रशः ॥ ५३ ।

| तथा गायोंका वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे ॥ ४१-४२१ / २ ॥ उस समय अपार दु: ख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियोंसे लोग पीड़ित होंगे । ऐसा कहा गया है कि कलियुगमें अधर्मके प्रति अत्यन्त आसक्ति होनेके कारण लोगोंका आचरण तमोगुणप्रधान होगा । उस समय प्रजाओंमें ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करनेकी विशेष तत्परता होगी ॥ ४३-४४ ॥ अतएव कलियुगको प्राप्तकर प्रजाओंकी आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा । उस समय अल्पकालके धर्माचरणसे ही मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होंगे ॥ ४५ ॥

उस कलियुगमें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण करेंगे, वे धन्य होंगे ॥ ४६ ॥

त्रेता वर्षभर तथा द्वापरमें मासभर धर्माचरण करनेसे जिस फलका प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुगमें वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है ॥ ४७ ॥

यह कलियुगकी दशाका वर्णन किया गया है । अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये । युग-| युगमें सिद्धियोंके तीन पादोंका ह्रास होता है ॥ ४८ ॥

युगके स्वभाववाली सन्ध्याएँ यहाँ पादसे न्यून होकर रहती हैं । इस प्रकार सन्ध्याके स्वभाव अपने अंशोंमें अर्थात् सन्ध्यांशोंमें एक चतुर्थांशसे न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार युगान्तमें सन्ध्यांशकालके उपस्थित होनेपर दुष्ट प्राणियोंके संहारके लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा ॥ ५० ॥

पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जो प्रमिति नामसे विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्रके अंशसे इस कलियुगके समाप्तिकालमें चन्द्रमाके गोत्रमें सोमशर्मा नामक ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न होंगे ॥ ५१ ॥

शस्त्रधारी ब्राह्मणोंसे निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथसे युक्त विशाल सेना साथमें लेकर पूरे बीस वर्षतक पृथ्वीपर घूम - घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छोंका वध करेंगे ॥ ५२-५३ ॥

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अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोका वर्णन, कलियुगमें धर्म YE YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA

स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान् ।

पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः ॥ ५४

नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः ।

वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः ॥ ५५

प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत्स तु ।

अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम् ॥५६

मानवस्य तु सोंऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान् ।

पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान् ॥५७

गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः ।

द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः ॥ ५८

विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः ।

कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः ॥ ५ ९

परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु ।

स साधयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान् ॥ ६०

गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः ।

ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः ॥ ६१

उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः ।

तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके ॥ ६२

स्थितास्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित् ।

अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः ॥ ६३

उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम् ।

अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते ॥ ६४

प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः ।

व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च ॥ ६५

स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः ।

नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा ॥ ६६

निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः ।

नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः ॥ ६७ ।

आदिका ह्रास " पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१ फ परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे ॥ ५४ ॥

अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे ॥ ५५ ॥

सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त - आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे ॥ ५६ ॥

पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम - गोत्रमें कलियुगके पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे । बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों - हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय - सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे ॥ ५७–६१ ॥ धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र - तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी । वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी ॥ ६२-६३१ / २ ॥ युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायँगी । लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे ॥ ६४-६५ १/२ ॥ श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक - दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी ॥ ६६ ९ / २ ॥ धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे ।

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१८२ हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विवादव्याकुलेन्द्रियाः अनावृष्टिहताश्चैव वार्तामुत्सृज्य दूरतः

प्रत्यन्तानुपसेवन्ते हित्वा जनपदान् स्वकान् ।

सरित्सागरकूपांस्ते सेवन्ते पर्वतांस्तथा ॥

मधुमांसैर्मूलफलैर्वर्तयन्ति सुदुःखिताः चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः

वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्कटं घोरमास्थिताः ।

एवं कष्टमनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तदा ॥

जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमानसाः ।

विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणा ॥

साम्यावस्थात्मको बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता ।

अरूपशमयुक्तास्तु कलिशिष्टा हि वै स्वयम् ॥

अहोरात्रात्तदा तासां युगं तु परिवर्तते ।

चित्तसम्मोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत् ॥

भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत ।

प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै ॥

उत्पन्नाः कलिशिष्टास्तु प्रजाः कार्तयुगास्तदा ।

तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरन्ति च ॥

सप्तसप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते तु व्यवस्थिताः ।

ब्रह्मक्षत्रविश: शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह ॥

कलिजैः सह ते सर्वे निर्विशेषास्तदाभवन् ।

तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीतरेऽपि च ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । आपसी कलहसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले लोग अपनी ॥ ६८ पत्नियों एवं पुत्रोंका त्यागतक कर देंगे ॥ ६७१/२ ॥ वृष्टि न होनेके कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्मका पूर्ण रूपसे त्याग करके अपने - अपने देशोंको छोड़कर ६ ९ म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानोंपर शरण लेंगी ॥ ६८-६९ ॥ । प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल ॥ ७० तथा फलोंपर जीवन - निर्वाह करेंगी । वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षोंकी छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूपमें धारण करेंगी ॥ ७० ॥

७१ वर्ण तथा आश्रमव्यवस्थासे भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्टमें पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जानेके कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी ॥ ७१ ॥

बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधासे पीड़ित लोगोंके मनमें उस ७२ दुःखसे निर्वेद उत्पन्न होगा । पुनः उस निर्वेदसे साम्या-वस्थावाली विचारणा, विचारणासे साम्यावस्थात्मक बोध और अन्तमें उस बोधसे धर्माचरणके प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् ७३ होगी । कलियुगकी बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्यके अभावमें शान्तियुक्त हो जायँगी ॥ ७२-७३ ॥ इसके बाद सुप्त तथा मत्तकी भाँति उन प्रजाओंका ७४ चित्त - सम्मोहन करके एक दिन - रातमें ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्मके अनुसार कलियुगको । दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा ॥ ७४१/२ ॥ ७५ तदनन्तर उस सत्ययुगके प्रवृत्त होनेपर कलियुगकी बची हुई प्रजाओंमें सत्ययुगके आचार - विचार उत्पन्न होंगे ॥ ७५१/२ ॥ ७६ इस लोकमें उस समय जो सप्तसिद्ध लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूपमें सप्तर्षियों के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं ॥ ७६१/२ ॥ ७७ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीजके लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुगमें उत्पन्न होनेवालोंके साथ उस समय विशेषता - रहित होकर रहते थे ॥ ७७१/२ ॥ ७८ वर्णाश्रमके आचारवाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो १. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध — ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं । ( लिङ्गपुराण पू ० ८२।५१ ) २. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि- ये सप्तर्षि कहे गये हैं ।

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अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोका वर्णन, कलियुगमें धर्म KKKKKKKKKK

वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम् ।

ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७ ९

श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।

केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८०

मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै ।

यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१

वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः । ।

तथा कार्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२

एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम् ।

वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३

सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च ।

युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु ॥ ८४ ।

ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः ।

इत्येषा प्रतिसिद्धिर्वै कीर्तितैषा क्रमेण तु ॥ ८५

चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम् ।

एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्त्राद्गुणीकृता ॥ ८६

ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता ।

अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात् ॥ ८७

एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् ।

एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः ॥ ८८

क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते ।

चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत् ॥ ८ ९

तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम् ।

सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु ॥ ९ ०

पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा ।

तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः ॥ ९ १

आदिका ह्रास " पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८३ फ्र प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं । इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं ॥ ७८-७९ ॥ उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौतस्मार्तसम्बन्धी धर्मोका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोक धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं ॥ ८० ॥

वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं | जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है ॥ ८१-८२ ॥ इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं ॥८३ ॥

प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम - ये सभी क्रमसे तीन - तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक - एक पादका ह्रास होता जाता है ॥ ८४ ॥

इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है । इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया ॥ ८५ ॥।

इसी प्रकार सभी चारों युगों की स्थिति बनती है । चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है ॥ ८६१/२ ॥ ज्यों - ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है । यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है ॥ ८७१/२ ॥ क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर ( ७११४ ) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है । जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है ॥ ८८-८९ १/२ ॥ प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग १८४ अ मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम् ॥ यथा युगानां परिवर्तनानि चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् । तथा तु सन्तिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः ॥

इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः ।

अतीतानागतानां हि सर्वमन्वन्तरेषु वै ॥

मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च ।

व्याख्यातानि न सन्देहः कल्पः कल्पेन चैव हि ॥

अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ।

मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह ॥

तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत । ९ २ | हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं । उसी प्रकार युगोंके साथ - साथ लक्षणोंसहित । कल्प भी होते हैं । सभी मन्वन्तरोंका भी यही लक्षण है ॥ ९ ० - ९ २ ॥ युगों के स्वभावके अनुसार जिस प्रकार चिरकालसे | प्रवृत्त होनेवाले युगोंमें परिवर्तन होता है, उसी प्रकार ९ ३ युगोंके अनुरूप क्षय तथा उदयसे यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगोंके अनुरूप परिवर्तन होता रहता ॥ ९ ३ ॥ ९ ४ इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें बीते हुए तथा आनेवाले युगोंके लक्षण संक्षेपमें कहे गये हैं ॥ ९ ४ ॥ इसी तरह एक मन्वन्तरसे सभी मन्वन्तरोंकी ९ ५ व्याख्या की गयी है । एक कल्पके लक्षणोंसे सभी कल्पोंके लक्षण समझ लेना चाहिये । इस विषयमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है ॥ ९ ५ ॥ ९ ६ उसी भाँति ज्ञानी पुरुषको इस लोकमें बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें कल्पना कर लेनी चाहिये ॥ ९ ६ ॥ देवा ह्यष्टविधा ये च ये च मन्वन्तरेश्वराः ॥ ९ ७ जो आठ प्रकारके देवता *, मन्वन्तरोंके स्वामी,

ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः ।

एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागो युगे युगे ॥

युगस्वभावश्च तथा विधत्ते वै तदा प्रभुः ।

वर्णाश्रमविभागाश्च युगानि युगसिद्धयः ॥

युगानां परिमाणं ते कथितं हि प्रसङ्गतः ।

वदामि देवि पुत्रत्वं पद्मयोने: समासतः ॥

ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान-नाम - रूपवाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभीका ९ ८ समान प्रकारका प्रयोजन भी होता है॥९ ७१ / २ ॥ इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमोंके विभाग, युगोंकी सिद्धियाँ, युगोंके परिमाण जिन्हें युग-९९ युगमें परमात्मा धारण करते हैं – इन सबके विषयमें आपसे प्रसंगके अनुसार कह दिया । अब मैं आपसे पद्मयोनि ब्रह्माजीके देवीके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके १०० । विषयमें संक्षेपमें कह रहा हूँ॥९८–१०० ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्युगपरिमाणं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥। ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' चतुर्युगपरिमाण ' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥

यहाँ गणदेवताओंका वर्ग आठ प्रकारका बताया गया है, किंतु अमरकोष ( १।१।१० ) तथा वाचस्पतिकोषमें गणदेवताओंके नौ वर्ग कहे गये हैं और एक - एक वर्गमें परिगणित देवताओंकी संख्याको इस प्रकार बताया गया है-आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः । वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः ॥

आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः । महाराजिकनामानो द्वे शते विंशतिस्तथा ॥

साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः । अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४ ९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं ।

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अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य " नामाष्टकस्तुतिकावर्णन १८५ इकतालीसवाँ अध्याय विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य इन्द्र उवाच

पुनः ससर्ज भगवान् प्रभ्रष्टाः पूर्ववत्प्रजाः ।

सहस्रयुगपर्यन्ते प्रभाते तु पितामहः ॥

एवं परार्धे विप्रेन्द्र द्विगुणे तु तथा गते ।

तदा धराम्भसि व्याप्ता ह्यापो वह्नौ समीरणे ॥

वह्निः समीरणश्चैव व्योम्नि तन्मात्रसंयुतः ।

इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि द्विजोत्तम ॥

अहङ्कारमनुप्राप्य प्रलीनास्तत्क्षणादहो ।

अभिमानस्तदा तत्र महान्तं व्याप्य वै क्षणात् ॥

महानपि तथा व्यक्तं प्राप्य लीनोऽभवद् द्विज ।

अव्यक्तं स्वगुणैः सार्धं प्रलीनमभवद्भवे ॥

ततः सृष्टिरभूत्तस्मात्पूर्ववत्पुरुषाच्छिवात् ।

अथ सृष्टास्तदा तस्य मनसा तेन मानसाः ॥

तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन इन्द्र बोले — तत्पश्चात् एक हजार चतुर्युगीके व्यतीत हो जानेपर प्रभात वेला भगवान् ब्रह्माने नष्ट हुई प्रजाओंका १ पुनः पूर्ववत् सृजन किया । हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माके परार्धका दूना समय बीत जानेपर पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें अपनी - अपनी २ तन्मात्रासहित व्याप्त हो गये । हे द्विजश्रेष्ठ! दसों इन्द्रियाँ, मन तथा तन्मात्राएँ अहंकारको प्राप्तकर तत्क्षण उसीमें विलीन हो गयीं । अहंकार उस महत्को व्याप्त करके एवं महत् भी अव्यक्तको व्याप्त करके उसी क्षण उनमें विलीन ३ हो गया । हे द्विज! अव्यक्त भी अपने गुणोंके साथ महेश्वरमें समाहित हो गया । इसके अनन्तर उन्हीं परम पुरुष शिवसे पूर्वकी भाँति सृष्टि होने लगी ॥ १-५१२ ॥ एतदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने अपने मनसे मानस ४ पुत्रोंका सृजन किया । इस लोकमें जब प्रजाओंकी वृद्धि न हो सकी, तब प्रजा - वृद्धिके लिये स्वयं भगवान् ब्रह्मा अपने मानस पुत्रोंके साथ महेश्वरके निमित्त कठोर तप ५ करने लगे । तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर वे महेश्वर शिव उनकी कामना समझकर उन पुरुषरूप ब्रह्माके ललाटके मध्य - भागका भेदन करके ' मैं आपका पुत्र हूँ ' – ऐसा ६

न व्यवर्धन्त लोकेऽस्मिन् प्रजाः कमलयोनिना ।

वृद्ध्यर्थं भगवान् ब्रह्मा पुत्रैर्वै मानसैः सह ॥ ७

दुश्चरं विचचारेशं समुद्दिश्य तपः स्वयम् ।

तुष्टस्तु तपसा तस्य भवो ज्ञात्वा स वाञ्छितम् ॥ ८

ललाटमध्यं निर्भिद्य ब्रह्मणः पुरुषस्य तु ।

पुत्रस्नेहमिति प्रोच्य स्त्रीपुंरूपोऽभवत्तदा ॥ ९

तस्य पुत्रो महादेवो ह्यर्धनारीश्वरोऽभवत् । सर्वं ब्रह्माणं च जगद्गुरुम् ॥ १० | कहकर स्त्री - पुरुषरूपमें प्रकट हो गये । उनके पुत्र वे ददाह भगवान्

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१८६ अथार्धमात्रां कल्याणीमात्मनः परमेश्वरीम् बुभुजे योगमार्गेण वृद्ध्यर्थं जगतां शिवः तस्यां हरिं च ब्रह्माणं ससर्ज परमेश्वरः विश्वेश्वरस्तु विश्वात्मा चास्त्रं पाशुपतं तथा तस्माद् ब्रह्मा महादेव्याश्चांशजश्च हरिस्तथा । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । महादेव अर्धनारीश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हुए । तब उन्होंने ॥ ११ । जगद्गुरु ब्रह्मासहित सब कुछ दग्ध कर दिया ॥ ६–१० ॥ इसके बाद शिवजीने समग्र जगत्की वृद्धिके लिये । योगमार्गके द्वारा कल्याणमयी अर्धमात्रास्वरूपिणी अपनी ॥ १२ अर्धांगिनी परमेश्वरीके साथ संसर्ग किया । विश्वेश्वर विश्वात्मा परमेश्वर शिवने उन परमेश्वरीसे विष्णु, ब्रह्मा और पाशुपत अस्त्रका सृजन किया । इसीलिये ब्रह्मा तथा अण्डजः पद्मजश्चैव भवाङ्गभव एव च ॥ १३ विष्णुको महादेवीके अंशसे उत्पन्न कहा गया है और उन

एतत्ते कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम् ।

परार्धं ब्रह्मणो यावत्तावद्भूतिः समासतः ॥

वैराग्यं ब्रह्मणो वक्ष्ये तमोद्भूतं समासतः ।

नारायणोऽपि भगवान् द्विधा कृत्वात्मनस्तनुम् ॥

ससर्ज सकलं तस्मात्स्वाङ्गादेव चराचरम् ।

ततो ब्रह्माणमसृजद् ब्रह्मा रुद्रं पितामहः ॥

मुने कल्पान्तरे रुद्रो हरिं ब्रह्माणमीश्वरम् ।

ततो ब्रह्माणमसृजन्मुने कल्पान्तरे हरिः ॥

नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणं च पुनर्भवः ।

तदा विचार्य वै ब्रह्मा दुःखं संसार इत्यजः ॥

सर्गं विसृज्य चात्मानमात्मन्येव नियोज्य च ।

संहृत्य प्राणसञ्चारं पाषाण इव निश्चलः ॥

दशवर्षसहस्त्राणि समाधिस्थोऽभवत्प्रभुः ।

अधोमुखं तु यत्पद्मं हृदि संस्थं सुशोभनम् ॥

पूरितं पूरणैव प्रबुद्धं चाभवत्तदा ।

तदूर्ध्ववक्त्रमभवत्कुम्भकेन निरोधितम् ॥

तत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थापयामास चेश्वरम् ।

तदोमिति शिवं देवमर्धमात्रापरं परम् ॥

मृणालतन्तुभागैकशतभागे व्यवस्थितम् ।

यमी यमविशुद्धात्मा नियम्यैवं हृदीश्वरम् ॥

ब्रह्माको अण्डज, पद्मज और भवांगभव भी कहा जाता है । १४ मैंने आपसे यह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह दिया । जबतक ब्रह्माका परार्ध रहता है, तबतकके उनके ऐश्वर्य तथा तमोगुणसे प्रादुर्भूत उनके वैराग्यके विषयमें मैं संक्षेपमें १५ कहूँगा ॥ ११–१४ / २ ॥ भगवान् नारायणने भी अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके अपने उसी अंगसे सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि १६ की । तब उन्होंने ब्रह्माका सृजन किया और पितामह ब्रह्माने रुद्रका सृजन किया । हे मुने! दूसरे कल्पमें रुद्रने विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर ( शिव ) - को उत्पन्न किया । हे १७ मुने! तदनन्तर दूसरे कल्पमें हरि ( विष्णु ) - ने ब्रह्माका सृजन किया । पुनः [ दूसरे कल्पमें ] ब्रह्माने नारायणको और फिर १८ भव ( रुद्र ) - ने ब्रह्माकी सृष्टि की । तत्पश्चात् अजन्मा भगवान् ब्रह्मा ‘ यह संसार दुःखरूप है ' - ऐसा सोचकर सृष्टिकार्य छोड़ करके अपनेको आत्मतत्त्वमें अवस्थितकर १ ९ प्राण - संचारको निरुद्ध करके पाषाणकी भाँति अचल होकर दस हजार वर्षोंतक समाधिमें स्थित रहे । १५ -१ ९ २ ॥ तब उनके हृदयमें जो नीचेकी ओर मुखवाला सुन्दर २० कमल विराजमान था, वह पूरक प्राणायामद्वारा वायुपूरित होकर विकसित हो उठा और पुनः कुम्भक प्राणायामद्वारा वायुनिरुद्ध होकर ऊर्ध्वमुखवाला हो गया । तब उन्होंने २१ परमेश्वरको उसी कमलकी कर्णिकाके मध्यमें स्थापित कर दिया । तदनन्तर आत्मनियन्त्रण करनेवाले, संयमके २२ द्वारा विशुद्ध आत्मावाले तथा पूजनके योग्य ब्रह्माने ओंकार शब्दसे सम्बन्ध रखनेवाली अर्धमात्रासे परे है, उससे भी परे ब्रह्मसंज्ञक नादस्वरूप, मृणालतन्तुके शतभाग २३ | एक भागमें अवस्थित परम सूक्ष्म पीतवर्ण अग्निशिखा-

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अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य " नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८७ YAYAYAYAYAYAYAYAYA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA

यमपुष्पादिभिः पूज्यं याज्यो ह्ययजदव्ययम् ।

तस्य हृत्कमलस्थस्य नियोगाच्चांशजो विभुः ॥ २४

ललाटमस्य निर्भिद्य प्रादुरासीत्पितामहात् ।

लोहितोऽभूत्स्वयं नीलः शिवस्य हृदयोद्भवः ॥ २५

वह्नेश्चैव तु संयोगात्प्रकृत्या पुरुषः प्रभुः ।

नीलश्च लोहितश्चैव यतः कालाकृतिः पुमान् ॥ २६

नीललोहित इत्युक्तस्तेन देवेन वै प्रभुः ।

ब्रह्मणा भगवान् कालः प्रीतात्मा चाभवद्विभुः ॥ २७

सुप्रीतमनसं देवं तुष्टाव च पितामहः ।

नामाष्टकेन विश्वात्मा विश्वात्मानं महामुने ॥ २८

पितामह उवाच

नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे ।

नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयाय ते ॥ २ ९

शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः ।

ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः ॥ ३०

पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे ।

भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ॥ ३१

महादेवाय सोमाय अमृताय नमोऽस्तु ते ।

उग्राय यजमानाय नमस्ते कर्मयोगिने ॥ ३२

यः पठेच्छृणुयाद्वापि पैतामहमिमं स्तवम् ।

रुद्राय कथितं विप्रान् श्रावयेद्वा समाहितः ॥ ३३

अष्टमूर्तेस्तु सायुज्यं वर्षादेकादवाप्नुयात् ।

एवं स्तुत्वा महादेवमवैक्षत पितामहः ॥ ३४

तदाष्टधा महादेवः समातिष्ठत्समन्ततः ।

तदा प्रकाशते भानुः कृष्णवर्त्मा निशाकरः ॥ ३५

क्षितिर्वायुः पुमानम्भः सुषिरं सर्वगं तथा ।

तदाप्रभृति तं प्राहुरष्टमूर्तिरितीश्वरम् ॥ ३६

अष्टमूर्तेः प्रसादेन विरञ्चिश्चासृजत्पुनः ।

सृष्ट्वैतदखिलं ब्रह्मा पुनः कल्पान्तरे प्रभुः ॥ ३७

सहस्त्रयुगपर्यन्तं संसुप्ते च चराचरे ।

प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तत उग्रं तपो महत् ॥ ३८

सदृश, यम - नियम आदि योगांग पुष्पोंके द्वारा पूजनीय तथा अविनाशी ईश्वरको अपने हृदयमें ध्यानावस्थित करके उनकी पूजा की ॥ २० -२३१/२ ॥ तब हृदयकमलमें विराजमान रहनेवाले उन ब्रह्माके अंशसे जायमान सर्वव्यापी रुद्र उनके ललाटका भेदन करके । पितामहसे उत्पन्न हुए । शिवके हृदयसे प्रादुर्भूत पुरुष रुद्र स्वभावतः स्वयं नील होते हुए भी अग्निके संयोगके कारण लोहित ( रक्त ) वर्णके हो गये । चूँकि वे कालाकृति पुरुष रुद्र नील और लोहित वर्णके हुए, अतः वे ब्रह्मदेव प्रभु रुद्रको ' नीललोहित ' – ऐसा कहने लगे । कालरूप भगवान् । रुद्र ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रसन्न हुए । हे महामुने! तदनन्तर विश्वात्मा पितामह ब्रह्मा नामाष्टक स्तोत्रसे प्रसन्नचित्त विश्वात्मा भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे ॥ २४-२८ ॥ पितामह बोले - हे भगवन्! हे रुद्र! हे भास्कर! अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है; अम्बुमय तथा रस-स्वरूप आप भगवान् भवको नमस्कार है । गन्धमय पृथ्वीरूप शर्वको नित्य नमस्कार है; स्पर्शगुणयुक्त वायुरूप ईशको बार - बार नमस्कार है । अमित तेजस्वी अग्नि - रूप पशुपतिको नमस्कार है । शब्दतन्मात्रावाले व्योमरूप आप भीमको नमस्कार है । आप अमृतमय चन्द्रस्वरूप महादेवको नमस्कार है; आप कर्मयोगी यजमानरूप उग्रको नमस्कार है । जो मनुष्य समाहितचित्त होकर पितामह ब्रह्माके द्वारा रुद्रके लिये कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करता है या श्रवण करता है अथवा विप्रोंको सुनाता है, वह एक वर्षमें ही अष्टमूर्ति भगवान्

रुद्रका सायुज्य प्राप्त कर लेता है । २ ९ - ३३ / २ ॥

इस प्रकार स्तुति करके जब पितामहने महादेवकी ओर देखा, तब वे सभी ओर आठ प्रकारसे विभक्त होकर सुशोभित होने लगे । उसी समयसे सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रकाश करने लगे और पृथ्वी, वायु, यजमानरूप पुरुष, जल तथा सर्वव्यापी गगन अपने - अपने गुणधर्मसे समन्वित हुए ॥ उसी समयसे लोग उन ईश्वरको ' अष्टमूर्ति ' इस नामसे कहने लगे ॥ ३४–३६ ॥ उन्हीं अष्टमूर्तिके अनुग्रहसे ब्रह्माजी पुनः सृष्टि करने लगे । इस सम्पूर्ण जगत्का सृजन करके पुनः दूसरे | कल्पमें हजार युगपर्यन्त चराचर संसारके सुप्त रहनेपर

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१८८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत ।

ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो व्यजायत ॥ ३ ९

क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।

ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तदाभवन् ॥ ४०

सर्वांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा भूतप्रेतनिशाचरान् ।

अनिन्दत तदा देवो ब्रह्मात्मानमजो विभुः ॥ ४१

प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ।

ततः प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत्प्रभोर्मुखात् ॥ ४२

अर्धनारीश्वरो भूत्वा बालार्कसदृशद्युतिः ।

तदैकादशधात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः ॥ ४३

अर्धेनांशेन सर्वात्मा ससर्जासौ शिवामुमाम् ।

सा चासृजत्तदा लक्ष्मीं दुर्गां श्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥ ४४

वामां रौद्रीं महामायां वैष्णवीं वारिजेक्षणाम् ।

कलां विकरिणीं चैव कालीं कमलवासिनीम् ॥ ४५

बलविकरिणीं देवीं बलप्रमथिनीं तथा ।

सर्वभूतस्य दमनीं ससृजे च मनोन्मनीम् ॥ ४६

तथान्या बहवः सृष्टास्तया नार्यः सहस्रशः ।

रुद्रैश्चैव महादेवस्ताभिस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ४७

सर्वात्मनश्च तस्याग्रे ह्यतिष्ठत्परमेश्वरः ।

मृतस्य तस्य देवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ ४८

घृणी ददौ पुनः प्राणान् ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ।

ब्रह्मणः प्रददौ प्राणानात्मस्थांस्तु तदा प्रभुः ॥ ४ ९

प्रहृष्टोऽभूत्ततो रुद्रः किञ्चित्प्रत्यागतासवम् ।

अभ्यभाषत देवेशो ब्रह्माणं परमं वचः ॥५०

मा भैर्देव महाभाग विरिञ्च जगतां गुरो ।

मयेह स्थापिताः प्राणास्तस्मादुत्तिष्ठ वै प्रभो ॥ ५१ ।

* भगवान् रुद्रके ग्यारह नामोंका वर्णन विभिन्न पुराणोंमें आया है, | भगवान् ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके विचारसे अत्यन्त उग्र तप आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ इस प्रकार तप करते हुए उन ब्रह्माको जब कोई सफलता प्राप्त न हुई; तब दीर्घकालतक तप करनेसे उत्पन्न दुःखके कारण उन्हें क्रोध आ गया । तब क्रोधाविष्ट उन ब्रह्माके नेत्रोंसे अश्रुबिन्दु गिरने लगे । तदनन्तर उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत - प्रेत प्रादुर्भूत हो गये ॥ ३ ९ -४० ॥ तब उन सभी भूत - प्रेत - निशाचरोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर अजन्मा तथा परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ब्रह्मा अपनेको कोसने लगे । इससे उन भगवान् पितामह कोपाविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ ४१ १/२ ॥ तत्पश्चात् उन प्रभुके मुखसे उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले अर्धनारीश्वरके रूपमें होकर प्राणमय रुद्र प्रकट हुए । तब वे अपनेको ग्यारह स्वरूपों में * विभक्त करके व्यवस्थित हो गये । उन सर्वात्मा रुद्रने अपने आधे अंशसे कल्याणकारिणी उमाको आविर्भूत किया ॥ ४२-४३१ / २ ॥ तत्पश्चात् उमाने लक्ष्मी, दुर्गा तथा श्रेष्ठ सरस्वतीका सृजन किया; पुन: उन्होंने वामा, रौद्री महामाया, कमलके समान नेत्रोंवाली वैष्णवी, कल - विकरिणी, काली, कमल-वासिनी, बलविकरिणी, देवी बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनीका सृजन किया । इसी प्रकार उन्होंने अन्य बहुत - सी हजारों नारियोंकी सृष्टि की ॥ ४४ - ४६ ९ / २ U तब तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर महादेव समस्त रुद्रों तथा उन देवियोंके साथ उन सर्वात्मा ब्रह्माके समक्ष खड़े हो गये । तदनन्तर ब्रह्मपुत्र दयालु महेश्वर शिवने उन मरे हुए • परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माको पुनः प्राण प्रदान कर दिये । जब प्रभु शिवने ब्रह्मामें आत्मस्थित प्राणोंका संचार किया, तब उन्हें कुछ - कुछ चेतनायुक्त देखकर भगवान् रुद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए । इसके बाद देवेश्वर शिवने ब्रह्माजीसे यह श्रेष्ठ वचन कहा — हे देव! डरिये मत! हे महाभाग! विरिञ्च! हे जगद्गुरो! मैंने आपमें प्राण स्थापित कर दिये हैं; अतः हे प्रभो! अब उठिये ॥ ४७-५१ ॥ किंतु नामोंमें अन्तर है, लिङ्गपुराण पूर्वभाग अ ० ६३ में ११ रुद्रोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं — अजैकपाद, अहिर्बुध्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित ।