लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 231–240

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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अध्याय ५४ ] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २२ ९ चौवनवाँ अध्याय ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओं की स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव सूत उवाच

ज्योतिर्गणप्रचारं वै सङ्क्षिप्याण्डे ब्रवीम्यहम् ।

देवक्षेत्राणि चालोक्य ग्रहचारप्रसिद्धये ॥

मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां मेरोः पुरी स्थिता ।

दक्षिणे भानुपुत्रस्य वरुणस्य च वारुणी ॥

सौम्ये सोमस्य विपुला तासु दिग्देवताः स्थिताः ।

अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात् ॥

लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतो दक्षिणायने ।

काष्ठां गतस्य सूर्यस्य गतिर्या तां निबोधत ॥

दक्षिणप्रक्रमे भानुः क्षिप्तेषुरिव धावति ।

ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति ॥

पुरान्तगो यदा भानुः शक्रस्य भवति प्रभुः ।

सर्वैः सायमनैः सौरो ह्युदयो दृश्यते द्विजाः ॥

स एव सुखवत्यां तु निशान्तस्थः प्रदृश्यते ।

अस्तमेति पुनः सूर्यो विभायां विश्वदृग्विभुः ॥

मया प्रोक्तोऽमरावत्यां यथासौ वारितस्करः ।

तथा संयमनीं प्राप्य सुखां चैव विभां खगः ॥

यदापराह्णस्त्वाग्नेय्यां पूर्वाह्णो नैर्ऋते द्विजाः ।

तदा त्वपररात्रश्च वायुभागे सुदारुणः ॥

ईशान्यां पूर्वरात्रस्तु गतिरेषा च सर्वतः ।

एवं पुष्करमध्ये तु यदा सर्पति वारिपः ॥

त्रिंशांशकं तु मेदिन्यां मुहूर्तेनैव गच्छति ।

योजनानां मुहूर्तस्य इमां सङ्ख्यां निबोधत ॥

सूतजी बोले – [ हे ऋषियो! ] देवक्षेत्रोंको देखकर मैं ग्रहोंकी गतिके ज्ञानके लिये अण्डमें ज्योतिर्गणों १ ( ग्रहों ) -की गतिका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ ॥१ ॥

मेरुके पूर्वमें मानस पर्वतपर महेन्द्रकी पुरी स्थित है । २ दक्षिणमें सूर्यपुत्र यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें सोमकी विशाल पुरी है । उनमें दिग्पाल रहते हैं । वेपुरियाँ क्रमसे अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा ३ । [ नामवाली ] हैं॥२-३ ॥ लोकपालोंकी पुरियोंके ऊपर सभी ओर दक्षिणायनमें बाणके समान गतिवाले सूर्यकी जो गति है, उसे ४ [ आपलोग ] जानिये । दक्षिणायनमें सूर्य बाणकी तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्रचक्रको साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥ ५ द्विज! जब प्रभु सूर्य इन्द्रकी पुरीमें प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरीके सभी लोग सूर्यका उदय देखते हैं; ६ जब वे सूर्य संयमनीपुरीमें होते हैं, तब [ पश्चिममें ] सुखावतीपुरीमें प्रातःकाल होता है । उस समय विश्वके । नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरीमें अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥ ७ जिस प्रकार मैंने अमरावतीमें सूर्यकी गतिको कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनीको पाकर ' सुखा ' तथा ' विभा ' को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥

८ हे द्विजो! जब आग्नेय ( दक्षिण - पूर्व ) भागमें अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत ( दक्षिण - पश्चिम ) भागमें पूर्वाह्न, उस समय वायव्य ( उत्तर - पश्चिम ) भागमें ९ भयानक रात्रिका उत्तरार्ध और उत्तर - पूर्व भागमें रात्रिका प्रथम काल होता है । सब प्रकारसे यही गति होती है । १० इसी प्रकार जब जलको सोखनेवाले सूर्य आकाशके मध्यमें संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्तमें पृथ्वीपर तीस अंश चलते हैं । एक मुहूर्तमें सूर्यके द्वारा पार की ११ । गयी दूरीको योजनपरिमाणमें सुनिये॥९ –११ ॥

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२३० पूर्णा शतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु सा स्मृता पञ्चाशच्च तथान्यानि सहस्त्राण्यधिकानि तु

मौहूर्तिकी गतिर्ह्येषा भास्करस्य महात्मनः ।

एतेन गतियोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥

पर्यपृच्छेत्पतङ्गोऽपि सौम्याशां चोत्तरेऽहनि ।

मध्ये तु पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने ॥

मानसोत्तरशैले तु महातेजा विभावसुः ।

मण्डलानां शतं पूर्णं तदशीत्यधिकं विभुः ॥

बाह्यं चाभ्यन्तरं प्रोक्तमुत्तरायणदक्षिणे ।

प्रत्यहं चरते तानि सूर्यो वै मण्डलानि तु ॥

कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्तते ।

दक्षिणप्रक्रमे देवस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते ॥

तस्मात्प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति ।

सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने ॥

त्रयोदशार्धमृक्षाणामह्ना तु चरते रविः ।

मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन् ॥

कुलालचक्रमध्यं तु यथा मन्दं प्रसर्पति ।

तथोदगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः ॥

तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति ।

स रथोऽधिष्ठितो भानोरादित्यैर्मुनिभिस्तथा ॥

गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ।

प्रदीपयन् सहस्त्रांशुरग्रतः पृष्ठतोऽप्यधः ॥

ऊर्ध्वतश्च करं त्यक्त्वा सभां ब्राह्मीमनुत्तमाम् ।

अम्भोभिर्मुनिभिस्त्यक्तैः सन्ध्यायां तु निशाचरान् ॥

हत्वा हत्वा तु सम्प्राप्तान् ब्राह्मणैश्चरते रविः ।

अष्टादश मुहूर्तं तु उत्तरायणपश्चिमम् ॥

अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः ।

त्रयोदशार्धमृक्षाणि नक्तं द्वादशभी रविः ।

मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि दिवाष्टादशभिश्चरन् ॥

ततो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा ।

मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन ॥ १२ कही गयी है । यह महात्मा भास्करकी एक मुहूर्तकी । गति है । जब सूर्य इस गतिसे दक्षिण दिशाकी ओर १३ जाते हैं, तब [ वहाँ छः माह भ्रमण करनेके बाद । पुनः उत्तरायणकालमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं । दक्षिणायनके समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वतपर १४ पुष्करके मध्य भ्रमण करते हैं । वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलसे गुजरते हैं । उत्तरायण तथा दक्षिणायनको बाह्य १५ एवं आभ्यन्तर कहा गया है । सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलोंपर भ्रमण करते हैं । जैसे कुम्हारके चाकका १६ बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायनमें तेजीसे भ्रमण करते हैं । इसलिये १७ वे थोड़े समयमें ही [ अपेक्षाकृत ] अधिक भूमिपर पहुँचते हैं । दक्षिणायनमें सूर्य मात्र बारह मुहूर्तोंमें शीघ्रतापूर्वक दिनमें साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि १८ रात्रिमें अठारह मुहूर्तोंमें उतनी ही नक्षत्रकी दूरीको तय करते हैं॥१२- १ ९ ॥ १ ९ जैसे कुम्हारके चाकका मध्यभाग मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायणमें मन्दगतिसे भ्रमण २० करते हैं । इसलिये वे अधिक समयमें थोड़ी भूमिपर पहुँचते हैं । सूर्यका वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, २१ अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित रहता है । हजार किरणोंवाले वे सूर्य आगेसे, पीछेसे, नीचेसे तथा ऊपरसे किरण छोड़कर ब्रह्माकी अत्युत्तम २२ सभाको प्रकाशित करते हुए सन्ध्या - वन्दनके समय मुनियों तथा ब्राह्मणोंके द्वारा [ अर्घ्यहेतु ] छोड़े गये २३ जलसे पास आनेवाले राक्षसोंको मार - मारकर आगे बढ़ते रहते हैं॥२०–२३१ / २ ॥ २४ उत्तरायणके पश्चिम भागमें दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस समय सूर्य मन्दगतिवाले होकर चलते हैं । सूर्य रातमें बारह मुहूर्तमें साढ़े तेरह नक्षत्रदूरीको तय करते हैं और दिनमें चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्रकी २५ दूरी अठारह मुहूर्तोंमें तय करते हैं ॥ २४-२५ ॥ जिस प्रकार नाभिमें चक्र अधिक मन्द गतिसे २६ | घूमता है, उसी प्रकार [ चक्रके मध्यस्थित ] मिट्टीके

पृष्ठ 233

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अध्याय ५४ ] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३१ ५

त्रिंशन्मुहूर्तैरेवाहुरहोरात्रं पुराविदः ।

उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु ॥

कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते ।

औत्तानपादो भ्रमति ग्रहैः सार्धं ग्रहाग्रणीः ॥

गणो मुनिज्योतिषां तु मनसा तस्य सर्पति ।

अधिष्ठितः पुनस्तेन भानुस्त्वादाय तिष्ठति ॥

किरणैः सर्वतस्तोयं देवो वै ससमीरणः ।

औत्तानपादस्य सदा ध्रुवत्वं वै प्रसादतः ॥

विष्णोरौत्तानपादेन चाप्तं तातस्य हेतुना ।

आपः पीतास्तु सूर्येण क्रमन्ते शशिनः क्रमात् ॥

निशाकरान्निस्त्रवन्ते जीमूतान् प्रत्यपः क्रमात् ।

वृन्दं जलमुचां चैव श्वसनेनाभिताडितम् ॥

क्ष्मायां वृष्टिं विसृजतेऽभासयत्तेन भास्करः ।

तोयस्य नास्ति वै नाशः तदैव परिवर्तते ॥

हिताय सर्वजन्तूनां गतिः शर्वेण निर्मिता ।

भूर्भुवः स्वस्तथा ह्यापो ह्यन्नं चामृतमेव च ॥

प्राणा वै जगतामापो भूतानि भुवनानि च ।

बहुना किमुक्तेन चराचरमिदं जगत् ॥

अपां शिवस्य भगवानाधिपत्ये व्यवस्थितः ।

अपां त्वधिपतिर्देवो भव इत्येव कीर्तितः ॥

भवात्मकं जगत्सर्वमिति किं चेह चाद्भुतम् ।

नारायणत्वं देवस्य हरेश्चाद्भिः कृतं विभोः ।

जगतामालयो विष्णुस्त्वापस्तस्यालयानि तु ॥

दन्दह्यमानेषु चराचरेषु गोधूमभूतास्त्वथ निष्क्रमन्ति । या या ऊर्ध्वं मारुतेनेरिता वै तास्तास्त्वभ्राण्यग्निना वायुना च ॥

अतो धूमाग्निवातानां संयोगस्त्वभ्रमुच्यते ।

वारीणि वर्षतीत्यभ्रमभ्रस्येशः सहस्रदृक् ॥

फ्र पिण्डकी भाँति मध्यमें स्थित ध्रुव घूमता है । प्राचीन २७ विद्याके वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [ मिलकर ] तीस मुहूर्तके बराबर होते हैं । दोनों दिशाओंके बीचमें २८ मण्डलोंमें सूर्य घूमता है । जैसे कुलालचक्रकी नाभि | उसी स्थानपर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहोंके साथ घूमते हैं । मुनियों तथा २ ९ नक्षत्रोंका समूह उसीके मनके अनुसार चलता है । उसी [ ध्रुव ] -के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायुके साथ सभी ओरसे अपनी किरणोंके द्वारा जल ग्रहण करते हैं । ३० उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपद भगवान् विष्णुकी कृपासे सुलभ हुआ और ध्रुवने इसे अपने पिताके कारण प्राप्त ३ ९ किया था ॥ २६ – ३० १/२ ॥ सूर्यके द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रमसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमासे ३२ मेघोंको प्राप्त होता है । इसके बाद वायुद्वारा आघात करनेपर मेघोंका समूह पृथ्वीपर वृष्टि करता है । सूर्य ३३ सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [ नामवाले ] हैं । जलका कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है । भगवान् शिवने सभी प्राणियों के ३४ कल्याणके लिये जलकी इस गतिका निर्माण किया है । जल ही भूः भुवः स्वः, अन्न तथा अमृत है । जल ३५ सभी लोकोंका प्राण है । अधिक कहनेसे क्या लाभ— सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जलसे बना हुआ है । भगवान् भी शिवरूपी जलके आधिपत्यमें ३६ व्यवस्थित हैं । भगवान् शिव जलके अधिपति कहे गये हैं । यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है - इसमें आश्चर्य क्या है? सर्वव्यापी विष्णुदेवको नारायणपद जलसे ही प्राप्त ३७ हुआ है । विष्णु सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान और जल उनका निवासस्थान है ॥ ३१- ३७ ॥ चराचर समस्त प्राणियोंके वायुद्वारा उत्तेजित अग्निसे जल जानेपर धुएँके रूपमें जो - जो निकलता है और वायुद्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हींको अभ्र कहा ३८ गया है । अतः धूम, अग्नि तथा वायुके संयोगको अभ्र

कहा जाता है । जो जलकी वर्षा करता है, वह अभ्र है ।

३ ९ । हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अभ्रके स्वामी हैं ॥ ३८-३९ ॥

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२३२ यज्ञधूमोद्भवं चापि द्विजानां हितकृत्सदा दावाग्निधूमसम्भूतमभ्रं वनहितं स्मृतम् मृतधूमोद्भवं त्वभ्रमशुभाय भविष्यति अभिचाराग्निधूमोत्थं भूतनाशाय वै द्विजाः एवं धूमविशेषेण जगतां वै हिताहितम् । तस्मादाच्छादयेद्धूममभिचारकृतं नरः

अनाच्छाद्य द्विजः कुर्याद्धूमं यश्चाभिचारिकम् ।

एवमुद्दिश्य लोकस्य क्षयकृच्च भविष्यति ॥

अपां निधानं जीमूताः षण्मासानिह सुव्रताः ।

वर्षयन्त्येव जगतां हिताय पवनाज्ञया ॥

स्तनितं चेह वायव्यं वैद्युतं पावकोद्भवम् ।

त्रिधा तेषामिहोत्पत्तिरभ्राणां मुनिपुङ्गवाः ॥

न भ्रश्यन्ति यतोऽभ्राणि मेहनान्मेघ उच्यते ।

काष्ठा वाह्नाश्च वैरिंच्याः पक्षाश्चैव पृथग्विधाः ॥

आज्यानां काष्ठसंयोगादग्नेर्धूमः प्रवर्तितः ।

द्वितीयानां च सम्भूतिर्विरिञ्चोच्छ्वास वायुना ॥

भूभृतां त्वथ पक्षैस्तु मघवच्छेदितैस्ततः ।

वाह्नेयास्त्वथ जीमूतास्त्वावहस्थानगाः शुभाः ॥

विरिञ्चोच्छ्वासजाः सर्वे प्रवहस्कन्धजास्ततः ।

पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम् ॥

मूकाः सशब्ददुष्टाशास्त्वेतैः कृत्यं यथाक्रमम् ॥

क्षामवृष्टिप्रदा दीर्घकालं शीतसमीरिणः ॥

जीवकाश्च तथा क्षीणा विद्युद्ध्वनिविवर्जिताः ।

तिष्ठन्त्याक्रोशमात्रं तु धरापृष्ठादितस्ततः ॥

अर्धक्रोशे तु सर्वे वै जीमूता गिरिवासिनः ।

मेघा योजनमात्रं तु साध्यत्वाद्बहुतोयदाः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग फ्र । यज्ञके धुएँसे उत्पन्न अभ्र ( मेघ ) सदा द्विजोंका ॥ ४० हित करनेवाला होता है और दावानलके धूमसे उत्पन्न अभ्र वनके लिये हितकर कहा गया है । मृत प्राणियोंके । जलानेपर उठे हुए धूमसे उत्पन्न अभ्र अशुभके लिये ॥ ४१ होता है और हे द्विजो! अभिचाराग्निके धूमसे उत्पन्न अभ्र प्राणियोंके नाशके लिये होता है । इस प्रकार अलग - अलग धूमोंसे संसारका हित तथा अहित होता ॥ ४२ है । अतः मनुष्यको चाहिये कि अभिचारकर्मसे उत्पन्न धूमको ढँक दे । यदि कोई द्विज धूमको ढँके बिना ४३ अभिचारकर्म करता है, तो यह संसारके विनाशका कारण हो जाता है ॥ ४० - ४३ ॥ हे सुव्रतो! जलके भण्डारस्वरूप मेघ वायुकी ४४ आज्ञासे जगत्के हितके लिये इस लोकमें छः महीने वृष्टि करते हैं । मेघका गर्जन वायुके द्वारा, विद्युत्के द्वारा तथा अग्निके द्वारा होता है । हे मुनिश्रेष्ठो! उन मेघोंकी ४५ उत्पत्ति तीन प्रकारसे होती है । ' अभ्र ' शब्दका अर्थ है ' जो नष्ट नहीं होता है । ' ' मेहन ' शब्दसे ' मेघ ' व्युत्पन्न कहा गया है । काष्ठ, वाह्न, वैरिंच्य तथा पक्ष — ये ४६ विभिन्न प्रकारके मेघ होते हैं । घृतका काष्ठसे संयोग होनेपर अग्निसे जो धूम निकलता है, उससे प्रथम ४७ प्रकारका मेघ बनता है । दूसरे प्रकारके मेघकी उत्पत्ति ब्रह्माकी श्वासवायुसे होती है । इन्द्रके द्वारा पर्वतोंके काटे गये पक्षोंसे तीसरे प्रकारके मेघ उत्पन्न होते हैं । ४८ अग्निसे उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक । वायुके स्थानमें जाते हैं । ब्रह्माके श्वाससे उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायुके स्कन्धपर रहते हैं । पुष्कर ४ ९ आदि मेघ पक्षसे उत्पन्न होते हैं । ये जब बरसते हैं, तब क्रमसे शान्त, ध्वनि करनेवाले तथा विनाशकारी ५० होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है । कुछ मेघ अल्प वृष्टि करनेवाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ कालतक शीतल वायुवाले होते हैं । कुछ मेघ जीवक ५१ होते हैं । कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनिसे रहित होते हैं । कुछ मेघ पृथ्वीतलसे एक कोसके भीतर आकाशमें इधर - उधर रहते हैं । पर्वतपर ५२ । रहनेवाले सभी मेघ आधे कोसकी दूरीमें होते हैं ।

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अध्याय ५४ ] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३३

धरापृष्ठाद् द्विजाः क्ष्मायां विद्युद्गुणसमन्विताः ।

तेषां तेषां वृष्टिसर्गं त्रेधा कथितमत्र तु ॥ ५३

पक्षजाः कल्पजाः सर्वे पर्वतानां महत्तमाः ।

कल्पान्ते ते च वर्षन्ति रात्रौ नाशाय शारदाः ॥ ५४

पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम् ।

तदार्णवमभूत्सर्वं तत्र शेते निशीश्वरः ॥ ५५

आग्नेयानां श्वासजानां पक्षजानां द्विजर्षभाः ।

जलदानां सदा धूमो ह्याप्यायन इति स्मृतः ॥ ५६

पौण्ड्रास्तु वृष्टयः सर्वा वैद्युताः शीतसस्यदाः ।

पुण्ड्रदेशेषु पतिता नागानां शीकरा हिमाः ॥५७

गाङ्गा गङ्गाम्बुसम्भूता पर्जन्येन परावहैः ।

नगानां च नदीनां च दिग्गजानां समाकुलम् ॥ ५८

मेघानां च पृथग्भूतं जलं प्रायादगादगम् ।

परावहो यः श्वसनश्चानयत्यम्बिकागुरुम् ॥ ५ ९

मेनापतिमतिक्रम्य वृष्टिशेषं द्विजाः परम् ।

अभ्येति भारते वर्षे त्वपरान्तविवृद्धये ॥ ६०

वृष्टयः कथिता द्य द्विधा वस्तुविवृद्धये ।

सस्यद्वयस्य सङ्क्षेपात्प्रब्रवीमि यथामति ॥ ६१

स्रष्टा भानुर्महातेजा वृष्टीनां विश्वदृग्विभुः ।

सोऽपि साक्षाद् द्विजश्रेष्ठाश्चेशानः परमः शिवः ॥ ६२

स एव तेजस्त्वोजस्तु बलं विप्रा यशः स्वयम् ।

चक्षुः श्रोत्रं मनो मृत्युरात्मा मन्युर्विदिग्दिशः ॥ ६३

सत्यं ऋतं तथा वायुरम्बरं खचरश्च सः ।

लोकपालो हरिर्ब्रह्मा रुद्रः साक्षान्महेश्वरः ॥ ६४

सहस्रकिरणः श्रीमानष्टहस्तः सुमङ्गलः ।

अर्धनारीवपुः साक्षात्त्रिनेत्रस्त्रिदशाधिपः ॥ ६५

द्विजो! पृथ्वीतलसे योजन - मात्रकी दूरीवाले विद्युत्-युक्त मेघ साध्य होनेके कारण पृथ्वीपर अधिक जल-वृष्टि करनेवाले होते हैं । उन मेघोंका तीन प्रकारका वृष्टिसर्ग बता दिया गया ॥ ४४–५३ ॥ पर्वतोंके [ कटे हुए ] पक्षोंसे उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं । वे कल्पके अन्तमें विनाशके लिये रात्रिमें बरसते हैं । पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रातमें शयन करते हैं । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अग्निसे उत्पन्न, [ ब्रह्माके ] श्वाससे उत्पन्न तथा [ कटे हुए पर्वतोंके ] पक्षसे उत्पन्न मेघोंका धूम सदा आप्यायन कहा गया है ॥ ५४-५६ ॥ समस्त पौण्ड्र ( पुण्ड्र देशमें होनेवाली ) वृष्टि विद्युन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करनेवाली होती है । पुण्ड्र देशके मेघ बर्फके समान शीतल होते हैं और वे हाथीके सूँड़से गिरते हुए जलके छिड़कावकी भाँति प्रतीत होते हैं । गांग नामक मेघ गंगाके जलसे उत्पन्न होते हैं । ये परावहसंज्ञक वायुद्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजोंको व्याकुल कर देते हैं । मेघोंसे अलग हुआ जल एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर पहुँचता है । परावह नामक जो वायु है, वह मेघोंको हिमालय ( अम्बिकागुरु ) पर्वतकी ओर ले जाती है । हे द्विजो! पुनः मेनापति हिमालयसे आगे बढ़कर ये मेघ समुद्रके मध्य देशोंकी वृद्धिके लिये भारतवर्षमें भारी वर्षा करते हैं॥५७–६० ॥ वस्तुओंकी वृद्धिके लिये होनेवाली वृष्टियाँ दो प्रकारकी कही गयी हैं । मैं बुद्धिके अनुसार उन दोनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ । संसारके नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियोंका सृजन करनेवाले हैं । हे द्विजश्रेष्ठो! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं । हे विप्रो! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु ( क्रोध ), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं । वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं । वे हजार किरणोंवाले, श्रीमान्, आठ भुजाओंवाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, । तीन नेत्रोंवाले तथा देवताओंके अधिपति हैं ॥ ६१–६५ ॥

पृष्ठ 236

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२३४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अस्यैवेह प्रसादात्तु वृष्टिर्नानाभवद् द्विजाः । | हे द्विजो! इन्हींकी कृपासे नाना प्रकारकी वृष्टि होती सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते किरणैर्जलम् ॥ ६६ है । ये हजार गुना जल देनेके लिये अपनी किरणोंसे जल ग्रहण करते हैं । विचारपूर्वक देखा जाय तो इस जलस्य नाशो वृद्धिर्वा नास्त्येवास्य विचारतः । जलका नाश अथवा वृद्धि होती ही नहीं । ध्रुवके द्वारा ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः । ६७ अधिष्ठित वायु वृष्टिका पुनः हरण कर लेती है । तदनन्तर यह सूर्यग्रहसे निकलकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डलमें ग्रहान्निःसृत्य सूर्यात्तु कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले । फैलती है । उसके बाद ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित यह चारस्यान्ते विशत्यर्के ध्रुवेण समधिष्ठिता ॥ ६८ | वृद्धि पुनः सूर्यमें प्रवेश करती है ॥ ६६- ६८ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिश्चक्रे सूर्यगत्यादिकथनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' ज्योतिश्चक्रमें सूर्यगत्यादिकथन ' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, सूत उवाच

सौरं सङ्क्षेपतो वक्ष्ये रथं शशिन एव च ।

ग्रहाणामितरेषां च यथा गच्छति चाम्बुपः ॥

सौरस्तु ब्रह्मणा सृष्टो रथस्त्वर्थवशेन सः ।

संवत्सरस्यावयवैः कल्पितश्च द्विजर्षभाः ॥

त्रिणाभिना तु चक्रेण पञ्चारेण समन्वितः ।

सौवर्णः सर्वदेवानामावासो भास्करस्य तु ॥

नवयोजनसाहस्त्रो विस्तारायामतः स्मृतः ।

द्विगुणोऽपि रथोपस्थादीषादण्डः प्रमाणतः ॥

असङ्गैस्तु हयैर्युक्तो यतश्चक्रं ततः स्थितैः ।

वाजिनस्तस्य वै सप्त छन्दोभिर्निर्मितास्तु ते ॥

चक्रपक्षे निबद्धास्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः ।

सहाश्वचक्रो भ्रमते सहाक्षो भ्रमते ध्रुवः ॥

नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन सूतजी बोले – [ हे ऋषियो! ] मैं संक्षेपमें सूर्यके रथ और चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहोंके विषयमें बताऊँगा १ और जिस प्रकार जलका शोषण करनेवाले सूर्य गति करते हैं, उसका भी वर्णन करूँगा ॥१ ॥

श्रेष्ठ द्विजो! ब्रह्माके द्वारा विशेष प्रयोजनके २ लिये निर्मित वह सूर्यरथ संवत्सरके अवयवोंसे कल्पित किया गया है । तीन नाभि तथा पाँच अरोंवाले चक्रसे युक्त यह सूर्यरथ सुवर्णमय है और सभी देवताओंका ३ निवासस्थान है । यह लम्बाई तथा चौड़ाईमें नौ हजार योजनवाला कहा गया है । इसका ईषादण्ड प्रमाण ( माप ) -में रथोपस्थसे दुगुना है । जहाँ चक्र है, वहाँ ४ स्थित अन्तरिक्षगामी घोड़ोंसे वह युक्त ( जुता हुआ ) है । उसके सातों घोड़े वेदके सात छन्दों [ गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति ] -से ५ निर्मित हैं । वे चक्रके बगलमें बँधे हुए हैं । ध्रुवमें [ रथका ] अक्ष लगा हुआ । वह रथ घोड़ों तथा चक्रसहित घूमता है और ध्रुव अक्षके साथ ६ | घूमता है ॥२-६ ॥

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अध्याय ५५ ] शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन २३५

अक्षः सहैकचक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः ।

प्रेरको ज्योतिषां धीमान् ध्रुवो वै वातरश्मिभिः ॥

युगा कोटिसम्बद्धौ द्वौ रश्मी स्यन्दनस्य तु ।

ध्रुवेण भ्रमते रश्मिनिबद्धः स युगाक्षयोः ॥

भ्रमतो मण्डलानि स्युः खेचरस्य रथस्य तु ।

युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य हि ॥

ध्रुवेण प्रगृहीते वै विचक्राश्वे च रज्जुभिः ।

भ्रमन्तमनुगच्छन्ति ध्रुवं रश्मी च तावुभौ ॥

युगाक्षकोटिस्त्वेतस्य वातोर्मिस्यन्दनस्य तु ।

कीले सक्ता यथा रज्जुर्भ्रमते सर्वतोदिशम् ॥

भ्राम्यतस्तस्य रश्मी तु मण्डलेषूत्तरायणे ।

वर्धेते दक्षिणे चैव भ्रमतो मण्डलानि तु ॥

आकृष्येते यदा ते वै ध्रुवेणाधिष्ठिते तदा ।

आभ्यन्तरस्थः सूर्योऽथ भ्रमते मण्डलानि तु ॥

अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः ।

ध्रुवेण मुच्यमानाभ्यां रश्मिभ्यां पुनरेव तु ॥

तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु ।

उद्वेष्टयन् स वेगेन मण्डलानि तु गच्छति ॥

देवाश्चैव तथा नित्यं मुनयश्च दिवानिशम् ।

यजन्ति सततं देवं भास्करं भवमीश्वरम् ॥

स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्मुनिभिस्तथा ।

गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ॥

एते वसन्ति वै सूर्ये द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु ।

आप्याययन्ति चादित्यं तेजोभिर्भास्करं शिवम् ॥

ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम् ।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते ॥

ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसङ्ग्रहम् ।

सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति च ॥

वह अक्ष ध्रुवसे प्रेरित होकर एक ही चक्रके साथ ७ घूमता है । बुद्धिमान् ध्रुव वायुकिरणोंके द्वारा ज्योतिर्गणों ( ग्रह, नक्षत्र आदि ) को प्रेरित करता है । दो रश्मियाँ ८ ( किरणें ) रथके जुए तथा अक्षके अग्रभागमें बँधी हुई हैं और [ उन ] जुए तथा अक्षमें रश्मियोंसे निबद्ध वह सूर्यरथ ध्रुवके द्वारा भ्रमण करता है ॥ ७-८ ॥ ९ इस प्रकार भ्रमण करते हुए आकाशमें विचरण करनेवाले रथके अनेक मण्डल होते हैं । वे [ रश्मिनिबद्ध ] जुए तथा अक्षकी कोटियाँ उस रथके दाहिनी ओर होती १० हैं । रज्जुओंके द्वारा ध्रुवसे प्रगृहीत अरुण, चक्र तथा घोड़े और वे दोनों रश्मियाँ घूमते हुए ध्रुवका अनुगमन करते ११ हैं ॥ ९ -१० ॥ इस रथकी वायुलहरीरूपा युगाक्षकोटि ( जुए तथा अक्षकी कोटि ) कीलमें बँधी हुई रस्सीकी भाँति सभी १२ दिशाओंमें घूमती है । उत्तरायणमें मण्डलोंमें घूमते हुए उस सूर्यकी दोनों रश्मियाँ बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें १३ मण्डलोंमें घूमते हुए सूर्यके द्वारा वे रश्मियाँ खिंच जाती हैं । जब वे [ रश्मियाँ ] ध्रुवके द्वारा प्रेरित की जाती हैं, तब [ रथके ] भीतर स्थित सूर्य मण्डलोंमें घूमता है । उस समय १४ | सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंका चक्कर लगाता है॥११–१३१ / २ ॥ पुनः ध्रुवके द्वारा किरणोंके छोड़े जानेपर उसी १५ भाँति सूर्य मण्डलोंके बाहर भ्रमण करता है; वह मण्डलोंको घेरते हुए वेगपूर्वक चलता है ॥ १४-१५ ॥ १६ देवता तथा मुनिगण नित्य दिन - रात भवस्वरूप ईश्वर सूर्यदेवका निरन्तर पूजन करते हैं । वह रथ देवताओं, आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, १७ ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंके द्वारा अधिष्ठित है । ये | लोग सूर्यमें दो - दो महीने क्रमसे निवास करते हैं और १८ | कल्याणकारी आदित्य भास्करको अपने तेजोंसे तृप्त करते हैं ॥ १६-१८ ॥ मुनिगण अपने वचनोंसे ग्रथित स्तुतियोंके द्वारा १ ९ सूर्यका स्तवन करते हैं; गन्धर्व तथा अप्सराएँ गान एवं नृत्यके द्वारा उनकी उपासना करते हैं; ग्रामणी, यक्ष तथा २० | भूतगण किरणोंका संग्रह करते हैं; सर्पगण सूर्यका वहन

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२३६

बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम् ।

इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे ॥

मधुश्च माधवश्चैव शुक्रश्च शुचिरेव च ।

नभोनभस्यौ विप्रेन्द्रा इषश्चोर्जस्तथैव च ॥

सहः सहस्यौ च तथा तपस्यश्च तपः पुनः । एते द्वादश मासास्तु वर्षं वै मानुषं द्विजाः

वासन्तिकस्तथा ग्रैष्मः शुभो वै वार्षिकस्तथा ।

शारदश्च हिमश्चैव शैशिरो ऋतवः स्मृताः ॥

धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणश्चेन्द्र एव च ।

विवस्वांश्चैव पूषा च पर्जन्योंऽशुर्भगस्तथा ॥

त्वष्टा विष्णुः पुलस्त्यश्च पुलहश्चात्रिरेव च ।

वसिष्ठश्चाङ्गिराश्चैव भृगुर्बुद्धिमतां वरः ॥

भारद्वाजो गौतमश्च कश्यपश्च क्रतुस्तथा ।

जमदग्निः कौशिकश्च वासुकिः कङ्कणीकरः ॥

तक्षकश्च तथा नाग एलापत्रस्तथा द्विजाः ।

शङ्खपालस्तथा चान्यस्त्वैरावत इति स्मृतः ॥

धनञ्जयो महापद्मस्तथा कर्कोटकः स्मृतः ।

कम्बलोऽश्वतरश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा ॥

हाहा हूहूर्मुनिश्रेष्ठा विश्वावसुरनुत्तमः ।

उग्रसेनोऽथ सुरुचिरन्यश्चैव परावसुः ॥

चित्रसेनो महातेजाश्चोर्णायुश्चैव सुव्रताः ।

धृतराष्ट्रः सूर्यवर्चा देवी साक्षात्कृतस्थला ॥

शुभानना शुभश्रोणिर्दिव्या वै पुञ्जिकस्थला ।

मेनका सहजन्या च प्रम्लोचाथ शुचिस्मिता ॥

अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा । श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग करते हैं; यातुधान ( राक्षसगण ) उनका अनुगमन करते २१ हैं और बालखिल्य [ नामक ऋषिगण ] उदयकालसे प्रारम्भ करके चारों ओरसे घेरकर सूर्यको अस्ताचलकी २२ ओर ले जाते हैं । ये सब दो - दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं ॥१ ९ -२१ ॥ ॥ २३ हे विप्रेन्द्रो! मधु ( चैत्र ), माधव ( वैशाख ), शुक्र ( ज्येष्ठ ), शुचि ( आषाढ़ ), नभ ( श्रावण ), नभस्य २४ ( भाद्रपद ), इष ( आश्विन ), ऊर्ज ( कार्तिक ), सह ( मार्गशीर्ष ), सहस्य ( पौष ), तपस्य ( माघ ) तथा तप २५ ( फाल्गुन ) – ये बारह महीने मानव वर्षमें होते हैं । हे द्विजो! वसन्त, ग्रीष्म, शुभ वर्षा, शरद, हिम ( हेमन्त ) २६ तथा शिशिर – ये ऋतुएँ कही गयी हैं ॥ २२ - २४ ॥ धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, २७ पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा, विष्णु -पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, २८ श्रेष्ठ भृगु, भारद्वाज, गौतम, कश्यप, कौशिक — ये बारह ऋषि हैं; हे द्विजो! २ ९ तक्षक, नाग, एलापत्र, शंखपाल, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा ३० ये बारह आदित्य हैं; अंगिरा, बुद्धिमानोंमें क्रतु, जमदग्नि तथा वासुकि, कंकणीकर, ऐरावत, धनंजय, अश्वतर - ये बारह सर्प कहे गये हैं; हे मुनिश्रेष्ठो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, श्रेष्ठ विश्वावसु, उग्रसेन, सुरुचि, परावसु, चित्रसेन, ३१ महातेजस्वी ऊर्णायु, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा – ये बारह ३२ गन्धर्व हैं; हे सुव्रतो! साक्षात् देवी कृतस्थला, सुन्दर मुखवाली - उत्तम श्रोणिवाली दिव्य पुंजिकस्थला, मेनका, पूर्वचित्तिरिति ख्याता देवी साक्षात्तिलोत्तमा ॥ ३३ सहजन्या, पवित्र मुसकानवाली प्रम्लोचा, अनुम्लोचा,

रम्भा चाम्भोजवदना रथकृद् ग्रामणीः शुभः ।

रथौजा रथचित्रश्च सुबाहुर्वै रथस्वनः ॥

वरुणश्च तथैवान्यः सुषेण: सेनजिच्छुभः ।

तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च क्षतजित्सत्यजित्तथा ॥

रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा ।

सर्पो व्याघ्रः पुनश्चापो वातो विद्युद्दिवाकरः ॥

ब्रह्मोपेतश्च रक्षेन्द्रो यज्ञोपेतस्तथैव च । एते देवादयः सर्वे वसन्त्यर्के क्रमेण तु स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः धात्रादिविष्णुपर्यन्ता देवा द्वादश कीर्तिताः घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, साक्षात् देवी ३४ तिलोत्तमा तथा कमलके समान मुखवाली रम्भा - ये बारह अप्सराएँ कही गयी हैं; रथकृत्, शुभ रथौजा, ३५ रथचित्र, सुबाहु, रथस्वन, वरुण, सुषेण, शुभ सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, क्षतजित् तथा सत्यजित् – ये बारह ३६ ग्रामणी हैं; हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और राक्षसराज ॥ ३७ यज्ञोपेत – ये बारह यातुधान ( राक्षस ) हैं - ये सभी । देवता आदि क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं । बारहकी ॥ ३८ । संख्यावाले ये सात गण अपने स्थानका अभिमान

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अध्याय - ५५ ] शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन २३७

आदित्यं परमं भानुं भाभिराप्याययन्ति ते ।

कौशिकान्ता मुनयो मुनिसत्तमाः ॥

पुलस्त्याद्याः

द्वादशैव स्तवैर्भानुं स्तुवन्ति च यथाक्रमम् ।

नागाश्चाश्वतरान्तास्तु वासुकिप्रमुखाः शुभाः ॥

द्वादशैव महादेवं वहन्त्येवं यथाक्रमम् ।

क्रमेण सूर्यवर्चान्तास्तुम्बुरुप्रमुखाम्बुपम् ॥

गीतैरेनमुपासन्ते गन्धर्वा द्वादशोत्तमाः ।

कृतस्थलाद्या रम्भान्ता दिव्याश्चाप्सरसो रविम् ॥

ताण्डवैः सरसैः सर्वाश्चोपासन्ते यथाक्रमम् ।

दिव्याः सत्यजिदन्ताश्च ग्रामण्यो रथकृन्मुखाः ॥

द्वादशास्य क्रमेणैव कुर्वते भीषुसङ्ग्रहम् ।

प्रयान्ति यज्ञोपेतान्ता रक्षोहेतिमुखाः सह ॥

सायुधा द्वादशैवैते राक्षसाश्च यथाक्रमम् ।

धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः ॥

उरगो वासुकिश्चैव कङ्कणीकश्च तावुभौ ।

तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ ॥

कृतस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला ।

ग्रामणी रथकृच्चैव रथौजाश्चैव तावुभौ ॥

रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुदाहृतौ ।

मधुमाधवयोरेष गणो वसति भास्करे ॥

वसन्ति ग्रीष्मकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह ।

ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च तक्षको नाग एव च ॥

मेनका सहजन्या च गन्धर्वौ च हहाहुहूः ।

सुबाहुनामा ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ ॥

पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानावुदाहृतौ ।

एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः ॥

ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्तीह देवताः ।

इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च ॥

एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च तावुभौ ।

विश्वावसूग्रसेनौ च वरुणश्च रथस्वनः ॥

करनेवाले हैं॥२५–३७१ / २ ॥

३ ९ धातासे लेकर विष्णुपर्यन्त जो बारह देवता ( आदित्य ) कहे गये हैं, वे अपने तेजसे परम भानुको सन्तृप्त करते ४० हैं । श्रेष्ठ मुनियो! पुलस्त्यसे लेकर कौशिकतक [ कहे गये ] बारह मुनिगण यथाक्रम स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं । इसी प्रकार वासुकिसे लेकर अश्वतरतक ४१ | [ कहे गये ] बारह शुभ नाग यथाक्रम महादेव ( सूर्य ) -का वहन करते हैं । तुम्बुरुसे लेकर सूर्यवर्चातक [ कहे ४२ गये ] बारह उत्तम गन्धर्व क्रमसे गीतोंके द्वारा इन सूर्यकी उपासना करते हैं । कृतस्थलासे लेकर रम्भा - पर्यन्त [ कही गयी ] सभी दिव्य अप्सराएँ यथाक्रम सरस ४३ नृत्योंके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं । रथकृत्से लेकर सत्यजित्पर्यन्त [ कहे गये ] बारह दिव्य ग्रामणी क्रमसे ४४ इस सूर्यकी रथरश्मियोंका संग्रह करते हैं । रक्षोहेतिसे लेकर यज्ञोपेततक [ कहे गये ] - ये प्रमुख बारह राक्षस ४५ शस्त्र धारण करके क्रमसे [ सूर्यके ] पीछे - पीछे चलते हैं ॥ ३८–४४१ / २ ॥ धाता तथा अर्यमा [ दो आदित्य ], प्रजापति पुलस्त्य ४६ तथा पुलह [ दो ऋषि ], वे दोनों नाग वासुकि एवं कंकणीक, गान करनेवालोंमें श्रेष्ठ गन्धर्व तुम्बुरु तथा नारद, ४७ कृतस्थला एवं पुंजिकस्थला अप्सराएँ, वे दोनों ग्रामणी रथकृत् तथा रथौजा और यातुधान कहे गये राक्षस हेति ४८ तथा प्रति - यह समुदाय चैत्र एवं वैशाख महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥४५–४८ ॥ इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतुके दो महीनोमें भी ये ४ ९ लोग निवास करते हैं । [ दो आदित्य ] मित्र तथा वरुण, ऋषि अत्रि एवं वसिष्ठ, [ सर्प ] तक्षक तथा ५० नाग, [ दो अप्सराएँ ] मेनका और सहजन्या, दो गन्धर्व हाहा तथा हूहू, रथचित्र एवं सुबाहु नामक वे दोनों ग्रामणी और यातुधान कहे गये पौरुषेय तथा वध — ये ५१ सब शुक्र ( ज्येष्ठ ) तथा शुचि ( आषाढ़ ) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं ॥ ४ ९ –५१ ॥ ५२ इसके बाद अन्य देवता सूर्यमें निवास करते हैं । [ आदित्य ] इन्द्र तथा विवस्वान्, [ ऋषि ] अंगिरा तथा ५३ | भृगु, वे दोनों सर्प एलापत्र एवं शंखपाल, [ गन्धर्व ]

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२३८ प्रम्लोचा चैव विख्याता अनुम्लोचा च ते उभे यातुधानास्तथा सर्पो व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ नभोनभस्ययोरेष गणो वसति भास्करे । पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजोऽथ गौतमः

धनञ्जय इरावांश्च सुरुचिः सपरावसुः ।

घृताची चाप्सरः श्रेष्ठा विश्वाची चातिशोभना ॥

सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ ।

आपो वातश्च तावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ ॥

वसन्त्येते तु वै सूर्ये मास ऊर्ज इषे च ह ।

हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति च दिवाकरे ॥

अंशुर्भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुः सह ।

भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा ॥

चित्रसेनश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ ।

उर्वशी पूर्वचित्तिश्च तथैवाप्सरसावुभे ॥

तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ ।

विद्युद्दिवाकरश्चोभौ यातुधानावुदाहृतौ ॥

सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे ।

ततः शैशिरयोश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै ॥

त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च ।

काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ ॥

धृतराष्ट्रः सगन्धर्वः सूर्यवर्चास्तथैव च ।

तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोहरा ॥

रथजित्सत्यजिच्चैव ग्रामण्यौ लोकविश्रुतौ ।

ब्रह्मोपेतस्तथा रक्षो यज्ञोपेतश्च यः स्मृतः ॥

एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु ।

स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः ॥

सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम् ।

ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम् ॥

गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते ।

ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसङ्ग्रहम् ॥

सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति वै ।

बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । विश्वावसु तथा उग्रसेन, [ ग्रामणी ] वरुण एवं रथस्वन ॥ ५४ विख्यात प्रम्लोचा तथा अनुम्लोचा – वे दोनों अप्सराएँ, और वे दोनों यातुधान सर्प तथा व्याघ्र — यह समुदाय ॥ ५५ नभ ( श्रावण ) तथा नभस्य ( भाद्रपद ) महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है ॥ ५२-५४२ ॥ ५६ [ आदित्य ] पर्जन्य तथा पूषा, [ ऋषि ] भरद्वाज एवं गौतम, [ सर्प ] धनंजय तथा इरावान् ( ऐरावत ), [ गन्धर्व ] सुरुचि तथा परावसु, अप्सराओंमें श्रेष्ठ घृताची तथा परम ५७ सुन्दर विश्वाची, वे दोनों ग्रामणी - सेनानी सेनजित् तथा सुषेण और यातुधान कहे गये वे दोनों आप तथा वात— ५८ ये सब इष ( आश्विन ) तथा ऊर्ज ( कार्तिक ) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं ॥ ५५–५७९ २ ॥ ५ ९ इसी प्रकार हेमन्त ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग सूर्यमें निवास करते हैं । ये दोनों [ आदित्य ] अंशु तथा ६० भग, [ ऋषि ] कश्यप तथा क्रतु, भुजंग महापद्म तथा सर्प कर्कोटक, वे दोनों गन्धर्व चित्रसेन तथा ऊर्णायु, दोनों ६१ अप्सराएँ उर्वशी तथा पूर्वचित्ति, ग्रामणी - सेनानी तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि और यातुधान कहे गये दोनों विद्युत् तथा ६२ दिवाकर — ये सब सह ( मार्गशीर्ष ) तथा सहस्य ( पौष ) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं ॥ ५८- ६१ ९ / २ ॥ इसके बाद [ आदित्य ] त्वष्टा तथा विष्णु, [ ऋषि ] ६३ जमदग्नि तथा विश्वामित्र, कद्रूके पुत्र दोनों नाग कम्बल तथा अश्वतर, गन्धर्व धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा, मनोहर अप्सरा ६४ देवी रम्भा तथा तिलोत्तमा, लोकमें प्रसिद्ध ग्रामणी रथजित् तथा सत्यजित् और ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत - जो यातुधान ६५ कहे गये हैं- ये सब शिशिर ऋतुके दो महीनों ( माघ और फाल्गुन ) - में [ सूर्यमें ] निवास करते हैं ॥ ६२–६५ ॥ ६६ ये देवतागण क्रमसे दो - दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं । बारहकी संख्यामें ये सात समूह अपने स्थानका अभिमान करनेवाले हैं । ये सब तेजके द्वारा उत्तम तेजवाले ६७ सूर्यको सन्तृप्त करते हैं । मुनिगण अपने द्वारा विरचित स्तुतियोंसे सूर्यका स्तवन करते हैं, गन्धर्व तथा अप्सराएँ ६८ नृत्य - गानोंसे उनकी उपासना करते हैं, ग्रामणी - यक्ष - भूत रथरश्मियोंको पकड़े रहते हैं, सर्पगण सूर्यका वहन करते ६ ९ | हैं, यातुधान पीछे - पीछे चलते हैं और बालखिल्य