लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 421–430

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१ ९

इन्द्रोऽधिदैवतं छन्दो गायत्री गौतमो ऋषिः ।

मकारः कृष्णवर्णोऽस्य स्थानं वै दक्षिणामुखम् ॥ ४ ९

छन्दोऽनुष्टुप् ऋषिश्चात्री रुद्रो दैवतमुच्यते ।

शिकारो धूम्रवर्णोऽस्य स्थानं वै पश्चिमं मुखम् ॥ ५०

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विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विष्णुस्तु दैवतम् ।

वाकारो हेमवर्णोऽस्य स्थानं चैवोत्तरं मुखम् ॥ ५१

ब्रह्माधिदैवतं छन्दो बृहती चाङ्गिरा ऋषिः ।

यकारो रक्तवर्णश्च स्थानमूर्ध्वं मुखं विराट् ॥ ५२

छन्दो ऋषिर्भरद्वाजः स्कन्दो दैवतमुच्यते ।

न्यासमस्य प्रवक्ष्यामि सर्वसिद्धिकरं शुभम् ॥ ५३

सर्वपापहरं चैव त्रिविधो न्यास उच्यते ।

उत्पत्तिस्थितिसंहारभेदतस्त्रिविधः स्मृतः ॥ ५४

ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां क्रमशो भवेत् ।

उत्पत्तिर्ब्रह्मचारीणां गृहस्थानां स्थितिः सदा ॥ ५५

यतीनां संहृतिन्यासः सिद्धिर्भवति नान्यथा ।

अङ्गन्यासः करन्यासो देहन्यास इति त्रिधा ॥ ५६

उत्पत्त्यादित्रिभेदेन वक्ष्यते ते वरानने ।

न्यसेत्पूर्वं करन्यासं देहन्यासमनन्तरम् ॥५७

अङ्गन्यासं ततः पश्चादक्षराणां विधिक्रमात् ।

मूर्धादिपादपर्यन्तमुत्पत्तिन्यास उच्यते ॥ ५८ ।

पादादिमूर्धपर्यन्तं संहारो भवति प्रिये ।

हृदयास्यगलन्यासः स्थितिन्यास उदाहृतः ॥ ५ ९

ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां चैव शोभने ।

सशिरस्कं ततो देहं सर्वमन्त्रेण संस्पृशेत् ॥ ६०

स देहन्यास इत्युक्तः सर्वेषां सम एव सः ।

दक्षिणाङ्गुष्ठमारभ्य वामाङ्गुष्ठान्त एव हि ॥ ६१ ।

1985 Lingamahapuran_Section_15_2_Front ' न ' पीले रंगका है और स्थान पूर्वमुख ( पूरबकी ओर मुखवाला ) कहा गया है । इसके अधिदेवता इन्द्र हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके ऋषि गौतम हैं । ' म ' कृष्ण वर्णवाला है, इसका स्थान दक्षिणमुख है, इसका छन्द अनुष्टुप् है, इसके ऋषि अत्रि हैं और इसके अधिदेवता रुद्र कहे जाते हैं । ' शि ' धूम्र वर्णवाला है, इसका स्थान पश्चिममुख है, इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, इसका छन्द त्रिष्टुप् है और इसके देवता विष्णु हैं । ' वा ' हेम वर्णवाला है, इसका स्थान उत्तरमुख है, इसके अधिदेवता ब्रह्मा इसका छन्द बृहती है और इसके ऋषि अंगिरा हैं । ' य ' लाल रंगवाला है, इसका स्थान ऊर्ध्वमुख है, इसका छन्द विराट् है, इसके ऋषि भरद्वाज हैं और इसके देवता स्कन्द कहे जाते हैं ॥ ४८–५२१२ ॥ [ हे देवि! ] अब मैं सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले, मंगलमय तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाले इसके न्यासको बताऊँगा । न्यास तीन प्रकारका कहा जाता है । उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ) तथा संहारके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है; यह क्रमशः ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये होता है । उत्पत्ति [ न्यास ] ब्रह्मचारियोंका, स्थिति [ न्यास ] गृहस्थोंका और संहृति ( संहार ) न्यास यतियोंका होता है; अन्यथा सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती ॥ ५३-५५१२ ॥ अंगन्यास, करन्यास, देहन्यास - यह तीन प्रकारका न्यास होता है; हे वरानने! अब मैं उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे इन्हें भी आपको बताऊँगा । सबसे पहले करन्यास उसके बाद देहन्यास पुनः अंगन्यास मन्त्रके अक्षरोंके क्रमसे करना चाहिये । सिरसे प्रारम्भ होकर पैरोंतकका न्यास उत्पत्तिन्यास कहा जाता है । हे प्रिये! पैरोंसे प्रारम्भ होकर सिरतकका न्यास संहारन्यास होता है । हृदय, मुख और कण्ठका न्यास स्थितिन्यास कहा गया है । हे शोभने! यह न्यास [ क्रमश: ] ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये है॥५६–५९९ २ ॥ तत्पश्चात् सम्पूर्ण मन्त्रसे सिरसहित देहका स्पर्श करना चाहिये । वह देहन्यास कहा गया है; वह सबके

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४२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 555 न्यस्यते यत्तदुत्पत्तिर्विपरीतं तु संहृतिः । लिये समान है । दाहिने हाथके अँगूठेसे प्रारम्भ करके अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं न्यस्यते हस्तयोर्द्वयोः ॥ ६२ बायें हाथके अँगूठेतक जो न्यास किया जाता है, वक | उत्पत्तिन्यास है और इसके विपरीत करना अतीव भोगदो देवि स्थितिन्यासः कुटुम्बिनाम् । ( संहार ) न्यास है । दोनों हाथोंमें अँगूठेसे प्रारम्भ संहति करन्यासं पुरा कृत्वा देहन्यासमनन्तरम् ॥ ६३ कनिष्ठातक जो न्यास किया जाता है वह स्थितिन्यास करके

अङ्गन्यासं न्यसेत्पश्चादेष साधारणो विधिः ।

ओङ्कारं सम्पुटीकृत्य सर्वाङ्गेषु च विन्यसेत् ॥

करयोरुभयोश्चैव दशाग्राङ्गुलिषु क्रमात् ।

प्रक्षाल्य पादावाचम्य शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न्यासकर्म समाचरेत् ।

स्मरेत्पूर्वमृषिं छन्दो दैवतं बीजमेव च ॥

शक्तिं च परमात्मानं गुरुं चैव वरानने ।

मन्त्रेण पाणी सम्मृज्य तलयोः प्रणवं न्यसेत् ॥

अङ्गुलीनां च सर्वेषां तथा चाद्यन्तपर्वसु ।

सबिन्दुकानि बीजानि पञ्चमध्यमपर्वसु ॥

उत्पत्त्यादित्रिभेदेन न्यसेदाश्रमतः क्रमात् ।

उभाभ्यामेव पाणिभ्यामापादतलमस्तकम् ॥

मन्त्रेण संस्पृशेद्देहं प्रणवेनैव सम्पुटम् ।

मूर्ध्नि वक्त्रे च कण्ठे च हृदये गुह्यके तथा ॥

पादयोरुभयोश्चैव गुह्ये च हृदये तथा ।

कण्ठे च मुखमध्ये च मूनि च प्रणवादिकम् ॥

हृदये गुह्यके चैव पादयोर्मूर्ध्नि वाचि वा ।

कण्ठे चैव न्यसेदेव प्रणवादित्रिभेदतः ॥

कृत्वाङ्गन्यासमेवं हि मुखानि परिकल्पयेत् ।

पूर्वादि चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम् ॥

षडङ्गानि न्यसेत्पश्चाद्यथास्थानं च शोभनम् ।

नमः स्वाहा वषड्ढुं च वौषट्फट्कारकैः सह ॥

प्रणवं हृदयं विद्यान्नकारः शिर उच्यते ।

शिखा मकार आख्यातः शिकारः कवचं तथा ॥

, होता है; हे देवि! वह [ न्यास ] गृहस्थोंको परम सुख ६४ प्रदान करनेवाला है । सर्वप्रथम करन्यास करके देहन्यास करना चाहिये और उसके बाद अंगन्यास करना चाहिये: यह सामान्य विधि है ॥ ६०–६३१ / २ ॥ ६५ प्रत्येक मन्त्रको ओंकारसे सम्पुटित करके सभी अंगोंमें, दोनों हाथोंमें तथा दसों अँगुलियोंके अग्रभागमें ६६ क्रमसे न्यास करना चाहिये । दोनों पैर धोकर आचमन करके शुद्ध होकर समाहित चित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके न्यासकर्म करना ६७ चाहिये ॥ ६४-६५१ / २ ॥ हे वरानने! प्रारम्भमें ऋषि, छन्द, देवता, बीज, ६८ शक्ति, परमात्मा तथा गुरुका स्मरण करना चाहिये । मन्त्र उच्चारणके साथ दोनों हाथोंको धोकर दोनों करतलोंमें प्रणवका न्यास करना चाहिये । सभी अँगुलियोंके ६ ९ आदि - अन्त पर्वोंपर और पाँचों मध्यम पर्वोंपर बिन्दुयुक्त पाँच बीजोंका उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे तथा ब्रह्मचर्य आदिके क्रमसे न्यास करना चाहिये । दोनों हाथोंसे ७० मस्तकसे लेकर पैरतक प्रणवके द्वारा सम्पुटित मन्त्रसे देहका स्पर्श करना चाहिये । प्रणवयुक्त मन्त्रसे सिर, ७१ मुख, कण्ठ, हृदय, गुह्यस्थान एवं दोनों पैरोंमें; गुह्यस्थान, हृदय, कण्ठ, मुख तथा सिरमें; पुनः हृदय, गुह्यस्थान, दोनों पैरों, सिर, मुख तथा कण्ठमें तीन प्रकारका न्यास ७२ करना चाहिये । इस प्रकार अंगन्यास करके प्रणवसहित नकारसे प्रारम्भ होकर यकारपर पूर्ण होनेवाले इन नकार ७३ आदि वर्णोंकी क्रमशः अपने शरीरमें भावना करे । इसके बाद मन्त्रमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्के साथ यथास्थान छहों अंगोंमें उत्तम रीतिसे न्यास करना ७४ चाहिये ॥ ६६–७४ ॥ प्रणवको हृदय जानना चाहिये, ‘ न ' को सिर कहा ७५ | जाता है, ' म ' को शिखा कहा गया है, ' शि ' को कवच

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२१

वाकारो नेत्रमस्त्रं तु यकारः परिकीर्तितः ।

इत्थमङ्गानि विन्यस्य ततो वै बन्धयेद्दिशः ॥

विघ्नेशो मातरो दुर्गा क्षेत्रज्ञो देवता दिशः ।

आग्नेयादिषु कोणेषु चतुर्ष्वपि यथाक्रमम् ॥

अङ्गुष्ठतर्जन्यग्राभ्यां संस्थाप्य सुमुखं शुभम् ।

रक्षध्वमिति चोक्त्वा तु नमस्कुर्यात्पृथक् पृथक् ॥

गले मध्ये तथाङ्गुष्ठे तर्जन्याद्यङ्गुलीषु च ।

अङ्गुष्ठेन करन्यासं कुर्यादेव विचक्षणः ॥

एवं न्यासमिमं प्रोक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥

सर्वसिद्धिकरं पुण्यं सर्वरक्षाकरं शिवम् ॥

न्यस्ते मन्त्रेऽथ सुभगे शङ्करप्रतिमो भवेत् ।

जन्मान्तरकृतं पापमपि नश्यति तत्क्षणात् ॥

एवं विन्यस्य मेधावी शुद्धकायो दृढव्रतः ।

जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं लब्ध्वाचार्यप्रसादतः ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसङ्ग्रहणं शुभे ।

यं विना निष्फलं नित्यं येन वा सफलं भवेत् ॥

आज्ञाहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनममानसम् ।

आज्ञप्तं दक्षिणाहीनं सदा जप्तं च निष्फलम् ॥

आज्ञासिद्धं क्रियासिद्धं श्रद्धासिद्धं सुमानसम् ।

एवं च दक्षिणासिद्धं मन्त्रं सिद्धं यतस्ततः ॥

उपगम्य गुरुं विप्रं मन्त्रतत्त्वार्थवेदिनम् ।

ज्ञानिनं सद्गुणोपेतं ध्यानयोगपरायणम् ॥

तोषयेत्तं प्रयत्नेन भावशुद्धिसमन्वितः ।

वाचा च मनसा चैव कायेन द्रविणेन च ॥

आचार्यं पूजयेच्छिष्यः सर्वदातिप्रयत्नतः ।

हस्त्यश्वरथरत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥

भूषणानि च वासांसि धान्यानि विविधानि च ।

एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या च विभवे सति ॥

वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः ।

पश्चान्निवेदयेद्देवि आत्मानं सपरिच्छदम् ॥

36 35 36 36 36 36 36 1935 YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA कहा गया है, ' वा ' को नेत्र और ' य ' को अस्त्र कहा गया ७६ है । इस प्रकार अंगोंका न्यास करनेके अनन्तर दिशाओंको बाँधना चाहिये । आग्नेय आदि चारों कोणोंमें क्रमशः ७७ विघ्नेश, माताएँ, दुर्गा तथा क्षेत्रज्ञ दिशाओंके देवता हैं । अंगुष्ठ तथा तर्जनी अग्रभागोंसे कल्याणप्रद तथा सुन्दर मुखवाले गणेश आदिको दिशाओंमें स्थापित करके ' रक्षा ७८ कीजिये ' – ऐसा कहकर इन्हें पृथक् - पृथक् नमस्कार करना चाहिये ॥ ७५–७८ ॥ ७ ९ बुद्धिमान्को चाहिये 3636363636363636363636363636 कि कण्ठमें, मध्यमें, अँगूठेमें, तर्जनी आदि अँगुलियोंमें अँगूठेसे ही करन्यास करे । इस प्रकार यह न्यास सभी पापोंको हरनेवाला, शुभ, ८० सभी सिद्धियाँ देनेवाला, पुण्यप्रद, सबकी रक्षा करनेवाला तथा कल्याणकारी कहा गया है । हे सुभगे! मन्त्रका ८१ न्यास कर लेनेपर साधक शिवतुल्य हो जाता है और उसके द्वारा पूर्व जन्ममें किया गया पाप भी उसी ८२ क्षण नष्ट हो जाता है । इस प्रकार न्यास करके मेधावीको शुद्ध शरीरवाला तथा दृढव्रती होकर आचार्यकी कृपासे ग्रहण करके पंचाक्षर मन्त्रका जप करना ८३ चाहिये ॥ ७ ९ –८२ ॥ शुभे! अब मैं इस मन्त्रको ग्रहण करनेकी विधि ८४ बताऊँगा, जिसके बिना यह निष्फल हो जाता है और जिसके द्वारा यह सफल होता है । आज्ञाहीन, क्रियाहीन, ८५ श्रद्धाहीन, ध्यानहीन, आज्ञप्त तथा दक्षिणाहीन मन्त्र जपे जानेपर सदा निष्फल होता है । आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध, श्रद्धासिद्ध, सुमानस ( पूर्ण ध्यानयुक्त ) तथा दक्षिणासिद्ध

८६ मन्त्र सदा सफल होता है । ८३ - ८५ ॥

शिष्यको चाहिये कि मन्त्रके वास्तविक अर्थके ८७ ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न, सद्गुणोंसे युक्त तथा ध्यानयोगपरायण ब्राह्मण गुरुके पास जाकर भावशुद्धिसे युक्त हो मन-वचन - शरीर तथा धनसे उन्हें प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे ८८ और बड़े प्रयत्नके साथ उन आचार्यकी सर्वदा पूजा करे । वैभव रहनेपर हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, गृह, ८ ९ आभूषण, वस्त्र तथा विविध धान्य —ये सब गुरुको भक्तिपूर्वक देना चाहिये । यदि वह अपनी सिद्धि चाहता ९ ० । हो तो धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये । हे देवि!

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४२२ एवं सम्पूज्य विधिवद्यथाशक्ति त्ववञ्चयन् आददीत गुरोर्मन्त्रं ज्ञानं चैव क्रमेण तु एवं तुष्टो गुरुः शिष्यं पूजितं वत्सरोषितम् । शुश्रूषुमनहङ्कारमुपवासकृशं शुचिम्

नापयित्वा तु शिष्याय ब्राह्मणानपि पूज्य च ।

समुद्रतीरे नद्यां च गोष्ठे देवालयेऽपि वा ॥

शुचौ देशे गृहे वापि काले सिद्धिकरे तिथौ ।

नक्षत्रे शुभयोगे च सर्वदा दोषवर्जिते ॥

अनुगृह्य ततो दद्याच्छिवज्ञानमनुत्तमम् ।

स्वरेणोच्चारयेत्सम्यगेकान्तेऽपि प्रसन्नधीः ॥

उच्चार्योच्चारयित्वा ' तु तु. आचार्यः सिद्धिदः स्वयम् ।

शिवं चास्तु शुभं चास्तु शोभनोऽस्तु प्रियोऽस्त्विति ॥

एवं लब्ध्वा परं मन्त्रं ज्ञानं चैव गुरोस्ततः ।

जपेन्नित्यं ससङ्कल्पं पुरश्चरणमेव च ॥

यावज्जीवं जपेन्नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् ।

अनश्नंस्तत्परो भूत्वा स याति परमां गतिम् ॥

जपेदक्षलक्षं वै चतुर्गुणितमादरात् ।

नक्ताशी संयमी यश्च पौरश्चरणिकः स्मृतः ॥

पुरश्चरणजापी वा अपि वा नित्यजापकः ।

अचिरात्सिद्धिकाङ्क्षी तु तयोरन्यतरो भवेत् ॥

यः पुरश्चरणं कृत्वा नित्यजापी भवेन्नरः ।

तस्य नास्ति समो लोके स सिद्धः सिद्धिदो वशी ॥

आसनं रुचिरं बद्ध्वा मौनी चैकाग्रमानसः ।

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि जपेन्मन्त्रमनुत्तमम् ॥

आद्यन्तयोर्जपस्यापि कुर्याद्वै प्राणसंयमान् ।

तथा चान्ते जपेद्बीजं शतमष्टोत्तरं शुभम् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । इसके बाद सेवक आदि सहित अपने आपको ॥ ९९ । समर्पित कर देना चाहिये । इस प्रकार विधिपूर्वक भी यथाशक्ति [ गुरुकी ] पूजा करके निष्कपट भाव रखते हुए [ शिष्यको ] गुरुसे क्रमपूर्वक मन्त्र तथा ज्ञान ग्रहण ॥ ९ २ | करना चाहिये ॥ ८६ – ९ १ ॥ इस प्रकार सन्तुष्ट गुरु वर्षपर्यन्त पास रहकर सेवामें | परायण, अहंकाररहित, उपवाससे दुर्बल शरीरवाले तथा ९ ३ शुद्धियुक्त पूजित शिष्यको स्नान कराकर ब्राह्मणोंकी पूजा करके [ किसी ] समुद्रतटपर, नदीतटपर, गोशालामें, ९ ४ देवालयमें, पवित्र स्थानमें अथवा घरमें ही सिद्धिकारक समयमें, उत्तम तिथिमें तथा दोषरहित नक्षत्र एवं शुभयोगमें शिष्यपर अनुग्रह करके उसे अत्युत्तम शिवज्ञान प्रदान ९ ५ करे; साथ ही प्रसन्नचित्त होकर एकान्तमें स्वरसे सम्यक् उच्चारण करे । स्वयं उच्चारणकर तथा उच्चारण कराकर मन्त्रदाता आचार्य बोले - [ तुम्हारा ] कल्याण हो, शुभ ९ ६ हो, कुशल हो, प्रिय हो ॥ ९ २ – ९ ६ ॥ इस प्रकार गुरुसे श्रेष्ठ मन्त्र तथा ज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिये और पुरश्चरण ९ ७ भी करना चाहिये । जो बिना भोजन किये तत्पर होकर आजीवन नित्य इसका एक हजार आठ बार जप करता ९ ८ है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ ९ ७ - ९ ८ ॥ नक्तव्रत करते हुए तथा नियमोंका पालन करते हुए जो श्रद्धापूर्वक मन्त्रकी अक्षरसंख्याका चार लाख गुना जप ९९ करता है, उसे पुरश्चरणकर्ता कहा गया है । पुरश्चरणजप करनेवाला अथवा नित्य जप करनेवाला शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है । दोनोंमें किसी एकको अवश्य करना १०० चाहिये॥९९ -१०० ॥ जो मनुष्य पुरश्चरण करके इसका नित्य जप करनेवाला है, उसके समान लोकमें कोई नहीं है; वह १०१ सिद्ध, सिद्धिदाता तथा इन्द्रियजित् होता है ॥ १०१ ॥

सुखदायक आसन लगाकर मौन तथा एकाग्रचित्त १०२ होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके [ इस ] सर्वोत्तम मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ १०२ ॥

जपके प्रारम्भ और अन्तमें [ तीन - तीन ] प्राणायाम १०३ | करना चाहिये और अन्तमें एक सौ आठ बार बीजमन्त्रका

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२३ 6 36 36 36

चत्वारिंशत्समावृत्ति प्राणानायम्य संस्मरेत् ।

पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य प्राणायाम उदाहृतः ॥

प्राणायामाद्भवेत्क्षिप्रं सर्वपापपरिक्षयः ।

इन्द्रियाणां वशित्वं च तस्मात्प्राणांश्च संयमेत् ॥

गृहे जपः समं विद्याद् गोष्ठे शतगुणं भवेत् ।

नद्यां शतसहस्त्रं तु अनन्तः शिवसन्निधौ ॥

समुद्रतीरे देवह्रदे गिरौ देवालयेषु च ।

पुण्याश्रमेषु सर्वेषु जपः कोटिगुणो भवेत् ॥

शिवस्य सन्निधाने च सूर्यस्याग्रे गुरोरपि ।

दीपस्य गोर्जलस्यापि जपकर्म प्रशस्यते ॥

अङ्गुलीजपसंख्यानमेकमेकं शुभानने ।

रेखैरष्टगुणं प्रोक्तं पुत्रजीवफलैर्दश ॥

शतं वै शङ्खमणिभिः प्रवालैश्च सहस्रकम् ।

स्फाटिकैर्दशसाहस्त्रं मौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥

पद्माक्षैर्दशलक्षं तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते ।

कुशग्रन्थ्या च रुद्राक्षैरनन्तगुणमुच्यते ॥

पञ्चविंशति मोक्षार्थं सप्तविंशति पौष्टिकम् ।

त्रिंशच्च धनसम्पत्त्यै पञ्चाशच्चाभिचारिकम् ॥

तत्पूर्वाभिमुखं वश्यं दक्षिणं चाभिचारिकम् ।

पश्चिमं धनदं विद्यादुत्तरं शान्तिकं भवेत् ॥

अङ्गुष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्जनी शत्रुनाशनी ।

मध्यमा धनदा शान्तिं करोत्येषा ह्यनामिका ॥

36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 36 जप करना चाहिये । श्वास रोककर चालीस बार जप १०४ करना चाहिये । यह पंचाक्षरमन्त्रका प्राणायाम कहा गया है । प्राणायामसे शीघ्र ही सभी पापोंका नाश और इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है, अतः प्राणायाम [ अवश्य ] १०५ करना चाहिये ॥ १०३–१०५ ॥ घरमें किये गये जपको सामान्य फलवाला जानना चाहिये । गोशालामें किया गया जप उससे सौ गुना फलदायक होता है । नदीके तटपर किया गया जप लाख १०६ गुना और शिवके सान्निध्यमें किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है । समुद्रके तटपर, देवसरोवरमें, पर्वतपर, देवालयमें अथवा सभी पवित्र आश्रमोंमें किया १०७ गया जप करोड़ गुना फलदायक होता है । शिवकी सन्निधिमें, सूर्य, गुरु, दीपक, गौ अथवा जलके समक्ष जपकर्म श्रेष्ठ माना जाता है ॥ १०६ - १०८ ॥ १०८ हे शुभानने! एक - एक करके अँगुलीसे जपकी गणना करनेपर वह सामान्य फल प्रदान करता है; रेखाओंसे करनेपर वह आठ गुना फलदायक कहा गया है । पुत्रजीव - फलोंसे जप करनेपर दस गुना, शंखमणियोंसे १० ९ करनेपर सौ गुना, प्रवालों ( मूँगा ) -से करनेपर हजार गुना, स्फटिकोंसे करनेपर दस हजार गुना और मोतियोंसे करनेपर लाख गुना फलदायक कहा जाता है । कमलके ११० बीजसे करनेपर दस लाख गुना और सोनेके सुवर्णखण्डोंसे करनेपर जप करोड़ गुना फलदायक कहा जाता है । कुशाकी ग्रन्थिसे तथा रुद्राक्षोंसे गणना करनेपर जप १११ | अनन्त गुना फलदायक होता है ॥१० ९ –१११ ॥ पचीस मणियोंकी माला मोक्षके लिये, सत्ताईसकी [ माला ] पुष्टिके लिये, तीसकी धन सम्पदाके लिये और पचासकी अभिचार कर्मके लिये होती है । पूर्वकी ११२ ओर मुख करके किया गया जप वशीकरणकी शक्ति देनेवाला और दक्षिणकी ओर मुख करके किया गया जप अभिचारकर्मकी शक्ति देनेवाला होता है । पश्चिमकी ११३ और मुख करके किये गये जपको धन प्रदान करनेवाला जानना चाहिये । उत्तरकी ओर मुख करके किया गया जप शान्ति प्रदान करनेवाला होता है ॥ ११२-११३ ॥ ११४ अँगूठेको मोक्ष देनेवाला जानना चाहिये । तर्जनी

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४२४

कनिष्ठा रक्षणीया सा जपकर्मणि शोभने ।

अङ्गुष्ठेन जपेजप्यमन्यैरङ्गुलिभिः सह ॥

अङ्गुष्ठेन विना कर्म कृतं तदफलं यतः ।

शृणुष्व सर्वयज्ञेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते ॥

हिंसया ते प्रवर्तन्ते जपयज्ञो न हिंसया ।

यावन्तः कर्म यज्ञाः स्युः प्रदानानि तपांसि च ॥

सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।

माहात्म्यं वाचिकस्यैव जपयज्ञस्य कीर्तितम् ॥

तस्माच्छतगुणोपांशुः सहस्त्रो मानसः स्मृतः ।

यदुच्चनीचस्वरितैः शब्दैः स्पष्टपदाक्षरैः ॥

मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः ।

शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ तु चालयेत् ॥

किञ्चित्कर्णान्तरं विद्यादुपांशुः स जपः स्मृतः ।

धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम् ॥

शब्दार्थं चिन्तयेद्भूयः स तूक्तो मानसो जपः ।

त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयान् स्यादुत्तरोत्तरः ॥

भवेद्यज्ञविशेषेण वैशिष्ट्यं तत्फलस्य च ।

जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ॥

प्रसन्ना विपुलान् भोगान् दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम् ।

यक्षरक्षः पिशाचाश्च ग्रहाः सर्वे च भीषणाः ।

जापिनं नोपसर्पन्ति भयभीताः समन्ततः ॥

जपेन पापं शमयेदशेषं यत्तत्कृतं जन्मपरम्परासु । जपेन भोगान् जयते च मृत्युं जपेन सिद्धिं लभते च मुक्तिम् ॥ एवं लब्ध्वा शिवं ज्ञानं ज्ञात्वा जपविधिक्रमम् ॥ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग फ्र [ अँगुली ] शत्रुका नाश करनेवाली तथा मध्यमा धन ११५ प्रदान करनेवाली है । अनामिका शान्ति प्रदान करती है । हे शोभने! जपकर्ममें कनिष्ठा रक्षणीय होती है । अँगूठेसे अन्य अँगुलियोंके साथ मन्त्रका जप करना ११६ चाहिये; क्योंकि बिना अँगूठेके जो जपकर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है ॥ ११४-११५१ / २ ॥ [ हे देवि! ] सुनो, जपयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ है; ११७ वे सभी यज्ञ हिंसाके साथ हुआ करते हैं, किंतु जपयज्ञ बिना हिंसाके होता है । जितने भी अनुष्ठान, यज्ञ, दान तथा तप हैं, वे सब [ इस ] जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके ११८ भी बराबर नहीं हैं॥११६-११७१ / २ ॥ वाचिक जपयज्ञका जो माहात्म्य बताया गया है; ११ ९ उपांशु [ जपयज्ञ ] उससे सौ गुना और मानस [ जपयज्ञ ] हजार गुना [ फलप्रद ] कहा गया है । यदि साधक स्पष्ट पद- अक्षरोंवाले शब्दोंके साथ उदात्त, अनुदात्त तथा १२० स्वरित स्वरोंमें वाणीके द्वारा मन्त्रका उच्चारण करता है, तो वह जपयज्ञ वाचिक होता है । यदि साधक धीमे स्वरमें मन्त्रका उच्चारण करता है और कुछ - कुछ ओठोंको १२१ चलाता है तथा उसे कुछ - कुछ कानमें सुनायी पड़ता है, तो वह जप उपांशु कहा गया है । यदि साधक मनमें अक्षरसमूहके वर्णसे वर्ण तथा पदसे पद शब्दार्थका बार-१२२ बार चिन्तन करता है, तो उस जपको मानस जप कहा गया है । तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर ( बादवाला पहलेकी अपेक्षा ) श्रेष्ठ है । यज्ञविशेषसे उसके फलका वैशिष्ट्य १२३ होता है॥११८–१२२२ ॥ जपके द्वारा नित्य स्तुति किये जाते हुए देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रसन्न होकर अत्यधिक भोग १२४ तथा चिरस्थायी मुक्ति प्रदान करते हैं । यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा सभी भयंकर ग्रह जप करनेवालेके पास नहीं जाते और उससे पूर्णरूपसे भयभीत रहते हैं ॥ १२३ - १२४ ॥ मनुष्य जन्म - जन्मान्तरमें जो भी पाप किये रहता है, उसे जपके द्वारा नष्ट कर देता है; जपके द्वारा १२५ भोगोंको प्राप्त करता है; मृत्युको जीत लेता है; जपके द्वारा सिद्धि तथा मुक्तिको भी प्राप्त कर लेता है ॥ १२५ ॥

१२६ इस प्रकार शिवज्ञान प्राप्त करके और जपके

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ),

सदाचारी जपन्नित्यं ध्यायन् भद्रं समश्नुते ।

सदाचारं प्रवक्ष्यामि सम्यक् धर्मस्य साधनम् ॥ १२७

यस्मादाचारहीनस्य साधनं निष्फलं भवेत् ।

आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः ॥ १२८

आचारः परमा विद्या आचारः परमा गतिः ।

सदाचारवतां पुंसां सर्वत्राप्यभयं भवेत् ॥ १२ ९

तद्वदाचारहीनानां सर्वत्रैव भयं भवेत् ।

सदाचारेण देवत्वमृषित्वं च वरानने ॥ १३०

उपयान्ति कुयोनित्वं तद्वदाचारलङ्घनात् ।

आचारहीनः पुरुषो लोके भवति निन्दितः ॥ १३१

तस्मात्संसिद्धिमन्विच्छन् सम्यगाचारवान् भवेत् ।

दुर्वृत्तो शुद्धिभूयिष्ठो पापीयाञ्ज्ञानदूषकः ॥ १३२

वर्णाश्रमविधानोक्तं धर्मं कुर्वीत यत्नतः ॥ १३३

यस्य यद्विहितं कर्म तत्कुर्वन् मत्प्रियः सदा ।

सन्ध्योपासनशीलः स्यात्सायं प्रातः प्रसन्नधीः ॥ ९ ३४

उदयास्तमयात्पूर्वमारभ्य विधिना शुचिः ।

कामान्मोहाद्भयाल्लोभात्सन्ध्यां नातिक्रमेद् द्विजः ॥ १३५

सन्ध्यातिक्रमणाद्विप्रो ब्राह्मण्यात्पतते यतः ।

असत्यं न वदेत्किञ्चिन्न सत्यं च परित्यजेत् ॥ १३६

यत्सत्यं ब्रह्म इत्याहुरसत्यं ब्रह्मदूषणम् ।

अनृतं परुषं शाठ्यं पैशुन्यं पापहेतुकम् ॥ १३७

परदारान् परद्रव्यं परहिंसां च सर्वदा ।

क्वचिच्चापि न कुर्वीत वाचा च मनसा तथा ॥ १३८

शूद्रान्नं यातयामान्नं नैवेद्यं श्राद्धमेव च ।

गणान्नं समुदायान्नं राजान्नं च विवर्जयेत् ॥ १३ ९

जपविधान तथा उसकी महिमा ४२५ विधिक्रमको जानकर सदाचारी [ मनुष्य ] नित्य जप करता हुआ तथा शिवका ध्यान करता हुआ कल्याण प्राप्त करता है ॥ १२६१/२ ॥ [ हे देवि! ] अब मैं धर्मके साधनस्वरूप सदाचारका सम्यक् वर्णन करूँगा; क्योंकि आचारहीन [ व्यक्ति ] -का साधन निष्फल हो जाता है । आचार सर्वश्रेष्ठ धर्म है, आचार परम तप है, आचार परम विद्या है और आचार परम गति है । जिस तरह सदाचारी मनुष्योंको सभी जगह अभय रहता है; उसी तरह आचारहीनोंको सर्वत्र भय ही रहता है ॥ १२७–१२९९ / २ ॥ हे वरानने! जो सदाचारका पालन करते हैं, वे देवत्व तथा ऋषित्व प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार जो आचारका उल्लंघन करते हैं, वे कुत्सित योनि प्राप्त करते हैं । आचारसे विहीन पुरुष संसारमें निन्दित होता है, अतः सिद्धिकी इच्छा रखनेवालेको पूर्णरूपसे आचारवान् होना चाहिये । महान् शुद्धिसे युक्त होता हुआ भी दुराचारी व्यक्ति पापी तथा ज्ञानको दूषित करनेवाला | होता है ॥ १३० –१३२ ॥ वर्णाश्रम - विधानके अनुसार बताये गये धर्मका यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये । जिसका जो कर्म विहित है, उसे करनेवाला सर्वदा मुझे प्रिय है । प्रसन्नचित्त होकर प्रातः तथा सायंकाल सन्ध्योपासन करना चाहिये । द्विजको चाहिये कि सूर्योदय तथा सूर्यास्तके पूर्व आरम्भ करके पवित्र होकर विधिपूर्वक सन्ध्या करे और काम, मोह, भय तथा लोभके कारण सन्ध्याका उल्लंघन न करे; क्योंकि सन्ध्याका उल्लंघन करनेसे विप्र ब्राह्मणत्वसे पतित हो जाता है ॥ १३३–१३५१ / २ ॥ कुछ भी असत्य नहीं बोलना चाहिये और सत्यका त्याग नहीं करना चाहिये । सत्यको ब्रह्म कहा गया है; असत्य ब्रह्मको दूषित करनेवाला है । असत्य, कठोर वचन, शठता तथा परनिन्दा - ये पापके कारण हैं । वाणी | तथा मनसे भी परायी स्त्री तथा पराये धनका हरण और परहिंसा कभी भी नहीं करनी चाहिये ॥ १३६–१३८ ॥ शूद्रके अन्न, बासी अन्न, [ शिवका ] नैवेद्य, श्राद्धके | अन्न, अनेक लोगोंके अधिकारवाले अन्न, समुदायविशेषके

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४२६ अन्नशुद्धौ सत्त्वशुद्धिर्न मृदा न जलेन वै शुद्ध भवेत्सिद्धिस्ततोऽन्नं परिशोधयेत् राजप्रतिग्रहैर्दग्धान् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः I स्विन्नानामपि बीजानां पुनर्जन्म न विद्यते ॥

राजप्रतिग्रहो घोरो बुद्ध्वा चादौ विषोपमः ।

बुधेन परिहर्तव्यः श्वमांसं चापि वर्जयेत् ॥

अस्नात्वा न च भुञ्जीयादजपोऽग्निमपूज्य च ।

पर्णपृष्ठे न भुञ्जीयाद्रात्रौ दीपं विना तथा ॥

भिन्नभाण्डे च रथ्यायां पतितानां च सन्निधौ ।

शूद्रशेषं न भुञ्जीयात्सहान्नं शिशुकैरपि ॥

शुद्धान्नं स्निग्धमश्नीयात्संस्कृतं चाभिमन्त्रितम् ।

भोक्ता शिव इति स्मृत्वा मौनी चैकाग्रमानसः ॥

आस्येन न पिबेत्तोयं तिष्ठन्नाञ्जलिनापि वा । वामहस्तेन शय्यायां तथैवान्यकरेण वा ।

विभीतकार्ककारञ्जस्नुहिच्छायां न चाश्रयेत् ।

स्तम्भदीपमनुष्याणामन्येषां प्राणिनां तथा ॥

एको न गच्छेदध्वानं बाहुभ्यां नोत्तरेन्नदीम् ।

नावरोहेत कूपादिं नारोहेदुच्चपादपान् ॥

सूर्याग्निजलदेवानां गुरूणां विमुखः शुभे ।

न कुर्यादिह कार्याणि जपकर्म शुभानि वा ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । लिये निर्मित अन्नका तथा राजाके अन्नका त्याग करना ॥ १४० चाहिये । अन्नकी शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है कि मिट्टी अथवा जलसे । अन्तःकरणकी पवित्रतासे, न सिद्धि प्राप्त होती है, अतः अन्नका शोधन करना चाहिये अर्थात् पवित्र अन्न ग्रहण करना चाहिये ॥ १३ ९ - १४० ॥ १४१ जैसे भुने हुए बीजोंका अंकुरण नहीं होता है, वैसे | ही ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंको भी राजाओंके प्रतिग्रहसे दग्ध जानना चाहिये । अर्थात् वे ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाते हैं । १४२ राजाओंसे प्रतिग्रह लेना पाप है तथा विषके समान है— प्रारम्भमें ही ऐसा जानकर बुद्धिमान्‌को इसे ग्रहण नहीं करना चाहिये और कुत्तेके मांसके समान इसका त्याग कर देना चाहिये ॥ १४१-१४२ ॥ १४३ बिना स्नान किये, बिना जप किये तथा बिना अग्निपूजन किये भोजन नहीं करना चाहिये । पत्तेके पृष्ठपर भोजन नहीं करना चाहिये तथा रातमें बिना दीपक जलाये भोजन नहीं करना चाहिये । टूटे हुए १४४ | पात्रमें, मार्गमें एवं पतितजनोंके समीप भोजन नहीं करना चाहिये । शूद्रोंका छोड़ा हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और शिशुओंके साथ भी भोजन नहीं करना १४५ चाहिये ॥ १४३-१४४ ॥ शुद्ध, स्निग्ध ( चिकना ), पका हुआ तथा अभिमन्त्रित अन्न ग्रहण करना चाहिये; भोजन करनेवाला शिव है-ऐसा समझकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर भोजन १४६ करना चाहिये । खड़े - खड़े, अंजुलिसे, मुख लगाकर, बायें हाथसे, शय्यापर तथा दायें हाथसे भी पानी नहीं पीना चाहिये ॥ १४५-१४६ ॥ बहेड़ा, अर्क ( मदार ), करंज तथा सेंहुड़के १४७ वृक्षकी छायामें शरण नहीं लेना चाहिये । किसी खम्भे, दीप, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियोंकी छायामें खड़े नहीं होना चाहिये ॥ १४७ ॥

दूर यात्रापर अकेले नहीं जाना चाहिये, भुजाओंके १४८ आदिमें सहारे तैरकर नदीको पार नहीं करना चाहिये, कूप नहीं उतरना चाहिये और लम्बे वृक्षोंपर नहीं चढ़ना चाहिये ॥ १४८ ॥

१४ ९ हे शुभे! सूर्य, अग्नि, जल, देवता तथा गुरुजनों के

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अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या ( पंचाक्षरमन्त्र ),

अग्नौ न तापयेत्पादौ हस्तं पद्भ्यां न संस्पृशेत् ।

अग्नेर्नोच्छ्रयमासीत नाग्नौ किञ्चिन्मलं त्यजेत् ॥ १५०

न जलं ताडयेत्पद्भ्यां नाम्भस्यङ्गमलं त्यजेत् ।

मलं प्रक्षालयेत्तीरे प्रक्षाल्य स्नानमाचरेत् ॥ १५१

नखाग्रकेशनिर्धूतस्नानवस्त्रघटोदकम् I अश्रीकरं मनुष्याणामशुद्धं संस्पृशेद्यदि ॥ १५२

अजाश्वानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तुषरेणुकान् ।

संस्पृशेद्यदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि ॥ १५३

मार्जारश्च गृहे यस्य सोऽप्यन्त्यजसमो नरः ।

भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि ॥ १५४

तच्चाण्डालसमं ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा ।

स्फिग्वातं शूर्पवातं च वातं प्राणमुखानिलम् ॥ १५५

सुकृतानि हरन्त्येते संस्पृष्टाः पुरुषस्य तु ।

उष्णीषी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो मलावृतः ॥ १५६

अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत्क्वचित् ।

क्रोधो मदः क्षुधा तन्द्रा निष्ठीवनविजृम्भणे ॥ १५७

श्वनीचदर्शनं निद्रा प्रलापास्ते जपद्विषः ।

एतेषां सम्भवे वापि कुर्यात्सूर्यादिदर्शनम् ॥ १५८

आचम्य वा जपेच्छेषं कृत्वा वा प्राणसंयमम् ।

सूर्योऽग्निश्चन्द्रमाश्चैव ग्रहनक्षत्रतारकाः ॥ १५ ९

जपविधान तथा उसकी महिमा ४२७ ५. विमुख होकर जपकर्म तथा [ अन्य ] शुभ कर्म नहीं करने | चाहिये ॥ १४ ९ ॥ अग्निमें पैरोंको तपाना नहीं चाहिये, पैरोंसे हाथका स्पर्श नहीं करना चाहिये, अग्निके ऊपर आसन नहीं बनाना चाहिये और अग्निमें कोई मल ( दूषित पदार्थ ) नहीं डालना चाहिये ॥ १५० ॥

पैरोंसे जल नहीं उछालना चाहिये, शरीरकी मैलको जलमें नहीं छोड़ना चाहिये; तटपर ही मलको साफ करना चाहिये और उसे साफ करके स्नान करना चाहिये ॥ १५१ ॥

नाखून तथा केशसे टपकता हुआ जल और स्नानवस्त्रका तथा घटका जल मनुष्योंके लिये श्रेयस्कर नहीं होता है; यदि कोई इसे स्पर्श करता है, तो अशुद्ध हो जाता है ॥ १५२ ॥

यदि कोई मूढ़ बुद्धिवाला [ मनुष्य ] बकरी, कुत्ता, गधा, ऊँट आदिसे उठी हुई धूल और झाड़ू लगाने से उठी हुई धूलका स्पर्श करता है, तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों ॥ १५३ ॥

जिसके घरमें बिल्ली रहती वह चाण्डालके समान होता है । यदि कोई मनुष्य बिल्लीकी सन्निधिमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, तो उसे चाण्डालके समान जानना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४ ९ / २ ॥ दूषित वायु, सूपकी वायु और प्राणियोंके मुखसे निकली हुई वायु – इनका सम्पर्क हो जानेपर ये मनुष्यके पुण्योंको नष्ट कर देते हैं । पगड़ी धारण करके, कंचुक पहनकर, नग्न होकर, केशोंको खोलकर, मैलसे युक्त होकर, अपवित्र हाथसे, अशुद्ध होकर तथा बात - चीत करते हुए कभी भी जप नहीं करना चाहिये ॥ १५५-१५६९ २ ॥ क्रोध, अहंकार, भूख, आलस्य, थूकना, जम्हाई, कुत्ते तथा नीच व्यक्तिका दर्शन, निद्रा तथा वार्तालाप-ये जपके शत्रु हैं; इनके उत्पन्न होनेपर सूर्य आदिका दर्शन करना चाहिये । पुनः आचमन करके अथवा प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिये । सूर्य, अग्नि,

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४२८

ते ज्योतींषि प्रोक्तानि विद्वद्भिर्ब्राह्मणैस्तथा ।

प्रसार्य पादौ न जपेत्कुक्कुटासन एव च ॥

अनासनः शयानो वा रथ्यायां शूद्रसन्निधौ ।

रक्तभूम्यां च खट्वायां न जपेज्जापकस्तथा ॥

आसनस्थो जपेत्सम्यक् मन्त्रार्थगतमानसः ।

कौशेयं व्याघ्रचर्मं वा चैलं तौलमथापि वा ॥

दारवं तालपर्णं वा आसनं परिकल्पयेत् ।

त्रिसन्ध्यं तु गुरोः पूजा कर्तव्या हितमिच्छता ॥

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः ।

यथा शिवस्तथा विद्या यथा विद्या तथा गुरुः ॥

शिवविद्या गुरोस्तस्माद्भक्त्या च सदृशं फलम् ।

सर्वदेवमयो देवि सर्वशक्तिमयो हि सः ॥

सगुण निर्गुणो वापि तस्याज्ञां शिरसा वहेत् ।

श्रेयोऽर्थी यस्तु गुर्वाज्ञां मनसापि न लङ्घयेत् ॥

गुर्वाज्ञापालकः सम्यक् ज्ञानसम्पत्तिमश्नुते ।

गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् भुञ्जन् यद्यत्कर्म समाचरेत् ॥

समक्षं यदि तत्सर्वं कर्तव्यं गुर्वनुज्ञया ।

गुरोर्देवसमक्षं वा न यथेष्टासनो भवेत् ॥

गुरुर्देवो यतः साक्षात्तद्गृहं देवमन्दिरम् ।

पापिनां च यथासङ्गात्तत्पापैः पतनं भवेत् ॥

तद्वदाचार्यसङ्गेन तद्धर्मफलभाग्भवेत् ।

यथैव वह्निसम्पर्कान्मलं त्यजति काञ्चनम् ॥

तथैव गुरुसम्पर्कात्पापं त्यजति मानवः ।

यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते ॥

तथा पापं विलीयेत आचार्यस्य समीपतः ।

यथा प्रज्वलितो वह्निर्विष्ठां काष्ठं च निर्दहेत् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे - ये विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा १६० | ज्योतिर्गण कहे गये हैं ॥ १५७ –१५ ९९ ॥ पैरोंको फैलाकर अथवा कुक्कुट आसनमें बैठकर जप नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार जापकको बिना १६१ | आसनके, लेटे हुए, मार्गपर, शूद्रके पास, रक्तभूमिपर अथवा चारपाईपर जप नहीं करना चाहिये । आसनपर बैठकर मनमें मन्त्रके अर्थका चिन्तन करते हुए भली-१६२ भाँति जप करना चाहिये । रेशमी वस्त्र, व्याघ्रचर्म, वस्त्र, रूई, लकड़ी अथवा ताड़के पत्तेका आसन बनाना १६३ चाहिये ॥ १६०–१६२१ / २ ॥ अपना हित चाहनेवालेको तीनों सन्ध्याओंमें गुरुकी पूजा करनी चाहिये । जो गुरु हैं, वे शिव कहे गये हैं १६४ और जो शिव हैं, वे गुरु कहे गये हैं । जैसे शिव हैं, वैसे ही विद्या; जैसी विद्या वैसे ही गुरु होते हैं । शिवविद्या उन गुरुसे ही ग्रहण की जा सकती है और भक्तिके द्वारा १६५ अनुकूल फल प्राप्त होता है । हे देवि! वे [ गुरु ] सर्वदेवस्वरूप तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं । गुरु सगुण हों अथवा निर्गुण – उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये । १६६ जो कल्याणका इच्छुक है, उसे मनसे भी गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये । पूर्णरूपसे गुरुकी आज्ञाका १६७ पालन करनेवाला [ शिष्य ] ज्ञानसम्पदा प्राप्त करता है । चलते हुए, बैठते हुए, सोते हुए अथवा खाते हुए [ शिष्य ] जो भी कर्म यदि गुरुके समक्ष करे, वह समस्त कार्य १६८ उनकी आज्ञासे ही करना चाहिये ॥ १६३–१६७ / २ ॥ गुरुदेवके समक्ष इच्छानुसार आसनपर नहीं बैठना चाहिये; क्योंकि गुरु साक्षात् देवता हैं और उनका घर १६ ९ देवमन्दिर है । जिस प्रकार पापियोंकी संगतिके कारण उनके पापोंसे [ व्यक्तिका ] पतन हो जाता है, उसी प्रकार गुरुकी संगतिसे [ व्यक्ति ] उनके धर्मफलका भागी होता १७० है । जैसे सुवर्ण अग्निके सम्पर्कसे अपने मैलका त्याग करता है, वैसे ही मनुष्य गुरुके सम्पर्कसे पापका त्याग १७१ करता है । जैसे अग्निके समीप स्थित कुम्भका घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्य ( गुरु ) –के सम्पर्कसे [ मनुष्यका ] पाप विलीन हो जाता है । जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि १७२ | मल तथा काष्ठको जला डालती है, उसी प्रकार प्रसन्न